{"ref": "bbd/1", "book": "bbd", "lang": "hi", "url": "/hi/library/bbd/1/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "हम ये शरीर नहीं हैं", "purport": "dehī nityam avadhyo 'yaṁ\n\ndehe sarvasya bhārata\n\ntasmāt sarvāṇi bhūtāni\n\nna tvaṁ śocitum arhasi\n\n\"हे भरतवंशी, जो देह में वास करता है वह नित्य है और कभी मारा नहीं जा सकता। अतः तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं।\" (*भगवद्गीता* 2.30)\n\nआत्म-साक्षात्कार की सर्वप्रथम सीढ़ी यह अनुभव करना है कि अपनी पहचान शरीर से भिन्न है। \"मैं यह शरीर नहीं, अपितु आत्मा हूँ\"—जो कोई मृत्यु से परे जाकर उस पार के आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करना चाहता है, उसके लिए यह अनुभूति अनिवार्य है। यह केवल इतना कह देने की बात नहीं कि \"मैं यह शरीर नहीं हूँ\", अपितु वस्तुतः इसका अनुभव करने की बात है। यह उतना सरल नहीं जितना प्रथम दृष्टि में प्रतीत होता है। यद्यपि हम ये शरीर नहीं, अपितु शुद्ध चेतना हैं, तथापि किसी-न-किसी प्रकार हम इस शारीरिक आवरण के भीतर बँध गए हैं। यदि हम वस्तुतः वही सुख और स्वतन्त्रता चाहते हैं जो मृत्यु से परे है, तो हमें शुद्ध चेतना के रूप में अपनी स्वरूप-स्थिति में स्थापित होकर वहीं स्थित रहना होगा।\n\nदेहात्म-बुद्धि में जीते हुए, सुख के विषय में हमारी धारणा प्रलाप-ग्रस्त मनुष्य के समान होती है। कुछ दार्शनिकों का दावा है कि देह-तादात्म्य की इस प्रलाप-ग्रस्त दशा को समस्त कर्म से विरत होकर ठीक किया जाना चाहिए। चूँकि ये भौतिक क्रियाएँ हमारे लिए क्लेश का स्रोत रही हैं, अतः उनका कथन है कि वस्तुतः हमें इन क्रियाओं को रोक देना चाहिए। उनकी पूर्णता की पराकाष्ठा एक प्रकार के बौद्ध निर्वाण में है, जिसमें कोई क्रिया नहीं की जाती। बुद्ध का मत था कि भौतिक तत्त्वों के संयोग से यह शरीर अस्तित्व में आया है, और किसी-न-किसी प्रकार यदि इन भौतिक तत्त्वों को पृथक् अथवा विघटित कर दिया जाए, तो दुःख का कारण दूर हो जाता है। यदि हमारे पास एक बड़ा घर होने के कारण कर-संग्राहक हमें बहुत कठिनाई दें, तो एक सरल समाधान यह है कि घर को ही नष्ट कर दिया जाए। तथापि *भगवद्गीता* यह संकेत देती है कि यह भौतिक शरीर ही सर्वस्व नहीं है। भौतिक तत्त्वों के इस संयोग से परे आत्मा है, और उस आत्मा का लक्षण चेतना है।\n\nचेतना को नकारा नहीं जा सकता। चेतनारहित शरीर मृत शरीर है। ज्यों ही चेतना शरीर से हट जाती है, मुख नहीं बोलेगा, नेत्र नहीं देखेंगे, और न ही कान सुनेंगे। यह बात एक बालक भी समझ सकता है। यह तथ्य है कि शरीर के संचालन हेतु चेतना नितान्त आवश्यक है। यह चेतना क्या है? जिस प्रकार ताप अथवा धूम अग्नि के लक्षण हैं, उसी प्रकार चेतना आत्मा का लक्षण है। आत्मा अथवा स्व की ऊर्जा चेतना के रूप में प्रकट होती है। वस्तुतः चेतना ही प्रमाणित करती है कि आत्मा विद्यमान है। यह केवल *भगवद्गीता* का दर्शन नहीं, अपितु समस्त वैदिक साहित्य का निष्कर्ष है।\n\nशंकराचार्य के निर्विशेषवादी अनुयायी, तथा भगवान् श्रीकृष्ण से चली गुरु-परम्परा में आने वाले वैष्णवजन—दोनों ही आत्मा के यथार्थ अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, किन्तु बौद्ध दार्शनिक नहीं करते। बौद्धजन का तर्क है कि किसी अवस्था पर पदार्थ का संयोग चेतना उत्पन्न करता है, किन्तु इस तर्क का खण्डन इस तथ्य से होता है कि यद्यपि हमारे पास पदार्थ के समस्त घटक उपलब्ध हों, तथापि हम उनसे चेतना उत्पन्न नहीं कर सकते। एक मृत मनुष्य में समस्त भौतिक तत्त्व विद्यमान हो सकते हैं, परन्तु हम उस मनुष्य को पुनः चेतन नहीं कर सकते। यह शरीर किसी यन्त्र के समान नहीं है। जब किसी यन्त्र का कोई पुर्ज़ा बिगड़ जाता है, तो उसे बदला जा सकता है, और यन्त्र पुनः चल पड़ता है; किन्तु जब शरीर बिगड़ जाता है और चेतना शरीर को छोड़ देती है, तब हमारे लिए बिगड़े हुए अंश को बदलकर चेतना को पुनर्जीवित करने की कोई सम्भावना नहीं रहती। आत्मा शरीर से भिन्न है, और जब तक आत्मा वहाँ है, शरीर सजीव रहता है। परन्तु आत्मा के अभाव में शरीर को सजीव बनाने की कोई सम्भावना नहीं है।\n\nचूँकि हम अपनी स्थूल इन्द्रियों से आत्मा को नहीं देख पाते, अतः हम उसे नकार देते हैं। वस्तुतः ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं जो विद्यमान तो हैं, किन्तु जिन्हें हम देख नहीं सकते। हम वायु, रेडियो-तरंगों अथवा ध्वनि को नहीं देख सकते, न ही अपनी कुण्ठित इन्द्रियों से सूक्ष्म जीवाणुओं को अनुभव कर सकते हैं, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वे वहाँ हैं ही नहीं। सूक्ष्मदर्शी तथा अन्य उपकरणों की सहायता से अनेक वस्तुएँ अनुभव की जा सकती हैं, जिन्हें पूर्व में अपूर्ण इन्द्रियों ने नकार दिया था। केवल इसलिए कि आत्मा, जो आकार में अणु के समान है, अभी तक इन्द्रियों अथवा उपकरणों से अनुभव नहीं की गई, हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि वह वहाँ है ही नहीं। तथापि उसे उसके लक्षणों तथा प्रभावों से अनुभव किया जा सकता है।\n\n*भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण यह दर्शाते हैं कि हमारे समस्त दुःख शरीर के साथ मिथ्या तादात्म्य के कारण हैं।\n\nmātrā-sparśās tu kaunteya\n\nśītoṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ\n\nāgamāpāyino 'nityās\n\ntāṁs titikṣasva bhārata\n\n\"हे कुन्तीपुत्र, सुख-दुःख की क्षणिक प्रतीति तथा यथासमय उनका अन्तर्धान होना, शीत तथा ग्रीष्म ऋतुओं के आने-जाने के समान है। हे भरतवंशी, वे इन्द्रिय-संवेदन से उत्पन्न होते हैं, और मनुष्य को विचलित हुए बिना उन्हें सहन करना सीखना चाहिए।\" (गीता 2.14) ग्रीष्म ऋतु में हमें जल के स्पर्श से सुख की अनुभूति हो सकती है, किन्तु शीत ऋतु में हम उसी जल से दूर भागते हैं क्योंकि वह अत्यधिक ठण्डा होता है। दोनों ही दशाओं में जल वही है, किन्तु शरीर के साथ उसके स्पर्श के कारण हम उसे सुखद अथवा दुःखद रूप में अनुभव करते हैं।\n\nदुःख तथा सुख की समस्त अनुभूतियाँ शरीर के कारण हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में शरीर तथा मन सुख तथा दुःख अनुभव करते हैं। तथ्यतः हम सुख के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि आत्मा की स्वरूप-स्थिति सुख की है। आत्मा परम सत्ता का अंश है, जो sac-cid-ānanda-vigrahaḥ [ब्र.सं. 5.1] है—ज्ञान, आनन्द तथा नित्यता का साक्षात् विग्रह। वस्तुतः \"कृष्ण\" नाम स्वयं, जो असाम्प्रदायिक है, \"सर्वाधिक आनन्द\" का अर्थ देता है। कृष् का अर्थ है \"सर्वाधिक\", और ण का अर्थ है \"आनन्द\"। श्रीकृष्ण आनन्द के मूर्तिमान् सार हैं, और उनका अंश होने के कारण हम आनन्द के लिए लालायित रहते हैं। समुद्र-जल की एक बूँद में स्वयं समुद्र के समस्त गुण विद्यमान रहते हैं, और हम, यद्यपि परम पूर्ण के अणुमात्र अंश हैं, तथापि परम के समान ही ऊर्जायुक्त गुण रखते हैं।\n\nयह आणविक आत्मा, यद्यपि इतनी सूक्ष्म है, सम्पूर्ण शरीर को इतने अद्भुत रूपों में कर्म करने के लिए संचालित कर रही है। संसार में हम इतने सारे नगर, राजमार्ग, सेतु, विशाल भवन, स्मारक तथा महान् सभ्यताएँ देखते हैं, किन्तु यह सब किसने किया है? यह सब शरीर के भीतर स्थित उस सूक्ष्म आत्म-स्फुलिंग द्वारा किया गया है। यदि इतने अद्भुत कार्य उस सूक्ष्म आत्म-स्फुलिंग द्वारा सम्पन्न हो सकते हैं, तो हम कल्पना भी आरम्भ नहीं कर सकते कि परम आत्म-पूर्ण द्वारा क्या-क्या सम्पन्न किया जा सकता है। उस सूक्ष्म आत्म-स्फुलिंग की स्वाभाविक लालसा पूर्ण के गुणों—ज्ञान, आनन्द तथा नित्यता—की ओर है, किन्तु भौतिक शरीर के कारण ये लालसाएँ कुण्ठित हो रही हैं। आत्मा की इस इच्छा को कैसे प्राप्त किया जाए, इसकी जानकारी *भगवद्गीता* में दी गई है।