### SB 5.2.2

> स च कदाचित्पितृलोककामः सुरवरवनिताक्रीडाचलद्रोण्यां भगवन्तं विश्वसृजां पतिमाभृतपरिचर्योपकरण आत्मैकाग्र्येण तपस्व्याराधयां बभूव ॥ २ ॥

*सः*—वे (राजा आग्नीध्र); *च*—भी; *कदाचित्*—एक बार; *पितृलोक*—पितृलोक नामक लोक की; *कामः*—कामना करते हुए; *सुर-वर*—महान् देवताओं की; *वनिता*—स्त्रियों के; *आक्रीडा*—विहार का स्थान; *अचल-द्रोण्याम्*—मन्दर पर्वत की एक घाटी में; *भगवन्तम्*—सर्वाधिक शक्तिशाली (भगवान् ब्रह्मा) की; *विश्व-सृजाम्*—इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वाली विभूतियों के; *पतिम्*—स्वामी की; *आभृत*—एकत्र करके; *परिचर्या-उपकरणः*—पूजा की सामग्री; *आत्म*—मन की; *एक-अग्र्येण*—पूर्ण एकाग्रता के साथ; *तपस्वी*—तपस्या करने वाला व्यक्ति; *आराधयाम् बभूव*—पूजा में संलग्न हो गए।

**एक उत्तम पुत्र प्राप्त करने तथा पितृलोक का निवासी बनने की कामना से महाराज आग्नीध्र ने एक बार भौतिक सृष्टि के अधिष्ठाताओं के स्वामी भगवान् ब्रह्मा की पूजा की। वे मन्दर पर्वत की एक घाटी में गए, जहाँ स्वर्गलोक की अप्सराएँ विचरण करने के लिए उतरती हैं। वहाँ उन्होंने उपवन के पुष्प तथा अन्य आवश्यक सामग्री एकत्र की और तत्पश्चात् कठोर तपस्या तथा पूजा में संलग्न हो गए।**

राजा पितृलोक-काम बन गए, अर्थात् पितृलोक नामक लोक में स्थानान्तरित होने की कामना करने लगे। पितृलोक का उल्लेख भगवद्गीता में हुआ है (yānti deva-vratā devān pitṝn yānti pitṛ-vratāḥ [भ.गी. ९.२५])। इस लोक में जाने के लिए मनुष्य को ऐसे अत्यन्त उत्तम पुत्रों की आवश्यकता होती है जो भगवान् विष्णु को अर्पण कर सकें और फिर उसका अवशेष अपने पितरों को अर्पित कर सकें। श्राद्ध समारोह का उद्देश्य भगवान् विष्णु को प्रसन्न करना है, ताकि उन्हें प्रसन्न करने के पश्चात् मनुष्य अपने पितरों को प्रसाद अर्पित कर सके और इस प्रकार उन्हें सुखी बना सके। पितृलोक के निवासी सामान्यतः कर्म-काण्डीय श्रेणी के, अर्थात् सकाम कर्म करने वाले, मनुष्य होते हैं, जिन्हें उनके पुण्य कर्मों के कारण वहाँ स्थानान्तरित किया गया होता है। वे वहाँ तब तक रह सकते हैं जब तक उनके वंशज उन्हें विष्णु-प्रसाद अर्पित करते रहते हैं। किन्तु पितृलोक जैसे स्वर्गलोकों में रहने वाले सभी को अपने पुण्य कर्मों के फल के क्षीण हो जाने पर पृथ्वी पर लौटना पड़ता है। जैसा कि भगवद्गीता (९.२१) में पुष्टि हुई है, kṣīṇe puṇye martya-lokaṁ viśanti: जो लोग पुण्य कर्म करते हैं वे उच्चतर लोकों में स्थानान्तरित किए जाते हैं, किन्तु जब उनके पुण्य कर्मों के फल समाप्त हो जाते हैं, तब वे पुनः पृथ्वी पर स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं।

