### Īśo 13

> अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्।\
> इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१३॥

*अन्यत्*—भिन्न; *एव*—निश्चय ही; *आहुः*—कहा जाता है; *सम्भवात्*—समस्त कारणों के कारणस्वरूप परमेश्वर की आराधना से; *अन्यत्*—भिन्न; *आहुः*—कहा जाता है; *असम्भवात्*—जो परम नहीं है, उसकी आराधना से; *इति*—इस प्रकार; *शुश्रुम*—मैंने इसे सुना; *धीराणाम्*—अविचलित अधिकारियों से; *ये*—जिन्होंने; *नः*—हमें; *तत्*—उस विषय में; *विचचक्षिरे*—भली-भाँति समझाया।

**कहा गया है कि समस्त कारणों के *परम कारण* की उपासना से एक फल प्राप्त होता है, और जो परम नहीं है उसकी उपासना से दूसरा फल प्राप्त होता है। यह सब उन अविचलित प्रामाणिक आचार्यों से सुना गया, जिन्होंने इसे स्पष्ट रूप से समझाया।**

श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में अविचलित प्रामाणिक आचार्यों से श्रवण करने की पद्धति की पुष्टि होती है। जब तक मनुष्य उस प्रामाणिक आचार्य से नहीं सुनता, जो भौतिक जगत् के परिवर्तनों से कभी विचलित नहीं होते, तब तक उसे दिव्य ज्ञान की वास्तविक कुंजी नहीं मिल सकती। प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने स्वयं भी अपने अविचलित आचार्य से श्रुति-मन्त्र अर्थात् वैदिक ज्ञान सुना है, कभी ऐसी कोई बात न गढ़ते हैं, न प्रस्तुत करते हैं, जिसका उल्लेख वैदिक साहित्य में न हो। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि पितरों के उपासक पितरों के पास पहुँचते हैं, इस संसार में यहीं रहने की योजनाएँ बनाने वाले स्थूल भौतिकतावादी यहीं रह जाते हैं, और भगवान् के वे भक्त, जो समस्त कारणों के परम कारण भगवान् श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी की उपासना नहीं करते, आध्यात्मिक आकाश में उनके धाम में उन्हें प्राप्त करते हैं।

यहाँ श्री ईशोपनिषद् में भी कहा गया है कि उपासना की भिन्न-भिन्न विधियों से भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। यदि हम परमेश्वर की उपासना करें, तो निश्चय ही हम उनके नित्य धाम में परमेश्वर को प्राप्त करेंगे, और यदि हम सूर्य व चन्द्र जैसे देवताओं की उपासना करें, तो निःसन्देह हम उन-उन लोकों तक पहुँच सकते हैं। और यदि हम अपने योजना-आयोगों तथा अपनी अस्थायी राजनीतिक जोड़-तोड़ के साथ इस शोचनीय ग्रह पर ही रहना चाहें, तो निश्चय ही वह भी कर सकते हैं। प्रामाणिक शास्त्रों में कहीं नहीं कहा गया कि आप जो भी करें और जिसकी भी उपासना करें, अन्ततः उसी एक लक्ष्य पर पहुँचेंगे। ऐसे मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त वे स्वयंभू गुरु प्रस्तुत करते हैं, जिनका परम्परा अर्थात् गुरु-परम्परा की प्रामाणिक पद्धति से कोई सम्बन्ध नहीं है।

प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु यह नहीं कह सकते कि जिस किसी की अपनी-अपनी उपासना-पद्धति है — चाहे वह देवताओं की उपासना हो या परमेश्वर की — वह सबको एक ही लक्ष्य तक ले जाती है। सामान्य मनुष्य के लिए यह समझना अत्यन्त सरल है कि बम्बई से रेलगाड़ी द्वारा चलने वाला व्यक्ति उसी गन्तव्य तक पहुँच सकता है, जिसका उसने टिकट लिया है, अन्यत्र नहीं। जिसने कलकत्ता का टिकट लिया है, वह कलकत्ता पहुँच सकता है। किन्तु आज के तथाकथित गुरु यह प्रचार करते हैं कि आप चाहे जो आध्यात्मिक टिकट लें, वह आपको परम लक्ष्य तक पहुँचा देगा। ऐसे लौकिक तथा समझौतापूर्ण प्रस्ताव अनेक मूर्ख प्राणियों को आकृष्ट करते हैं, जो आध्यात्मिक साक्षात्कार की अपनी गढ़ी हुई विधियों के दर्प में फूल उठते हैं, किन्तु वैदिक उपदेश इनका समर्थन नहीं करता।

