### SB 4.30.19

> गृहेष्वाविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम् ।\
> मद्वार्तायातयामानां न बन्धाय गृहा मताः ॥ १९ ॥

*gṛheṣu*—गृहस्थ जीवन में; *āviśatām*—जो प्रविष्ट हुए हैं; *ca*—भी; *api*—यद्यपि; *puṁsām*—पुरुषों के; *kuśala-karmaṇām*—शुभ कार्यों में रत; *mat-vārtā*—मेरे विषयक प्रसंगों में; *yāta*—व्यतीत होता है; *yāmānām*—जिनका प्रत्येक क्षण; *na*—नहीं; *bandhāya*—बन्धन के लिए; *gṛhāḥ*—गृहस्थ जीवन; *matāḥ*—माना जाता है।

**जो लोग भक्ति में शुभ कार्यों में रत रहते हैं, वे निश्चय ही यह समझते हैं कि समस्त कार्यों के परम भोक्ता अथवा लाभार्थी भगवान् ही हैं। अतएव जब कोई कार्य करता है, तो वह उसके फल भगवान् को अर्पित करता है और सदैव भगवान् के प्रसंगों में रत रहकर जीवन व्यतीत करता है। यद्यपि ऐसा व्यक्ति गृहस्थ जीवन में भाग ले रहा हो, फिर भी वह अपने कार्यों के फलों से प्रभावित नहीं होता।**

सामान्यतः परिवार में रहने वाला व्यक्ति सकाम कर्म के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, वह अपने कर्मों के फलों का भोग करने का प्रयत्न करता है। किन्तु भक्त जानता है कि श्रीकृष्ण ही परम भोक्ता हैं।

भोक्तारं यज्ञतपसां

सर्वलोकमहेश्वरम्

सुहृदं सर्वभूतानां

ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति

"मुझे समस्त यज्ञों और तपस्याओं का परम प्रयोजन, समस्त लोकों और देवताओं का परमेश्वर तथा समस्त जीवों का हितैषी एवं शुभचिन्तक जानकर, ज्ञानी पुरुष भौतिक दुःखों की पीड़ा से शान्ति प्राप्त करते हैं।" (गीता 5.29)

परमेश्वर परम स्वामी हैं; फलस्वरूप भक्त किसी भी वृत्ति का स्वयं को स्वामी नहीं मानता। भक्त सदा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को ही स्वामी मानता है; अतः उसके व्यवसाय के फल परमेश्वर को अर्पित किए जाते हैं। जो इस प्रकार अपने परिवार और सन्तानों के साथ भौतिक जगत् में रहता है, वह कभी भौतिक जगत् के कल्मष से प्रभावित नहीं होता। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (3.9) में होती है :

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर

जो अपने कर्मों के फलों का भोग करने का प्रयत्न करता है, वह उन फलों से बँध जाता है। किन्तु जो उन फलों अथवा लाभों को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित कर देता है, वह उन फलों में नहीं उलझता। यही सफलता का रहस्य है। सामान्यतः लोग सकाम कर्म की प्रतिक्रियाओं से मुक्त होने के लिए संन्यास लेते हैं। जो अपने कर्मों के फल स्वयं न लेकर उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित कर देता है, वह निश्चय ही मुक्त अवस्था में रहता है। भक्ति-रसामृत-सिन्धु में श्री रूप गोस्वामी इसकी पुष्टि करते हैं :

