### SB 1.11.1

> सूत उवाच\
> आनर्तान् स उपव्रज्य स्वृद्धाञ्जनपदान्स्वकान् ।\
> दध्मौ दरवरं तेषां विषादं शमयन्निव ॥ १ ॥

*सूतः उवाच*—सूत गोस्वामी ने कहा; *आनर्तान्*—आनर्त नामक देश (द्वारका); *सः*—वे; *उपव्रज्य*—सीमा पर पहुँचकर; *स्वृद्धान्*—अत्यन्त समृद्ध; *जन-पदान्*—नगरी; *स्वकान्*—अपनी; *दध्मौ*—बजाया; *दरवरम्*—मंगलमय शंख (पाञ्चजन्य); *तेषाम्*—उनका; *विषादम्*—विषाद; *शमयन्*—शान्त करते हुए; *इव*—मानो।

**सूत गोस्वामी ने कहा : आनर्तों के देश के नाम से विख्यात अपनी परम समृद्ध राजधानी [द्वारका] की सीमा पर पहुँचकर भगवान् ने अपना मंगलमय *शंख* बजाया, जिसने उनके आगमन की सूचना दी और जिससे निवासियों की खिन्नता स्पष्टतः शान्त हुई।**

प्रिय भगवान् कुरुक्षेत्र-युद्ध के कारण अपनी समृद्ध राजधानी द्वारका से दीर्घकाल तक दूर रहे, अतः सभी निवासी विरह के कारण विषाद से अभिभूत थे। जब भगवान् पृथ्वी पर अवतरित होते हैं, तो उनके नित्य पार्षद भी उनके साथ आते हैं, ठीक जैसे राजा के साथ उसका परिकर चलता है। भगवान् के ऐसे पार्षद नित्य मुक्त आत्माएँ हैं, और भगवान् के प्रति गहन स्नेह के कारण वे उनका विरह क्षण-भर भी सहन नहीं कर सकते। इस प्रकार द्वारका नगरी के निवासी खिन्न मनोदशा में थे और प्रतिक्षण भगवान् के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। अतएव मंगलमय शंख की आगमन-सूचक ध्वनि अत्यन्त उत्साहवर्धक थी, और स्पष्टतः उस ध्वनि ने उनकी खिन्नता को शान्त कर दिया। वे भगवान् को अपने बीच देखने हेतु और भी अधिक लालायित हो उठे, और वे सभी उनका समुचित रीति से स्वागत करने के लिए सजग हो गए। ये स्वतःस्फूर्त भगवत्प्रेम के लक्षण हैं।
