### SB 3.6.2

> कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः ।\
> त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥

*काल-सञ्ज्ञाम्*—काली के नाम से ज्ञात; *तदा*—उस समय; *देवीम्*—देवी को; *बिभ्रत्*—संहारक; *शक्तिम्*—शक्ति; *उरुक्रमः*—परम सामर्थ्यवान्; *त्रयः-विंशति*—तेईस; *तत्त्वानाम्*—तत्त्वों के; *गणम्*—उन सभी को; *युगपत्*—एक साथ; *आविशत्*—प्रविष्ट हुए।

**तत्पश्चात् परम सामर्थ्यवान् भगवान् अपनी बहिरंगा शक्ति काली देवी के सहित एक साथ तेईस तत्त्वों में प्रविष्ट हुए, जो अकेली ही समस्त विभिन्न तत्त्वों का संयोजन करती हैं।**

पदार्थ के अवयव तेईस गिने जाते हैं: समग्र भौतिक ऊर्जा, मिथ्या अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, नेत्र, कर्ण, नासिका, जिह्वा, त्वचा, हाथ, पैर, मलत्याग का अंग, जननेन्द्रिय, वाणी तथा मन। ये सभी काल के प्रभाव से परस्पर संयुक्त होते हैं और काल के क्रम में पुनः विलीन हो जाते हैं। अतः काल भगवान् की ऊर्जा है और भगवान् के निर्देश से अपनी ही रीति से कार्य करता है। यह ऊर्जा काली कहलाती है और उस श्याम संहारक देवी के रूप में प्रस्तुत होती है, जिसकी आराधना सामान्यतः भौतिक अस्तित्व में तमोगुण अथवा अज्ञान से प्रभावित व्यक्ति करते हैं। वैदिक स्तोत्र में इस प्रक्रिया का वर्णन इस प्रकार किया गया है—मूल-प्रकृतिर् अविकृतिर् महदाद्याः प्रकृति-विकृतयः सप्त षोडशकस् तु विकारो न प्रकृतिर् न विकृतिः पुरुषः। जो ऊर्जा तेईस अवयवों के संयोग में भौतिक प्रकृति के रूप में कार्य करती है, वह सृष्टि का अन्तिम स्रोत नहीं है। भगवान् तत्त्वों में प्रविष्ट होते हैं और अपनी काली नामक ऊर्जा का प्रयोग करते हैं। अन्य समस्त वैदिक शास्त्रों में भी यही सिद्धान्त स्वीकार किया गया है। ब्रह्म-संहिता (5.35) में कहा गया है:

eko 'py asau racayituṁ jagad-aṇḍa-koṭiṁ

yac-chaktir asti jagad-aṇḍa-cayā yad-antaḥ

aṇḍāntara-stha-paramāṇu-cayāntara-sthaṁ

govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi

"मैं उस आदि भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जो भगवान् के आदि स्वरूप हैं। अपने अंशकलात्मक पूर्ण विस्तार [महाविष्णु] के द्वारा वे भौतिक प्रकृति में, फिर प्रत्येक ब्रह्माण्ड में [गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में], और फिर [क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में] पदार्थ के प्रत्येक अणु सहित समस्त तत्त्वों में प्रविष्ट होते हैं। विश्व-सृष्टि के ऐसे प्रकटन असंख्य हैं, ब्रह्माण्डों में भी और एक-एक अणु में भी।"

इसी प्रकार, भगवद्गीता (10.42) में भी इसकी पुष्टि होती है:

athavā bahunaitena

kiṁ jñātena tavārjuna

viṣṭabhyāham idaṁ kṛtsnam

ekāṁśena sthito jagat

"हे अर्जुन! मेरी अनन्त ऊर्जाओं को, जो विविध रीतियों से कार्य करती हैं, जानने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है। मैं अपने अंशकलात्मक पूर्ण विस्तार [परमात्मा अथवा अन्तर्यामी] के द्वारा समस्त ब्रह्माण्डों में तथा उनके समस्त तत्त्वों में भौतिक सृष्टि में प्रविष्ट होता हूँ, और इस प्रकार सृष्टि का कार्य चलता रहता है।" भौतिक प्रकृति के अद्भुत कार्य भगवान् श्रीकृष्ण के कारण होते हैं, और इस प्रकार वे ही अन्तिम कारण अर्थात् समस्त कारणों के परम कारण हैं।
