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लोक-मण्डलों की विविधताएँ

इन दिनों, जब मनुष्य चन्द्रमा तक जाने का प्रयत्न कर रहे हैं, लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि कृष्णभावनामृत का सम्बन्ध किसी पुरानी-ढर्रे की वस्तु से है। जब संसार चन्द्रमा तक पहुँचने की प्रगति कर रहा है, तब हम हरे कृष्ण का जप कर रहे हैं। किन्तु लोगों को ग़लत न समझना चाहिए और यह नहीं मान लेना चाहिए कि हम आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति से पीछे हैं। हम समस्त वैज्ञानिक प्रगति को पहले ही पार कर चुके हैं। *भगवद्गीता* में कहा गया है कि उच्चतर लोकों तक पहुँचने का मनुष्य का प्रयत्न नवीन नहीं है। समाचारपत्रों की सुर्ख़ियाँ पढ़ती हैं, "चन्द्रमा पर मनुष्य के प्रथम पग", किन्तु संवाददाताओं को यह ज्ञात नहीं कि करोड़ों-करोड़ों मनुष्य वहाँ गए और लौट आए। यह पहली बार नहीं है। यह एक प्राचीन प्रथा है। *भगवद्गीता* (8.16) में स्पष्ट रूप से कहा गया है, *abrahma-bhuvanāl lokāḥ punar āvartino 'rjuna*: "हे प्रिय अर्जुन, यदि तुम सर्वोच्च लोक-मण्डल, जिसे ब्रह्मलोक कहा जाता है, तक भी चले जाओ, तो तुम्हें लौटना ही पड़ेगा।" अतः अन्तर्ग्रहीय यात्रा नवीन नहीं है। यह कृष्णभावनाभावित भक्तगण को ज्ञात है।

चूँकि हम कृष्णभावनाभावित हैं, अतः कृष्ण जो कहते हैं, उसे हम परम सत्य मानते हैं। वैदिक साहित्य के अनुसार अनेक लोक-मण्डल हैं। जिस लोक-मण्डल में हम रहते हैं, उसे भूर्लोक कहा जाता है। इस लोक-मण्डल के ऊपर भुवर्लोक है। उसके ऊपर स्वर्लोक है (चन्द्रमा स्वर्लोक लोक-मण्डल का है)। स्वर्लोक के ऊपर महर्लोक है; उसके ऊपर जनलोक है; और उसके ऊपर सत्यलोक है। इसी प्रकार, निम्नतर लोक-मण्डल भी हैं। इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड के भीतर लोक-मण्डलों के चौदह स्तर हैं, और सूर्य प्रधान ग्रह है। सूर्य का वर्णन ब्रह्मसंहिता (5.52) में किया गया है:

*yac-cakṣur eṣa savitā sakala-grahāṇāṁ*

*rājā samasta-sura-mūrtir aśeṣa-tejāḥ*

*yasyājñayā bhramati saṁbhṛta-kāla-cakro*

*govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi*

"मैं गोविन्द [कृष्ण] की आराधना करता हूँ, उन आदि भगवान् की, जिनके आदेश से सूर्य अपार शक्ति एवं ताप धारण करता है तथा अपनी कक्षा का अनुगमन करता है। सूर्य, जो समस्त लोक-मण्डलों में प्रधान है, परमेश्वर का नेत्र है।" वस्तुतः सूर्य के बिना हम देख नहीं सकते। हमें अपने नेत्रों पर अत्यधिक गर्व हो सकता है, किन्तु हम अपने पड़ोसी तक को नहीं देख सकते। लोग चुनौती देते हैं, "क्या तुम मुझे भगवान् दिखा सकते हो?" किन्तु वे देख क्या सकते हैं? उनके नेत्रों का क्या मूल्य है? भगवान् सस्ते नहीं हैं। हम सूर्य के प्रकाश के बिना कुछ भी नहीं देख सकते, फिर भगवान् की तो बात ही क्या। सूर्य के प्रकाश के बिना हम अन्धे हैं। रात्रि में हम कुछ भी नहीं देख सकते, और इसीलिए हम विद्युत् का प्रयोग करते हैं, क्योंकि सूर्य उपस्थित नहीं रहता।

विश्व-प्रकटीकरण में केवल एक ही सूर्य नहीं है; करोड़ों एवं अरबों सूर्य हैं। यह भी ब्रह्मसंहिता (5.40) में कहा गया है:

*yasya prabhā prabhavato jagad-aṇḍa-koṭi-*

*koṭiṣv aśeṣa-vasudhādi-vibhūti-bhinnam*

*tad brahma niṣkalam anantam aśeṣa-bhūtaṁ*

*govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi*

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, कृष्ण, की आध्यात्मिक देह-तेज को *ब्रह्मज्योति* कहा जाता है, और उस *ब्रह्मज्योति* में असंख्य लोक हैं। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश के भीतर अगणित ग्रह हैं, उसी प्रकार कृष्ण की देह के देदीप्यमान तेज में अगणित लोक एवं ब्रह्माण्ड हैं। हमें अनेक ब्रह्माण्डों का ज्ञान है, और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में एक सूर्य है। इस प्रकार करोड़ों एवं अरबों ब्रह्माण्ड हैं, तथा करोड़ों एवं अरबों सूर्य, चन्द्र एवं ग्रह हैं। किन्तु कृष्ण कहते हैं कि यदि कोई इन ग्रहों में से किसी एक पर जाने का प्रयत्न करे, तो वह केवल अपना समय व्यर्थ करेगा।

अब कोई चन्द्रमा पर चला गया है, किन्तु इससे मानव-समाज को क्या प्राप्त होगा? यदि इतना धन, इतनी ऊर्जा तथा दस वर्षों का परिश्रम व्यय करने के पश्चात् कोई चन्द्रमा पर जाकर केवल उसका स्पर्श कर ले, तो इसका क्या लाभ? क्या कोई वहाँ रह सकता है और अपने मित्रों को आने के लिए बुला सकता है? और यदि कोई वहाँ जाकर रह भी जाए, तो क्या लाभ होगा? जब तक हम इस भौतिक जगत् में हैं, चाहे इस ग्रह पर हों या अन्य ग्रहों पर, वही दुःख — जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था एवं रोग — हमारा अनुगमन करेंगे। हम उनसे स्वयं को मुक्त नहीं कर सकते।

यदि हम चन्द्रमा पर रहने जाएँ — यह मानते हुए कि यह सम्भव है — तो ऑक्सीजन-मुखौटे के साथ भी हम कब तक रह सकते हैं? इसके अतिरिक्त, यदि हमें वहाँ रहने का अवसर मिल भी जाए, तो हमें क्या प्राप्त होगा? सम्भवतः हम कुछ अधिक दीर्घ जीवन प्राप्त कर लें, किन्तु हम वहाँ सदा जीवित नहीं रह सकते। यह असम्भव है। और दीर्घ जीवन से हमें क्या प्राप्त होगा? *Taravaḥ kiṁ na jīvanti*: [भा. 2.3.18] क्या वृक्ष अनेकानेक वर्षों तक जीवित नहीं रहते? सान फ़्रांसिस्को के निकट मैंने एक वन देखा है, जहाँ एक वृक्ष सात हज़ार वर्ष पुराना है। किन्तु इससे क्या लाभ? यदि कोई सात हज़ार वर्ष तक एक ही स्थान पर खड़े रहने पर गर्व करे, तो यह कोई बहुत बड़ी विशेषता नहीं है।

कोई चन्द्रमा पर कैसे जाता है, कैसे लौटता है, इत्यादि एक बड़ी कथा है, और यह सब वैदिक साहित्य में वर्णित है। यह कोई बहुत नवीन प्रक्रिया नहीं है। किन्तु हमारी कृष्णभावनामृत-संस्था का लक्ष्य भिन्न है। हम अपना मूल्यवान् समय व्यर्थ नहीं करने जा रहे। कृष्ण कहते हैं, "इस ग्रह या उस ग्रह तक जाने का प्रयत्न करके अपना समय व्यर्थ मत करो। तुम्हें क्या प्राप्त होगा? तुम्हारे भौतिक दुःख तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हारा अनुगमन करेंगे।" इसलिए *चैतन्य-चरितामृत* (आदि 3.97) में लेखक द्वारा अति उत्तम रीति से कहा गया है:

