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जीवन की पूर्णता की प्राप्ति

## "मानव जीवन ईश्वर-साक्षात्कार के लिए है"

प्रत्येक विचारशील मनुष्य यह मूलभूत प्रश्न पूछता है, "जीवन का प्रयोजन क्या है?" दुर्भाग्यवश, परम अर्थ को पाने की हमारी कठिनाई इस तथ्य से और भी बढ़ जाती है कि सहस्रों परस्पर-विरोधी दर्शन, धर्म तथा विचारधाराएँ एवं उनके समर्थक हमारी निष्ठा के लिए होड़ करते हैं। यहाँ श्रील प्रभुपाद कुछ सरल एवं प्रबोधक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

आज का विषय है ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध। यही आत्म-साक्षात्कार है। संकीर्तन-आन्दोलन आत्म-साक्षात्कार की सरलतम विधि है, क्योंकि यह हृदय को स्वच्छ करता है। अपनी पहचान के विषय में हमारी ग़लतफ़हमी मन के दर्पण पर पड़ी धूल के कारण है। जिस दर्पण पर धूल जमी हो, उसमें मनुष्य स्वयं को नहीं देख पाता। किन्तु यदि वह अत्यन्त स्वच्छ हो, तो मनुष्य स्वयं को देख सकता है। अतः ध्यान हृदय को स्वच्छ करने की एक विधि है। ध्यान का अर्थ है परम के साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयास करना।

जिस किसी वस्तु के सम्पर्क में हम आते हैं, उसके साथ कोई न कोई सम्बन्ध होता है। चूँकि मैं अब इस गद्दी पर बैठा हूँ, अतः सम्बन्ध यह है कि मैं बैठूँगा और गद्दी मुझे धारण करेगी। आपके भी सम्बन्ध हैं। आप अंग्रेज़ हैं अथवा भारतीय, अतः आपके समाज के साथ, आपके परिवार के साथ, आपके मित्रों के साथ एक सम्बन्ध है। तो फिर ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है?

यदि आप प्रत्येक व्यक्ति से पूछें, तो बहुत कम लोग ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की व्याख्या कर पाएँगे। वे कहते हैं, "ईश्वर क्या है? ईश्वर मर चुका है। मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करता, फिर सम्बन्ध की तो बात ही क्या।" चूँकि ये मलिन वस्तुएँ उनके हृदय को ढके हुए हैं, इसलिए वे देख नहीं पाते। प्रत्येक वस्तु के साथ हमारा सम्बन्ध है—फिर हम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न क्यों नहीं करते? क्या यह बुद्धिमत्ता है? नहीं। यह अज्ञान है। इस भौतिक जगत् के समस्त प्राणी भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से ढके हुए हैं। इसी कारण वे ईश्वर को नहीं देख पाते। वे न तो ईश्वर को समझ पाते हैं, और न ही उन्हें समझने का प्रयास करते हैं। किन्तु ईश्वर वहाँ हैं। इंग्लैंड में प्रातःकाल कुहासा रहता है, अतः आप उस कुहरे के पीछे सूर्य को नहीं देख पाते। किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि सूर्य है ही नहीं? आप उसे इसलिए नहीं देख पाते क्योंकि आपकी आँखें ढकी हुई हैं। किन्तु यदि आप संसार के किसी अन्य भाग में तार भेजें, तो वे कहेंगे, "हाँ, सूर्य यहाँ है। हम उसे देख सकते हैं। वह अत्यन्त चकाचौंध करने वाला, प्रकाश से परिपूर्ण है।" अतः जब आप ईश्वर के अस्तित्व का खण्डन करते हैं अथवा ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को निश्चित नहीं कर पाते, तो इसका अर्थ यह है कि आपमें ज्ञान का अभाव है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर नहीं हैं। हमीं में अभाव है। सूर्य ढका नहीं है। सूर्य ढका नहीं जा सकता। कुहरे, बादल अथवा कुहासे में सूर्य को ढकने की शक्ति नहीं है। सूर्य कितना विशाल है! वह इस पृथ्वी से अनेक गुना बड़ा है। और बादल अधिक से अधिक दस, बीस अथवा सौ मील को ही ढक सकते हैं। तो फिर बादल सूर्य को कैसे ढक सकते हैं? नहीं। बादल सूर्य को नहीं ढक सकते। वे आपकी आँखों को ढक लेते हैं। जब कोई शत्रु आता है और कोई खरगोश अपनी रक्षा नहीं कर पाता, तब वह खरगोश अपनी आँखें बन्द कर लेता है और सोचता है, "मेरा शत्रु अब चला गया।" इसी प्रकार, हम ईश्वर की बहिरंगा शक्ति से ढके हुए हैं और सोचते हैं, "ईश्वर मर चुका है।"

भगवान् की तीन प्रकार की शक्तियाँ हैं। विष्णु पुराण में परमेश्वर की शक्ति का वर्णन है। और वेदों में भी, उपनिषदों में, परमेश्वर की शक्तियों के वर्णन हैं। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.8)। शक्ति का अर्थ है "ऊर्जा"। भगवान् की अनेक शक्तियाँ हैं। वेद कहते हैं, "ईश्वर को कुछ भी नहीं करना है।" हमें कार्य करना पड़ता है क्योंकि अस्तित्व में बने रहने का हमारे पास और कोई उपाय नहीं है—हमें खाना पड़ता है, हम इसका, उसका भोग करना चाहते हैं—किन्तु ईश्वर को कार्य क्यों करना पड़े? ईश्वर को कार्य नहीं करना पड़ता। तो फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड की रचना की? क्या वह कार्य नहीं है? नहीं। तो फिर यह कैसे हुआ? उनकी विविध शक्तियाँ इतनी प्रबल हैं कि वे स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं और ज्ञान से परिपूर्ण हैं। हम देख सकते हैं कि एक पुष्प कैसे खिलता है, बढ़ता है और व्यवस्थित रूप से अनेक रंग प्रदर्शित करता है: एक ओर एक छोटा बिन्दु, दूसरी ओर एक छोटा बिन्दु, एक ओर श्वेत, दूसरी ओर अधिक श्वेत। तितली भी ऐसी कलात्मक समरूपता प्रदर्शित करती है। अतः यह सब चित्रित किया जा रहा है, किन्तु इतनी पूर्ण रीति से और इतनी द्रुत गति से कि हम देख ही नहीं पाते कि कैसे। हम समझ नहीं पाते कि यह कैसे किया जा रहा है, किन्तु यह भगवान् की शक्ति द्वारा किया जा रहा है।

ज्ञान के अभाव के कारण ही लोग कहते हैं कि ईश्वर मर चुका है, कि ईश्वर है ही नहीं, और कि ईश्वर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। इन विचारों की तुलना उस मनुष्य के विचारों से की गई है जो भूत से ग्रसित हो। जिस प्रकार भूतग्रस्त मनुष्य सब निरर्थक बातें बकता है, उसी प्रकार जब हम ईश्वर की मायावी शक्ति से ढक जाते हैं, तब हम कहते हैं कि ईश्वर मर चुका है। किन्तु यह तथ्य नहीं है। अतएव, हमें अपने हृदय को स्वच्छ करने हेतु इस जप-विधि की आवश्यकता है। हरे कृष्ण मन्त्र के जप की इस सरल विधि को अपनाइए। इस प्रकार, अपने गृहस्थ-जीवन में, अपने क्लब में, अपने घर में, मार्ग पर—सर्वत्र—हरे कृष्ण का जप कीजिए, और आपके हृदय को ढकने वाला, आपकी वास्तविक स्थिति को ढकने वाला यह अन्धकार दूर हो जाएगा। तब आप अपनी वास्तविक स्वरूपगत स्थिति को समझ पाएँगे।

भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अनुशंसा की: चेतो-दर्पण-मार्जनम् [चै.च. अन्त्य 20.12]। मार्जनम् का अर्थ है "स्वच्छ करना", और दर्पणम् का अर्थ है "दर्पण"। हृदय एक दर्पण है। यह एक कैमरे के समान है। जिस प्रकार कैमरा दिन-रात के सभी प्रकार के चित्र खींचता है, उसी प्रकार हमारा हृदय भी चित्र खींचता है और उन्हें एक अचेतन अवस्था में रख लेता है। मनोवैज्ञानिक यह जानते हैं। हृदय इतने सारे चित्र खींच लेता है, और इसी कारण वह ढक जाता है। हम नहीं जानते कि यह कब आरम्भ हुआ, किन्तु यह तथ्य है कि भौतिक सम्पर्क के कारण हमारी वास्तविक पहचान ढक जाती है। अतएव चेतो-दर्पण-मार्जनम्: मनुष्य को अपना हृदय स्वच्छ करना होता है। हृदय को स्वच्छ करने की विभिन्न विधियाँ हैं—ज्ञान-विधि, योग-विधि, ध्यान-विधि, पुण्य कर्म। कर्म भी हृदय को स्वच्छ करता है। यदि कोई अत्यन्त पुण्यपूर्वक कार्य करे, तो उसका हृदय धीरे-धीरे स्वच्छ हो जाएगा। किन्तु यद्यपि हृदय को स्वच्छ करने हेतु ये विधियाँ अनुशंसित हैं, फिर भी इस युग में ये सभी कठिन हैं। दार्शनिक ज्ञान के पथ का अनुसरण करने हेतु मनुष्य को अत्यन्त विद्वान् पण्डित बनना पड़ता है, इतने सारे ग्रन्थ पढ़ने पड़ते हैं, विद्वान् आचार्यों एवं पण्डितों के पास जाकर तर्क-वितर्क करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की खोज करनी पड़ती है जिसने प्रकाश देखा हो। तो ये सब दार्शनिक विधियाँ हैं। ध्यान भी एक अनुशंसित विधि है। मनुष्य को प्रश्न करना चाहिए, "मैं क्या हूँ?" केवल विचार कीजिए: क्या मैं यह शरीर हूँ? नहीं। क्या मैं यह उँगली हूँ? नहीं, यह मेरी उँगली है। यदि आप अपने पाँव पर ध्यान दें, तो आप पाएँगे, "ओह, यह मेरा पाँव है।" इसी प्रकार, आप प्रत्येक वस्तु को "मेरा" पाएँगे। और वह "मैं" कहाँ है? सब कुछ मेरा है, किन्तु वह "मैं" कहाँ है? जब कोई उस "मैं" की खोज करता है, वही ध्यान है। वास्तविक ध्यान का अर्थ है समस्त इन्द्रियों को उसी रीति से एकाग्र करना। किन्तु वह ध्यान-विधि अत्यन्त कठिन है। मनुष्य को इन्द्रियों का संयम करना होता है। इन्द्रियाँ मनुष्य को बाहर की ओर खींचती हैं, और उसे उन्हें अन्तर्मुखी करके आत्म-निरीक्षण की ओर लाना होता है। इसी कारण योग-पद्धति में आठ सोपान हैं। प्रथम है नियामक सिद्धान्तों द्वारा इन्द्रियों का संयम। फिर आसन—वह मन को एकाग्र करने में सहायक होगा। यदि कोई झुककर बैठे, तो वह सहायक नहीं होगा; यदि कोई सीधा तनकर बैठे, तो वह सहायक होगा। फिर श्वास का संयम, फिर ध्यान, फिर समाधि। किन्तु आज ये अत्यन्त, अत्यन्त कठिन विधियाँ हैं। कोई इन्हें तत्क्षण नहीं कर सकता। तथाकथित योग-विधियाँ खण्डित हैं—केवल आसन और कुछ श्वास-व्यायामों का ही अभ्यास किया जाता है। किन्तु वह मनुष्य को पूर्णता की अवस्था तक नहीं पहुँचा सकती। वास्तविक योग-विधि, यद्यपि एक अनुशंसित वैदिक विधि है, फिर भी इस युग में अत्यन्त कठिन है। इसी प्रकार मनुष्य तार्किक दार्शनिक विधि से ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकता है: "यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म नहीं है, तो फिर ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है?" ऐसी अनुभववादी दार्शनिक चर्चा भी अनुशंसित है, किन्तु इस युग में यह निरर्थक है।

अतः चैतन्य महाप्रभु—केवल चैतन्य महाप्रभु ही नहीं, अपितु वैदिक साहित्य भी—कहते हैं:

harer nāma harer nāma

harer nāmaiva kevalam

kalau nāsty eva nāsty eva

nāsty eva gatir anyathā

[चै.च. आदि 17.21]

कलौ का अर्थ है "इस युग में"। नास्त्य् एव, नास्त्य् एव, नास्त्य् एव—तीन बार नास्त्य् एव। एव का अर्थ है "निश्चय ही", और नास्ति का अर्थ है "नहीं"। "निश्चय ही नहीं, निश्चय ही नहीं, निश्चय ही नहीं।" वह "निश्चय ही नहीं" क्या है? मनुष्य कर्म से अपना साक्षात्कार नहीं कर सकता। यह पहला "निश्चय ही नहीं" है। मनुष्य ज्ञान से अपना साक्षात्कार नहीं कर सकता। यह दूसरा "निश्चय ही नहीं" है। मनुष्य योग से अपना साक्षात्कार नहीं कर सकता। निश्चय ही नहीं। कलौ। कलौ का अर्थ है "इस युग में"। कलौ नास्त्य् एव नास्त्य् एव नास्त्य् एव गतिर् अन्यथा। इस युग में मनुष्य निश्चय ही इन तीनों में से किसी विधि द्वारा सफलता नहीं पा सकता। तो फिर अनुशंसित विधि क्या है? हरेर् नाम हरेर् नाम हरेर् नामैव केवलम् [चै.च. आदि 17.21]। केवल हरे कृष्ण मन्त्र का जप कीजिए। केवलम् का अर्थ है "केवल"। केवल हरे कृष्ण का जप कीजिए। यह सरलतम तथा परम उदात्त विधि है। यह अनुशंसित, व्यावहारिक तथा प्रामाणिक है। अतः इसे अपनाइए। जीवन की किसी भी दशा में इसे स्वीकार कीजिए। जप कीजिए। इसमें कोई व्यय नहीं है, कोई हानि नहीं है। हम कोई गुप्त वस्तु का जप नहीं कर रहे। नहीं। यह खुला हुआ है। और जप करने से आप अपना हृदय स्वच्छ कर लेंगे।

इस भौतिक जगत् में कोई दुःख नहीं चाहता, फिर भी वह आता है। अप्रत्याशित रूप से, उस दावानल के समान जो किसी के माचिस जलाए बिना ही भड़क उठता है, वह आता है। कोई युद्ध नहीं चाहता, फिर भी युद्ध लड़े जाते हैं। कोई अकाल नहीं चाहता, फिर भी अकाल आता है। कोई महामारी नहीं चाहता, फिर भी वह आती है। कोई झगड़ा नहीं चाहता, फिर भी झगड़ा होता है। कोई ग़लतफ़हमी नहीं चाहता, फिर भी वह होती है। क्यों? यह वन में धधकती अग्नि के समान है। और इसे अग्निशमन-यन्त्रों से नहीं बुझाया जा सकता। समस्याओं की यह धधकती अग्नि हमारी तथाकथित ज्ञान की उन्नति से नहीं बुझाई जा सकती। नहीं। यह सम्भव नहीं है। जिस प्रकार मनुष्य अग्निशमन-यन्त्र भेजकर अथवा थोड़ा जल लाकर किसी दावानल को नहीं बुझा सकता, उसी प्रकार हमारे जीवन की समस्याएँ भौतिक विधियों से हल नहीं की जा सकतीं।

अनेक उदाहरण हैं। प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "हे मेरे प्रभु, वस्तुतः माता-पिता बालकों के रक्षक नहीं हैं।" माता-पिता अपने बालकों की देखभाल करते हैं; यह उनका कर्तव्य है। किन्तु वे परम रक्षक नहीं हैं। जब प्रकृति का नियम बालक को बुलाता है, तब माता-पिता उसकी रक्षा नहीं कर सकते। अतएव यद्यपि सामान्यतः यह तथ्य माना जाता है कि माता-पिता बालक के रक्षक हैं, वस्तुतः यह तथ्य नहीं है। यदि कोई समुद्र में नौकायन कर रहा हो और वह सोचे कि उसके पास अत्यन्त उत्तम आसन है, तो क्या वह उसकी रक्षा करेगा? नहीं। फिर भी वह डूब सकता है। एक उत्तम वायुयान आकाश में उड़ रहा है, सभी सुरक्षित हैं, किन्तु अकस्मात् वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। कोई भी भौतिक वस्तु हमारी रक्षा नहीं कर सकती। मान लीजिए कोई रोगग्रस्त है। वह किसी अच्छे चिकित्सक को नियुक्त कर सकता है जो अच्छी औषधि देता है, किन्तु इससे यह आश्वासन नहीं मिलता कि वह जीवित रहेगा। तो फिर परम आश्वासन क्या है? प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "हे मेरे प्रभु, यदि आप किसी की उपेक्षा कर दें, तो कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता।"

