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श्रीकृष्ण की शक्तियों का ज्ञान

इस बिन्दु पर यह उल्लेख किया जा सकता है कि *भगवद्गीता* का नवम अध्याय विशेष रूप से उनके लिए है जिन्होंने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में पहले ही स्वीकार कर लिया है। दूसरे शब्दों में, यह उनके भक्तों के लिए है। यदि कोई श्रीकृष्ण को परमेश्वर के रूप में स्वीकार नहीं करता, तो यह नवम अध्याय उससे भिन्न प्रतीत होगा जो यह वास्तव में है। जैसा कि आरम्भ में कहा गया, नवम अध्याय का विषय समस्त *भगवद्गीता* की परम गोपनीय सामग्री है। यदि कोई श्रीकृष्ण को परमेश्वर के रूप में स्वीकार नहीं करता, तो वह इस अध्याय को मात्र अतिशयोक्ति समझेगा। यह विशेष रूप से उन श्लोकों के सन्दर्भ में सत्य है जो श्रीकृष्ण के अपनी सृष्टि के साथ सम्बन्ध की चर्चा करते हैं।

mayā tatam idaṁ sarvaṁ

jagad avyakta-mūrtinā

mat-sthāni sarva-bhūtāni

na cāhaṁ teṣv avasthitaḥ

"मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में, यह समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्त है। समस्त जीव मुझमें स्थित हैं, किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।" (गीता 9.4)

जो संसार हम देखते हैं, वह भी श्रीकृष्ण की शक्ति, उनकी माया है। यहाँ mayā का अर्थ है "मेरे द्वारा", जैसे कोई कहता है, "यह कार्य मेरे द्वारा किया गया है।" इस "मेरे द्वारा" का यह अर्थ नहीं है कि उन्होंने अपना कार्य कर लिया और समाप्त कर दिया अथवा अवकाश ले लिया। यदि मैं कोई विशाल कारखाना आरम्भ करूँ और कहूँ, "यह कारखाना मेरे द्वारा आरम्भ किया गया था", तो किसी भी दशा में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं लुप्त हो गया अथवा किसी प्रकार उपस्थित नहीं हूँ। यद्यपि कोई निर्माता अपने उत्पादों को "मेरे द्वारा निर्मित" कह सकता है, इसका यह अर्थ नहीं कि उसने व्यक्तिगत रूप से अपने उत्पाद को रचा अथवा बनाया, अपितु यह कि वह उत्पाद उसकी ऊर्जा द्वारा उत्पन्न किया गया था। इसी प्रकार, यदि श्रीकृष्ण कहते हैं, "संसार में तुम जो कुछ भी देखते हो, वह मेरे द्वारा रचा गया था", तो हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे अब विद्यमान नहीं हैं।

सृष्टि में सर्वत्र ईश्वर को देख लेना अत्यन्त कठिन नहीं है, क्योंकि वह सर्वत्र उपस्थित है। जिस प्रकार फोर्ड कारखाने में श्रमिक प्रत्येक कोने में श्रीमान् फोर्ड को देखते हैं, उसी प्रकार जो श्रीकृष्ण के विज्ञान से परिचित हैं, वे सृष्टि के प्रत्येक अणु में उन्हें देख सकते हैं। प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण में स्थित है (mat-sthāni sarva bhūtāni), किन्तु श्रीकृष्ण वहाँ नहीं हैं (na cāhaṁ teṣv avasthitaḥ)। श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति अभिन्न हैं, फिर भी शक्ति श्रीकृष्ण नहीं है। सूर्य एवं सूर्य-प्रकाश भिन्न नहीं हैं, किन्तु सूर्य-प्रकाश सूर्य नहीं है। सूर्य-प्रकाश हमारी खिड़की से आकर हमारे कक्ष में प्रवेश कर सकता है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि सूर्य हमारे कक्ष में है। *विष्णु पुराण* कहता है: parasya brāhmaṇaḥ śaktiḥ: parasya का अर्थ है परम, brāhmaṇaḥ का अर्थ है परम सत्य, और śaktiḥ का अर्थ है ऊर्जा। परम परब्रह्म की ऊर्जा ही सब कुछ है, किन्तु उस ऊर्जा में श्रीकृष्ण नहीं पाए जाते।