*keha pāpe, keha puṇye kare viṣaya-bhoga*

*bhakti-gandha nāhi, yāte yāya bhava-roga*

"इस भौतिक जगत् में कोई भोग रहा है और कोई नहीं भोग रहा, किन्तु वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति कष्ट भोग रहा है, यद्यपि कुछ लोग सोचते हैं कि वे भोग रहे हैं, जबकि अन्य यह अनुभव करते हैं कि वे कष्ट भोग रहे हैं।" वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति कष्ट भोग रहा है। इस भौतिक जगत् में कौन रोग नहीं भोगता? कौन वृद्धावस्था से कष्ट नहीं पाता? कौन नहीं मरता? कोई वृद्ध नहीं होना चाहता अथवा रोग से कष्ट नहीं पाना चाहता, किन्तु प्रत्येक को ऐसा करना ही पड़ता है। तब भोग कहाँ है? यह भोग सब निरर्थक है, क्योंकि इस भौतिक जगत् के भीतर कोई भोग नहीं है। यह केवल हमारी कल्पना है। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए, "यह भोग है, और यह कष्ट है।" सब कुछ कष्ट ही है! इसलिए *चैतन्य-चरितामृत* में कहा गया है, "खाने, सोने, मैथुन एवं रक्षा के सिद्धान्त सदा विद्यमान रहेंगे, किन्तु वे भिन्न-भिन्न स्तरों पर विद्यमान रहेंगे।" उदाहरणार्थ, अमेरिकियों ने पूर्व जन्मों में किए गए पुण्यकर्मों के फलस्वरूप अमेरिका में जन्म लिया है। भारत में लोग दरिद्र हैं और कष्ट भोग रहे हैं, किन्तु यद्यपि अमेरिकी अति उत्तम मक्खन लगी रोटी खा रहे हैं और भारतीय बिना मक्खन के खा रहे हैं, फिर भी दोनों खा तो रहे ही हैं। भारत के दरिद्र होने के कारण समूची जनसंख्या भोजन के अभाव से मर नहीं गई। शरीर की चार प्रमुख माँगें — खाना, सोना, मैथुन एवं रक्षा — किसी भी परिस्थिति में सन्तुष्ट की जा सकती हैं, चाहे कोई अपुण्य अवस्था में जन्मा हो या पुण्य अवस्था में। किन्तु समस्या यह है कि जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था एवं रोग — इन चार सिद्धान्तों से कैसे मुक्त हुआ जाए।

यही वास्तविक समस्या है। यह "मैं क्या खाऊँगा?" नहीं है। पक्षियों एवं पशुओं के सम्मुख ऐसी कोई समस्या नहीं। प्रातःकाल वे तुरन्त चहचहाते हैं, "जी, जी, जी, जी।" वे जानते हैं कि उन्हें अपना भोजन मिल जाएगा। कोई नहीं मर रहा, और अति-जनसंख्या जैसी कोई वस्तु नहीं, क्योंकि प्रत्येक की व्यवस्था ईश्वर के प्रबन्ध से होती है। गुणात्मक भिन्नताएँ हैं, किन्तु भौतिक भोग की श्रेष्ठ गुणवत्ता प्राप्त करना जीवन का लक्ष्य नहीं है। वास्तविक समस्या यह है कि जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था एवं रोग से कैसे मुक्त हुआ जाए। यह इस ब्रह्माण्ड के भीतर यात्रा में समय व्यर्थ करने मात्र से हल नहीं हो सकती। यदि कोई सर्वोच्च ग्रह पर भी चला जाए, तो यह समस्या हल नहीं हो सकती, क्योंकि मृत्यु तो सर्वत्र है।

वैदिक जानकारी के अनुसार चन्द्रमा पर जीवन की अवधि दस हज़ार वर्ष है, और वहाँ का एक दिन यहाँ के छह मास के बराबर है। इस प्रकार दस हज़ार को एक सौ अस्सी से गुणा करने पर जो आता है, वह चन्द्रमा पर जीवन की अवधि है। किन्तु पृथ्वीवासियों के लिए चन्द्रमा पर जाकर वहाँ बहुत समय तक रहना असम्भव है। अन्यथा समूचा वैदिक साहित्य मिथ्या सिद्ध हो जाता। हम वहाँ जाने का प्रयत्न कर सकते हैं, किन्तु वहाँ रहना सम्भव नहीं। यह ज्ञान *वेदों* में है। इसलिए हम इस ग्रह या उस ग्रह पर जाने के लिए बहुत उत्सुक नहीं हैं। हम सीधे उस ग्रह पर जाने के लिए उत्सुक हैं, जहाँ कृष्ण रहते हैं। कृष्ण *भगवद्गीता* (9.25) में कहते हैं:

*yānti deva-vratā devān*

*pitṝn yānti pitṛ-vratāḥ*

*bhūtāni yānti bhūtejyā*

*yānti mad-yājino 'pi mām*

"कोई चन्द्रमा पर जा सकता है, अथवा कोई सूर्य पर या करोड़ों एवं अरबों अन्य ग्रहों पर भी जा सकता है, अथवा यदि कोई अत्यधिक भौतिक रूप से आसक्त हो तो वह यहीं रह सकता है — किन्तु जो मेरे भक्त हैं, वे मेरे पास आएँगे।" यही हमारा लक्ष्य है। कृष्णभावनामृत में दीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि शिष्य अन्ततः सर्वोच्च लोक, कृष्णलोक, तक जा सके। हम निष्क्रिय बैठे नहीं हैं; हम भी अन्य ग्रहों पर जाने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु हम केवल समय व्यर्थ नहीं कर रहे।

एक विवेकशील एवं बुद्धिमान् मनुष्य किसी भी भौतिक ग्रह में प्रवेश की कामना नहीं करता, क्योंकि भौतिक दुःखों की चार दशाएँ उन सब पर विद्यमान हैं। *भगवद्गीता* से हम यह समझ सकते हैं कि यदि हम इस ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोक-मण्डल, ब्रह्मलोक, में भी प्रवेश कर जाएँ, तो भी दुःख के चार सिद्धान्त उपस्थित रहेंगे। हम *भगवद्गीता* से यह सीखते हैं कि ब्रह्मलोक पर एक दिन की अवधि हमारी गणना के अनुसार करोड़ों वर्षों के बराबर है। यह तथ्य है।

सर्वोच्च लोक-मण्डल, ब्रह्मलोक, तक भी पहुँचा जा सकता है, किन्तु वैज्ञानिक कहते हैं कि स्पुतनिक की गति से इसमें चालीस हज़ार वर्ष लगेंगे। चालीस हज़ार वर्ष तक अन्तरिक्ष में यात्रा करने के लिए कौन तैयार है? वैदिक साहित्य से हम यह समझ सकते हैं कि हम किसी भी ग्रह में प्रवेश कर सकते हैं, बशर्ते हम उस प्रयोजन के लिए तैयारी करें। यदि कोई उच्चतर लोक-मण्डलों में प्रवेश करने के लिए स्वयं को तैयार कर ले, जो कहा जाता है कि देवताओं द्वारा बसाए गए हैं, तो वह वहाँ जा सकता है। इसी प्रकार, कोई निम्नतर लोक-मण्डल में जा सकता है, अथवा यदि कोई चाहे तो इसी ग्रह पर रह सकता है। अन्ततः, यदि कोई चाहे तो वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लोक में प्रवेश कर सकता है। यह सब तैयारी का विषय है। तथापि, हमारे भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर समस्त लोक-मण्डल अस्थायी हैं। कुछ भौतिक ग्रहों पर जीवन की अवधि अत्यधिक दीर्घ हो सकती है, किन्तु भौतिक ब्रह्माण्ड के समस्त जीव अन्ततः विनाश के अधीन हैं और उन्हें पुनः अन्य शरीर विकसित करने पड़ते हैं। शरीरों के भिन्न-भिन्न प्रकार हैं। एक मानव-शरीर सौ वर्ष विद्यमान रहता है, जबकि एक कीट का शरीर बारह घण्टे विद्यमान रह सकता है। इस प्रकार इन भिन्न-भिन्न शरीरों की अवधि सापेक्ष है। किन्तु यदि कोई वैकुण्ठलोक नामक ग्रह में, उस आध्यात्मिक लोक में, प्रवेश कर जाए, तो वह आनन्द एवं ज्ञान से परिपूर्ण नित्य जीवन प्राप्त कर लेता है। एक मनुष्य उस पूर्णता को प्राप्त कर सकता है, यदि वह प्रयत्न करे। यह *भगवद्गीता* में कहा गया है, जब भगवान् कहते हैं, "जो कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विषय में यथार्थ रूप से जानता है, वह मेरे स्वभाव को प्राप्त कर सकता है।"

