### CC Adi 15.22

> এই মত নানা লীলা করে গৌরহরি ।\
> কি কারণে লীলা, — ইহা বুঝিতে না পারি ॥২২॥

> ei mata nānā līlā kare gaurahari\
> ki kāraṇe līlā,—ihā bujhite nā pāri

*एइ मत*—इस प्रकार; *नाना*—विविध; *लीला*—लीलाएँ; *करे*—करते हैं; *गौरहरि*—श्रीचैतन्य महाप्रभु; *कि कारणे*—क्या कारण है; *लीला*—लीलाएँ; *इहा*—यह; *बुझिते*—समझ पाना; *ना*—नहीं; *पारि*—मैं समर्थ हूँ।

**इस प्रकार भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने विविध लीलाएँ कीं, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह मैं नहीं समझ पाता।**

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा उनके भक्तगण, जो इस संसार में आते हैं, एक मिशन का सम्पादन करते हैं, और इसीलिए कभी-कभी वे ऐसी रीति से कार्य करते हैं जिसे समझ पाना अत्यन्त कठिन होता है। अतः कहा गया है, वैष्णवेर क्रिया-मुद्रा विज्ञेह ना बुझय : चाहे कोई कितना ही विद्वान् एवं बुद्धिमान् पण्डित क्यों न हो, वह किसी वैष्णव के कार्यों को नहीं समझ सकता। वैष्णव अपने मिशन के सम्पादन हेतु जो कुछ भी अनुकूल हो, उसे स्वीकार कर लेते हैं। किन्तु मूर्ख व्यक्ति, ऐसे महान् वैष्णवों के प्रयोजन को न जानते हुए, उनकी आलोचना में लिप्त हो जाते हैं। यह निषिद्ध है। चूँकि कोई नहीं जान सकता कि कोई वैष्णव अपने मिशन के सम्पादन हेतु क्या करते हैं, अतएव ऐसे वैष्णव की आलोचना करना साधु-निन्दा नामक अपराध है।
