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भक्ति के सिद्धान्तों सम्बन्धी प्रमाण

श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में, प्रबुद्ध महाराज निमि से कहते हैं : "हे मेरे प्रिय राजा, निश्चय ही यह जान लो कि भौतिक जगत् में कोई सुख नहीं है। यह सोचना मात्र एक भूल है कि यहाँ सुख है, क्योंकि यह स्थान दुःखमय दशाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं से भरा है। जो कोई भी व्यक्ति वास्तविक सुख प्राप्त करने का गम्भीरता से अभिलाषी है, उसे एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु खोजना चाहिए और दीक्षा द्वारा उनकी शरण लेनी चाहिए। आध्यात्मिक गुरु की योग्यता यह है कि उन्होंने विचार तथा तर्कों द्वारा शास्त्रों के निष्कर्ष का साक्षात्कार किया हो और इस प्रकार वे दूसरों को इन निष्कर्षों का विश्वास दिला सकें। ऐसे महान् पुरुष, जिन्होंने समस्त भौतिक विचारों को त्यागकर परम भगवान् की शरण ली है, उन्हें प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु समझना चाहिए। प्रत्येक को ऐसा प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु खोजने का प्रयत्न करना चाहिए, ताकि वह अपने जीवन के ध्येय को पूर्ण कर सके, जो स्वयं को आध्यात्मिक आनन्द के स्तर तक स्थानान्तरित करना है।"

तात्पर्य यह है कि मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु के रूप में ऐसे किसी को स्वीकार नहीं करना चाहिए, जो मूर्ख-शिरोमणि हो, जिसके पास शास्त्रीय आदेशों के अनुसार कोई दिशा न हो, जिसका चरित्र सन्दिग्ध हो, जो भक्ति के सिद्धान्तों का पालन न करता हो, अथवा जिसने इन्द्रियतृप्ति के छह अभिकर्ताओं के प्रभाव पर विजय न प्राप्त की हो। इन्द्रियतृप्ति के छह अभिकर्ता हैं — जिह्वा, जननेन्द्रिय, उदर, क्रोध, मन तथा वाणी। जिस किसी ने इन छहों को वश में करने का अभ्यास किया हो, उसे समूचे विश्व में शिष्य बनाने की अनुमति है। ऐसे आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करना आध्यात्मिक जीवन में उन्नति हेतु निर्णायक बिन्दु है। जो इतना भाग्यशाली हो कि प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण में आ जाए, वह निःसन्देह आध्यात्मिक मुक्ति के पथ को निश्चय ही पार कर लेता है।

प्रबुद्ध ऋषि राजा से इस प्रकार आगे बोलते रहे : "हे मेरे प्रिय राजा, शिष्य को आध्यात्मिक गुरु को केवल आध्यात्मिक गुरु के रूप में ही नहीं, अपितु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा परमात्मा के प्रतिनिधि के रूप में भी स्वीकार करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, शिष्य को आध्यात्मिक गुरु को ईश्वर के रूप में स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के बाह्य प्राकट्य हैं।" इसकी पुष्टि प्रत्येक शास्त्र में होती है, और शिष्य को आध्यात्मिक गुरु को इसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु के प्रति समस्त आदर तथा श्रद्धा सहित श्रीमद्भागवत को गम्भीरता से सीखना चाहिए। श्रीमद्भागवत का श्रवण तथा कथन वह धार्मिक प्रक्रिया है, जो मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा तथा प्रेम के स्तर तक उन्नत करती है।

शिष्य का भाव सदा प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को सन्तुष्ट करने का होना चाहिए। तब उसके लिए आध्यात्मिक ज्ञान को समझना अति सरल हो जाएगा। इसकी पुष्टि वेदों में होती है, और रूप गोस्वामी द्वारा आगे यह समझाया जाएगा कि जिस व्यक्ति की ईश्वर तथा आध्यात्मिक गुरु में अविचल श्रद्धा हो, उसके लिए सब कुछ अति सरलता से प्रकट हो जाता है।

