### SB 4.29.12

> आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धो बहूदनम् ।\
> पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः ॥ १२ ॥

*आपणः*—आपण नामक; *व्यवहारः*—जिह्वा का व्यापार; *अत्र*—यहाँ; *चित्रम्*—सभी प्रकार के; *अन्धः*—खाद्य पदार्थ; *बहूदनम्*—बहूदन नामक; *पितृ-हूः*—पितृहू नामक; *दक्षिणः*—दाहिना; *कर्णः*—कान; *उत्तरः*—बायाँ; *देव-हूः*—देवहू; *स्मृतः*—कहलाता है।

**आपण नामक नगर जिह्वा के वाणी में व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है, और बहूदन विविध प्रकार के खाद्य पदार्थों का। दाहिना कान पितृहू का द्वार कहलाता है, और बायाँ कान देवहू का द्वार कहलाता है।**
