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श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व

श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण असीम आनन्द के भण्डार तथा समस्त के सर्वश्रेष्ठ नायक हैं, तथापि वे तीन प्रकार से अपने भक्तों पर निर्भर रहते हैं। भक्त की भावदशा के अनुसार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की तीन प्रकार से प्रशंसा होती है: सर्वाधिक पूर्ण के रूप में, अति पूर्ण के रूप में, तथा पूर्ण के रूप में। जब वे अपने आप को पूर्णता में प्रकट करते हैं, तब महान् विद्वान पण्डित उन्हें सर्वाधिक पूर्ण मानकर उनकी प्रशंसा करते हैं। जब वे अपने आप को न्यून मात्रा में प्रकट करते हैं, तब वे अति पूर्ण कहलाते हैं। और जब वे उससे भी कम प्रकट करते हैं, तब वे पूर्ण कहलाते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण की प्रशंसा पूर्णता की तीन कोटियों में होती है। ये तीन कोटियाँ विशेष रूप से इस प्रकार प्रकट होती हैं: जब वे गोलोक वृन्दावन में होते हैं, तब उनके दिव्य गुण सर्वाधिक पूर्ण रूप में प्रकट होते हैं; जब वे द्वारका में होते हैं, तब वे अपने गुणों को अति पूर्ण रूप में प्रकट करते हैं; और जब वे मथुरा में होते हैं, तब वे अपने गुणों को पूर्ण रूप में प्रकट करते हैं।

श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का विश्लेषण धीरोदात्त, धीर-ललित, धीर-प्रशान्त तथा धीरोद्धत के रूप में किया जाता है। यदि कोई पूछे कि एक व्यक्तित्व को चार पूर्णतः परस्पर-विरोधी प्रकारों में किस प्रकार देखा जा सकता है, तो उत्तर यह है कि भगवान् समस्त दिव्य गुणों तथा लीलाओं के भण्डार हैं। अतः उनके भिन्न-भिन्न पक्षों का विश्लेषण उनकी असीम विविध लीलाओं के प्रकटीकरण के अनुसार किया जा सकता है, और इस कारण इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।

धीरोदात्त वह व्यक्ति है जो स्वभाव से अत्यन्त गम्भीर, सौम्य, क्षमाशील, करुणामय, दृढ़निश्चयी, विनम्र, अत्यन्त गुणवान, शूरवीर तथा शारीरिक रूप से आकर्षक होता है।

इस सन्दर्भ में स्वर्ग के राजा इन्द्र द्वारा दिया गया निम्नलिखित कथन अत्यन्त सार्थक है: "हे मेरे प्रभु, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने आपके प्रति महान् अपराध किए हैं, किन्तु मैं अपने पश्चात्ताप के भाव व्यक्त नहीं कर सकता, क्योंकि मैं आपके असाधारण शौर्य-भाव, अपने भक्तों की रक्षा के आपके प्रयत्न, आपके दृढ़निश्चय, गोवर्धन के विशाल पर्वत को उठाने में आपकी स्थिरता, आपके सुन्दर शारीरिक लक्षणों, तथा अपने भक्तों एवं अपराधियों की प्रार्थनाएँ मात्र स्वीकार कर प्रसन्न हो जाने के आपके आश्चर्यजनक स्वभाव को देखकर विमोहित हूँ।"

स्वर्ग के राजा द्वारा किया गया उपर्युक्त कथन श्रीकृष्ण के धीरोदात्त होने की यथार्थ पुष्टि करता है। अनेक विद्वान पण्डितों ने भगवान् रामचन्द्र को भी धीरोदात्त रूप में स्वीकार किया है, किन्तु भगवान् रामचन्द्र के समस्त गुण भगवान् श्रीकृष्ण के चरित्र में भी समाहित हैं।