\n\nइस समय हम एक अपूर्ण उपकरण के माध्यम से नित्यता, आनन्द तथा ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं। वस्तुतः इन लक्ष्यों की ओर हमारी प्रगति भौतिक शरीर द्वारा अवरुद्ध हो रही है; अतः हमें शरीर से परे अपने अस्तित्व की अनुभूति पर पहुँचना होगा। यह सैद्धान्तिक ज्ञान कि हम ये शरीर नहीं हैं, पर्याप्त नहीं। हमें सदा स्वयं को शरीर के स्वामी के रूप में पृथक् रखना होगा, सेवक के रूप में नहीं। यदि हम भली-भाँति वाहन चलाना जानते हों, तो वह हमें उत्तम सेवा देगा; किन्तु यदि हम न जानें, तो हम संकट में पड़ जाएँगे।\n\nशरीर इन्द्रियों से रचित है, और इन्द्रियाँ सदा अपने विषयों के लिए भूखी रहती हैं। नेत्र किसी सुन्दर व्यक्ति को देखते हैं और हमसे कहते हैं, \"अरे, वहाँ एक सुन्दर कन्या है, एक सुन्दर बालक है। चलो देखने चलें।\" कान हमसे कहते हैं, \"अरे, वहाँ बहुत मधुर संगीत है। चलो उसे सुनने चलें।\" जिह्वा कहती है, \"अरे, वहाँ एक बहुत अच्छा भोजनालय है जिसमें स्वादिष्ट व्यंजन हैं। चलो चलें।\" इस प्रकार इन्द्रियाँ हमें एक स्थान से दूसरे स्थान खींचती रहती हैं, और इसी कारण हम व्याकुल रहते हैं।\n\nindriyāṇāṁ hi caratāṁ\n\nyan mano 'nuvidhīyate\n\ntad asya harati prajñāṁ\n\nvāyur nāvam ivāmbhasi\n\n\"जिस प्रकार जल पर तैरती नौका प्रचण्ड वायु द्वारा बहा ले जाई जाती है, उसी प्रकार जिस एक इन्द्रिय पर मन केन्द्रित होता है, वह मनुष्य की बुद्धि को हर ले जा सकती है।\" (गीता 2.67)\n\nयह नितान्त आवश्यक है कि हम इन्द्रियों को वश में करना सीखें। गोस्वामी नाम उसे दिया जाता है जिसने इन्द्रियों को वश में करना सीख लिया है। गो का अर्थ है \"इन्द्रियाँ\", और स्वामी का अर्थ है \"नियन्त्रक\"; अतः जो इन्द्रियों को वश में कर सके, वही गोस्वामी माना जाना चाहिए। श्रीकृष्ण यह संकेत देते हैं कि जो मायामय भौतिक शरीर के साथ तादात्म्य करता है, वह आत्मा के रूप में अपनी यथार्थ पहचान में स्थित नहीं हो सकता। शारीरिक सुख चंचल तथा मादक है, और हम वस्तुतः उसका भोग नहीं कर सकते, क्योंकि उसका स्वभाव क्षणिक है। यथार्थ सुख आत्मा का है, शरीर का नहीं। हमें अपना जीवन इस प्रकार ढालना होगा कि शारीरिक सुख हमें विचलित न करे। यदि किसी प्रकार हम विचलित हो जाते हैं, तो शरीर से परे अपनी यथार्थ पहचान में अपनी चेतना को स्थापित करना हमारे लिए सम्भव नहीं रहता।\n\nbhogaiśvarya-prasaktānāṁ\n\ntayāpahṛta-cetasām\n\nvyavasāyātmikā buddhiḥ\n\nsamādhau na vidhīyate\n\ntraiguṇya-viṣayā vedā\n\nnistraiguṇyo bhavārjuna\n\nnirdvandvo nitya-sattva-stho\n\nniryoga-kṣema ātmavān\n\n\"जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्वर्य में अत्यधिक आसक्त हैं और जो ऐसी वस्तुओं से मोहित हैं, उनके मन में परमेश्वर की भक्ति हेतु दृढ़ निश्चय उत्पन्न नहीं होता। *वेद* भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के विषय का प्रतिपादन करते हैं। हे अर्जुन, इन गुणों से ऊपर उठो। उन सबके प्रति दिव्य बनो। समस्त द्वन्द्वों से तथा लाभ एवं सुरक्षा की समस्त चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्मा में स्थित हो जाओ।\" (गीता 2.44–45)\n\nवेद शब्द का अर्थ है \"ज्ञान का ग्रन्थ\"। ज्ञान के अनेक ग्रन्थ हैं, जो देश, जनसंख्या, परिवेश आदि के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। भारत में ज्ञान के ग्रन्थ *वेद* कहलाते हैं। पश्चिम में वे पुराना नियम तथा नया नियम कहलाते हैं। मुसलमान कुरान को स्वीकार करते हैं। ज्ञान के इन समस्त ग्रन्थों का प्रयोजन क्या है? वे हमें शुद्ध आत्मा के रूप में अपनी स्थिति समझने का प्रशिक्षण देने हेतु हैं। उनका प्रयोजन कुछ निश्चित नियमों तथा विधि-विधानों द्वारा शारीरिक क्रियाओं को नियन्त्रित करना है, और ये नियम तथा विधि-विधान नीति-संहिता के रूप में जाने जाते हैं। उदाहरणार्थ, बाइबिल में हमारे जीवन को नियमित करने हेतु दस आदेश हैं। उच्चतम पूर्णता तक पहुँचने के लिए शरीर को नियन्त्रित किया जाना चाहिए, और विधि-विधानों के बिना अपने जीवन को पूर्ण बनाना सम्भव नहीं। ये विधि-विधान देश-देश में अथवा शास्त्र-शास्त्र में भिन्न हो सकते हैं, किन्तु इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि वे समय, परिस्थिति तथा लोगों की मनोवृत्ति के अनुसार बनाए जाते हैं। किन्तु नियमित नियन्त्रण का सिद्धान्त एक ही है। इसी प्रकार, सरकार अपने नागरिकों द्वारा पालन किए जाने हेतु कुछ नियम निर्धारित करती है। कुछ नियमों के बिना सरकार अथवा सभ्यता में प्रगति करने की कोई सम्भावना नहीं। पूर्ववर्ती श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि *वेदों* के विधि-विधान भौतिक प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज तथा तम (traiguṇya-viṣayā vedāḥ)—को नियन्त्रित करने हेतु हैं। तथापि श्रीकृष्ण अर्जुन को परामर्श देते हैं कि वह भौतिक प्रकृति के द्वन्द्वों से परे, आत्मा के रूप में अपनी शुद्ध स्वरूप-स्थिति में स्थापित हो जाए।\n\nजैसा कि हम पहले बता चुके हैं, ये द्वन्द्व—जैसे शीत तथा ताप, सुख तथा दुःख—इन्द्रियों के अपने विषयों के साथ स्पर्श के कारण उत्पन्न होते हैं। दूसरे शब्दों में, वे शरीर के साथ तादात्म्य से जन्म लेते हैं। श्रीकृष्ण संकेत देते हैं कि जो भोग तथा शक्ति में अनुरक्त हैं, वे *वेदों* के उन वचनों द्वारा बहा ले जाए जाते हैं जो यज्ञ तथा नियमित कर्म द्वारा स्वर्गीय भोग का वचन देते हैं। भोग हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, क्योंकि वह आत्मा का लक्षण है; किन्तु आत्मा भौतिक रूप से भोग करने का प्रयत्न करता है, और यही त्रुटि है।\n\nप्रत्येक व्यक्ति भोग के लिए भौतिक विषयों की ओर मुड़ रहा है और यथासम्भव अधिकाधिक ज्ञान संचित कर रहा है। कोई रसायनज्ञ, भौतिकविद्, राजनेता, कलाकार अथवा जो भी बन रहा है। प्रत्येक व्यक्ति किसी वस्तु के विषय में कुछ अथवा किसी विषय की प्रत्येक बात जानता है, और सामान्यतः इसी को ज्ञान कहा जाता है। किन्तु ज्यों ही हम शरीर छोड़ते हैं, यह समस्त ज्ञान नष्ट हो जाता है। पूर्व जन्म में कोई महान् ज्ञानी रहा हो सकता है, किन्तु इस जन्म में उसे पुनः आरम्भ से विद्यालय जाकर पढ़ना-लिखना सीखना पड़ता है। पूर्व जन्म में अर्जित जो भी ज्ञान था, वह विस्मृत हो जाता है। स्थिति यह है कि वस्तुतः हम नित्य ज्ञान की खोज कर रहे हैं, किन्तु इसे इस भौतिक शरीर द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता। हम सब इन शरीरों के माध्यम से भोग की खोज कर रहे हैं, किन्तु शारीरिक भोग हमारा यथार्थ भोग नहीं है। वह कृत्रिम है। हमें यह समझना होगा कि यदि हम इस कृत्रिम भोग में लगे रहना चाहेंगे, तो हम नित्य भोग की अपनी स्थिति प्राप्त नहीं कर सकेंगे।