### SB 5.7.4

> स बहुविन्महीपतिः पितृपितामहवदुरुवत्सलतया स्वे स्वे कर्मणि वर्तमानाः प्रजाः स्वधर्ममनुवर्तमानः पर्यपालयत् ॥ ४ ॥

*सः*—वह राजा (महाराज भरत); *बहु-वित्*—ज्ञान में अत्यन्त उन्नत होकर; *मही-पतिः*—पृथ्वी का शासक; *पितृ*—पिता; *पितामह*—पितामह; *वत्*—बिल्कुल समान; *उरु-वत्सलतया*—प्रजा के प्रति अत्यन्त वत्सल होने के गुण से; *स्वे स्वे*—अपने-अपने; *कर्मणि*—कर्तव्यों में; *वर्तमानाः*—स्थित रहते हुए; *प्रजाः*—प्रजा; *स्व-धर्मम् अनुवर्तमानः*—अपने व्यावसायिक कर्तव्य में पूर्णतया स्थित होकर; *पर्यपालयत्*—शासन किया।

**महाराज भरत इस पृथ्वी पर एक अत्यन्त विद्वान् एवं अनुभवी राजा थे। उन्होंने प्रजा पर भली-भाँति शासन किया और स्वयं अपने-अपने कर्तव्यों में संलग्न रहे। महाराज भरत प्रजा के प्रति उतने ही वत्सल थे जितने उनके पिता एवं पितामह रहे थे। उन्हें अपने-अपने व्यावसायिक कर्तव्यों में संलग्न रखते हुए उन्होंने पृथ्वी पर शासन किया।**

यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि प्रमुख शासक प्रजा को उनके अपने-अपने व्यावसायिक कर्तव्यों में पूर्णतया संलग्न रखकर उन पर शासन करे। कुछ प्रजाजन ब्राह्मण थे, कुछ क्षत्रिय थे, और कुछ वैश्य एवं शूद्र थे। यह सरकार का कर्तव्य है कि वह देखे कि प्रजा अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए इन भौतिक विभाजनों के अनुसार कर्म करे। किसी को भी किसी भी प्रकार से बेरोज़गार या अकर्मण्य नहीं रहना चाहिए। भौतिक मार्ग पर मनुष्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के रूप में कर्म करना चाहिए, और आध्यात्मिक मार्ग पर प्रत्येक व्यक्ति को ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी के रूप में कर्म करना चाहिए। यद्यपि पूर्वकाल में शासन राजतन्त्रीय था, फिर भी सभी राजा प्रजा के प्रति अत्यन्त वत्सल थे, और वे प्रजा को उनके अपने-अपने कर्तव्यों में कठोरता से संलग्न रखते थे। अतएव समाज अत्यन्त सुचारु रूप से संचालित होता था।
