### CC Adi 1.8

> মায়াতীতে ব্যাপিবৈকুণ্ঠলোকে\
> পূর্ণৈশ্বর্যে শ্রীচতুর্ব্যূহমধ্যে ।\
> রূপং যস্যোদ্ভাতি সঙ্কর্ষণাখ্যং\
> তং শ্রীনিত্যানন্দরামং প্রপদ্যে ॥৮॥

> māyātīte vyāpi-vaikuṇṭha-loke\
> pūrṇaiśvarye śrī-catur-vyūha-madhye\
> rūpaṁ yasyodbhāti saṅkarṣaṇākhyaṁ\
> taṁ śrī-nityānanda-rāmaṁ prapadye

*माया-अतीते*—भौतिक सृष्टि से परे; *व्यापि*—सर्वव्यापी; *वैकुण्ठ-लोके*—आध्यात्मिक जगत् वैकुण्ठलोक में; *पूर्ण-ऐश्वर्ये*—पूर्ण ऐश्वर्य से सम्पन्न; *श्री-चतुः-व्यूह-मध्ये*—चतुर्व्यूह (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध) के मध्य; *रूपम्*—रूप; *यस्य*—जिनका; *उद्भाति*—प्रकट होता है; *सङ्कर्षण-आख्यम्*—सङ्कर्षण के नाम से विख्यात; *तम्*—उनको; *श्री-नित्यानन्द-रामम्*—भगवान् नित्यानन्द के रूप में भगवान् बलराम को; *प्रपद्ये*—मैं शरणागत होता हूँ।

**मैं श्री नित्यानन्द राम के चरणकमलों में शरणागत होता हूँ, जो चतुर्व्यूह [जो वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध से युक्त है] के मध्य सङ्कर्षण के नाम से विख्यात हैं। वे पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न हैं और भौतिक सृष्टि से कहीं परे वैकुण्ठलोक में विराजमान हैं।**