यह हमारा व्यावहारिक अनुभव है। हम भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा प्रस्तुत समस्याओं को हल करने हेतु अनेक विधियाँ आविष्कृत कर सकते हैं, किन्तु वे पर्याप्त नहीं हैं। वे न तो कभी समस्त समस्याओं को हल करेंगी, और न ही वास्तविक राहत देंगी। यह तथ्य है। अतएव श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, "माया, यह बहिरंगा शक्ति, अत्यन्त, अत्यन्त प्रबल है। कोई इसे पार नहीं कर सकता। यह प्रायः असम्भव है।" तो फिर मनुष्य इस भौतिक प्रकृति से कैसे मुक्त हो सकता है? श्रीकृष्ण कहते हैं, "केवल मेरी शरण ग्रहण करने मात्र से मनुष्य भौतिक प्रकृति के आक्रमण से राहत पा सकता है।" यह तथ्य है। अतः हमें यह जानने हेतु अपना हृदय स्वच्छ करना होगा कि ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है।

कठोपनिषद् में कहा गया है, नित्यो नित्यानां चेतनश् चेतनानाम्। परम परब्रह्म भगवान्, अर्थात् परम सत्य, नित्य हैं। ईश्वर नित्य हैं, और हम भी नित्य हैं। किन्तु वेद बताते हैं कि वे परम जीवित सत्ता हैं। वे मृत नहीं हैं। यदि वे जीवित नहीं हैं, तो यह संसार कैसे चल रहा है? भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, "मेरे अधीक्षण में सब कुछ चल रहा है।" बाइबिल में भी कहा गया है, "ईश्वर ने सृष्टि की।" यह तथ्य है। ऐसा नहीं कि किसी समय एक पिण्ड था और फिर यह हुआ और फिर वह हुआ। नहीं। वेद हमें वास्तविक तथ्य बताते हैं, किन्तु देखने हेतु हमें अपनी आँखें खोलनी होंगी। चेतो-दर्पण-मार्जनम् [चै.च. अन्त्य 20.12]। यही हमारे हृदय को स्वच्छ करने की विधि है। जब हम अपने हृदय को स्वच्छ कर लेते हैं, तब हम समझ पाएँगे कि श्रीकृष्ण और वेद क्या कहते हैं। हमें शुद्ध होने की आवश्यकता है। यदि कोई मनुष्य पीलिया से पीड़ित हो और आप उसे मिश्री का एक टुकड़ा दें, तो वह कहेगा कि यह अत्यन्त कड़वा है। किन्तु क्या मिश्री कड़वी होती है? नहीं, वह अत्यन्त मधुर होती है। और पीलिया की औषधि वही मिश्री है। आधुनिक विज्ञान यही निर्धारित करता है, और वैदिक साहित्य में भी यही निर्धारित है। अतः यदि हम इस मिश्री की बड़ी मात्रा ग्रहण करें, तो हमें पीलिया से राहत मिल जाएगी। और जब राहत मिलती है, तब मनुष्य कहता है, "ओह, यह तो अत्यन्त मधुर है।" अतः निरीश्वरवादी सभ्यता का यह आधुनिक पीलिया हरे कृष्ण के इस जप द्वारा ठीक किया जा सकता है। आरम्भ में यह कड़वा प्रतीत हो सकता है, किन्तु जब मनुष्य उन्नत होता है, तब वह देखेगा कि यह कितना सुखद है।

जैसे ही मनुष्य अपनी पहचान को, ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझ लेता है, वैसे ही वह तत्क्षण सुखी हो जाता है। हम इतने सारे दुःखों से भरे हुए हैं क्योंकि हमने स्वयं को भौतिक जगत् के साथ अभिन्न मान लिया है। इसी कारण हम दुःखी हैं। चिन्ता तथा भय भौतिक जगत् के साथ अपनी मिथ्या पहचान के कारण हैं। उस दिन मैं समझा रहा था कि जो हड्डी एवं चर्म के इस थैले के साथ अपनी पहचान बनाता है, वह पशु के समान है। अतः हरे कृष्ण के जप से यह ग़लतफ़हमी दूर हो जाएगी। हृदय की स्वच्छता का अर्थ है कि मनुष्य समझ जाएगा कि वह इस भौतिक जगत् का नहीं है। अहं ब्रह्मास्मि: मैं आत्मा हूँ। जब तक मनुष्य स्वयं को इंग्लैंड के साथ, भारत के साथ अथवा अमेरिका के साथ अभिन्न मानता है, यह अज्ञान है। आज आप अंग्रेज़ हैं क्योंकि आपका जन्म इंग्लैंड में हुआ, किन्तु अपने अगले जीवन में सम्भव है आपका जन्म इंग्लैंड में न हो; वह चीन में, रूस में अथवा किसी अन्य देश में हो सकता है। अथवा सम्भव है आपको यह मानव शरीर ही न मिले। आज आप राष्ट्रवादी हैं, आप अपने देश के अत्यन्त प्रबल अनुयायी हैं, किन्तु कल यदि आप अपने ही देश में रहें, तो सम्भव है आप एक गाय हों जिसे वधशाला की ओर ले जाया जा रहा हो।

अतः हमें अपनी पहचान को भली-भाँति जानना होगा। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि प्रत्येक प्राणी की वास्तविक पहचान यह है कि वह ईश्वर का नित्य सेवक है। यदि कोई इस प्रकार सोचे—"मैं और किसी का सेवक नहीं हूँ; मेरा कार्य ईश्वर की सेवा करना है"—तो वह मुक्त है। उसका हृदय तत्क्षण स्वच्छ हो जाता है, और वह मुक्त हो जाता है। और जब मनुष्य उस अवस्था तक पहुँच जाता है, तब इस संसार की उसकी समस्त चिन्ताएँ एवं व्यग्रताएँ समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि वह जानता है, "मैं ईश्वर का सेवक हूँ। ईश्वर मुझे रक्षा प्रदान करेंगे। फिर मैं किसी बात की चिन्ता क्यों करूँ?" यह ठीक एक बालक के समान है। बालक जानता है कि उसके माता-पिता उसकी देखभाल करेंगे। वह निश्चिन्त है। यदि वह अग्नि को छूने जाए, तो उसकी माता उसकी रक्षा करेगी: "ओह, मेरे प्यारे बच्चे, मत छुओ।" माता सदा उसकी देखभाल करती रहती है। तो फिर आप ईश्वर पर अपना विश्वास क्यों नहीं रखते? वस्तुतः, आप ईश्वर की रक्षा में ही हैं।

लोग गिरजे में जाकर कहते हैं, "हे ईश्वर, हमें हमारी प्रतिदिन की रोटी दे।" वस्तुतः, यदि वे हमें वह न दें, तो हम जीवित ही न रह पाएँ। यह तथ्य है। वेद भी कहते हैं कि एक परम पुरुष ही प्रत्येक अन्य प्राणी की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। ईश्वर प्रत्येक को भोजन प्रदान कर रहे हैं। हम मनुष्यों की अपनी आर्थिक समस्या है, किन्तु मानव-समाज के अतिरिक्त अन्य समाजों में कौन-सी आर्थिक समस्या है? पक्षी-समाज में कोई आर्थिक समस्या नहीं है। जीवन की योनियाँ, और उनमें से, मानव-समाज अत्यन्त, अत्यन्त छोटा है। तो उन्होंने ही समस्याएँ खड़ी कर ली हैं—क्या खाएँ, कहाँ सोएँ, कैसे मैथुन करें, कैसे रक्षा करें। ये हमारे लिए समस्या हैं, किन्तु अधिकांश प्राणियों—जलचरों, मछलियों, पौधों, कीटों, पक्षियों, पशुओं तथा अन्य करोड़ों-करोड़ों प्राणियों—के लिए ऐसी कोई समस्या नहीं है। वे भी प्राणी हैं। यह मत सोचिए कि वे हमसे भिन्न हैं। यह सत्य नहीं है कि हम मनुष्य ही एकमात्र प्राणी हैं और अन्य सभी मृत हैं। नहीं। और उनका भोजन एवं आश्रय कौन प्रदान कर रहा है? वह ईश्वर है। पौधे एवं पशु कार्यालय नहीं जाते। वे धन कमाने हेतु तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने विश्वविद्यालय नहीं जाते। तो फिर वे कैसे खाते हैं? ईश्वर प्रदान कर रहे हैं। हाथी सैकड़ों पाउंड भोजन खाता है। कौन प्रदान कर रहा है? क्या आप हाथी के लिए प्रबन्ध कर रहे हैं? करोड़ों हाथी हैं। कौन प्रदान कर रहा है?

अतः यह स्वीकार करने की विधि कि ईश्वर प्रदान कर रहे हैं, इस सोच से श्रेष्ठ है कि "ईश्वर मर चुका है। हम रोटी के लिए गिरजे जाकर ईश्वर से प्रार्थना क्यों करें?" भगवद्गीता में कहा गया है, "चार प्रकार के लोग श्रीकृष्ण के पास आते हैं: दुःखी, धन के अभावग्रस्त, ज्ञानी तथा जिज्ञासु।" जो जिज्ञासु है, जो ज्ञानी है, जो दुःखी है, और जो धन का अभावग्रस्त है—ये चार वर्ग के मनुष्य ईश्वर के समीप आते हैं। "हे मेरे प्रभु, मैं अत्यन्त भूखा हूँ। मुझे मेरी प्रतिदिन की रोटी दे।" यह अच्छा है। जो इस प्रकार ईश्वर के समीप आते हैं, उन्हें सुकृतिनः कहकर अनुशंसित किया गया है। सुकृती का अर्थ है "पुण्यात्मा"। वे पुण्यात्मा हैं। यद्यपि वे धन के लिए, भोजन के लिए माँग रहे हैं, फिर भी उन्हें पुण्यात्मा माना जाता है क्योंकि वे ईश्वर के समीप आ रहे हैं। और अन्य ठीक इसके विपरीत हैं। वे दुष्कृतिनः, अर्थात् पापी हैं। कृती का अर्थ है "अत्यन्त गुणवान्", किन्तु दुष्कृती शब्द यह संकेत करता है कि उनकी ऊर्जा का अनर्थ रचने हेतु दुरुपयोग किया जा रहा है। ठीक उस मनुष्य के समान जिसने आणविक अस्त्रों का आविष्कार किया। उसके पास बुद्धि है, किन्तु उसका दुरुपयोग किया गया है। उसने कोई ऐसी वस्तु रच दी है जो भयानक है। कोई ऐसी वस्तु रचिए जो सुनिश्चित करे कि मनुष्य को अब और मरना न पड़े। ऐसी वस्तु रचने का क्या लाभ है जिससे करोड़ों लोग तत्क्षण मर जाएँगे? वे आज मरेंगे या कल या सौ वर्ष बाद। तो वैज्ञानिकों ने क्या किया? कोई ऐसी वस्तु रचिए जिससे मनुष्य तत्क्षण न मरे, जिससे अब और रोग न रहे, जिससे अब और वृद्धावस्था न रहे। तब आपने कुछ किया होगा। किन्तु दुष्कृती कभी ईश्वर के पास नहीं जाते। वे कभी ईश्वर को समझने का प्रयत्न नहीं करते। इसी कारण उनकी ऊर्जा कुमार्गगामी हो जाती है।

जो स्थूल भौतिकतावादी ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की उपेक्षा करते हैं, उनका वर्णन भगवद्गीता में मूढ़ों के रूप में किया गया है। मूढ़ का अर्थ है "गधा", "खच्चर"। जो धन कमाने हेतु अत्यन्त, अत्यन्त कठिन परिश्रम कर रहे हैं, उनकी तुलना गधे से की जाती है। वे प्रतिदिन वही चार चपातियाँ खाएँगे, फिर भी वे सहस्रों डॉलर कमाने हेतु अनावश्यक परिश्रम कर रहे हैं। और अन्य का वर्णन नराधम के रूप में किया गया है। नराधम का अर्थ है "मनुष्यों में नीचतम"। यह मानव-जीवन ईश्वर-साक्षात्कार के लिए है। ईश्वर का साक्षात्कार करने का प्रयत्न करना मनुष्य का अधिकार है। जो ब्रह्म को, ईश्वर को समझ लेता है, वही ब्राह्मण है, अन्य नहीं। अतः यही इस मानव-जीवन का कर्तव्य है। प्रत्येक मानव-समाज में कोई न कोई व्यवस्था है जिसे "धर्म" कहा जाता है और जिसके द्वारा मनुष्य ईश्वर को समझने का प्रयत्न कर सकता है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वह ईसाई धर्म हो, मुसलमानी धर्म हो, अथवा हिन्दू धर्म। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। व्यवस्था ईश्वर को तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध को समझने की है। बस इतना ही। यह मनुष्यों का कर्तव्य है, और यदि मानव-समाज में इस कर्तव्य की उपेक्षा की जाए, तो वह पशु-समाज है। पशुओं में यह समझने की शक्ति नहीं है कि ईश्वर क्या है और ईश्वर के साथ उनका सम्बन्ध क्या है। उनकी एकमात्र रुचि खाने, सोने, मैथुन करने तथा रक्षा करने में है। यदि हम भी केवल इन्हीं बातों से सरोकार रखते हैं, तो हम क्या हैं? हम पशु हैं। इसी कारण भगवद्गीता कहती है कि जो इस अवसर की उपेक्षा करते हैं, वे "मनुष्यों में नीचतम" हैं। उन्हें जन्म मिले, फिर भी उन्होंने उनका उपयोग ईश्वर-साक्षात्कार हेतु न करके केवल पाशविक प्रवृत्तियों हेतु किया। इसी कारण वे नराधम, अर्थात् मनुष्यों में नीचतम हैं। और कुछ अन्य व्यक्ति हैं जो अपने ज्ञान पर अत्यन्त गर्व करते हैं। किन्तु वह ज्ञान क्या है? "ईश्वर है ही नहीं। मैं ही ईश्वर हूँ।" उनका वास्तविक ज्ञान माया ने हर लिया है। यदि वे ईश्वर हैं, तो वे कुत्ता कैसे बन गए? उनके विरुद्ध इतने सारे तर्क हैं, फिर भी वे केवल ईश्वर की अवहेलना करते हैं। नास्तिकता। चूँकि उन्होंने नास्तिकता की विधि को अपना लिया है, अतः उनका वास्तविक ज्ञान चुरा लिया गया है। वास्तविक ज्ञान का अर्थ है यह जानना कि ईश्वर क्या है और ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है। यदि कोई इसे नहीं जानता, तो यह समझना चाहिए कि उसका ज्ञान माया ने हर लिया है।

अतः इस प्रकार, यदि हम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न करें, तो उसके उपाय एवं साधन हैं। ग्रन्थ हैं, और ज्ञान है, तो फिर इनका लाभ क्यों न उठाएँ? प्रत्येक व्यक्ति को इस ज्ञान का लाभ उठाना चाहिए। यह समझने का प्रयत्न कीजिए कि भगवद्गीता तथा अन्य वैदिक साहित्य में, सर्वत्र, यह कहा गया है कि ईश्वर महान् हैं और यद्यपि हम गुणतः ईश्वर के साथ एक हैं, फिर भी हम अणु-मात्र हैं। समुद्र तथा जल के सूक्ष्म कण का गुण एक ही है, किन्तु जल की बूँद में नमक की मात्रा तथा समुद्र में नमक की मात्रा भिन्न है। वे गुणतः एक हैं किन्तु मात्रा में भिन्न। इसी प्रकार, ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं, और हममें कुछ शक्ति है। ईश्वर सब कुछ रचते हैं, और हम उड़ने हेतु एक छोटा यन्त्र रच सकते हैं, ठीक उन छोटे यन्त्रों के समान जिनसे बालक खेलते हैं। किन्तु ईश्वर करोड़ों ग्रहों को आकाश में उड़ता हुआ रच सकते हैं। यही ईश्वर की योग्यता है। आप कोई ग्रह नहीं रच सकते। और यदि आप कोई ग्रह रच भी सकें, तो उसका क्या लाभ है? ईश्वर द्वारा रचे गए करोड़ों ग्रह हैं। किन्तु आपमें भी सृजन-शक्ति है। ईश्वर में शक्ति है, और आपमें शक्ति है। किन्तु उनकी शक्ति इतनी महान् है कि आपकी शक्ति उससे तुलनीय नहीं है। यदि आप कहें, "मैं ही ईश्वर हूँ", तो यह मूर्खता है। आप दावा कर सकते हैं कि आप ईश्वर हैं, किन्तु आपने ऐसे कौन-से असाधारण कार्य किए हैं कि आप दावा कर सकें कि आप ईश्वर हैं? यह अज्ञान है। जो स्वयं को ईश्वर समझता है, उसका ज्ञान माया के मायाजाल ने हर लिया है। अतः हमारा सम्बन्ध यह है कि ईश्वर महान् हैं और हम अणु-मात्र हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं, "समस्त जीव मेरे अंश हैं। गुणतः वे मेरे साथ एक हैं, किन्तु मात्रा में भिन्न हैं।" अतः हम एक साथ ही ईश्वर के साथ एक भी हैं और भिन्न भी। यही हमारा सम्बन्ध है। हम एक हैं क्योंकि हममें ईश्वर के समान ही गुण हैं। किन्तु यदि हम स्वयं का सूक्ष्मता से अध्ययन करें, तो हम पाएँगे कि यद्यपि हममें कुछ महान् गुण हैं, फिर भी ईश्वर में वे सभी अधिक मात्रा में विद्यमान हैं।