ऊर्जा दो प्रकार की होती है—भौतिक एवं आध्यात्मिक। जीव, अथवा व्यष्टि आत्माएँ, श्रीकृष्ण की पराशक्ति से सम्बन्धित हैं, किन्तु चूँकि वे भौतिक शक्ति की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति रखते हैं, अतः उन्हें तटस्था शक्ति कहा जाता है। किन्तु वास्तव में केवल दो ही शक्तियाँ हैं। समस्त लोकमण्डल एवं ब्रह्माण्ड श्रीकृष्ण की शक्तियों पर स्थित हैं। जिस प्रकार सौरमण्डल के समस्त ग्रह सूर्य-प्रकाश में स्थित हैं, उसी प्रकार सृष्टि के भीतर प्रत्येक वस्तु कृष्ण-प्रभा पर स्थित है। भगवान् की ये समस्त शक्तियाँ भक्त को आनन्द प्रदान करती हैं, किन्तु जो श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करता है, वह इन्हें अस्वीकार कर देता है। जब कोई अभक्त होता है, तब श्रीकृष्ण के कथन उसे केवल ढोंग प्रतीत होते हैं, किन्तु जब कोई भक्त होता है, तब वह सोचता है, "अहो, मेरे प्रभु इतने शक्तिशाली हैं!" और वह प्रेम एवं आराधना से भर उठता है। अभक्त सोचते हैं कि चूँकि श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं ईश्वर हूँ", अतः वे एवं अन्य सभी भी वही कह सकते हैं। किन्तु यदि उनसे अपना विश्वरूप दिखाने को कहा जाए, तो वे ऐसा नहीं कर सकते। यही कूट ईश्वर एवं वास्तविक ईश्वर के बीच का अन्तर है। श्रीकृष्ण की लीलाओं का अनुकरण नहीं किया जा सकता। श्रीकृष्ण ने 16,000 से अधिक पत्नियों से विवाह किया और उन्हें 16,000 प्रासादों में भली-भाँति रखा, किन्तु एक साधारण मनुष्य तो एक पत्नी को भी भली-भाँति नहीं रख सकता। ऐसा नहीं है कि श्रीकृष्ण ने केवल इतनी आश्चर्यजनक बातें ही कहीं; उन्होंने आश्चर्यजनक ढंग से कार्य भी किया। हमें श्रीकृष्ण की कही अथवा की हुई एक बात पर विश्वास करके दूसरी को अस्वीकार नहीं करना चाहिए; यदि विश्वास है, तो वह पूर्ण विश्वास होना चाहिए।

इस सन्दर्भ में, नारद मुनि की एक कथा है, जिनसे एक बार एक ब्राह्मण ने पूछा: "अरे, आप तो भगवान् से मिलने जा रहे हैं? कृपया उनसे पूछिएगा कि मुझे मेरी मुक्ति कब मिलेगी?"

नारद ने स्वीकार किया, "ठीक है। मैं उनसे पूछूँगा।"

ज्यों-ज्यों नारद आगे बढ़े, उन्हें एक मोची मिला जो एक वृक्ष के नीचे बैठा जूते सुधार रहा था, और उस मोची ने भी इसी प्रकार नारद से पूछा, "अरे, आप तो ईश्वर के दर्शन करने जा रहे हैं? कृपया उनसे पूछिएगा कि मेरी मुक्ति कब आएगी?"

जब नारद मुनि वैकुण्ठ लोकों में पहुँचे, तब उन्होंने उनकी विनती पूरी की और नारायण (ईश्वर) से उस ब्राह्मण एवं मोची की मुक्ति के विषय में पूछा, और नारायण ने उत्तर दिया, "इस शरीर को त्यागने के पश्चात् वह मोची यहाँ मेरे पास आएगा।"

नारद ने पूछा, "और उस ब्राह्मण का क्या?"