अनेक लोग दावा करते हैं, "भगवान् महान् हैं", किन्तु यह एक घिसा-पिटा वाक्यांश है। मनुष्य को यह जानना चाहिए कि वे कैसे महान् हैं, और यह अधिकृत शास्त्र से जाना जा सकता है। *भगवद्गीता* में भगवान् स्वयं का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं, "एक साधारण मनुष्य के समान जन्म लेने का मेरा प्राकट्य वस्तुतः दिव्य है।" भगवान् इतने कृपालु हैं कि वे एक साधारण मनुष्य के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं, किन्तु उनका शरीर ठीक मानव-शरीर जैसा नहीं है। वे धूर्त, जो उनके विषय में नहीं जानते, सोचते हैं कि कृष्ण हम में से किसी एक के समान हैं। यह भी *भगवद्गीता* (9.11) में कहा गया है:

*avajānanti māṁ mūḍhā*

*mānuṣīṁ tanum āśritam*

*paraṁ bhāvam ajānanto*

*mama bhūta-maheśvaram*

"मूर्ख लोग मेरा उपहास करते हैं, जब मैं मानव-रूप में अवतरित होता हूँ। वे मेरे दिव्य स्वभाव तथा समस्त सत्ता पर मेरे परम आधिपत्य को नहीं जानते।" हमें कृष्ण के विषय में जानने का अवसर है, बशर्ते हम उचित निर्देशन में उचित साहित्य का अध्ययन करें; और यदि हम केवल यह जान लें कि भगवान् का स्वभाव क्या है, तो इस एक तथ्य को समझ लेने मात्र से हम मुक्त हो जाते हैं। हमारी मानवीय अवस्था में परम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को पूर्णतः समझना सम्भव नहीं है, किन्तु *भगवद्गीता* की सहायता से, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा दिए गए कथनों की सहायता से, तथा आध्यात्मिक गुरु की सहायता से, हम उन्हें अपनी सामर्थ्यानुसार जान सकते हैं। यदि हम उन्हें यथार्थतः जान लें, तो इस शरीर को त्यागते ही हम भगवद्धाम में प्रवेश कर सकते हैं। कृष्ण कहते हैं, *tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so 'rjuna*: "इस शरीर को त्यागकर, जो ज्ञान में स्थित है, वह पुनः इस भौतिक जगत् में नहीं आता, क्योंकि वह आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करता है और मेरे पास आता है।" (गीता 4.9)

हमारे कृष्णभावनामृत-आन्दोलन का प्रयोजन इस उन्नत वैज्ञानिक विचार का सामान्य जनों में प्रचार करना है, और प्रक्रिया अत्यन्त सरल है। केवल भगवान् के पवित्र नामों का जप करने मात्र से — हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे — मनुष्य अपने हृदय की मलिनता को शुद्ध करता है और यह बोध प्राप्त करता है कि वह परमेश्वर का अंश है और उनकी सेवा करना उसका कर्तव्य है। यह प्रक्रिया अत्यन्त आनन्ददायक है: हम हरे कृष्ण मन्त्र का जप करते हैं, हम लयबद्ध रूप से नृत्य करते हैं, और हम सुस्वादु प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस जीवन का आनन्द लेते हुए ही हम अपने अगले जीवन में भगवद्धाम में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं। यह कोई मनगढ़न्त बात नहीं है — यह सब तथ्य है। यद्यपि किसी सामान्य व्यक्ति को यह मनगढ़न्त प्रतीत होता है, तथापि कृष्ण उसके सम्मुख भीतर से स्वयं को प्रकट करते हैं, जो ईश्वर-साक्षात्कार के विषय में गम्भीर है। कृष्ण तथा आध्यात्मिक गुरु — दोनों निष्ठावान् आत्मा की सहायता करते हैं। आध्यात्मिक गुरु ईश्वर का बाह्य प्राकट्य है, जो प्रत्येक के हृदय में परमात्मा के रूप में स्थित है। जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने के विषय में अत्यन्त गम्भीर है, उसके लिए परमात्मा तत्क्षण सहायता प्रदान करते हैं, उसे किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की ओर निर्दिष्ट करके। इस प्रकार आध्यात्मिक साधक को भीतर एवं बाहर — दोनों से सहायता मिलती है।

भागवत पुराण के अनुसार, परम सत्य का साक्षात्कार तीन अवस्थाओं में होता है। प्रथम निराकार ब्रह्म, अथवा निर्विशेष परम; तत्पश्चात् परमात्मा, अथवा ब्रह्म का स्थानिक पक्ष। परमाणु के न्यूट्रॉन को परमात्मा का प्रतिनिधित्व माना जा सकता है, जो परमाणु में भी प्रवेश करते हैं। यह ब्रह्मसंहिता में वर्णित है। किन्तु अन्ततः परम दिव्य सत्ता का साक्षात्कार उस परम सर्व-आकर्षक पुरुष (कृष्ण) के रूप में होता है, जो ऐश्वर्य, बल, यश, सौन्दर्य, ज्ञान एवं त्याग की पूर्ण एवं अचिन्त्य सामर्थ्यों से युक्त हैं। ये छह सामर्थ्य श्रीराम तथा श्रीकृष्ण द्वारा पूर्णतः प्रदर्शित होती हैं, जब वे मनुष्यों के सम्मुख अवतरित होते हैं। मनुष्यों का केवल एक वर्ग — अनन्य भक्तगण — प्रकट शास्त्रों के प्रमाण पर कृष्ण को पहचान सकता है, किन्तु अन्य लोग भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से मोहित रहते हैं। अतः परम सत्य ही परम पुरुष है, जिसका कोई समकक्ष अथवा प्रतिद्वन्द्वी नहीं। निराकार ब्रह्म की किरणें उनकी दिव्य देह की किरणें हैं, ठीक जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से उद्भूत होती हैं।

*विष्णु पुराण* के अनुसार, भौतिक ऊर्जा को *अविद्या*, अथवा अज्ञान, कहा जाता है, और वह इन्द्रिय-भोग की सकाम क्रियाओं में प्रकट होती है। किन्तु यद्यपि प्राणी में इन्द्रिय-भोग के लिए भौतिक ऊर्जा द्वारा मोहित एवं फँसाए जाने की प्रवृत्ति है, तथापि वह अभौतिक ऊर्जा, अथवा आध्यात्मिक ऊर्जा, का है। इस अर्थ में प्राणी सकारात्मक ऊर्जा है, जबकि पदार्थ नकारात्मक ऊर्जा है। पदार्थ तब तक विकसित नहीं होता, जब तक वह श्रेष्ठ आध्यात्मिक, अथवा अभौतिक, ऊर्जा के सम्पर्क में न आए, जो प्रत्यक्षतः आध्यात्मिक समग्र का अंश है। प्राणियों द्वारा प्रकट इस आध्यात्मिक ऊर्जा का विषय निस्सन्देह एक साधारण मनुष्य के लिए अत्यन्त जटिल है, जो इसीलिए इस विषय से चकित रह जाता है। कभी वह इसे अपूर्ण इन्द्रियों के माध्यम से आंशिक रूप से समझ लेता है, और कभी वह इसे जानने में पूर्णतः असफल रहता है। इसलिए सर्वश्रेष्ठ यही है कि सर्वोच्च अधिकारी, श्रीकृष्ण, से, अथवा उनके भक्त से, जो गुरु-परम्परा की शृंखला में उनका प्रतिनिधित्व करता है, श्रवण किया जाए।

