### SB 1.5.5

> व्यास उवाच\
> अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं\
> तथापि नात्मा परितुष्यते मे ।\
> तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधं\
> पृच्छामहे त्वात्मभवात्मभूतम् ॥ ५ ॥

*व्यासः*—व्यास; *उवाच*—ने कहा; *अस्ति*—है; *एव*—निश्चय ही; *मे*—मेरा; *सर्वम्*—सब; *इदम्*—यह; *त्वया*—आपके द्वारा; *उक्तम्*—कहा गया; *तथापि*—फिर भी; *न*—नहीं; *आत्मा*—आत्मा; *परितुष्यते*—शान्त होती है; *मे*—मुझे; *तत्*—जिसका; *मूलम्*—मूल; *अव्यक्तम्*—अप्रकट; *अगाध-बोधम्*—असीम ज्ञान वाले पुरुष; *पृच्छामहे*—जिज्ञासा करता हूँ; *त्वा*—आपसे; *आत्म-भव*—स्वयं उत्पन्न; *आत्म-भूतम्*—सन्तान।

**श्रीव्यासदेव ने कहा : मेरे विषय में आपने जो कुछ कहा है, वह सर्वथा सत्य है। इतना सब होते हुए भी, मैं शान्त नहीं हूँ। अतः मैं आपसे अपने असन्तोष के मूल कारण के विषय में जिज्ञासा करता हूँ, क्योंकि आप असीम ज्ञान के पुरुष हैं, इस कारण कि आप उनकी [ब्रह्मा की] सन्तान हैं जो स्वयं उत्पन्न हैं [सांसारिक माता-पिता के बिना]।**

भौतिक जगत् में प्रत्येक व्यक्ति शरीर अथवा मन को आत्मा मानने की धारणा में निमग्न रहता है। इसी प्रकार, भौतिक जगत् में प्रसारित समस्त ज्ञान या तो शरीर से अथवा मन से सम्बन्धित है, और यही समस्त निराशाओं का मूल कारण है। भले ही कोई भौतिक ज्ञान का सबसे बड़ा विद्वान् क्यों न हो, इसका सदा पता नहीं चलता। अतः समस्त निराशाओं के मूल कारण को हल करने हेतु श्रीनारद जैसी विभूति के समीप जाना उचित है। श्रीनारद के समीप क्यों जाना चाहिए, यह नीचे समझाया गया है।