हममें कोई ऐसी वस्तु नहीं हो सकती जो ईश्वर में न हो। यह सम्भव नहीं है। अतएव वेदान्त-सूत्र में कहा गया है कि जो कुछ हममें है, वह ईश्वर में भी पाया जाता है। वह ईश्वर से ही निःसृत हो रहा है। अतः हमारा सम्बन्ध यह है कि चूँकि हम छोटे हैं, चूँकि हम अणु-मात्र हैं, इसलिए हम ईश्वर के नित्य सेवक हैं। इस भौतिक जगत् में भी, साधारण व्यवहार में, हम देखते हैं कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की सेवा करने जाता है क्योंकि वह दूसरा मनुष्य उससे बड़ा है और उसे अच्छा वेतन दे सकता है। अतः स्वाभाविक निष्कर्ष यह है कि यदि हम छोटे हैं, तो हमारा कर्तव्य ईश्वर की सेवा करना है। हमारा और कोई कार्य नहीं है। हम सभी मूल सत्ता के विभिन्न अंश हैं।

जो पेंच किसी यन्त्र से जुड़ा है, वह मूल्यवान् है क्योंकि वह सम्पूर्ण यन्त्र के साथ कार्य कर रहा है। और यदि पेंच को यन्त्र से अलग कर दिया जाए, अथवा यदि वह त्रुटिपूर्ण हो, तो वह व्यर्थ है। मेरी उँगली तब तक करोड़ों डॉलर के मूल्य की है जब तक वह इस शरीर से जुड़ी है और शरीर की सेवा कर रही है। और यदि उसे इस शरीर से काट दिया जाए, तो उसका क्या मूल्य है? कुछ नहीं। इसी प्रकार, हमारा सम्बन्ध यह है कि हम ईश्वर के अत्यन्त छोटे कण हैं; इसलिए हमारा कर्तव्य अपनी ऊर्जाओं को उनके साथ संयोजित करना और उनके साथ सहयोग करना है। यही हमारा सम्बन्ध है। अन्यथा हम व्यर्थ हैं। हम कट चुके हैं। जब उँगली निरर्थक हो जाती है, तब चिकित्सक कहता है, "ओह, इस उँगली को काट दो। अन्यथा शरीर में विष फैल जाएगा।" इसी प्रकार, जब हम ईश्वरविहीन हो जाते हैं, तब हम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध से कट जाते हैं और इस भौतिक जगत् में कष्ट भोगते हैं। यदि हम पुनः परमेश्वर के साथ जुड़ने का प्रयत्न करें, तो हमारा सम्बन्ध पुनर्जीवित हो जाता है।

## सर्वोच्च प्रेम

"प्रेम।" गायक इसके विषय में मधुर गीत गाते हैं, कवि इसमें आनन्दित होते हैं, उपन्यासकार इसके विषय में जटिल कथाएँ बुनते हैं। चलचित्र तथा दूरदर्शन इससे ओतप्रोत हैं। किन्तु क्या यह वास्तविक है? इस सुस्पष्ट निबन्ध में, श्रील प्रभुपाद तर्क प्रस्तुत करते हैं कि जिस प्रेम का अनुभव हम इस भौतिक जगत् में करते हैं, वह एक भ्रम पर आधारित है और, यहाँ की प्रत्येक अन्य वस्तु के समान, क्षणभंगुर है। फिर भी एक "सर्वोच्च प्रेम" है—जिसकी कल्पना लौकिक रोमांसकारों ने कभी नहीं की।

यदि कोई भक्ति की कोमल लता की भली-भाँति रक्षा करे, तो वह धीरे-धीरे ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का फल उत्पन्न करती है। ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का अर्थ है वह प्रेम जो न तो भौतिक लाभ की इच्छा से, न मात्र दार्शनिक समझ की इच्छा से, और न ही सकाम परिणामों की इच्छा से रंजित हो। अनन्य प्रेम यह जानना है कि "ईश्वर महान् हैं, मैं उनका अंश हूँ, और इसी कारण वे मेरे परम प्रेमास्पद हैं।" यह चेतना मानव-जीवन की सर्वोच्च पूर्णता तथा आत्म-साक्षात्कार की समस्त विधियों का परम लक्ष्य है। यदि कोई इस बिन्दु तक पहुँच जाए—ईश्वर ही मेरे एकमात्र प्रियतम हैं, श्रीकृष्ण ही एकमात्र प्रेमास्पद हैं—तो उसका जीवन पूर्ण हो जाता है। और जब कोई श्रीकृष्ण के साथ उस दिव्य सम्बन्ध का आस्वादन करता है, तब वह वास्तविक सुख का अनुभव करता है। तब वह भक्ति की लता इतनी दृढ़ता से सुरक्षित हो जाएगी कि उसे केवल पकड़ लेने मात्र से मनुष्य परम गन्तव्य तक पहुँच सकेगा। यदि कोई किसी वृक्ष पर अटल रूप से चढ़ता जाए, तो वह अन्ततः उसकी सर्वोच्च चोटी तक पहुँच जाता है। इसी प्रकार, यदि कोई उस भक्ति-लता को पकड़कर ईश्वर-प्रेम प्राप्त कर सके, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह श्रीकृष्ण के दिव्य धाम तक पहुँचेगा और उनके साथ साक्षात् रूप से संग करेगा, ठीक जैसे हम यहाँ आमने-सामने संग कर रहे हैं।

ईश्वर काल्पनिक अथवा मनगढ़न्त नहीं हैं। वे उतने ही वास्तविक हैं जितने हम। (वस्तुतः, हम भ्रम के अधीन हैं; हम इस प्रकार जी रहे हैं मानो यह शरीर ही हमारा वास्तविक स्वरूप हो, यद्यपि यह शरीर तनिक भी वास्तविकता नहीं है, अपितु केवल एक क्षणभंगुर अभिव्यक्ति है।) हम यह मानने का दुस्साहस करते हैं कि ईश्वर है ही नहीं अथवा उनका कोई रूप नहीं है। यह मानसिक कल्पना ज्ञान के दरिद्र भण्डार के कारण है। भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनका धाम विद्यमान हैं, और मनुष्य वहाँ जा सकता है, उन तक पहुँच सकता है, और उनके साथ संग कर सकता है। यह तथ्य है। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है परमेश्वर के संग में रहना और आनन्द एवं ज्ञान में नित्य रूप से विद्यमान रहना। ऐसे नित्य संग का अर्थ है श्रीकृष्ण के साथ खेलना, श्रीकृष्ण के साथ नृत्य करना तथा श्रीकृष्ण से प्रेम करना। अथवा श्रीकृष्ण आपके पुत्र बन सकते हैं—जो भी आप चाहें।

श्रीकृष्ण के साथ पाँच प्रमुख सम्बन्ध हैं: निष्क्रिय भक्त के रूप में, सेवक के रूप में, मित्र के रूप में, माता-पिता के रूप में, तथा प्रेमी के रूप में। श्रीकृष्ण के धाम की गौएँ भी मुक्त आत्माएँ हैं। उन्हें सुरभि गौएँ कहा जाता है। अनेक लोकप्रिय चित्र हैं जो दर्शाते हैं कि श्रीकृष्ण किस प्रकार गौओं से प्रेम करते हैं, किस प्रकार वे उनका आलिंगन करते हैं और उन्हें चूमते हैं। श्रीकृष्ण के साथ उस निष्क्रिय सम्बन्ध को शान्त कहा जाता है। उनका पूर्ण सुख तब प्राप्त होता है जब श्रीकृष्ण आकर उन्हें केवल स्पर्श करते हैं।

अन्य भक्तगण वास्तव में सेवा अर्पित करने की ओर प्रवृत्त रहते हैं। वे सोचते हैं, "श्रीकृष्ण बैठना चाहते हैं। मैं उनके लिए स्थान का प्रबन्ध करूँगा। श्रीकृष्ण भोजन करना चाहते हैं। मैं उनके लिए कोई उत्तम भोजन लाऊँगा।" और वे वास्तव में ये प्रबन्ध करते हैं। अन्य भक्तगण श्रीकृष्ण के साथ समानता के स्तर पर मित्र के रूप में खेलते हैं। वे नहीं जानते कि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं; उनके लिए श्रीकृष्ण उनके प्रेमास्पद मित्र हैं, और वे एक क्षण के लिए भी उन्हें भुला नहीं सकते। दिन-भर तथा रात-भर वे श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं। रात्रि में, जब वे सो रहे होते हैं, तब वे सोचते हैं, "ओह, प्रातःकाल मैं जाकर श्रीकृष्ण के साथ खेलूँगा।" और प्रातःकाल वे श्रीकृष्ण के घर जाते हैं और प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं, जब श्रीकृष्ण की माता उन्हें मैदानों में अपने मित्रों के साथ खेलने जाने से पूर्व सजाती हैं। कृष्णलोक (श्रीकृष्ण के धाम) में और कोई गतिविधि नहीं है। वहाँ कोई उद्योग नहीं है, कार्यालय की ओर भागदौड़ नहीं है, अथवा ऐसी कोई निरर्थक बात नहीं है। वहाँ पर्याप्त दूध एवं मक्खन है, और प्रत्येक व्यक्ति प्रचुरता से खाता है। श्रीकृष्ण को अपने मित्र अत्यन्त प्रिय हैं, और कभी-कभी वे उनके लिए मक्खन चुराने का आनन्द लेते हैं। मनुष्य वास्तव में इस प्रकार जी सकता है, और यही अस्तित्व की पूर्णता है। हमें जीवन की उस पूर्णता की अवस्था के लिए लालायित होना चाहिए। कृष्णभावनामृत उसे प्राप्त करने की विधि है।

किन्तु जब तक मनुष्य में इस भौतिक जगत् के प्रति तनिक-सी भी आसक्ति है, तब तक उसे यहीं रहना होगा। श्रीकृष्ण अत्यन्त कठोर हैं। वे किसी ऐसे व्यक्ति को अपने संग में प्रवेश करने नहीं देते जिसमें जीवन की भौतिक धारणा का तनिक भी अंश हो। भक्ति भौतिक कल्मष से मुक्त होनी चाहिए। यह मत सोचिए, "मैं एक अत्यन्त विद्वान् पण्डित हूँ। मैं मानसिक कल्पना द्वारा खोज निकालूँगा कि परम सत्य क्या है।" यह निरर्थक है; मनुष्य कल्पना करता ही चला जाए और फिर भी समस्त स्रोतों के स्रोत को कभी नहीं पाएगा। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, "मनुष्य करोड़ों-करोड़ों वर्षों तक परम सत्य के विषय में कल्पना करता रह सकता है, और फिर भी वह प्रकट नहीं होगा।" मनुष्य जैसा है वैसा ही इस भौतिक जगत् में सड़ सकता है और कल्पना करता चला जा सकता है, किन्तु वह सही विधि नहीं है। यहाँ वह विधि है—भक्तियोग।

भगवान् चैतन्य कहते हैं कि श्रीकृष्ण की भक्ति-सेवा करना जीवन की सर्वोच्च पूर्णता की अवस्था है, और इसकी तुलना में, अन्य वस्तुएँ जिनके लिए लोग इस भौतिक जगत् में लालायित रहते हैं, समुद्र के बुलबुलों के समान हैं। सामान्यतः, लोग पुरस्कारों के पीछे रहते हैं, और इसी कारण वे धार्मिक बनते हैं। वे कहते हैं, "मैं हिन्दू हूँ," "मैं ईसाई हूँ," "मैं यहूदी हूँ," "मैं मुसलमान हूँ," "मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, और इसी कारण मैं अपना धर्म नहीं बदल सकता। मैं श्रीकृष्ण को स्वीकार नहीं कर सकता।" इसे धार्मिकता, अर्थात् धर्म कहा जाता है। धर्म की ऐसी भौतिकतावादी, सम्प्रदायवादी धारणा के साथ, वे कर्मकाण्डों एवं श्रद्धा से चिपके हुए इस भौतिक जगत् में सड़ते रहेंगे। वे इस धारणा के अधीन हैं कि यदि वे अपने धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करें, तो उन्हें भौतिक समृद्धि प्राप्त होगी। निस्सन्देह, यदि कोई किसी भी प्रकार की धार्मिक श्रद्धा से चिपका रहे, तो उसे भौतिक जीवन की सुविधाएँ मिल जाएँगी।

लोग यह भौतिक समृद्धि क्यों चाहते हैं? इन्द्रियतृप्ति के लिए। वे सोच रहे हैं, "मेरी एक अत्यन्त सुन्दर पत्नी होगी। मेरी अत्यन्त अच्छी सन्तानें होंगी। मेरा एक अत्यन्त अच्छा पद होगा। मैं राष्ट्रपति बनूँगा। मैं प्रधानमन्त्री बनूँगा।" यह इन्द्रियतृप्ति है। और जब मनुष्य निराश हो जाता है और देख लेता है कि धनी होना अथवा राष्ट्रपति-पद प्राप्त करना उसे सुख नहीं दे सकता, यौन-जीवन के समस्त रस को निचोड़ लेने के पश्चात्, जब वह पूर्णतः निराश हो जाता है, तब सम्भव है वह एलएसडी का सहारा लेकर शून्य के साथ एक हो जाने का प्रयत्न करे। किन्तु यह निरर्थक बात सुख नहीं दे सकती। यहाँ सुख है: मनुष्य को श्रीकृष्ण के समीप जाना ही होगा। अन्यथा, यह एलएसडी की उलझन तथा निर्विशेष शून्य की धारणाओं में भटकने में ही समाप्त हो जाएगा। लोग निराश हैं। यदि उनके पास सच्चा आध्यात्मिक जीवन नहीं है तो वे अवश्य ही निराश होंगे, क्योंकि व्यक्ति स्वभाव से आध्यात्मिक है।

श्रीकृष्ण के बिना कोई कैसे सुखी हो सकता है? मान लीजिए किसी को समुद्र में फेंक दिया जाए। वह वहाँ कैसे सुखी हो सकता है? वह हमारे लिए नहीं है। कोई अत्यन्त अच्छा तैराक हो सकता है, किन्तु वह कितने समय तक तैर पाएगा? वह अन्ततः थक जाता है और डूब जाता है। इसी प्रकार, हम स्वभाव से आध्यात्मिक हैं। हम इस भौतिक जगत् में कैसे सुखी हो सकते हैं? यह सम्भव नहीं है। किन्तु मनुष्य यहाँ बने रहने का प्रयत्न करते हैं, जीवित रहने हेतु इतने सारे क्षणभंगुर समायोजन करते हुए। यह जोड़-तोड़ सुख नहीं है। यदि कोई वास्तव में सुख चाहता है, तो यहाँ वह विधि है: मनुष्य को ईश्वर-प्रेम प्राप्त करना ही होगा। जब तक मनुष्य श्रीकृष्ण से प्रेम न कर सके, जब तक वह बिल्लियों, कुत्तों, देश, राष्ट्र तथा समाज के प्रति प्रेम से मुक्त न हो जाए और इसके स्थान पर अपना प्रेम श्रीकृष्ण पर एकाग्र न कर ले, तब तक सुख का प्रश्न ही नहीं उठता। रूप गोस्वामी ने इस सम्बन्ध में एक अत्यन्त सुन्दर उदाहरण दिया है: अनेक मादक द्रव्य हैं जो मनुष्य को विचारों अथवा मतिभ्रमों से भर देते हैं। किन्तु रूप गोस्वामी कहते हैं कि जब तक मनुष्य ईश्वर-प्रेम के उस अन्तिम मादक द्रव्य, अर्थात् कृष्ण-प्रेमा का आस्वादन न करे, तब तक उसे ध्यान, निर्विशेष अद्वैतवाद तथा अन्य अनेक विभ्रमों द्वारा मोहित होना पड़ेगा।

चैतन्य महाप्रभु वर्णन करते हैं कि श्रीकृष्ण का अनन्य प्रेम प्राप्त करने हेतु मनुष्य को भक्ति-सेवा, अर्थात् कृष्णभावनामृत का सम्पादन करना होता है। मनुष्य को अपने आपको अनन्य रूप से श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न करना होता है। अनन्य भक्ति की सर्वोच्च पूर्णता की अवस्था है समस्त भौतिक इच्छाओं, समस्त मानसिक कल्पना तथा समस्त सकाम कर्मों से मुक्त होना। अनन्य भक्ति का मूल सिद्धान्त यह है कि मनुष्य पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होने के अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं रख सकता। यद्यपि कोई यह जान भी ले कि ईश्वर के अन्य समस्त रूप भी श्रीकृष्ण ही हैं, फिर भी उसे किसी अन्य रूप की आराधना नहीं करनी चाहिए, अपितु श्रीकृष्ण के रूप पर ही एकाग्र होना चाहिए। श्रीकृष्ण के अनेक रूप हैं, किन्तु मनुष्य को केवल उनके बंशीधर रूप में ही श्रीकृष्ण की आराधना करनी होती है, जैसे राधा-कृष्ण विग्रह में। केवल उसी रूप पर एकाग्र हो जाइए, और समस्त मानसिक कल्पना तथा सकाम कर्म स्वतः गिर जाएँगे। मनुष्य को कृष्णभावनामृत का अनुकूल रीति से अनुशीलन करना होता है, और इसका अर्थ है ऐसी सेवा का सम्पादन जिससे श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हों। कृष्णभावनामृत अपनी ही विधि गढ़ने से प्राप्त नहीं होता। मैं सोच सकता हूँ कि मैं कृष्णभावनामृत में कुछ कर रहा हूँ, किन्तु इसे किसने अनुमोदित किया है? उदाहरणार्थ, भगवद्गीता में, अर्जुन कुछ नैतिक कारणों से युद्ध करने में हिचकिचाया, किन्तु वह उस स्थिति को सकाम कर्मों के स्तर से देख रहा था, जिस स्तर पर मनुष्य को परिणामों का भोग करना पड़ता है अथवा कष्ट उठाना पड़ता है। वह विचार कर रहा था कि यदि वह अपने परिवार-जनों का वध करे, तो उसे अनेक प्रतिक्रियाओं के अधीन होना पड़ेगा। तथापि, इस निष्कर्ष को श्रीकृष्ण ने अनुमोदित नहीं किया। भौतिक जगत् में क्रिया एवं प्रतिक्रिया के नियम को कर्म कहा जाता है, किन्तु भक्ति-सेवा कर्म से परे है।

