### SB 1.3.22

> नरदेवत्वमापन्नः सुरकार्यचिकीर्षया ।\
> समुद्रनिग्रहादीनि चक्रे वीर्याण्यतः परम् ॥ २२ ॥

*nara*—मनुष्य; *devatvam*—दिव्यता; *āpannaḥ*—रूप धारण करके; *sura*—देवता; *kārya*—कार्य; *cikīrṣayā*—सम्पन्न करने के उद्देश्य से; *samudra*—हिन्द महासागर; *nigraha-ādīni*—वशीभूत करना, इत्यादि; *cakre*—सम्पन्न किया; *vīryāṇi*—अलौकिक पराक्रम; *ataḥ param*—तत्पश्चात्।

**अठारहवें अवतार में भगवान् राजा राम के रूप में प्रकट हुए। देवताओं के लिए कुछ प्रिय कार्य सम्पन्न करने हेतु उन्होंने हिन्द महासागर को वश में करके तथा समुद्र के उस पार स्थित नास्तिक राजा रावण का वध करके अलौकिक शक्तियों का प्रदर्शन किया।**

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ने मानव-रूप धारण किया और देवताओं अथवा प्रशासनिक व्यक्तित्वों के लिए कुछ प्रिय कार्य करने हेतु और ब्रह्माण्ड की व्यवस्था बनाए रखने के प्रयोजन से इस पृथ्वी पर प्रकट हुए। कभी-कभी रावण और हिरण्यकशिपु जैसे महान् असुर और नास्तिक, तथा अन्य अनेक जन, भौतिक विज्ञान और अन्य गतिविधियों की सहायता से भौतिक सभ्यता को आगे बढ़ाते हुए और भगवान् की स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने की भावना से अत्यन्त प्रसिद्ध हो जाते हैं। उदाहरणार्थ, भौतिक साधनों द्वारा अन्य ग्रहों पर जाने का प्रयास भगवान् की स्थापित व्यवस्था को चुनौती है। प्रत्येक ग्रह की परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं, और भगवान् के विधानों में उल्लिखित विशेष उद्देश्यों हेतु वहाँ विभिन्न वर्गों के मनुष्यों को आवास दिया जाता है। किन्तु भौतिक उन्नति में क्षुद्र सफलता से अहंकारग्रस्त होकर, कभी-कभी ईश्वर-रहित भौतिकतावादी ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देता है। रावण उन्हीं में से एक था; वह साधारण मनुष्यों को भौतिक साधनों द्वारा, आवश्यक योग्यताओं पर विचार किए बिना, इन्द्र के लोकों [स्वर्ग] में पहुँचाना चाहता था। वह सीधे स्वर्गलोक तक पहुँचने वाली एक सीढ़ी बनवाना चाहता था, जिससे लोगों को उस लोक में प्रवेश के लिए आवश्यक पुण्य-कर्म की प्रक्रिया से गुज़रने की आवश्यकता न रहे। वह भगवान् के स्थापित विधान के विरुद्ध अन्य कार्य भी करना चाहता था। उसने तो भगवान् श्रीराम की सत्ता को भी चुनौती दी और उनकी पत्नी सीता का अपहरण कर लिया। निस्सन्देह, भगवान् श्रीराम देवताओं की प्रार्थना और इच्छा का उत्तर देते हुए इस नास्तिक को दण्डित करने के लिए आए। अतः उन्होंने रावण की चुनौती को स्वीकार किया, और यह सम्पूर्ण वृत्तान्त रामायण का विषय है। चूँकि भगवान् रामचन्द्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् थे, इसलिए उन्होंने ऐसी अलौकिक लीलाएँ प्रकट कीं जो कोई भी मनुष्य, भौतिक दृष्टि से उन्नत रावण सहित, नहीं कर सकता था। भगवान् रामचन्द्र ने ऐसे पत्थरों से, जो जल पर तैरते थे, हिन्द महासागर पर एक राजमार्ग तैयार किया। आधुनिक वैज्ञानिकों ने भारहीनता के क्षेत्र में अनुसन्धान किया है, किन्तु सर्वत्र और सर्वदा भारहीनता उत्पन्न करना सम्भव नहीं है। किन्तु चूँकि भारहीनता भगवान् की सृष्टि है, जिसके द्वारा वे विशाल ग्रहों को वायु में उड़ाते और तैराते हैं, अतः उन्होंने इस पृथ्वी पर भी पत्थरों को भारहीन बना दिया और बिना किसी आधार-स्तम्भ के समुद्र पर एक पाषाण-सेतु बनाया। यही ईश्वरीय शक्ति का प्रदर्शन है।
