### 3

भगवद्भक्ति स्वीकार करने के लिए उम्मीदवार की पात्रता

महात्माओं, अथवा भगवान् की भगवद्भक्ति में शत-प्रतिशत संलग्न महान् आत्माओं, के साथ अपने संग के कारण, मनुष्य श्री कृष्ण के प्रति थोड़ा-सा आकर्षण प्राप्त कर सकता है। किन्तु साथ ही मनुष्य सकाम कर्मों तथा भौतिक इन्द्रिय-भोग में अत्यधिक आसक्त रह सकता है और भिन्न-भिन्न प्रकार के त्याग को सहने के लिए तैयार न हो। ऐसा व्यक्ति, यदि उसका कृष्ण के प्रति अटूट आकर्षण हो, भगवद्भक्ति सम्पन्न करने के लिए एक योग्य उम्मीदवार बन जाता है।

शुद्ध भक्तों के संग में कृष्णभावनामृत के प्रति यह आकर्षण महान् सौभाग्य का चिह्न है। भगवान् चैतन्य द्वारा यह पुष्ट किया गया है कि केवल भाग्यशाली व्यक्ति ही, प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु तथा कृष्ण दोनों की कृपा से, भगवद्भक्ति का बीज प्राप्त करेंगे। इस सन्दर्भ में, भगवान् कृष्ण *श्रीमद्भागवत* के एकादश स्कन्ध, 20वें अध्याय, श्लोक 8 में कहते हैं : "हे मेरे प्रिय उद्धव, केवल असाधारण सौभाग्य से ही कोई व्यक्ति मेरी (कृष्ण की) ओर आकृष्ट होता है। और भले ही कोई सकाम कर्मों से पूर्ण रूप से विरक्त न हो, अथवा भगवद्भक्ति में पूर्ण रूप से आसक्त न हो, ऐसी सेवा शीघ्र ही प्रभावकारी होती है।"

भक्तों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम अथवा सर्वोच्च श्रेणी का वर्णन इस प्रकार है : मनुष्य प्रासंगिक शास्त्रों के अध्ययन में अत्यन्त निपुण है, और वह उन शास्त्रों के सन्दर्भ में तर्क प्रस्तुत करने में भी निपुण है। वह पूर्ण विवेक के साथ अत्यन्त भली-भाँति निष्कर्ष प्रस्तुत कर सकता है और भगवद्भक्ति के मार्गों पर निर्णायक रीति से विचार कर सकता है। वह पूर्ण रूप से समझता है कि जीवन का परम लक्ष्य कृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा को प्राप्त करना है, और वह जानता है कि कृष्ण ही आराधना तथा प्रेम के एकमात्र विषय हैं। यह प्रथम-श्रेणी का भक्त वह है जिसने किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के प्रशिक्षण में विधि-नियमों का कठोरता से पालन किया है और प्रकट शास्त्रों के अनुरूप निष्ठापूर्वक उनकी आज्ञा का पालन किया है। इस प्रकार प्रचार करने तथा स्वयं आध्यात्मिक गुरु बनने के लिए पूर्ण रूप से प्रशिक्षित होने के कारण, वह प्रथम श्रेणी का माना जाता है। एक प्रथम-श्रेणी का भक्त उच्चतर प्राधिकार के सिद्धान्तों से कभी विचलित नहीं होता, और वह समस्त तर्क तथा युक्तियों सहित समझकर शास्त्रों में दृढ़ श्रद्धा प्राप्त करता है। जब हम तर्क तथा युक्ति की बात करते हैं, तो उसका अर्थ है प्रकट शास्त्र के आधार पर तर्क तथा युक्ति। प्रथम-श्रेणी का भक्त समय व्यर्थ करने के लिए बने शुष्क काल्पनिक उपायों में रुचि नहीं रखता। दूसरे शब्दों में, जिसने भगवद्भक्ति के विषय में परिपक्व दृढ़ता प्राप्त कर ली है, उसे प्रथम-श्रेणी का भक्त स्वीकार किया जा सकता है।

