### SB 4.2.13

> लुप्तक्रियायाशुचये मानिने भिन्नसेतवे ।\
> अनिच्छन्नप्यदां बालां शूद्रायेवोशतीं गिरम् ॥ १३ ॥

*लुप्त-क्रियाय*—नियमों एवं विधियों का पालन न करने वाले को; *अशुचये*—अपवित्र को; *मानिने*—अभिमानी को; *भिन्न-सेतवे*—शिष्टाचार के समस्त नियमों को भंग करने वाले को; *अनिच्छन्*—इच्छा न रखते हुए; *अपि*—यद्यपि; *अदाम्*—सौंप दी; *बालाम्*—अपनी पुत्री; *शूद्राय*—शूद्र को; *इव*—के समान; *उशतीम् गिरम्*—वेदों के सन्देश को।

**मुझे अपनी पुत्री इस व्यक्ति को देने की कोई इच्छा नहीं थी, जिसने शिष्टाचार के समस्त नियमों को तोड़ डाला है। अपेक्षित विधि-विधानों का पालन न करने के कारण वह अपवित्र है, किन्तु मैं अपनी पुत्री उसे सौंपने को विवश था, ठीक जैसे कोई शूद्र को वेदों के सन्देश सिखाता है।**

शूद्र को वेदों से शिक्षा लेने का निषेध है, क्योंकि शूद्र, अपनी अस्वच्छ आदतों के कारण, ऐसे उपदेश सुनने के योग्य नहीं है। यह प्रतिबन्ध, कि जब तक मनुष्य ब्राह्मणोचित गुण अर्जित न कर ले तब तक उसे वैदिक साहित्य का अध्ययन नहीं करना चाहिए, उस प्रतिबन्ध के समान है कि विधि का विद्यार्थी तब तक विधि-महाविद्यालय में प्रवेश न करे जब तक वह समस्त निम्न श्रेणियाँ उत्तीर्ण न कर ले। दक्ष के आकलन के अनुसार, शिव अपनी आदतों में अस्वच्छ थे और उनकी पुत्री सती का पाणिग्रहण करने के योग्य नहीं थे, जो इतनी प्रबुद्ध, सुन्दर तथा सती थी। इस सन्दर्भ में प्रयुक्त शब्द भिन्न-सेतवे है, जिसका अर्थ है वह जिसने वैदिक सिद्धान्तों का पालन न करके सदाचार के समस्त विधि-विधानों को भंग कर दिया है। दूसरे शब्दों में, दक्ष के अनुसार उनकी पुत्री का शिव के साथ विवाह का समूचा व्यवहार समुचित नहीं था।