अनन्य प्रेम को सकाम कर्मों (कर्म) के समस्त अंशों तथा मानसिक कल्पना एवं भौतिक इच्छा के समस्त अंशों से मुक्त होना चाहिए। उस अनन्य भक्ति-सेवा को श्रीकृष्ण पर अनुकूल रीति से स्थिर रहना चाहिए। "अनुकूल" का अर्थ है उसके अनुरूप जो वे चाहते हैं। श्रीकृष्ण ने इच्छा की कि कुरुक्षेत्र का युद्ध हो; यह सब उन्हीं के द्वारा रचा गया था। अर्जुन से कहा गया, "तुम अपनी ही रीति से सोच रहे हो, किन्तु यदि तुम युद्ध न भी करो, तो भी निश्चिन्त रहो कि चूँकि यह मेरे द्वारा रचा गया है, अतः ये जो योद्धा यहाँ एकत्र हैं, इनमें से कोई भी अपने घरों को नहीं लौट रहा। वे यहीं मारे जाएँगे। यह पहले ही रचा जा चुका है।" ईश्वर की इच्छा ऐसी होती है कि उसे कोई बदल नहीं सकता। श्रीकृष्ण के दो गुण हैं: वे रक्षा कर सकते हैं, और वे वध भी कर सकते हैं। यदि वे किसी का वध करना चाहें, तो संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो उसकी रक्षा कर सके, और यदि वे किसी की रक्षा करें, तो संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो उसका वध कर सके। श्रीकृष्ण की इच्छा सर्वोपरि है। अतएव, हमें अपनी इच्छाओं को श्रीकृष्ण की इच्छाओं के साथ संयोजित करना होगा। श्रीकृष्ण जो कुछ भी चाहते हैं, उसे कोई निरर्थक एवं निरस्त नहीं कर सकता क्योंकि वे परमेश्वर हैं। अतएव, हमारा कर्तव्य है अपने कर्मों को श्रीकृष्ण की इच्छा के साथ संयोजित करना, न कि कोई कर्म गढ़कर फिर यह घोषणा करना: "मैं यह कर्म कृष्णभावनामृत में कर रहा हूँ।" हमें यह निश्चित करने में अत्यन्त सावधान रहना होगा कि श्रीकृष्ण वास्तव में उसे चाहते हैं या नहीं। ऐसा अधिकृत ज्ञान श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि द्वारा शिक्षित किया जाता है। आध्यात्मिक गुरु की स्तुति में अपनी प्रार्थनाओं में हम प्रतिदिन गाते हैं, "यदि आध्यात्मिक गुरु सन्तुष्ट हैं, तो ईश्वर सन्तुष्ट होंगे। और यदि कोई अपने आध्यात्मिक गुरु को असन्तुष्ट करता है, तो उसके लिए ईश्वर को प्रसन्न करने का कोई मार्ग नहीं है।"

अतएव, जहाँ तक सम्भव हो, मनुष्य को अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश का सम्पादन करना होता है। यही मनुष्य को प्रगति करने में समर्थ बनाएगा। यही कृष्णभावनामृत के अनुकूल सम्पादन का सार है। अपनी वृद्धावस्था में, मैं अमेरिका आया हूँ, और मैं कृष्णभावनामृत की शिक्षा देने का प्रयत्न कर रहा हूँ, क्योंकि मेरे आध्यात्मिक गुरु ने मुझे आदेश दिया कि मुझे यह करना ही है। यह मेरा कर्तव्य है। मैं नहीं जानता कि मैं सफल होऊँगा अथवा असफल। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता; मेरा कर्तव्य पूर्ण हो जाता है यदि मैं आपके समक्ष वह सब प्रस्तुत कर सकूँ जो मैंने अपने आध्यात्मिक गुरु से सुना है। इसे कृष्णभावनामृत का अनुकूल सम्पादन कहा जाता है। जो वास्तव में गम्भीर हैं, उन्हें श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि के माध्यम से श्रीकृष्ण के आदेश को अपना समूचा जीवन एवं प्राण बना लेना चाहिए। जो इस सिद्धान्त से चिपका रहता है, वह निश्चय ही प्रगति करता है। चैतन्य महाप्रभु ने इसी प्रकार कहा, और मेरे आध्यात्मिक गुरु कहा करते थे, "आध्यात्मिक गुरु पारदर्शी माध्यम हैं।" उदाहरणार्थ, मैं इस ग्रन्थ के अक्षरों को इन पारदर्शी चश्मों के माध्यम से भली-भाँति देख पाता हूँ, जिनके बिना मैं नहीं देख पाता क्योंकि मेरी आँखें त्रुटिपूर्ण हैं। इसी प्रकार, हमारी इन्द्रियाँ सभी त्रुटिपूर्ण हैं। हम इन आँखों से ईश्वर को नहीं देख सकते, हम इन कानों से हरे कृष्ण को नहीं सुन सकते, हम आध्यात्मिक गुरु के माध्यम के बिना कुछ नहीं कर सकते। जिस प्रकार त्रुटिपूर्ण आँख चश्मे के माध्यम के बिना नहीं देख सकती, उसी प्रकार मनुष्य आध्यात्मिक गुरु के पारदर्शी माध्यम के बिना परमेश्वर के समीप नहीं पहुँच सकता। "पारदर्शी" का अर्थ है कि वह माध्यम कल्मष से मुक्त होना चाहिए। यदि वह पारदर्शी है, तो मनुष्य उसके आर-पार देख सकता है।

ईश्वर के अनन्य प्रेम में हमें अपनी इन्द्रियों को संलग्न करना होता है—सर्वेन्द्रिय, समस्त इन्द्रियाँ। इसका अर्थ है कि काम-वासना को भी कृष्णभावनामृत में संलग्न करना है। ईश्वर की पिता अथवा माता के रूप में धारणा भगवान् की सेवा में अपनी काम-वासना को संलग्न करने की अनुमति नहीं देती, क्योंकि पिता एवं माता के साथ कोई यौन-सम्बन्ध नहीं होता। किन्तु ईश्वर की प्रेमी के रूप में धारणा में यौन-संलग्नता भी है। अतएव, चैतन्य महाप्रभु ने परमेश्वर के साथ हमारी संलग्नता की सर्वाधिक पूर्ण जानकारी प्रदान की। जीवन की अन्य धार्मिक धारणाओं में, ईश्वर को अधिक से अधिक पिता अथवा माता के रूप में स्वीकार किया जाता है। भारत में अनेक उपासक देवी काली को ईश्वर का प्रतिनिधित्व मानते हैं। निस्सन्देह, यह अनुमोदित नहीं है, किन्तु यह विश्वास विद्यमान है, और ईसाई धर्म में भी ईश्वर की धारणा पिता के रूप में है। किन्तु चैतन्य महाप्रभु हमें बताते हैं कि मनुष्य भगवान् के साथ यौन-संलग्नता भी रख सकता है। यह जानकारी चैतन्य महाप्रभु का अद्वितीय योगदान है। इस भौतिक जगत् में, यौन-संलग्नता को सर्वोच्च संलग्नता, सबसे बड़ा सुख माना जाता है, यद्यपि वह केवल एक विकृत रूप में ही विद्यमान है। तथापि, किसी ने यह धारणा नहीं की कि आध्यात्मिक जगत् में यौन-संलग्नता हो सकती है। समूचे संसार में कहीं भी ऐसे धर्मशास्त्र का एक भी उदाहरण नहीं है। यह जानकारी प्रथम बार चैतन्य महाप्रभु द्वारा दी गई है: मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अपने पति के रूप में, अपने प्रेमी के रूप में पा सकता है। यह राधा एवं कृष्ण की उपासना में सम्भव है, किन्तु कोई भी, विशेषकर निर्विशेषवादी, राधा-कृष्ण को नहीं समझ सकते। निर्विशेषवादियों को कोई धारणा ही नहीं है; वे यह तक कल्पना नहीं कर सकते कि ईश्वर का कोई रूप है। किन्तु चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि ईश्वर का न केवल रूप है, अपितु उनका यौन-जीवन भी है। यह चैतन्य महाप्रभु का सर्वोच्च योगदान है।

मनुष्य विभिन्न सम्बन्धों में परमेश्वर की सेवा कर सकता है, किन्तु भौतिक जगत् में वे सम्बन्ध केवल विकृत प्रतिबिम्बों के रूप में विद्यमान हैं। इस भौतिक जगत् के सम्बन्ध में हमारी संलग्नता क्या है? समाज, मैत्री तथा प्रेम के विषय में हमारी धारणाएँ क्या हैं? वे सभी जीवन की भौतिक धारणा पर आधारित हैं। हमारे समाज में, कोई किसी पुत्र के पिता अथवा माता के रूप में संलग्न है, और अन्य पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका के रूप में संलग्न हैं। अन्य रस (सम्बन्ध) भी हैं, जैसे किसी दूसरे के साथ शत्रु के रूप में संलग्न होना। बारह विभिन्न सम्बन्ध हैं, जिनमें से पाँच प्रमुख हैं। शेष सात अप्रत्यक्ष सम्बन्ध हैं, जैसे, उदाहरणार्थ, किसी का शत्रु होना। शत्रुओं के बीच भी प्रायः एक सम्बन्ध होता है, यहाँ तक कि एक हत्यारे तथा जिसकी वह हत्या करता है, उसके बीच भी। किन्तु जहाँ तक श्रीकृष्ण के साथ हमारे सम्बन्ध का प्रश्न है, यदि कोई उनके शत्रु के रूप में भी सम्बन्ध स्थापित कर ले, तो उसका जीवन सफल हो जाता है। अतएव, जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को श्रीकृष्ण के साथ संलग्न करता है, तब बारह विभिन्न प्रकारों में से किसी एक में सम्बन्ध स्थापित हो सकता है, जिनमें से पाँच प्रकार प्रत्यक्ष हैं और सात अप्रत्यक्ष।

जब श्रीकृष्ण कंस के अखाड़े में प्रकट हुए, तब अनेक विशाल मल्ल उन्हें मारने के लिए तैयार थे। वस्तुतः, उन्हें वहाँ मारे जाने के लिए ही आमन्त्रित किया गया था। उनके शत्रु कंस ने सोचा, "शीघ्र ही ये बालक आएँगे। हमने सोलह वर्षों तक उन्हें मारने का प्रयत्न किया, किन्तु वह बालक कृष्ण मारा न जा सका। किन्तु अब मैंने उसे अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया है, और जब वह आएगा तो इन मल्लों के साथ लड़ेगा, और वे उसे मार डालेंगे।" आसुरी अथवा नास्तिक लोग सदा श्रीकृष्ण को, अर्थात् ईश्वर को, मारने के विचार में रहते हैं। इसी कारण वे अपने सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं कि ईश्वर मर चुका है। वे सोचते हैं कि यदि ईश्वर मर जाए, तो वे जैसा चाहें वैसा करने के लिए स्वतन्त्र हो जाएँगे। किन्तु जहाँ तक उनकी वास्तविक गतिविधियों का प्रश्न है, ईश्वर मरा हो अथवा जीवित, किन्तु ईश्वर का अभिकर्ता, अर्थात् भौतिक शक्ति, इतनी प्रबल है कि कोई भी स्वतन्त्र रूप से कोई अनुचित कार्य नहीं कर सकता। जैसे ही कोई कुछ अनुचित करता है, तत्क्षण दण्ड मिलता है। इसके लिए ईश्वर की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर मरा हो अथवा जीवित, किन्तु भौतिक शक्ति किसी भी व्यक्ति को दण्डित करने हेतु पर्याप्त है जो भौतिक नियमों का तनिक भी उल्लंघन करता है। ईश्वर ने ये परिस्थितियाँ निर्धारित की हैं, किन्तु मूर्ख लोग नहीं समझते।

तथापि, भगवान् चैतन्य शुद्ध भक्ति-जीवन में समस्त इन्द्रियों को श्रीकृष्ण की सेवा में अनुकूल रीति से संलग्न करने की बात कहते हैं। मनुष्य को अपनी इन्द्रियों को अनुकूल रीति से संलग्न करना चाहिए और वह करना चाहिए जो श्रीकृष्ण चाहते हैं। फिर भी यदि कोई अपनी इन्द्रियों को श्रीकृष्ण की इच्छा के विरुद्ध संलग्न करे किन्तु फिर भी श्रीकृष्ण का चिन्तन करे, तो वह भी लाभप्रद है। उदाहरणार्थ, पूतना नामक असुरी ने श्रीकृष्ण को मारने का विचार किया। जिस प्रकार ईश्वरीय व्यक्तियों का कार्य ईश्वर की सेवा करना है, उसी प्रकार असुर तथा नास्तिक सदा ईश्वर को मारने के लिए तत्पर रहते हैं। पूतना ने सोचा, "मैं श्रीकृष्ण को मार डालूँगी। वह तो केवल एक बालक है।" यह आसुरी जनों की एक और भूल है। वे श्रीकृष्ण को, अर्थात् ईश्वर को, एक साधारण बालक अथवा मनुष्य समझते हैं। तो इस प्रकार पूतना सोच रही थी: "मैं अपने स्तन पर विष लगा लूँ, और जब वह बालक मेरा दूध पीने जाएगा, तब वह मर जाएगा।" जैसे ही हम इसका अध्ययन करते हैं, हम देखते हैं कि वह श्रीकृष्ण के पास उनकी शत्रु के रूप में आई, फिर भी उन्होंने उसे मित्र के रूप में स्वीकार किया क्योंकि वे अत्यन्त दयालु हैं। उन्होंने उसकी मानसिकता के आसुरी अंश को नहीं लिया, अपितु उसे स्वीकार कर लिया। प्रत्येक जीव बद्ध है, किन्तु श्रीकृष्ण नहीं हैं। एक चिकित्सक अथवा मनोचिकित्सक उन्मादियों का उपचार करता है, किन्तु वह स्वयं उन्मादी नहीं हो जाता। कभी-कभी कोई रोगी उस पर क्रोधित हो सकता है अथवा उसे गाली दे सकता है, किन्तु चिकित्सक शान्त रहता है और केवल उसका उपचार करता है। इसी प्रकार, यदि कोई श्रीकृष्ण को अपना शत्रु माने, तो श्रीकृष्ण उसके शत्रु नहीं हो जाते।

पूतना श्रीकृष्ण को विष देने आई, किन्तु उन्होंने इसे अन्यथा रूप में लिया। उन्होंने सोचा, "मैंने उसका स्तन-दुग्ध पिया है। इसलिए वह मेरी माता बन गई है।" श्रीकृष्ण ने उसके साथ अपनी माता के समान व्यवहार किया, और इसी कारण वह श्रीकृष्ण की वास्तविक माता यशोदा के समान ही पद को प्राप्त होकर मुक्त हो गई। निष्कर्ष यह है कि सर्वोच्च पूर्णता श्रीकृष्ण के साथ अनुकूल सम्बन्ध स्थापित करना है, किन्तु यदि कोई स्वयं को प्रतिकूल रूप से भी संलग्न करे, तो भी श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि वे उसे कम-से-कम मुक्ति तो प्रदान कर ही देते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा मारे गए समस्त शत्रु तत्क्षण मुक्त हो गए।

दो वर्ग के मनुष्य निराकार ब्रह्मज्योति में विलीन हो सकते हैं: जो जान-बूझकर निराकार ब्रह्मज्योति में विलीन होने की आकांक्षा करते हैं, वे प्रवेश कर सकते हैं, और जो श्रीकृष्ण के शत्रु हैं और उनके द्वारा मारे जाते हैं, वे भी ऐसा कर सकते हैं। अतएव, भक्त निष्कर्ष निकालता है: मैं ऐसी अवस्था को क्यों स्वीकार करूँ जो ईश्वर के शत्रुओं को भी प्रदान की जाती है?

