### SB 6.2.19

> यथागदं वीर्यतममुपयुक्तं यदृच्छया ।\
> अजानतोऽप्यात्मगुणं कुर्यान्मन्त्रोऽप्युदाहृतः ॥ १९ ॥

*yathā*—जिस प्रकार; *agadam*—औषधि; *vīrya-tamam*—अत्यन्त शक्तिशाली; *upayuktam*—उचित रीति से ली गई; *yadṛcchayā*—किसी न किसी प्रकार; *ajānataḥ*—ज्ञानरहित व्यक्ति द्वारा; *api*—भी; *ātma-guṇam*—अपनी ही शक्ति; *kuryāt*—प्रकट करती है; *mantraḥ*—हरे कृष्ण मन्त्र; *api*—भी; *udāhṛtaḥ*—उच्चारित।

**यदि किसी औषधि की प्रभावकारी शक्ति से अनजान कोई व्यक्ति उस औषधि का सेवन करता है अथवा उसे बलपूर्वक सेवन कराया जाता है, तो वह उसके जाने बिना भी अपना कार्य करती है, क्योंकि उसकी शक्ति रोगी की समझ पर निर्भर नहीं करती। इसी प्रकार, यद्यपि कोई भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन के मूल्य को नहीं जानता, फिर भी यदि वह जानकर अथवा अनजाने कीर्तन करता है, तो वह कीर्तन अत्यन्त प्रभावकारी होगा।**

पाश्चात्य देशों में, जहाँ हरे कृष्ण आन्दोलन फैल रहा है, विद्वान् पंडित तथा अन्य विचारशील मनुष्य इसकी प्रभावकारिता का अनुभव कर रहे हैं। उदाहरणार्थ, डॉ. जे. स्टिलसन जुडा, एक विद्वान् पंडित, इस आन्दोलन की ओर अत्यधिक आकृष्ट हुए हैं, क्योंकि उन्होंने वास्तव में देखा है कि यह नशे के आदी हिप्पियों को शुद्ध वैष्णवों में परिणत कर रहा है, जो स्वेच्छा से कृष्ण के तथा मानवता के सेवक बन जाते हैं। कुछ ही वर्ष पूर्व ऐसे हिप्पी हरे कृष्ण मन्त्र को नहीं जानते थे, किन्तु अब वे इसका कीर्तन कर रहे हैं और शुद्ध वैष्णव बन रहे हैं। इस प्रकार वे समस्त पापकर्मों, जैसे अवैध मैथुन, नशा, मांस-भक्षण तथा द्यूतक्रीड़ा से मुक्त हो रहे हैं। यह हरे कृष्ण आन्दोलन की प्रभावकारिता का व्यावहारिक प्रमाण है, जिसका समर्थन इस श्लोक में किया गया है। कोई हरे कृष्ण मन्त्र के कीर्तन का मूल्य जाने या न जाने, किन्तु यदि वह किसी न किसी प्रकार इसका कीर्तन करता है, तो वह तत्काल शुद्ध हो जाएगा, ठीक उसी प्रकार जैसे शक्तिशाली औषधि का सेवन करने वाला उसके प्रभावों का अनुभव करता है, चाहे वह उसे जानकर ले अथवा अनजाने।