द्वितीय-श्रेणी के भक्त को निम्नलिखित लक्षणों से परिभाषित किया गया है : वह प्रकट शास्त्र के बल पर तर्क करने में बहुत निपुण नहीं है, किन्तु उसकी लक्ष्य में दृढ़ श्रद्धा है। इस वर्णन का तात्पर्य यह है कि द्वितीय-श्रेणी के भक्त की कृष्ण के प्रति भगवद्भक्ति की प्रक्रिया में दृढ़ श्रद्धा है, किन्तु वह कभी-कभी किसी विपक्षी दल को प्रकट शास्त्र के बल पर तर्क तथा निर्णय प्रस्तुत करने में विफल हो सकता है। किन्तु साथ ही वह अपने इस निर्णय के विषय में कि कृष्ण आराधना के परम विषय हैं, अपने भीतर अब भी अविचलित रहता है।

नवदीक्षित अथवा तृतीय-श्रेणी का भक्त वह है जिसकी श्रद्धा प्रबल नहीं है और, साथ ही, जो प्रकट शास्त्र के निर्णय को नहीं पहचानता। नवदीक्षित की श्रद्धा को कोई अन्य व्यक्ति प्रबल तर्कों से अथवा विपरीत निर्णय से बदल सकता है। द्वितीय-श्रेणी के भक्त के विपरीत, जो शास्त्र से तर्क तथा प्रमाण प्रस्तुत तो नहीं कर सकता, किन्तु जिसकी फिर भी लक्ष्य में पूर्ण श्रद्धा है, नवदीक्षित की लक्ष्य में कोई दृढ़ श्रद्धा नहीं है। अतः उसे नवदीक्षित भक्त कहा जाता है।

नवदीक्षित भक्त का आगे वर्गीकरण *भगवद्गीता* में किया गया है। वहाँ कहा गया है कि चार वर्ग के मनुष्य—अर्थात् वे जो क्लेशग्रस्त हैं, वे जिन्हें धन की आवश्यकता है, वे जो जिज्ञासु हैं तथा वे जो ज्ञानी हैं—भगवद्भक्ति आरम्भ करते हैं और अपनी-अपनी आत्म-सन्तुष्टि के विषय में राहत के लिए भगवान् के पास आते हैं। वे किसी आराधना-स्थल में जाते हैं और भौतिक क्लेश के शमन के लिए, अथवा किसी आर्थिक विकास के लिए, अथवा अपनी जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। और एक ज्ञानी मनुष्य जो केवल ईश्वर की महानता का अनुभव करता है, वह भी नवदीक्षितों में गिना जाता है। ऐसे आरम्भकर्ता द्वितीय-श्रेणी अथवा प्रथम-श्रेणी के स्तर तक उन्नत हो सकते हैं, यदि वे शुद्ध भक्तों के संग में रहें।

कनिष्ठ श्रेणी का एक उदाहरण महाराज ध्रुव हैं। उन्हें अपने पिता के राज्य की आवश्यकता थी, अतः वे भगवान् की भक्ति में संलग्न हुए। तत्पश्चात् अन्त में, जब वे पूर्णतः शुद्ध हो गए, तब उन्होंने भगवान् से कोई भी भौतिक वरदान स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसी प्रकार, गजेन्द्र दुःखग्रस्त था और उसने रक्षा हेतु श्रीकृष्ण से प्रार्थना की, जिसके पश्चात् वह शुद्ध भक्त बन गया। उसी प्रकार, सनक, सनातन, सनन्द तथा सनत्कुमार — ये सभी ज्ञानी, सन्त-स्वभाव पुरुषों की कोटि में थे, और वे भी भक्ति से आकर्षित हुए। ऐसा ही नैमिषारण्य वन में शौनक ऋषि के नेतृत्व वाली सभा के साथ हुआ। वे जिज्ञासु थे और श्रीकृष्ण के विषय में सदा सूत गोस्वामी से पूछा करते थे। इस प्रकार उन्होंने शुद्ध भक्त की संगति प्राप्त की और स्वयं भी शुद्ध भक्त बन गए। अतः आत्म-उन्नति का यही मार्ग है। मनुष्य चाहे जिस भी अवस्था में हो, यदि वह इतना सौभाग्यशाली हो कि शुद्ध भक्तों की संगति प्राप्त कर सके, तो वह अति शीघ्र द्वितीय श्रेणी या प्रथम श्रेणी के स्तर तक उन्नत हो जाता है।