"उसे वहाँ अनेक जन्मों तक रहना पड़ेगा। मैं नहीं जानता कि वह कब आ रहा है।"

नारद मुनि चकित रह गए, और अन्ततः उन्होंने कहा, "मैं इसके रहस्य को नहीं समझ पा रहा हूँ।"

नारायण ने कहा, "वह तुम देखोगे। जब वे तुमसे पूछें कि मैं अपने धाम में क्या कर रहा हूँ, तो उन्हें बताना कि मैं एक हाथी को सुई के छेद में पिरो रहा हूँ।"

जब नारद पृथ्वी पर लौटे और उस ब्राह्मण के पास पहुँचे, तब ब्राह्मण ने कहा, "अरे, आपने भगवान् के दर्शन कर लिए? वे क्या कर रहे थे?"

नारद ने उत्तर दिया, "वे एक हाथी को सुई के छेद से पिरो रहे थे।"

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, "मैं ऐसी बकवास पर विश्वास नहीं करता।" नारद तत्काल समझ गए कि इस मनुष्य में कोई श्रद्धा नहीं है और वह केवल पुस्तकों का पाठक मात्र है।

तत्पश्चात् नारद वहाँ से चल पड़े और उस मोची के पास गए, जिसने उनसे पूछा, "अरे, आपने भगवान् के दर्शन कर लिए? बताइए, वे क्या कर रहे थे?"

नारद ने उत्तर दिया, "वे एक हाथी को सुई के छेद से पिरो रहे थे।"

वह मोची रोने लगा, "अहो, मेरे प्रभु इतने अद्भुत हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं!"

नारद ने पूछा, "क्या तुम सचमुच विश्वास करते हो कि भगवान् एक हाथी को सुई के छेद से धकेल सकते हैं?"

मोची ने कहा, "क्यों नहीं? निःसन्देह मैं इस पर विश्वास करता हूँ।"

"वह कैसे?"

मोची ने उत्तर दिया, "आप देख सकते हैं कि मैं इस बरगद के वृक्ष के नीचे बैठा हूँ, और आप देख सकते हैं कि प्रतिदिन इतने फल गिरते हैं, और प्रत्येक बीज में इसी के समान एक बरगद का वृक्ष है। यदि एक छोटे-से बीज के भीतर इतना बड़ा वृक्ष हो सकता है, तो क्या यह स्वीकार करना कठिन है कि भगवान् एक हाथी को सुई के छेद से धकेल रहे हैं?"

अतः इसे श्रद्धा कहते हैं। यह आँख मूँदकर विश्वास करने का प्रश्न नहीं है। इस विश्वास के पीछे तर्क है। यदि श्रीकृष्ण इतने छोटे-छोटे बीजों के भीतर एक बड़ा वृक्ष रख सकते हैं, तो क्या यह इतना आश्चर्यजनक है कि वे समस्त लोकमण्डलों को अपनी शक्ति के द्वारा आकाश में तैरता रखे हुए हैं?

यद्यपि वैज्ञानिक यह सोच सकते हैं कि ग्रह केवल प्रकृति के द्वारा ही आकाश में टिके हुए हैं, किन्तु प्रकृति के पीछे परमेश्वर है। प्रकृति उसके निर्देशन में कार्य कर रही है। जैसा कि श्रीकृष्ण कहते हैं:

mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ

sūyate sa-carācaram

hetunānena kaunteya

jagad viparivartate

"हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य कर रही है, और समस्त चर एवं अचर जीवों को उत्पन्न कर रही है। इसके शासन से यह प्रकटीकरण बार-बार रचा एवं नष्ट किया जाता है।" (गीता 9.10)