यह कृष्णभावनामृत-आन्दोलन ईश्वर को समझने के प्रयोजन के लिए अभिप्रेत है। आध्यात्मिक गुरु कृष्ण का जीवित प्रतिनिधि है, जो बाह्य रूप से सहायता करता है, और परमात्मा के रूप में कृष्ण आन्तरिक रूप से सहायता करते हैं। जीव ऐसे मार्गदर्शन का लाभ उठाकर अपने जीवन को सफल बना सकता है। हम अनुरोध करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति इस आन्दोलन को समझने के लिए प्रामाणिक साहित्य का अध्ययन करे। हमने *भगवद्गीता यथारूप*; *टीचिंग्स ऑफ़ लॉर्ड चैतन्य*; *श्रीमद्भागवत*; *कृष्ण, द सुप्रीम पर्सनैलिटी ऑफ़ गॉडहेड*; तथा *द नेक्टर ऑफ़ डिवोशन* प्रकाशित किए हैं। हम अपनी पत्रिका *बैक टू गॉडहेड* भी प्रतिमास अनेक भाषाओं में प्रकाशित कर रहे हैं। हमारा ध्येय मानव-समाज को जन्म एवं मृत्यु के चक्र में पुनः-पुनः अवतरित होने के संकटों से बचाना है।

प्रत्येक को कृष्ण तक जाने का प्रयत्न करना चाहिए। हमने अपनी *बैक टू गॉडहेड* पत्रिका में "बियॉन्ड द यूनिवर्स" शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया है। यह लेख *भगवद्गीता* में निहित ज्ञान के अनुसार इस ब्रह्माण्ड से परे एक स्थान का वर्णन करता है। *भगवद्गीता* एक अत्यन्त लोकप्रिय ग्रन्थ है, और अमेरिका में तथा भारत से भी इसके अनेक संस्करण हैं। किन्तु दुर्भाग्यवश, अनेक धूर्त *भगवद्गीता* का प्रचार करने के लिए पश्चिम में आए हैं। उन्हें धूर्त इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे ठग हैं, जो वास्तविक जानकारी नहीं देते। किन्तु हमारी *भगवद्गीता यथारूप* में आध्यात्मिक प्रकृति का प्रामाणिक रूप से वर्णन है।

इस विश्व-प्रकटीकरण को "प्रकृति" कहा जाता है, किन्तु एक अन्य प्रकृति है, जो श्रेष्ठ है। विश्व-प्रकटीकरण निम्न प्रकृति है, किन्तु इस प्रकृति से परे, जो व्यक्त एवं अव्यक्त है, एक अन्य प्रकृति है, जिसे सनातन, नित्य, कहा जाता है। यह समझना सरल है कि यहाँ जो कुछ भी व्यक्त है, वह अस्थायी है। स्पष्ट उदाहरण हमारा शरीर है। यदि कोई तीस वर्ष का है, तो तीस वर्ष पूर्व उसका शरीर व्यक्त नहीं था, और अन्य पचास वर्षों में वह पुनः अव्यक्त हो जाएगा। यह प्रकृति का तथ्यपरक नियम है। वह व्यक्त होता है और पुनः विनष्ट हो जाता है, ठीक जैसे समुद्र में लहरें बारम्बार उठती हैं और फिर शान्त हो जाती हैं। किन्तु भौतिकतावादी केवल इस नश्वर जीवन से सरोकार रखता है, जो किसी भी क्षण समाप्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त, जैसे यह शरीर मरेगा, वैसे ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, यह विशाल भौतिक देह, विनष्ट हो जाएगा, और चाहे हम सौभाग्यशाली हों या दुर्भाग्यशाली, इस ग्रह पर हों या किसी अन्य ग्रह पर, सब कुछ समाप्त हो जाएगा। तब हम ऐसे ग्रह तक जाने का प्रयत्न करके अपना समय क्यों व्यर्थ कर रहे हैं, जहाँ सब कुछ समाप्त हो जाएगा? हमें कृष्णलोक तक जाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह आध्यात्मिक विज्ञान है; हमें इसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए, और स्वयं इसे समझ लेने के पश्चात् हमें इस सन्देश का समूचे संसार में प्रचार करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अन्धकार में है। यद्यपि लोगों के पास ज्ञान नहीं है, फिर भी वे अत्यधिक अहंकारी हैं। किन्तु दस वर्षों के परिश्रम के पश्चात् चन्द्रमा पर जाकर एक पत्थर लेकर लौट आना ज्ञान की उन्नति नहीं है। अन्तरिक्ष-यात्री अत्यधिक अहंकारी हैं: "ओह, मैंने इसका स्पर्श कर लिया।" किन्तु उन्होंने प्राप्त क्या किया? यदि हम वहाँ रहने में समर्थ भी हो जाएँ, तो वह दीर्घकाल के लिए नहीं होगा। अन्त में वह सब विनष्ट हो जाएगा।

उस ग्रह को खोजने का प्रयत्न करो, जहाँ से कोई कभी नहीं लौटेगा, जहाँ नित्य जीवन है, और जहाँ कोई कृष्ण के साथ नृत्य कर सकता है। यही कृष्णभावनामृत का अर्थ है। इस आन्दोलन को गम्भीरता से लो, क्योंकि कृष्णभावनामृत मनुष्य को कृष्ण तक पहुँचने तथा उनके साथ नित्य नृत्य करने का अवसर देता है। वैदिक साहित्य से हम समझते हैं कि यह भौतिक जगत् ईश्वर की सम्पूर्ण सृष्टि के केवल एक-चौथाई का प्रकटीकरण है। ईश्वर की सृष्टि का तीन-चौथाई भाग आध्यात्मिक जगत् है। यह हमें *भगवद्गीता* में मिलता है। कृष्ण कहते हैं, "यह भौतिक जगत् समग्र का एक भिन्नात्मक अंश मात्र है।" यदि हम जहाँ तक देख सकते हैं वहाँ तक देखें — आकाश तक — तो भी हमारी दृष्टि केवल एक ही ब्रह्माण्ड के भीतर सीमित रहती है, और जिसे भौतिक जगत् कहा जाता है, उसके भीतर असीमित ब्रह्माण्ड एक साथ गुच्छों में हैं। किन्तु असीमित संख्या वाले ब्रह्माण्डों के उन गुच्छों से परे आध्यात्मिक आकाश है, जिसका उल्लेख *भगवद्गीता* में भी है, जहाँ भगवान् कहते हैं कि भौतिक जगत् से परे एक अन्य प्रकृति है, जो नित्य है; उसके आरम्भ का कोई इतिहास नहीं, और उसका कोई अन्त नहीं। "नित्य" उसे कहते हैं, जिसका न अन्त है न आदि। इसलिए वैदिक धर्म को नित्य कहा जाता है, क्योंकि कोई यह नहीं खोज सकता कि वह कब आरम्भ हुआ। ईसाई धर्म का इतिहास दो हज़ार वर्ष का है, और मुहम्मदी धर्म का भी इतिहास है, किन्तु यदि कोई वैदिक धर्म को पीछे की ओर खोजे, तो उसे उसका ऐतिहासिक आरम्भ नहीं मिलेगा। इसलिए उसे नित्य धर्म कहा जाता है।

हम उचित रूप से कह सकते हैं कि ईश्वर ने इस भौतिक जगत् की रचना की, और यह संकेत करता है कि ईश्वर सृष्टि से पूर्व विद्यमान था। यही "रचा" शब्द यह सूचित करता है कि विश्व-प्रकटीकरण की रचना से पूर्व भगवान् विद्यमान थे। इसलिए ईश्वर सृष्टि के अधीन नहीं है। यदि ईश्वर सृष्टि के अधीन होता, तो वह रचना कैसे कर सकता था? इसके बजाय वह इस भौतिक सृष्टि की वस्तुओं में से एक होता। किन्तु ईश्वर सृष्टि के अधीन नहीं है; वह सृष्टिकर्ता है, और इसलिए वह नित्य है।