जब तक मनुष्य ने प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से — जो गुरु-परम्परा की मान्य श्रृंखला में स्थित हों — ज्ञान प्राप्त नहीं किया, तब तक उसे वस्तु यथारूप प्राप्त नहीं हो सकती। भगवद्गीता कहती है: इस प्रकार, हे शत्रुदमन! [गीता के] ये योग-सिद्धान्त महान् राजाओं को ज्ञात थे। किन्तु परम्परा-पद्धति के खण्डित हो जाने से ये सिद्धान्त अब लुप्त-से प्रतीत होते हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण इस जगत् में उपस्थित थे, तब भगवद्गीता में परिभाषित भक्तियोग के सिद्धान्त विकृत हो चुके थे, अतः भगवान् को अर्जुन से आरम्भ करके गुरु-परम्परा की पद्धति पुनः स्थापित करनी पड़ी, जो भगवान् के परम विश्वस्त सखा और भक्त थे। भगवान् ने अर्जुन से स्पष्ट कहा कि चूँकि वे उनके भक्त और सखा थे, इसी कारण गीता के सिद्धान्त उनके लिए बोधगम्य थे।

दूसरे शब्दों में, जो भगवान् का भक्त और सखा नहीं है, वह गीता को नहीं समझ सकता। इसका अर्थ है कि केवल वही गीता को समझ सकता है, जो अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है। वर्तमान समय में इस उदात्त संवाद के अनेक भाष्यकार हैं, जिनका अर्जुन या भगवान् श्रीकृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे भगवद्गीता के श्लोकों की अपने-अपने ढंग से व्याख्या करते हैं और गीता के नाम पर सब प्रकार की निरर्थक बातें प्रतिपादित करते हैं। ऐसे भाष्यकार न श्रीकृष्ण में विश्वास करते हैं, न उनके नित्य धाम में। तो फिर वे भगवद्गीता के विषय में क्या समझा सकते हैं? गीता स्पष्ट कहती है कि केवल वे ही देवताओं की उपासना करते हैं, जिनकी बुद्धि मारी गई है। श्रीकृष्ण अन्ततः यही उपदेश देते हैं कि मनुष्य उपासना के अन्य सब मार्गों और विधियों को त्यागकर केवल उनकी ही पूर्ण शरण ग्रहण करे।

जो व्यक्ति समस्त पाप-फलों से शुद्ध हो चुके हैं, वे ही परमेश्वर में ऐसी अविचल श्रद्धा रख सकते हैं। शेष लोग उपासना की अपनी तुच्छ विधियों के साथ भौतिक क्षेत्र में ही मँडराते रहेंगे, और इस मिथ्या धारणा के वशीभूत होकर कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं, वास्तविक पथ से भटक जाएँगे। इस मन्त्र में संस्कृत शब्द सम्भवात् — परम कारण की उपासना — अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवान् श्रीकृष्ण आदि पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और जो कुछ विद्यमान है, वह सब उन्हीं से उद्भूत हुआ है। गीता में भगवान् स्वयं अपना परिचय देते हैं। वे वहाँ कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित सबके स्रष्टा वे ही हैं। और चूँकि भौतिक जगत् के ये तीनों प्रधान देव भगवान् द्वारा सृजित हैं, अतएव भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों में जो कुछ भी विद्यमान है, उस सबके स्रष्टा वे ही हैं।

