### SB 4.25.22

> सुनासां सुदतीं बालां सुकपोलां वराननाम् ।\
> समविन्यस्तकर्णाभ्यां बिभ्रतीं कुण्डलश्रियम् ॥ २२ ॥

*सु-नासाम्*—अत्यन्त सुन्दर नाक; *सु-दतीम्*—अत्यन्त सुन्दर दाँत; *बालाम्*—युवती; *सु-कपोलाम्*—सुन्दर ललाट; *वर-आननाम्*—सुन्दर मुख; *सम*—समान रूप से; *विन्यस्त*—सुसज्जित; *कर्णाभ्याम्*—दोनों कान; *बिभ्रतीम्*—जगमगाते; *कुण्डल-श्रियम्*—सुन्दर कुण्डल धारण किए हुए।

**उस स्त्री की नाक, दाँत तथा ललाट सभी अत्यन्त सुन्दर थे। उसके कान भी समान रूप से अत्यन्त सुन्दर थे तथा जगमगाते कुण्डलों से सुसज्जित थे।**

बुद्धि का शरीर अपने को आच्छादित करने वाले इन्द्रिय-तृप्ति के विषयों, यथा गन्ध, दृष्टि तथा श्रवण का भोग करता है। सुनासाम् ("सुन्दर नाक") शब्द गन्ध द्वारा ज्ञान अर्जित करने वाली इन्द्रिय का संकेत करता है। इसी प्रकार, मुख स्वाद द्वारा ज्ञान अर्जित करने का साधन है, क्योंकि किसी वस्तु को चबाकर तथा जीभ से उसे छूकर हम उसका स्वाद समझ सकते हैं। सुकपोलाम् ("सुन्दर ललाट") शब्द एक स्वच्छ मस्तिष्क का संकेत करता है, जो वस्तुओं को यथारूप समझने में सक्षम होता है। बुद्धि के द्वारा कोई वस्तुओं को व्यवस्थित कर सकता है। दोनों कानों में लगे कुण्डल वहाँ बुद्धि के कार्य द्वारा रखे गए हैं। इस प्रकार ज्ञान अर्जित करने के मार्गों का रूपक के द्वारा वर्णन किया गया है।
