### SB 2.7.22

> क्षत्रं क्षयाय विधिनोपभृतं महात्मा\
> ब्रह्मध्रुगुज्झितपथं नरकार्तिलिप्सु ।\
> उद्धन्त्यसाववनिकण्टकमुग्रवीर्य-\
> स्त्रिःसप्तकृत्व उरुधारपरश्वधेन ॥ २२ ॥

*kṣatram*—राजोचित वर्ग; *kṣayāya*—घटाने के निमित्त; *vidhinā*—विधाता द्वारा; *upabhṛtam*—अनुपात में बढ़ा हुआ; *mahātmā*—महान् ऋषि परशुराम के रूप में भगवान्; *brahma-dhruk*—ब्रह्म में परम सत्य; *ujjhita-patham*—वे जिन्होंने परम सत्य का मार्ग त्याग दिया; *naraka-ārti-lipsu*—नरक में पीड़ा भोगने के इच्छुक; *uddhanti*—उखाड़ फेंकते हैं; *asau*—वे सभी; *avanikaṇṭakam*—संसार के काँटे; *ugra-vīryaḥ*—अत्यन्त शक्तिशाली; *triḥ-sapta*—तीन बार सात; *kṛtvaḥ*—किया; *urudhāra*—अत्यन्त तीक्ष्ण; *paraśvadhena*—महान् फरसे से।

**जब शासक प्रशासक, जो क्षत्रिय कहलाते हैं, नरक में कष्ट भोगने की इच्छा से परम सत्य के मार्ग से विचलित हो गए, तब भगवान् ने ऋषि परशुराम के रूप में अवतार लेकर उन अवांछित राजाओं को उखाड़ फेंका, जो पृथ्वी के कण्टकों के रूप में प्रकट हुए थे। इस प्रकार उन्होंने अपने तीक्ष्ण धारदार फरसे से इक्कीस बार क्षत्रियों को उखाड़ फेंका।**

क्षत्रिय, अर्थात् ब्रह्माण्ड के किसी भी भाग के शासक प्रशासक, चाहे इस लोक पर हों अथवा अन्य लोकों पर, वस्तुतः सर्वशक्तिमान् भगवान् के प्रतिनिधि हैं, और वे प्रजा को ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग की ओर ले जाने के लिए हैं। प्रत्येक राज्य तथा उसके प्रशासकों का, प्रशासन की प्रकृति चाहे जो हो—राजतन्त्र हो या प्रजातन्त्र, कुलीनतन्त्र हो या अधिनायकतन्त्र अथवा स्वेच्छातन्त्र—यह प्रमुख दायित्व है कि वे नागरिकों को ईश्वर-साक्षात्कार की ओर ले जाएँ। यह समस्त मनुष्यों के लिए आवश्यक है, और यह पिता, आध्यात्मिक गुरु, तथा अन्ततः राज्य का कर्तव्य है कि वे नागरिकों को इस लक्ष्य की ओर ले जाने का दायित्व ग्रहण करें। भौतिक अस्तित्व की समूची सृष्टि इसी प्रयोजन से रची गई है, केवल उन पतित आत्माओं को एक अवसर देने के लिए, जिन्होंने परम पिता की इच्छा के विरुद्ध विद्रोह किया और इस प्रकार भौतिक प्रकृति से बद्ध हो गईं। भौतिक प्रकृति का बल मनुष्य को क्रमशः नित्य पीड़ाओं तथा दुःखों की नारकीय अवस्था की ओर ले जाता है। जो बद्ध जीवन के विहित नियमों के विरुद्ध जाते हैं, वे ब्रह्मोज्झित-पथाः कहलाते हैं, अर्थात् वे व्यक्ति जो परम सत्य के मार्ग के विरुद्ध जाते हैं, और वे दण्ड के पात्र हैं। भगवान् परशुराम, भगवान् के अवतार, सांसारिक व्यवहारों की ऐसी ही अवस्था में प्रकट हुए और उन्होंने समस्त दुष्ट राजाओं का इक्कीस बार वध किया। उस समय अनेक क्षत्रिय राजा भारत से भागकर संसार के अन्य भागों में चले गए, और महाभारत के प्रमाण के अनुसार, मिस्र के राजा मूलतः परशुराम के दण्ड-कार्यक्रम के कारण भारत से प्रव्रजित हुए थे। राजा अथवा प्रशासक इसी प्रकार समस्त परिस्थितियों में दण्डित किए जाते हैं, जब भी वे ईश्वरविमुख हो जाते हैं और ईश्वरविहीन सभ्यता की योजना बनाते हैं, और यही सर्वशक्तिमान् का आदेश है।