\n\nशरीर को एक रोगग्रस्त दशा मानना चाहिए। रोगी मनुष्य भली-भाँति भोग नहीं कर सकता; उदाहरणार्थ, पीलिया-ग्रस्त मनुष्य को मिश्री कड़वी लगेगी, किन्तु स्वस्थ मनुष्य उसकी मधुरता का स्वाद ले सकता है। दोनों ही दशाओं में मिश्री वही है, किन्तु हमारी दशा के अनुसार उसका स्वाद भिन्न लगता है। जब तक हम शारीरिक जीवन की इस रोगग्रस्त धारणा से मुक्त नहीं हो जाते, तब तक हम आध्यात्मिक जीवन की मधुरता का स्वाद नहीं ले सकते। वस्तुतः वह हमें कड़वी ही लगेगी। साथ ही, भौतिक जीवन के अपने भोग को बढ़ाकर हम अपनी रोगग्रस्त दशा को और जटिल बना रहे हैं। टाइफाइड का रोगी ठोस भोजन नहीं खा सकता, और यदि कोई उसे भोग के लिए वह दे दे, और वह उसे खा ले, तो वह अपने रोग को और जटिल बना लेता है और अपने प्राण संकट में डाल लेता है। यदि हम वस्तुतः भौतिक अस्तित्व के दुःखों से मुक्ति चाहते हैं, तो हमें अपनी शारीरिक माँगों तथा भोगों को न्यूनतम करना होगा।\n\nवस्तुतः भौतिक भोग भोग है ही नहीं। यथार्थ भोग कभी समाप्त नहीं होता। *महाभारत* में एक श्लोक है—ramante yogino 'nante—इस आशय का कि योगी (yogino), जो स्वयं को आध्यात्मिक स्तर तक उठाने का प्रयत्न कर रहे हैं, वस्तुतः भोग (ramante) कर रहे हैं, किन्तु उनका भोग anante अर्थात् अनन्त है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका भोग परम भोक्ता (राम), श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में है। भगवान् श्रीकृष्ण ही यथार्थ भोक्ता हैं, और *भगवद्गीता* (5.29) इसकी पुष्टि करती है:\n\nbhoktāraṁ yajña-tapasāṁ\n\nsarva-loka-maheśvaram\n\nsuhṛdaṁ sarva-bhūtānāṁ\n\njñātvā māṁ śāntim ṛcchati\n\n\"ऋषिगण मुझे समस्त यज्ञों तथा तपस्याओं का परम भोक्ता, समस्त लोकों तथा देवताओं का परमेश्वर, तथा समस्त जीवों का हितैषी एवं शुभचिन्तक जानकर, भौतिक दुःखों की पीड़ा से शान्ति प्राप्त करते हैं।\" भोग का अर्थ है \"उपभोग\", और हमारा भोग अपनी स्थिति को भोग्य के रूप में समझने से आता है। यथार्थ भोक्ता परमेश्वर हैं, और हम उनके द्वारा भोग्य हैं।\n\nइस सम्बन्ध का एक उदाहरण भौतिक जगत् में पति तथा पत्नी के बीच पाया जा सकता है: पति भोक्ता (पुरुष) है, और पत्नी भोग्य (प्रकृति) है। pri शब्द का अर्थ है \"स्त्री\"। पुरुष अथवा आत्मा कर्ता है, और प्रकृति अथवा प्रकृति-तत्त्व कर्म है। तथापि भोग में पति तथा पत्नी दोनों ही भाग लेते हैं। जब यथार्थ भोग होता है, तब ऐसा कोई भेद नहीं रहता कि पति अधिक भोग कर रहा है अथवा पत्नी कम भोग कर रही है। यद्यपि पुरुष प्रधान है और स्त्री प्रधान-अधीन है, तथापि जब भोग की बात आती है तब कोई विभाजन नहीं रहता। विशाल स्तर पर, कोई भी जीव भोक्ता नहीं है।\n\nईश्वर अनेक रूपों में विस्तृत हुए, और हम उन्हीं विस्तारों से बने हैं। ईश्वर अद्वितीय हैं, किन्तु उन्होंने भोग करने के लिए अनेक होने की इच्छा की। हमें अनुभव है कि कमरे में अकेले बैठकर स्वयं से बातें करने में अल्प अथवा कोई भोग नहीं होता। तथापि यदि वहाँ पाँच व्यक्ति उपस्थित हों, तो हमारा भोग बढ़ जाता है, और यदि हम अनेकानेक लोगों के समक्ष श्रीकृष्ण के विषय में चर्चा कर सकें, तो भोग और भी अधिक हो जाता है। भोग का अर्थ है विविधता। ईश्वर अपने भोग के लिए अनेक हो गए, और इस प्रकार हमारी स्थिति भोग्य की है। यही हमारी स्वरूप-स्थिति है तथा हमारी सृष्टि का प्रयोजन है। भोक्ता तथा भोग्य दोनों में चेतना है, किन्तु भोग्य की चेतना भोक्ता की चेतना के अधीन है। यद्यपि श्रीकृष्ण भोक्ता हैं और हम भोग्य, तथापि भोग में सब समान रूप से भाग ले सकते हैं। हमारा भोग तब पूर्ण हो सकता है जब हम ईश्वर के भोग में भाग लें। शारीरिक स्तर पर पृथक् रूप से भोग करने की हमारे लिए कोई सम्भावना नहीं। स्थूल शारीरिक स्तर पर भौतिक भोग को समूची *भगवद्गीता* में हतोत्साहित किया गया है।\n\nmātrā-sparśās tu kaunteya\n\nśītoṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ\n\nāgamāpāyino 'nityās\n\ntāṁs titikṣasva bhārata\n\n\"हे कुन्तीपुत्र, सुख-दुःख की क्षणिक प्रतीति तथा यथासमय उनका अन्तर्धान होना, शीत तथा ग्रीष्म ऋतुओं के आने-जाने के समान है। हे भरतवंशी, वे इन्द्रिय-संवेदन से उत्पन्न होते हैं, और मनुष्य को विचलित हुए बिना उन्हें सहन करना सीखना चाहिए।\" (गीता 2.14)\n\nस्थूल भौतिक शरीर भौतिक प्रकृति के गुणों की पारस्परिक क्रिया का परिणाम है, और वह विनाश के लिए नियत है।\n\nantavanta ime dehā\n\nnityasyoktāḥ śarīriṇaḥ\n\nanāśino 'prameyasya\n\ntasmād yudhyasva bhārata\n\n\"अविनाशी, अप्रमेय तथा नित्य जीव का केवल भौतिक शरीर ही विनाश के अधीन है; अतः, हे भरतवंशी, युद्ध करो।\" (गीता 2.18) अतः श्रीकृष्ण हमें प्रोत्साहित करते हैं कि हम अस्तित्व की देहात्म-बुद्धि से परे जाएँ और अपने यथार्थ आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त करें।\n\nguṇān etān atītya trīn\n\ndehī deha-samudbhavān\n\njanma-mṛtyu jarā-duḥkhair\n\nvimukto 'mṛtam aśnute\n\n\"जब देहधारी प्राणी इन तीन गुणों [सत्त्व, रज तथा तम] को लाँघने में समर्थ हो जाता है, तब वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा उनके दुःखों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में अमृत का भोग कर सकता है।\" (गीता 14.20)\n\nतीन गुणों से ऊपर, शुद्ध ब्रह्मभूत आध्यात्मिक स्तर पर स्वयं को स्थापित करने के लिए हमें कृष्णभावनामृत की विधि अपनानी होगी। भगवान् चैतन्य महाप्रभु की देन, श्रीकृष्ण के नामों का कीर्तन—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—इस प्रक्रिया को सुगम बनाती है। यह विधि भक्तियोग अथवा मन्त्रयोग कहलाती है, और इसका प्रयोग सर्वोच्च दिव्यवादियों द्वारा किया जाता है। दिव्यवादी जन्म-मृत्यु से परे, भौतिक शरीर से परे, अपनी पहचान का साक्षात्कार किस प्रकार करते हैं, और स्वयं को भौतिक ब्रह्माण्ड से आध्यात्मिक ब्रह्माण्डों में किस प्रकार स्थानान्तरित करते हैं—यही आगे के अध्यायों के विषय हैं।"}
{"ref": "bbd/2", "book": "bbd", "lang": "hi", "url": "/hi/library/bbd/2/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "मृत्यु के समय उन्नति", "purport": "विभिन्न प्रकार के दिव्यवादी होते हैं जो योगी कहलाते हैं—हठयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी तथा भक्तियोगी—और ये सभी आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित होने के योग्य हैं। योग शब्द का अर्थ है \"जुड़ना\", और योग-पद्धतियाँ हमें दिव्य जगत् से जोड़ने में समर्थ बनाने हेतु हैं। जैसा कि पूर्व अध्याय में उल्लेख किया गया, मूलतः हम सब परमेश्वर से जुड़े हुए हैं, किन्तु अब हम भौतिक कल्मष से प्रभावित हो चुके हैं। प्रक्रिया यह है कि हमें आध्यात्मिक जगत् में लौटना है, और जुड़ने की उस प्रक्रिया को योग कहते हैं। योग शब्द का एक अन्य अर्थ है \"जोड़\" (plus)। इस समय हम ईश्वर से रहित अथवा परम से रहित हैं। जब हम अपने जीवन में श्रीकृष्ण—अथवा ईश्वर—को जोड़ देते हैं, तब यह मनुष्य-जीवन पूर्ण हो जाता है।\n\nमृत्यु के समय हमें पूर्णता की उस प्रक्रिया को सम्पन्न करना होता है। अपने जीवनकाल में हमें उस पूर्णता तक पहुँचने की विधि का अभ्यास करना होता है, जिससे मृत्यु के समय, जब हमें यह भौतिक शरीर त्यागना पड़ता है, तब उस पूर्णता का साक्षात्कार हो सके।\n\nprayāṇa-kāle manasācalena\n\nbhaktyā yukto yoga-balena caiva\n\nbhruvor madhye prāṇam āveśya samyak\n\nsa taṁ paraṁ puruṣam upaiti divyam\n\n\"जो मनुष्य मृत्यु के समय अपने प्राण को भौंहों के मध्य स्थिर करता है और पूर्ण भक्ति के साथ परमेश्वर के स्मरण में संलग्न होता है, वह निश्चय ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्राप्त होगा।