### SB 6.8.31

> यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।\
> सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१ ॥

*यथा*—जिस प्रकार; *हि*—निस्सन्देह; *भगवान्*—भगवान्; *एव*—निश्चय ही; *वस्तुतः*—अन्ततोगत्वा; *सत्*—व्यक्त; *असत्*—अव्यक्त; *च*—तथा; *यत्*—जो कुछ भी; *सत्येन*—सत्य के द्वारा; *अनेन*—इस; *नः*—हमारे; *सर्वे*—समस्त; *यान्तु*—चले जाएँ; *नाशम्*—विनाश को; *उपद्रवाः*—विघ्न।

**सूक्ष्म तथा स्थूल विराट जगत् भौतिक है, फिर भी वह भगवान् से अभिन्न है क्योंकि अन्ततोगत्वा वे ही समस्त कारणों के कारण हैं। कारण तथा कार्य वास्तव में एक हैं, क्योंकि कारण कार्य में विद्यमान रहता है। अतएव परम सत्य, भगवान्, अपने किसी भी शक्तिशाली अंश द्वारा हमारे समस्त संकटों को नष्ट कर सकते हैं।**