इन चार प्रकार के भक्तों का वर्णन भगवद्गीता के सातवें अध्याय में हुआ है, और इन सभी को पुण्यात्मा स्वीकार किया गया है। पुण्यात्मा बने बिना कोई भी भक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। भगवद्गीता में यह समझाया गया है कि जिसने निरन्तर पुण्य-कर्म किए हों और जिसके जीवन में पापकर्मों की प्रतिक्रियाएँ पूर्णतः समाप्त हो चुकी हों, केवल वही कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर सकता है। अन्य नहीं कर सकते। कनिष्ठ भक्तों को उनके पुण्य-कर्मों की तरतमता के अनुसार चार वर्गों में विभाजित किया गया है — आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी। पुण्य-कर्मों के अभाव में यदि मनुष्य दुःखग्रस्त अवस्था में हो, तो वह अज्ञेयवादी, साम्यवादी अथवा वैसा ही कुछ बन जाता है। चूँकि वह ईश्वर में दृढ़ विश्वास नहीं करता, अतः वह सोचता है कि वह उसमें पूर्णतः अविश्वास करके अपनी दुःखग्रस्त अवस्था को सुधार सकता है।

किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में समझाया है कि इन चार प्रकार के कनिष्ठ भक्तों में से जो ज्ञानी है, वह उन्हें अत्यन्त प्रिय है, क्योंकि ज्ञानी मनुष्य, यदि वह श्रीकृष्ण में आसक्त हो, तो भौतिक लाभों का विनिमय नहीं खोजता। जो ज्ञानी मनुष्य श्रीकृष्ण में आसक्त हो जाता है, वह उनसे कोई प्रतिफल नहीं चाहता — न दुःख-निवारण के रूप में, न धन-प्राप्ति के रूप में। इसका अर्थ है कि आरम्भ से ही श्रीकृष्ण के प्रति उसकी आसक्ति का मूल सिद्धान्त, कमोबेश, प्रेम है। इसके अतिरिक्त, अपने ज्ञान तथा शास्त्रों के अध्ययन के कारण, वह यह भी समझ सकता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।

भगवद्गीता में इसकी पुष्टि होती है कि अनेकानेक जन्मों के पश्चात्, जब मनुष्य वस्तुतः ज्ञानी बनता है, तब वह वासुदेव की शरण में जाता है, यह भली-भाँति जानते हुए कि श्रीकृष्ण (वासुदेव) ही समस्त कारणों के उद्गम तथा कारण हैं। अतः वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों से चिपका रहता है और क्रमशः उनके प्रति प्रेम विकसित करता है। यद्यपि ऐसा ज्ञानी मनुष्य श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है, तथापि अन्य भी अत्यन्त उदार-चित्त स्वीकार किए जाते हैं, क्योंकि यद्यपि वे दुःखग्रस्त हैं अथवा धन के अभावग्रस्त हैं, तो भी वे सन्तुष्टि हेतु श्रीकृष्ण के पास आए हैं। इस प्रकार वे उदार, विशाल-हृदय महात्मा स्वीकार किए जाते हैं।

