### CC Adi 3.5

> পূর্ণ ভগবান্ কৃষ্ণ ব্রজেন্দ্রকুমার ।\
> গোলোকে ব্রজের সহ নিত্য বিহার ॥৫॥

> pūrṇa bhagavān kṛṣṇa vrajendra-kumāra\
> goloke vrajera saha nitya vihāra

*पूर्ण*—पूर्ण; *भगवान्*—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; *कृष्ण*—भगवान् श्रीकृष्ण; *व्रजेन्द्र-कुमार*—व्रज के राजा के पुत्र; *गोलोके*—गोलोक में; *व्रजेर सह*—व्रजधाम सहित; *नित्य*—नित्य; *विहार*—लीलाएँ।

**व्रज के राजा के पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं। वे अपने नित्य धाम गोलोक में, जिसमें व्रजधाम सम्मिलित है, नित्य रूप से दिव्य लीलाओं का आनन्द लेते हैं।**

पूर्ववर्ती अध्याय में यह स्थापित किया जा चुका है कि व्रजेन्द्र (व्रज के राजा) के पुत्र श्रीकृष्ण ही छहों ऐश्वर्यों से युक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे अपने उस लोक में, जो गोलोक के नाम से विख्यात है, दिव्य रूप से विविध ऐश्वर्यों का नित्य आनन्द लेते हैं। आध्यात्मिक लोक कृष्णलोक में भगवान् की नित्य लीलाएँ अप्रकट लीलाएँ कहलाती हैं, क्योंकि वे बद्धजीवों की दृष्टि-सीमा से परे हैं। भगवान् श्रीकृष्ण सर्वत्र सदैव विद्यमान रहते हैं, किन्तु जब वे हमारी आँखों के समक्ष उपस्थित नहीं होते, तब उन्हें अप्रकट कहा जाता है।