Mayādhyakṣena का अर्थ है "मेरी देखरेख में"। भौतिक प्रकृति इतने आश्चर्यजनक ढंग से कार्य नहीं कर सकती जब तक उसके पीछे भगवान् का हाथ न हो। हम भौतिक वस्तुओं के स्वतः कार्य करने का कोई उदाहरण नहीं दे सकते। जड़ पदार्थ निष्क्रिय है, और आध्यात्मिक स्पर्श के बिना उसके कार्य करने की कोई सम्भावना नहीं है। जड़ पदार्थ स्वतन्त्र रूप से अथवा स्वतः कार्य नहीं कर सकता। यन्त्र भले ही अत्यन्त आश्चर्यजनक ढंग से बनाए गए हों, किन्तु जब तक कोई मनुष्य उस यन्त्र को स्पर्श न करे, वह कार्य नहीं कर सकता। और वह मनुष्य क्या है? वह एक आध्यात्मिक स्फुलिंग है। आध्यात्मिक स्पर्श के बिना कुछ भी गति नहीं कर सकता; अतः प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण की निर्विशेष ऊर्जा पर स्थित है। श्रीकृष्ण की ऊर्जा निर्विशेष है, किन्तु वे एक पुरुष हैं। हम प्रायः ऐसे व्यक्तियों के विषय में सुनते हैं जो आश्चर्यजनक कार्य करते हैं, फिर भी अपनी ऊर्जावान् उपलब्धियों के बावजूद वे व्यक्ति ही बने रहते हैं। यदि यह मनुष्यों के लिए सम्भव है, तो परमेश्वर के लिए यह सम्भव क्यों नहीं? हम सब व्यक्ति हैं, किन्तु हम सब श्रीकृष्ण पर, उस परम पुरुष पर, आश्रित हैं।

हमने प्रायः एटलस के चित्र देखे हैं — एक हृष्ट-पुष्ट पुरुष, जो अपने कन्धों पर एक विशाल ग्रह उठाए हुए है और उसे थामे रखने के लिए अत्यन्त संघर्ष कर रहा है। हम सोच सकते हैं कि चूँकि श्रीकृष्ण ब्रह्माण्ड का पालन करते हैं, अतः वे भी एटलस की भाँति उसके भार तले संघर्ष कर रहे होंगे। किन्तु ऐसा नहीं है।

na ca mat-sthāni bhūtāni

paśya me yogam aiśvaram

bhūta-bhṛn na ca bhūta-stho

mamātmā bhūta-bhāvanaḥ

"और फिर भी जो कुछ सृजित है, वह मुझमें स्थित नहीं है। मेरे योगैश्वर्य को देखो। यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालक हूँ और यद्यपि मैं सर्वत्र हूँ, तथापि मेरा आत्मस्वरूप सृष्टि का परम उद्गम है।" (गीता 9.5)