ज्ञानी अथवा प्रज्ञावान् पुरुष की स्थिति तक उन्नत हुए बिना कोई भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आराधना के सिद्धान्त पर अडिग नहीं रह सकता। अन्य लोग, जो अल्पबुद्धि हैं अथवा जिनकी बुद्धि माया के प्रभाव से हर ली गई है, वे प्रकृति के गुणों के प्रभाव के कारण विभिन्न देवताओं में आसक्त रहते हैं। ज्ञानी वह है जिसने भली-भाँति समझ लिया है कि वह आत्मा है, न कि मात्र शरीर। चूँकि उसे यह अनुभव हो जाता है कि वह आत्मा है और श्रीकृष्ण परम आत्मा हैं, अतः वह जानता है कि उसका घनिष्ठ सम्बन्ध श्रीकृष्ण के साथ होना चाहिए, इस शरीर के साथ नहीं। आर्त तथा अर्थार्थी मनुष्य जीवन की भौतिक धारणा में स्थित हैं, क्योंकि दुःख तथा धन की आवश्यकता — दोनों ही इस शरीर से सम्बन्धित हैं। जो जिज्ञासु है, वह आर्त तथा अर्थार्थी से कुछ ऊपर हो सकता है, किन्तु फिर भी वह भौतिक स्तर पर ही है। परन्तु जो ज्ञानी मनुष्य श्रीकृष्ण को खोजता है, वह भली-भाँति जानता है कि वह आत्मा अथवा ब्रह्म है, और श्रीकृष्ण परम आत्मा अथवा परब्रह्म हैं। वह जानता है कि आत्मा, अधीन तथा ससीम होने के कारण, सदा अनन्त तथा परम आत्मा श्रीकृष्ण के साथ स्वयं को संयोजित रखे। ज्ञानी मनुष्य का श्रीकृष्ण के साथ यही सम्बन्ध है।

यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जो व्यक्ति जीवन की देहात्म-बुद्धि से मुक्त हो चुका है, वही शुद्ध भक्ति का योग्य पात्र है। भगवद्गीता में इसकी भी पुष्टि होती है कि ब्रह्म-साक्षात्कार के पश्चात्, जब मनुष्य भौतिक चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है और प्रत्येक जीव को समान स्तर पर देख सकता है, तब वह भक्ति में प्रवेश का अधिकारी बनता है।

जैसा पूर्व में कहा गया है, सुख तीन प्रकार के होते हैं — भौतिक, आध्यात्मिक तथा भक्तिमय। जब तक मनुष्य भौतिक रूप से प्रभावित है, तब तक भक्ति तथा उसके सम्पादन से उत्पन्न सुख सम्भव नहीं। यदि किसी को भौतिक भोग की अथवा परम के साथ एकाकार होने की इच्छा हो, तो ये दोनों ही भौतिक धारणाएँ मानी जाती हैं। चूँकि निर्विशेषवादी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ संगति तथा प्रेममय व्यवहार के विनिमय के आध्यात्मिक सुख की सराहना नहीं कर सकते, अतः उनका चरम लक्ष्य भगवान् के साथ एकाकार होना है। यह धारणा मात्र भौतिक विचार का ही विस्तार है। भौतिक जगत् में, प्रत्येक व्यक्ति अपने समस्त साथियों अथवा पड़ोसियों में सर्वोच्च मुखिया बनने का प्रयत्न कर रहा है। चाहे सामुदायिक रूप से, सामाजिक रूप से अथवा राष्ट्रीय रूप से, प्रत्येक व्यक्ति जीवन की भौतिक धारणा में अन्य सबसे बड़ा बनने की होड़ कर रहा है। इस महत्ता को असीम तक विस्तृत किया जा सकता है, यहाँ तक कि मनुष्य वस्तुतः सबसे महान् — परमेश्वर — के साथ एकाकार होना चाहता है। यह भी एक भौतिक धारणा है, यद्यपि सम्भवतः कुछ अधिक उन्नत।