चैतन्य महाप्रभु शुद्ध भक्ति-सेवा की अनुशंसा करते हैं। न तो अपनी भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करने की कोई कामना होनी चाहिए, न प्रायोगिक दर्शन द्वारा श्रीकृष्ण को समझने का कोई प्रयास होना चाहिए, और न ही श्रीकृष्ण से भौतिक लाभ प्राप्त करने हेतु कोई सकाम कर्म होने चाहिए। एकमात्र इच्छा यही होनी चाहिए कि उनकी अनुकूल रीति से सेवा की जाए, जैसा वे चाहते हैं। यदि श्रीकृष्ण कुछ चाहें, तो हमें वही करना चाहिए। मान लीजिए मैं किसी शिष्य से कहूँ, "हे मेरे प्रिय छात्र, कृपया मुझे एक गिलास जल दो।" तब यह उसका कर्तव्य है कि वह मुझे एक गिलास जल दे। यदि वह सोचे, "प्रभुपाद एक गिलास जल चाहते हैं, किन्तु उन्हें कोई और श्रेष्ठ वस्तु क्यों न दूँ? एक गिलास गर्म दूध क्यों न दूँ?" तो यह सेवा नहीं है। उसकी दृष्टि में, गर्म दूध अत्यन्त स्वादिष्ट है और जल से श्रेष्ठ है, फिर भी क्योंकि मैंने जल माँगा है, अतः उसे मुझे जल देना है, दूध नहीं। यही अनुकूल सेवा है। मनुष्य को यह समझना होता है कि श्रीकृष्ण क्या चाहते हैं। जब वह घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, तब मनुष्य श्रीकृष्ण की सर्वाधिक अनुकूल रीति से सेवा कर सकता है। और जब तक वह घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं होता, तब तक मनुष्य को श्रीकृष्ण क्या चाहते हैं इसकी जानकारी आध्यात्मिक गुरु के पारदर्शी माध्यम से लेनी होती है।

वैष्णव कभी यह नहीं सोचता कि श्रीकृष्ण के साथ उसका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। भगवान् चैतन्य कहते हैं, "मैं श्रीकृष्ण के सेवक के सेवक के सेवक के सेवक का सेवक हूँ—सौ बार सेवक का सेवक।" हमें सेवक के सेवक के सेवक बनने के लिए सहमत होना होगा। यही गुरु-परम्परा की विधि है, और यदि कोई वास्तविक, दिव्य ईश्वर-प्रेम चाहता है, तो उसे यह विधि अपनानी होगी। चूँकि लोग इस विधि को स्वीकार नहीं करते, इसलिए वे वास्तविक ईश्वर-प्रेम विकसित नहीं करते। वे ईश्वर की बात करते हैं, किन्तु वस्तुतः वे ईश्वर से प्रेम नहीं करते; चूँकि शुद्ध भक्ति-सेवा का कोई अनुशीलन नहीं है, इसलिए वे कुत्ते से प्रेम करते हैं।

हम कह सकते हैं, "ईश्वर-प्रेम", किन्तु जब तक हम इस सिद्धान्त को न अपनाएँ, तब तक हमें कुत्ते से प्रेम करना होगा, ईश्वर से नहीं। यही भूल है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि यदि कोई वास्तव में ईश्वर-प्रेम चाहता है, तो उसे शुद्ध भक्ति-सेवा की विधि का अनुसरण करना होगा। ऐसा नहीं है कि चैतन्य महाप्रभु अपनी ही मानसिक कल्पना से कह रहे हैं; उनके कथन वैदिक शास्त्रों में, जैसे नारद-पञ्चरात्र तथा श्रीमद्भागवत में, पुष्ट हैं। ये दोनों ग्रन्थ, तथा भगवद्गीता, भक्तों के लिए अभिप्रेत अत्यन्त प्रामाणिक शास्त्र हैं। चैतन्य महाप्रभु नारद-पञ्चरात्र के एक श्लोक से उद्धरण देते हैं: हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिर् उच्यते [चै.च. मध्य 19.170]। यह शुद्ध भक्ति-सेवा की परिभाषा है। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनम्। हृषीकेण का अर्थ है "अपनी इन्द्रियों से"। हमें अपनी इन्द्रियों को संलग्न करना होता है; ऐसा नहीं कि हम केवल अपने मन को संलग्न करें। यदि कोई कहे, "मैं सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करता हूँ", तो वह शुद्ध भक्ति-सेवा नहीं है। ध्यान चिन्तन है, किन्तु कोई श्रीकृष्ण का चिन्तन नहीं करता; वे शून्य अथवा किसी निराकार वस्तु का चिन्तन करते हैं। यदि कोई श्रीकृष्ण अथवा नारायण अथवा विष्णु का चिन्तन करे, जैसा वैदिक शास्त्रों में निर्धारित है, तो वही वास्तविक योग है; योग-ध्यान का अर्थ है अपने मन को परमात्मा पर केन्द्रित करना। परमात्मा चतुर्भुज नारायण के रूप में श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व हैं। पतञ्जलि तक, जो योग-पद्धति के एक प्रामाणिक आचार्य हैं, विष्णु पर ध्यान निर्धारित करते हैं। किन्तु जिस प्रकार लोग कूट धार्मिक विधियाँ गढ़ रहे हैं, उसी प्रकार आज के तथाकथित योगियों ने किसी शून्य वस्तु का चिन्तन करने की अपनी ही रीति गढ़ ली है।

किन्तु नारद-पञ्चरात्र कहता है, हृषीकेण हृषीकेश-सेवनम्: [चै.च. मध्य 19.170] मनुष्य को न केवल अपने मन को, अपितु अपनी इन्द्रियों को भी संलग्न करना चाहिए। इन्द्रियों को इन्द्रियों के स्वामी की सेवा में संलग्न कीजिए। ये तीन संस्कृत शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। हृषीकेश का अर्थ है "इन्द्रियों के स्वामी"। अतः भक्तियोग का अर्थ है इन्द्रियों के स्वामी की इन्द्रियों से सेवा करना। इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण हैं। हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारे पास हमारी इन्द्रियाँ इसलिए हैं क्योंकि हम इस भौतिक जगत् का भोग करना चाहते थे, और इसी कारण भगवान् ने हमारे भोग हेतु हमें इन्द्रियों का एक विशेष समूह दिया है। सूअर का एक विशेष प्रकार का शरीर एवं इन्द्रियाँ हैं क्योंकि वह विष्ठा खाने का भोग करना चाहता था। इसी प्रकार, मनुष्य का एक विशेष प्रकार का शरीर एवं इन्द्रियाँ हैं क्योंकि वह कुछ और भोगना चाहता था। हमारे पास बद्ध इन्द्रियों का एक विशेष समूह है जिससे इस भौतिक जगत् का भोग करना है, और यही वह है जिसे हमें शुद्ध करना है। हमारी इन्द्रियाँ मूल हैं, किन्तु अब वे भौतिक इच्छाओं से ढकी हुई हैं। हमें अपना उपचार करके ऐसी इच्छाओं से मुक्त होना है। जब किसी की इन्द्रियाँ भौतिक इन्द्रियतृप्ति की ओर अब प्रवृत्त नहीं रहतीं, तब उसकी स्थिति को शुद्ध भक्ति कहा जाता है।

नारद-पञ्चरात्र के इस श्लोक से, हम समझ सकते हैं कि आत्मा की मूल इन्द्रियाँ हैं। आत्मा चाहे कितने भी छोटे शरीर में प्रवेश कर गई हो, वह निराकार नहीं है; उसकी इन्द्रियाँ हैं। सम्भव है किसी को अपने ग्रन्थ पर कोई खटमल मिल जाए। वह इतना छोटा है, किसी सूई की नोक से भी छोटा, फिर भी वह चलता है; उसकी समस्त इन्द्रियाँ हैं। छोटे जीवाणु भी चलते हैं, और उनकी अपनी इन्द्रियाँ हैं। मूलतः, समस्त जीवों की इन्द्रियाँ हैं। ऐसा नहीं है कि इन्द्रियाँ कुछ भौतिक परिस्थितियों में विकसित हुई हों। नास्तिक सिद्धान्त यह है कि भौतिक परिस्थितियों में हमने इन्द्रियाँ विकसित की हैं, कि आध्यात्मिक अवस्था में कोई इन्द्रियाँ नहीं हैं, और कि हम निराकार हैं। किन्तु तर्क एवं युक्ति से, वह ऐसा नहीं हो सकता। आध्यात्मिक शक्ति का एक सूक्ष्म कण, चाहे वह आकार में किसी परमाणु से भी छोटा हो, उसकी अपनी इन्द्रियाँ हैं। ये इन्द्रियाँ, भौतिक तत्त्वों से ढकी होने के कारण, एक विकृत रूप में प्रकट होती हैं। हमें इन्द्रियों को शुद्ध करना होता है, और जब इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तब हम उन्हें इन्द्रियों के स्वामी के सुख हेतु संलग्न कर सकते हैं। श्रीकृष्ण इन्द्रियों के स्वामी एवं अधिपति हैं। अतएव, चूँकि हम परमेश्वर के अंश हैं, इसलिए हमारी इन्द्रियाँ उन्हीं से उधार ली गई हैं; वे किराए पर हैं। सर्वोत्तम बात यह है कि इन्द्रियों का उपयोग उनकी इन्द्रिय-तृप्ति हेतु करें, न कि अपनी। यही शुद्ध कृष्णभावनामृत की विधि है।

श्रीमद्भागवत से, भगवान् चैतन्य शुद्ध भक्ति का एक उदाहरण देते हैं: भागवत में कहा गया है कि श्रीकृष्ण प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। अतएव, जिस प्रकार नदियाँ बहती हैं और उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति समुद्र तक पहुँचने की होती है, उसी प्रकार जैसे ही कोई भगवान् की महिमा सुनता है, उसकी आत्मा तत्क्षण परमेश्वर की ओर आकृष्ट हो जाती है। यही शुद्ध भक्ति-सेवा का आरम्भ है। जैसे ही जप की ध्वनि होती है, हरे कृष्ण, तत्क्षण श्रीकृष्ण की समस्त सामग्री, श्रीकृष्ण का नाम, श्रीकृष्ण की कीर्ति, श्रीकृष्ण का धाम, श्रीकृष्ण के पार्षद—सब कुछ—अकस्मात् भीतर प्रकट हो जाते हैं क्योंकि वे उपस्थित हैं। यही मनुष्य के कृष्णभावनामृत का आरम्भ है। किसी सन्दर्भ के आधार पर स्मरण करने का अर्थ है कि जैसे ही कोई कोई संकेत-शब्द सुनता है, वह तत्क्षण उस संकेत के पीछे की समस्त जानकारी का स्मरण कर लेता है। इसी प्रकार, जब हमारे मन केवल श्रीकृष्ण के गुणों की थोड़ी-सी महिमा सुनने मात्र से श्रीकृष्ण की ओर तथा श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु की ओर आकृष्ट हो जाते हैं, वही शुद्ध कृष्णभावनामृत का आरम्भ है। तब और कोई गति, अर्थात् मन का संचलन नहीं रहता।

गोपियों के साथ ठीक ऐसा ही हुआ: जैसे ही उन्होंने श्रीकृष्ण की बंशी की ध्वनि सुनी, उन्होंने सब कुछ त्याग दिया। उनमें से कुछ लेटी हुई थीं, कुछ अपने पारिवारिक कार्यों में लगी थीं, कुछ अपने बालकों की देखभाल कर रही थीं, किन्तु जैसे ही उन्होंने श्रीकृष्ण की बंशी सुनी, वे सब कुछ भूलकर उनकी ओर दौड़ पड़ीं। उनके पतियों ने, उनके भाइयों ने, तथा उनके पिताओं ने कहा, "तुम अपना कर्तव्य छोड़कर क्यों जा रही हो?" किन्तु उन्होंने परवाह नहीं की—वे बस चली गईं। मन के श्रीकृष्ण में उस विलय में कोई अवरोध तथा कोई बाधा नहीं है। यही शुद्ध भक्ति का आरम्भ है।

पुरुषोत्तम का अर्थ है श्रीकृष्ण। पुरुष शब्द का अर्थ है "भोक्ता"। बद्ध जीव मिथ्या भोक्ता, अनुकरण-भोक्ता हैं। यहाँ इस भौतिक जगत् में, समस्त जीव पुरुषों के रूप में कार्य कर रहे हैं। पुरुष का अधिक सटीक अर्थ है "नर"। नर को भोक्ता माना जाता है, और नारी को भोग्य माना जाता है। भौतिक जगत् में, चाहे किसी का नर शरीर हो अथवा नारी शरीर, प्रत्येक में भोग करने की प्रवृत्ति है, और इसी कारण प्रत्येक को पुरुष कहा जाता है। किन्तु वस्तुतः एकमात्र पुरुष परमेश्वर हैं। हम जीव उनकी शक्ति हैं, और वे परम भोक्ता हैं। हम पुरुष नहीं हैं। शक्तियाँ भोग हेतु प्रयुक्त की जाती हैं, और हम शक्तियाँ हैं, परम पुरुष के उपकरण हैं। अतएव पुरुषोत्तम परम दिव्य पुरुष, अर्थात् श्रीकृष्ण हैं। जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति हमारी शुद्ध भक्ति प्रयुक्त होती है और कोई अवरोध अथवा बाधाएँ नहीं रहतीं, वही शुद्ध कृष्णभावनामृत का लक्षण है।

शुद्ध कृष्णभावनामृत में कोई महत्त्वाकांक्षा अथवा मंशा नहीं होती। उपासना का प्रत्येक अन्य दिव्य कृत्य अथवा प्रकार किसी मंशा से प्रेरित होता है: कोई मुक्ति चाहता है, कोई भौतिक समृद्धि चाहता है, कोई किसी उच्चतर लोक में जाना चाहता है, कोई कृष्णलोक जाना चाहता है। ये महत्त्वाकांक्षाएँ नहीं होनी चाहिए। शुद्ध भक्त की ऐसी कोई महत्त्वाकांक्षाएँ नहीं होतीं। शुद्ध भक्त श्रीकृष्ण के परम धाम जाने की इच्छा तक नहीं करता। निस्सन्देह, वह जाता है, किन्तु उसकी कोई इच्छा नहीं होती। वह केवल अपने आपको पूर्णतः श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न करना चाहता है।

विभिन्न प्रकार की मुक्ति होती है। सालोक्य मुक्ति है, अर्थात् परमेश्वर के साथ उसी लोक में रहना। वैकुण्ठ-लोकों के निवासी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ उसी लोक में रहते हैं। सार्ष्टि मुक्ति का अर्थ है नारायण के समान ही प्रायः वही ऐश्वर्य प्राप्त करना। मुक्त जीवात्मा ठीक नारायण के समान प्रकट हो सकती है, चार भुजाओं सहित, चार प्रतीकों सहित, प्रायः वही शारीरिक लक्षणों सहित, वही ऐश्वर्य, वही आभूषण, वही भवन, सब कुछ। सारूप्य का अर्थ है वही रूप अथवा लक्षण प्राप्त करना। सामीप्य का अर्थ है कभी दूर न रहना, अपितु सदा परमेश्वर के साथ संग करना। उदाहरणार्थ, जिस प्रकार हम साथ बैठे हैं, उसी प्रकार मनुष्य भगवान् के साथ संग कर सकता है। इसे सामीप्य-मुक्ति, अर्थात् समीप होने की मुक्ति कहा जाता है। तथापि, शुद्ध भक्तगण मुक्ति के इन विभिन्न रूपों को स्वीकार नहीं करते। वे केवल श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहना चाहते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार की मुक्ति से सरोकार नहीं है। जो वास्तव में कृष्णभावनाभावित हैं, वे परमेश्वर का संग प्राप्त करते हैं, किन्तु वे उसकी इच्छा नहीं करते; उनकी एकमात्र महत्त्वाकांक्षा भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहना है। भक्ति-सेवा, अर्थात् कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च पूर्णता तब प्रदर्शित होती है जब कोई भक्त परमेश्वर से किसी वरदान अथवा लाभ को स्वीकार करने से इन्कार कर देता है। प्रह्लाद महाराज को जो भी उन्हें प्रिय था वह प्रस्तावित किया गया, उन्हें केवल माँगना था, किन्तु उन्होंने कहा, "हे मेरे प्रभु, मैं आपका नित्य सेवक हूँ। आपकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है, तो फिर मैं उससे कोई लाभ कैसे स्वीकार कर सकता हूँ? तब तो मैं आपका सेवक नहीं रहूँगा; मैं तो व्यापारी हो जाऊँगा।" उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया, और यही शुद्ध व्यक्ति का चिह्न है। श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि वे भक्त की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं, चाहे वह भौतिक वरदान ही क्यों न चाहे। यदि भक्त के हृदय की गहराई में कोई इच्छा हो, तो वे उसे भी पूर्ण करते हैं। वे इतने दयालु हैं। किन्तु भक्तियोग, अर्थात् भक्ति-सेवा की उदात्त स्थिति यह है कि शुद्ध भक्त मुक्ति के विभिन्न प्रकारों को स्वीकार करने से इन्कार कर देता है, चाहे वे परमेश्वर द्वारा ही प्रस्तावित क्यों न किए जाएँ।