आध्यात्मिक गुरु से दीक्षा ग्रहण करने के विषय में, श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध के सत्रहवें अध्याय के बाईसवें श्लोक में, भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कहा गया है : "हे मेरे प्रिय उद्धव, आध्यात्मिक गुरु को न केवल मेरे प्रतिनिधि के रूप में, अपितु साक्षात् मेरे स्वरूप के रूप में स्वीकार करना चाहिए। उन्हें कभी किसी साधारण मनुष्य के समान स्तर पर नहीं समझना चाहिए। मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु से कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, जैसे कोई किसी साधारण मनुष्य से ईर्ष्या कर सकता है। आध्यात्मिक गुरु को सदा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रतिनिधि के रूप में देखना चाहिए, और आध्यात्मिक गुरु की सेवा करके, मनुष्य समस्त देवताओं की सेवा करने में समर्थ होता है।"

स्कन्द पुराण में यह सलाह दी गई है कि भक्त पूर्व आचार्यों तथा सन्त-स्वभाव पुरुषों का अनुगमन करे, क्योंकि ऐसे अनुगमन से मनुष्य वांछित परिणाम प्राप्त कर सकता है, बिना अपनी प्रगति में शोक करने अथवा हतप्रभ होने की किसी सम्भावना के।

ब्रह्म-यामल नामक शास्त्र में इस प्रकार कहा गया है : "यदि कोई प्रकट शास्त्रों के अधिकारियों का अनुगमन किए बिना स्वयं को महान् भक्त के रूप में प्रस्तुत करना चाहे, तो उसके कार्य उसे भक्ति में प्रगति करने में कभी सहायता नहीं करेंगे। उल्टे, वह भक्ति के निष्ठावान् साधकों के लिए मात्र विघ्न उत्पन्न करेगा।" जो प्रकट शास्त्रों के सिद्धान्तों का कठोरता से पालन नहीं करते, वे सामान्यतः सहजिया कहलाते हैं — वे जिन्होंने सब कुछ सस्ता मान लिया है, और जिनके अपने गढ़े हुए विचार हैं, और जो शास्त्रीय आदेशों का पालन नहीं करते। ऐसे व्यक्ति भक्ति के सम्पादन में मात्र विघ्न उत्पन्न कर रहे हैं।

इस सन्दर्भ में, जो भक्ति में नहीं हैं और जो प्रकट शास्त्रों की परवाह नहीं करते, वे एक आपत्ति उठा सकते हैं। इसका एक उदाहरण बौद्ध दर्शन में देखा जाता है। भगवान् बुद्ध एक उच्च श्रेणी के क्षत्रिय राजा के कुल में प्रकट हुए, किन्तु उनका दर्शन वैदिक निष्कर्षों के अनुरूप नहीं था, अतः अस्वीकार कर दिया गया। एक हिन्दू राजा महाराज अशोक के संरक्षण में, बौद्ध धर्म समूचे भारत तथा निकटवर्ती देशों में फैला। किन्तु महान् धुरन्धर आचार्य शंकराचार्य के प्राकट्य के पश्चात्, यह बौद्ध मत भारत की सीमा से परे खदेड़ दिया गया।

बौद्ध अथवा अन्य मतावलम्बी, जो प्रकट शास्त्रों की परवाह नहीं करते, कभी-कभी कहते हैं कि भगवान् बुद्ध के अनेक भक्त हैं, जो भगवान् बुद्ध की भक्ति प्रदर्शित करते हैं, अतः उन्हें भक्त माना जाना चाहिए। इस तर्क के उत्तर में, रूप गोस्वामी कहते हैं कि बुद्ध के अनुयायियों को भक्त स्वीकार नहीं किया जा सकता। यद्यपि भगवान् बुद्ध श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में स्वीकार किए जाते हैं, तो भी ऐसे अवतारों के अनुयायी वेदों के अपने ज्ञान में अधिक उन्नत नहीं हैं। वेदों का अध्ययन करने का अर्थ है भगवान् की सर्वोच्चता के निष्कर्ष पर पहुँचना। अतः जो कोई भी धार्मिक सिद्धान्त भगवान् की सर्वोच्चता का निषेध करता है, वह स्वीकार नहीं किया जाता और नास्तिकता कहलाता है। नास्तिकता का अर्थ है वेदों के अधिकार की अवहेलना करना और उन महान् आचार्यों की निन्दा करना, जो सामान्य जनों के हित हेतु वैदिक शास्त्र पढ़ाते हैं।

