### SB 2.6.46

> प्राधान्यतो यानृष आमनन्ति\
> लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः ।\
> आपीयतां कर्णकषायशोषा-\
> ननुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशान् ॥ ४६ ॥

*प्राधान्यतः*—मुख्यतः; *यान्*—वे सब; *ऋषे*—हे नारद; *आमनन्ति*—उपासना करते हैं; *लीला*—लीलाएँ; *अवतारान्*—अवतार; *पुरुषस्य*—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के; *भूम्नः*—परम; *आपीयताम्*—ताकि तुम्हारे द्वारा आस्वादित हों; *कर्ण*—कान; *कषाय*—मलिन पदार्थ; *शोषान्*—जो उड़ा देता है; *अनुक्रमिष्ये*—एक के बाद एक कहूँगा; *ते*—वे; *इमान्*—जैसे वे मेरे हृदय में हैं; *सु-पेशान्*—सब सुनने में प्रिय।

**हे नारद! अब मैं एक के बाद एक भगवान् के उन दिव्य अवतारों का वर्णन करूँगा, जो लीला-अवतार कहलाते हैं। उनके कार्यकलापों का श्रवण कान में संचित समस्त मलिन पदार्थों का प्रतिकार करता है। ये लीलाएँ सुनने में प्रिय हैं और आस्वादन के योग्य हैं। अतः ये मेरे हृदय में हैं।**

जैसा कि श्रीमद्भागवत के आरम्भ में कहा गया था (भा. 1.5.8), मनुष्य श्रवण से तब तक पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं हो सकता जब तक उसे भगवान् की दिव्य लीलाओं के श्रवण का अवसर न मिले। अतः ब्रह्माजी इस श्लोक में भी भगवान् की दिव्य लीलाओं के वर्णन के महत्त्व पर बल देने का प्रयास करते हैं, जैसा कि वे भौतिक लोकों की सतह पर यहाँ आते एवं स्वयं को प्रकट करते हैं। प्रत्येक जीव में प्रिय सन्देश सुनने की प्रवृत्ति रहती है, और इसीलिए हममें से लगभग प्रत्येक रेडियो केन्द्रों द्वारा प्रसारित समाचार एवं वार्ताएँ सुनने के लिए प्रवृत्त रहता है। किन्तु कठिनाई यह है कि उन समस्त सन्देशों को सुनकर कोई भी हृदय से सन्तुष्ट नहीं होता। ऐसी असन्तुष्टि का कारण उस सन्देश की जीव की अन्तरतम सत्ता के साथ असंगति है। यह दिव्य साहित्य श्रील व्यासदेव द्वारा विशेष रूप से तैयार किया गया है, ताकि श्रीनारद मुनि के श्रील व्यासदेव को दिए गए उपदेश के अनुसार भगवान् की क्रियाओं के वर्णन से जनसामान्य को परम सन्तोष प्रदान किया जा सके। भगवान् की ऐसी क्रियाएँ मुख्यतः दो प्रकार की हैं। एक का सम्बन्ध भौतिक सृजनात्मक शक्ति के लौकिक प्रकटीकरण से है, और दूसरी काल एवं स्थान के अनुसार भिन्न-भिन्न अवतारों के रूप में उनकी लीलाओं से सम्बद्ध है। भगवान् के असंख्य अवतार हैं, जैसे नदी की लहरें निरन्तर भीतर-बाहर बहती रहती हैं। अल्पबुद्धि व्यक्ति भौतिक जगत् में भगवान् की सृजनात्मक शक्तियों में अधिक रुचि लेते हैं, और भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध से विच्छिन्न होकर, वे वैज्ञानिक अनुसन्धान के नाम पर सृष्टि के अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। तथापि भगवान् के भक्त भली-भाँति जानते हैं कि भगवान् की भौतिक ऊर्जा की क्रिया एवं प्रतिक्रिया द्वारा सृजनात्मक शक्तियाँ किस प्रकार एक साथ कार्य करती हैं। अतः वे भगवान् की उन दिव्य क्रियाओं में अधिक रुचि लेते हैं, जब वे भौतिक जगत् की सतह पर स्वयं को अवतरित करते हैं। श्रीमद्भागवत भगवान् की ऐसी क्रियाओं का इतिहास है, और जो लोग श्रीमद्भागवत के श्रवण में रुचि लेते हैं, वे अपने हृदय को संचित लौकिक मल से स्वच्छ कर लेते हैं। बाज़ार में सहस्रों उतावले साहित्य उपलब्ध हैं, किन्तु जिसने श्रीमद्भागवत में रुचि ले ली है, वह ऐसे मलिन साहित्य में समस्त रुचि खो देता है। इस प्रकार श्रीब्रह्माजी भगवान् के प्रमुख अवतारों का वर्णन करने का प्रयास करते हैं, ताकि नारद उन्हें दिव्य अमृत के रूप में पान कर सकें।

इस प्रकार श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कन्ध के षष्ठ अध्याय के, जिसका शीर्षक "पुरुष-सूक्त की पुष्टि" है, भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं।