व्यक्ति धीर-ललित कहलाता है यदि वह स्वभाव से अत्यन्त विनोदी, सदा पूर्ण यौवन से युक्त, हास्य-परिहास में निपुण, तथा समस्त चिन्ताओं से मुक्त हो। ऐसा धीर-ललित व्यक्तित्व प्रायः अपनी प्रेयसी के प्रति सहज तथा अत्यन्त समर्पित पाया जाता है। श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का यह धीर-ललित लक्षण *श्रीमद्भागवत* में वर्णित है, जहाँ वृन्दावन में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों में से एक की पत्नी यज्ञपत्नी अपनी सखियों से कहती हैं: "एक दिन श्रीमती राधारानी अपनी सखियों सहित अपने उद्यान में विश्राम कर रही थीं, और उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण उस सभा में पधारे। बैठ जाने के पश्चात् वे राधारानी के साथ अपनी विगत रात्रि की लीलाओं का अत्यन्त धृष्टतापूर्वक वर्णन करने लगे। जब वे इस प्रकार बोल रहे थे, तब राधारानी अत्यन्त लज्जित हो गईं। वे लज्जा का अनुभव कर रही थीं तथा विचारों में लीन थीं, और श्रीकृष्ण ने यह अवसर पाकर उनके स्तनों पर भाँति-भाँति के तिलक अंकित कर दिए। श्रीकृष्ण ने उस कला में अपने को अत्यन्त निपुण सिद्ध किया।" इस प्रकार धीर-ललित के रूप में श्रीकृष्ण गोपियों की संगति में अपनी यौवनोचित प्रवृत्तियों का आनन्द लेते थे।

सामान्यतः जो नाटक-रचना में निपुण होते हैं, वे कामदेव को आदर्श धीर-ललित कहना पसन्द करते हैं, किन्तु हम धीर-ललित के समस्त लक्षण श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में अधिक पूर्ण रूप से पा सकते हैं।

जो व्यक्ति अत्यन्त शान्त, सहनशील, विचारशील तथा सेवापरायण होता है, वह धीर-प्रशान्त कहलाता है। श्रीकृष्ण का यह धीर-प्रशान्त लक्षण पाण्डवों के साथ उनके व्यवहार में प्रकट हुआ। भगवान् के प्रति पाण्डवों की निष्ठापूर्ण भक्ति के कारण वे उनके सारथी, उनके सलाहकार, उनके मित्र, उनके दूत तथा कभी-कभी उनके अंगरक्षक बनने को सहमत हो गए। यह विष्णु के प्रति की गई भक्ति के फल का एक उदाहरण है। जब श्रीकृष्ण महाराज युधिष्ठिर से धर्म-सिद्धान्तों के विषय में बोल रहे थे, तब उन्होंने अपने आप को महान् विद्वान पण्डित सिद्ध किया, किन्तु क्योंकि उन्होंने युधिष्ठिर के छोटे चचेरे भाई का स्थान स्वीकार किया था, अतः वे अत्यन्त सौम्य स्वर में बोल रहे थे, जिससे उनके सुन्दर शारीरिक लक्षण और बढ़ गए। उनके नेत्रों की गति तथा उनकी वाणी का ढंग सिद्ध करते थे कि वे नैतिक उपदेश देने में अत्यन्त निपुण थे। कभी-कभी विद्वान पण्डित महाराज युधिष्ठिर को भी धीर-प्रशान्त रूप में स्वीकार करते हैं।

जो व्यक्ति अत्यन्त ईर्ष्यालु, अभिमानी, सहज ही क्रोधित हो जाने वाला, अस्थिर तथा आत्मतुष्ट होता है, उसे विद्वान पण्डित धीरोद्धत कहते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के चरित्र में ये गुण दृष्टिगोचर हुए, क्योंकि जब वे कालयवन को एक पत्र लिख रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उसे एक पापी मेंढक कहकर सम्बोधित किया। अपने पत्र में श्रीकृष्ण ने कालयवन को परामर्श दिया कि उसे तत्काल जाकर अपने निवास हेतु कोई अन्धकारपूर्ण कूप ढूँढ़ लेना चाहिए, क्योंकि कृष्ण नामक एक काला सर्प है जो ऐसे समस्त पापी मेंढकों को निगल जाने के लिए अत्यन्त उत्सुक है। श्रीकृष्ण ने कालयवन को स्मरण कराया कि वे समस्त ब्रह्माण्डों को मात्र देखकर ही भस्म कर सकते हैं।

श्रीकृष्ण का उपर्युक्त कथन प्रत्यक्ष रूप से ईर्ष्यालु स्वभाव का प्रतीत होता है, किन्तु भिन्न-भिन्न लीलाओं, स्थानों तथा कालों के अनुसार इस गुण को एक महान् लक्षण माना जाता है। श्रीकृष्ण के धीरोद्धत गुणों को महान् माना गया है, क्योंकि श्रीकृष्ण इनका प्रयोग केवल अपने भक्तों की रक्षा हेतु करते हैं। दूसरे शब्दों में, अवांछनीय लक्षणों का भी प्रयोग भक्ति के आदान-प्रदान में हो सकता है।

