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भक्ति की विशुद्धता

श्रील रूप गोस्वामी द्वारा अपने विस्तृत कथनों में दिए गए समस्त पूर्व उपदेशों को इस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है : जब तक मनुष्य भौतिक रूप से प्रवृत्त है अथवा आध्यात्मिक तेज में विलीन होने का अभिलाषी है, तब तक वह शुद्ध भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकता। तत्पश्चात् रूप गोस्वामी कहते हैं कि भक्ति समस्त भौतिक विचारों से परे है और यह किसी विशेष देश, वर्ग, समाज अथवा परिस्थिति तक सीमित नहीं है। जैसा श्रीमद्भागवत में कहा गया है, भक्ति दिव्य है और इसका कोई कारण नहीं है। भक्ति किसी लाभ की आशा के बिना सम्पन्न की जाती है, और इसे किसी भी भौतिक परिस्थिति द्वारा रोका नहीं जा सकता। यह सबके लिए खुली है, बिना किसी भेदभाव के, और यह जीवों का स्वरूपगत व्यवसाय है।

मध्यकाल में, भगवान् चैतन्य के महान् पार्षद भगवान् नित्यानन्द के अन्तर्धान के पश्चात्, एक पुरोहित-वर्ग ने नित्यानन्द के वंशज होने का दावा किया और स्वयं को गोस्वामी जाति कहने लगा। उन्होंने आगे यह भी दावा किया कि भक्ति का अभ्यास तथा प्रसार केवल उनके उसी विशेष वर्ग का है, जो नित्यानन्द-वंश के नाम से जाना जाता था। इस प्रकार उन्होंने कुछ समय तक अपनी कृत्रिम शक्ति का प्रयोग किया, जब तक श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर, गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के प्रभावशाली आचार्य ने, उनके इस विचार को पूर्णतः चूर्ण नहीं कर दिया। कुछ समय तक कड़ा संघर्ष हुआ, किन्तु वह सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ, और अब यह सही तथा व्यावहारिक रूप से स्थापित है कि भक्ति किसी विशेष वर्ग के मनुष्यों तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त, जो कोई भक्ति में संलग्न है, वह पहले ही उच्च श्रेणी के ब्राह्मण की स्थिति में है। अतः इस आन्दोलन के लिए श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का संघर्ष सफल सिद्ध हुआ है।

उनकी इसी स्थिति के आधार पर अब कोई भी, विश्व के किसी भी भाग से अथवा ब्रह्माण्ड के किसी भी भाग से, गौड़ीय वैष्णव बन सकता है। जो कोई शुद्ध वैष्णव है, वह दिव्य रूप से स्थित है, अतः भौतिक जगत् की सर्वोच्च योग्यता — अर्थात् सत्त्वगुण में स्थित होना — पहले ही ऐसे व्यक्ति द्वारा प्राप्त हो जाती है। पाश्चात्य जगत् में हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन हमारे आध्यात्मिक गुरु श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद के उपर्युक्त प्रस्ताव पर आधारित है। उनके अधिकार के बल पर, हम पाश्चात्य देशों के समस्त वर्गों से सदस्य ग्रहण कर रहे हैं। तथाकथित ब्राह्मण दावा करते हैं कि जो ब्राह्मण कुल में जन्मा न हो, वह यज्ञोपवीत ग्रहण नहीं कर सकता और उच्च श्रेणी का वैष्णव नहीं बन सकता। किन्तु हम ऐसे सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि इसका समर्थन न रूप गोस्वामी द्वारा होता है, न विभिन्न शास्त्रों के बल द्वारा।