अथर्ववेद में भी इसी प्रकार कहा गया है कि जो ब्रह्मा की सृष्टि से पूर्व विद्यमान थे और जिन्होंने ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान से प्रकाशित किया, वे भगवान् श्रीकृष्ण हैं। “परम पुरुष ने जीवों की सृष्टि करने की इच्छा की, और इस प्रकार नारायण ने समस्त प्राणियों की रचना की। नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न हुए। नारायण ने समस्त प्रजापतियों की रचना की। नारायण ने इन्द्र की रचना की। नारायण ने आठ वसुओं की रचना की। नारायण ने ग्यारह रुद्रों की रचना की। नारायण ने बारह आदित्यों की रचना की।” यह नारायण भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण प्रकाश होने से, नारायण और श्रीकृष्ण एक ही हैं। परवर्ती पाठ भी हैं, जो कहते हैं कि वही परमेश्वर देवकी के पुत्र हैं। देवकी और वसुदेव के साथ उनके बाल्यकाल तथा नारायण से उनकी अभिन्नता की पुष्टि श्रीपाद शंकराचार्य ने भी की है, यद्यपि शंकर वैष्णव अर्थात् साकारवादी सम्प्रदाय के नहीं हैं।

अथर्ववेद में ही ऐसे अन्य पाठ भी हैं, जैसे यह: “आदि में केवल नारायण विद्यमान थे; न ब्रह्मा का अस्तित्व था, न शिव का, न अग्नि का, न जल का। न तारे थे, न सूर्य था, न चन्द्रमा। वे अकेले नहीं रहते। वे अपनी इच्छानुसार सृष्टि करते हैं।” मोक्षधर्म में कहा गया है: “मैंने प्रजापतियों और रुद्रों की रचना की। उन्हें मेरा पूर्ण ज्ञान नहीं है, क्योंकि वे भी मेरी मायाशक्ति से आवृत हैं।” वराह पुराण में कहा गया है: “नारायण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और उन्हीं से चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए, तथा रुद्र भी, जो आगे चलकर सर्वज्ञ हुए।” इस प्रकार समस्त वैदिक साहित्य इस मत की पुष्टि करता है कि नारायण अथवा श्रीकृष्ण ही समस्त कारणों के कारण हैं।

ब्रह्म-संहिता में भी कहा गया है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण हैं। वे “गोविन्द” हैं — प्रत्येक जीव को आनन्द देने वाले — और वे समस्त कारणों के आदि कारण हैं। वास्तविक विद्वान् व्यक्ति महान् ऋषियों तथा वेदों के प्रमाण से यह सब जानेगा और इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को सर्वस्व मानकर उनकी आराधना का निश्चय करेगा। वे ही व्यक्ति बुध अर्थात् वास्तविक विद्वान् कहलाते हैं, जो केवल श्रीकृष्ण की आराधना में ही दृढ़ रहते हैं। यह दृढ़ निश्चय तब स्थापित होता है, जब मनुष्य श्रद्धा और प्रेमपूर्वक अविचलित आचार्य से दिव्य सन्देश सुनता है। जिसे भगवान् श्रीकृष्ण में न श्रद्धा है, न प्रेम, वह इस सरल सत्य के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता। ऐसे श्रद्धाहीन व्यक्तियों को भगवद्गीता में मूढ़ — गधे के समान मूर्ख — कहा गया है।

कहा गया है कि मूढ़ लोग भगवान् का उपहास करते हैं, क्योंकि उन्हें अविचलित आचार्य से पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता। जो भौतिक शक्ति की भँवर-गतियों से विचलित है, वह आचार्य बनने का अधिकारी नहीं है। गीता सुनने से पूर्व अर्जुन इसी भँवर से — परिवार, समाज तथा जाति-स्नेह की प्रतिक्रिया से — विचलित थे, और इसी कारण वे संसार के एक परोपकारी तथा अहिंसावादी पुरुष बनना चाहते थे। किन्तु जब वे परम पुरुष से भगवद्गीता का वैदिक ज्ञान सुनकर बुध बन गए, तब उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया और भगवान् श्रीकृष्ण के आराधक बन गए, जिन्होंने स्वयं कुरुक्षेत्र-युद्ध की योजना रची थी। अर्जुन ने अपने तथाकथित सम्बन्धियों से युद्ध करके भगवान् की आराधना की, और इस प्रकार वे भगवान् के शुद्ध भक्त बन गए।

