### SB 3.22.7

> दिष्टया त्वयानुशिष्टोऽहं कृतश्चानुग्रहो महान् ।\
> अपावृतैः कर्णरन्ध्रैर्जुष्टा दिष्ट्योशतीर्गिरः ॥ ७ ॥

*दिष्ट्या*—सौभाग्य से; *त्वया*—आपके द्वारा; *अनुशिष्टः*—उपदेश दिया गया; *अहम्*—मैं; *कृतः*—प्रदान किया गया; *च*—तथा; *अनुग्रहः*—अनुग्रह; *महान्*—महान्; *अपावृतैः*—खुले; *कर्ण-रन्ध्रैः*—कानों के छिद्रों से; *जुष्टाः*—प्राप्त किए गए; *दिष्ट्या*—सौभाग्य से; *उशतीः*—शुद्ध; *गिरः*—वचन।

**सौभाग्यवश आपने मुझे उपदेश दिया, और इस प्रकार मुझ पर महान् अनुग्रह किया गया। मैं भगवान् का धन्यवाद करता हूँ कि मैंने खुले कानों से आपके शुद्ध वचनों को सुना।**

श्रील रूप गोस्वामी ने अपने भक्ति-रसामृत-सिन्धु में यह निर्देश दिया है कि किस प्रकार प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार किया जाए और किस प्रकार उनके साथ व्यवहार किया जाए। प्रथम, इच्छुक उम्मीदवार को किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को खोजना चाहिए, और तत्पश्चात् उसे अत्यन्त उत्सुकता से उनसे उपदेश ग्रहण करने तथा उनका पालन करने चाहिए। यह पारस्परिक सेवा है। प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु अथवा सन्त पुरुष सदा उस सामान्य मनुष्य को ऊपर उठाने की इच्छा करते हैं जो उनके पास आता है। चूँकि प्रत्येक माया के भ्रम के अधीन है और अपने प्रमुख कर्तव्य, कृष्णभावनामृत, को भुला बैठा है, अतः सन्त पुरुष सदा यह इच्छा करते हैं कि प्रत्येक मनुष्य सन्त पुरुष बने। प्रत्येक विस्मृत सामान्य मनुष्य में कृष्णभावनामृत को जागृत करना सन्त पुरुष का कार्य है।

मनु ने कहा कि चूँकि उन्हें कर्दम मुनि द्वारा परामर्श तथा उपदेश दिया गया, अतः उन पर अत्यधिक अनुग्रह हुआ। वे स्वयं को भाग्यशाली मानते थे कि उन्हें श्रवण द्वारा सन्देश प्राप्त हुआ। यहाँ विशेष रूप से उल्लेख है कि मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के अधिकृत स्रोत से खुले कानों से सुनने हेतु अत्यन्त जिज्ञासु होना चाहिए। कैसे ग्रहण करना है? मनुष्य को दिव्य सन्देश श्रवण द्वारा ग्रहण करना चाहिए। कर्ण-रन्ध्रैः शब्द का अर्थ है "कानों के छिद्रों से।" आध्यात्मिक गुरु की कृपा कानों के अतिरिक्त शरीर के किसी अन्य अंग से प्राप्त नहीं होती। तथापि इसका यह अर्थ नहीं कि आध्यात्मिक गुरु कुछ डॉलर के बदले कानों के माध्यम से किसी विशेष प्रकार का मन्त्र देते हैं और यदि मनुष्य उस पर ध्यान करे तो वह छह मास में सिद्धि प्राप्त कर ले और भगवान् बन जाए। कानों के माध्यम से ऐसा ग्रहण कूट है। वास्तविक तथ्य यह है कि प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु किसी विशेष मनुष्य की प्रकृति को तथा यह जानते हैं कि वह कृष्णभावनामृत में किस प्रकार के कर्तव्य कर सकता है, और वे उसे उसी प्रकार उपदेश देते हैं। वे उसे कानों के माध्यम से उपदेश देते हैं, गुप्त रूप से नहीं, अपितु सार्वजनिक रूप से। "तुम कृष्णभावनामृत में अमुक-अमुक कार्य के योग्य हो। तुम इस प्रकार कार्य कर सकते हो।" एक व्यक्ति को विग्रहों के कक्ष में कार्य करके कृष्णभावनामृत में प्रवृत्त होने का परामर्श दिया जाता है, दूसरे को सम्पादकीय कार्य करके कृष्णभावनामृत में प्रवृत्त होने का परामर्श दिया जाता है, अन्य को प्रचार-कार्य करने का परामर्श दिया जाता है, और किसी अन्य को पाक-विभाग में कृष्णभावनामृत का निर्वाह करने का परामर्श दिया जाता है। कृष्णभावनामृत में क्रिया के भिन्न-भिन्न विभाग हैं, और आध्यात्मिक गुरु, किसी विशेष मनुष्य की विशेष योग्यता को जानकर, उसे इस प्रकार प्रशिक्षित करते हैं कि अपनी कर्म-प्रवृत्ति से वह सिद्ध बन जाए। भगवद्गीता स्पष्ट करती है कि मनुष्य केवल अपनी योग्यता के अनुसार सेवा अर्पित करके आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकता है, जैसे अर्जुन ने सैन्य कला में अपनी योग्यता द्वारा श्रीकृष्ण की सेवा की। अर्जुन ने एक योद्धा के रूप में अपनी सेवा पूर्ण रूप से अर्पित की, और वे सिद्ध बन गए। इसी प्रकार, कोई कलाकार केवल आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में कलात्मक कार्य करके सिद्धि प्राप्त कर सकता है। यदि कोई साहित्यिक मनुष्य है, तो वह आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में भगवान् की सेवा हेतु लेख तथा कविता लिख सकता है। मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु का सन्देश इस विषय में ग्रहण करना होता है कि अपनी क्षमता के अनुसार किस प्रकार कार्य करे, क्योंकि आध्यात्मिक गुरु ऐसे निर्देश देने में निपुण हैं।

यही संयोग—आध्यात्मिक गुरु का उपदेश तथा शिष्य द्वारा उपदेश का निष्ठापूर्वक पालन—समूची प्रक्रिया को सिद्ध बनाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भगवद्गीता के व्यवसायात्मिका बुद्धिः श्लोक की अपनी व्याख्या में वर्णन करते हैं कि जो आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करने हेतु निश्चित होना चाहता है, उसे आध्यात्मिक गुरु से यह उपदेश ग्रहण करना चाहिए कि उसका विशेष कार्य क्या है। उसे उस विशेष उपदेश का निष्ठापूर्वक पालन करने का प्रयत्न करना चाहिए और उसे अपना जीवन-प्राण मानना चाहिए। आध्यात्मिक गुरु से प्राप्त उपदेश का निष्ठापूर्वक पालन ही शिष्य का एकमात्र कर्तव्य है, और यही उसे सिद्धि प्रदान करेगा। मनुष्य को अत्यन्त सावधान रहना चाहिए कि वह आध्यात्मिक गुरु से सन्देश कानों के माध्यम से ग्रहण करे और उसका निष्ठापूर्वक पालन करे। यही मनुष्य के जीवन को सफल बनाएगा।
