### CC Adi 1.35

> মন্ত্রগুরু আর যত শিক্ষাগুরুগণ ।\
> তাঁহার চরণ আগে করিয়ে বন্দন ॥৩৫॥

> mantra-guru āra yata śikṣā-guru-gaṇa\
> tāṅhāra caraṇa āge kariye vandana

*मन्त्र-गुरु*—दीक्षा-गुरु; *आर*—तथा; *यत*—जितने भी (हों); *शिक्षा-गुरु-गण*—समस्त शिक्षा-गुरु; *ताङ्हार*—उन सबके; *चरण*—चरणकमलों को; *आगे*—सर्वप्रथम; *करिये*—मैं अर्पित करता हूँ; *वन्दन*—सादर प्रणाम।

**मैं सर्वप्रथम अपने दीक्षा-गुरु तथा अपने समस्त शिक्षा-गुरुओं के चरणकमलों में सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ।**

श्रील जीव गोस्वामी ने अपने ग्रन्थ भक्ति-सन्दर्भ (२०२) में कहा है कि निष्कलंक भक्ति शुद्ध वैष्णवों का लक्ष्य है और मनुष्य को ऐसी सेवा अन्य भक्तों के संग में सम्पन्न करनी चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण के भक्तों का संग करने से मनुष्य में कृष्णभावनामृत का भाव विकसित होता है और इस प्रकार वह भगवान् की प्रेममयी सेवा की ओर प्रवृत्त होता है। भक्ति में क्रमिक अभिरुचि के द्वारा परमेश्वर के समीप पहुँचने की यही विधि है। यदि कोई अनन्य भक्ति की कामना करता है, तो उसे श्री कृष्ण के भक्तों का संग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि ऐसे संग से ही बद्धजीव दिव्य प्रेम के प्रति रुचि प्राप्त कर सकता है और इस प्रकार किसी विशिष्ट प्रकटीकरण में तथा उस विशिष्ट दिव्य रस के अनुरूप, जो उसमें नित्य निहित है, भगवान् के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को पुनर्जीवित कर सकता है।

यदि कोई कृष्णभावनामृतमय कार्यों के द्वारा श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम विकसित करता है, तो वह परम परब्रह्म को जान सकता है, किन्तु जो केवल तार्किक युक्तियों के द्वारा भगवान् को समझने का प्रयत्न करता है, वह न तो सफल होगा, न ही उसे अनन्य भक्ति के प्रति रुचि प्राप्त होगी। रहस्य यह है कि मनुष्य को उन लोगों से विनम्रतापूर्वक सुनना चाहिए जो भगवान् के विज्ञान को पूर्ण रूप से जानते हैं, और मनुष्य को गुरु द्वारा नियमित सेवा-विधि का आरम्भ करना चाहिए। जो भक्त पहले से ही परमेश्वर के नाम, रूप, गुण आदि से आकृष्ट है, उसे भक्ति की उसकी विशिष्ट विधि की ओर निर्देशित किया जा सकता है; उसे तर्क के द्वारा भगवान् के समीप पहुँचने में समय नष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। निपुण आध्यात्मिक गुरु भली-भाँति जानते हैं कि अपने शिष्य की ऊर्जा को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में किस प्रकार संलग्न किया जाए, और इस प्रकार वे एक भक्त को उसकी विशेष प्रवृत्ति के अनुसार किसी विशिष्ट भक्ति में संलग्न करते हैं। एक भक्त का केवल एक ही दीक्षा-गुरु होना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में एक से अधिक को स्वीकार करना सदा वर्जित है। तथापि, मनुष्य जितने शिक्षा-गुरु स्वीकार कर सकता है, उनकी संख्या की कोई सीमा नहीं है। सामान्यतः जो आध्यात्मिक गुरु किसी शिष्य को आध्यात्मिक विज्ञान में निरन्तर शिक्षा देता है, वही आगे चलकर उसका दीक्षा-गुरु बन जाता है।

मनुष्य को सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करने तथा दीक्षित होने में अनिच्छुक है, वह भगवद्धाम वापस जाने के अपने प्रयास में निश्चय ही असफल होगा। जो मनुष्य समुचित रूप से दीक्षित नहीं है, वह स्वयं को एक महान् भक्त के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, किन्तु वस्तुतः उसे आध्यात्मिक साक्षात्कार की ओर अपनी प्रगति के पथ पर अनेक बाधाओं का सामना अवश्य करना पड़ता है, जिसके फलस्वरूप उसे बिना किसी राहत के अपने भौतिक अस्तित्व की अवधि निरन्तर चलानी पड़ती है। ऐसे असहाय व्यक्ति की तुलना पतवार रहित जलयान से की जाती है, क्योंकि ऐसा जलयान कभी अपने गन्तव्य तक नहीं पहुँच सकता। अतः यह अनिवार्य है कि यदि मनुष्य भगवान् की कृपा प्राप्त करना चाहता है, तो वह आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करे। आध्यात्मिक गुरु की सेवा अनिवार्य है। यदि आध्यात्मिक गुरु की प्रत्यक्ष सेवा करने का अवसर न हो, तो भक्त को उनके उपदेशों का स्मरण करके उनकी सेवा करनी चाहिए। आध्यात्मिक गुरु के उपदेशों तथा स्वयं आध्यात्मिक गुरु में कोई अन्तर नहीं है। अतः उनकी अनुपस्थिति में, उनके मार्गदर्शन के वचन शिष्य का गौरव होने चाहिए। यदि कोई यह सोचता है कि वह आध्यात्मिक गुरु सहित किसी अन्य से परामर्श करने से ऊपर है, तो वह तत्क्षण भगवान् के चरणकमलों का अपराधी बन जाता है। ऐसा अपराधी कभी भगवद्धाम वापस नहीं जा सकता। यह अनिवार्य है कि एक गम्भीर व्यक्ति शास्त्रीय आदेशों के अनुसार एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करे। श्री जीव गोस्वामी सलाह देते हैं कि मनुष्य आध्यात्मिक गुरु को वंशानुगत अथवा प्रथागत सामाजिक एवं धार्मिक परम्पराओं के आधार पर स्वीकार न करे। मनुष्य को आध्यात्मिक बोध में वास्तविक उन्नति हेतु केवल एक वास्तविक रूप से योग्य आध्यात्मिक गुरु को खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।