\" (गीता 8.10)\n\nजिस प्रकार एक विद्यार्थी चार या पाँच वर्ष तक किसी विषय का अध्ययन करता है और फिर अपनी परीक्षा देकर उपाधि प्राप्त करता है, उसी प्रकार जीवन रूपी विषय में, यदि हम अपने जीवनकाल में मृत्यु के समय की परीक्षा हेतु अभ्यास करें, और यदि हम वह परीक्षा उत्तीर्ण कर लें, तो हम आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित हो जाते हैं। मृत्यु के समय हमारे समूचे जीवन की परीक्षा होती है।\n\nyaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ\n\ntyajaty ante kalevaram\n\ntaṁ tam evaiti kaunteya\n\nsadā tad-bhāva-bhāvitaḥ\n\n\"मनुष्य शरीर त्यागते समय जिस भी भाव का स्मरण करता है, वह उसी भाव को निश्चय ही प्राप्त होता है।\" (गीता 8.6)\n\nएक बंगाली कहावत है कि मनुष्य पूर्णता हेतु जो कुछ करता है, उसकी परीक्षा उसकी मृत्यु के समय होगी। *भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि शरीर त्यागते समय मनुष्य को क्या करना चाहिए। ध्यानयोगी (ध्यान करने वाले) के लिए श्रीकृष्ण निम्नलिखित श्लोक कहते हैं:\n\nyad akṣaraṁ veda-vido vadanti\n\nviśanti yad yatayo vīta-rāgāḥ\n\nyad icchanto brahmacaryaṁ caranti\n\ntat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣye\n\nsarva-dvārāṇi saṁyamya\n\nmano hṛdi nirudhya ca\n\nmūrdhny ādhāyātmanaḥ prāṇam\n\nāsthito yoga-dhāraṇām\n\n\"*वेदों* में पारंगत व्यक्ति, जो ओंकार का उच्चारण करते हैं और जो संन्यास-आश्रम के महान् ऋषि हैं, वे ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। ऐसी पूर्णता की इच्छा करते हुए मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन करता है। अब मैं तुम्हें वह प्रक्रिया समझाऊँगा जिसके द्वारा मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है। योगमय स्थिति समस्त इन्द्रिय-व्यापारों से विरक्ति की स्थिति है। इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बन्द करके तथा मन को हृदय में और प्राण को मस्तक के शिखर पर स्थिर करके, मनुष्य योग में स्थापित होता है।\" (गीता 8.11–12)\n\nयोग-पद्धति में इस प्रक्रिया को प्रत्याहार कहा जाता है, जिसका अर्थ है \"ठीक इसके विपरीत\"। यद्यपि जीवनकाल में नेत्र सांसारिक सौन्दर्य देखने में संलग्न रहते हैं, मृत्यु के समय मनुष्य को इन्द्रियों को उनके विषयों से खींचकर भीतर के सौन्दर्य को देखना होता है। इसी प्रकार, कान संसार में अनेकानेक ध्वनियाँ सुनने के अभ्यस्त रहते हैं, किन्तु मृत्यु के क्षण में मनुष्य को भीतर से दिव्य ओंकार सुनना होता है।\n\noṁ ity ekākṣaraṁ brahma\n\nvyāharan mām anusmaran\n\nyaḥ prayāti tyajan dehaṁ\n\nsa yāti paramāṁ gatim\n\n\"इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परम संयोग, पवित्र अक्षर ॐ का उच्चारण करते हुए, यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का स्मरण करता हुआ अपना शरीर त्यागता है, तो वह निश्चय ही आध्यात्मिक लोकों को प्राप्त करता है।\" (गीता 8.13) इस प्रकार समस्त इन्द्रियों को उनकी बाह्य क्रियाओं से रोककर विष्णु-मूर्ति के स्वरूप, अर्थात् भगवान् के स्वरूप पर एकाग्र करना होता है। मन अत्यन्त चंचल है, किन्तु इसे हृदय में स्थित भगवान् पर स्थिर करना होता है। जब मन हृदय के भीतर स्थिर हो जाता है और प्राणवायु को मस्तक के शिखर पर स्थानान्तरित कर दिया जाता है, तब मनुष्य योग की सिद्धि प्राप्त कर सकता है।\n\nइस बिन्दु पर योगी निश्चय करता है कि उसे कहाँ जाना है। भौतिक ब्रह्माण्ड में असंख्य लोक हैं, और इस ब्रह्माण्ड से परे आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड है। योगियों को इन स्थानों की जानकारी वैदिक साहित्य से प्राप्त होती है। जिस प्रकार अमेरिका जाने वाला व्यक्ति पुस्तकें पढ़कर उस देश के विषय में कुछ अनुमान लगा सकता है, उसी प्रकार मनुष्य वैदिक साहित्य पढ़कर आध्यात्मिक लोकों का ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। योगी इन समस्त वर्णनों को जानता है, और वह बिना अन्तरिक्षयानों की सहायता के अपने को किसी भी इच्छित लोक में स्थानान्तरित कर सकता है। यान्त्रिक साधनों द्वारा अन्तरिक्ष-यात्रा अन्य लोकों में उन्नति हेतु स्वीकृत प्रक्रिया नहीं है। सम्भवतः बहुत अधिक समय, परिश्रम और धन के साथ कुछ मनुष्य भौतिक साधनों—अन्तरिक्षयान, अन्तरिक्ष-वस्त्र आदि—द्वारा अन्य लोकों तक पहुँच सकें, किन्तु यह अत्यन्त बोझिल और अव्यावहारिक विधि है। किसी भी दशा में, यान्त्रिक साधनों द्वारा भौतिक ब्रह्माण्ड से परे जाना सम्भव नहीं है।\n\nउच्चतर लोकों में स्थानान्तरण हेतु सामान्यतः स्वीकृत विधि ध्यानमयी योग-पद्धति अथवा ज्ञान-पद्धति का अभ्यास है। किन्तु भक्तियोग-पद्धति का अभ्यास किसी भौतिक लोक में स्थानान्तरण हेतु नहीं किया जाता, क्योंकि जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के सेवक हैं, उनकी इस भौतिक जगत् के किसी भी लोक में रुचि नहीं होती; वे जानते हैं कि भौतिक आकाश में मनुष्य जिस किसी भी लोक में प्रवेश करे, वहाँ जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु—ये चारों सिद्धान्त विद्यमान हैं। उच्चतर लोकों में आयु की अवधि इस पृथ्वी की अपेक्षा दीर्घतर हो सकती है, फिर भी वहाँ मृत्यु अवश्य है। \"भौतिक ब्रह्माण्ड\" से हमारा तात्पर्य उन लोकों से है जहाँ जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु निवास करते हैं, तथा \"आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड\" से हमारा तात्पर्य उन लोकों से है जहाँ जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु नहीं हैं। जो बुद्धिमान हैं, वे भौतिक ब्रह्माण्ड के किसी भी लोक में अपने को उन्नत करने का प्रयत्न नहीं करते।\n\nयदि कोई यान्त्रिक साधनों द्वारा उच्चतर लोकों में प्रवेश करने का प्रयत्न करे, तो तत्काल मृत्यु निश्चित है, क्योंकि शरीर वायुमण्डल के आमूल परिवर्तनों को सहन नहीं कर सकता। किन्तु यदि कोई योग-पद्धति के साधन से उच्चतर लोकों में जाने का प्रयास करे, तो वह प्रवेश हेतु उपयुक्त शरीर प्राप्त कर लेगा। हम इसका प्रमाण इसी पृथ्वी पर देख सकते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे लिए समुद्र में, जलमय वातावरण में रहना सम्भव नहीं है, और न ही जलचरों के लिए पृथ्वी पर रहना सम्भव है। जैसे हम समझते हैं कि इस लोक में भी किसी विशेष स्थान में रहने हेतु एक विशेष प्रकार का शरीर आवश्यक है, उसी प्रकार अन्य लोकों हेतु एक विशेष प्रकार का शरीर अपेक्षित होता है। उच्चतर लोकों में शरीर पृथ्वी की अपेक्षा कहीं अधिक दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं, क्योंकि पृथ्वी के छह मास उच्चतर लोकों के एक दिन के तुल्य हैं। अतः वेद वर्णन करते हैं कि जो उच्चतर लोकों में निवास करते हैं, वे पृथ्वी के दस हज़ार वर्षों तक जीवित रहते हैं। तथापि इतनी दीर्घ आयु के बावजूद, मृत्यु सबकी प्रतीक्षा करती है। चाहे कोई बीस हज़ार अथवा पचास हज़ार अथवा लाखों वर्षों तक भी जीवित रहे, भौतिक जगत् में वर्ष सब गिने हुए हैं, और वहाँ मृत्यु विद्यमान है। हम मृत्यु के इस अधीनत्व से किस प्रकार बच सकते हैं? यही भगवद्गीता की शिक्षा है।