श्रील रूप गोस्वामी यहाँ विशेष रूप से कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को भक्ति ग्रहण करने तथा कृष्णभावनाभावित बनने का जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्होंने अनेक शास्त्रों से अनेक प्रमाण दिए हैं, और उन्होंने विशेष रूप से पद्मपुराण से एक प्रसंग उद्धृत किया है, जहाँ वसिष्ठ ऋषि राजा दिलीप से कहते हैं : "हे मेरे प्रिय राजा, प्रत्येक को भक्ति सम्पन्न करने का अधिकार है, ठीक जैसे प्रत्येक को माघ मास [दिसम्बर-जनवरी] में प्रातःकालीन स्नान करने का अधिकार है।" पद्मपुराण के काशीखण्ड भाग में और भी प्रमाण है, जहाँ कहा गया है : "मयूरध्वज नामक देश में, निम्न जाति के लोग, जो शूद्रों से भी न्यून माने जाते हैं, उन्हें भी भक्ति के वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित किया जाता है। और जब वे भली-भाँति सुसज्जित होते हैं — अपने शरीरों पर तिलक तथा हाथों एवं गलों में माला सहित — तो वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वैकुण्ठ से आ रहे हों। वस्तुतः वे इतने सुन्दर दिखते हैं कि वे तत्काल साधारण ब्राह्मणों को भी लाँघ जाते हैं।"

इस प्रकार वैष्णव स्वतः ही ब्राह्मण बन जाता है। इस विचार का समर्थन सनातन गोस्वामी द्वारा भी अपने ग्रन्थ हरि-भक्ति-विलास में होता है, जो वैष्णव-मार्गदर्शिका है। उसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जो कोई भी व्यक्ति वैष्णव सम्प्रदाय में भली-भाँति दीक्षित होता है, वह निश्चय ही ब्राह्मण बन जाता है, उतना ही जितना कंस (काँसा) नामक धातु पारे के मिश्रण से स्वर्ण में परिणत हो जाती है। प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु, अधिकारियों के मार्गदर्शन में, किसी को भी वैष्णव सम्प्रदाय की ओर मोड़ सकता है, ताकि स्वभावतः वह ब्राह्मण की सर्वोच्च स्थिति तक पहुँच सके।

किन्तु श्रील रूप गोस्वामी चेतावनी देते हैं कि यदि कोई व्यक्ति प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु द्वारा भली-भाँति दीक्षित हो जाए, तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि ऐसी दीक्षा ग्रहण करने मात्र से उसका कार्य पूर्ण हो गया। उसे फिर भी विधि-नियमों का अति सावधानी से पालन करना पड़ता है। यदि आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करने तथा दीक्षित होने के पश्चात् भी कोई भक्ति के विधि-नियमों का पालन न करे, तो वह पुनः पतित हो जाता है। मनुष्य को अति सतर्क रहकर यह स्मरण रखना चाहिए कि वह श्रीकृष्ण के दिव्य शरीर का अंश है, और अंश के रूप में उसका कर्तव्य समष्टि अथवा श्रीकृष्ण की सेवा करना है। यदि हम श्रीकृष्ण की सेवा न करें, तो हम पुनः पतित हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, मात्र दीक्षित हो जाना ही मनुष्य को उच्च श्रेणी के ब्राह्मण की स्थिति तक उन्नत नहीं करता। उसे कर्तव्यों का निर्वाह भी करना पड़ता है और विधि-नियमों का अति दृढ़ता से पालन करना पड़ता है।

श्री रूप गोस्वामी यह भी कहते हैं कि यदि कोई नियमित रूप से भक्ति सम्पन्न कर रहा हो, तो पतन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु यदि परिस्थितिवश कुछ पतन हो भी जाए, तो वैष्णव को प्रायश्चित्त — शुद्धि हेतु अनुष्ठानिक समारोह — से कुछ लेना-देना नहीं रहता। यदि कोई भक्ति के सिद्धान्तों से पतित हो जाए, तो उसे सुधार हेतु प्रायश्चित्त-अनुष्ठानों की ओर जाने की आवश्यकता नहीं। उसे मात्र भक्ति सम्पन्न करने के विधि-नियमों का पालन करना है, और यही उसकी पुनःप्रतिष्ठा हेतु पर्याप्त है। यही वैष्णव (भक्ति) सम्प्रदाय का रहस्य है।

