### CC Adi 10.135-136

> প্রতাপরুদ্র রাজা, আর ওঢ্র কৃষ্ণানন্দ ।\
> পরমানন্দ মহাপাত্র, ওঢ্র শিবানন্দ ॥১৩৫॥\
> ভগবান্ আচার্য, ব্রহ্মানন্দাখ্য ভারতী ।\
> শ্রীশিখি মাহিতি, আর মুরারি মাহিতি ॥১৩৬॥

> pratāparudra rājā, āra oḍhra kṛṣṇānanda\
> paramānanda mahāpātra, oḍhra śivānanda

> bhagavān ācārya, brahmānandākhya bhāratī\
> śrī-śikhi māhiti, āra murāri māhiti

*प्रतापरुद्र राजा*—उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र; *आर*—तथा; *ओढ्र कृष्णानन्द*—कृष्णानन्द, एक उड़िया भक्त; *परमानन्द महापात्र*—परमानन्द महापात्र नामक; *ओढ्र शिवानन्द*—उड़िया शिवानन्द; *भगवान् आचार्य*—भगवान् आचार्य नामक; *ब्रह्मानन्द-आख्य भारती*—ब्रह्मानन्द भारती नामक; *श्री-शिखि माहिति*—श्री शिखि माहिति नामक; *आर*—तथा; *मुरारि माहिति*—मुरारि माहिति नामक।

**उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र, उड़िया भक्त कृष्णानन्द तथा शिवानन्द, परमानन्द महापात्र, भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्द भारती, श्री शिखि माहिति तथा मुरारि माहिति—ये सभी, जब चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में निवास करते थे, तब निरन्तर उनके सान्निध्य में रहते थे।**

प्रतापरुद्र महाराज, जो गंगा-राजवंश के थे और जिनकी राजधानी कटक में थी, उड़ीसा के सम्राट् तथा भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के महान् भक्त थे। रामानन्द राय तथा सार्वभौम भट्टाचार्य की व्यवस्था से ही वे भगवान् चैतन्य की सेवा कर सके। गौर-गणोद्देश-दीपिका (118) में कहा गया है कि राजा इन्द्रद्युम्न, जिन्होंने हज़ारों वर्ष पूर्व जगन्नाथ के मन्दिर की स्थापना की थी, बाद में अपने ही वंश में श्रीचैतन्य महाप्रभु के समय महाराज प्रतापरुद्र के रूप में पुनः जन्मे। महाराज प्रतापरुद्र राजा इन्द्र के समान शक्तिशाली थे। चैतन्य-चन्द्रोदय नामक नाटक उनके निर्देशन में रचा गया।


*चैतन्य-भागवत* की *अन्त्य-लीला* के पाँचवें अध्याय में परमानन्द महापात्र का वर्णन इस प्रकार हुआ है: "परमानन्द महापात्र उन भक्तों में से थे जिन्होंने उड़ीसा में जन्म लिया और चैतन्य महाप्रभु को अपनी एकमात्र सम्पत्ति के रूप में स्वीकार किया। माधुर्य-प्रेम के भाव में वे सदा चैतन्य महाप्रभु का ही चिन्तन करते थे।" भगवान् आचार्य, जो एक अत्यन्त विद्वान् पण्डित थे, पूर्वकाल में हालिसहर के निवासी थे, किन्तु उन्होंने जगन्नाथ पुरी में चैतन्य महाप्रभु के साथ रहने के लिए सब कुछ त्याग दिया। चैतन्य महाप्रभु के साथ उनका सम्बन्ध सख्य-भाव का था, जैसा किसी ग्वालबाल का होता है। वे सदा स्वरूप गोसाञि के प्रति मैत्रीपूर्ण रहते थे, किन्तु भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों के प्रति दृढ़तापूर्वक समर्पित थे। वे कभी-कभी चैतन्य महाप्रभु को अपने घर पर आमन्त्रित करते थे।


