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माधुर्य स्नेह

श्रीकृष्ण तथा उनके माता-पिता के बीच के प्रेम के भाव से भी ऊपर माधुर्य प्रेम का सम्बन्ध है। यह भगवान् तथा युवा गोपियों के बीच भिन्न-भिन्न प्रकारों से प्रकट होता है—चितवन, भौंहें चलाना, अत्यन्त मधुर वचन बोलना तथा मुस्कानों का आदान-प्रदान करना।

गोविन्द-विलास में इस आशय का एक कथन है : "श्रीमती राधारानी श्रीकृष्ण को अत्यन्त व्याकुलता से तथा प्रायः निराशापूर्वक खोज रही थीं।" जब माधुर्य प्रेम की ऐसी अप्रत्यक्ष अभिव्यक्ति होती है, तब वहाँ मुस्कान, विस्मय, उत्साह, विलाप, क्रोध, भय तथा कभी-कभी भयानकता होती है। माधुर्य प्रेम के ये सात आदान-प्रदान भावमय प्रेम की एक अन्य अवस्था का निर्माण करते हैं।

माधुर्य प्रेम के प्रत्यक्ष सम्बन्ध में, हास्य, विस्मय, वीरता, विलाप, क्रोध तथा भय होते हैं, किन्तु भयानकता नहीं होती। इन अभिव्यक्तियों को आनन्द के महान् भण्डार माना जाता है। जब ये सात प्रकार के भावमय प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान प्रकट होते हैं, तब वे स्थिरता की अवस्था प्राप्त कर लेते हैं, जिससे माधुर्य प्रेम का स्वाद विस्तृत होता है।

दो गोपियों के घड़ों से कुछ दही चुराने के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अपनी एक गोपी सखी से कहा : "हे प्रिय सुन्दर सखी, मैं शपथ ले सकता हूँ कि मैंने तुम्हारे घड़े से एक बूँद दही भी नहीं चुराई ! किन्तु फिर भी, तुम्हारी सखी राधारानी अत्यन्त निर्लज्जता से मेरे मुख की सुगन्ध सूँघ रही है। कृपया उसे अपना मुख मेरे मुख के निकट लाने की इस कुटिल नीति से रोको।" जब श्रीकृष्ण इस प्रकार बोल रहे थे, तब राधारानी की सखियाँ अपनी हँसी रोक न सकीं। यह माधुर्य प्रेम में भाव का एक उदाहरण है।

एक बार ब्रह्मा समस्त गायों तथा ग्वालबालों को देख रहे थे, जो पीत वस्त्र धारण किए हुए तथा मूल्यवान् रत्नों से सुसज्जित थे। वे बालक अपनी चार भुजाएँ फैलाए हुए थे और सैकड़ों अन्य ब्रह्माओं द्वारा पूजित हो रहे थे। समस्त ग्वालबाल परब्रह्म श्रीकृष्ण के संग होने के लिए अपना आह्लाद व्यक्त करने लगे। उस समय ब्रह्मा ने यह उद्गार करते हुए अपना आश्चर्य प्रकट किया, "मैं यहाँ क्या देख रहा हूँ ?" यह भावमय प्रेम में विस्मय का एक उदाहरण है।

यमुना के तट पर एक बार सूखे पत्तों की चरमराहट, ग्वालबालों की खिलखिलाहट तथा आकाश से गर्जन की ध्वनि थी। अघासुर के विजेता श्रीकृष्ण से युद्ध करने हेतु श्रीदामा अपनी कमरबन्द कस रहा था। यह भावमय प्रेम में वीरता का एक उदाहरण है।

*श्रीमद्भागवत* के दशम स्कन्ध, सातवें अध्याय, बाईसवें श्लोक में तृणावर्त नामक वातचक्र-असुर द्वारा श्रीकृष्ण को उड़ा ले जाने का वर्णन है। जब श्रीकृष्ण इस प्रकार आकाश में उड़ाए जा रहे थे, तब समस्त गोपियाँ ऊँचे स्वर में रोने लगीं। वे माता यशोदा के पास पहुँचीं, यह कहते हुए कि वे नन्द के पुत्र को नहीं खोज पा रहीं। उन्हें किसी वातचक्र ने उड़ा लिया था। यह भावमय प्रेम में विलाप का एक उदाहरण है।

जब श्रीकृष्ण कालिय के साथ युद्ध कर रहे थे, तब माता यशोदा ने उद्गार किया, "श्रीकृष्ण अब कालिय सर्प के फणों में फँसे हैं, और फिर भी मैं टुकड़े-टुकड़े नहीं हुई ! अतः मुझे यह स्वीकार करना ही होगा कि इस भौतिक शरीर की रक्षण-शक्ति कितनी आश्चर्यजनक है !" यह भावमय प्रेम में विलाप का एक अन्य उदाहरण है।

जब अभिमन्यु की बहन कुटिला ने श्रीकृष्ण को एक हार पहने देखा, तब वह समझ गई कि वह रत्नजटित आभूषण उन्हें राधारानी द्वारा दिया गया था। अतः वह क्रोध में निमग्न हो गई और अपनी भौंहें चलाने लगी, भावमय प्रेम में अपना क्रोध व्यक्त करते हुए।

यामुनाचार्य का इस आशय का एक कथन है : "जब से मैंने इन दिव्य प्रेम के आदान-प्रदानों का आनन्द लेना आरम्भ किया है, जो सदैव नित्य-नवीन हैं, तब से जब भी मुझे विगत यौन-जीवन के सुख का स्मरण होता है, तब मेरे होंठ सिकुड़ जाते हैं और मैं उस विचार पर थूकना चाहता हूँ।" यह भयानकता में भावमय प्रेम का एक उदाहरण है।

एक वृद्ध भक्त ने कहा, "हे प्रभु, जब हम आपसे दूर होते हैं, तब हम आपको फिर देखने के लिए इतने व्याकुल हो जाते हैं, और हमारे जीवन में महान् दुःख होता है। किन्तु तब, जब हम आपको देख पाते हैं, तब तत्क्षण वियोग का भय आ जाता है। इन परिस्थितियों में, चाहे हम आपको देखें अथवा न देखें, हम भिन्न-भिन्न प्रकार के क्लेशों के अधीन रहते हैं।" यह श्रीकृष्ण के प्रति भावमय प्रेम के एक विरोधी मिश्रण का उदाहरण है। ऐसा भावमय प्रेम आस्वादनीय है, और कुशल समीक्षकों ने ऐसे भावमय प्रेम की तुलना दही, मिश्री तथा थोड़ी-सी काली मिर्च के मिश्रण से की है। संयुक्त स्वाद अत्यन्त आस्वादनीय होता है।