यदि किसी के भीतर भौतिक इच्छाएँ अथवा मंशाएँ हों, और ऐसी इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह स्वयं को भक्ति-सेवा में संलग्न करे, तो परिणाम यह होगा कि उसे कभी शुद्ध ईश्वर-प्रेम प्राप्त नहीं होगा। यदि कोई यह सोच रहा है, "मैं कृष्णभावनामृत में, श्रीकृष्ण की भक्ति-सेवा में संलग्न हूँ, क्योंकि मुझे अमुक-अमुक ऐश्वर्य चाहिए", तो वह इच्छा भले ही पूर्ण हो जाए, किन्तु उसे श्रीकृष्ण का वैसा अनन्य प्रेम कभी प्राप्त नहीं होगा जैसा गोपियों को था। यदि किसी की कोई मंशा हो, तो वह अपना भक्ति-कर्तव्य निभाते हुए भी शुद्ध ईश्वर-प्रेम की अवस्था तक नहीं पहुँच पाएगा। भक्ति-रसामृत-सिन्धु के एक श्लोक में, रूप गोस्वामी कहते हैं, "जब तक मनुष्य किसी भौतिक लाभ [भुक्ति] की इच्छा करता है, अथवा यदि वह मुक्ति [मुक्ति] भी चाहता है, तब तक उसे उन प्रेत-रूपी प्रतिनिधित्वों को ग्रहण करना होगा।" जब तक वह माया किसी के हृदय के भीतर विद्यमान रहती है, तब तक मनुष्य शुद्ध ईश्वर-प्रेम से प्राप्त उस आध्यात्मिक आनन्द का भोग कैसे कर सकता है? दूसरे शब्दों में, यदि किसी की भौतिक इच्छाएँ हों, अथवा मुक्ति की भी इच्छा हो, तो वह शुद्ध ईश्वर-प्रेम प्राप्त नहीं कर सकता। शुद्ध भक्ति समस्त इच्छाओं से रहित होती है—वह केवल प्रेममयी सेवा को उसके अपने ही निमित्त अर्पित करना है।

रूप गोस्वामी के जीवन में एक सुन्दर उदाहरण है। रूप गोस्वामी तथा उनके बड़े भाई सनातन गोस्वामी वृन्दावन में अलग-अलग रहते थे और अपना भजन, अर्थात् भक्ति-सेवा करते रहते थे। रूप वन में रहते थे, और वहाँ उत्तम भोजन पकाने अथवा एक चपाती खाने के लिए गाँव से भिक्षा माँगने की कोई सुविधा नहीं थी। रूप गोस्वामी छोटे भाई थे, और उन्होंने सोचा, "यदि मुझे कुछ खाद्य-सामग्री मिल जाए, तो मैं उत्तम व्यंजन तैयार करके श्रीकृष्ण को अर्पित कर सकता हूँ और अपने बड़े भाई को आमन्त्रित कर सकता हूँ।" उनकी यह इच्छा थी। अगले ही क्षण, लगभग बारह वर्ष की एक सुन्दर बालिका आई और प्रचुर मात्रा में खाद्य-सामग्री—दूध, आटा, घी इत्यादि—दे गई। यही वैदिक व्यवस्था है; कभी-कभी गृहस्थ संन्यास-आश्रम के याचकों एवं ऋषियों को खाद्य-सामग्री भेंट करते हैं। रूप गोस्वामी अत्यन्त प्रसन्न हुए कि श्रीकृष्ण ने इतनी सारी वस्तुएँ भेजी हैं और कि अब वे एक भोज तैयार कर सकते हैं। उन्होंने एक भोज तैयार किया और फिर अपने बड़े भाई को आमन्त्रित किया।

जब सनातन गोस्वामी आए, तब वे आश्चर्यचकित हुए। "तुमने ये वस्तुएँ कैसे प्राप्त कीं? तुमने इस वन में इतना उत्तम भोज तैयार कर लिया है। यह कैसे सम्भव है?"

अतः रूप गोस्वामी ने समझाया, "प्रातःकाल मैंने इसकी इच्छा की, और संयोगवश श्रीकृष्ण ने मुझे ये समस्त वस्तुएँ भेज दीं। एक सुन्दर बालिका आई, और उसने मुझे ये दे दीं।" वे उस बालिका का वर्णन कर रहे थे: "एक अत्यन्त सुन्दर बालिका।"

तब सनातन ने कहा, "यह सुन्दर बालिका राधारानी हैं। तुमने राधारानी से, भगवान् की नित्य प्रियतमा से सेवा ले ली है। यह बड़ी भारी भूल है।" यही उनका दर्शन है। वे भगवान् से सेवा स्वीकार नहीं करते। वे केवल सेवा अर्पित करना चाहते थे। किन्तु श्रीकृष्ण इतने चतुर हैं कि वे भी अपने भक्त की सेवा करना चाहते हैं। वे अपने भक्त की सेवा करने का अवसर ढूँढ़ते रहते हैं। यह आध्यात्मिक स्पर्धा है। शुद्ध भक्त श्रीकृष्ण से कुछ नहीं चाहता; वह केवल उनकी सेवा करना चाहता है। और श्रीकृष्ण भी अपने भक्त की सेवा करने का अवसर ढूँढ़ते हैं। श्रीकृष्ण अपने भक्त को प्रसन्न करने के लिए सदा उतने ही व्यग्र रहते हैं जितना भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए।

यही दिव्य जगत् है। परम स्तर पर, कोई शोषण नहीं है। प्रत्येक सेवा करना चाहता है; कोई सेवा लेना नहीं चाहता। दिव्य जगत् में, प्रत्येक सेवा देना चाहता है। आप मुझे सेवा देना चाहते हैं, और मैं आपको सेवा देना चाहता हूँ। यह कितनी सुन्दर भावना है। इस भौतिक जगत् का अर्थ है कि मैं आपकी जेब काटना चाहता हूँ, और आप मेरी जेब काटना चाहते हैं। बस इतना ही। यही भौतिक जगत् है। हमें इसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। भौतिक जगत् में, प्रत्येक अपने मित्र का, अपने पिता का, अपनी माता का, प्रत्येक का शोषण करना चाहता है। किन्तु दिव्य जगत् में, प्रत्येक सेवा करना चाहता है। प्रत्येक के लिए श्रीकृष्ण सेवा के केन्द्र-बिन्दु हैं, और समस्त भक्तगण, चाहे श्रीकृष्ण के मित्र, सेवक, माता-पिता अथवा प्रेमी के रूप में, सभी उनकी सेवा करना चाहते हैं। और साथ ही, श्रीकृष्ण भी उनकी सेवा करना चाहते हैं। यह एक दिव्य सम्बन्ध है; मुख्य कार्य सेवा है, यद्यपि सेवा की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रत्येक परिपूर्ण है। वहाँ कोई भूख नहीं है, खाने की कोई आवश्यकता नहीं है, फिर भी प्रत्येक खाने के लिए उत्तम वस्तुएँ अर्पित करता है। यही दिव्य जगत् है। जब तक हम केवल श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की सेवा करने की अवस्था तक न पहुँच जाएँ, तब तक हम सेवा के दिव्य आनन्द का आस्वादन नहीं कर सकते। यदि हमारी कोई मंशा हो, तो वह भाव कभी जागृत नहीं होगा। बिना किसी मंशा के, बिना व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति की इच्छा के, परमेश्वर तथा उनके भक्तों की सेवा अर्पित की जानी चाहिए।

## प्रेमपूर्वक कृष्ण के निकट जाना

इस समापन-अध्याय में, श्रील प्रभुपाद आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान के परम लक्ष्य—परम आत्मा, अर्थात् श्रीकृष्ण के पूर्ण साक्षात्कार—पर चर्चा करते हैं। आत्म-साक्षात्कार का विकास इस समझ से आरम्भ होता है कि आत्मा भौतिक नहीं है—कोई भौतिक शरीर नहीं है—अपितु शुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा है। तदुपरान्त, मनुष्य यह अनुभव करता है कि शुद्ध, आध्यात्मिक आत्मा नित्य रूप से परम आत्मा, अर्थात् श्रीकृष्ण का अंश है। अन्ततः मनुष्य यह सीखता है कि उस नित्य, आनन्दमय, दिव्य सम्बन्ध में पूर्ण रूप से कैसे जिया जाए। जिसने इस अवस्था को प्राप्त कर लिया है, उसने जीवन की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर ली है।

जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर थे, तब वृन्दावन के समस्त निवासी उनसे प्रेम करते थे। वस्तुतः, वे श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते थे। वे यह नहीं जानते थे कि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं अथवा नहीं, और न ही वे इन विचारों से विचलित होते थे कि "यदि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं तो मैं उनसे प्रेम करूँगा।" उनकी भावना शुद्ध प्रेम की थी, और वे सोचते थे, "वे ईश्वर हों अथवा न हों—इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हम श्रीकृष्ण से प्रेम करते हैं, बस इतना ही।" अतः यही वास्तविक, अनन्य प्रेम का स्तर है। जब कोई सोचता है, "यदि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं, तो मैं उनसे प्रेम करूँगा", तो यह जान लेना चाहिए कि यह शुद्ध प्रेम का नहीं, अपितु सशर्त प्रेम का स्तर है। पृथ्वी पर रहते हुए, श्रीकृष्ण ने असाधारण शक्तियाँ प्रदर्शित कीं, और व्रजवासी, अर्थात् वृन्दावन के निवासी, प्रायः सोचते थे, "ओह, श्रीकृष्ण कैसे अद्भुत बालक हैं। सम्भव है वे कोई देवता हों।" वे इस प्रकार इसलिए सोचते थे क्योंकि लोग सामान्यतः इस धारणा के अधीन थे कि देवता सर्वशक्तिमान् होते हैं। भौतिक जगत् के भीतर देवता शक्तिशाली होते हैं, किन्तु लोग इससे अनभिज्ञ हैं कि श्रीकृष्ण इन सभी से ऊपर हैं। देवताओं में सर्वोच्च, ब्रह्मा ने इस विषय में अपना मत इस श्लोक में दिया, ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः [ब्र.सं. 5.1]: "श्रीकृष्ण परम नियन्ता हैं, और उनका शरीर ज्ञान, आनन्द एवं नित्यता से परिपूर्ण है।" वृन्दावन के निवासी श्रीकृष्ण की परम नियन्ता तथा समस्त देवताओं के स्वामी के रूप में उनकी शक्ति को बहुत कम जानते थे। उल्लेखनीय बात यह है कि उनके प्रति इनका प्रेम ऐसे विचारों के अधीन नहीं था।

जिस प्रकार वृन्दावन के निवासी श्रीकृष्ण से निःशर्त प्रेम करते थे, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी उनसे निःशर्त प्रेम करते थे। व्रज-जन-वल्लभ, गिरि-वर-धारी। जब वृन्दावन के निवासियों ने स्वर्ग के प्रमुख देवता, इन्द्र को यज्ञ अर्पित करना बन्द कर दिया, तब उन्होंने स्वयं को एक अत्यन्त संकटपूर्ण स्थिति में डाल लिया। इन्द्र अत्यन्त क्रोधित हुए और शक्तिशाली बादल भेजे जो सात दिनों तक वृन्दावन पर निरन्तर बरसते रहे। समूचा क्षेत्र जलमग्न होने लगा, और निवासी अत्यन्त विचलित हो गए। यद्यपि वे केवल सात वर्ष के थे, फिर भी श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर तथा उसे गाँव की रक्षा हेतु एक छत्र के समान धारण करके वृन्दावन के निवासियों को बचा लिया। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने देवता इन्द्र को यह शिक्षा दी कि उनकी ये बाधाएँ केवल उनकी छोटी-सी उँगली से रोकी जा सकती हैं। यह देखकर, भगवान् इन्द्र श्रीकृष्ण के समक्ष नतमस्तक हो गए।

इस प्रकार श्रीकृष्ण गोपीजन-वल्लभ के रूप में भी विख्यात हुए, जो यह संकेत करता है कि उनका एकमात्र कार्य गोपी-जन की रक्षा करना है। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन लोगों को यह सिखाने का लक्ष्य रखता है कि गोपी-जन, अर्थात् श्रीकृष्ण के शुद्ध प्रेमी कैसे बना जाए। जब हम ईश्वर के शुद्ध प्रेम की उस अवस्था तक पहुँच जाते हैं, तब भगवान् हमें किसी भी संकट से बचाएँगे, भले ही इसके लिए उन्हें कोई पहाड़ी अथवा पर्वत ही क्यों न उठाना पड़े। श्रीकृष्ण को गोवर्धन पर्वत उठाने के लिए किसी योग-पद्धति का अभ्यास नहीं करना पड़ा। ईश्वर के रूप में, वे सर्वशक्तिमान् हैं, बालक के रूप में भी। वे बालक के समान खेलते थे और दूसरों के साथ बालक के समान व्यवहार करते थे, किन्तु जब आवश्यकता हुई, तब उन्होंने स्वयं को सर्वशक्तिमान् ईश्वर के रूप में प्रकट किया। यही श्रीकृष्ण का, अर्थात् ईश्वर का स्वभाव है: उन्हें ईश्वर बनने के लिए ध्यान का अभ्यास अथवा किसी योग-पद्धति का अनुसरण नहीं करना पड़ता। वे कोई निर्मित प्रकार के ईश्वर नहीं हैं, अपितु नित्य रूप से ईश्वर हैं।

यद्यपि वे ईश्वर हैं, फिर भी वे अपने भक्तों के साथ प्रेममय सम्बन्धों का आनन्द लेते हैं, और अपने भक्तों को सन्तुष्ट करने हेतु वे प्रायः ऐसी भूमिकाएँ ग्रहण करते हैं जो गौण प्रतीत होती हैं। श्रीकृष्ण को प्रायः किसी भक्त का बालक बनना अच्छा लगता है, और इस प्रकार वे यशोदा के प्रिय बालक, यशोदा-नन्दन बन गए। चूँकि वे ईश्वर हैं और प्रत्येक उनकी आराधना करता है, इसलिए कोई उन्हें ताड़ना नहीं देता। तथापि, श्रीकृष्ण अपने भक्त माता-पिता द्वारा ताड़ना पाने का आनन्द लेते हैं, और चूँकि श्रीकृष्ण ताड़ना पाने में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, इसलिए भक्तगण भी यह भूमिका ग्रहण कर लेते हैं, यह कहते हुए, "ठीक है, मैं आपका पिता बनूँगा और आपको ताड़ना दूँगा।" इसी प्रकार, जब श्रीकृष्ण युद्ध करना चाहते हैं, तब उनका कोई भक्त हिरण्यकशिपु असुर बनकर उनसे लड़ता है। इस प्रकार, श्रीकृष्ण की समस्त गतिविधियाँ उनके भक्तों के सम्बन्ध में सम्पन्न होती हैं। यदि हम श्रीकृष्ण के ऐसे पार्षद बनने की आकांक्षा करते हैं, तो हमें कृष्णभावनामृत, अर्थात् श्रीकृष्ण के प्रति जागरूकता विकसित करनी होगी।

यशोदा-नन्दन व्रज-जन-रञ्जन। श्रीकृष्ण का एकमात्र कार्य व्रज-जनों को सन्तुष्ट करना है, और उनका एकमात्र कार्य श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट करना है। यही प्रेम की पारस्परिकता है। यमुना-तीर-वन-चारी: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों, ग्वालबालों, पक्षियों, भौंरों, तथा गौओं एवं बछड़ों को प्रसन्न करने हेतु यमुना के तट पर विचरण करते हैं। ये साधारण पक्षी, भौंरे, गौएँ, बछड़े अथवा मनुष्य नहीं हैं; इन सभी ने आत्म-साक्षात्कार के शिखर को प्राप्त कर लिया है और इस प्रकार, अनेकानेक जन्मों के पश्चात्, ऐसी स्थिति प्राप्त की है जिसके द्वारा वे श्रीकृष्ण के साथ खेल सकते हैं। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन प्रत्येक को कृष्णलोक जाने तथा मित्र, सेवक, पिता अथवा माता के रूप में श्रीकृष्ण का पार्षद बनने में समर्थ बना सकता है। श्रीकृष्ण अपने भक्त के सम्बन्ध में इनमें से कोई भी स्थिति ग्रहण करने को सहमत रहते हैं। वे यह कैसे करते हैं, यह सब हमारे ग्रन्थ भगवान् चैतन्य की शिक्षाएँ में वर्णित है। श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध का साक्षात्कार करने हेतु, हमें केवल भगवान् चैतन्य तथा उनके प्रमुख पार्षदों, अर्थात् छः गोस्वामियों—श्री रूप, सनातन, श्री जीव, गोपाल, रघुनाथ दास, तथा रघुनाथ भट्ट—के पदचिह्नों पर चलना है। ये गोस्वामीगण सदा हरे कृष्ण का जप तथा भावविभोर होकर नृत्य करने में संलग्न रहते थे। उन्होंने सिखाया कि जब कोई कृष्ण-कीर्तन, अर्थात् श्रीकृष्ण के पवित्र नामों के कीर्तन में मग्न हो जाता है, तब वह कृष्ण-प्रेम के सागर में विलीन हो जाता है। जैसे ही श्रीकृष्ण के नाम की ध्वनि गुंजायमान होती है, मनुष्य तत्क्षण प्रेम के सागर में विलीन हो सकता है। यही शुद्ध भक्ति का चिह्न है। इस प्रकार कीर्तनों के समय छः गोस्वामी तत्क्षण ईश्वर-प्रेम के सागर में विलीन हो जाते थे।