किन्तु जीवन की पूर्ण आध्यात्मिक धारणा अपनी स्वरूपगत स्थिति का पूर्ण ज्ञान है, और इस प्रकार मनुष्य इतना जान लेता है कि स्वयं को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संयोजित कर सके। मनुष्य को जानना चाहिए कि वह ससीम है और भगवान् अनन्त हैं। अतः भगवान् के साथ वस्तुतः एकाकार होना सम्भव नहीं, भले ही मनुष्य इसकी आकांक्षा करे। यह सर्वथा असम्भव है। अतः जिस किसी की भी अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने की — चाहे भौतिक अर्थ में अथवा आध्यात्मिक अर्थ में, अधिकाधिक महत्त्वपूर्ण बनकर — कोई इच्छा अथवा आकांक्षा हो, वह भक्ति के वास्तविक मधुर स्वाद का आस्वादन नहीं कर सकता। अतएव श्रील रूप गोस्वामी ने इन भुक्ति (भौतिक) तथा मुक्ति की इच्छाओं को धारण करने की तुलना किसी डायन की काली विद्या से प्रभावित होने से की है — दोनों ही दशाओं में मनुष्य संकट में रहता है। भुक्ति का अर्थ है भौतिक भोग, और मुक्ति का अर्थ है भौतिक चिन्ता से मुक्त होकर भगवान् के साथ एकाकार हो जाना। इन इच्छाओं की तुलना भूतों तथा डायनों से ग्रस्त होने से की गई है, क्योंकि जब तक भौतिक भोग अथवा परम के साथ आध्यात्मिक एकत्व की ये आकांक्षाएँ बनी रहती हैं, तब तक कोई भी भक्ति के वास्तविक दिव्य स्वाद का आस्वादन नहीं कर सकता।

शुद्ध भक्त मुक्ति की कभी परवाह नहीं करता। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की : "हे मेरे प्रिय नन्दनन्दन, मैं न तो अनेक अनुयायियों के रूप में कोई भौतिक सुख चाहता हूँ, न धन का अपार ऐश्वर्य, न कोई सुन्दरी पत्नी, और न ही मैं भौतिक अस्तित्व से निवृत्ति चाहता हूँ। मैं चाहे बार-बार, एक के बाद एक अनेक जन्म लूँ, किन्तु आपसे मेरी यही प्रार्थना है कि आपके प्रति मेरी भक्ति सदा अविचल बनी रहे।"

शुद्ध भक्त का ध्यान भगवान् की लीलाओं, नाम, गुणों, रूपों इत्यादि के गुणगान की ओर इतना आकृष्ट रहता है कि वह भक्त मुक्ति की परवाह नहीं करता। श्री बिल्वमंगल ठाकुर ने कहा है : "हे मेरे प्रिय प्रभु, यदि मैं आपकी भक्ति में संलग्न रहूँ, तो मैं अति सरलता से सर्वत्र आपकी उपस्थिति का अनुभव कर सकता हूँ। और जहाँ तक मुक्ति का प्रश्न है, मैं समझता हूँ कि मुक्ति हाथ जोड़े मेरे द्वार पर मेरी सेवा करने की प्रतीक्षा में खड़ी है।" अतः शुद्ध भक्तों के लिए मुक्ति तथा आध्यात्मिक विमोचन अति महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ नहीं हैं।

इस सन्दर्भ में, श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के पच्चीसवें अध्याय के तेईसवें श्लोक में, कपिलदेव ने अपनी माता देवहूति को इस प्रकार उपदेश दिया है : "हे मेरी प्रिय माता, मेरे शुद्ध भक्त मेरे विभिन्न रूपों को, मेरे मुख की सुन्दरता को, मेरे इतने मनोहर शरीर की संरचना को देखकर मोहित हो जाते हैं। मेरा हास्य, मेरी लीलाएँ तथा मेरी चितवन उन्हें इतनी सुन्दर प्रतीत होती हैं कि उनके मन सदा मेरे ही चिन्तन में निमग्न रहते हैं, और उनके जीवन पूर्णतः मुझे समर्पित होते हैं। यद्यपि ऐसे लोग किसी भी प्रकार की मुक्ति अथवा किसी भी प्रकार के भौतिक सुख की कामना नहीं करते, तथापि मैं उन्हें परम धाम में अपने पार्षदों के बीच स्थान देता हूँ।"