व्यावहारिक रूप से, मनुष्य को आध्यात्मिक चेतना के स्तर तक उन्नत करने हेतु तीन प्रक्रियाएँ हैं। ये प्रक्रियाएँ कर्म, ज्ञान तथा भक्ति कहलाती हैं। अनुष्ठानिक कार्य कर्म के क्षेत्र में हैं। कल्पनात्मक प्रक्रियाएँ ज्ञान के क्षेत्र में हैं। जिसने भक्ति — भगवान् की भक्ति — को ग्रहण कर लिया है, उसे कर्म अथवा ज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं रहता। यह पहले ही समझाया जा चुका है कि शुद्ध भक्ति कर्म अथवा ज्ञान के किसी अंश से रहित है। भक्ति में दार्शनिक कल्पना अथवा अनुष्ठानिक कार्यों का कोई अंश नहीं होना चाहिए।

इस सन्दर्भ में श्रील रूप गोस्वामी श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध से प्रमाण देते हैं, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव से कहा गया है : "योग्यता तथा अयोग्यता के बीच का भेद इस प्रकार किया जा सकता है : जो व्यक्ति पहले ही भक्ति सम्पन्न करने में उन्नत हैं, वे फिर कभी सकाम कर्मों अथवा दार्शनिक कल्पना की प्रक्रियाओं की शरण नहीं लेंगे। यदि कोई भक्ति से अडिग रहता है और अधिकारियों तथा आचार्यों द्वारा दिए गए विधि-नियमों द्वारा संचालित होता है, तो यही सर्वोत्तम योग्यता है।"

इस कथन का समर्थन श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध के पाँचवें अध्याय के सत्रहवें श्लोक में होता है, जहाँ श्री नारद मुनि व्यासदेव को इस प्रकार उपदेश देते हैं : "यदि कोई अपना विशिष्ट व्यावसायिक कर्तव्य न भी करे, किन्तु तत्काल हरि [श्रीकृष्ण] के चरणकमलों की प्रत्यक्ष शरण ले ले, तो उसमें कोई दोष नहीं होगा, और सब परिस्थितियों में उसकी स्थिति सुरक्षित है। यदि किसी कुसंगति के कारण वह भक्ति सम्पन्न करते हुए पतित भी हो जाए, अथवा यदि वह भक्ति का पूरा क्रम पूर्ण न कर पाए और असमय मर जाए, तो भी उसकी कोई हानि नहीं होती। किन्तु जो व्यक्ति मात्र वर्ण तथा आश्रम में अपना व्यावसायिक कर्तव्य सम्पन्न कर रहा है, बिना किसी कृष्णभावनामृत के, वह व्यावहारिक रूप से मानव जीवन का वास्तविक लाभ नहीं पाता।" तात्पर्य यह है कि वे समस्त बद्धजीव, जो यह जाने बिना कि यह प्रक्रिया उन्हें भौतिक कल्मष से बाहर निकालने में कभी सहायता नहीं करेगी, इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में अति उन्मत्त भाव से संलग्न हैं, उन्हें केवल बारम्बार जन्म-मृत्यु ही प्राप्त होते हैं।

श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध में ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों से स्पष्ट कहा गया है : "जो व्यक्ति सकाम कर्मों में संलग्न हैं, वे बारम्बार जन्म-मृत्यु ग्रहण कर रहे हैं, और जब तक वे वासुदेव के प्रति प्रेम-भाव विकसित नहीं करते, तब तक प्रकृति के इन कठोर नियमों से बाहर निकलने का कोई प्रश्न ही नहीं उठेगा।" अतः जो कोई भी व्यक्ति वर्णों तथा आश्रमों में अपने व्यावसायिक कर्तव्यों में अति गम्भीरता से संलग्न है, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव के प्रति प्रेम विकसित नहीं करता, उसे मात्र अपना मानव जीवन व्यर्थ करने वाला समझना चाहिए।