\n\nna jāyate mriyate vā kadācin\n\nnāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ\n\najo nityaḥ śāśvato 'yaṁ purāṇo\n\nna hanyate hanyamāne śarīre\n\n\"आत्मा के लिए न कभी जन्म है और न मृत्यु। न तो वह एक बार होकर पुनः अस्तित्व खोता है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत, अमर और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारी जाती।\" (गीता 2.20)\n\nहम आत्मा हैं, और इस रूप में हम नित्य हैं। तब फिर हमें अपने को जन्म-मृत्यु के अधीन क्यों करना चाहिए? जो यह प्रश्न पूछता है, उसे बुद्धिमान माना जाना चाहिए। जो कृष्णभावनाभावित हैं, वे अत्यन्त बुद्धिमान हैं, क्योंकि उनकी ऐसे किसी लोक में प्रवेश पाने में रुचि नहीं होती जहाँ मृत्यु है। वे भगवान् जैसा शरीर प्राप्त करने हेतु दीर्घ आयु को अस्वीकार कर देंगे। ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः [ब्रह्मसंहिता 5.1]। सत् का अर्थ है \"नित्य\", चित् का अर्थ है \"ज्ञान से परिपूर्ण\", तथा आनन्द का अर्थ है \"आनन्द से परिपूर्ण\"। श्रीकृष्ण समस्त आनन्द के आगार हैं। यदि हम अपने को इस शरीर से आध्यात्मिक जगत् में—चाहे कृष्णलोक (श्रीकृष्ण के लोक) में अथवा किसी अन्य आध्यात्मिक लोक में—स्थानान्तरित कर लें, तो हमें उसी प्रकार का सच्चिदानन्द शरीर प्राप्त होगा। अतः जो कृष्णभावनामृत में हैं, उनका लक्ष्य उन लोगों से भिन्न है जो इस भौतिक जगत् के भीतर उच्चतर लोकों में अपनी उन्नति करने का प्रयत्न कर रहे हैं।\n\nव्यष्टि का स्व, अर्थात् आत्मा, एक सूक्ष्म आध्यात्मिक स्फुलिंग है। योग की सिद्धि इस आध्यात्मिक स्फुलिंग को मस्तक के शिखर पर स्थानान्तरित करने में निहित है। इसे प्राप्त कर लेने पर योगी अपने को अपनी इच्छानुसार भौतिक जगत् के किसी भी लोक में स्थानान्तरित कर सकता है। यदि योगी यह जानने को उत्सुक हो कि चन्द्रमा कैसा है, तो वह अपने को वहाँ स्थानान्तरित कर सकता है, अथवा यदि उसकी उच्चतर लोकों में रुचि हो, तो वह अपने को वहाँ स्थानान्तरित कर सकता है—ठीक जैसे यात्री पृथ्वी पर न्यूयॉर्क, कनाडा अथवा अन्य नगरों को जाते हैं। पृथ्वी पर मनुष्य जहाँ भी जाता है, वहाँ उसे वही वीज़ा और सीमा-शुल्क की व्यवस्थाएँ कार्यरत मिलती हैं, और इसी प्रकार समस्त भौतिक लोकों पर मनुष्य जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु के सिद्धान्तों को कार्यरत देख सकता है।\n\nॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म: मृत्यु के समय योगी ॐ, ओंकार, अर्थात् दिव्य ध्वनि-कम्पन के संक्षिप्त रूप का उच्चारण कर सकता है। यदि योगी इस ध्वनि का कम्पन कर सके और साथ ही श्रीकृष्ण अथवा विष्णु का स्मरण कर सके (माम् अनुस्मरन्), तो वह सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करता है। मन को विष्णु पर एकाग्र करना ही योग की प्रक्रिया है। निर्विशेषवादी परमेश्वर के किसी रूप की कल्पना करते हैं, किन्तु साकारवादी इसकी कल्पना नहीं करते; वे वस्तुतः साक्षात् देखते हैं। चाहे कोई उनकी कल्पना करे अथवा वस्तुतः साक्षात् देखे, मनुष्य को अपने मन को श्रीकृष्ण के साकार रूप पर एकाग्र करना होता है।\n\nananya-cetāḥ satataṁ\n\nyo māṁ smarati nityaśaḥ\n\ntasyāhaṁ sulabhaḥ pārtha\n\nnitya-yuktasya yoginaḥ\n\n\"जो अनन्यभाव से मेरा स्मरण करता है, हे पृथापुत्र, उसके लिए मैं सुलभ हूँ, क्योंकि वह निरन्तर भक्ति में संलग्न रहता है।\" (गीता 8.14)\n\nजो क्षणिक जीवन, क्षणिक सुख और क्षणिक सुविधाओं से सन्तुष्ट हैं, उन्हें बुद्धिमान नहीं माना जाना चाहिए—कम-से-कम भगवद्गीता के अनुसार तो नहीं। गीता के अनुसार, जिसका मस्तिष्क-तत्त्व अत्यन्त अल्प है, उसकी क्षणिक वस्तुओं में रुचि होती है। हम नित्य हैं, तब फिर हमें क्षणिक वस्तुओं में रुचि क्यों होनी चाहिए? कोई भी अनित्य स्थिति नहीं चाहता। यदि हम किसी अपार्टमेंट में रह रहे हों और मकान-स्वामी हमें उसे खाली करने को कहे, तो हमें दुःख होता है, किन्तु यदि हम किसी श्रेष्ठतर अपार्टमेंट में जाएँ तो हमें दुःख नहीं होता। यह हमारा स्वभाव है, क्योंकि हम स्थायी हैं, कि हम स्थायी निवास चाहते हैं। हम मरना नहीं चाहते, क्योंकि वास्तव में हम स्थायी हैं। न ही हम वृद्ध होना अथवा रोगग्रस्त होना चाहते हैं, क्योंकि ये सब बाह्य अथवा अस्थायी अवस्थाएँ हैं। यद्यपि हम ज्वर से पीड़ित होने हेतु नहीं बने हैं, तथापि कभी-कभी ज्वर आ जाता है, और हमें पुनः स्वस्थ होने हेतु सावधानियाँ तथा उपचार करने पड़ते हैं। चतुर्विध दुःख एक ज्वर के समान हैं, और वे सब भौतिक शरीर के कारण हैं। यदि किसी प्रकार हम भौतिक शरीर से बाहर निकल सकें, तो हम उन दुःखों से बच सकते हैं जो इसके अभिन्न अंग हैं।\n\nनिर्विशेषवादियों के लिए इस अस्थायी शरीर से बाहर निकलने हेतु, श्रीकृष्ण यहाँ यह सलाह देते हैं कि वे ॐ अक्षर का कम्पन करें। इस प्रकार उन्हें आध्यात्मिक जगत् में देहान्तरण का आश्वासन मिल सकता है। तथापि, यद्यपि वे आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश कर सकते हैं, फिर भी वे वहाँ के किसी भी लोक में प्रवेश नहीं कर सकते। वे बाहर, ब्रह्मज्योति में ही रहते हैं। ब्रह्मज्योति की तुलना सूर्य-प्रकाश से की जा सकती है, और आध्यात्मिक लोकों की तुलना स्वयं सूर्य से की जा सकती है। आध्यात्मिक आकाश में निर्विशेषवादी परमेश्वर के तेज, ब्रह्मज्योति में रहते हैं। निर्विशेषवादी आध्यात्मिक स्फुलिंगों के रूप में ब्रह्मज्योति में स्थित किए जाते हैं, और इस प्रकार ब्रह्मज्योति आध्यात्मिक स्फुलिंगों से भर जाती है। आध्यात्मिक अस्तित्व में विलीन होने का यही तात्पर्य है। यह नहीं समझना चाहिए कि मनुष्य ब्रह्मज्योति में इस अर्थ में विलीन हो जाता है कि वह उससे एक हो जाता है; आध्यात्मिक स्फुलिंग का व्यष्टित्व बना रहता है, किन्तु क्योंकि निर्विशेषवादी कोई साकार रूप नहीं लेना चाहता, अतः वह उस तेज में एक आध्यात्मिक स्फुलिंग के रूप में पाया जाता है। जैसे सूर्य-प्रकाश अनेकानेक अणुकणों से बना है, वैसे ही ब्रह्मज्योति अनेकानेक आध्यात्मिक स्फुलिंगों से बनी है।\n\nकिन्तु जीव के रूप में हम आनन्द चाहते हैं। केवल अस्तित्व ही पर्याप्त नहीं है। हम अस्तित्व (सत्) के साथ-साथ आनन्द (आनन्द) भी चाहते हैं। अपनी समग्रता में जीव तीन गुणों—नित्यता, ज्ञान और आनन्द—से बना है। जो निर्विशेष रूप से ब्रह्मज्योति में प्रवेश करते हैं, वे कुछ समय तक इस पूर्ण ज्ञान सहित वहाँ रह सकते हैं कि अब वे ब्रह्म के साथ समरूप रूप से विलीन हो गए हैं, किन्तु उन्हें वह नित्य आनन्द, अर्थात् बलिहारी, प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि वह अंश अभावग्रस्त है। मनुष्य किसी कक्ष में कुछ समय तक अकेला रह सकता है और कोई पुस्तक पढ़कर अथवा किसी चिन्तन में संलग्न होकर स्वयं को प्रसन्न रख सकता है, किन्तु उस कक्ष में वर्षों-वर्षों तक एक साथ रहना सम्भव नहीं है, और सम्पूर्ण नित्यता तक तो निश्चय ही नहीं। अतः जो परमेश्वर के अस्तित्व में निर्विशेष रूप से विलीन हो जाता है, उसके पुनः भौतिक जगत् में गिर पड़ने की पूरी सम्भावना रहती है, ताकि वह कुछ संगति प्राप्त कर सके। यही श्रीमद्भागवत का निर्णय है। अन्तरिक्ष-यात्री हज़ारों-हज़ारों मील की यात्रा कर सकते हैं, किन्तु यदि उन्हें किसी लोक पर विश्राम न मिले, तो उन्हें पुनः पृथ्वी पर लौटना पड़ता है। किसी भी दशा में, विश्राम अपेक्षित है। निर्विशेष रूप में विश्राम अनिश्चित है। अतः श्रीमद्भागवत कहता है कि इतने प्रयास के पश्चात् भी, यदि निर्विशेषवादी आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करता है और निर्विशेष रूप प्राप्त करता है, तो वह पुनः भौतिक जगत् में लौट आता है, क्योंकि उसने प्रेम और भक्तिपूर्वक परमेश्वर की सेवा करने की उपेक्षा की। जब तक हम यहाँ पृथ्वी पर हैं, हमें परमेश्वर श्रीकृष्ण से प्रेम करने तथा उनकी सेवा करने का अभ्यास करना सीखना चाहिए। यदि हम यह सीख लें, तो हम उन आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश कर सकते हैं। आध्यात्मिक जगत् में निर्विशेषवादी की स्थिति अनित्य है, क्योंकि एकाकीपन के कारण वह कुछ संगति प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा। चूँकि वह परमेश्वर के साथ साकार रूप से संगति नहीं करता, अतः उसे पुनः जगत् में लौटकर वहाँ बद्ध जीवों के साथ संगति करनी पड़ती है।