कभी-कभी पाण्डवों के द्वितीय भाई भीम का भी वर्णन धीरोद्धत रूप में किया जाता है।

एक बार, हिरण के रूप में प्रकट हुए एक असुर से युद्ध करते समय श्रीकृष्ण ने उसे इस प्रकार ललकारा: "मैं तेरे समक्ष कृष्ण नामक एक महान् गज के रूप में आया हूँ। तुझे पराजय स्वीकार करते हुए युद्धभूमि छोड़ देनी होगी, अन्यथा तेरी प्रतीक्षा में मृत्यु है।" श्रीकृष्ण का यह ललकारने का भाव उनके उदात्त चरित्र के विरुद्ध नहीं है, क्योंकि परमपुरुष के रूप में उनके चरित्र में सब कुछ सम्भव है।

*कूर्म पुराण* में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के इन परस्पर-विरोधी लक्षणों के विषय में एक उत्तम कथन है। वहाँ कहा गया है कि परमपुरुष न तो अत्यन्त स्थूल हैं और न अत्यन्त कृश; वे सदैव भौतिक गुणों से परे हैं, तथापि उनके शरीर की कान्ति श्यामल है। उनके नेत्र रक्तिम हैं, वे सर्वशक्तिमान हैं, और वे सभी प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न हैं। श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में परस्पर-विरोधी लक्षण तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं हैं: *श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्* के लक्षणों को वस्तुतः विरोधाभासी नहीं मानना चाहिए। मनुष्य को श्रीकृष्ण के लक्षणों को प्रामाणिक स्रोतों से समझने का प्रयत्न करना चाहिए, और यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि भगवान् की परम इच्छा द्वारा ये लक्षण किस प्रकार प्रयुक्त होते हैं।

*महा-वराह पुराण* में इसकी पुष्टि होती है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा उनके विस्तारों के दिव्य शरीर सब नित्य विद्यमान रहते हैं। ऐसे शरीर कभी भौतिक नहीं होते तथा पूर्णतः आध्यात्मिक एवं ज्ञान से परिपूर्ण होते हैं। वे समस्त दिव्य गुणों के भण्डार हैं। *वैष्णव तन्त्र* में एक कथन है कि भगवान् तथा उनके विस्तृत शरीर अठारह प्रकार के भौतिक कल्मषों से सदैव मुक्त रहते हैं,* [*उपर्युक्त अठारह प्रकार के भौतिक कल्मषों का वर्णन *विष्णु-यामल तन्त्र* में इस प्रकार किया गया है: भ्रम, थकान, त्रुटि करना, रूखापन, भौतिक काम, अस्थिरता, अभिमान, ईर्ष्या, हिंसा, अपमान, क्लान्ति, असत्य, क्रोध, लालसा, परावलम्बन, ब्रह्माण्ड पर प्रभुत्व की इच्छा, द्वैत देखना, तथा छल।] क्योंकि ऐसे शरीर सदा ज्ञान, आनन्द तथा नित्यता से परिपूर्ण रहते हैं।

उपर्युक्त समस्त कथनों के विषय में यह समझा जाता है कि महा-विष्णु भौतिक जगत् में समस्त अवतारों के स्रोत हैं। किन्तु अपने महत्तर असाधारण ऐश्वर्य के कारण, हम समझ सकते हैं कि नन्द महाराज के पुत्र महा-विष्णु के भी स्रोत हैं। इसकी पुष्टि *ब्रह्म-संहिता* में होती है, जहाँ कहा गया है: "मैं उन गोविन्द को सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ, जिनके आंशिक प्रतिनिधि महा-विष्णु हैं।" महा-विष्णु का विराट स्वरूप असंख्य ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति का स्रोत है। असंख्य ब्रह्माण्ड उनके निःश्वास से बाहर आ रहे हैं, और वे ही ब्रह्माण्ड उनके श्वास के साथ भीतर लौट जाते हैं। ये महा-विष्णु भी श्रीकृष्ण के एक अंश के अंश के एक पूर्ण अंश हैं।
