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भक्ति समस्त मुक्ति से श्रेष्ठ है

भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति के प्रति कितना गम्भीरता से आसक्त होता है, इसे महाराज पृथु (आदिराज) के उस कथन से समझा जा सकता है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध के बीसवें अध्याय के इक्कीसवें श्लोक में हुआ है। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से इस प्रकार प्रार्थना करते हैं : "हे मेरे प्रिय प्रभु, यदि मुक्ति प्राप्त करने के पश्चात् मुझे आपकी महिमा सुनने का अवसर न मिले — वह महिमा जो शुद्ध भक्त अपने हृदय की गहराई से आपके चरणकमलों की स्तुति में गाते हैं — और यदि मुझे दिव्य आनन्द के इस मधु का अवसर न मिले, तो मैं मुक्ति अथवा इस तथाकथित आध्यात्मिक विमोचन की कभी याचना नहीं करूँगा। मैं तो सदा आपसे यही प्रार्थना करूँगा कि आप मुझे लाखों जिह्वाएँ तथा लाखों कान दें, ताकि मैं निरन्तर आपकी दिव्य महिमा का गान तथा श्रवण कर सकूँ।"

निर्विशेषवादी परमेश्वर के अस्तित्व में विलीन होने की कामना करते हैं, किन्तु अपनी व्यक्तिगत सत्ता को बनाए रखे बिना उनके पास परमेश्वर की महिमा सुनने तथा गाने का कोई अवसर नहीं रहता। चूँकि उन्हें परमेश्वर के दिव्य रूप की कोई धारणा नहीं है, अतः उनके लिए उनकी दिव्य लीलाओं का गान तथा श्रवण करने का कोई अवसर नहीं है। दूसरे शब्दों में, जब तक कोई पहले से ही मुक्ति से परे न हो, तब तक वह न तो भगवान् की दिव्य महिमा का आस्वादन कर सकता है, और न ही भगवान् के दिव्य रूप को समझ सकता है।

एक समान कथन श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध के चौदहवें अध्याय के तैंतालीसवें श्लोक में मिलता है। वहाँ शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज को सम्बोधित करते हुए कहते हैं : "महात्मा राजा भरत श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा के प्रति इतने आसक्त थे कि उन्होंने भूलोक पर अपना आधिपत्य तथा अपने पुत्रों, समाज, मित्रों, राजसी ऐश्वर्य एवं सुन्दरी पत्नी के प्रति अपना स्नेह अति सरलता से त्याग दिया। वे इतने भाग्यशाली थे कि लक्ष्मीदेवी प्रसन्न होकर उन्हें सब प्रकार की भौतिक सुविधाएँ अर्पित करने को तत्पर थीं, किन्तु उन्होंने इनमें से किसी भी भौतिक ऐश्वर्य को कभी स्वीकार नहीं किया।" शुकदेव गोस्वामी राजा भरत के इस आचरण की अति उच्च स्तुति करते हैं। वे कहते हैं : "जिस किसी का हृदय भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मधुसूदन के दिव्य गुणों से आकृष्ट हो, वह भौतिक ऐश्वर्यों की तो बात ही क्या, उस मुक्ति की भी परवाह नहीं करता जिसकी आकांक्षा अनेक महान् ऋषि करते हैं।"

भागवत के षष्ठ स्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय के तेईसवें श्लोक में, वृत्रासुर द्वारा एक समान कथन है, जो भगवान् को इस प्रकार सम्बोधित करता है : "हे मेरे प्रिय प्रभु, आपकी दिव्य सेवा को छोड़कर मैं ध्रुवलोक नामक लोक [ध्रुवतारा] तक उन्नत हो सकता हूँ, अथवा मैं ब्रह्माण्ड के समस्त लोक-मण्डलों पर आधिपत्य प्राप्त कर सकता हूँ। किन्तु मैं इसकी आकांक्षा नहीं करता। न ही मैं योगाभ्यास की योगसिद्धियाँ चाहता हूँ, और न ही मैं आध्यात्मिक विमोचन की आकांक्षा करता हूँ। हे प्रभु, मैं तो केवल आपकी संगति तथा नित्य दिव्य सेवा ही चाहता हूँ।"