भगवान् बुद्ध श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में स्वीकार किए जाते हैं, किन्तु उसी श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भगवान् बुद्ध मनुष्यों के नास्तिक वर्ग को मोहित करने हेतु प्रकट हुए। अतः उनका दर्शन नास्तिकों को मोहित करने हेतु है और इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। यदि कोई पूछे, "श्रीकृष्ण नास्तिक सिद्धान्तों का प्रचार क्यों करेंगे?" तो उत्तर यह है कि उस हिंसा का अन्त करना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इच्छा थी, जो उस समय वेदों के नाम पर की जा रही थी। तथाकथित मतावलम्बी मांसाहार जैसे हिंसक कृत्यों को न्यायोचित ठहराने हेतु वेदों का मिथ्या प्रयोग कर रहे थे, और भगवान् बुद्ध पतित लोगों को वेदों की ऐसी मिथ्या व्याख्या से दूर ले जाने हेतु आए। साथ ही, नास्तिक वर्ग के लिए, भगवान् बुद्ध ने नास्तिकता का उपदेश दिया, ताकि वे उनका अनुगमन करें और इस प्रकार छलपूर्वक भगवान् बुद्ध, अथवा श्रीकृष्ण, की भक्ति में लग जाएँ।

नारदीय पुराण में कहा गया है : "यदि कोई वस्तुतः भक्ति के प्रति अति गम्भीर है, तो उसके समस्त प्रयोजन बिना किसी विलम्ब के सिद्ध हो जाएँगे।"

पद्मपुराण में कहा गया है : "जिसने अपना भौतिक इन्द्रिय-भोग त्याग दिया है और भक्ति के सिद्धान्तों को स्वीकार कर लिया है, उसके लिए विष्णुलोक [ईश्वर का राज्य] का ऐश्वर्य प्रतीक्षा कर रहा है।" पद्मपुराण में यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति द्वारका में छह मास, एक मास, अथवा एक पक्ष तक भी निवास कर चुका है, उसके लिए वैकुण्ठलोकों तक उन्नति तथा सारूप्य-मुक्ति (नारायण के समान चतुर्भुज देहाकृति धारण करने का सौभाग्य) के समस्त लाभ प्रतीक्षा कर रहे हैं।

ब्रह्म पुराण में कहा गया है : "पुरुषोत्तम-क्षेत्र, जो भगवान् जगन्नाथ का 80 वर्गमील का क्षेत्र है, उसके दिव्य महत्त्व का भली-भाँति वर्णन नहीं किया जा सकता। उच्चतर लोक-मण्डलों के देवता भी इस जगन्नाथ पुरी के निवासियों को ठीक उसी देहाकृति वाला देखते हैं, जैसी वैकुण्ठ में किसी की होती है। अर्थात्, देवता जगन्नाथ पुरी के निवासियों को चतुर्भुज रूप में देखते हैं।"

जब नैमिषारण्य में महान् ऋषियों की सभा हुई, तब सूत गोस्वामी श्रीमद्भागवत का पाठ कर रहे थे, और गंगा का महत्त्व इस प्रकार बताया गया : "गंगा का जल सदा श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अर्पित तुलसी का सुगन्ध वहन करता है, अतः गंगा का जल सदा प्रवाहित होता हुआ भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा फैलाता है। जहाँ कहीं भी गंगा का जल प्रवाहित होता है, सब कुछ पवित्र हो जाएगा — बाहर से भी और भीतर से भी।"