एक आध्यात्मिक आकाश है, जहाँ अगणित आध्यात्मिक लोक तथा अगणित आध्यात्मिक जीव हैं, किन्तु जो उस आध्यात्मिक जगत् में रहने योग्य नहीं हैं, उन्हें इस भौतिक जगत् में भेज दिया जाता है। स्वेच्छा से हमने इस भौतिक शरीर को स्वीकार किया है, किन्तु वास्तव में हम आत्माएँ हैं, जिन्हें इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए था। हमने इसे कब और कैसे स्वीकार किया, इसका पता नहीं लगाया जा सकता। कोई भी यह इतिहास नहीं खोज सकता कि बद्ध आत्मा ने भौतिक शरीर को सर्वप्रथम कब स्वीकार किया। जीवों के 84,00,000 रूप हैं — जल में, 20,00,000 जीव-योनियाँ पादप एवं वनस्पतियों में हैं। दुर्भाग्यवश, यह वैदिक ज्ञान किसी विश्वविद्यालय द्वारा नहीं पढ़ाया जाता। किन्तु ये तथ्य हैं। वनस्पति-शास्त्री एवं नृविज्ञानी वैदिक निष्कर्ष पर शोध करें। डार्विन का सावयव पदार्थ के विकास का सिद्धान्त निस्सन्देह विद्या-संस्थानों में अत्यन्त प्रमुख है। किन्तु भागवत पुराण तथा वैज्ञानिक परिमाण के अन्य प्रामाणिक शास्त्र यह वर्णन करते हैं कि भिन्न-भिन्न देह-रूपों में जीव किस प्रकार एक के बाद एक विकसित होते हैं। यह कोई नवीन विचार नहीं है, किन्तु शिक्षक केवल डार्विन के सिद्धान्त पर बल दे रहे हैं, यद्यपि वैदिक साहित्य में हमारे पास इस भौतिक जगत् की जीवन-दशाओं की विपुल जानकारी है।

हम तो भौतिक जगत् के अनेक ब्रह्माण्डों में स्थित समस्त जीवों का एक भिन्नात्मक अंश मात्र हैं। जो भौतिक जगत् में तथा भौतिक शरीर में हैं, वे दण्डित हैं। उदाहरणार्थ, कारागार की जनसंख्या सरकार द्वारा दण्डित है, किन्तु उनकी संख्या समूची जनसंख्या का एक अंश मात्र है। ऐसा नहीं कि समूची जनसंख्या कारागार जाती है; कुछ, जो अवज्ञाकारी हैं, कारागार में बन्दी हैं। इसी प्रकार, इस भौतिक जगत् के भीतर बद्ध आत्माएँ ईश्वर की सृष्टि के समस्त जीवों का एक अंश मात्र हैं, और चूँकि उन्होंने ईश्वर की अवज्ञा की है — चूँकि उन्होंने कृष्ण के आदेश का पालन नहीं किया — इसलिए उन्हें इस भौतिक जगत् में डाल दिया गया है। यदि कोई विवेकशील एवं जिज्ञासु है, तो उसे यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए: "मुझे इस बद्ध जीवन में क्यों डाला गया है? मैं कष्ट नहीं भोगना चाहता।"

तीन प्रकार के दुःख हैं, जिनमें शरीर एवं मन से सम्बन्धित दुःख भी सम्मिलित हैं। हवाई में, मेरे घर के सम्मुख, एक मनुष्य कुछ पशु एवं पक्षी रख रहा था, ताकि उन्हें वध के लिए ले जाया जा सके। मैंने अपने शिष्यों को यह उदाहरण दिया: "ये पशु यहाँ खड़े हैं, और यदि तुम उनसे कहो, 'ओ मेरे प्रिय पशुओ, तुम यहाँ क्यों खड़े हो? चले जाओ! तुम वधशाला के लिए अभिप्रेत हो', तो भी वे जा नहीं सकते। उनमें बुद्धि नहीं है।"

ज्ञान के बिना, निवारण के बिना, कष्ट भोगना पशु-जीवन है। जो यह नहीं समझ पाता कि वह कष्ट भोग रहा है और जो सोचता है कि वह बहुत सुखी है, वह पशु-चेतना में है, मानव-चेतना में नहीं। मनुष्य को इस ग्रह के त्रिविध दुःखों को भोगने के प्रति सचेत होना चाहिए। मनुष्य को यह जानना चाहिए कि वह जन्म में कष्ट भोग रहा है, मृत्यु में कष्ट भोग रहा है, वृद्धावस्था में कष्ट भोग रहा है तथा रोग में कष्ट भोग रहा है, और मनुष्य को इस विषय में जिज्ञासु होना चाहिए कि वह इस कष्ट से कैसे बच सकता है। यही वास्तविक शोध-कार्य है।

हम अपने जन्म के आरम्भ से ही कष्ट भोगते आए हैं। शिशु के रूप में, मनुष्य नौ मास तक माता के उदर में एक वायुरुद्ध थैली में कसकर रखा जाता है। वह हिल तक नहीं सकता, कीड़े उसे काटते हैं, और वह विरोध नहीं कर सकता। शिशु के बाहर आने के पश्चात् कष्ट चलता रहता है। माता निस्सन्देह बहुत देखभाल करती है, फिर भी शिशु रोता है, क्योंकि वह कष्ट भोग रहा है। खटमल काट रहे होते हैं अथवा उसके पेट में पीड़ा होती है; शिशु रोता है, और माता नहीं जानती कि उसे कैसे शान्त किया जाए। उसका कष्ट उसकी माता के गर्भ में आरम्भ होता है। फिर, उसके जन्म के पश्चात्, ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता है, और अधिक कष्ट होता है। वह विद्यालय नहीं जाना चाहता, किन्तु उसे विवश किया जाता है। वह अध्ययन नहीं करना चाहता, किन्तु शिक्षक उसे कार्य देता है। यदि हम अपने जीवन का विश्लेषण करें, तो हम पाएँगे कि वह कष्ट से परिपूर्ण है। तब हम यहाँ क्यों आ रहे हैं? बद्ध आत्माएँ बहुत प्रबुद्ध नहीं हैं। हमें पूछना चाहिए, "मैं कष्ट क्यों भोग रहा हूँ?" यदि कोई निवारण है, तो हमें उसका लाभ अवश्य उठाना चाहिए।

हम परमेश्वर से नित्य रूप से सम्बन्धित हैं, किन्तु किसी-न-किसी प्रकार हम अब भौतिक कल्मष में हैं। इसलिए हमें कोई ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए, जिसके द्वारा हम पुनः आध्यात्मिक जगत् में लौट सकें। उस संयोजन-प्रक्रिया को योग कहा जाता है। योग शब्द का वास्तविक अनुवाद "जोड़" है। वर्तमान क्षण में हम ईश्वर के बिना हैं, अथवा परम के बिना हैं। किन्तु जब हम स्वयं को जोड़ लेते हैं — संयुक्त कर लेते हैं — तब हमारा मानव-जीवन पूर्ण हो जाता है। अपने जीवनकाल में हमें पूर्णता के उस बिन्दु तक पहुँचने का अभ्यास करना होता है, और मृत्यु के समय, जब हम इस भौतिक शरीर को त्यागते हैं, उस पूर्णता का साक्षात्कार हो जाना चाहिए। मृत्यु के समय मनुष्य को तैयार रहना चाहिए। उदाहरणार्थ, विद्यार्थी महाविद्यालय में दो से पाँच वर्ष तक तैयारी करते हैं, और उनकी शिक्षा की अन्तिम परीक्षा परीक्षण होती है। यदि वे परीक्षा उत्तीर्ण कर लें, तो उन्हें उपाधि मिलती है। इसी प्रकार, जीवन के विषय में, यदि हम मृत्यु के समय की परीक्षा के लिए तैयारी करें और उसे उत्तीर्ण कर लें, तो हम आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं। मृत्यु के समय प्रत्येक वस्तु की परीक्षा होती है।

एक अत्यन्त प्रचलित बंगाली कहावत है, जो कहती है कि मनुष्य पूर्णता के लिए जो कुछ करता है, उसका परीक्षण उसकी मृत्यु के समय होगा। *भगवद्गीता* यह वर्णन करती है कि हमें अपनी मृत्यु के बिन्दु पर क्या करना चाहिए, जब हम इस वर्तमान शरीर को त्याग रहे होते हैं। ध्यान-योगी (ध्यानी) के लिए श्रीकृष्ण निम्नलिखित श्लोक कहते हैं:

*yad akṣaraṁ veda-vido vadanti*

*viśanti yad yatayo vīta-rāgāḥ*

*yad icchanto brahmacaryaṁ caranti*

*tat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣye*

*sarva-dvārāṇi saṁyamya*

*mano hṛdi nirudhya ca*

*mūrdhny ādhāyātmanaḥ prāṇam*

*āsthito yoga-dhāraṇām*

"*वेदों* में पारंगत व्यक्ति, जो *ओंकार* का उच्चारण करते हैं और जो संन्यास-आश्रम में महान् ऋषि हैं, ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। ऐसी पूर्णता की कामना से मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन करता है। अब मैं तुम्हें वह प्रक्रिया समझाऊँगा, जिसके द्वारा मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। योग की स्थिति समस्त इन्द्रिय-व्यापारों से विरक्ति की है। इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बन्द करके तथा मन को हृदय में और प्राणवायु को मस्तक के शीर्ष पर स्थिर करके, मनुष्य स्वयं को योग में स्थापित करता है।" (गीता 8.11-12) योग-पद्धति में इस प्रक्रिया को *प्रत्याहार* कहा जाता है, जिसका तकनीकी भाषा में अर्थ है "विपरीत"। अब नेत्र सांसारिक सौन्दर्य देखने में लगे हैं, अतः मनुष्य को उन्हें उस सौन्दर्य के भोग से हटाकर भीतर के सौन्दर्य के दर्शन पर एकाग्र करना होता है। उसे ही *प्रत्याहार* कहते हैं। इसी प्रकार, मनुष्य को *ओंकार* की ध्वनि भीतर से सुननी होती है।

*oṁ ity ekākṣaraṁ brahma*

*vyāharan mām anusmaran*

*yaḥ prayāti tyajan dehaṁ*

*sa yāti paramāṁ gatim*

"इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परम संयोग, पवित्र अक्षर *ओं*, का उच्चारण करके, यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का चिन्तन करे और अपने शरीर को त्यागे, तो वह निश्चय ही आध्यात्मिक लोकों को प्राप्त करेगा।" (गीता 8.13) इस प्रकार समस्त इन्द्रियों को उनके बाह्य व्यापारों में रोकना होता है, और मन को *विष्णु-मूर्ति*, भगवान् विष्णु के रूप, पर एकाग्र करना होता है। यही योग की पूर्णता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे हृदय पर स्थिर करना होता है। जब मन हृदय के भीतर स्थिर होता है और प्राणवायु मस्तक के शीर्ष पर स्थानान्तरित होती है, तब मनुष्य योग की पूर्णता प्राप्त कर सकता है।

तब पूर्ण योगी निर्धारित करता है कि उसे कहाँ जाना है। अगणित भौतिक लोक हैं, और इन लोकों से परे आध्यात्मिक जगत् है। योगियों को यह जानकारी वैदिक शास्त्रों से प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ, संयुक्त राज्य अमेरिका आने से पूर्व मैंने ग्रन्थों से इसके वर्णन पढ़े थे। इसी प्रकार, उच्चतर लोकों तथा आध्यात्मिक जगत् का वर्णन वैदिक शास्त्रों में पाया जा सकता है। योगी सब कुछ जानता है; वह स्वयं को किसी भी ग्रह पर, जो उसे प्रिय हो, स्थानान्तरित कर सकता है। उसे अन्तरिक्ष-यान की सहायता की आवश्यकता नहीं।

भौतिक वैज्ञानिक अनेक वर्षों से प्रयत्न कर रहे हैं, और वे सौ अथवा एक हज़ार वर्ष और प्रयत्न करते रहेंगे, किन्तु वे कभी किसी ग्रह तक नहीं पहुँचेंगे। सम्भवतः किसी वैज्ञानिक प्रक्रिया से एक या दो मनुष्य किसी ग्रह तक पहुँच जाएँ, किन्तु वह सामान्य प्रक्रिया नहीं है। अन्य ग्रहों पर स्थानान्तरण की सामान्यतः मान्य प्रक्रिया योग-पद्धति अथवा ज्ञान-पद्धति का अभ्यास है। किन्तु भक्ति-पद्धति किसी भौतिक ग्रह पर स्थानान्तरण के लिए अभिप्रेत नहीं है। जो कृष्ण, अथवा परमेश्वर, की भक्ति में संलग्न हैं, उन्हें इस भौतिक जगत् के किसी भी ग्रह में रुचि नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं कि मनुष्य चाहे जिस ग्रह पर स्वयं को उन्नत कर ले, उसे वहाँ भी भौतिक अस्तित्व के चार सिद्धान्त मिलेंगे ही। कुछ ग्रहों पर जीवन की अवधि इस पृथ्वी की अपेक्षा कहीं अधिक दीर्घ है, किन्तु मृत्यु वहाँ भी है। किन्तु जो कृष्णभावनाभावित हैं, वे जन्म, मृत्यु, रोग एवं वृद्धावस्था के इस भौतिक जीवन को लाँघ जाते हैं।

आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है इस झंझट एवं दुःख से मुक्ति। इसलिए जो बुद्धिमान् हैं, वे स्वयं को इस भौतिक जगत् के किसी भी ग्रह पर उन्नत करने का प्रयत्न नहीं करते। मनुष्य चन्द्रमा तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं, और यद्यपि उस ग्रह में प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन है, फिर भी यदि हम प्रवेश पा लें, तो हमारे जीवन की अवधि बढ़ जाएगी। निस्सन्देह, यह इस शरीर में जीवन पर लागू नहीं होता। यदि हम इस शरीर के साथ चन्द्रमा में प्रवेश करें, तो तत्क्षण मृत्यु निश्चित होगी।

जब कोई किसी लोक-मण्डल में प्रवेश करता है, तो उसके पास उस ग्रह के लिए उपयुक्त शरीर होना चाहिए। प्रत्येक ग्रह उस ग्रह के लिए उपयुक्त शरीरों वाले जीवों से बसा हुआ है। उदाहरणार्थ, हम इस शरीर में जल में प्रवेश तो कर सकते हैं, किन्तु वहाँ रह नहीं सकते। हम वहाँ पन्द्रह या सोलह घण्टे, अथवा सम्भवतः चौबीस घण्टे रह सकते हैं, किन्तु बस इतना ही। जलचर प्राणियों के, तथापि, ऐसे विशिष्ट शरीर होते हैं, जो अपना समूचा जीवन जल में बिताने के लिए उपयुक्त हैं। इसी प्रकार, यदि कोई किसी मछली को जल से बाहर निकालकर थल पर रख दे, तो वह तत्क्षण मर जाएगी। जैसे हम यह समझते हैं कि इस ग्रह पर भी विशेष स्थानों में रहने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर हैं, उसी प्रकार, यदि हम किसी अन्य ग्रह में प्रवेश करना चाहें, तो हमें उपयुक्त शरीर प्राप्त करने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा।

यदि कोई स्वयं को स्थानान्तरित कर ले और इस योग-प्रक्रिया से उसकी आत्मा चन्द्रमा पर संक्रमण कर जाए, तो उसे जीवन की दीर्घ अवधि प्राप्त होती है। उच्चतर लोकों पर हमारे छह मास एक दिन के बराबर होते हैं। इस प्रकार वहाँ के जीव दस हज़ार वर्ष तक जीते हैं। यही वैदिक साहित्य में वर्णन है। अतः निस्सन्देह कोई जीवन की अत्यन्त दीर्घ अवधि प्राप्त कर सकता है, किन्तु फिर भी मृत्यु तो है। दस हज़ार अथवा बीस हज़ार वर्षों के पश्चात्, अथवा करोड़ों वर्षों के पश्चात् भी (इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता), मृत्यु आती है।