इस कथन की पुष्टि भगवान् शिव द्वारा श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध के सत्रहवें अध्याय के बावनवें श्लोक में होती है, जहाँ भगवान् शिव सती को इस प्रकार सम्बोधित करते हैं : "हे मेरी प्रिय सती, जो लोग नारायण [श्रीकृष्ण] के प्रति समर्पित हैं, वे किसी से नहीं डरते। चाहे वे उच्चतर लोक-मण्डलों तक उन्नत किए जाएँ, अथवा वे भौतिक कल्मष से मुक्ति प्राप्त कर लें, अथवा वे नारकीय जीवन-दशा में ढकेल दिए जाएँ — वस्तुतः किसी भी स्थिति में — वे किसी से नहीं डरते। मात्र इसलिए कि उन्होंने नारायण के चरणकमलों की शरण ले ली है, उनके लिए भौतिक जगत् में कोई भी स्थिति किसी अन्य के समान ही उत्तम है।"

स्वर्ग के राजा इन्द्र द्वारा श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध के अठारहवें अध्याय के बावनवें श्लोक में एक समान कथन है। वहाँ इन्द्र अपनी माता को इस प्रकार सम्बोधित करते हैं : "हे मेरी प्रिय माता [अदिति], जिन व्यक्तियों ने सब प्रकार की कामनाएँ त्याग दी हैं और जो मात्र भगवान् की भक्ति में संलग्न हैं, वे जानते हैं कि वस्तुतः उनका स्वार्थ क्या है। ऐसे व्यक्ति वस्तुतः अपने स्वार्थ की सेवा कर रहे हैं और जीवन की पूर्णता की अवस्था तक अग्रसर होने के विषय में प्रथम श्रेणी के विशेषज्ञ माने जाते हैं।"

भागवत के सप्तम स्कन्ध के छठे अध्याय के तेईसवें श्लोक में, महाराज प्रह्लाद कहते हैं : "हे मेरे प्रिय मित्रो, जो नास्तिक कुलों में जन्मे हो, यदि तुम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को प्रसन्न कर सको, तो इस संसार में इससे दुर्लभ कुछ भी नहीं है। दूसरे शब्दों में, यदि परमेश्वर श्रीकृष्ण तुमसे प्रसन्न हो जाएँ, तो तुम्हारे हृदय की गहराई में जो भी कामना हो, वह निःसन्देह पूर्ण हो सकती है। तो फिर सकाम कर्मों के फलों द्वारा स्वयं को उन्नत करने का क्या लाभ, जो प्रकृति के गुणों द्वारा सब अवस्थाओं में स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं? और तुम्हारे लिए आध्यात्मिक विमोचन अथवा भौतिक बन्धन से मुक्ति का क्या लाभ? यदि तुम सदा परमेश्वर की महिमा का गान करते रहो और सदा भगवान् के चरणकमलों के अमृत का आस्वादन करते रहो, तो इनमें से किसी की भी कोई आवश्यकता नहीं।" प्रह्लाद महाराज के इस कथन से यह स्पष्ट समझा जाता है कि जो भगवान् की दिव्य महिमा के गान तथा श्रवण में आनन्द लेता है, वह सब प्रकार के भौतिक वरदानों को — पुण्यमय सकाम कर्मों, यज्ञों तथा भौतिक बन्धन से मुक्ति तक के फलों सहित — पहले ही लाँघ चुका है।

इसी प्रकार, उसी सप्तम स्कन्ध के आठवें अध्याय के उनतालीसवें श्लोक में, जब देवता भगवान् नृसिंह को प्रार्थनाएँ अर्पित कर रहे हैं, तब स्वर्ग के राजा इन्द्र कहते हैं : "हे परम पुरुष, ये असुर अनुष्ठानिक यज्ञों के सम्पादन में हमारे भाग की बात करते हैं, किन्तु भगवान् नृसिंहदेव के रूप में मात्र अपने प्राकट्य द्वारा आपने हमें भयानक भयों से बचा लिया है। वस्तुतः, यज्ञ-सम्पादन में हमारे भाग केवल आपके ही कारण हैं, क्योंकि आप समस्त यज्ञों के परम भोक्ता हैं। आप प्रत्येक जीव के परमात्मा हैं, अतः आप ही समस्त वस्तुओं के वास्तविक स्वामी हैं। हमारे हृदय चिरकाल से इस असुर हिरण्यकशिपु के भय से सदा भरे रहते थे। किन्तु आप हम पर इतने कृपालु हैं कि उसका वध करके आपने वह भय हमारे हृदयों से दूर कर दिया है और हमें पुनः आपको अपने हृदयों में स्थापित करने का अवसर दिया है। जो व्यक्ति आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हैं, उनके लिए वे समस्त ऐश्वर्य, जो असुरों द्वारा हमसे छीन लिए गए थे, कुछ भी नहीं माने जाते। भक्त तो मुक्ति की भी परवाह नहीं करते, फिर इन भौतिक ऐश्वर्यों की तो बात ही क्या। वस्तुतः, हम यज्ञों के फलों के भोक्ता नहीं हैं। हमारा एकमात्र कर्तव्य सदा आपकी सेवा में संलग्न रहना है, क्योंकि आप ही समस्त वस्तुओं के भोक्ता हैं।"