नारदीय पुराण में निर्देश है : "यदि कोई भक्ति सम्पन्न करने के प्रति गम्भीर है, तो उसे आवश्यकता से अधिक स्वीकार नहीं करना चाहिए।" तात्पर्य यह है कि मनुष्य को न तो भक्ति के सिद्धान्तों के पालन की उपेक्षा करनी चाहिए, न ही भक्ति के ऐसे नियमों को स्वीकार करना चाहिए, जो उससे अधिक हों जितने वह सरलता से सम्पन्न कर सके। उदाहरणार्थ, यह कहा जा सकता है कि मनुष्य को अपनी माला पर प्रतिदिन कम से कम 1,00,000 बार हरे कृष्ण मन्त्र का जप करना चाहिए। किन्तु यदि यह सम्भव न हो, तो उसे अपने जप को अपनी क्षमता के अनुसार न्यूनतम कर लेना चाहिए। सामान्यतः, हम अपने शिष्यों को सलाह देते हैं कि वे प्रतिदिन अपनी जप-माला पर कम से कम 16 माला जप करें, और इसे पूर्ण करना चाहिए। किन्तु यदि कोई 16 माला भी जप करने में असमर्थ हो, तो उसे अगले दिन इसकी पूर्ति करनी चाहिए। उसे अपना व्रत बनाए रखने के प्रति सुनिश्चित रहना चाहिए। यदि वह इसका कठोरता से पालन न करे, तो वह निश्चय ही लापरवाह हो जाएगा। यह भगवान् की सेवा में अपराध है। यदि हम अपराधों को प्रोत्साहित करें, तो हम भक्ति में प्रगति नहीं कर सकेंगे। यह उत्तम है कि मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक विधि-नियम निश्चित कर ले और फिर उस व्रत का बिना चूक पालन करे। यही उसे आध्यात्मिक जीवन में उन्नत करेगा।

ब्रह्म-वैवर्त पुराण में कहा गया है कि जो एकादशी दिवस पर उपवास करता है, वह सब प्रकार के पापकर्मों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाता है और पुण्यमय जीवन में उन्नति करता है। मूल सिद्धान्त मात्र उपवास करना नहीं, अपितु गोविन्द अथवा श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा तथा प्रेम बढ़ाना है। एकादशी पर उपवास करने का वास्तविक कारण शरीर की माँगों को न्यूनतम करना तथा अपना समय जप करके अथवा वैसी ही सेवा करके भगवान् की सेवा में लगाना है। उपवास के दिनों में सर्वोत्तम कार्य यह है कि गोविन्द की लीलाओं का स्मरण किया जाए तथा उनके पवित्र नाम का निरन्तर श्रवण किया जाए।

स्कन्द पुराण में निर्देश है कि भक्त को तुलसी के पौधे तथा आमलकी वृक्षों को जल अर्पित करना चाहिए। उसे गौओं तथा ब्राह्मणों को आदर अर्पित करना चाहिए और वैष्णवों को सादर प्रणाम अर्पित करके तथा उनका ध्यान करके उनकी सेवा करनी चाहिए। ये समस्त प्रक्रियाएँ भक्त को उसके विगत पापकर्मों की प्रतिक्रियाओं को न्यून करने में सहायता करेंगी।

भगवान् चैतन्य से एक बार उनके किसी गृहस्थ भक्त ने पूछा कि वैष्णव का सामान्य आचरण कैसा होना चाहिए। इस सन्दर्भ में, भगवान् चैतन्य ने उत्तर दिया कि वैष्णव को सदा अभक्तों की संगति त्याग देनी चाहिए। तत्पश्चात् उन्होंने समझाया कि अभक्त दो प्रकार के होते हैं : एक वर्ग श्रीकृष्ण की सर्वोच्चता के विरुद्ध है, और दूसरा वर्ग अति भौतिकतावादी है। दूसरे शब्दों में, जो भौतिक भोग के पीछे हैं और जो भगवान् की सर्वोच्चता के विरुद्ध हैं, वे अवैष्णव कहलाते हैं, और उनकी संगति का कठोरता से परिहार करना चाहिए।