श्रीमद्भागवत का यह प्रमाण शुद्ध भक्त को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की संगति तक उन्नत होने का आश्वासन देता है। श्रील रूप गोस्वामी इस सन्दर्भ में टिप्पणी करते हैं कि जो वस्तुतः श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सुन्दरता अथवा उनकी सेवा से आकृष्ट होता है, और जिसका हृदय ऐसे आकर्षण के कारण सदा दिव्य आनन्द से परिपूर्ण रहता है, वह स्वभावतः उस मुक्ति की कभी आकांक्षा नहीं करेगा, जो निर्विशेषवादियों के लिए इतनी मूल्यवान् है।

इसी ग्रन्थ के तृतीय स्कन्ध के पन्द्रहवें अध्याय में भी एक समान प्रसंग है, जहाँ उद्धव भगवान् श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहते हैं : "हे मेरे प्रिय प्रभु, जो लोग आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हैं, उनके लिए धर्म, अर्थ, इन्द्रियतृप्ति अथवा मोक्ष में से कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है — यद्यपि इन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सुख उन्हें अति सरलता से उपलब्ध हो सकता है। ऐसी सुविधाओं के होते हुए भी, हे मेरे प्रिय प्रभु, मैं ऐसा कोई फल प्राप्त करने की आकांक्षा नहीं करता। मेरी एकमात्र प्रार्थना यह है कि आपके चरणकमलों में मेरी अविचल श्रद्धा तथा भक्ति बनी रहे।"

एक समान प्रसंग तृतीय स्कन्ध के पच्चीसवें अध्याय के इकतीसवें श्लोक में आता है, जहाँ कपिलदेव अपनी माता को उपदेश देते हुए कहते हैं : "हे मेरी प्रिय माता, वे भक्त जिनके हृदय सदा मेरे चरणकमलों की सेवा में लीन रहते हैं, और जो मेरी सन्तुष्टि हेतु कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं, विशेषकर वे जो मेरे गुणों, लीलाओं तथा रूप को समझने हेतु एकत्र होते हैं, और इस प्रकार समवेत रूप से मेरा गुणगान करते हैं तथा उससे दिव्य आनन्द प्राप्त करते हैं — ऐसे भाग्यशाली भक्त कभी मेरे साथ एकाकार होने की कामना नहीं करते। और मेरे साथ एकाकार होने की तो बात ही क्या, यदि उन्हें मेरे धाम में मेरे समान पद, अथवा मेरे समान ऐश्वर्य, अथवा मेरे समान देहाकृति के साथ मेरी व्यक्तिगत संगति भी अर्पित की जाए, तो वे उसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं, क्योंकि वे मात्र मेरी भक्ति में संलग्न रहकर ही सन्तुष्ट हैं।"

श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध के नवें अध्याय के दसवें श्लोक में, राजा ध्रुव कहते हैं : "हे मेरे प्रिय प्रभु, आपके चरणकमलों के ध्यान से प्राप्त वह दिव्य आनन्द, जिसका भोग शुद्ध भक्त करते हैं, उस दिव्य आनन्द से कहीं अधिक है जिसे निर्विशेषवादी आत्म-साक्षात्कार द्वारा प्राप्त करते हैं — उस तक उनकी पहुँच ही नहीं। तो फिर वे सकाम कर्मी, जो अधिक से अधिक उच्चतर स्वर्गलोकों में उन्नति की आकांक्षा कर सकते हैं, आपको कैसे समझ सकते हैं, और उन्हें भक्तों के सुख के समान सुख का भोग करने वाला कैसे कहा जा सकता है?"
