### SB 3.32.25

> स तदैवात्मनात्मानं निःसङ्गं समदर्शनम् ।\
> हेयोपादेयरहितमारूढं पदमीक्षते ॥ २५ ॥

*सः*—शुद्ध भक्त; *तदा*—तब; *एव*—निश्चय ही; *आत्मना*—अपनी दिव्य बुद्धि द्वारा; *आत्मानम्*—स्वयं को; *निःसङ्गम्*—भौतिक आसक्ति से रहित; *सम-दर्शनम्*—दृष्टि में समभाव; *हेय*—त्याज्य; *उपादेय*—ग्राह्य; *रहितम्*—से रहित; *आरूढम्*—उन्नत; *पदम्*—दिव्य पद पर; *ईक्षते*—वह देखता है।

**अपनी दिव्य बुद्धि के कारण शुद्ध भक्त अपनी दृष्टि में समभाव रहता है और स्वयं को पदार्थ से अदूषित देखता है। वह किसी को श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट रूप में नहीं देखता, और स्वयं को परम पुरुष के गुणों में समान होने के दिव्य धरातल पर उन्नत अनुभव करता है।**

अननुकूल का अनुभव आसक्ति से उत्पन्न होता है। भक्त की किसी वस्तु के प्रति व्यक्तिगत आसक्ति नहीं होती; इसलिए उसके लिए अनुकूल अथवा अननुकूल का प्रश्न ही नहीं उठता। भगवान् की सेवा हेतु वह कुछ भी स्वीकार कर सकता है, भले ही वह उसके व्यक्तिगत हित के प्रतिकूल हो। वस्तुतः वह व्यक्तिगत स्वार्थ से पूर्णतः मुक्त होता है, और इस प्रकार जो कुछ भगवान् को अनुकूल है, वही उसे अनुकूल है। उदाहरणार्थ, अर्जुन को आरम्भ में युद्ध करना अनुकूल नहीं लगा, किन्तु जब उसने समझा कि युद्ध भगवान् को अनुकूल है, तब उसने युद्ध को अनुकूल मानकर स्वीकार कर लिया। यही शुद्ध भक्त की स्थिति है। उसके व्यक्तिगत हित के लिए कुछ भी अनुकूल अथवा अननुकूल नहीं होता; सब कुछ भगवान् के लिए किया जाता है, और इसलिए वह आसक्ति एवं विरक्ति दोनों से मुक्त होता है। यही तटस्थता की दिव्य अवस्था है। शुद्ध भक्त परमेश्वर के आनन्द में जीवन का सुख भोगता है।
