### SB 2.6.2

> सर्वासूनां च वायोश्च तन्नासे परमायणे ।\
> अश्विनोरोषधीनां च घ्राणो मोदप्रमोदयोः ॥ २ ॥

*सर्व*—समस्त; *असूनाम्*—विभिन्न प्रकार के प्राणवायु; *च*—तथा; *वायोः*—वायु का; *च*—भी; *तत्*—उनके; *नासे*—नासिका में; *परम-आयणे*—दिव्य उत्पादक केन्द्र में; *अश्विनोः*—अश्विनी-कुमार देवताओं का; *ओषधीनाम्*—समस्त औषधीय वनस्पतियों का; *च*—भी; *घ्राणः*—उनकी घ्राण-शक्ति; *मोद*—आनन्द; *प्रमोदयोः*—विशिष्ट क्रीड़ा।

**उनके दोनों नासाछिद्र हमारे श्वसन तथा अन्य समस्त वायुओं के उत्पत्ति-केन्द्र हैं, उनकी घ्राण-शक्तियाँ अश्विनीकुमार देवताओं तथा समस्त प्रकार की औषधीय जड़ी-बूटियों को उत्पन्न करती हैं, और उनकी श्वसन-ऊर्जाएँ विभिन्न प्रकार की सुगन्ध उत्पन्न करती हैं।**