\n\nअतः यह परम महत्त्वपूर्ण है कि हम अपनी स्वरूपगत स्थिति की प्रकृति को जानें: हम नित्यता, पूर्ण ज्ञान और आनन्द भी चाहते हैं। जब हमें निर्विशेष ब्रह्मज्योति में दीर्घकाल तक अकेला छोड़ दिया जाता है, तब हमें आनन्द नहीं मिल पाता, और अतः हम भौतिक जगत् द्वारा दिए गए आनन्द को स्वीकार कर लेते हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत में वास्तविक आनन्द भोगा जाता है। भौतिक जगत् में सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि सर्वोच्च सुख यौन-सुख है। यह आध्यात्मिक जगत् के यौन-सुख का, अर्थात् श्रीकृष्ण के साथ संगति के आनन्द का, विकृत प्रतिबिम्ब है। किन्तु हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि वहाँ का आनन्द भौतिक जगत् के यौन-सुख जैसा है। नहीं, वह भिन्न है। किन्तु जब तक आध्यात्मिक जगत् में यौन-जीवन न हो, तब तक वह यहाँ प्रतिबिम्बित नहीं हो सकता। यहाँ यह केवल एक विकृत प्रतिबिम्ब है, किन्तु वास्तविक जीवन वहाँ श्रीकृष्ण में है, जो समस्त आनन्द से परिपूर्ण हैं। अतः सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया यह है कि हम अभी अपने को इस प्रकार प्रशिक्षित करें कि मृत्यु के समय हम अपने को आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड में, कृष्णलोक में स्थानान्तरित कर सकें, और वहाँ श्रीकृष्ण के साथ संगति कर सकें। ब्रह्मसंहिता (5.29) में श्रीकृष्ण तथा उनके धाम का वर्णन इस प्रकार किया गया है:\n\ncintāmaṇi-prakara-sadmasu kalpa-vṛkṣa-\n\nlakṣāvṛteṣu surabhīr abhipālayantam\n\nlakṣmī-sahasra-śata-sambhrama-sevyamānaṁ\n\ngovindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi\n\n\"मैं उन गोविन्द की, उन आदि-पुरुष की, उन प्रथम जनक की आराधना करता हूँ, जो गौओं का पालन करते हुए समस्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं, जो आध्यात्मिक रत्नों से निर्मित धामों में निवास करते हैं, जो करोड़ों इच्छापूरक वृक्षों से घिरे हैं, और जिनकी सहस्रों-शत लक्ष्मियों, अर्थात् गोपियों, द्वारा महान् आदर और स्नेह सहित सदा सेवा की जाती है।\" यह कृष्णलोक का वर्णन है। वहाँ के भवन \"स्पर्शमणि\" नामक पदार्थ से बने हैं। स्पर्शमणि जिस किसी का स्पर्श करती है, वह तत्काल स्वर्ण में बदल जाता है। वहाँ के वृक्ष इच्छापूरक वृक्ष, अर्थात् \"कल्प-वृक्ष\" हैं, क्योंकि मनुष्य उनसे जो कुछ चाहे प्राप्त कर सकता है। इस जगत् में हमें आम के वृक्षों से आम और सेब के वृक्षों से सेब प्राप्त होते हैं, किन्तु वहाँ किसी भी वृक्ष से मनुष्य जो कुछ चाहे प्राप्त कर सकता है। इसी प्रकार, वहाँ की गौएँ सुरभि कहलाती हैं, और वे दुग्ध की अनन्त आपूर्ति देती हैं। ये वैदिक शास्त्रों में पाए जाने वाले आध्यात्मिक लोकों के वर्णन हैं।\n\nइस भौतिक जगत् में हम जन्म, मृत्यु और सब प्रकार के दुःखों के अभ्यस्त हो गए हैं। भौतिक वैज्ञानिकों ने इन्द्रिय-भोग तथा विनाश हेतु अनेक सुविधाओं की खोज की है, किन्तु उन्होंने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु की समस्याओं का कोई समाधान नहीं खोजा है। वे कोई ऐसा यन्त्र नहीं बना सकते जो मृत्यु, वृद्धावस्था अथवा रोग को रोक सके। हम कुछ ऐसा बना सकते हैं जो मृत्यु को त्वरित कर दे, किन्तु ऐसा कुछ नहीं जो मृत्यु को रोक दे। किन्तु जो बुद्धिमान हैं, वे भौतिक जीवन के चतुर्विध दुःखों से चिन्तित नहीं रहते, अपितु आध्यात्मिक लोकों में उन्नति से चिन्तित रहते हैं। जो निरन्तर समाधि में रहता है (नित्य-युक्तस्य योगिनः), वह अपना ध्यान किसी अन्य वस्तु की ओर नहीं भटकाता। वह सदा समाधि में स्थित रहता है। उसका मन अविचलित रूप से सदा श्रीकृष्ण के विचार से परिपूर्ण रहता है (अनन्य-चेताः सततम्)। सततम् किसी भी स्थान और किसी भी समय को इंगित करता है।\n\nभारत में मैं वृन्दावन में रहता था, और अब मैं अमेरिका में हूँ, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मैं वृन्दावन से बाहर हूँ, क्योंकि यदि मैं सदा श्रीकृष्ण का विचार करूँ, तो मैं भौतिक उपाधि की परवाह किए बिना सदा वृन्दावन में ही हूँ। कृष्णभावनामृत का अर्थ है कि मनुष्य सदा उस आध्यात्मिक लोक, गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण के साथ रहता है, और मात्र इस भौतिक शरीर को त्यागने की प्रतीक्षा कर रहा है। स्मरति नित्यशः का अर्थ है \"निरन्तर स्मरण करना\", और जो निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, उसके लिए भगवान् तस्याहं सुलभः—सरलता से क्रय किए जाने योग्य—हो जाते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि वे इस भक्तियोग-प्रक्रिया से सरलता से क्रय कर लिए जाते हैं। तब फिर हम किसी अन्य प्रक्रिया को क्यों अपनाएँ? हम हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का चौबीस घंटे प्रतिदिन जप कर सकते हैं। इसके कोई नियम और विधान नहीं हैं। मनुष्य सड़क पर, भूमिगत रेल में, अथवा अपने घर अथवा कार्यालय में जप कर सकता है। इसका कोई कर नहीं है और न ही कोई व्यय। तो फिर इसे क्यों न अपनाएँ?"}
{"ref": "bbd/3", "book": "bbd", "lang": "hi", "url": "/hi/library/bbd/3/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "भौतिक लोकों से मुक्ति", "purport": "ज्ञानी और योगी सामान्यतः निर्विशेषवादी होते हैं, और यद्यपि वे निर्विशेष तेज, अर्थात् आध्यात्मिक आकाश में विलीन होकर मुक्ति का क्षणिक रूप प्राप्त कर लेते हैं, तथापि श्रीमद्भागवत के अनुसार उनके ज्ञान को शुद्ध नहीं माना जाता। तपस्या, तप और ध्यान द्वारा वे परम परब्रह्म के स्तर तक उठ सकते हैं, किन्तु जैसा समझाया जा चुका है, वे पुनः भौतिक जगत् में गिर पड़ते हैं, क्योंकि उन्होंने श्रीकृष्ण के साकार स्वरूपों को गम्भीरता से नहीं लिया। जब तक मनुष्य श्रीकृष्ण के चरणकमलों की आराधना नहीं करता, तब तक उसे पुनः भौतिक स्तर पर उतरना पड़ता है। आदर्श मनोवृत्ति यह होनी चाहिए, \"मैं आपका नित्य सेवक हूँ। कृपया किसी प्रकार मुझे अपनी सेवा में संलग्न होने दीजिए।