कात्यायन-संहिता में कहा गया है कि यदि किसी को लोहे के पिंजरे में अथवा धधकती अग्नि के बीच रहने को भी विवश किया जाए, तो उसे ऐसे अभक्तों के साथ रहने के बजाय, जो पूर्णतः भगवान् की सर्वोच्चता के विरुद्ध हैं, यह स्थिति स्वीकार कर लेनी चाहिए। इसी प्रकार, विष्णु-रहस्य में इस आशय का एक कथन है कि मनुष्य को विभिन्न देवताओं के उपासक तथा भौतिक कामना से प्रेरित व्यक्तियों की संगति करने के बजाय किसी साँप, बाघ अथवा घड़ियाल का आलिंगन करना श्रेयस्कर समझना चाहिए।

शास्त्रों में यह उपदेश है कि यदि कोई किसी भौतिक लाभ को प्राप्त करने का अभिलाषी हो, तो वह किसी विशेष देवता की उपासना कर सकता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई रोगग्रस्त दशा से छुटकारा पाने का अभिलाषी हो, तो उसे सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी जाती है। सुन्दरी पत्नी हेतु, मनुष्य भगवान् शिव की पत्नी उमा की उपासना कर सकता है, और उन्नत शिक्षा हेतु मनुष्य सरस्वती की उपासना कर सकता है। इसी प्रकार, श्रीमद्भागवत में विभिन्न भौतिक कामनाओं के अनुसार समस्त देवताओं के उपासकों की एक सूची है। किन्तु ये समस्त उपासक, यद्यपि वे देवताओं के अति अच्छे भक्त प्रतीत होते हैं, तो भी अभक्त ही माने जाते हैं। उन्हें भक्त स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मायावादी (निर्विशेषवादी) कहते हैं कि मनुष्य भगवान् के किसी भी रूप की उपासना कर सकता है और इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि अन्ततः सब एक ही गन्तव्य तक पहुँचते हैं। किन्तु भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जो देवताओं के उपासक हैं, वे अन्ततः केवल उन्हीं देवताओं के लोकों तक पहुँचेंगे, जबकि जो साक्षात् भगवान् के भक्त हैं, वे भगवान् के धाम — ईश्वर के राज्य — तक उन्नत किए जाएँगे। अतः वस्तुतः ये व्यक्ति, जो देवताओं के उपासक हैं, गीता में निन्दित किए गए हैं। यह वर्णित है कि अपनी कामनाओं के कारण उन्होंने अपनी बुद्धि खो दी है, अतः उन्होंने विभिन्न देवताओं की उपासना ग्रहण कर ली है। अतः विष्णु-रहस्य में इन देवता-उपासकों की इस कथन द्वारा कठोरता से निन्दा की गई है कि इन व्यक्तियों की संगति करने की अपेक्षा अति खतरनाक पशुओं के साथ रहना श्रेयस्कर है।

एक अन्य प्रतिबन्ध यह है कि किसी व्यक्ति के अनेक शिष्य हो सकते हैं, किन्तु उसे ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए कि वह किसी विशेष कार्य अथवा किसी अनुग्रह हेतु उनमें से किसी का आभारी हो जाए। और मनुष्य को नए मन्दिर बनाने हेतु भी अति उत्साही नहीं होना चाहिए, न ही उसे विभिन्न प्रकार के ग्रन्थ पढ़ने हेतु उत्साही होना चाहिए, उन ग्रन्थों को छोड़कर जो भक्ति की उन्नति की ओर ले जाते हैं। व्यावहारिक रूप से, यदि कोई अति सावधानी से भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, भगवान् चैतन्य की शिक्षाएँ तथा यह भक्ति-रसामृत पढ़ ले, तो यह उसे कृष्णभावनामृत के विज्ञान को समझने हेतु पर्याप्त ज्ञान दे देगा। उसे अन्य ग्रन्थ पढ़ने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं।