छः गोस्वामी न केवल भगवान् चैतन्य महाप्रभु के अन्य भक्तों को, अपितु अभक्तों को भी प्रिय थे। शुद्ध भक्त की स्थिति यह है कि उसका कोई शत्रु नहीं होता क्योंकि वह ईर्ष्यालु नहीं होता। शुद्ध भक्त सदा प्रत्येक के लिए खुला रहता है, और वह यह भेद नहीं करता कि इस व्यक्ति को हरे कृष्ण जप करने की अनुमति दी जा सकती है और उस व्यक्ति को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। भौतिक स्तर पर, जो द्वैत का स्तर है, ऊँच-नीच, पुरुष-स्त्री, तथा इस-उस के बीच भेद होते हैं, किन्तु आध्यात्मिक स्तर पर ऐसे कोई भेद नहीं होते। शुद्ध भक्त, समदृष्टि से प्रत्येक वस्तु को देखते हुए, इसी कारण ईर्ष्यारहित होता है। चूँकि वह ईर्ष्यारहित है, इसलिए वह आराध्य है। वस्तुतः, यहाँ तक कहा जा सकता है कि कोई व्यक्ति केवल इसीलिए आराध्य है यदि वह ईर्ष्यारहित है, क्योंकि ईर्ष्यारहित होना केवल आध्यात्मिक स्तर पर ही सम्भव है। यह भगवद्गीता (5.18–19) का भी निर्णय है:

vidyā-vinaya-sampanne

brāhmaṇe gavi hastini

śuni caiva śvapāke ca

paṇḍitāḥ sama-darśinaḥ

ihaiva tair jitaḥ sargo

yeṣāṁ sāmye sthitaṁ manaḥ

nirdoṣaṁ hi samaṁ brahma

tasmād brahmaṇi te sthitāḥ

"विनम्र ऋषि, यथार्थ ज्ञान के बल पर, एक विद्वान् एवं विनयशील ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ते तथा एक कुत्ता-भक्षक को समान दृष्टि से देखता है। जिनके मन समता एवं समभाव में स्थित हैं, उन्होंने जन्म-मृत्यु की अवस्थाओं को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं, और इस प्रकार वे पहले ही ब्रह्म में स्थित हैं।"

ऐसी स्थिति वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जिसने भगवान् चैतन्य की कृपा अर्जित की है। उनकी कृपा प्राप्त करने पर, कोई व्यक्ति पीड़ित मानवता को भौतिक कल्मष से उद्धार कर सकता है। चूँकि छः गोस्वामी ऐसे भक्त थे, इसलिए हम इस मन्त्र के साथ उन्हें अपना सादर प्रणाम अर्पित करते हैं: वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ। छः गोस्वामी संसार में वास्तविक धर्म की स्थापना करने के लक्ष्य से समस्त शास्त्रों का सूक्ष्मता से अध्ययन करने में निपुण थे। वे हमारे मार्गदर्शन हेतु अनेक ग्रन्थ छोड़ गए, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध श्री रूप गोस्वामी का भक्ति-रसामृत-सिन्धु (द नेक्टर ऑफ डिवोशन) है, जो नवदीक्षित भक्त को आरम्भिक दिशा-निर्देश देता है। गोस्वामीगण सदा अत्यन्त कठिन परिश्रम करते थे, दिन-रात, और उनका कार्य केवल ग्रन्थ लिखना, जप करना तथा नृत्य करना था। वस्तुतः, वे खाने, सोने, मैथुन करने तथा भय से अपनी रक्षा करने की शारीरिक आवश्यकताओं से प्रायः मुक्त थे। मैथुन का तो प्रश्न ही नहीं था, और न ही भय अथवा रक्षा का कोई प्रश्न था, क्योंकि वे पूर्णतः श्रीकृष्ण में लीन थे। वे अधिक से अधिक प्रतिदिन डेढ़ घण्टा सोते थे, और वे प्रायः कुछ भी नहीं खाते थे। जब भी उन्हें भूख लगती, तो वे केवल किसी गृहस्थ के घर जाकर एक या दो रोटी के टुकड़े माँग लेते थे।

ऐसे साधु-पुरुषों का ध्येय केवल यही है कि प्रत्येक को आध्यात्मिक चेतना तक उन्नत करके पीड़ित मानवता को सुखी बनाएँ। भौतिक जगत् में, प्रत्येक एक-दूसरे का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है—एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है, एक समाज दूसरे का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है, एक व्यापारी दूसरे का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है, इत्यादि। इसे अस्तित्व के लिए संघर्ष कहा जाता है, और इसी से संघर्षरत लोगों ने एक नियम गढ़ लिया है जिसका नाम है "जिसकी लाठी उसकी भैंस", किन्तु हम वास्तव में देख सकते हैं कि सबसे शक्तिशाली को भी संघर्ष करना पड़ता है, ठीक जैसा वर्तमान विश्व-स्थिति में है। रूस, अमेरिका तथा चीन के बीच एक महान् संघर्ष चल रहा है। ऐसे संघर्ष के कारण, प्रत्येक कष्ट भोग रहा है। वस्तुतः, अस्तित्व के लिए संघर्ष का अर्थ ही कष्ट है। तथापि, श्रीकृष्ण के शुद्ध भक्तगण दूसरों का शोषण करने में नहीं, अपितु लोगों को सुखी बनाने में रुचि रखते हैं, और इसी कारण समस्त लोकों में उनकी आराधना की जाती है। चाणक्य पण्डित ने तो यहाँ तक कहा कि एक धनी मनुष्य तथा एक विद्वान् मनुष्य की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि एक धनी मनुष्य अपने ही देश में अथवा अपने ही लोक में सम्मानित हो सकता है, किन्तु एक विद्वान् मनुष्य, अर्थात् ईश्वर का भक्त, जहाँ भी जाता है वहीं सम्मानित होता है।

भक्त के लिए स्वर्ग एवं नरक में भी कोई भेद नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण दोनों ही स्थानों पर उसके साथ रहते हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ नरक का प्रश्न ही नहीं उठता; प्रत्येक स्थान वैकुण्ठ है। उदाहरणार्थ, हरिदास ठाकुर पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे, क्योंकि उनका जन्म एक मुसलमान परिवार में हुआ था, और हिन्दू मुसलमानों के मन्दिर में प्रवेश करने का विरोध करते थे। तथापि, हरिदास ठाकुर ने इससे स्वयं को विचलित नहीं होने दिया। उन्होंने सोचा, "ओह, मैं जाकर उन्हें क्यों विचलित करूँ? मैं यहीं जप करूँगा।" परिणामस्वरूप भगवान् चैतन्य, जो स्वयं भगवान् जगन्नाथ हैं, हरिदास से मिलने प्रतिदिन आते थे। यही शुद्ध भक्त की शक्ति है: उसे जगन्नाथ के पास नहीं जाना पड़ता; जगन्नाथ उसके पास आते हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु जब समुद्र में स्नान करने जाते थे, तब प्रतिदिन हरिदास ठाकुर से मिलने जाया करते थे। भगवान् हरिदास की कुटिया में प्रवेश करके पूछते, "हरिदास, तुम क्या कर रहे हो?" और हरिदास उत्तर देते, "कृपया भीतर पधारिए, हे मेरे प्रभु।" अतः यही भक्त की वास्तविक स्थिति है। अतएव श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके भक्त की उपासना स्वयं उनकी उपासना से भी अधिक मूल्यवान् है। भक्त वास्तव में श्रीकृष्ण को प्रदान करने में समर्थ है, क्योंकि वह कृष्णभावनामृत के विज्ञान को, श्रीकृष्ण के वचनों को सुनने के विज्ञान को, कृष्ण-प्रसादम् ग्रहण करने तथा श्रीकृष्ण का आनन्द लेने के विज्ञान को जानता है। निर्विशेषवादी तथा शून्यवादी अहं ब्रह्मास्मि—"मैं आत्मा हूँ"—पर शुष्क दार्शनिक ग्रन्थों का उपदेश दे सकते हैं, किन्तु अन्ततः कौन आकृष्ट होगा? जो सोचता है, "मैं पत्थर हूँ", और जो सोचता है, "मैं शून्य हूँ", उनमें क्या अन्तर है? हम पत्थर, काठ अथवा शून्य क्यों बनें? हमारी वास्तविक स्थिति श्रीकृष्ण के साथ प्रेममय व्यवहार में पारस्परिकता निभाने की होनी चाहिए।

श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम की चिनगारी आध्यात्मिक गुरु, अर्थात् शुद्ध भक्त के द्वारा प्रज्वलित की जाती है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मेरे आध्यात्मिक गुरु, हिज़ डिवाइन ग्रेस ॐ विष्णुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद ने मुझे पाश्चात्य जगत् में कृष्णभावनामृत के प्रसार का उत्तरदायित्व ग्रहण करने का आदेश दिया। हिज़ डिवाइन ग्रेस की पाश्चात्य देशों में भगवान् चैतन्य के सन्देश का प्रचार करने की महान् इच्छा थी, और मेरी सफलता उनकी कृपा एवं प्रसन्नता दोनों है। जब मैं प्रथम बार अपने आध्यात्मिक गुरु से मिला, तब मैं भारत में एक अत्यन्त युवा व्यक्ति था, एक राष्ट्रवादी, एक अत्यन्त उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यालय में संलग्न। किन्तु यद्यपि मैं जाना नहीं चाहता था, फिर भी मेरे एक मित्र ने, जो आज भी कलकत्ता में जीवित हैं, मुझे हिज़ डिवाइन ग्रेस के पास बलपूर्वक ले गए। मैं उनसे मिलने में अनिच्छुक था क्योंकि हमारे घर में हमारे पिता अनेक संन्यासियों का स्वागत किया करते थे और मैं उनके व्यवहार से बहुत सन्तुष्ट नहीं था। मैंने सोचा कि भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज भी कोई वैसे ही व्यक्ति होंगे, और यदि वे वैसे ही हुए, तो उनसे मिलने में मेरा क्या प्रयोजन? किन्तु मेरे मित्र मुझे बलपूर्वक ले गए। "उनसे मिल क्यों नहीं लेते?" उन्होंने पूछा। मैं अन्ततः मान गया और उनके साथ गया, और मुझे लाभ हुआ।

मेरी प्रथम भेंट पर, हिज़ डिवाइन ग्रेस ने कहा कि मेरे जैसे शिक्षित युवकों का विदेशी देशों में जाकर चैतन्य महाप्रभु के सुसमाचार का प्रचार करना आवश्यक है। मैंने उत्तर दिया कि भारत एक विदेशी-शासित राष्ट्र है और कोई हमारे सन्देशों को नहीं सुनेगा। वस्तुतः, उस समय विदेशी भारतीयों को अत्यन्त तुच्छ समझते थे, क्योंकि इतने सारे स्वतन्त्र राष्ट्रों के समक्ष भारत अब भी परतन्त्र था, ब्रिटेन के अधीन। उस समय एक बंगाली कवि थे जिन्होंने वास्तव में यह विलाप किया कि असभ्य राष्ट्र तक स्वतन्त्र थे, जबकि भारत ब्रिटेन पर निर्भर था। हिज़ डिवाइन ग्रेस ने मुझे आश्वस्त किया कि परतन्त्रता एवं स्वतन्त्रता केवल अस्थायी अवस्थाएँ हैं, और उन्होंने इंगित किया कि चूँकि हम मानवता के नित्य कल्याण से सरोकार रखते हैं, इसलिए हमें चैतन्य महाप्रभु की इस चुनौती को ग्रहण करना चाहिए। हिज़ डिवाइन ग्रेस, मेरे गुरु महाराज के साथ यह भेंट 1922 में हुई, अर्थात् आधी शताब्दी पूर्व।

मुझे विधिवत् दीक्षा 1933 में मिली, अर्थात् गुरु महाराज के इस मर्त्यलोक से प्रयाण से ठीक तीन वर्ष पूर्व। अन्तिम क्षण में, उनके प्रयाण से ठीक एक पखवाड़ा पूर्व, उन्होंने मुझे एक पत्र लिखकर अपने निर्देशों को दोहराया। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि मुझे यह सुसमाचार अंग्रेज़ी-भाषी लोगों के मध्य प्रचारित करने का प्रयत्न करना चाहिए। यह पत्र पाने के पश्चात्, मैं कभी-कभी स्वप्न देखता था कि गुरु महाराज मुझे बुला रहे हैं और मैं घर छोड़कर उनका अनुसरण कर रहा हूँ। मैं इस प्रकार स्वप्न देखता था और सोचता था, "मुझे अपना घर त्यागना होगा। मेरे गुरु महाराज चाहते हैं कि मैं अपना घर त्यागकर संन्यास ग्रहण करूँ।" साथ ही मैं सोचता था, "यह तो भयानक है। मैं अपना घर कैसे छोड़ूँ? अपनी पत्नी को? अपने बच्चों को?" इसे माया कहा जाता है। वस्तुतः मैं अपना गृहस्थ-जीवन त्यागना नहीं चाहता था, किन्तु गुरु महाराज ने मुझसे उसे त्यागवा दिया। उनके आदेशों का पालन करते हुए, मैंने अपना घर, कुछ बच्चों सहित, छोड़ दिया, किन्तु अब गुरु महाराज ने मुझे समूचे संसार में अनेक सुन्दर बच्चे दे दिए हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण की सेवा करने से किसी की हानि नहीं होती, और यह मेरे अपने व्यावहारिक अनुभव का एक उदाहरण है।

जब मैं 1965 में अकेला भारत से निकला, तब मुझे भय था कि मुझे बहुत कठिनाई होगी। भारत सरकार मुझे देश से कोई धन बाहर ले जाने की अनुमति नहीं देती थी, अतः मैं केवल कुछ ग्रन्थ तथा चालीस रुपए लेकर आया। मैं ऐसी ही अवस्था में न्यूयॉर्क नगर पहुँचा, किन्तु यह सब गुरु महाराज तथा श्रीकृष्ण की कृपा से हुआ। सब कुछ श्रीकृष्ण तथा आध्यात्मिक गुरु की संयुक्त कृपा से होता है। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि श्रीकृष्ण की कृपा तथा गुरु की कृपा संयुक्त रहती हैं। यही इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन की सफलता का रहस्य है। श्रीकृष्ण सदा हमारे भीतर रहते हैं, और इसी कारण वे हमारे प्रयोजनों के विषय में सब कुछ जानते हैं, और वे हमें वैसा कार्य करने का अवसर देते हैं जैसा हम निर्णय करते हैं। यदि हम इस भौतिक जगत् का भोग करने का निर्णय करें, तो श्रीकृष्ण हमें एक अत्यन्त चतुर व्यापारी अथवा एक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ अथवा एक धूर्त मनुष्य बनने की बुद्धि देते हैं ताकि हम धन कमा सकें और अपना भोग कर सकें। भौतिक जीवन के मानदण्डों के अनुसार, अनेक लोग महान् बन रहे हैं। वे अत्यन्त दरिद्र मनुष्यों के रूप में आरम्भ करते हैं और शीघ्र ही, सौभाग्यवश, करोड़पति बन जाते हैं। तथापि, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे अपने तुच्छ प्रयासों से ऐसी सफलता प्राप्त कर रहे हैं। बुद्धि के बिना, कोई उन्नति नहीं कर सकता, और वह बुद्धि श्रीकृष्ण द्वारा दी जाती है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे प्रत्येक के हृदय में परमात्मा के रूप में आसीन हैं और कि उनकी इच्छा से मनुष्य स्मरण कर सकता है, और उनकी इच्छा से मनुष्य भूल सकता है। श्रीकृष्ण जीव की इच्छा के अनुसार विस्मृति एवं स्मृति प्रदान करते हैं। यदि हम श्रीकृष्ण को भूलकर भौतिक जगत् का भोग करना चाहें, तो वे हमें आवश्यक बुद्धि देंगे ताकि हम उन्हें सदा के लिए भूल सकें।

अनेक लोग सोच रहे हैं, "मैं इस भौतिक जगत् का अत्यन्त भली-भाँति भोग कर सकता हूँ। प्रत्येक व्यक्ति इतना अच्छा समय बिता रहा है। कोई कारण नहीं कि मैं उतना भोग न कर सकूँ जितना वे करते हैं।" यह विचार भ्रम है क्योंकि भौतिक जगत् में कोई वास्तविक भोग नहीं है। हम राष्ट्रपति केनेडी के समान किसी अत्यन्त उच्च पद तक उठ सकते हैं। हम अत्यन्त सुन्दर, अत्यन्त विख्यात, अत्यन्त बुद्धिमान् एवं सुशिक्षित, अत्यन्त धनी एवं अत्यन्त शक्तिशाली हो सकते हैं, और हमारी एक अत्यन्त सुन्दर पत्नी एवं बच्चे हो सकते हैं तथा हम देश का सर्वोच्च पद धारण कर सकते हैं—किन्तु किसी भी क्षण हम गोली से मारे जाने के अधीन हैं। यही भौतिक जगत् का स्वभाव है: हमें पग-पग पर संकट का सामना करना पड़ता है। बिना अवरोधों के सुख का प्रश्न ही नहीं है। यहाँ तक कि जब सुख अर्जित किए जाते हैं, तब भी वे बहुत अधिक संघर्ष एवं त्याग के पश्चात् अर्जित किए जाते हैं, और जो भी सुख अर्जित किया जाए वह क्षणभंगुर होता है, क्योंकि भौतिक जगत् में ऐसा कोई सुख नहीं है जो हमें निरन्तर एवं अनन्त भोग दे सके। केवल श्रीकृष्ण ही हमें वह दे सकते हैं।