इन्द्र के इस कथन का तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा से लेकर तुच्छ चींटी तक, कोई भी जीव भौतिक ऐश्वर्यों का भोग करने के लिए नहीं है। वे मात्र समस्त वस्तुएँ परम स्वामी, भगवान्, को अर्पित करने के लिए हैं। ऐसा करके वे स्वतः ही लाभ का भोग करते हैं। पुनः शरीर के विभिन्न अंगों का उदाहरण दिया जा सकता है, जो खाद्य पदार्थ एकत्र करते तथा पकाते हैं, ताकि अन्ततः उदर को भोजन अर्पित किया जा सके। जब वह उदर में चला जाता है, तब शरीर के समस्त अंग उस भोजन के लाभ का समान रूप से भोग करते हैं। अतः इसी प्रकार, प्रत्येक का कर्तव्य परमेश्वर को सन्तुष्ट करना है, और तब स्वतः ही प्रत्येक सन्तुष्ट हो जाएगा।

एक समान श्लोक श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध के तीसरे अध्याय के बीसवें श्लोक में मिलता है। वहाँ गजेन्द्र कहता है : "हे मेरे प्रिय प्रभु, आपकी भक्ति से प्राप्त दिव्य आनन्द का मुझे कोई अनुभव नहीं है, अतः मैंने आपसे कुछ अनुग्रह माँगा है। किन्तु मैं जानता हूँ कि जो व्यक्ति शुद्ध भक्त हैं और जो महात्माओं के चरणकमलों की सेवा करके समस्त भौतिक कामनाओं से मुक्त हो चुके हैं, वे सदा दिव्य आनन्द के सागर में निमग्न रहते हैं और इस प्रकार मात्र आपके मंगलमय लक्षणों के गुणगान से ही सदा सन्तुष्ट रहते हैं। उनके लिए और कुछ भी आकांक्षा करने अथवा प्रार्थना करने योग्य नहीं है।"

भागवत के नवम स्कन्ध के चौथे अध्याय के उनचासवें श्लोक में, वैकुण्ठ के स्वामी दुर्वासा मुनि को इस प्रकार उत्तर देते हैं : "मेरे शुद्ध भक्त भक्ति में संलग्न रहकर सदा सन्तुष्ट रहते हैं, अतः वे पाँच मुक्त-पदों की भी आकांक्षा नहीं करते, जो ये हैं — (1) मेरे साथ एकाकार होना, (2) मेरे लोक में निवास प्राप्त करना, (3) मेरे ऐश्वर्यों को पाना, (4) मेरे समान देहाकृति धारण करना, तथा (5) मेरे साथ व्यक्तिगत संगति प्राप्त करना। अतः जब वे इन मुक्त-पदों में भी रुचि नहीं रखते, तो तुम जान सकते हो कि वे भौतिक ऐश्वर्यों अथवा भौतिक मुक्ति की कितनी कम परवाह करते हैं।"

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के सोलहवें अध्याय के तैंतीसवें श्लोक में नागपत्नियों (कालिय सर्प की पत्नियों) द्वारा एक समान प्रार्थना है। वहाँ नागपत्नियाँ कहती हैं : "हे प्रिय प्रभु, आपके चरणकमलों की धूलि अति अद्भुत है। जो कोई इतना भाग्यशाली हो कि इस धूलि को प्राप्त कर ले, वह स्वर्गलोकों की, समस्त लोक-मण्डलों पर आधिपत्य की, योग की योगसिद्धियों की, अथवा भौतिक अस्तित्व से मुक्ति की भी परवाह नहीं करता। दूसरे शब्दों में, जो कोई आपके चरणकमलों की धूलि का आदर करता है, वह अन्य समस्त पूर्णता-अवस्थाओं की रत्ती भर भी परवाह नहीं करता।"

