### Īśo 9

> अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।\
> ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः॥९॥

*अन्धम्*—घोर अज्ञान; *तमः*—अन्धकार; *प्रविशन्ति*—में प्रवेश करते हैं; *ये*—जो; *अविद्याम्*—अविद्या; *उपासते*—पूजते हैं; *ततः*—उससे; *भूयः*—और भी अधिक; *इव*—समान; *ते*—वे; *तमः*—अन्धकार; *ये*—जो; *उ*—भी; *विद्यायाम्*—ज्ञान की संस्कृति में; *रताः*—संलग्न।

**जो लोग *अविद्यामय* कर्मों की साधना में लगे हैं, वे अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में प्रवेश करेंगे। उनसे भी बुरे वे हैं, जो तथाकथित ज्ञान की साधना में लगे हैं।**

इस मन्त्र में विद्या और अविद्या का तुलनात्मक अध्ययन है। अविद्या अर्थात् अज्ञान निःसन्देह संकटमय है, किन्तु विद्या अर्थात् ज्ञान जब भ्रान्त या पथभ्रष्ट हो जाए, तो वह और भी अधिक संकटमय है। आधुनिक मानव सभ्यता में श्री ईशोपनिषद् की यह व्याख्या अतीत के किसी भी काल की अपेक्षा अधिक लागू होती है। आधुनिक सभ्यता ने जन-शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है, फिर भी परिणाम यह है कि लोग पहले से अधिक दुखी हैं, क्योंकि भौतिक उन्नति पर अत्यधिक बल दिया गया है और जीवन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष — आध्यात्मिक पक्ष — के प्रति कोई रुचि नहीं है। जहाँ तक विद्या का प्रश्न है, श्री ईशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र ने अत्यन्त स्पष्ट रूप से समझाया है कि परमेश्वर ही सब वस्तुओं के स्वामी हैं, और इस तथ्य की विस्मृति ही अज्ञान कहलाती है।

मनुष्य जीवन के इस तथ्य को जितना अधिक भूलता है, उतना ही अधिक वह अन्धकार में रहता है; और इस दृष्टि से, शिक्षा की तथाकथित उन्नति की ओर उन्मुख ईश्वरविहीन सभ्यता उस सभ्यता से अधिक संकटमय है जिसमें जन-साधारण कम उन्नत हों। मनुष्यों के विभिन्न वर्ग हैं — कर्मी, ज्ञानी तथा योगी। कर्मी वे हैं जो इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में लगे रहते हैं। आधुनिक सभ्यता में प्रायः 99.9 प्रतिशत लोग औद्योगीकरण, आर्थिक विकास, परोपकार, राजनीतिक चेतना आदि विविध कार्यों के झण्डों तले इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में ही लगे हैं। किन्तु ये सब कार्य न्यूनाधिक इन्द्रियों की तुष्टि पर ही आधारित हैं, जिनमें श्री ईशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र में वर्णित ईश्वर-भावना का कोई स्थान नहीं है।

भगवद्गीता की भाषा में, स्थूल इन्द्रियतृप्ति में लगे लोग मूढ़ हैं — गधे के समान अन्धकार में, जो मूर्खता का प्रतीक है। जो लोग जीवन में किसी वास्तविक लाभ के बिना केवल इन्द्रियतृप्ति की खोज में लगे हैं, वे श्री ईशोपनिषद् की दृष्टि में अविद्या की उपासना कर रहे हैं। और जो लोग शैक्षिक उन्नति के नाम पर इस प्रकार की सभ्यता की सहायता करने की भूमिका निभाते हैं, वे स्थूल इन्द्रियतृप्ति के धरातल पर स्थित लोगों से भी अधिक हानि कर रहे हैं। ईश्वरविहीन लोगों द्वारा विद्या की उन्नति उतनी ही संकटमय है जितना किसी नाग के फन पर जड़ा बहुमूल्य रत्न। ऐसे बहुमूल्य रत्न से सुसज्जित नाग उतना ही भयानक है जितना बिना रत्न वाला नाग।

पुनः, हरि-भक्ति-सुधोदय के अनुसार, ईश्वरविहीन लोगों द्वारा शैक्षिक कार्यों की उन्नति मृत शरीर के शृंगार के समान है। भारत में, अन्य अनेक देशों की भाँति, कुछ लोग शोकाकुल परिजनों की प्रसन्नता के लिए सजाए हुए शव के साथ शोभायात्रा निकालने की प्रथा का पालन करते हैं। इसी अर्थ में आधुनिक सभ्यता भौतिक अस्तित्व के नित्य दुखों को ढकने के लिए की गई गतिविधियों की जोड़-तोड़ मात्र है। ऐसे सब कार्य इन्द्रियतृप्ति को लक्ष्य बनाकर किए जाते हैं, किन्तु इन्द्रियों के ऊपर मन है, मन के ऊपर बुद्धि है, और बुद्धि के ऊपर आत्मा है। अतएव शिक्षा का लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार — आत्मा के आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति — होना चाहिए। जो शिक्षा जीवन की ऐसी अनुभूति तक न ले जाए, उसे अविद्या अर्थात् अज्ञान ही मानना चाहिए।