वस्तुतः हम मृत्यु के अधीन नहीं हैं। यह *भगवद्गीता* (2.20) के आरम्भ में प्रतिपादित है: *na hanyate hanyamāne śarīre*। हम आत्मा हैं, और इसलिए हम नित्य हैं। तब हमें स्वयं को मृत्यु एवं जन्म के अधीन क्यों करना चाहिए? इस प्रकार सोचना बुद्धिमत्ता है। जो कृष्णभावनाभावित हैं, वे अत्यन्त बुद्धिमान् हैं, क्योंकि उन्हें ऐसे किसी ग्रह पर पदोन्नति में रुचि नहीं, जहाँ मृत्यु है, भले ही वहाँ जीवन की अवधि दीर्घ हो। प्रत्युत, वे ईश्वर जैसा शरीर प्राप्त करना चाहते हैं। *Īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ sac-cid-ānanda-vigrahaḥ*। (ब्र.सं. 5.1) ईश्वर का शरीर *सच्चिदानन्द* है। *सत्* का अर्थ है "नित्य", और *चित्* का अर्थ है "ज्ञान से परिपूर्ण"। *आनन्द* का अर्थ है "सुख से परिपूर्ण"।

जैसा कि हमारी पुस्तिका *कृष्ण, द रिज़र्वायर ऑफ़ प्लेज़र* में कहा गया है, यदि हम स्वयं को आध्यात्मिक जगत् में, कृष्ण के लोक में, अथवा किसी अन्य आध्यात्मिक लोक में स्थानान्तरित कर लें, तो हमें ईश्वर के समान शरीर प्राप्त होगा: *सच्चिदानन्द* — नित्य, ज्ञान से परिपूर्ण तथा आनन्द से परिपूर्ण। अतः जो कृष्णभावनाभावित होने का प्रयत्न करते हैं, उनके जीवन का लक्ष्य उनसे भिन्न है, जो इस भौतिक जगत् के श्रेष्ठतर ग्रहों पर स्वयं को पदोन्नत करने का प्रयत्न कर रहे हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, *mūrdhny ādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām*: "योग की पूर्णता स्वयं को आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित करना है।" (गीता 8.12)

आत्मा शरीर के भीतर एक सूक्ष्म कण है। हम उसे देख नहीं सकते। आत्मा को मस्तक के सर्वोच्च भाग तक उठाने के लिए मनुष्य योग-पद्धति का अभ्यास करता है। यह अभ्यास तब तक चलता है, जब तक मनुष्य जीवित है, और पूर्णता तब प्राप्त होती है, जब मनुष्य स्वयं को मस्तक के शीर्ष पर स्थापित करके फिर उसे भेद सके। तब वह स्वयं को जिन भी उच्चतर लोकों में चाहे, स्थानान्तरित कर सकता है। यही योगी की पूर्णता है।

यदि योगी चन्द्रमा देखने के लिए जिज्ञासु है, तो वह कह सकता है, "आह, मुझे देखने दो कि चन्द्रमा कैसा है। तत्पश्चात् मैं स्वयं को उच्चतर लोकों में स्थानान्तरित करूँगा" — ठीक उन यात्रियों के समान, जो पृथ्वी पर यूरोप, कैलिफ़ोर्निया, कनाडा अथवा अन्य देशों में जाते हैं। मनुष्य इस योग-पद्धति से स्वयं को अनेक लोकों में स्थानान्तरित कर सकता है, किन्तु वह जहाँ भी जाएगा, वहाँ उसे वीज़ा-पद्धतियाँ एवं सीमा-शुल्क-पद्धतियाँ मिलेंगी। अन्य ग्रहों पर जाने के लिए मनुष्य को अर्ह होना चाहिए।

कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों को किसी भी अस्थायी ग्रह में रुचि नहीं, भले ही वह जीवन की दीर्घ अवधि प्रदान करता हो। यदि योगी मृत्यु के समय *ओं*, दिव्य ध्वनि-कम्पन का संक्षिप्त रूप, का उच्चारण कर सके और उसी समय *mām anusmaran*, कृष्ण, विष्णु, का स्मरण कर सके, तो वह पूर्णता प्राप्त करेगा। समूची योग-पद्धति का प्रयोजन मन को विष्णु पर एकाग्र करना है। निर्विशेषवादी कल्पना करते हैं कि वे विष्णु, अथवा भगवान्, का रूप देखते हैं, किन्तु जो साकारवादी हैं, वे इसकी कल्पना नहीं करते — वे वस्तुतः परमेश्वर का रूप देखते हैं। चाहे जो भी हो, यदि कोई कल्पना के द्वारा अपने मन को एकाग्र करे अथवा यदि कोई वस्तुतः देखे, तो उसे अपने मन को विष्णु-रूप पर एकाग्र करना होता है। *मां* का अर्थ है "परमेश्वर, विष्णु, के प्रति"। जो कोई इस शरीर को त्यागते हुए अपने मन को विष्णु पर एकाग्र करता है, वह अपने शरीर को त्यागने के पश्चात् आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश करता है। जो वस्तुतः योगी हैं, वे किसी अन्य ग्रह में प्रवेश की कामना नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि अस्थायी ग्रहों पर जीवन अस्थायी है, और इस प्रकार उन्हें कोई रुचि नहीं। यही बुद्धिमत्ता है।

जो अस्थायी सुख, अस्थायी जीवन तथा अस्थायी सुविधाओं से सन्तुष्ट हैं, वे *भगवद्गीता* (7.23) के अनुसार बुद्धिमान् नहीं हैं। *Antavat tu phalaṁ teṣāṁ tad bhavaty alpa-medhasām*: "जिसका मस्तिष्क-तत्त्व अत्यन्त अल्प है, वह अस्थायी वस्तुओं में रुचि लेता है।" यही श्रीमद् *भगवद्गीता* का कथन है। मैं नित्य हूँ, तो मुझे अनित्य वस्तुओं में रुचि क्यों लेनी चाहिए? अनित्य अस्तित्व कौन चाहता है? कोई इसे नहीं चाहता। यदि हम किसी अपार्टमेंट में रह रहे हैं और मकानमालिक हमें खाली करने को कहता है, तो हमें खेद होता है; किन्तु यदि हम किसी श्रेष्ठतर अपार्टमेंट में जाते हैं, तो हमें खेद नहीं होता। यही हमारी प्रवृत्ति है। हम मरना नहीं चाहते, क्योंकि हम नित्य हैं।

भौतिक वातावरण हमसे हमारी नित्यता छीन रहा है। *श्रीमद्भागवत* कहता है, "हमारे जीवन की अवधि सूर्य द्वारा, उसके उदय से लेकर उसके अस्त के समय तक, घटाई जा रही है।" प्रतिदिन हम अपने जीवन की अवधि खो रहे हैं। यदि सूर्य प्रातः 5:30 बजे उदित होता है, तो सायं 5:30 बजे तक हमारे जीवन की अवधि से बारह घण्टे छीन लिए जाते हैं। हम यह समय कभी वापस नहीं पाएँगे। यदि हम किसी वैज्ञानिक से पूछें, "मैं तुम्हें एक करोड़ बीस लाख डॉलर दूँगा — कृपया मुझे ये बारह घण्टे लौटा दो", तो वह उत्तर देगा, "नहीं, यह सम्भव नहीं।" वैज्ञानिक ऐसा नहीं कर सकता। इसलिए *भागवत* कहता है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक हमारे जीवन की अवधि घटाई जा रही है।