एक समान कथन दशम स्कन्ध के सतासीवें अध्याय के सत्रहवें श्लोक में है, जब श्रुतियों, अर्थात् साक्षात् वेदों ने, भगवान् से इस प्रकार प्रार्थना की : "हे मेरे प्रिय प्रभु, आध्यात्मिक ज्ञान को समझना अति कठिन है। आपका यहाँ ज्यों-का-त्यों प्राकट्य आत्मा के ज्ञान के इस अत्यन्त कठिन विषय को हमें समझाने के लिए है। अतः आपके भक्त, जिन्होंने मुक्त आचार्यों [गुरुओं] की संगति हेतु अपने गृह-सुख त्याग दिए हैं, अब पूर्णतः आपकी भक्ति में निमग्न हैं, और इस प्रकार वे किसी तथाकथित मुक्ति की परवाह नहीं करते।"

इस श्लोक की व्याख्या में यह ध्यान देने योग्य है कि आध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ है आत्मा तथा परमात्मा अथवा परम आत्मा को समझना। जीवात्मा तथा परमात्मा गुणात्मक रूप से एक हैं, अतः दोनों ही ब्रह्म अथवा आत्मा कहलाते हैं। किन्तु ब्रह्म का ज्ञान समझना अति कठिन है। आत्मा को समझने के कार्य में संलग्न इतने अधिक दार्शनिक हैं, किन्तु वे कोई ठोस प्रगति नहीं कर पाते। भगवद्गीता में इसकी पुष्टि होती है कि अनेक लाखों व्यक्तियों में से केवल एक ही यह समझने का प्रयत्न कर सकता है कि आध्यात्मिक ज्ञान क्या है, और जो ऐसे अनेक व्यक्ति समझने का प्रयत्न करते हैं, उनमें से केवल एक अथवा कुछ ही जान पाते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कौन हैं। अतः यह श्लोक कहता है कि आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना अति कठिन है, और इसलिए इसे अधिक सुलभ बनाने हेतु, परमेश्वर स्वयं अपने आदि रूप में श्रीकृष्ण के रूप में आते हैं और अर्जुन जैसे पार्षद को साक्षात् अपना उपदेश देते हैं, ताकि सामान्य जन इस आध्यात्मिक ज्ञान का लाभ उठा सकें। यह श्लोक यह भी समझाता है कि मुक्ति का अर्थ है जीवन के समस्त भौतिक सुखों का पूर्णतः परित्याग कर देना। जो निर्विशेषवादी हैं, वे मात्र भौतिक परिस्थितियों से मुक्त होकर ही सन्तुष्ट हो जाते हैं, किन्तु जो भक्त हैं, वे स्वतः ही भौतिक जीवन त्याग सकते हैं और साथ ही भगवान् श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं के श्रवण तथा कीर्तन के दिव्य आनन्द का भी भोग कर सकते हैं।

श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के बीसवें अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में, भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से इस प्रकार कहते हैं : "हे मेरे प्रिय उद्धव, जिन भक्तों ने पूर्णतः मेरी सेवा की शरण ले ली है, वे भक्ति में इतने अडिग हैं कि उनकी कोई अन्य कामना नहीं रहती। यदि उन्हें चार प्रकार के आध्यात्मिक ऐश्वर्य भी अर्पित किए जाएँ, तो वे उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देंगे। तो फिर भौतिक जगत् के भीतर किसी वस्तु की उनकी कामना की तो बात ही क्या!" इसी प्रकार, भगवान् श्रीकृष्ण भागवत के एकादश स्कन्ध के चौदहवें अध्याय के तेरहवें श्लोक के एक अन्य प्रसंग में कहते हैं : "हे मेरे प्रिय उद्धव, जिस व्यक्ति की चेतना पूर्णतः मेरे चिन्तन तथा लीलाओं में निमग्न है, वह ब्रह्मा का पद, अथवा इन्द्र का पद, अथवा लोकों पर आधिपत्य का पद, अथवा आठ प्रकार की योगसिद्धियाँ, अथवा मुक्ति को भी ग्रहण करने की आकांक्षा नहीं करता।" श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के दसवें अध्याय के छठे श्लोक में, भगवान् शिव देवी से कहते हैं : "हे मेरी प्रिय देवी, इस महान् ब्राह्मण ऋषि मार्कण्डेय ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अविचल श्रद्धा तथा भक्ति प्राप्त कर ली है, अतः वह भौतिक जगत् से मुक्ति सहित किसी भी वरदान की आकांक्षा नहीं करता।"