ऐसी उपलब्धियाँ केवल वास्तविक श्रीकृष्ण की आराधना से ही सम्भव हैं, न कि उन मूर्खों द्वारा चलाए गए किसी गढ़े हुए “कृष्ण” की उपासना से, जिन्हें गीता तथा श्रीमद्भागवत में वर्णित कृष्ण-विज्ञान की सूक्ष्मताओं का कोई ज्ञान नहीं है। वेदान्त-सूत्र के अनुसार सम्भूत जन्म और पालन के स्रोत हैं, तथा संहार के पश्चात् आश्रय हैं। श्रीमद्भागवत, जो उसी रचयिता द्वारा वेदान्त-सूत्रों पर की गई स्वाभाविक टीका है, यह स्पष्ट करता है कि समस्त उद्भवों का स्रोत कोई जड़ पत्थर नहीं, अपितु अभिज्ञ अर्थात् पूर्ण चेतन है। फलतः आदि भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि वे भूत, वर्तमान और भविष्य से पूर्णतः अभिज्ञ हैं, और शिव तथा ब्रह्मा जैसे देवताओं सहित कोई भी उन्हें पूर्ण रूप से नहीं जानता।

जो भौतिक अस्तित्व की लहरों से विचलित हैं, वे उन्हें पूर्ण रूप से नहीं जान सकते। ऐसे अर्ध-शिक्षित आध्यात्मिक गुरु कुछ समझौता करने का प्रयत्न करते हैं और जनसमूह को ही उपासना का विषय बना देते हैं। वे नहीं जानते कि जनसमूह की ऐसी उपासना सम्भव नहीं है, न ही जनसमूह पूर्ण है। यह कुछ ऐसा है, जैसे जड़ को सींचने के स्थान पर वृक्ष की पत्तियों पर जल डालना। उपासना की स्वाभाविक विधि यह है कि वृक्ष की उस जड़ में जल डाला जाए, जिससे पत्तियाँ उगती हैं। किन्तु आज के विचलित नेता जड़ की अपेक्षा पत्तियों के प्रति अधिक आकृष्ट हो जाते हैं, और इस कारण निरन्तर पत्तियों को सींचते रहने पर भी पोषण के अभाव में सब कुछ सूखता जा रहा है। श्री ईशोपनिषद् हमें जड़ को — समस्त अंकुरण के स्रोत को — सींचने का परामर्श देता है।

शारीरिक सेवा द्वारा — जो कभी पूर्ण नहीं हो सकती — जनसमूह की उपासना करना आत्मा की सेवा की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण है। आत्मा ही वह जड़ है, जो कर्म अर्थात् भौतिक प्रतिक्रिया के नियम के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर उत्पन्न करती है। बूचड़खानों में बेचारे पशुओं के गले काटते हुए केवल मनुष्य की चिकित्सा-सहायता, सामाजिक सुविधाओं तथा शिक्षा-सुविधाओं द्वारा सेवा करना जीवों की कोई वास्तविक सेवा नहीं है। जीव भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों में जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि के भौतिक रोग से निरन्तर पीड़ित है। मानव-जीवन भौतिक अस्तित्व के इस जंजाल से निकलने का एक अवसर है। यह केवल जीव के परमेश्वर के साथ खोए हुए सम्बन्ध की पुनः स्थापना से ही सम्भव है।

और भगवान् स्वयं आकर हमें परम अर्थात् सम्भूतम् की शरणागति का यह दर्शन सिखाते हैं। मानवता की वास्तविक सेवा यही है कि लोगों को परमेश्वर की शरणागति की शिक्षा दी जाए और पूर्ण प्रेम तथा शक्ति से केवल उन्हीं की आराधना की जाए। इस मन्त्र में श्री ईशोपनिषद् का यही उपदेश है। इस अशान्ति के युग में परमेश्वर की आराधना का सरल मार्ग है — उनके महान् कार्यकलापों का श्रवण और कीर्तन। किन्तु मनोधर्मी भगवान् के कार्यकलापों को काल्पनिक मानते हैं, अतः वे ऐसी किसी श्रवण-विधि से दूर रहते हैं और बेचारे भोले जनसमूह का ध्यान बँटाने के लिए सारहीन शब्दों का इन्द्रजाल रच लेते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के कार्यकलापों का श्रवण करने के स्थान पर वे अपने अनुयायियों से छद्म गुरु का ही गुणगान करवाकर अपना प्रचार करना अधिक पसन्द करते हैं।

