### SB 4.22.17

> मैत्रेय उवाच\
> पृथोस्तत्सूक्तमाकर्ण्य सारं सुष्ठु मितं मधु ।\
> स्मयमान इव प्रीत्या कुमारः प्रत्युवाच ह ॥ १७ ॥

*मैत्रेयः उवाच*—महान् ऋषि मैत्रेय ने आगे कहा; *पृथोः*—राजा पृथु के; *तत्*—वह; *सूक्तम्*—वैदिक निष्कर्ष; *आकर्ण्य*—सुनकर; *सारम्*—अत्यन्त सारगर्भित; *सुष्ठु*—उपयुक्त; *मितम्*—संक्षिप्त; *मधु*—सुनने में मधुर; *स्मयमानः*—मुस्कराते हुए; *इव*—के समान; *प्रीत्या*—महान् सन्तोष से; *कुमारः*—ब्रह्मचारी; *प्रत्युवाच*—उत्तर दिया; *ह*—इस प्रकार।

**इस प्रकार ब्रह्मचारियों में श्रेष्ठ सनत्कुमार ने पृथु महाराज का वचन सुनकर—जो सार्थक, उपयुक्त, सटीक शब्दों से परिपूर्ण तथा सुनने में अत्यन्त मधुर था—पूर्ण सन्तोष से मुस्कराकर इस प्रकार बोलना आरम्भ किया।**

कुमारों के समक्ष पृथु महाराज की वाणी अनेक गुणों के कारण अत्यन्त प्रशंसनीय थी। वाणी चयनित शब्दों से रचित, सुनने में अत्यन्त मधुर तथा परिस्थिति के अनुकूल होनी चाहिए। ऐसी वाणी सार्थक कहलाती है। ये समस्त उत्तम गुण पृथु महाराज की वाणी में विद्यमान हैं, क्योंकि वे एक पूर्ण भक्त हैं। कहा गया है, *yasyāsti bhaktir bhagavaty akiñcanā sarvair guṇais tatra samāsate surāḥ*: "जिसकी अविचल भक्ति-श्रद्धा है और जो उनकी सेवा में संलग्न है, उसमें समस्त उत्तम गुण प्रकट हो जाते हैं।" (भा. 5.18.12) इस प्रकार कुमार अत्यन्त प्रसन्न हुए, और सनत्कुमार इस प्रकार बोलने लगे।