इसी प्रकार, पद्मपुराण में एक कथन है, जो कार्तिक मास (अक्तूबर-नवम्बर) के अनुष्ठानिक कार्य का वर्णन करता है। इस मास के दौरान, वृन्दावन में भगवान् श्रीकृष्ण से उनके दामोदर रूप में प्रतिदिन प्रार्थना करना विधिनियम है। दामोदर रूप श्रीकृष्ण के उस बाल्यकाल को संकेत करता है, जब उनकी माता यशोदा ने उन्हें रस्सी से बाँध दिया था। दाम का अर्थ है रस्सी, और उदर का अर्थ है पेट। अतः माता यशोदा ने, नटखट कृष्ण से अत्यन्त व्याकुल होकर, उन्हें पेट के चारों ओर रस्सी से बाँध दिया, और इस प्रकार श्रीकृष्ण दामोदर नाम से प्रसिद्ध हुए। कार्तिक मास के दौरान, दामोदर से इस प्रकार प्रार्थना की जाती है : "हे मेरे प्रिय प्रभु, आप सबके स्वामी हैं, समस्त वरदानों के दाता हैं।" भगवान् ब्रह्मा तथा भगवान् शिव जैसे अनेक देवता हैं, जो कभी-कभी अपने-अपने भक्तों को वरदान देते हैं। उदाहरणार्थ, रावण भगवान् शिव द्वारा अनेक वरदानों से अनुगृहीत हुआ था, और हिरण्यकशिपु भगवान् ब्रह्मा द्वारा अनुगृहीत हुआ था। किन्तु भगवान् शिव तथा भगवान् ब्रह्मा भी भगवान् श्रीकृष्ण के वरदानों पर आश्रित हैं, अतः श्रीकृष्ण को समस्त वरदाताओं के स्वामी के रूप में सम्बोधित किया जाता है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तों को वह सब कुछ अर्पित कर सकते हैं, जो वे चाहते हैं, फिर भी भक्त की प्रार्थना इस प्रकार चलती रहती है : "मैं आपसे न मुक्ति माँगता हूँ, न मुक्ति तक की कोई भौतिक सुविधा। आपके अनुग्रह के रूप में मैं तो यही चाहता हूँ कि मैं सदा आपके उसी रूप का चिन्तन करूँ, जैसा मैं अभी आपको दामोदर के रूप में देख रहा हूँ। आप इतने सुन्दर तथा मनोहर हैं कि इस अद्भुत रूप के अतिरिक्त मेरा मन और कुछ नहीं चाहता।" इसी प्रार्थना में एक अन्य प्रसंग है, जिसमें कहा गया है : "हे मेरे प्रिय दामोदर भगवान्, एक बार जब आप नन्द महाराज के घर में एक नटखट बालक के रूप में खेल रहे थे, तब आपने दही से भरा पात्र तोड़ दिया, और इसी कारण माता यशोदा ने आपको अपराधी मानकर ओखली से रस्सी द्वारा बाँध दिया। उस समय आपने कुबेर के दो पुत्रों, नलकूवर तथा मणिग्रीव का उद्धार किया, जो नन्द महाराज के आँगन में दो अर्जुन वृक्षों के रूप में खड़े थे। मेरी एकमात्र विनती यह है कि आप अपनी कृपामयी लीलाओं द्वारा इसी प्रकार मेरा भी उद्धार करें।"