श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध के तेरहवें अध्याय के सातवें श्लोक में, नारद मुनि, महाराज युधिष्ठिर के साथ समाज के विभिन्न आश्रमों के विभिन्न कार्यों पर चर्चा करते हुए, विशेष रूप से संन्यासियों — उन व्यक्तियों जिन्होंने इस भौतिक जगत् का त्याग कर दिया है — के लिए नियमों का उल्लेख करते हैं। जिसने संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया है, उसे ऐसे किसी को शिष्य के रूप में स्वीकार करना वर्जित है जो योग्य न हो। संन्यासी को सर्वप्रथम यह परीक्षण करना चाहिए कि कोई सम्भावित शिष्य निष्ठापूर्वक कृष्णभावनामृत खोज रहा है या नहीं। यदि वह न खोज रहा हो, तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। किन्तु भगवान् चैतन्य की अहैतुकी कृपा ऐसी है कि उन्होंने समस्त प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरुओं को सलाह दी कि वे सर्वत्र कृष्णभावनामृत के विषय में बोलें। अतः भगवान् चैतन्य की परम्परा में, संन्यासी भी सर्वत्र कृष्णभावनामृत के विषय में बोल सकते हैं, और यदि कोई गम्भीरता से शिष्य बनने की ओर प्रवृत्त हो, तो संन्यासी उसे सदा स्वीकार करते हैं।

एक बिन्दु यह है कि शिष्यों की संख्या बढ़ाए बिना, कृष्णभावनामृत के सम्प्रदाय का प्रसार नहीं होता। अतः कभी-कभी जोखिम उठाकर भी, चैतन्य महाप्रभु की परम्परा का संन्यासी ऐसे व्यक्ति को भी स्वीकार कर सकता है, जो भली-भाँति शिष्य बनने योग्य न हो। बाद में, ऐसे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की कृपा से, शिष्य क्रमशः उन्नत होता है। किन्तु यदि कोई मात्र किसी प्रतिष्ठा अथवा मिथ्या सम्मान हेतु शिष्यों की संख्या बढ़ाए, तो वह कृष्णभावनामृत के सम्पादन के विषय में निश्चय ही पतित हो जाएगा।

इसी प्रकार, प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को मात्र अपनी प्रवीणता दिखाने हेतु अथवा विभिन्न स्थानों पर व्याख्यान देकर लोकप्रियता पाने हेतु अनेक ग्रन्थ पढ़ने से कोई प्रयोजन नहीं रहता। मनुष्य को इन समस्त बातों का परिहार करना चाहिए। यह भी कहा गया है कि संन्यासी को मन्दिर बनाने हेतु उत्साही नहीं होना चाहिए। हम श्री चैतन्य महाप्रभु की परम्परा के विभिन्न आचार्यों के जीवन में देख सकते हैं कि वे मन्दिर बनाने हेतु अति उत्साही नहीं हैं। किन्तु यदि कोई कुछ सेवा अर्पित करने हेतु आगे आए, तो वही अनिच्छुक आचार्य ऐसे सेवकों द्वारा महँगे मन्दिरों के निर्माण को प्रोत्साहित करेंगे। उदाहरणार्थ, रूप गोस्वामी को सम्राट अकबर के प्रधान सेनापति महाराज मानसिंह द्वारा एक अनुग्रह अर्पित किया गया, और रूप गोस्वामी ने उन्हें गोविन्दजी हेतु एक विशाल मन्दिर बनाने का उपदेश दिया, जिस पर विपुल धनराशि व्यय हुई।