और ऐसी अविद्या की साधना का अर्थ है अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में गिरना। ऐसे भ्रान्त शिक्षक वैदिक भाषा में चार नामों से जाने जाते हैं: 1. वेद-वाद-रत, 2. मायया अपहृत-ज्ञान, 3. आसुरं भावम्, 4. नराधम। वेद-वाद-रत लोग अपने को वैदिक साहित्य का परम विद्वान् बताते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश वे वेदों के प्रयोजन से पूर्णतः विमुख हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि वेदों का प्रयोजन भगवान् को जानना है, किन्तु इन वेद-वाद-रत मनुष्यों की भगवान् में तनिक भी रुचि नहीं होती। इसके विपरीत, वे स्वर्ग-प्राप्ति जैसे फलों पर मोहित रहते हैं। जैसा कि श्री ईशोपनिषद् के मन्त्र एक में कहा गया है, हमें जानना चाहिए कि भगवान् ही सब वस्तुओं के स्वामी हैं, और हमें जीवन की आवश्यकताओं के अपने नियत अंश से सन्तुष्ट रहना चाहिए।

सम्पूर्ण वैदिक साहित्य का प्रयोजन विस्मृत जीव में इस ईश्वर-भावना को जगाना है, और यही सिद्धान्त मूर्ख मानव-जाति की समझ के लिए संसार के विविध शास्त्रों में विविध रूपों में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार चरम प्रयोजन मनुष्य को भगवद्धाम वापस ले जाना है। किन्तु वेद-वाद-रत लोग वेदों का तात्पर्य समझने के बजाय यह मान बैठते हैं कि इन्द्रियतृप्ति हेतु स्वर्गिक सुख की प्राप्ति जैसे गौण विषय — जिनकी लालसा ही मूलतः उनके भौतिक बन्धन का कारण है — वेदों का चरम लक्ष्य हैं। ऐसे लोग वैदिक साहित्य की मिथ्या व्याख्या करके दूसरों को पथभ्रष्ट करते हैं, और कभी-कभी वे पुराणों की निन्दा करते हैं, जो साधारण जनों के लिए प्रामाणिक वैदिक व्याख्याएँ हैं।

वेद-वाद-रत लोग आचार्य कहलाने वाले महान् गुरुजनों के प्रामाण्य की उपेक्षा करके वेदों की अपनी ही व्याख्याएँ गढ़ते हैं; और वे अपने ही बीच से किसी अनैतिक व्यक्ति को वैदिक ज्ञान के अग्रणी व्याख्याता के रूप में खड़ा कर देते हैं। श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में ऐसे मनुष्यों की विशेष रूप से भर्त्सना अत्यन्त उपयुक्त संस्कृत शब्द विद्या-रत से की गई है। विद्या का अर्थ है वेद, क्योंकि वेद समस्त ज्ञान का मूल है; और रत का अर्थ है संलग्न। विद्या-रत का अर्थ है वेदों के अध्ययन में संलग्न। अतएव तथाकथित विद्या-रत लोगों की यहाँ भर्त्सना की गई है, क्योंकि आचार्यों की अवज्ञा के कारण वे यह नहीं जानते कि वेदों का प्रयोजन क्या है। ऐसे वेद-वाद-रत लोग वेदों के प्रत्येक शब्द में अपने प्रयोजन के अनुकूल अर्थ ढूँढ़ने के अभ्यस्त होते हैं।

वे नहीं जानते कि वैदिक साहित्य साधारण पुस्तकों का संग्रह नहीं है और गुरु-परम्परा की शृंखला के बिना उसे समझा नहीं जा सकता। वेदों के दिव्य सन्देश को समझने के लिए मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना चाहिए। यही कठ उपनिषद् का निर्देश है। किन्तु इन वेद-वाद-रत लोगों का अपना ही आचार्य होता है, जो दिव्य गुरु-परम्परा की शृंखला में नहीं है। इस प्रकार वे वैदिक साहित्य की मिथ्या व्याख्या करके अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश की ओर बढ़ेंगे — उनसे भी आगे, जिन्हें वेदों का कोई ज्ञान ही नहीं है। मायया अपहृत-ज्ञान वर्ग के मनुष्य स्वयंभू “ईश्वर” होते हैं। ऐसे लोग समझते हैं कि वे स्वयं ही ईश्वर हैं और किसी अन्य ईश्वर की आराधना की कोई आवश्यकता नहीं है।

वे किसी साधारण मनुष्य की पूजा करने को सहमत हो जाएँगे, यदि वह धनी हो, किन्तु वास्तविक भगवान् की आराधना कभी नहीं करेंगे। ऐसे मूर्ख मनुष्य इस प्रश्न के विषय में अपनी ही मूर्खता नहीं पहचान पाते कि ईश्वर भला कभी माया के जाल में कैसे फँस सकते हैं। यदि ईश्वर कभी माया के वश में आ जाएँ, तो माया ईश्वर से अधिक शक्तिशाली ठहरेगी। किन्तु वे यह भी कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं। यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं, तो माया उन्हें कैसे पराभूत कर सकती है? ये स्वयंभू ईश्वर इन सब प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाते, किन्तु वे इसी में सन्तुष्ट रहते हैं कि वे स्वयं ईश्वर बन गए हैं।