इस श्लोक के पीछे की कथा यह है कि कुबेर (देवताओं के कोषाध्यक्ष) के दो पुत्र अपने पिता के ऐश्वर्य के कारण अहंकारग्रस्त थे, अतः एक बार किसी स्वर्गलोक में वे कुछ नग्न स्वर्ग-अप्सराओं के साथ एक सरोवर में क्रीड़ा कर रहे थे। उस समय महान् सन्त नारद मुनि उस मार्ग से जा रहे थे और कुबेर-पुत्रों का आचरण देखकर खिन्न हुए। नारद को जाते देख, स्वर्ग की अप्सराओं ने अपने शरीर वस्त्र से ढक लिए, किन्तु दोनों पुत्रों में, मद्यप होने के कारण, यह शिष्टता न थी। नारद उनके आचरण से क्रुद्ध हुए और उन्हें इस प्रकार शाप दिया : "तुममें कोई बुद्धि नहीं है, अतः यही उत्तम है कि तुम कुबेर के पुत्रों के स्थान पर वृक्ष बन जाओ।" यह सुनकर बालक होश में आए और नारद से अपने अपराधों के लिए क्षमा की याचना की। तब नारद ने कहा : "हाँ, तुम वृक्ष बनोगे — अर्जुन वृक्ष — और तुम नन्द महाराज के आँगन में खड़े रहोगे। किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं समय आने पर नन्द के पालित पुत्र के रूप में प्रकट होंगे, और वे तुम्हारा उद्धार करेंगे।" दूसरे शब्दों में, नारद का शाप कुबेर के पुत्रों के लिए एक वरदान था, क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से यह पूर्वसूचित किया गया था कि वे भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त कर सकेंगे। उसके पश्चात्, कुबेर के दोनों पुत्र नन्द महाराज के आँगन में दो विशाल अर्जुन वृक्षों के रूप में तब तक खड़े रहे, जब तक भगवान् दामोदर ने, नारद की इच्छा पूर्ण करने हेतु, उस ओखली को घसीटा जिससे वे बँधे थे और दोनों वृक्षों से टकराकर उन्हें प्रचण्ड वेग से गिरा दिया। इन गिरे हुए वृक्षों में से नलकूवर तथा मणिग्रीव निकले, जो तब तक भगवान् के महान् भक्त बन चुके थे।

हयशीर्ष पुराण में एक प्रसंग है, जो कहता है : "हे मेरे प्रिय प्रभु, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, मैं अपने धार्मिक जीवन से कोई फलस्वरूप वरदान नहीं चाहता, न मैं कोई अर्थ-समृद्धि चाहता हूँ, न मैं इन्द्रियतृप्ति का भोग करना चाहता हूँ, न मुक्ति। मैं तो मात्र आपके चरणकमलों में नित्य सेवक बनने की प्रार्थना करता हूँ। कृपया मुझ पर अनुग्रह करें और मुझे यही वरदान दें।"

उसी हयशीर्ष पुराण में, नृसिंहदेव द्वारा प्रह्लाद महाराज को वरदान देने की इच्छा प्रकट करने के पश्चात्, प्रह्लाद ने कोई भौतिक वरदान स्वीकार नहीं किया और मात्र भगवान् के नित्य भक्त बने रहने का अनुग्रह माँगा। इस सन्दर्भ में, प्रह्लाद महाराज ने हनुमान का उदाहरण दिया, जो भगवान् रामचन्द्र के नित्य सेवक हैं, और जिन्होंने भी भगवान् से कभी कोई भौतिक अनुग्रह न माँगकर एक आदर्श स्थापित किया। वे सदा उनकी सेवा में संलग्न रहे। हनुमान का यही आदर्श चरित्र है, जिसके कारण समस्त भक्त आज भी उनकी आराधना करते हैं। प्रह्लाद महाराज ने भी हनुमान को अपना सादर प्रणाम अर्पित किया। हनुमान द्वारा कहा गया एक सुप्रसिद्ध श्लोक है, जिसमें वे कहते हैं : "हे मेरे प्रिय प्रभु, यदि आप चाहें तो मुझे इस भौतिक अस्तित्व से मुक्ति, अथवा आपके अस्तित्व में विलीन होने का सौभाग्य दे सकते हैं, किन्तु मैं इनमें से कोई वस्तु नहीं चाहता। मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं चाहता जो आपके साथ स्वामी-सेवक के रूप में मेरे सम्बन्ध को क्षीण करे — मुक्ति के पश्चात् भी।"

