### SB 2.7.12

> मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः\
> क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः ।\
> विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे\
> आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान् ॥ १२ ॥

*मत्स्यः*—मत्स्य अवतार; *युग-अन्त*—कल्प के अन्त में; *समये*—के समय; *मनुना*—भावी वैवस्वत मनु द्वारा; *उपलब्धः*—देखे गए; *क्षोणीमयः*—पृथ्वी ग्रह तक; *निखिल*—समस्त; *जीव*—जीव; *निकाय-केतः*—के लिए आश्रय; *विस्रंसितान्*—से उद्भूत; *उरु*—महान्; *भये*—भय के कारण; *सलिले*—जल में; *मुखात्*—मुख से; *मे*—मेरे; *आदाय*—ग्रहण करके; *तत्र*—वहाँ; *विजहार*—विहार किया; *ह*—निश्चय ही; *वेद-मार्गान्*—समस्त वेद।

**सहस्राब्दी के अन्त में, सत्यव्रत नामक भावी वैवस्वत मनु यह देखेंगे कि मत्स्य अवतार में भगवान् समस्त प्रकार के जीवों के, यहाँ तक कि पार्थिव लोक के जीवों तक के, आश्रय हैं। सहस्राब्दी के अन्त में, उस विशाल जल के भय से, वेद मेरे [ब्रह्मा के] मुख से बाहर निकलते हैं, और भगवान् उस विशाल जल का आनन्द लेते हैं तथा वेदों की रक्षा करते हैं।**

ब्रह्मा के एक दिन के दौरान चौदह मनु होते हैं, और प्रत्येक मनु के अन्त में पार्थिव लोकों तक प्रलय होता है, और वह विशाल जल स्वयं ब्रह्मा के व्यक्तित्व के लिए भी भयप्रद होता है। अतः भावी वैवस्वत मनु के आरम्भ में, ऐसा प्रलय उनके द्वारा देखा जाएगा। और भी अनेक घटनाएँ होंगी, जैसे विख्यात शंखासुर का वध आदि। यह भविष्यवाणी ब्रह्माजी के विगत अनुभव से है, जो जानते थे कि उस भयप्रद प्रलयकारी दृश्य में वेद उनके मुख से बाहर निकलेंगे, किन्तु भगवान् अपने मत्स्य अवतार में न केवल समस्त जीवों को, अर्थात् देवताओं, पशुओं, मनुष्यों एवं महान् ऋषियों को बचाएँगे, अपितु वेदों की भी रक्षा करेंगे।