आधुनिक काल में ऐसे पाखण्डियों की संख्या पर्याप्त रूप से बढ़ गई है, और भगवान् के शुद्ध भक्तों के लिए यह एक समस्या बन गई है कि जनसमूह को इन पाखण्डियों तथा भगवान् के नकली अवतारों के अपवित्र प्रचार से कैसे बचाया जाए। उपनिषद् परोक्ष रूप से हमारा ध्यान आदि भगवान् श्रीकृष्ण की ओर आकृष्ट करते हैं, और भगवद्गीता, जो समस्त उपनिषदों का सार है, प्रत्यक्ष रूप से श्रीकृष्ण की ओर संकेत करती है। अतएव मनुष्य को चाहिए कि वह श्रीकृष्ण के विषय में वैसा ही सुने, जैसे वे गीता या श्रीमद्भागवत में हैं; इससे क्रमशः उसके मन को समस्त दूषित वस्तुओं से स्वच्छ होने में सहायता मिलेगी। भागवत कहता है: “भगवान् के कार्यकलापों के श्रवण से मनुष्य भगवान् का ध्यान भक्त की ओर आकृष्ट करता है।

और भगवान्, प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित होने के कारण, भक्त को उचित दिशा-निर्देश देकर उसकी सहायता करते हैं।” भगवद्गीता भी इसकी पुष्टि करती है। भगवान् का यह आन्तरिक निर्देश भक्त के हृदय को उन समस्त मलिनताओं से स्वच्छ कर देता है, जो रजो तथा तमो — इन भौतिक गुणों से उत्पन्न होती हैं। अभक्त रजोगुण और तमोगुण के निर्देशन में रहते हैं। रजोगुण के कारण मनुष्य भौतिक आसक्ति से विरक्त नहीं हो पाता, और तमोगुण के कारण वह यह नहीं जान पाता कि वह वास्तव में क्या है और भगवान् क्या हैं। इस प्रकार रजोगुण की अवस्था में आत्म-साक्षात्कार की कोई सम्भावना नहीं रहती, चाहे मनुष्य धर्मात्मा का मिथ्या अभिनय कितना ही क्यों न करे। भक्त के लिए, भगवान् की कृपा से, रजोगुण और तमोगुण हट जाते हैं, और वह तुरन्त सतोगुण में स्थित हो जाता है, जो पूर्ण ब्राह्मण का लक्षण है।

ब्राह्मण-योग्यता की यह अवस्था कोई भी और हर कोई अर्जित कर सकता है, यदि वह प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति के पथ का अनुसरण करे। भागवत कहता है कि कोई भी निम्न-जन्मा जीव भगवान् के शुद्ध भक्त के मार्गदर्शन में पवित्र बनाया जा सकता है, क्योंकि भगवान् असाधारण रूप से शक्तिमान् हैं। ब्राह्मण-योग्यता का पहला लक्षण यह है कि साधक प्रसन्न हो जाता है और भगवान् की भक्ति के विषय में उत्साही बन जाता है। इससे उसके सम्मुख ईश्वर-विज्ञान का सम्पूर्ण रहस्य स्वतः अनावृत हो जाता है। और इस प्रकार ईश्वर-विज्ञान को जानकर वह क्रमशः अपनी भौतिक आसक्तियों से मुक्त होता जाता है, तथा भगवान् की कृपा से उसका सन्देहग्रस्त मन स्फटिक-सा निर्मल हो जाता है। इसी अवस्था में मनुष्य मुक्त आत्मा बन सकता है और जीवन के पग-पग पर भगवान् का दर्शन कर सकता है। यही श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में वर्णित सम्भवात् की पूर्णता है।