समय को *काल* कहा जाता है — भूत, वर्तमान एवं भविष्य। जो अब वर्तमान है, वह कल भूत होगा, और जो अब भविष्य है, वह कल वर्तमान होगा। किन्तु यह भूत, वर्तमान एवं भविष्य शरीर के भूत, वर्तमान एवं भविष्य हैं। हम भूत, वर्तमान एवं भविष्य की कोटि में नहीं आते। हम नित्यता की कोटि में आते हैं। इसलिए मनुष्य को इस बात से सरोकार रखना चाहिए कि नित्यता के स्तर को कैसे प्राप्त किया जाए अथवा उस तक कैसे उठा जाए। मनुष्य की विकसित चेतना का उपयोग खाने, सोने, मैथुन एवं रक्षा की पाशविक प्रवृत्तियों में नहीं, अपितु उस मूल्यवान् मार्ग को खोजने में किया जाना चाहिए, जो उसे नित्यता का वह जीवन प्राप्त करने में सहायता करे। कहा जाता है कि सूर्य हमारे जीवन की अवधि छीन रहा है — प्रत्येक मिनट, प्रत्येक घण्टा, प्रत्येक दिन — किन्तु यदि हम स्वयं को *उत्तम-श्लोक* के विषयों में, भगवान् के विषयों में, संलग्न कर दें, तो वह समय छीना नहीं जा सकता। कृष्णभावनामृत-मन्दिर में मनुष्य जो समय अर्पित करता है, वह छीना नहीं जा सकता। वह एक सम्पत्ति है — जोड़, घटाव नहीं। जीवन की अवधि, जहाँ तक शरीर का सम्बन्ध है, छीनी जा सकती है; मनुष्य उसे चाहे जितना अक्षुण्ण रखने का प्रयत्न करे, कोई ऐसा नहीं कर सकता। किन्तु कृष्णभावनामृत में हमें जो आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त होती है, वह सूर्य द्वारा छीनी नहीं जा सकती। वह एक ठोस सम्पत्ति बन जाती है।

हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करना अत्यन्त सरल कार्य है। जप में बिताया गया समय शरीर से सम्बन्धित समय के समान छीना नहीं जा सकता। पचास वर्ष पूर्व मैं एक युवा था, किन्तु वह समय छीन लिया गया और लौटाया नहीं जा सकता। किन्तु अपने आध्यात्मिक गुरु से मुझे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ, वह छीना नहीं जा सकता, अपितु वह मेरे साथ जाएगा। इस शरीर को त्यागने के पश्चात् भी वह मेरे साथ जाएगा; और यदि वह इस जीवन में पूर्ण है, तो वह मुझे नित्य धाम तक ले जाएगा।

भौतिक एवं आध्यात्मिक — दोनों जगत् कृष्ण के हैं। हम किसी वस्तु के स्वामी नहीं हैं। वह सब परमेश्वर की सम्पत्ति है, ठीक जैसे राज्य की प्रत्येक वस्तु सरकार की होती है, चाहे वह कारागार के भीतर हो या कारागार के बाहर। बद्ध जीवन इस भौतिक जगत् में ठीक कारागार के जीवन के समान है। एक बन्दी स्वच्छन्द रूप से एक कोठरी से दूसरी कोठरी में नहीं बदल सकता। स्वतन्त्र जीवन में मनुष्य एक घर से दूसरे घर में जा सकता है, किन्तु कारागार-जीवन में मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता, अपितु उसे अपनी कोठरी में ही रहना पड़ता है। ये सब ग्रह कोठरियों के समान हैं। हम चन्द्रमा तक जाने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु यान्त्रिक साधनों से यह व्यावहारिक नहीं है। हम चाहे अमेरिकी हों, भारतीय हों, चीनी हों या रूसी हों, हमें यह ग्रह रहने के लिए दिया गया है। हम इसे छोड़ नहीं सकते — यद्यपि करोड़ों एवं अरबों ग्रह हैं और यद्यपि हमारे पास ऐसी मशीनें हैं, जिनसे हम जा सकें — क्योंकि हम प्रकृति के नियमों, ईश्वर के नियमों, से बद्ध हैं। जिस मनुष्य को किसी विशेष कोठरी में डाला गया है, वह श्रेष्ठ अधिकारी के बिना अपनी इच्छानुसार नहीं बदल सकता। कृष्ण *भगवद्गीता* में कहते हैं कि मनुष्य को एक कोठरी से दूसरी कोठरी में बदलने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। उससे कोई सुखी नहीं होगा। यदि कोई बन्दी सोचे, "मैं इस कोठरी में हूँ — मुझे जेलर से अपनी कोठरी बदलने का अनुरोध करने दो, और मैं सुखी हो जाऊँगा", तो यह एक भ्रान्त विचार है। मनुष्य तब तक सुखी नहीं हो सकता, जब तक वह कारागार की दीवारों के भीतर है। हम कोठरियाँ बदलकर — पूँजीवाद से साम्यवाद की ओर — सुखी होने का प्रयत्न कर रहे हैं। लक्ष्य यह होना चाहिए कि इस "वाद" तथा उस "वाद" से मुक्त हुआ जाए। मनुष्य को भौतिकवाद के इस "वाद" से पूर्णतः बदलना होगा; तभी वह सुखी हो सकता है। यही कृष्णभावनामृत का कार्यक्रम है।

हम परम पुरुष से परामर्श ले रहे हैं। वे कहते हैं, "हे प्रिय अर्जुन, तुम सर्वोच्च लोक-मण्डल, जिसे ब्रह्मलोक कहा जाता है, तक उन्नत हो सकते हो, और वह वांछनीय है, क्योंकि वहाँ जीवन अत्यन्त दीर्घ है।" हम वहाँ के आधे दिन की भी गणना नहीं कर सकते। वह हमारी गणितीय गणनाओं से परे है। किन्तु ब्रह्मलोक में भी मृत्यु है। इसलिए कृष्ण कहते हैं, "स्वयं को उन्नत करने अथवा स्वयं को इस ग्रह से उस ग्रह पर स्थानान्तरित करने का प्रयत्न करके अपना समय व्यर्थ मत करो।"

मैंने अमेरिका में जो लोग देखे हैं, वे अत्यन्त अशान्त हैं। वे एक अपार्टमेंट से दूसरे अपार्टमेंट में अथवा एक देश से दूसरे देश में जाते रहते हैं। वह अशान्ति इसलिए है, क्योंकि हम अपने वास्तविक घर की खोज कर रहे हैं। इस स्थान से उस स्थान पर जाने से नित्य जीवन नहीं मिलेगा। नित्य जीवन कृष्ण के साथ है। इसलिए कृष्ण कहते हैं, "प्रत्येक वस्तु मेरी है, और मेरे पास परम उत्कृष्ट धाम है, जिसे गोलोक वृन्दावन कहा जाता है।" यदि कोई वहाँ जाना चाहे, तो उसे केवल कृष्णभावनाभावित होना है और यह समझने का प्रयत्न करना है कि कृष्ण कैसे प्रकट एवं अप्रकट होते हैं, उनकी स्वरूपगत स्थिति क्या है, हमारी स्वरूपगत स्थिति क्या है, उनके साथ हमारा सम्बन्ध क्या है, और कैसे जीना है। इन विचारों को केवल वैज्ञानिक रूप से समझने का प्रयत्न करो। कृष्णभावनामृत में प्रत्येक वस्तु वैज्ञानिक है। यह कूट, मनमाना, भावुक, धर्मान्ध अथवा काल्पनिक नहीं है। यह सत्य है, तथ्य है, वास्तविकता है। मनुष्य को कृष्ण को यथार्थ रूप से समझना ही चाहिए।

हमें इस शरीर को त्यागना ही पड़ता है, चाहे इच्छा से या अनिच्छा से। वह दिन आएगा, जब हमें प्रकृति के नियमों के समक्ष नतमस्तक होना पड़ेगा और इस शरीर को त्यागना पड़ेगा। राष्ट्रपति केनेडी तक को अपनी शोभायात्रा में प्रकृति के नियम के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा और अपना शरीर बदलकर अन्य शरीर धारण करना पड़ा। वे यह नहीं कह सके, "ओह, मैं राष्ट्रपति हूँ; मैं मिस्टर केनेडी हूँ। मैं ऐसा नहीं कर सकता।" वे ऐसा करने के लिए विवश थे। प्रकृति इसी प्रकार कार्य करती है।

हमारी विकसित मानव-चेतना का प्रयोजन यह समझना है कि प्रकृति कैसे कार्य करती है। मानव-चेतना के अतिरिक्त, कुत्तों, बिल्लियों, कृमियों, वृक्षों, पक्षियों, पशुओं तथा अन्य समस्त योनियों में भी चेतना है। किन्तु हम उस चेतना में जीने के लिए अभिप्रेत नहीं हैं। *श्रीमद्भागवत* कहता है कि अनेकानेक जन्मों के पश्चात् हमने यह मानव-देह प्राप्त की है। अब हमें इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। कृपया इस मानव-जीवन का उपयोग कृष्णभावनामृत विकसित करने में करें और सुखी हों।
