### SB 4.29.70

> नाहं ममेति भावोऽयं पुरुषे व्यवधीयते ।\
> यावद् बुद्धिमनोऽक्षार्थगुणव्यूहो ह्यनादिमान् ॥ ७० ॥

*न*—नहीं; *अहम्*—मैं; *मम*—मेरा; *इति*—इस प्रकार; *भावः*—चेतना; *अयम्*—यह; *पुरुषे*—जीव में; *व्यवधीयते*—पृथक् होती है; *यावत्*—जब तक; *बुद्धि*—बुद्धि; *मनः*—मन; *अक्ष*—इन्द्रियाँ; *अर्थ*—इन्द्रियविषय; *गुण*—भौतिक गुणों की; *व्यूहः*—एक अभिव्यक्ति; *हि*—निश्चय ही; *अनादि-मान्*—सूक्ष्म शरीर (अनादि काल से विद्यमान)।

**जब तक बुद्धि, मन, इन्द्रियों, इन्द्रियविषयों तथा भौतिक गुणों की प्रतिक्रियाओं से बना सूक्ष्म भौतिक शरीर विद्यमान रहता है, तब तक मिथ्या तादात्म्य की चेतना तथा उसका सापेक्ष विषय, स्थूल शरीर, भी विद्यमान रहता है।**

मन, बुद्धि तथा अहंकार के सूक्ष्म शरीर की इच्छाएँ पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश के भौतिक तत्त्वों से बने स्थूल शरीर के बिना पूरी नहीं की जा सकतीं। जब स्थूल भौतिक शरीर प्रकट नहीं होता, तब जीव वास्तव में भौतिक प्रकृति के गुणों में कार्य नहीं कर सकता। इस श्लोक में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि मन तथा बुद्धि की सूक्ष्म क्रियाएँ जीव के सूक्ष्म शरीर के कष्टों तथा भोगों के कारण जारी रहती हैं। भौतिक तादात्म्य की चेतना (जैसे "मैं" तथा "मेरा") तब भी जारी रहती है, क्योंकि ऐसी चेतना अनादि काल से विद्यमान रही है। किन्तु, जब कोई कृष्णभावनामृत को समझने के बल पर आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित हो जाता है, तब स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों शरीरों की क्रियाएँ तथा प्रतिक्रियाएँ आत्मा को और परेशान नहीं करतीं।