चूँकि महाराज प्रियव्रत महान् भक्त थे, तब वे ऐसे पुत्र को कैसे उत्पन्न कर सकते थे जो पितृलोक में स्थानान्तरित होना चाहता था? भगवान् कृष्ण कहते हैं, pitṝn yānti pitṛ-vratāḥ: जो लोग पितृलोक जाना चाहते हैं वे वहीं स्थानान्तरित किए जाते हैं। इसी प्रकार, yānti mad-yājino 'pi mām: जो लोग आध्यात्मिक लोकों, वैकुण्ठलोकों, में स्थानान्तरित होना चाहते हैं वे भी वहाँ जा सकते हैं। चूँकि महाराज आग्नीध्र एक वैष्णव के पुत्र थे, इसलिए उन्हें आध्यात्मिक जगत्, वैकुण्ठलोक, में स्थानान्तरित होने की कामना करनी चाहिए थी। तब फिर उन्होंने पितृलोक में स्थानान्तरित होने की कामना क्यों की? इसके उत्तर में भागवत के एक टीकाकार गोस्वामी गिरिधर यह टिप्पणी करते हैं कि आग्नीध्र का जन्म तब हुआ जब महाराज प्रियव्रत कामवासनापूर्ण इच्छाओं से मोहित थे। इसे एक तथ्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है क्योंकि गर्भाधान के समय के अनुसार पुत्र भिन्न-भिन्न मनोवृत्तियों के साथ उत्पन्न होते हैं। इसलिए वैदिक प्रणाली के अनुसार, सन्तान के गर्भाधान से पूर्व गर्भाधान-संस्कार सम्पन्न किया जाता है। यह संस्कार पिता की मनोवृत्ति को इस प्रकार ढालता है कि जब वह अपनी पत्नी के गर्भ में अपना बीज रोपित करता है, तब वह ऐसी सन्तान उत्पन्न करता है जिसका मन भक्तिपूर्ण भाव से पूर्ण रूप से ओतप्रोत होगा। किन्तु वर्तमान समय में ऐसे गर्भाधान-संस्कार नहीं होते, और इसलिए लोग सामान्यतः सन्तान उत्पन्न करते समय कामवासनापूर्ण मनोवृत्ति रखते हैं। विशेषकर इस कलियुग में गर्भाधान समारोह नहीं होते; प्रत्येक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ बिल्ली या कुत्ते के समान मैथुन का आनन्द लेता है। इसलिए शास्त्रीय आदेशों के अनुसार, इस युग के लगभग सभी लोग शूद्र श्रेणी के हैं। निःसन्देह, यद्यपि महाराज आग्नीध्र को पितृलोक में स्थानान्तरित होने की इच्छा थी, इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी मनोवृत्ति शूद्र की थी; वे क्षत्रिय थे।

महाराज आग्नीध्र पितृलोक में स्थानान्तरित होना चाहते थे, और इसलिए उन्हें एक पत्नी की आवश्यकता थी क्योंकि पितृलोक में स्थानान्तरित होने का इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को अपने पीछे एक ऐसा उत्तम पुत्र छोड़ना चाहिए जो प्रतिवर्ष पिण्ड, अर्थात् भगवान् विष्णु का प्रसाद, अर्पित करे। एक उत्तम पुत्र प्राप्त करने के लिए महाराज आग्नीध्र देवताओं के कुल से पत्नी चाहते थे। इसलिए वे मन्दर पर्वत पर गए, जहाँ देवताओं की स्त्रियाँ सामान्यतः भगवान् ब्रह्मा की पूजा करने आती हैं। भगवद्गीता (४.१२) में कहा गया है, kāṅkṣantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ: जो भौतिकतावादी भौतिक जगत् में शीघ्र फल चाहते हैं वे देवताओं की पूजा करते हैं। इसकी पुष्टि श्रीमद्भागवत में भी हुई है। śrī-aiśvarya-prajepsavaḥ: जो लोग सुन्दर पत्नियाँ, प्रचुर धन तथा अनेक पुत्र चाहते हैं वे देवताओं की पूजा करते हैं, किन्तु एक बुद्धिमान् भक्त, इस भौतिक जगत् के सुख में सुन्दर पत्नी, भौतिक ऐश्वर्य तथा सन्तान के रूप में फँसने के बजाय, तुरन्त घर वापस, भगवद्धाम वापस, स्थानान्तरित होना चाहता है। इस प्रकार वह भगवान् विष्णु की पूजा करता है।
