### SB 5.14.41

> कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत आपदः कथञ्चिन्नरकाद्विमुक्तः पुनरप्येवं संसाराध्वनि वर्तमानो नरलोकसार्थमुपयाति एवमुपरि गतोऽपि ॥ ४१ ॥

*कर्म-वल्लीम्*—सकाम कर्मों की लता का; *अवलम्ब्य*—आश्रय लेकर; *ततः*—उससे; *आपदः*—संकटमय अथवा दुःखमय अवस्था; *कथञ्चित्*—किसी न किसी प्रकार; *नरकात्*—जीवन की नारकीय अवस्था से; *विमुक्तः*—मुक्त होकर; *पुनः अपि*—फिर से; *एवम्*—इस प्रकार; *संसार-अध्वनि*—भौतिक अस्तित्व के मार्ग पर; *वर्तमानः*—विद्यमान रहते हुए; *नर-लोक-स-अर्थम्*—स्वार्थी भौतिक कर्मों के क्षेत्र में; *उपयाति*—वह प्रवेश करता है; *एवम्*—इस प्रकार; *उपरि*—ऊपर (उच्चतर लोकों में); *गतः अपि*—यद्यपि पदोन्नत होकर।

**जब बद्धजीव सकाम कर्म की लता का आश्रय ग्रहण करता है, तब वह अपने पुण्य कर्मों के कारण उच्चतर लोकों तक उन्नत हो सकता है और इस प्रकार नारकीय अवस्थाओं से मुक्ति पा सकता है, किन्तु दुर्भाग्यवश वह वहाँ टिक नहीं पाता। अपने पुण्य कर्मों के फल भोग लेने के पश्चात् उसे निम्नतर लोकों में पुनः लौटना पड़ता है। इस प्रकार वह निरन्तर ऊपर जाता है और नीचे आता है।**

इस सम्बन्ध में श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—

brahmāṇḍa bhramite kona bhāgyavān jīva

*guru*-kṛṣṇa-prasāde pāya bhakti-latā-bīja

(Cc. Madhya 19.151)

सृष्टि के समय से लेकर प्रलय के समय तक, यदि कोई करोड़ों वर्षों तक भी भटकता रहे, तो भी जब तक उसे किसी शुद्ध भक्त के चरणकमलों का आश्रय प्राप्त नहीं होता, तब तक वह भौतिक अस्तित्व के मार्ग से मुक्त नहीं हो सकता। जिस प्रकार बन्दर वटवृक्ष की शाखा का आश्रय लेकर सोचता है कि वह भोग कर रहा है, उसी प्रकार बद्धजीव अपने जीवन के वास्तविक हित को न जानते हुए कर्म-काण्ड अर्थात् सकाम कर्मों के मार्ग का आश्रय ग्रहण करता है। कभी ऐसे कर्मों द्वारा वह स्वर्गलोकों तक उन्नत हो जाता है, और कभी पुनः पृथ्वी पर उतर आता है। इसी को श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्रह्माण्ड भ्रमिते कहकर वर्णित किया है। किन्तु यदि कृष्ण की कृपा से कोई इतना भाग्यशाली हो कि गुरु की शरण में आ जाए, तो कृष्ण की कृपा से उसे भगवान् की भक्ति करने की शिक्षा प्राप्त होती है। इस प्रकार उसे भौतिक जगत के भीतर ऊपर-नीचे के अपने निरन्तर संघर्ष से छूटने का सूत्र प्राप्त हो जाता है। इसलिए वैदिक आदेश यह है कि मनुष्य को गुरु के पास जाना चाहिए। वेद घोषित करते हैं—tad-vijñānārthaṁ sa gurum evābhigacchet [MU tad-vijñānārthaṁ sa gurum evābhigacchet

*samit*-pāṇiḥ śrotriyaṁ brahma-niṣṭham

"इन वस्तुओं को भली-भाँति समझने के लिए, मनुष्य को हाथ में समिधा लेकर विनम्रतापूर्वक ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए जो *वेदों* में पारंगत हो तथा परम सत्य में दृढ़ता से समर्पित हो।"

[मुण्डक उपनिषद् 1.2.12]

इसी प्रकार भगवद्गीता (4.34) में भगवान् उपदेश देते हैं—

tad viddhi praṇipātena

paripraśnena sevayā

upadekṣyanti te jñānaṁ

*jñāninas tattva*-darśinaḥ

"तुम सत्य को जानने के लिए किसी गुरु के पास जाओ। उससे विनम्रतापूर्वक जिज्ञासा करो और उसकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कारी जीव तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकता है, क्योंकि उसने सत्य का दर्शन किया है।" श्रीमद्भागवत (11.3.21) भी इसी प्रकार का उपदेश देता है—

tasmād guruṁ prapadyeta

jijñāsuḥ śreya uttamam

śābde pare ca niṣṇātaṁ

brahmaṇy upaśamāśrayam

"जो भी व्यक्ति वास्तविक सुख प्राप्त करने की गम्भीरतापूर्वक इच्छा रखता है, उसे प्रामाणिक गुरु की खोज करनी चाहिए और दीक्षा द्वारा उसकी शरण ग्रहण करनी चाहिए। उसके गुरु की योग्यता यह है कि उसने विचार-मनन द्वारा शास्त्रों के निष्कर्ष का साक्षात्कार किया हो और इन निष्कर्षों के विषय में दूसरों को विश्वास दिला सके। ऐसे महापुरुष, जिन्होंने समस्त भौतिक विचारों को त्यागकर भगवान् की शरण ग्रहण की है, प्रामाणिक गुरु समझे जाते हैं।" इसी प्रकार महान् वैष्णव विश्वनाथ चक्रवर्ती भी उपदेश देते हैं—यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादः—"गुरु की कृपा से मनुष्य को कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।" यही वही उपदेश है जो श्री चैतन्य महाप्रभु ने दिया है (गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज)। यह अनिवार्य है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत में आना ही चाहिए, और इसलिए उसे किसी शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार मनुष्य पदार्थ के बन्धन से मुक्त हो सकता है।
