### SB 2.5.22

> कालाद् गुणव्यतिकरः परिणामः स्वभावतः ।\
> कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥

*कालात्*—नित्य काल से; *गुण-व्यतिकरः*—प्रतिक्रिया द्वारा गुणों का रूपान्तरण; *परिणामः*—रूपान्तरण; *स्वभावतः*—प्रकृति से; *कर्मणः*—क्रियाओं का; *जन्म*—सृष्टि; *महतः*—महत्-तत्त्व का; *पुरुष-अधिष्ठितात्*—भगवान् के पुरुष अवतार के कारण; *अभूत्*—यह हुआ।

**प्रथम पुरुष [कारणार्णवशायी विष्णु] के अवतार के पश्चात् महत्-तत्त्व, अर्थात् भौतिक सृष्टि के सिद्धान्त प्रकट होते हैं, और तब काल प्रकट होता है, और कालक्रम में तीन गुण प्रकट होते हैं। प्रकृति का अर्थ है तीन गुणात्मक प्रकटीकरण। वे क्रियाओं में रूपान्तरित होते हैं।**

परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता से सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि एक के बाद एक रूपान्तरण और प्रतिक्रियाओं की प्रक्रिया द्वारा विकसित होती है, और उसी सर्वशक्तिमत्ता से वे एक के बाद एक पुनः समेट ली जाती हैं और परमेश्वर के शरीर में संचित रहती हैं। काल, अर्थात् समय, प्रकृति का पर्याय है और भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की रूपान्तरित अभिव्यक्ति है। इस नाते काल को समस्त सृष्टि का प्रथम कारण माना जा सकता है, और प्रकृति के रूपान्तरण से भौतिक जगत् की विभिन्न गतिविधियाँ दृश्य होती हैं। इन गतिविधियों को प्रत्येक जीव की, या यहाँ तक कि जड़ पदार्थों की भी, स्वाभाविक प्रवृत्ति माना जा सकता है, और गतिविधियों की अभिव्यक्ति के बाद उसी प्रकृति की विविध उपजें और गौण उपजें होती हैं, और मूलतः ये सब परमेश्वर के ही कारण हैं। इस प्रकार वेदान्त-सूत्र और भागवत समस्त सृष्टियों के आरम्भ के रूप में परम सत्य से ही प्रारम्भ होते हैं (जन्माद्यस्य यतः)।