नारद-पंचरात्र में एक समान प्रसंग में कहा गया है : "हे मेरे प्रिय प्रभु, मैं अनुष्ठानिक धार्मिक समारोहों द्वारा, अथवा अर्थ-समृद्धि द्वारा, अथवा इन्द्रियतृप्ति द्वारा, अथवा मुक्ति द्वारा कोई पूर्णता-अवस्था नहीं चाहता। मैं तो मात्र इतनी प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे अपने चरणकमलों के नीचे रखने का अनुग्रह करें। मैं सालोक्य — आपके लोक में निवास करने, अथवा सारूप्य — आपके समान देहाकृति पाने — जैसी किसी भी प्रकार की मुक्ति नहीं चाहता। मैं तो मात्र आपके इस अनुग्रह की प्रार्थना करता हूँ कि मैं सदा आपकी प्रेममयी सेवा में संलग्न रहूँ।"

इसी प्रकार, श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध के चौदहवें अध्याय के चौथे श्लोक में, महाराज परीक्षित शुकदेव गोस्वामी से पूछते हैं : "हे मेरे प्रिय ब्राह्मण, मैं समझता हूँ कि असुर वृत्रासुर एक महान् पापी पुरुष था और उसका मन पूर्णतः रजोगुण तथा तमोगुण में निमग्न था। वह नारायण की भक्ति की ऐसी पूर्णता-अवस्था तक कैसे विकसित हुआ? मैंने सुना है कि वे महान् पुरुष भी, जिन्होंने कठोर तपस्याएँ की हैं और जो पूर्ण ज्ञान सहित मुक्त हैं, उन्हें भी भगवान् के भक्त बनने का प्रयत्न करना पड़ता है। यह समझा जाता है कि ऐसे व्यक्ति अति दुर्लभ हैं और प्रायः कभी देखने को नहीं मिलते, अतः मुझे आश्चर्य है कि वृत्रासुर ऐसा भक्त कैसे बन गया!"

उपर्युक्त श्लोक में सबसे महत्त्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य यह है कि अनेक मुक्त पुरुष हो सकते हैं, जो निराकार ब्रह्म के अस्तित्व में विलीन हो चुके हैं, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण का भक्त अति-अति दुर्लभ है। लाखों मुक्त पुरुषों में से भी, केवल एक ही इतना भाग्यशाली होता है कि भक्त बन सके।

श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध के सातवें अध्याय में, कुन्तीदेवी भगवान् श्रीकृष्ण के प्रस्थान के समय उनसे प्रार्थना कर रही हैं : "हे मेरे प्रिय श्रीकृष्ण, आप इतने महान् हैं कि महान् धुरन्धर विद्वानों तथा परमहंसों [पूर्णतः मुक्त आत्माओं] के लिए भी अचिन्त्य हैं। अतः यदि ऐसे महान् ऋषि, जो भौतिक अस्तित्व की समस्त प्रतिक्रियाओं से परे हैं, आपको नहीं जान पाते, तो जहाँ तक हमारा प्रश्न है, जो अल्पबुद्धि स्त्री-वर्ग की हैं, हमारे लिए आपकी महिमा जानना कैसे सम्भव है? हम आपको कैसे समझ सकती हैं?" इस श्लोक में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि भगवान् महान् मुक्त पुरुषों द्वारा नहीं समझे जाते, अपितु केवल कुन्तीदेवी जैसे भक्तों द्वारा ही, अपनी विनम्रता में, समझे जाते हैं। यद्यपि वे एक स्त्री थीं और पुरुष से अल्पबुद्धि मानी जाती थीं, तो भी उन्होंने श्रीकृष्ण की महिमा का अनुभव किया। यही इस श्लोक का तात्पर्य है।

एक अन्य प्रसंग, जो अति महत्त्वपूर्ण है, श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध के छठे अध्याय के दसवें श्लोक में है, और "आत्माराम श्लोक" कहलाता है। इस आत्माराम श्लोक में कहा गया है कि वे भी, जो भौतिक कल्मष से पूर्णतः मुक्त हैं, भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों से आकृष्ट होते हैं। इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि मुक्त आत्मा को भौतिक भोग की रत्ती भर भी कामना नहीं रहती; वह सब प्रकार की भौतिक कामनाओं से पूर्णतः मुक्त है, फिर भी वह भगवान् की लीलाओं को सुनने तथा समझने की इच्छा से अनिवार्य रूप से आकृष्ट होता है। अतः हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भगवान् की महिमा तथा लीलाएँ भौतिक नहीं हैं। अन्यथा, आत्माराम कहलाने वाले मुक्त पुरुष ऐसी लीलाओं से कैसे आकृष्ट होते? इस श्लोक में यही महत्त्वपूर्ण बिन्दु है।