यद्यपि ब्रह्माण्ड के समस्त जीव श्रीकृष्ण की ऊर्जा में स्थित हैं, तथापि वे उनमें नहीं हैं। श्रीकृष्ण समस्त जीवों का पालन करते हैं, और उनकी ऊर्जा सर्वव्यापी है, फिर भी वे अन्यत्र हैं। यह श्रीकृष्ण की अचिन्त्य योगशक्ति है। वे सर्वत्र हैं, फिर भी प्रत्येक वस्तु से पृथक् हैं। हम उनकी ऊर्जा का अनुभव कर सकते हैं, किन्तु उन्हें देख नहीं सकते, क्योंकि भौतिक नेत्रों से उन्हें देखा नहीं जा सकता। परन्तु जब हम अपने आध्यात्मिक गुणों का विकास करते हैं, तब हम अपनी इन्द्रियों को इतना पवित्र कर लेते हैं कि इसी ऊर्जा के भीतर भी हम उन्हें देख सकते हैं। उदाहरणार्थ, विद्युत् सर्वत्र विद्यमान है, और एक विद्युत्-तकनीशियन उसका उपयोग करने में समर्थ है। इसी प्रकार, परमेश्वर की ऊर्जा सर्वत्र है, और जब हम दिव्य स्थिति में स्थित हो जाते हैं, तब हम सर्वत्र भगवान् का साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। इन्द्रियों का यह आध्यात्मीकरण भक्ति तथा ईश्वर-प्रेम के द्वारा सम्भव है। भगवान् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापी हैं और आत्मा में, हृदय में, जल, वायु — सर्वत्र — स्थित हैं। अतः यदि हम किसी वस्तु में — मिट्टी, पत्थर, काष्ठ अथवा किसी भी वस्तु में — भगवान् की प्रतिमा बनाएँ, तो उसे मात्र एक गुड़िया नहीं समझना चाहिए। वह भी भगवान् हैं। यदि हममें पर्याप्त भक्ति हो, तो वह प्रतिमा हमसे वार्ता भी करेगी। भगवान् सर्वत्र निर्विशेष रूप से विद्यमान हैं (mayā tatam idaṁ sarvam), किन्तु यदि हम किसी वस्तु से उनका साकार रूप बनाएँ, अथवा यदि हम अपने भीतर भगवान् की प्रतिमा रच लें, तो वे हमारे लिए साक्षात् रूप में उपस्थित होंगे। शास्त्रों में आठ प्रकार की प्रतिमाओं की अनुशंसा की गई है, और किसी भी प्रकार की प्रतिमा की आराधना की जा सकती है, क्योंकि भगवान् सर्वत्र हैं। कोई आपत्ति कर सकता है और पूछ सकता है, "भगवान् की आराधना प्रतिमाओं में क्यों की जाए, उनके मूल आध्यात्मिक रूप में क्यों नहीं?" इसका उत्तर यह है कि हम भगवान् को उनके आध्यात्मिक रूप में तत्काल नहीं देख सकते। अपने भौतिक नेत्रों से हम केवल पत्थर, मिट्टी, काष्ठ — कोई मूर्त वस्तु ही देख सकते हैं। इसी कारण श्रीकृष्ण अर्चा-विग्रह के रूप में आते हैं — एक ऐसा रूप जिसे परमेश्वर हमारे दर्शन हेतु सुविधापूर्वक प्रस्तुत करते हैं। परिणाम यह होता है कि यदि हम उस प्रतिमा पर ध्यान केन्द्रित करें और प्रेम तथा भक्ति सहित अर्पण करें, तो श्रीकृष्ण उस प्रतिमा के माध्यम से प्रत्युत्तर देंगे।

ऐसा होने के अनेक उदाहरण हैं। भारत में एक मन्दिर है जिसे साक्षी-गोपाल कहते हैं (श्रीकृष्ण को प्रायः गोपाल कहा जाता है)। गोपाल मूर्ति अथवा विग्रह एक समय वृन्दावन के एक मन्दिर में स्थित थी। एक बार दो ब्राह्मण — एक वृद्ध और एक युवक — तीर्थयात्रा पर वृन्दावन के दर्शन हेतु गए। यह एक लम्बी यात्रा थी, और उन दिनों रेलगाड़ियाँ नहीं थीं, अतः यात्रियों को अनेक कष्ट सहने पड़ते थे। वृद्ध पुरुष यात्रा में सहायता के लिए उस युवक का बहुत आभारी था, और वृन्दावन पहुँचने पर उसने उससे कहा : "हे प्रिय बालक, तुमने मेरी इतनी सेवा की है, और मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूँ। मैं उस सेवा का प्रतिफल देना चाहता हूँ और तुम्हें कोई पुरस्कार देना चाहता हूँ।"

"हे आदरणीय," युवक ने कहा, "आप तो मेरे पिता के समान वृद्ध हैं। आपकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। मुझे किसी पुरस्कार की आवश्यकता नहीं।"

"नहीं, मैं तुम्हारा आभारी हूँ, और मुझे तुम्हें पुरस्कार अवश्य देना है," वृद्ध ने आग्रह किया। तत्पश्चात् उसने युवक को अपनी युवा पुत्री विवाह में देने का वचन दिया।