\" श्रीकृष्ण अजितः—अजेय—कहलाते हैं, क्योंकि कोई भी भगवान् को जीत नहीं सकता, किन्तु श्रीमद्भागवत के अनुसार, इस मनोवृत्ति वाला व्यक्ति परमेश्वर को सरलता से जीत लेता है। श्रीमद्भागवत यह भी अनुशंसा करता है कि हम परमेश्वर को नापने की इस व्यर्थ प्रक्रिया को त्याग दें। हम तो आकाश की सीमाओं को भी नहीं नाप सकते, फिर परमेश्वर की तो बात ही क्या। अपने अल्प ज्ञान से श्रीकृष्ण की लम्बाई और चौड़ाई नापना सम्भव नहीं है, और जो इस निष्कर्ष पर पहुँचता है, उसे वैदिक साहित्य द्वारा बुद्धिमान माना जाता है। मनुष्य को विनम्रतापूर्वक यह समझ लेना चाहिए कि वह ब्रह्माण्ड का एक अत्यन्त नगण्य अंश है। सीमित ज्ञान अथवा मानसिक कल्पना से परमेश्वर को समझने के प्रयास को त्यागकर, हमें विनम्र होकर भगवद्गीता जैसे प्रामाणिक स्रोतों से अथवा किसी आत्मानुभूत आत्मा के मुख से परमेश्वर के विषय में सुनना चाहिए।\n\nभगवद्गीता में अर्जुन साक्षात् श्रीकृष्ण के मुख से भगवान् के विषय में सुन रहे हैं। इस प्रकार अर्जुन ने विनम्र श्रवण द्वारा परमेश्वर को समझने का मानदण्ड स्थापित किया। हमारी स्थिति यह है कि हम अर्जुन के अथवा उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि, अर्थात् आध्यात्मिक गुरु के मुख से भगवद्गीता सुनें। सुनने के पश्चात्, इस अर्जित ज्ञान का दैनिक जीवन में अभ्यास करना आवश्यक है। \"हे प्रिय भगवन्! आप अजेय हैं,\" भक्त प्रार्थना करता है, \"किन्तु इस प्रक्रिया से, अर्थात् सुनने से, आप जीत लिए जाते हैं।\" भगवान् अजेय हैं, किन्तु वे उस भक्त द्वारा जीत लिए जाते हैं जो मानसिक कल्पना को त्याग देता है और प्रामाणिक स्रोतों को सुनता है।\n\nब्रह्मसंहिता के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के दो उपाय हैं—आरोही प्रक्रिया और अवरोही प्रक्रिया। आरोही प्रक्रिया द्वारा मनुष्य स्वयं अर्जित ज्ञान से उन्नत होता है। इस प्रकार मनुष्य सोचता है, \"मुझे किसी प्रामाणिक व्यक्ति अथवा पुस्तकों की परवाह नहीं। मैं ध्यान, दर्शन आदि द्वारा स्वयं ज्ञान प्राप्त करूँगा। इस प्रकार मैं भगवान् को समझ लूँगा।\" दूसरी प्रक्रिया, अर्थात् अवरोही प्रक्रिया, में उच्चतर प्रामाणिक व्यक्तियों से ज्ञान प्राप्त करना सम्मिलित है। ब्रह्मसंहिता कहती है कि यदि कोई आरोही प्रक्रिया को अपनाए और मन तथा वायु के वेग से लाखों वर्षों तक यात्रा करे, तब भी वह अन्ततः बिना जाने ही रह जाएगा। उसके लिए वह विषय अधराम्य और अचिन्त्य बना रहेगा। किन्तु वह विषय भगवद्गीता में दिया गया है: अनन्य-चेताः। श्रीकृष्ण कहते हैं कि विनम्रतापूर्वक भक्ति के मार्ग से विचलित हुए बिना उनका ध्यान करो। जो इस प्रकार उनकी आराधना करता है, उसके लिए—तस्याहं सुलभः: \"मैं सरलता से प्राप्य हो जाता हूँ।\" यही प्रक्रिया है: यदि कोई श्रीकृष्ण के लिए चौबीस घंटे कार्य करे, तो श्रीकृष्ण उसे विस्मृत नहीं कर सकते। विनम्र होकर वह भगवान् का ध्यान आकर्षित कर सकता है। जैसा गुरु महाराज भक्तिसिद्धान्त सरस्वती कहा करते थे, \"भगवान् को देखने का प्रयत्न मत करो। क्या भगवान् केवल इसलिए आकर एक सेवक की भाँति हमारे समक्ष खड़े हो जाएँ कि हम उन्हें देखना चाहते हैं? यह विनम्र उपाय नहीं है। हमें अपने प्रेम और सेवा से उन्हें कृतार्थ करना होगा।\"\n\nश्रीकृष्ण के समीप जाने की उचित प्रक्रिया मानवता को भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने प्रदान की, और उनके प्रथम शिष्य रूप गोस्वामी ने इसकी सराहना की। रूप गोस्वामी मुहम्मदी सरकार में मन्त्री थे, किन्तु उन्होंने चैतन्य महाप्रभु के शिष्य बनने हेतु सरकार छोड़ दी। जब वे प्रथम बार भगवान् के दर्शन को गए, तब रूप गोस्वामी निम्नलिखित श्लोक के साथ उनके समीप पहुँचे:\n\nnamo mahā-vadānyāya\n\nkṛṣṇa-prema-pradāya te\n\nkṛṣṇāya kṛṣṇa-caitanya-\n\nnāmne gaura-tviṣe namaḥ\n\n[Madhya 19.53]\n\n\"मैं परमेश्वर श्रीकृष्ण चैतन्य को अपना सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ, जो किसी भी अन्य अवतार से, स्वयं श्रीकृष्ण से भी, अधिक उदार हैं, क्योंकि वे वह वस्तु निःशुल्क प्रदान कर रहे हैं जो किसी अन्य ने कभी नहीं दी—कृष्ण-प्रेम।\" रूप गोस्वामी ने चैतन्य महाप्रभु को \"सर्वाधिक दानशील, सर्वाधिक उदार व्यक्तित्व\" कहा, क्योंकि वे सबसे अमूल्य वस्तु—भगवत्प्रेम—को अत्यन्त सस्ते में प्रदान कर रहे थे। हम सब श्रीकृष्ण को चाहते हैं और हम सब उनके लिए लालायित रहते हैं। श्रीकृष्ण सर्वाधिक आकर्षक, सर्वाधिक सुन्दर, सर्वाधिक ऐश्वर्यवान्, सर्वाधिक शक्तिशाली और सर्वाधिक विद्वान् हैं। यही हमारी लालसा का विषय है। हम सुन्दर, शक्तिशाली, विद्वान् और सम्पन्न के लिए लालायित रहते हैं। श्रीकृष्ण इन सबके आगार हैं, अतः हमें केवल अपना ध्यान उनकी ओर मोड़ना है, और हमें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। सब कुछ—जो कुछ हम चाहें। हमारे हृदय की जो भी इच्छा हो, वह कृष्णभावनामृत की इस प्रक्रिया से पूर्ण हो जाएगी।\n\nजो कृष्णभावनामृत में मरता है, उसके लिए, जैसा पहले कहा जा चुका है, कृष्णलोक, अर्थात् जहाँ श्रीकृष्ण निवास करते हैं उस परम धाम, में प्रवेश सुनिश्चित है। इस बिन्दु पर कोई पूछ सकता है कि उस लोक में जाने में क्या लाभ है, और श्रीकृष्ण स्वयं उत्तर देते हैं,\n\nmām upetya punar janma\n\nduḥkhālayam aśāśvatam\n\nnāpnuvanti mahātmānaḥ\n\nsaṁsiddhiṁ paramāṁ gatāḥ\n\n\"मुझे प्राप्त कर लेने के पश्चात्, वे महान् आत्माएँ, जो भक्ति में योगी हैं, इस क्षणिक संसार में, जो दुःखों से परिपूर्ण है, पुनः कभी नहीं लौटतीं, क्योंकि उन्होंने सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर ली है।\" (गीता 8.15)\n\nइस भौतिक जगत् को इसके स्रष्टा, श्रीकृष्ण द्वारा दुःखालयम्—दुःखों से परिपूर्ण—प्रमाणित किया गया है। तब फिर हम इसे आरामदेह कैसे बना सकते हैं? क्या इस जगत् को विज्ञान की तथाकथित उन्नति से आरामदेह बनाना सम्भव है? नहीं, यह सम्भव नहीं है। फलस्वरूप, हम यह जानना भी नहीं चाहते कि ये दुःख क्या हैं। ये दुःख, जैसा पहले कहा जा चुका है, जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु हैं, और क्योंकि हम इनका समाधान नहीं कर सकते, अतः हम इन्हें एक ओर रखने का प्रयत्न करते हैं। विज्ञान में इन दुःखों को सुलझाने की कोई शक्ति नहीं है, जो हमें सदा त्रास देते रहते हैं। इसके विपरीत, वे हमारा ध्यान अन्तरिक्षयानों अथवा परमाणु बमों के निर्माण की ओर भटका देते हैं। इन समस्याओं का समाधान यहाँ भगवद्गीता में दिया गया है: यदि कोई श्रीकृष्ण के स्तर को प्राप्त कर ले, तो उसे जन्म-मृत्यु की इस पृथ्वी पर पुनः नहीं लौटना पड़ता। हमें यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि यह स्थान दुःखों से परिपूर्ण है। इसे समझने हेतु एक निश्चित मात्रा की विकसित चेतना अपेक्षित है। बिल्ली, कुत्ते और सूअर यह नहीं समझ सकते कि वे दुःख भोग रहे हैं। मनुष्य को विवेकशील पशु कहा जाता है, किन्तु उसकी विवेकशीलता इस दुःखमय अवस्था से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय खोजने के बजाय अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने में प्रयुक्त हो रही है। यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जो उनके पास आता है, वह पुनः दुःख भोगने हेतु कभी जन्म नहीं लेगा। वे महान् आत्माएँ जो उनके पास आती हैं, उन्होंने जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर ली है, जो जीव को बद्ध अस्तित्व के दुःख से उबार देती है।