### CC Antya 7.119

> অজ্ঞ জীব নিজ-‘হিতে’ ‘অহিত’ করি’ মানে ।\
> গর্ব চূর্ণ হৈলে, পাছে উঘাড়ে নয়নে ॥১১৯॥

> ajña jīva nija-'hite' 'ahita' kari' māne\
> garva cūrṇa haile, pāche ughāḍe nayane

*अज्ञ जीव*—अज्ञानी जीव; *निज-हिते*—अपने व्यक्तिगत हित को; *अहित करि' माने*—हानि मानता है; *गर्व चूर्ण हैले*—जब अहंकार चूर्ण हो जाता है; *पाछे*—तत्पश्चात्; *उघाडे नयने*—नेत्र खुल जाते हैं।

**अज्ञानी जीव अपने वास्तविक लाभ को नहीं पहचानता। अज्ञान तथा भौतिक अहंकार के कारण वह कभी-कभी लाभ को हानि मान बैठता है, किन्तु जब उसका अहंकार चूर्ण हो जाता है, तब वह अपने सच्चे हित को वास्तव में देख पाता है।**
