### CC Antya 1.138

> ভক্তানামুদগাদনর্গলধিয়াং বর্গো নিসর্গোজ্জ্বলঃ\
> শীলৈঃ পল্লবিতঃ স বল্লববধূবন্ধোঃ প্রবন্ধোঽপ্যসৌ ।\
> লেভে চত্বরতাঞ্চ তাণ্ডববিধের্বৃন্দাটবীগর্ভভূ-\
> র্মন্যে মদ্বিধপুণ্যমণ্ডলপরীপাকোঽয়মুন্মীলতি ॥১৩৮॥

> bhaktānām udagād anargala-dhiyāṁ vargo nisargojjvalaḥ\
> śīlaiḥ pallavitaḥ sa ballava-vadhū-bandho prabandho 'py asau\
> lebhe catvaratāṁ ca tāṇḍava-vidher vṛndāṭavī-garbha-bhūr\
> manye mad-vidha-puṇya-maṇḍala-parīpāko 'yam unmīlati

*भक्तानाम्*—भक्तों का; *उदगात्*—प्रकट हुआ है; *अनर्गल-धियाम्*—निरन्तर राधा-कृष्ण का चिन्तन करने वालों का; *वर्गः*—समुदाय; *निसर्ग-उज्ज्वलः*—स्वभाव से अत्यन्त उन्नत; *शीलैः*—स्वाभाविक काव्य-अलंकारों से; *पल्लवितः*—वृक्ष के पत्तों के समान विस्तृत; *सः*—वह; *बल्लव-वधू-बन्धः*—गोपियों के सखा श्रीकृष्ण का; *प्रबन्धः*—एक साहित्यिक रचना; *अपि*—भी; *असौ*—वह; *लेभे*—प्राप्त किया है; *चत्वरताम्*—समतल भूमि वाले चतुष्कोण स्थान का गुण; *च*—और; *ताण्डव-विधेः*—अनुसरण करते हुए; *वृन्दा-अटवी*—वृन्दावन वन के; *गर्भ-भूः*—भीतरी प्रांगण; *मन्ये*—मैं मानता हूँ; *मत्-विध*—मुझ जैसे व्यक्तियों के; *पुण्य-मण्डल*—पुण्यकर्म-समूहों का; *परीपाकः*—पूर्ण विकास; *अयम्*—यह; *उन्मीलति*—प्रकट होता है।

**'अब उपस्थित भक्तगण निरन्तर परमेश्वर का चिन्तन करते हैं और इसीलिए अत्यन्त उन्नत हैं। विदग्ध-माधव नामक यह रचना भगवान् श्रीकृष्ण की विशिष्ट लीलाओं को काव्य-अलंकारों की सज्जा से चित्रित करती है। और वृन्दावन वन के भीतरी प्रांगण गोपियों के साथ श्रीकृष्ण के नृत्य के लिए उपयुक्त मंच प्रदान करते हैं। अतः मैं मानता हूँ कि मुझ जैसे व्यक्तियों के पुण्यकर्म, जिन्होंने भक्ति में उन्नत होने का प्रयत्न किया है, अब परिपक्वता को प्राप्त हो गए हैं।'**

यह विदग्ध-माधव के प्रथम अंक का आठवाँ श्लोक है।