ईहा यस्य हरेर्दास्ये कर्मणा मनसा गिरा निखिलास्वप्यवस्थासु जीवन्मुक्तः स उच्यते

यदि कोई अपने जीवन, धन, वाणी, बुद्धि और अपनी समस्त वस्तुओं के द्वारा भगवान् की सेवा में स्वयं को संलग्न कर ले, तो वह किसी भी अवस्था में सदा मुक्त रहेगा। ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त कहते हैं — अर्थात् वह, जो इसी जीवन में मुक्त है। कृष्णभावनामृत से रहित होकर, जो भौतिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, वे केवल भौतिक बन्धन में और अधिक उलझते जाते हैं। उन्हें समस्त क्रियाओं की क्रिया-प्रतिक्रियाओं को भोगना और सहना पड़ता है। अतः यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन मानवता के लिए सबसे बड़ा वरदान है, क्योंकि यह मनुष्य को सदा श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रखता है। भक्तगण श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं, श्रीकृष्ण के लिए कार्य करते हैं, श्रीकृष्ण के लिए भोजन करते हैं, श्रीकृष्ण के लिए शयन करते हैं और श्रीकृष्ण के लिए कार्य करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न होती है। कृष्णभावनामृत में पूर्णतः व्यतीत जीवन मनुष्य को भौतिक कल्मष से बचाता है। जैसा भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज ने कहा है — कृष्ण-भजने याहा हय अनुकूल, विषय बलिया त्यागे ताहा हय भूल। यदि कोई इतना निपुण हो कि वह प्रत्येक वस्तु को भगवान् की सेवा में संलग्न अथवा योजित कर सके, तो भौतिक जगत् का त्याग करना एक बड़ी भूल होगी। मनुष्य को यह सीखना चाहिए कि प्रत्येक वस्तु को भगवान् की सेवा में किस प्रकार योजित किया जाए, क्योंकि प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण से सम्बद्ध है। यही जीवन का वास्तविक प्रयोजन और सफलता का रहस्य है। जैसा भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में पुनः कहा गया है :

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः

"अतः कर्मों के फलों में आसक्त हुए बिना, मनुष्य को कर्तव्य के रूप में कर्म करना चाहिए; क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करते हुए मनुष्य परम को प्राप्त करता है।" (गीता 3.19)

भगवद्गीता का तृतीय अध्याय विशेष रूप से इन्द्रियतृप्ति के उद्देश्य से किए गए भौतिक कर्मों और परमेश्वर की तुष्टि के उद्देश्य से किए गए भौतिक कर्मों पर विचार करता है। निष्कर्ष यह है कि ये दोनों एक समान नहीं हैं। इन्द्रियतृप्ति के लिए किए गए भौतिक कर्म भौतिक बन्धन के कारण हैं, जबकि वही कर्म श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए किए जाने पर मोक्ष के कारण बन जाते हैं। वही कर्म किस प्रकार बन्धन और मोक्ष — दोनों का कारण हो सकता है, इसे इस प्रकार समझाया जा सकता है। अत्यधिक दुग्ध-पदार्थ — जैसे कन्डेन्स्ड मिल्क, खीर इत्यादि — खा लेने से मनुष्य को अजीर्ण हो सकता है। किन्तु यद्यपि अजीर्ण अथवा अतिसार हो, फिर भी एक अन्य दुग्ध-पदार्थ — काली मिर्च और नमक मिला हुआ दही — इन रोगों को तुरन्त ठीक कर देगा। दूसरे शब्दों में, एक दुग्ध-पदार्थ अजीर्ण और अतिसार उत्पन्न कर सकता है, और दूसरा दुग्ध-पदार्थ उन्हें ठीक कर सकता है।

यदि किसी को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की विशेष कृपा से भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त हो, तो उसे उस ऐश्वर्य को बन्धन का कारण नहीं मानना चाहिए। जब किसी परिपक्व भक्त को भौतिक ऐश्वर्य का आशीर्वाद मिलता है, तब वह प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि भौतिक ऐश्वर्य को भगवान् की सेवा में किस प्रकार लगाया जाए। विश्व के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। पृथु महाराज, प्रह्लाद महाराज, जनक, ध्रुव, वैवस्वत मनु और महाराज इक्ष्वाकु जैसे राजा हुए हैं। ये सभी महान् राजा थे और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विशेष कृपापात्र थे। यदि भक्त परिपक्व न हो, तो परमेश्वर उसका समस्त ऐश्वर्य हर लेते हैं। इस सिद्धान्त को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् इस प्रकार बताते हैं — यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः। "अपने भक्त पर दिखाई गई मेरी प्रथम कृपा यह है कि मैं उसका समस्त भौतिक ऐश्वर्य हर लेता हूँ।" जो भौतिक ऐश्वर्य भक्ति के लिए हानिकारक होता है, उसे परमेश्वर हर लेते हैं, जबकि जो व्यक्ति भक्ति में परिपक्व होता है, उसे समस्त भौतिक सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।