वृद्ध पुरुष अत्यन्त धनवान था, और युवक, यद्यपि एक विद्वान् ब्राह्मण था, अत्यन्त निर्धन था। इस पर विचार करते हुए युवक ने कहा, "ऐसा वचन न दीजिए, क्योंकि आपका परिवार कभी सहमत नहीं होगा। मैं इतना निर्धन हूँ, और आप कुलीन हैं, अतः यह विवाह सम्पन्न नहीं होगा। विग्रह के समक्ष इस प्रकार का वचन न दीजिए।"

यह वार्तालाप मन्दिर में गोपाल-कृष्ण के विग्रह के समक्ष हो रहा था, और युवक इस बात के लिए चिन्तित था कि विग्रह का अपराध न हो। तथापि, युवक के अनुनय के बावजूद, वृद्ध विवाह के लिए अड़ा रहा। कुछ समय वृन्दावन में रहने के पश्चात् वे अन्ततः घर लौटे, और वृद्ध ने अपने ज्येष्ठ पुत्र को सूचित किया कि उसकी छोटी बहन का विवाह उस निर्धन ब्राह्मण युवक से होना है। ज्येष्ठ पुत्र अत्यन्त क्रुद्ध हो गया। "ओह, आपने मेरी बहन के पति के रूप में उस दरिद्र को कैसे चुन लिया? यह नहीं हो सकता।"

वृद्ध की पत्नी भी उसके पास आई और बोली, "यदि तुमने हमारी पुत्री का विवाह उस बालक से किया, तो मैं आत्महत्या कर लूँगी।"

इस प्रकार वृद्ध व्याकुल हो उठा। कुछ समय पश्चात् वह ब्राह्मण युवक अत्यन्त चिन्तित हो गया। "उसने अपनी पुत्री का विवाह मुझसे करने का वचन दिया है, और वह वचन उसने विग्रह के समक्ष दिया था। अब वह उसे पूर्ण करने नहीं आ रहा।" तत्पश्चात् वह वृद्ध से मिलने गया, ताकि उसे उसका वचन स्मरण कराए।

"आपने भगवान् श्रीकृष्ण के समक्ष वचन दिया था," युवक ने कहा, "और आप उस वचन को पूर्ण नहीं कर रहे। ऐसा क्यों?"

वृद्ध मौन रहा। वह श्रीकृष्ण से प्रार्थना करने लगा, क्योंकि वह व्याकुल था। वह न तो अपनी पुत्री का विवाह उस युवक से करना चाहता था और न ही अपने परिवार में इतना बड़ा क्लेश उत्पन्न करना चाहता था। इसी बीच ज्येष्ठ पुत्र बाहर आया और ब्राह्मण युवक पर दोषारोपण करने लगा। "तुमने तीर्थस्थान में मेरे पिता को लूटा है। तुमने उन्हें कोई नशीला पदार्थ देकर उनका सारा धन ले लिया, और अब तुम कह रहे हो कि उन्होंने तुम्हें मेरी सबसे छोटी बहन देने का वचन दिया है। अरे धूर्त!"

इस प्रकार बहुत कोलाहल हुआ, और लोग एकत्र होने लगे। युवक समझ गया कि वृद्ध तो अब भी सहमत है, किन्तु परिवार उसके लिए कठिनाई उत्पन्न कर रहा है। ज्येष्ठ पुत्र के कोलाहल के कारण लोग एकत्र होने लगे, और ब्राह्मण युवक उनके समक्ष यह घोषित करने लगा कि वृद्ध ने यह वचन विग्रह के समक्ष दिया था, किन्तु अब वह उसे पूर्ण नहीं कर पा रहा, क्योंकि परिवार आपत्ति कर रहा है। ज्येष्ठ पुत्र, जो एक नास्तिक था, सहसा युवक की बात बीच में काटकर बोला, "तुम कहते हो कि भगवान् साक्षी थे। ठीक है, यदि वे आकर मेरे पिता के इस वचन के साक्षी बनते हैं, तो तुम मेरी बहन से विवाह कर सकते हो।"

