### SB 3.13.42

> संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषां\
> लोकाय पत्नीमसि मातरं पिता ।\
> विधेम चास्यै नमसा सह त्वया\
> यस्यां स्वतेजोऽग्निमिवारणावधाः ॥ ४२ ॥

*saṁsthāpaya enām*—इस पृथ्वी को ऊपर उठाइए; *jagatām*—चर तथा; *sa-tasthuṣām*—अचर दोनों के; *lokāya*—उनके निवास हेतु; *patnīm*—पत्नी; *asi*—आप हैं; *mātaram*—माता; *pitā*—पिता; *vidhema*—हम अर्पित करते हैं; *ca*—भी; *asyai*—माता को; *namasā*—समस्त प्रणामों सहित; *saha*—साथ; *tvayā*—आपके सहित; *yasyām*—जिसमें; *sva-tejaḥ*—अपनी निज शक्ति से; *agnim*—अग्नि; *iva*—के समान; *araṇau*—अरणि की लकड़ी में; *adhāḥ*—निहित की।

**हे भगवन्, चर तथा अचर समस्त निवासियों के निवास-प्रयोजन हेतु यह पृथ्वी आपकी पत्नी है, और आप परम पिता हैं। हम आपको माता पृथ्वी सहित अपने सादर प्रणाम अर्पित करते हैं, जिसमें आपने अपनी निज शक्ति को उसी प्रकार निहित किया है, जैसे कोई कुशल याज्ञिक अरणि की लकड़ी में अग्नि स्थापित करता है।**

तथाकथित गुरुत्वाकर्षण का नियम, जो ग्रहों को धारण करता है, यहाँ भगवान् की शक्ति के रूप में वर्णित है। यह शक्ति भगवान् द्वारा उसी रीति से निहित की जाती है, जिस प्रकार कोई कुशल याज्ञिक ब्राह्मण वैदिक मन्त्रों की शक्ति से अरणि की लकड़ी में अग्नि स्थापित करता है। इस व्यवस्था से यह जगत् चर तथा अचर दोनों प्रकार के प्राणियों के लिए निवास-योग्य हो जाता है। बद्धजीव, जो भौतिक जगत् के निवासी हैं, माता पृथ्वी के गर्भ में उसी प्रकार रखे जाते हैं, जिस प्रकार किसी सन्तान का बीज पिता द्वारा माता के गर्भ में रखा जाता है। भगवान् तथा पृथ्वी की पिता एवं माता के रूप में यह धारणा भगवद्गीता (14.4) में समझाई गई है। बद्धजीव उस मातृभूमि के प्रति समर्पित रहते हैं, जिसमें वे जन्म लेते हैं, किन्तु वे अपने पिता को नहीं जानते। माता सन्तान उत्पन्न करने में स्वतन्त्र नहीं है। इसी प्रकार, भौतिक प्रकृति भी परम पिता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के संपर्क के बिना जीवों को उत्पन्न नहीं कर सकती। श्रीमद्भागवत हमें यह शिक्षा देता है कि हम माता को पिता, परमेश्वर के सहित प्रणाम अर्पित करें, क्योंकि एकमात्र पिता ही माता को समस्त चर तथा अचर जीवों के पालन एवं भरण-पोषण हेतु समस्त ऊर्जाओं से गर्भित करते हैं।