उपर्युक्त कथन से यह ज्ञात होता है कि भक्त मुक्ति की किसी भी अवस्था के पीछे नहीं रहता। मुक्ति की पाँच अवस्थाएँ हैं, जिन्हें पहले ही इस प्रकार समझाया गया है — (1) भगवान् के साथ एकाकार हो जाना, (2) भगवान् के समान लोक में निवास करना, (3) भगवान् के समान देहाकृति प्राप्त करना, (4) भगवान् के समान ऐश्वर्य पाना, तथा (5) भगवान् के साथ निरन्तर संगति प्राप्त करना। इन पाँच मुक्त-अवस्थाओं में से, जो सायुज्य अथवा भगवान् के अस्तित्व में विलीन होना कहलाती है, उसे भक्त सबसे अन्त में स्वीकार करता है। अन्य चार मुक्तियाँ, यद्यपि भक्तों द्वारा वांछित नहीं हैं, तो भी भक्ति के आदर्शों के विरुद्ध नहीं हैं। कुछ मुक्त पुरुष, जिन्होंने मुक्ति की इन चार अवस्थाओं को प्राप्त कर लिया है, वे भी श्रीकृष्ण के प्रति स्नेह विकसित कर सकते हैं और आध्यात्मिक आकाश में गोलोक वृन्दावन लोक तक उन्नत हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, जो पहले से ही वैकुण्ठलोकों तक उन्नत हैं और जो चार प्रकार की मुक्ति धारण करते हैं, वे भी कभी-कभी श्रीकृष्ण के प्रति स्नेह विकसित कर सकते हैं और कृष्णलोक तक उन्नत हो सकते हैं।

अतः जो चार मुक्त-अवस्थाओं में स्थित हैं, वे भी अस्तित्व की विभिन्न अवस्थाओं से गुज़र रहे हो सकते हैं। आरम्भ में वे श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य चाह सकते हैं, किन्तु परिपक्व अवस्था में वृन्दावन में प्रकट हुआ श्रीकृष्ण के प्रति सुप्त प्रेम उनके हृदयों में प्रमुख हो जाता है। अतः शुद्ध भक्त सायुज्य की मुक्ति — परम के साथ एकाकार होना — कभी स्वीकार नहीं करते, यद्यपि कभी-कभी वे अन्य चार मुक्त-अवस्थाओं को अनुकूल मानकर स्वीकार कर सकते हैं।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अनेक प्रकार के भक्तों में से, जो भगवान् के आदि रूप — वृन्दावन के श्रीकृष्ण — से आकृष्ट होता है, वह सर्वश्रेष्ठ, प्रथम श्रेणी का भक्त माना जाता है। ऐसा भक्त न वैकुण्ठ के ऐश्वर्यों से आकृष्ट होता है, न द्वारका के — उस राजसी नगरी के, जहाँ श्रीकृष्ण ने शासन किया था। श्री रूप गोस्वामी का निष्कर्ष यह है कि जो भक्त गोकुल अथवा वृन्दावन में भगवान् की लीलाओं से आकृष्ट हैं, वे सर्वोच्च भक्त हैं।

जो भक्त भगवान् के किसी विशेष रूप में आसक्त है, वह अपनी भक्ति को अन्य रूपों की ओर मोड़ना नहीं चाहता। उदाहरणार्थ, भगवान् रामचन्द्र के भक्त हनुमान जानते थे कि भगवान् रामचन्द्र तथा भगवान् नारायण में कोई भेद नहीं है, फिर भी वे केवल भगवान् रामचन्द्र की ही सेवा करना चाहते थे। यह किसी विशेष भक्त के विशिष्ट आकर्षण के कारण है। भगवान् के अनेकानेक रूप हैं, किन्तु श्रीकृष्ण फिर भी आदि रूप हैं। यद्यपि भगवान् के विभिन्न रूपों के समस्त भक्त एक ही कोटि में हैं, तो भी कहा जाता है कि जो भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त हैं, वे समस्त भक्तों की सूची में सर्वोच्च हैं।