युवक ने उत्तर दिया, "हाँ, मैं श्रीकृष्ण से साक्षी के रूप में आने की प्रार्थना करूँगा।" उसे विश्वास था कि भगवान् अवश्य आएँगे। तत्पश्चात् सबके समक्ष यह समझौता हुआ कि यदि श्रीकृष्ण वृद्ध के वचन के साक्षी के रूप में वृन्दावन से आ जाएँ, तो कन्या विवाह में दे दी जाएगी।

ब्राह्मण युवक वृन्दावन लौटा और गोपाल-कृष्ण से प्रार्थना करने लगा। "हे प्रिय प्रभु, आपको मेरे साथ अवश्य चलना होगा।" वह इतना दृढ़ भक्त था कि वह श्रीकृष्ण से इस प्रकार बात करता था, जैसे कोई किसी मित्र से बात करता है। वह यह नहीं सोचता था कि गोपाल मात्र एक मूर्ति अथवा प्रतिमा हैं, अपितु वह उन्हें साक्षात् भगवान् मानता था। सहसा विग्रह ने उससे कहा :

"तुम कैसे सोचते हो कि मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ? मैं तो एक मूर्ति हूँ। मैं कहीं नहीं जा सकता।"

"यदि कोई मूर्ति बोल सकती है, तो वह चल भी सकती है," बालक ने उत्तर दिया।

"अच्छा तो ठीक है," विग्रह ने अन्ततः कहा। "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, किन्तु एक शर्त पर। तुम किसी भी दशा में मुझे देखने के लिए पीछे मुड़कर नहीं देखोगे। मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आऊँगा, और तुम मेरे पायल की झंकार से जान जाओगे कि मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूँ।"

युवक मान गया, और इस प्रकार वे दूसरे नगर जाने के लिए वृन्दावन से चल पड़े। जब यात्रा लगभग समाप्त होने को थी, ठीक जब वे उसके गाँव में प्रवेश करने ही वाले थे, तब युवक को पायल की ध्वनि अब सुनाई नहीं दी, और वह भयभीत होने लगा। "ओह, श्रीकृष्ण कहाँ हैं?" स्वयं को और अधिक न रोक पाने के कारण उसने पीछे मुड़कर देख लिया। उसने देखा कि विग्रह स्थिर खड़े हैं। चूँकि उसने पीछे मुड़कर देख लिया था, अतः वे और आगे नहीं जाएँगे। वह तुरन्त नगर में दौड़ा और लोगों से बाहर आकर श्रीकृष्ण के दर्शन करने को कहा, जो साक्षी के रूप में आए थे। सभी आश्चर्यचकित थे कि इतनी बड़ी मूर्ति इतनी दूर से आई है, और उन्होंने उसी स्थान पर विग्रह के सम्मान में एक मन्दिर बनवाया, और आज भी लोग साक्षी-गोपाल की, साक्षी रूप में भगवान् की, आराधना कर रहे हैं।

अतः हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि चूँकि भगवान् सर्वत्र हैं, अतः वे अपनी मूर्ति में, अपनी बनाई गई प्रतिमा में भी हैं। यदि श्रीकृष्ण सर्वत्र हैं, जैसा कि निर्विशेषवादी भी स्वीकार करते हैं, तो फिर वे अपनी प्रतिमा में क्यों न हों? कोई प्रतिमा अथवा मूर्ति हमसे बात करती है या नहीं, यह हमारी भक्ति की मात्रा पर निर्भर करता है। किन्तु यदि हम प्रतिमा को मात्र काष्ठ अथवा पत्थर का टुकड़ा मानने का निश्चय कर लें, तो श्रीकृष्ण हमारे लिए सदा काष्ठ अथवा पत्थर ही बने रहेंगे। श्रीकृष्ण सर्वत्र हैं, किन्तु जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक चेतना में उन्नति करते हैं, वैसे-वैसे हम उन्हें उनके यथार्थ रूप में देखने लगते हैं। यदि हम कोई पत्र किसी डाक-पेटी में डालते हैं, तो वह अपने गन्तव्य तक पहुँच जाएगा, क्योंकि वह डाक-पेटी अधिकृत है। इसी प्रकार, यदि हम भगवान् की किसी अधिकृत प्रतिमा की आराधना करते हैं, तो हमारी श्रद्धा का कुछ प्रभाव अवश्य होगा। यदि हम विविध नियमों एवं विधि-विधानों का पालन करने के लिए प्रस्तुत हों — अर्थात् यदि हम योग्य बन जाएँ — तो कहीं भी और सर्वत्र भगवान् का दर्शन सम्भव है। जब कोई भक्त उपस्थित होता है, तब श्रीकृष्ण अपनी सर्वव्यापी ऊर्जाओं द्वारा कहीं भी और सर्वत्र अपने को प्रकट करते हैं, किन्तु जब उनका भक्त वहाँ नहीं होता, तब वे ऐसा नहीं करते। इसके अनेक उदाहरण हैं। प्रह्लाद महाराज ने श्रीकृष्ण को एक स्तम्भ में देखा। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं। श्रीकृष्ण तो वहाँ हैं; आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम उन्हें देखने की योग्यता रखें।