इसकी पुष्टि श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय के बत्तीसवें श्लोक में भी होती है, जिसमें भगवान् उद्धव से कहते हैं : "हे मेरे प्रिय उद्धव, जो कोई भी व्यक्ति समस्त व्यावसायिक कर्तव्यों को त्यागकर, पूर्ण शरणागति में मेरी शरण लेता है और मेरे उपदेशों का पालन करता है, उसे प्रथम श्रेणी का मनुष्य समझना चाहिए।" पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के इस कथन से यह समझा जाता है कि जो लोग सामान्यतः परोपकारी, नैतिक, सदाचारी, परार्थवादी, राजनैतिक तथा सामाजिक कल्याण के कार्यों की ओर आकृष्ट हैं, उन्हें केवल भौतिक जगत् की गणना में ही भले मनुष्य माना जा सकता है। श्रीमद्भागवत तथा अन्य प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों से हम आगे यह सीखते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मात्र कृष्णभावनामृत में कार्य करता है और भक्ति सम्पन्न करता है, तो वह उन समस्त व्यक्तियों से, जो परोपकारी, नैतिक, सदाचारी, परार्थवादी तथा सामाजिक कल्याण के कार्यों में संलग्न हैं, कहीं अधिक उत्तम स्थिति में माना जाता है।

यही बात श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के पाँचवें अध्याय के सैंतीसवें श्लोक में और भी अधिक बलपूर्वक पुष्ट होती है, जिसमें करभाजन मुनि महाराज निमि को इस प्रकार सम्बोधित करते हैं : "हे मेरे प्रिय राजा, यदि कोई व्यक्ति अपने व्यावसायिक कर्तव्यों को, जैसे वे विभिन्न वर्णों तथा आश्रमों के लिए विहित हैं, त्याग दे, किन्तु भगवान् के चरणकमलों में पूर्ण शरण लेकर स्वयं को समर्पित कर दे, तो ऐसा व्यक्ति न तो ऋणी रहता है, न ही उस पर उन विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने का कोई दायित्व रहता है, जो हम महान् ऋषियों, पितरों, जीवों तथा परिवार एवं समाज के सदस्यों के प्रति करते हैं। न ही उसे पाप-कल्मष से मुक्त होने हेतु पाँच प्रकार के यज्ञ [यज्ञ] सम्पन्न करने का कष्ट उठाने की आवश्यकता रहती है। मात्र भक्ति सम्पन्न करके ही वह सब प्रकार के दायित्वों से मुक्त हो जाता है।" तात्पर्य यह है कि ज्यों ही मनुष्य जन्म लेता है, त्यों ही वह तत्काल इतने अधिक स्रोतों का ऋणी हो जाता है। वह महान् ऋषियों का ऋणी है, क्योंकि वह उनके प्रामाणिक शास्त्रों तथा ग्रन्थों के पठन से लाभान्वित होता है। उदाहरणार्थ, हम व्यासदेव द्वारा लिखे ग्रन्थों का लाभ उठाते हैं। व्यासदेव ने हमारे लिए समस्त वेद छोड़ गए हैं। व्यासदेव के लेखन से पूर्व, वैदिक साहित्य मात्र श्रवण किया जाता था, और शिष्य मन्त्रों को पढ़कर नहीं, अपितु सुनकर शीघ्र सीख लेते थे। बाद में, व्यासदेव ने वेदों को लिख देना उचित समझा, क्योंकि इस युग में लोग अल्पस्मृति वाले हैं और आध्यात्मिक गुरु द्वारा दिए गए समस्त उपदेशों को स्मरण रखने में असमर्थ हैं। अतः उन्होंने समस्त वैदिक ज्ञान को ग्रन्थ रूप में छोड़ा, जैसे पुराण, वेदान्त, महाभारत तथा श्रीमद्भागवत।

