### SB 3.31.2

> कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् ।\
> दशाहेन तु कर्कन्धूः पेश्यण्डं वा ततः परम् ॥ २ ॥

*कललम्*—शुक्र तथा अण्ड का मिश्रण; *तु*—तब; *एक-रात्रेण*—प्रथम रात्रि को; *पञ्च-रात्रेण*—पाँचवीं रात्रि तक; *बुद्बुदम्*—एक बुलबुला; *दश-अहेन*—दस दिनों में; *तु*—तब; *कर्कन्धूः*—बेर के समान; *पेशी*—मांस का पिण्ड; *अण्डम्*—अण्डा; *वा*—अथवा; *ततः*—तत्पश्चात्; *परम्*—बाद में।

**प्रथम रात्रि को शुक्र तथा अण्ड का मिश्रण होता है, और पाँचवीं रात्रि को वह मिश्रण किण्वित होकर एक बुलबुला बन जाता है। दसवीं रात्रि को वह बेर के समान रूप में विकसित होता है, और उसके पश्चात् वह क्रमशः मांस के पिण्ड अथवा अण्डे में, जैसी स्थिति हो, परिवर्तित हो जाता है।**

आत्मा का शरीर अपने भिन्न-भिन्न स्रोतों के अनुसार चार प्रकार से विकसित होता है। एक प्रकार का शरीर, अर्थात् वृक्षों तथा पौधों का, पृथ्वी से अंकुरित होता है; दूसरे प्रकार का शरीर पसीने से उत्पन्न होता है, जैसे मक्खियाँ, कीटाणु तथा खटमल; तीसरे प्रकार का शरीर अण्डों से विकसित होता है; और चौथा भ्रूण से विकसित होता है। यह श्लोक इंगित करता है कि अण्ड तथा शुक्र के मिश्रण के पश्चात् शरीर क्रमशः या तो मांस के पिण्ड में अथवा अण्डे में, जैसी स्थिति हो, विकसित होता है। पक्षियों के विषय में यह अण्डे में विकसित होता है, और पशुओं तथा मनुष्यों के विषय में यह मांस के पिण्ड में विकसित होता है।