अतः प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को मन्दिर निर्माण का कोई व्यक्तिगत दायित्व नहीं लेना चाहिए, किन्तु यदि किसी के पास धन हो और वह उसे श्रीकृष्ण की सेवा में व्यय करना चाहे, तो रूप गोस्वामी जैसे आचार्य भगवान् की सेवा हेतु एक सुन्दर महँगा मन्दिर बनाने में भक्त के धन का उपयोग कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश, ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति, जो आध्यात्मिक गुरु बनने योग्य नहीं है, मन्दिर निर्माण हेतु धनी व्यक्तियों से योगदान देने का अनुरोध कर सकता है। यदि ऐसे धन का उपयोग अयोग्य आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा बिना कोई प्रचार-कार्य किए महँगे मन्दिरों में सुखपूर्वक रहने हेतु किया जाए, तो यह स्वीकार्य नहीं है। दूसरे शब्दों में, आध्यात्मिक गुरु को मात्र तथाकथित आध्यात्मिक उन्नति के नाम पर मन्दिर-भवन बनाने हेतु अति उत्साही होने की आवश्यकता नहीं। अपितु, उसका प्रथम तथा प्रमुख कार्य प्रचार करना होना चाहिए। इस सन्दर्भ में, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज ने अनुशंसा की कि आध्यात्मिक गुरु ग्रन्थ छापे। यदि किसी के पास धन हो, तो महँगे मन्दिर बनाने के बजाय, उसे अपना धन कृष्णभावनामृत आन्दोलन के प्रसार हेतु विभिन्न भाषाओं में अधिकृत ग्रन्थों के प्रकाशन हेतु व्यय करना चाहिए।

पद्मपुराण में एक कथन है : "जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में संलग्न हैं, उन्हें किसी भौतिक लाभ अथवा हानि से कभी विचलित नहीं होना चाहिए। यदि कोई भौतिक हानि भी हो, तो मनुष्य को व्याकुल नहीं होना चाहिए, अपितु अपने भीतर सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करना चाहिए।" तात्पर्य यह है कि प्रत्येक बद्धजीव सदा भौतिकतावादी कार्यों के चिन्तन में निमग्न रहता है; उसे स्वयं को ऐसे विचारों से मुक्त करना है और स्वयं को पूर्णतः कृष्णभावनामृत में स्थानान्तरित करना है। जैसा हम पहले ही समझा चुके हैं, कृष्णभावनामृत का मूल सिद्धान्त सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करना है। मनुष्य को भौतिक हानि में विचलित नहीं होना चाहिए, अपितु अपने मन को भगवान् के चरणकमलों पर केन्द्रित करना चाहिए।

भक्त को शोक अथवा भ्रम के अधीन नहीं होना चाहिए। पद्मपुराण में निम्नलिखित कथन है : "जो व्यक्ति शोक अथवा क्रोध से अभिभूत है, उसके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रकट होने की कोई सम्भावना नहीं रहती।"

मनुष्य को देवताओं को उचित आदर अर्पित करने में उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मनुष्य भले देवताओं का भक्त न हो, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह उनके प्रति अनादर करे। उदाहरणार्थ, वैष्णव भगवान् शिव अथवा भगवान् ब्रह्मा का भक्त नहीं है, किन्तु वह ऐसे उच्च-स्थित देवताओं को समस्त आदर अर्पित करने हेतु कर्तव्यबद्ध है। वैष्णव दर्शन के अनुसार, मनुष्य को एक चींटी तक को आदर अर्पित करना चाहिए, तो फिर भगवान् शिव तथा भगवान् ब्रह्मा जैसे महान् पुरुषों की तो बात ही क्या?

पद्मपुराण में कहा गया है : "श्रीकृष्ण अथवा हरि समस्त देवताओं के स्वामी हैं, अतः वे सदा आराध्य हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य देवताओं को आदर न अर्पित करे।"

यह महाभारत का कथन है : "जो व्यक्ति किसी जीव के मन में विघ्न अथवा पीड़ादायक क्रिया उत्पन्न नहीं करता, जो प्रत्येक के साथ ठीक वैसा ही व्यवहार करता है जैसा एक स्नेही पिता अपनी सन्तानों के साथ करता है, जिसका हृदय इतना शुद्ध है, वह निश्चय ही अति शीघ्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा अनुगृहीत हो जाता है।"

तथाकथित सभ्य समाज में कभी-कभी पशुओं के प्रति क्रूरता के विरुद्ध आन्दोलन होता है, किन्तु साथ ही नियमित बूचड़खाने सदा चलते रहते हैं। वैष्णव ऐसा नहीं होता। वैष्णव न तो पशु-वध का कभी समर्थन कर सकता है, न ही किसी जीव को पीड़ा दे सकता है।
