### Īśo 3

> असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः।\
> ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥३॥

*असुर्याः*—असुरों के लिए नियत; *नाम*—इस नाम से प्रसिद्ध; *ते*—वे; *लोकाः*—लोक; *अन्धेन*—अज्ञान द्वारा; *तमसा*—अन्धकार द्वारा; *आवृताः*—आच्छादित; *तान्*—वहाँ; *ते*—वे; *प्रेत्य*—मृत्यु के पश्चात्; *अभिगच्छन्ति*—प्रवेश करते हैं; *ये*—जो भी; *के*—प्रत्येक; *च*—और; *आत्म-हनः*—आत्मा का हन्ता; *जनाः*—व्यक्ति।

**आत्मा का हन्ता, चाहे वह कोई भी हो, उन लोकों में अवश्य प्रवेश करता है जो श्रद्धाहीनों के जगत् के रूप में जाने जाते हैं, जो अन्धकार तथा अज्ञान से परिपूर्ण हैं।**

मनुष्य-जीवन पशु-जीवन से अपने गुरुतर उत्तरदायित्वों के कारण भिन्न है। जो इन उत्तरदायित्वों के प्रति सजग हैं और उसी भाव से कर्म करते हैं, वे सुर अर्थात् देवस्वभाव वाले कहलाते हैं। और जो या तो इन उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करते हैं या जिन्हें इनकी कोई जानकारी नहीं है, वे असुर कहलाते हैं। समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्यों के केवल ये ही दो प्रकार हैं। ऋग्वेद में कहा गया है कि सुरगण सदा परमेश्वर विष्णु के चरणकमलों को ही लक्ष्य बनाते हैं और तदनुसार आचरण करते हैं। उनके मार्ग सूर्य-पथ के समान प्रकाशित हैं। बुद्धिमान मनुष्यों को सदा स्मरण रखना चाहिए कि शरीर का यह विशेष रूप आत्मा के लाखों-करोड़ों वर्षों के देहान्तरण के विकास-क्रम के पश्चात् प्राप्त होता है।

इस भौतिक जगत् की तुलना कभी-कभी समुद्र से की जाती है, और इस मानव-शरीर की तुलना एक सुदृढ़ नौका से, जो उस समुद्र को पार करने के लिए बनी है। वैदिक शास्त्र तथा आचार्य — सन्त शिक्षक — कुशल नाविक के समान हैं, और मानव-शरीर की सुविधाएँ अनुकूल वायु के समान, जो नौका को सहज रूप से अभीष्ट गन्तव्य तक पहुँचा सकती हैं। यदि इतनी सारी सुविधाओं के रहते हुए भी कोई व्यक्ति अपने मानव-जीवन का पूर्ण उपयोग आत्म-साक्षात्कार के लिए नहीं करता, तो ऐसे असुर को आत्म-हन अर्थात् आत्मा का हन्ता मानना चाहिए। आत्मा का हन्ता अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में प्रवेश कर निरन्तर कष्ट भोगने के लिए बाध्य है, और श्री ईशोपनिषद् यहाँ स्पष्ट शब्दों में यही चेतावनी देती है।

सूकर, कुत्ते, ऊँट, गधे आदि भी हैं, जिनकी आर्थिक आवश्यकताएँ हमारी आवश्यकताओं जितनी ही महत्त्वपूर्ण हैं। किन्तु इन पशुओं की आर्थिक समस्याएँ घृणित परिस्थितियों में हल होती हैं, जबकि मनुष्य को प्रकृति के नियमों द्वारा सुखमय जीवन की समस्त सुविधाएँ दी गई हैं, क्योंकि मानव-जीवन पशु-जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण है। और मनुष्य को सूकर तथा अन्य पशुओं से उत्तम जीवन क्यों दिया गया है? किसी उच्च पदस्थ सेवक को एक साधारण लिपिक की अपेक्षा सुखमय जीवन की सारी सुविधाएँ क्यों दी जाती हैं? उत्तर यह है कि उच्च पदस्थ अधिकारी को उच्चतर स्तर के कर्तव्यों का निर्वाह करना होता है। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में उन पशुओं की अपेक्षा उच्चतर कर्तव्य हैं, जो सदा अपने भूखे पेट भरने के धन्धे में लगे रहते हैं।

