### SB 5.8.23

> किं वा अरे आचरितं तपस्तपस्विन्यानया यदियमवनिः सविनयकृष्णसारतनयतनुतरसुभगशिवतमाखरखुरपदपङ्क्तिभिर्द्रविणविधुरातुरस्य कृपणस्य मम द्रविणपदवीं सूचयन्त्यात्मानं च सर्वतः कृतकौतुकं द्विजानां स्वर्गापवर्गकामानां देवयजनं करोति ॥ २३ ॥

*किम् वा*—क्या; *अरे*—ओह; *आचरितम्*—अनुष्ठान किया गया; *तपः*—तपस्या; *तपस्विन्या*—सर्वाधिक भाग्यशालिनी के द्वारा; *अनया*—इस पृथ्वी ने; *यत्*—जिससे; *इयम्*—यह; *अवनिः*—पृथ्वी; *स-विनय*—अत्यन्त सौम्य तथा सुशील; *कृष्ण-सार-तनय*—काले मृग के बच्चे के; *तनुतर*—छोटे; *सुभग*—सुन्दर; *शिव-तम*—परम मंगलमय; *अखर*—कोमल; *खुर*—खुरों के; *पद-पङ्क्तिभिः*—चिह्नों की श्रृंखला से; *द्रविण-विधुर-आतुरस्य*—जो धन की हानि के कारण अत्यन्त व्यथित है; *कृपणस्य*—अत्यन्त दुखी प्राणी के; *मम*—मेरे लिए; *द्रविण-पदवीम्*—उस धन को प्राप्त करने का मार्ग; *सूचयन्ति*—संकेत करते हुए; *आत्मानम्*—अपने शरीर को; *च*—तथा; *सर्वतः*—चारों ओर से; *कृत-कौतुकम्*—सुशोभित; *द्विजानाम्*—ब्राह्मणों के; *स्वर्ग-अपवर्ग-कामानाम्*—जो स्वर्गलोक अथवा मुक्ति प्राप्त करने के इच्छुक हैं; *देव-यजनम्*—देवताओं के यज्ञ का स्थल; *करोति*—बना देती है।

**इस प्रकार उन्मत्त के समान बोलकर महाराज भरत उठ खड़े हुए और बाहर चले गये। भूमि पर मृग के पदचिह्नों को देखकर उन्होंने प्रेमवश उन पदचिह्नों की प्रशंसा करते हुए कहा: हे अभागे भरत, इस पृथ्वी द्वारा की गई तपस्या तथा कठोर साधना की तुलना में तेरी तपस्या तथा साधना अत्यन्त तुच्छ है। इस पृथ्वी की कठोर तपस्या के कारण ही इस मृग के पदचिह्न, जो छोटे, सुन्दर, परम मंगलमय तथा कोमल हैं, इस भाग्यशालिनी पृथ्वी के तल पर अंकित हुए हैं। पदचिह्नों की यह श्रृंखला मुझ जैसे व्यक्ति को, जो मृग के वियोग से शोकाकुल है, यह दिखा रही है कि वह पशु किस मार्ग से वन में होकर गया है और मैं किस प्रकार अपना खोया हुआ धन पुनः प्राप्त कर सकता हूँ। इन पदचिह्नों के कारण यह भूमि उन ब्राह्मणों के लिए, जो स्वर्गलोक अथवा मुक्ति के इच्छुक हैं, देवताओं के यज्ञ करने का उपयुक्त स्थल बन गई है।**

यह कहा जाता है कि जब कोई व्यक्ति प्रेम-सम्बन्धों में अत्यधिक लिप्त हो जाता है, तो वह स्वयं को तथा दूसरों को भूल जाता है और यह भी भूल जाता है कि किस प्रकार आचरण करना है और किस प्रकार बोलना है। कहा जाता है कि एक बार जब किसी व्यक्ति का पुत्र जन्म से ही अंधा था, तो पिता ने अपने उस बालक के प्रति प्रगाढ़ स्नेह के कारण उसका नाम पद्मलोचन अर्थात् "कमल-नयन" रख दिया। यह अंधे प्रेम से उत्पन्न होने वाली स्थिति है। भरत महाराज भी मृग के प्रति अपने भौतिक प्रेम के कारण धीरे-धीरे इसी दशा में पड़ गये। स्मृति-शास्त्र में कहा गया है:

yasmin deśe mṛgaḥ kṛṣṇas

tasmin dharmānn ivodhata

"जिस भूखण्ड पर काले मृग के पदचिह्न देखे जा सकें, उसे धार्मिक अनुष्ठानों के सम्पादन हेतु उपयुक्त स्थान समझना चाहिए।"