भगवान् आचार्य अत्यन्त उदार तथा सरल थे। उनके पिता शतानन्द खान पूर्णतः भौतिकतावादी थे, और उनके छोटे भाई गोपाल भट्टाचार्य एक कट्टर मायावादी दार्शनिक थे, जिन्होंने अत्यन्त विस्तार से अध्ययन किया था। जब उनके भाई जगन्नाथ पुरी आए, तब भगवान् आचार्य उनसे मायावाद-दर्शन सुनना चाहते थे, किन्तु स्वरूप दामोदर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया, और वहीं यह विषय समाप्त हो गया। एक बार भगवान् आचार्य का बंगाल का एक मित्र अपने द्वारा रचित एक नाटक का पाठ करना चाहता था, जो भक्ति के सिद्धान्तों के विरुद्ध था, और यद्यपि भगवान् आचार्य इस नाटक का पाठ भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के समक्ष करना चाहते थे, फिर भी भगवान् के सचिव स्वरूप दामोदर ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया। बाद में स्वरूप दामोदर ने उस नाटक में भक्ति के सिद्धान्त से अनेक भूलें तथा मतभेद इंगित किए, और तब रचयिता को अपने लेखन के दोषों का बोध हुआ और उसने स्वरूप दामोदर की शरण लेकर उनकी कृपा की याचना की। इसका वर्णन *अन्त्य-लीला* के पाँचवें अध्याय में, श्लोक 91-158 में हुआ है।


गौर-गणोद्देश-दीपिका के श्लोक 189 में कहा गया है कि शिखि माहिति पूर्वकाल में श्रीमती राधारानी की रागलेखा नामक सहचरी थे। उनकी बहन माधवी भी श्रीमती राधारानी की सहचरी थीं और कलाकेलि नाम से जानी जाती थीं। शिखि माहिति, माधवी तथा उनके भाई मुरारि माहिति—ये सभी श्रीचैतन्य महाप्रभु के अनन्य भक्त थे, जो जीवन के एक क्षण के लिए भी उन्हें नहीं भूल सकते थे। उड़िया भाषा में चैतन्य-चरित-महाकाव्य नामक एक ग्रन्थ है, जिसमें शिखि माहिति के विषय में अनेक वृत्तान्त हैं। एक वृत्तान्त उनके एक भावोन्मादपूर्ण स्वप्न को देखने से सम्बन्धित है। शिखि माहिति सदा अपने मन में भगवान् की सेवा करने में संलग्न रहते थे। एक रात्रि, जब वे ऐसी सेवा कर रहे थे, तब उन्हें निद्रा आ गई, और जब वे सो रहे थे, तब उनके भाई तथा बहन उन्हें जगाने आए। उस समय वे पूर्ण भावोन्माद में थे, क्योंकि वे एक अद्भुत स्वप्न देख रहे थे कि भगवान् चैतन्य जगन्नाथ के मन्दिर में दर्शन करते समय जगन्नाथ के शरीर में प्रवेश करके पुनः बाहर निकल रहे थे और जगन्नाथ विग्रह को निहार रहे थे। अतः जैसे ही वे जागे, उन्होंने अपने भाई तथा बहन का आलिंगन किया और उन्हें बतलाया, "हे मेरे प्रिय भाई तथा बहन, मैंने एक अद्भुत स्वप्न देखा है जिसे मैं अब तुम्हें बतलाता हूँ। माता शची के पुत्र भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के कार्य निश्चय ही परम अद्भुत हैं। मैंने देखा कि भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ के मन्दिर में दर्शन करते समय जगन्नाथ के शरीर में प्रवेश कर रहे थे और पुनः उनके शरीर से बाहर आ रहे थे। मैं अब भी वही स्वप्न देख रहा हूँ। क्या तुम समझते हो कि मेरा मस्तिष्क विकृत हो गया है? मैं अब भी वही स्वप्न देख रहा हूँ! और सबसे अद्भुत बात यह है कि ज्यों ही मैं चैतन्य महाप्रभु के समीप पहुँचा, उन्होंने अपनी लम्बी भुजाओं से मेरा आलिंगन किया।" जब वे इस प्रकार अपने भाई तथा बहन से बोल रहे थे, तब शिखि माहिति का स्वर अवरुद्ध हो गया, और उनके नेत्रों में अश्रु छलक आए। अतः दोनों भाई तथा बहन जगन्नाथ के मन्दिर में गए, और वहाँ उन्होंने जगमोहन (जगन्नाथ मन्दिर में कीर्तन-कक्ष) में भगवान् चैतन्य को ठीक उसी प्रकार श्री जगन्नाथ विग्रह की सुन्दरता को निहारते देखा, जैसा शिखि माहिति के स्वप्न में था। भगवान् इतने उदार थे कि उन्होंने तुरन्त शिखि माहिति का आलिंगन किया और कहा, "तुम मुरारि के बड़े भाई हो!" इस प्रकार आलिंगित होकर शिखि माहिति को भावोन्मादपूर्ण दिव्य आनन्द की अनुभूति हुई। अतः वे तथा उनके भाई और बहन सदा भगवान् की सेवा करने में संलग्न रहते थे। शिखि माहिति के सबसे छोटे भाई मुरारि माहिति का वर्णन *मध्य-लीला* के दसवें अध्याय में, श्लोक 44 में हुआ है।