फिर भी आधुनिक आत्म-घातिनी सभ्यता ने भूखे पेट की समस्याओं को बढ़ाया ही है। आधुनिक आत्म-घातिनी सभ्यता ने भूखे पेट की समस्याओं को बढ़ाया ही है। हम किसी परिमार्जित पशु — किसी आधुनिक सभ्य मनुष्य — के पास जाते हैं, और वह कहता है कि वह पेट की तृप्ति के लिए काम करना चाहता है तथा आत्म-साक्षात्कार की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु प्रकृति के नियम इतने निर्मम हैं कि पेट के लिए कठोर परिश्रम करने की उसकी उत्कण्ठा के बावजूद, आत्म-साक्षात्कार की सम्भावना को ठुकरा देने के बाद भी, बेकारी का प्रश्न सदा बना रहता है। हमें यह मानव-जीवन गधे, सूकर और कुत्ते की भाँति कठोर परिश्रम करने के लिए नहीं, अपितु जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के लिए दिया गया है।

यदि हम आत्म-साक्षात्कार की चिन्ता नहीं करते, तो प्रकृति के नियम से हमें कठोर परिश्रम करना ही पड़ता है, भले ही हम ऐसा न चाहें। इस युग में मनुष्य को गधे और बैल की भाँति गाड़ी खींचते हुए कठोर परिश्रम करने के लिए विवश किया गया है। श्री ईशोपनिषद् का यह मन्त्र उन प्रदेशों के कुछ उदाहरण प्रकट करता है, जहाँ असुर को कार्य करने के लिए भेजा जाता है। यदि कोई मनुष्य मानव के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वाह में विफल रहता है, तो उसे विवश होकर असुर्य नामक लोकों में अधम योनियों में देहान्तरण करना पड़ता है, ताकि वह अज्ञान और अन्धकार में कठोर परिश्रम करे। भगवद्गीता में भी कहा गया है कि जो अर्ध-आत्म-साक्षात्कृत मनुष्य पूर्व जन्मों में भगवान् तक पहुँचने की प्रक्रिया पूर्ण नहीं कर सके, किन्तु जिन्होंने उसके लिए सच्चा प्रयत्न किया था — दूसरे शब्दों में, जो ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की अनुभूति में सफलता नहीं पा सके — उन्हें शुचि अथवा श्रीमत् कुल में जन्म लेने का अवसर दिया जाता है।

शुचि का अर्थ है आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत ब्राह्मण, और श्रीमत् का अर्थ है वैश्य, अर्थात् वणिक समाज का सदस्य। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे पतित साधकों को उनके पूर्व जन्मों के सच्चे प्रयत्नों के कारण आत्म-साक्षात्कार की साधना का उत्तम अवसर दिया जाता है। यदि पतित साधकों को सम्मानित कुलीन परिवारों में जन्म लेने का अवसर मिलता है, तो जिन्होंने इस प्रयास में पूर्ण सफलता प्राप्त कर ली है, उनकी स्थिति की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ईश्वर-साक्षात्कार का प्रयत्न-मात्र ही यह सुनिश्चित कर देता है कि अगला जन्म किसी कुलीन परिवार में होगा। किन्तु जो ऐसा कोई प्रयत्न ही नहीं करते, जो माया से आवृत रहना चाहते हैं, जो अत्यधिक भौतिकतावादी और भौतिक भोग में आसक्त हैं, उन्हें नरक के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में प्रवेश करना ही पड़ता है — जैसा कि समस्त वैदिक साहित्य में पुष्टि की गई है।

ऐसे भौतिकतावादी असुर कभी-कभी धार्मिकता का प्रदर्शन भी करते हैं, जिसका चरम लक्ष्य भौतिक समृद्धि होता है। किन्तु भगवद्गीता उन्हें फटकारती है — ऐसे मनुष्यों के रूप में, जो मिथ्या सिद्धि के बल पर, अज्ञानियों के मतों और भौतिक धन के सहारे महान् कहलाते हैं। आत्म-साक्षात्कार तथा ईशावास्य — भगवान् — की धारणा से रहित ऐसे असुर निश्चय ही घोरतम अन्धकारमय प्रदेशों में प्रवेश करेंगे। निष्कर्ष यह है कि मनुष्य के रूप में हम केवल एक डगमगाते धरातल पर आर्थिक समस्याएँ सुलझाने के लिए ही नहीं हैं, अपितु भौतिक जीवन की उन समस्याओं को भी सुलझाने के लिए हैं, जिनमें प्रकृति की परिस्थितियों ने हमें डाल रखा है।