अतएव श्रीकृष्ण भगवद्गीता में उपदेश देते हैं कि प्रत्येक जीव का कल्याण इसी में है कि वह इस निरर्थक भौतिक गतिविधि को त्यागकर केवल उनकी शरण ग्रहण कर ले। दुर्भाग्यवश, इस युग में लोग भौतिक प्रकृति की चकाचौंध से, भ्रम अथवा माया से इतने आकृष्ट हैं कि उन्हें बहुत रुचि नहीं है। श्रीकृष्ण तो यहाँ तक घोषित करते हैं कि यदि कोई उनकी शरण ग्रहण करे, तो वे समस्त पापमय प्रतिक्रियाओं से पूर्ण रक्षा प्रदान करेंगे, फिर भी लोग इतने आसक्त हैं कि वे ऐसा नहीं कर पाते। लोग सदा भयभीत रहते हैं कि श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करने से वे कुछ खो देंगे, ठीक जैसे मुझे पाश्चात्य जगत् में जाकर प्रचार करने से अपना परिवार खोने का भय था। किन्तु श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि यदि वे कुछ ले भी लें, तो वे हमें सहस्रों गुना अधिक पुरस्कृत करेंगे।

आध्यात्मिक गुरु भी इस अर्थ में दयालु हैं कि वे द्वार-द्वार, देश-देश, नगर-नगर भिक्षा माँगते हैं: "हे मेरी प्रिय देवियो एवं सज्जनो, हे मेरे प्रिय बालको एवं बालिकाओ, कृपया कृष्णभावनामृत को अपनाइए।" इस प्रकार वे श्रीकृष्ण की अत्यन्त गोपनीय सेवा करते हैं। श्रीकृष्ण वे परमेश्वर हैं जो आदेश देते हैं, और आध्यात्मिक गुरु उन आदेशों का सम्पादन करते हैं; इसी कारण आध्यात्मिक गुरु श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं। श्रीकृष्ण उन्हें स्वर्ग भेजें अथवा नरक, इससे उनके लिए कोई अन्तर नहीं पड़ता। आध्यात्मिक गुरु, अर्थात् शुद्ध भक्त के लिए, स्वर्ग एवं नरक दोनों समान हैं यदि वहाँ कृष्णभावनामृत न हो। नरक में लोग अनेक प्रकार से कष्ट भोग रहे हैं, और स्वर्ग में वे अनेक प्रकार से अपनी इन्द्रियों का भोग कर रहे हैं, किन्तु भगवान् का भक्त किसी भी ऐसे स्थान पर रह सकता है जहाँ कृष्णभावनामृत हो, और चूँकि वह इस चेतना को अपने साथ लाता है, इसलिए वह सदा आत्म-सन्तुष्ट रहता है। यदि उसे नरक भेज दिया जाए, तो वह केवल हरे कृष्ण का जप करके सन्तुष्ट रहेगा। वस्तुतः, वह नरक में नहीं, अपितु श्रीकृष्ण में विश्वास करता है। इसी प्रकार, यदि उसे स्वर्ग में रख दिया जाए, जहाँ इन्द्रियतृप्ति के इतने सारे अवसर हैं, तो वह वहाँ भी अलिप्त रहेगा, क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा सन्तुष्ट हैं। इस प्रकार भगवान् की सेवा हेतु एक भक्त कहीं भी जाने को तैयार रहता है, और इसी कारण वह श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है।

विरक्त निर्विशेषवादी दार्शनिक कहते हैं कि यह संसार मिथ्या है और कि निराकार ब्रह्म ही सत्य है। किन्तु यदि उनसे ऐसे समाज में जाने को कहा जाए जहाँ भौतिक इन्द्रियतृप्ति प्रधान हो, तो वे उन परिस्थितियों से प्रभावित होने के भय से इन्कार कर देंगे। तथापि, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के लिए ऐसी कोई कठिनाई नहीं है। चूँकि वह संयमित है और उसने श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण कर ली है, इसलिए वह कहीं भी जाने से नहीं डरता।

फलस्वरूप, जब भक्तगण किसी ऐसे स्थान पर मिलते हैं जहाँ कृष्णभावनामृत नहीं है, तब कोई हानि नहीं है, क्योंकि वे हरे कृष्ण का जप करने तथा उस स्थान को कृष्णभावनामृत से ओतप्रोत करने का अवसर ले लेते हैं। यह अवसर सदा लिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मनुष्य को स्वयं को किसी कक्ष में बन्द करके अकेले जप करना चाहिए। महान् ऋषि नारद एक अन्तरिक्ष-यात्री हैं जो समूचे ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते हैं। यद्यपि वे सर्वाधिक उन्नत लोकों में निवास कर सकते हैं, फिर भी वे कभी-कभी नरक में जाकर वहाँ प्रचार करते हैं। यही ईश्वर के सेवक की सुन्दरता है—वह सदा श्रीकृष्ण तथा उनके अंशों के प्रति प्रेम के कारण कार्य करता रहता है।

भक्ति-सेवा का अन्तर्निहित सिद्धान्त श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम है। किसी विशेष भक्त की स्थिति चाहे जो भी हो—श्रीकृष्ण के मित्र, सेवक, माता-पिता अथवा प्रेमी के रूप में—उसकी सेवा निःशर्त होती है, क्योंकि कृष्णभावनामृत किसी भौतिक परिस्थिति पर निर्भर नहीं है। वह दिव्य है और उसका भौतिक प्रकृति के गुणों से कोई सरोकार नहीं है। भक्त कहीं भी जाने से नहीं डरता, और इसी कारण वह समस्त भौतिक परिस्थितियों को समान देखता है। संसार में हम कह सकते हैं कि यह रहने का अच्छा स्थान है और वह बुरा स्थान है, किन्तु, जैसा पहले इंगित किया गया, भक्त इन मानसिक कल्पनाओं के अधीन नहीं है। उसके लिए भौतिक अस्तित्व का मूल सिद्धान्त ही बुरा है, क्योंकि भौतिक अस्तित्व का अर्थ है श्रीकृष्ण की विस्मृति।

भक्ति की तटस्थ अवस्था में मनुष्य भगवान् की निराकार दीप्ति को तथा हृदय के भीतर स्थित परमात्मा को अधिक महत्त्व दे सकता है, किन्तु कृष्णभावनामृत वास्तव में तब विकसित होता है जब मनुष्य सोचता है, "श्रीकृष्ण मेरे घनिष्ठ सम्बन्धों के अत्यन्त घनिष्ठ स्वामी हैं।" आरम्भ में, निस्सन्देह, निराकार साक्षात्कार तथा परमात्मा का साक्षात्कार कृष्णभावनामृत के अंग हैं। ईश्वर का उनके निराकार पक्ष में अथवा परमात्मा के रूप में उनके पक्ष में आंशिक साक्षात्कार मनुष्य को भगवान् के प्रति श्रद्धा विकसित करने में समर्थ बनाता है, किन्तु जब मनुष्य का श्रीकृष्ण के साथ मित्र, स्वामी, पुत्र अथवा प्रेमी के रूप में घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है, तब वह श्रद्धा लुप्त हो जाती है।

व्यक्तिगत सम्बन्ध का यह स्तर निश्चय ही निराकार स्तर अथवा परमात्मा, अर्थात् परमात्मा के साक्षात्कार के स्तर से उच्चतर है। तटस्थ धारणा में, मनुष्य केवल यह अनुभव करता है कि वह तथा परम सत्य गुणतः एक हैं, अथवा वह अनुभव करता है कि वह परम का अंश है। यह निश्चय ही ज्ञान है, क्योंकि जब मनुष्य श्रीकृष्ण के साथ सेवक के रूप में व्यक्तिगत सम्बन्ध विकसित करता है, तब वह परमेश्वर के पूर्ण ऐश्वर्य की सराहना करने लगता है। जो यह अनुभव करता है कि ईश्वर छः ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, वह वास्तव में सेवा अर्पित करने लगता है। जैसे ही मनुष्य श्रीकृष्ण की महानता के प्रति जागरूक हो जाता है और श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता को समझ लेता है, उसकी सेवा आरम्भ हो जाती है। दिव्य सेवा अर्पित किए जाने पर ईश्वर की महानता के प्रति जागरूकता बढ़ती है। जो व्यक्ति भगवान् की इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने हेतु भगवान् की सेवा करता है, वह सन्तुष्ट हो जाता है, क्योंकि श्रीकृष्ण परमात्मा हैं और व्यक्तिगत जीव उनका अंश है। यदि वे सन्तुष्ट हैं, तो जीव सन्तुष्ट है। यदि पेट सन्तुष्ट है, तो शरीर के समस्त अंग सन्तुष्ट हैं, क्योंकि वे पेट के माध्यम से पोषण प्राप्त करते हैं। जब मेरे एक गुरुभाई ने एक अत्यन्त गर्म दिन में मेरे गुरु महाराज को पंखा झलना आरम्भ किया, तब गुरु महाराज ने पूछा, "तुम अकस्मात् मुझे पंखा क्यों झल रहे हो?" उस बालक ने उत्तर दिया, "क्योंकि यदि आप सन्तुष्ट हैं, तो हम सभी सन्तुष्ट हैं।" यही सूत्र है—हमें अपनी इन्द्रियों को पृथक् रूप से सन्तुष्ट करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, अपितु श्रीकृष्ण की इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करना चाहिए। तब स्वाभाविक रूप से हम सन्तुष्ट हो जाएँगे।

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सदा श्रीकृष्ण को सन्तुष्टि देने का प्रयत्न करता रहता है, और यही कृष्णभावनामृत का आरम्भ है। चूँकि निराकार धारणा में ईश्वर का कोई रूप नहीं है, इसलिए उनकी इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने का कोई अवसर नहीं है। तथापि, जो श्रीकृष्ण को स्वामी के रूप में देखता है, वह सेवा अर्पित कर सकता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को हृषीकेश, अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी के रूप में सम्बोधित किया गया है। जब यह समझ लिया जाता है कि परम सत्य इन्द्रियों के स्वामी हैं, कि हमारी इन्द्रियाँ उनकी इन्द्रियों की उपज हैं, और कि उन्हें इसीलिए उनकी इन्द्रियों की सन्तुष्टि हेतु प्रयुक्त किया जाना चाहिए, तब कृष्णभावनामृत, जो प्रत्येक के भीतर सुप्त है, जागृत होने लगता है। एक बार चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, "श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में तटस्थ स्थिति तथा स्वामी एवं सेवक के सम्बन्ध में क्या अन्तर है?" दोनों ही दशाओं में मनुष्य समझ सकता है कि श्रीकृष्ण महान् हैं, किन्तु तटस्थ स्थिति में सेवा की कोई प्रवृत्ति नहीं होती। इसी कारण श्रीकृष्ण तथा जीव के बीच स्वामी-सेवक का सम्बन्ध अधिक उन्नत है। फिर जब मनुष्य श्रीकृष्ण के साथ मैत्री प्राप्त करता है, तब एक और दिव्य गुण जुड़ जाता है। यह धारणा रहती है कि ईश्वर महान् हैं और उनकी सेवा अर्पित की जानी चाहिए, किन्तु एक अतिरिक्त भाव भी रहता है: "श्रीकृष्ण मेरे मित्र हैं। अतएव मुझे उनके साथ इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए कि वे प्रसन्न रहें।" मित्र के साथ हम केवल सेवा अर्पित करने मात्र से सन्तुष्ट नहीं होते, अपितु उसे वास्तव में सुखी एवं सन्तुष्ट बनाने में सन्तुष्ट होते हैं। ऐसे सम्बन्ध में समानता भी होती है, क्योंकि श्रीकृष्ण तथा भक्त समान स्तर पर सम्बन्ध रखते हैं। इस प्रकार इस स्थिति में भक्तगण वास्तव में श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता को भूल जाते हैं। जब श्रीकृष्ण के बालमित्र खेल खेलते हुए श्रीकृष्ण के कन्धों पर सवारी करते थे, तब वे यह नहीं सोचते थे कि वे उनसे बड़े हैं। वहाँ इन्द्रियतृप्ति अथवा आत्म-महिमा का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध शुद्ध प्रेम पर आधारित है। भक्त की एकमात्र इच्छा श्रीकृष्ण को सुख देने की है, और श्रीकृष्ण भी उनसे सुख प्राप्त करने हेतु अपने मित्रों को अपने कन्धों पर बैठाते हैं। कभी-कभी कोई व्यक्ति केवल इस तथ्य को स्वीकार कर लेता है कि उसका मित्र उसके मुख पर थप्पड़ मारेगा—किन्तु ऐसे कार्य में हीनता का कोई प्रश्न नहीं है। जब मैत्री एवं पारस्परिक सुख सम्बन्ध का आधार हों, तब अपमान अथवा हीनता का कोई प्रश्न नहीं रहता।

कृष्णभावनामृत तथा श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध का समूचा आधार स्वयं श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है। श्रीमती राधारानी, व्रज की कन्याएँ, तथा श्रीकृष्ण के ग्वालबाल मित्र—सभी श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति के विस्तार हैं। हम सभी में सुख की ओर एक प्रवृत्ति है, क्योंकि जिस स्रोत से हम निःसृत होते हैं वह सुख में पूर्णतः सामर्थ्यवान् है। निर्विशेषवादी इन शब्दों में नहीं सोच सकते, क्योंकि वे आह्लादिनी शक्ति का खण्डन करते हैं; अतएव निर्विशेषवादी दर्शन अपूर्ण एवं निम्न है। जो कृष्णभावनामृत में हैं, वे श्रीकृष्ण में तथा उनकी समस्त सामग्री—उनके मित्रों, सेवकों, पिता, माता तथा प्रियतमा—में आह्लादिनी शक्ति को पहचानते हैं। श्रीकृष्ण के साथ वे समस्त सम्बन्ध जिनका लक्ष्य श्रीकृष्ण की इन्द्रियों को सन्तुष्ट करना है, श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं।

जहाँ तक व्यक्तिगत आत्मा का प्रश्न है, वह मूलतः इस आह्लादिनी शक्ति का, अर्थात् स्वयं सुख के आगार का अंश है। तथापि, भौतिक प्रकृति के सम्पर्क के कारण, आत्मा अपनी वास्तविक स्थिति को भूल गई है और एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण की क्रमिक प्रक्रिया में फँस गई है। इस प्रकार मनुष्य अस्तित्व के लिए कठिन संघर्ष करता है। अब हमें संघर्ष के इन कष्टों से, उन असंख्य देहान्तरणों से जो हमें जन्म, वृद्धावस्था, रोग एवं मृत्यु के दुःख भोगने पर विवश करते हैं, स्वयं को निकालना होगा और कृष्णभावनामृत में अपने नित्य जीवन के बिन्दु तक आना होगा। वह नित्य जीवन सम्भव है। यदि कोई इस मानव-जीवन में अपना सर्वोत्तम प्रयत्न करे, तो अपने अगले जीवन में उसे एक आध्यात्मिक शरीर मिलेगा। आध्यात्मिक शरीर पहले से ही स्थूल भौतिक शरीर के भीतर है, किन्तु वह तभी विकसित होगा जब मनुष्य इस भौतिक अस्तित्व के कल्मष से मुक्त हो जाए। यही मानव-जीवन का ध्येय तथा समस्त लोगों का वास्तविक स्वार्थ है। स्वार्थ का अर्थ वस्तुतः यह अनुभव करना है, "मैं ईश्वर का अंश हूँ। मुझे ईश्वर के राज्य में लौटना है और उनसे जा मिलना है।" जिस प्रकार यहाँ हमारा एक सामाजिक जीवन है, उसी प्रकार ईश्वर का आध्यात्मिक राज्य में एक सामाजिक जीवन है, और हम वहाँ उनसे जा मिल सकते हैं। ऐसा नहीं है कि इस शरीर को समाप्त करने के पश्चात् हम शून्य हो जाते हैं। भगवद्गीता (2.12) में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, "ऐसा कभी नहीं था जब मैं विद्यमान न था, न ही तुम, न ही ये समस्त राजा, और न ही भविष्य में हममें से कोई विद्यमान रहना बन्द करेगा।" अतएव हमारा अस्तित्व नित्य है, और जन्म-मृत्यु के परिवर्तन केवल क्षणभंगुर भौतिक शरीरों के परिवर्तन हैं।