श्रीकृष्ण स्वयं अपनी सर्वव्यापकता का उदाहरण इस प्रकार देते हैं :

yathākāśa sthito nityaṁ

vāyuḥ sarvatra-go mahān

tathā sarvāṇi bhūtāni

mat-sthānīty upadhāraya

"जिस प्रकार सर्वत्र बहने वाली प्रबल वायु सदा आकाश में ही स्थित रहती है, उसी प्रकार जान लो कि समस्त जीव मुझमें स्थित हैं।" (गीता 9.6)

सभी जानते हैं कि वायु आकाश के भीतर बहती है, और पृथ्वी पर वह सर्वत्र बह रही है। ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ वायु अथवा हवा न हो। यदि हम वायु को बाहर निकालना चाहें, तो हमें किसी यन्त्र द्वारा कृत्रिम रूप से निर्वात बनाना पड़ता है। जिस प्रकार वायु आकाश में सर्वत्र बह रही है, उसी प्रकार प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण के भीतर विद्यमान है। यदि ऐसी ही बात है, तो जब भौतिक सृष्टि का प्रलय होता है, तब वह कहाँ जाती है?

sarva-bhūtāni kaunteya

prakṛtiṁ yānti māmikām

kalpa-kṣaye punas tāni

kalpādau visṛjāmy aham

"हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अन्त में प्रत्येक भौतिक प्रकटीकरण मेरी प्रकृति में प्रवेश कर जाता है, और दूसरे कल्प के आरम्भ में मैं अपनी शक्ति से पुनः सृष्टि करता हूँ।" (गीता 9.7)

श्रीकृष्ण अपनी प्रकृति को गति में लाते हैं, जैसे कोई घड़ी में चाबी भरता है, और जब प्रकृति की चाबी उतर जाती है, तब वह भगवान् में लीन हो जाती है। तथापि, आध्यात्मिक सृष्टि ऐसी नहीं है, क्योंकि वह नित्य है। भौतिक सृष्टि में प्रत्येक वस्तु क्षणिक है। जिस प्रकार हमारे शरीर अपने भीतर स्थित आध्यात्मिक स्फुलिंग के कारण विकसित होते हैं, उसी प्रकार समूची सृष्टि भगवान् की उस आत्मा के कारण, जो उसके भीतर है, अस्तित्व में आती, विकसित होती और लुप्त होती है। जिस प्रकार हमारी आत्मा शरीर के भीतर उपस्थित है, उसी प्रकार भगवान् परमात्मा के रूप में ब्रह्माण्ड के भीतर उपस्थित हैं। क्षीरोदकशायी विष्णु की उपस्थिति के कारण भौतिक सृष्टि का अस्तित्व है, ठीक जैसे हमारी उपस्थिति के कारण हमारे शरीर का अस्तित्व है। कभी श्रीकृष्ण भौतिक सृष्टि को प्रकट करते हैं, और कभी नहीं करते। सभी दशाओं में उसका अस्तित्व उनकी उपस्थिति के कारण ही है।