शंकराचार्य, गौतम मुनि तथा नारद मुनि इत्यादि अनेक अन्य ऋषि हैं, जिनके हम ऋणी हैं, क्योंकि हम उनके ज्ञान का लाभ उठाते हैं। इसी प्रकार, हम अपने पूर्वजों के आभारी हैं, क्योंकि हम किसी विशेष परिवार में जन्म लेते हैं, जहाँ हम समस्त लाभ उठाते हैं तथा सम्पत्ति का उत्तराधिकार पाते हैं। अतः हम पूर्वजों के ऋणी हैं और उनकी मृत्यु के पश्चात् हमें उन्हें पिण्ड (प्रसाद) अर्पित करना पड़ता है। इसी प्रकार, हम सामान्य जनों के भी ऋणी हैं, साथ ही अपने सम्बन्धियों, मित्रों तथा गौ एवं कुत्तों जैसे पशुओं के भी, जो हमें इतनी सेवा प्रदान करते हैं।

इस प्रकार, हम देवताओं के, पितरों के, ऋषियों के, पशुओं के तथा सामान्य रूप से समाज के ऋणी हैं। उचित सेवा-निर्वाह द्वारा उन सबका ऋण चुकाना हमारा कर्तव्य है। किन्तु भक्ति के एक ही प्रहार से, यदि कोई समस्त दायित्वों को त्यागकर मात्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण ले ले, तो वह न तो ऋणी रहता है, न ही किसी अन्य लाभ-स्रोत के प्रति बाध्य।

भगवद्गीता में भी भगवान् कहते हैं : "अपने समस्त कर्तव्यों को त्यागकर मात्र मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें आश्वासन देता हूँ कि मैं तुम्हें समस्त पापकर्मों से रक्षा प्रदान करूँगा।" कोई सोच सकता है कि चूँकि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण ले रहा है, अतः वह अपने अन्य समस्त दायित्वों को सम्पन्न नहीं कर सकेगा। किन्तु भगवान् बारम्बार कहते हैं : "संकोच न करो। यह मत समझो कि चूँकि तुम अन्य समस्त कार्यों को त्याग रहे हो, अतः तुम्हारे जीवन में कोई दोष आएगा। ऐसा मत सोचो। मैं तुम्हें पूर्ण रक्षा प्रदान करूँगा।" भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण का यही आश्वासन है।

अगस्त्य-संहिता में अतिरिक्त प्रमाण है : "जैसे मुक्त पुरुष को शास्त्र के विधि-नियमों की आवश्यकता नहीं रहती, उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवान् रामचन्द्र की सेवा में भली-भाँति संलग्न है, उसे भी उन अनुष्ठानिक नियमों को सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं रहती, जो वैदिक परिशिष्टों में संकेतित हैं।" दूसरे शब्दों में, भगवान् रामचन्द्र अथवा श्रीकृष्ण के भक्त पहले ही मुक्त पुरुष हैं और उन्हें वैदिक साहित्य के अनुष्ठानिक भागों में उल्लिखित समस्त विधि-नियमों का पालन करने की आवश्यकता नहीं रहती।

इसी प्रकार, श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के पाँचवें अध्याय में, करभाजन मुनि राजा निमि को सम्बोधित करते हुए कहते हैं : "हे मेरे प्रिय राजा, जिस व्यक्ति ने देवताओं की पूजा त्याग दी है और अपनी समस्त ऊर्जा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति में पूर्णतः केन्द्रित कर दी है, वह भगवान् को अति-अति प्रिय हो गया है। अतः यदि संयोगवश अथवा भूल से वह कोई निषिद्ध कार्य कर बैठे, तो उसे कोई शुद्धिकरण-समारोह सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं। चूँकि भगवान् उसके हृदय में स्थित हैं, अतः वे भक्त की अनजाने में हुई भूल पर करुणा करते हैं और उसे भीतर से सुधार देते हैं।" भगवद्गीता में भी अनेक स्थानों पर इसकी पुष्टि होती है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तों में विशेष रुचि लेते हैं और बलपूर्वक घोषणा करते हैं कि कोई भी वस्तु उनके भक्तों को पतित नहीं कर सकती। वे सदा उनकी रक्षा करते हैं।
