### SB 1.13.33

> अम्बा च हतपुत्रार्ता पितृव्यः क्व गतः सुहृत् ।\
> अपि मय्यकृतप्रज्ञे हतबन्धुः स भार्यया ।\
> आशंसमानः शमलं गङ्गायां दुःखितोऽपतत् ॥ ३३ ॥

*ambā*—माता समान चाची; *ca*—और; *hata-putrā*—जिसने अपने समस्त पुत्र खो दिए; *ārtā*—शोचनीय दशा में; *pitṛvyaḥ*—चाचा विदुर; *kva*—कहाँ; *gataḥ*—गए; *suhṛt*—शुभचिन्तक; *api*—क्या; *mayi*—मेरे प्रति; *akṛta-prajñe*—कृतघ्न; *hata-bandhuḥ*—जिसने अपने समस्त पुत्र खो दिए; *saḥ*—धृतराष्ट्र; *bhāryayā*—अपनी पत्नी सहित; *āśaṁsa-mānaḥ*—संशययुक्त मन में; *śamalam*—अपराध; *gaṅgāyām*—गंगा के जल में; *duḥkhitaḥ*—व्यथित मन में; *apatat*—गिर पड़े।

**मेरे शुभचिन्तक, चाचा विदुर, तथा माता गान्धारी, जो अपने समस्त पुत्रों के देहान्त के कारण अत्यन्त व्यथित हैं, कहाँ हैं? मेरे चाचा धृतराष्ट्र भी अपने समस्त पुत्रों एवं पौत्रों की मृत्यु के कारण अत्यन्त व्यथित थे। निःसन्देह मैं अत्यन्त कृतघ्न हूँ। तो क्या उन्होंने मेरे अपराधों को अत्यन्त गम्भीरता से लेकर, अपनी पत्नी सहित, गंगा में डूबकर प्राण त्याग दिए?**

पाण्डवों ने, विशेष रूप से महाराज युधिष्ठिर और अर्जुन ने, कुरुक्षेत्र के युद्ध के परिणामों का पूर्वानुमान लगाया था, इसीलिए अर्जुन ने युद्ध करने से मना किया था। युद्ध भगवान् की इच्छा से सम्पन्न हुआ, किन्तु पारिवारिक शोक के जो प्रभावों की उन्होंने पहले आशंका की थी, वे सब सच हो गए। महाराज युधिष्ठिर सदा अपने चाचा धृतराष्ट्र और चाची गान्धारी की भारी विपत्ति के प्रति सचेत थे, इसीलिए उन्होंने वृद्धावस्था और दुःखपूर्ण परिस्थितियों में उनकी यथासम्भव देखभाल की। जब, अतः, महल में उन्हें अपने चाचा और चाची नहीं मिले, तो स्वाभाविक रूप से उनके मन में सन्देह उठा और उन्होंने अनुमान लगाया कि वे गंगा के जल में चले गए होंगे। उन्होंने स्वयं को कृतघ्न अनुभव किया, क्योंकि जब पाण्डव पितृहीन थे, तब महाराज धृतराष्ट्र ने उन्हें जीने के लिए सभी राजकीय सुविधाएँ प्रदान की थीं, और प्रतिदान में उनके सभी पुत्र कुरुक्षेत्र के युद्ध में मारे गए थे। एक पुण्यात्मा मनुष्य के रूप में महाराज युधिष्ठिर अपने अपरिहार्य दुष्कर्मों का लेखा-जोखा करते थे और अपने चाचा तथा उनके साथियों के दुष्कर्मों के बारे में कभी नहीं सोचते थे। धृतराष्ट्र ने भगवान् की इच्छा से अपने दुष्कर्मों का फल भोगा था, किन्तु महाराज युधिष्ठिर केवल अपने अपरिहार्य दुष्कर्मों के बारे में सोच रहे थे। यही एक सच्चे मनुष्य और भगवान् के भक्त का स्वभाव है। भक्त दूसरों में दोष नहीं देखता, बल्कि अपने दोष ढूँढता है और यथासम्भव उन्हें सुधारने का प्रयत्न करता है।