\n\nश्रीकृष्ण और एक साधारण प्राणी में एक अन्तर यह है कि एक साधारण प्राणी एक समय में केवल एक ही स्थान पर हो सकता है, किन्तु श्रीकृष्ण एक साथ ब्रह्माण्ड में सर्वत्र भी हो सकते हैं और फिर भी अपने धाम में भी हो सकते हैं। दिव्य राज्य में श्रीकृष्ण का धाम गोलोक वृन्दावन कहलाता है। भारत का वृन्दावन वही वृन्दावन है जो इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। जब श्रीकृष्ण अपनी ही अन्तरंगा शक्ति से स्वयं अवतरित होते हैं, तब उनका धाम भी अवतरित होता है। दूसरे शब्दों में, जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं, तब वे अपने को उस विशेष भूमि में प्रकट करते हैं। इसके बावजूद, श्रीकृष्ण का धाम नित्य रूप से दिव्य क्षेत्र में, वैकुण्ठों में बना रहता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि जो वैकुण्ठों में स्थित उनके धाम में आता है, उसे पुनः कभी भौतिक जगत् में जन्म नहीं लेना पड़ता। ऐसे व्यक्ति को महात्मा कहा जाता है। महात्मा शब्द पश्चिम में सामान्यतः महात्मा गांधी के सन्दर्भ में सुना जाता है, किन्तु हमें यह समझना चाहिए कि महात्मा किसी राजनीतिज्ञ की उपाधि नहीं है। अपितु, महात्मा से तात्पर्य उस प्रथम-श्रेणी के कृष्णभावनाभावित मनुष्य से है जो श्रीकृष्ण के धाम में प्रवेश करने का अधिकारी है। महात्मा की सिद्धि यह है: मानव जीवन तथा प्रकृति के संसाधनों का उपयोग कर अपने को जन्म-मृत्यु के चक्र से उबार लेना।\n\nएक बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि वह दुःख नहीं चाहता, किन्तु वे उस पर बलपूर्वक थोपे जाते हैं। जैसा पहले कहा जा चुका है, हम इस मन, शरीर, प्राकृतिक उपद्रवों अथवा अन्य जीवों के कारण सदा एक दुःखमय अवस्था में रहते हैं। हम पर सदा किसी-न-किसी प्रकार का दुःख थोपा जाता रहता है। यह भौतिक जगत् दुःख के निमित्त बना है; जब तक दुःख न हो, तब तक हम कृष्णभावनामृत में नहीं आ सकते। दुःख वस्तुतः हमें कृष्णभावनामृत तक उन्नत करने में एक प्रेरणा और सहायता हैं। एक बुद्धिमान व्यक्ति प्रश्न करता है कि ये दुःख उस पर बलपूर्वक क्यों थोपे जाते हैं। किन्तु आधुनिक सभ्यता की मनोवृत्ति यह है, \"मुझे दुःख भोगने दो। मुझे इसे किसी नशे से ढक लेने दो, बस इतना ही।\" किन्तु ज्यों ही नशा समाप्त होता है, दुःख लौट आते हैं। कृत्रिम नशे से जीवन के दुःखों का समाधान करना सम्भव नहीं है। समाधान कृष्णभावनामृत से होता है।\n\nकोई यह इंगित कर सकता है कि यद्यपि श्रीकृष्ण के भक्त श्रीकृष्ण के लोक में प्रवेश करने का प्रयत्न कर रहे हैं, अन्य सब चन्द्रमा पर जाने में रुचि रखते हैं। क्या चन्द्रमा पर जाना भी सिद्धि नहीं है? अन्य लोकों की यात्रा करने की प्रवृत्ति जीव में सदा विद्यमान रहती है। जीव का एक नाम सर्व-गत है, जिसका अर्थ है \"जो सर्वत्र यात्रा करना चाहता है\"। यात्रा जीव की प्रकृति का अंग है। चन्द्रमा पर जाने की इच्छा कोई नई वस्तु नहीं है। योगी भी उच्चतर लोकों में प्रवेश करने में रुचि रखते हैं, किन्तु भगवद्गीता (8.16) में श्रीकृष्ण इंगित करते हैं कि इससे कोई सहायता नहीं मिलेगी।\n\nābrahma-bhuvanāl lokāḥ\n\npunar āvartino 'rjuna\n\nmām upetya tu kaunteya\n\npunar janma na vidyate\n\n\"भौतिक जगत् के उच्चतम लोक से लेकर निम्नतम तक, सभी दुःख के स्थान हैं जहाँ बारम्बार जन्म और मृत्यु होती है। किन्तु जो मेरे धाम को प्राप्त करता है, हे कुन्तीपुत्र, वह पुनः कभी जन्म नहीं लेता।\" ब्रह्माण्ड उच्च, मध्य और निम्न लोक-समूहों में विभक्त है। पृथ्वी को मध्य लोक-समूह का सदस्य माना जाता है। श्रीकृष्ण इंगित करते हैं कि यदि कोई सबसे उच्च लोक में भी, जो ब्रह्मलोक कहलाता है, प्रवेश कर ले, तब भी वहाँ जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति होती है। ब्रह्माण्ड के अन्य लोक जीवों से परिपूर्ण हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम तो यहाँ हैं और अन्य सब लोक रिक्त हैं। अनुभव से हम देख सकते हैं कि पृथ्वी पर कोई भी स्थान जीवों से रिक्त नहीं है। यदि हम पृथ्वी में गहराई तक खोदें, तो हमें कीड़े मिलते हैं; यदि हम जल में गहरे जाएँ, तो हमें जलचर मिलते हैं; यदि हम आकाश में जाएँ, तो हमें अनेकानेक पक्षी मिलते हैं। यह निष्कर्ष निकालना कैसे सम्भव है कि अन्य लोकों में कोई जीव नहीं हैं? किन्तु श्रीकृष्ण इंगित करते हैं कि यदि हम उन लोकों में भी प्रवेश कर जाएँ जहाँ महान् देवता निवास करते हैं, तब भी हम मृत्यु के अधीन रहेंगे। श्रीकृष्ण पुनः दोहराते हैं कि उनके लोक पर पहुँचकर मनुष्य को पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता।\n\nहमें आनन्द और ज्ञान से परिपूर्ण अपने नित्य जीवन को प्राप्त करने के विषय में अत्यन्त गम्भीर होना चाहिए। हम यह भूल चुके हैं कि वस्तुतः यही हमारे जीवन का लक्ष्य, हमारा वास्तविक स्वार्थ है। हम क्यों भूल गए हैं? हम तो मात्र भौतिक चमक-दमक, गगनचुम्बी भवनों, विशाल कारखानों और राजनीतिक खेल में फँस गए हैं, यद्यपि हम जानते हैं कि हम गगनचुम्बी भवन चाहे जितने बड़े बना लें, हम यहाँ अनिश्चित काल तक नहीं रह पाएँगे। हमें अपने को भौतिक प्रकृति में और अधिक फँसाने हेतु शक्तिशाली उद्योगों और नगरों के निर्माण में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करनी चाहिए; अपितु हमारी ऊर्जा कृष्णभावनामृत के विकास में प्रयुक्त होनी चाहिए, ताकि हम ऐसा आध्यात्मिक शरीर प्राप्त कर सकें जिसके द्वारा हम श्रीकृष्ण के लोक में प्रवेश कर सकें। कृष्णभावनामृत कोई धार्मिक सूत्र अथवा कोई आध्यात्मिक मनोरंजन नहीं है; यह तो जीव का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंश है।"}
{"ref": "bbd/4", "book": "bbd", "lang": "hi", "url": "/hi/library/bbd/4/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "ब्रह्माण्ड से परे का आकाश", "purport": "यदि इस ब्रह्माण्ड के उच्चतर लोक भी जन्म-मृत्यु के अधीन हैं, तो महान् योगी उनमें उन्नति हेतु प्रयत्न क्यों करते हैं? यद्यपि उनके पास अनेक योग-शक्तियाँ हो सकती हैं, फिर भी इन योगियों में भौतिक जीवन की सुविधाओं को भोगने की प्रवृत्ति बनी रहती है। उच्चतर लोकों में अविश्वसनीय रूप से दीर्घ आयु तक जीवित रहना सम्भव है। इन लोकों पर समय की गणना श्रीकृष्ण द्वारा इस प्रकार इंगित की गई है:\n\nsahasra-yuga-paryantam\n\nahar yad brahmaṇo viduḥ\n\nrātriṁ yuga-sahasrāntāṁ\n\nte 'ho-rātra-vido janāḥ\n\n\"मानवीय गणना के अनुसार, एक साथ मिलाकर एक हज़ार युग ब्रह्मा के एक दिन की अवधि है। और उनकी रात्रि की अवधि भी इतनी ही है।\" (गीता 8.17)\n\nएक युग 43,00,000 वर्षों को घेरता है। इस संख्या को एक हज़ार से गुणित करने पर ब्रह्मलोक नामक लोक पर ब्रह्मा के बारह घंटे गणित होते हैं। इसी प्रकार, अन्य बारह घंटों की अवधि रात्रि को घेरती है। ऐसे तीस दिन एक मास के तुल्य हैं, बारह मास एक वर्ष के, और ब्रह्मा ऐसे सौ वर्षों तक जीवित रहते हैं। ऐसे लोक पर जीवन वस्तुतः दीर्घ है, फिर भी खरबों वर्षों के पश्चात् भी ब्रह्मलोक के निवासियों को मृत्यु का सामना करना पड़ता है। जब तक हम आध्यात्मिक लोकों को न जाएँ, तब तक मृत्यु से कोई छुटकारा नहीं है।\n\navyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ\n\nprabhavanty ahar-āgame\n\nrātry-āgame pralīyante\n\ntatraivāvyakta-saṁjñake\n\n\"जब ब्रह्मा का दिन प्रकट होता है, तब जीवों का यह समुदाय अस्तित्व में आता है, और ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर वे सब विलीन हो जाते हैं।\" (गीता 8.18) ब्रह्मा के दिन के अन्त में, समस्त निम्न लोक-समूह जल से आच्छादित हो जाते हैं, और उन पर निवास करने वाले प्राणी विलीन हो जाते हैं। इस प्रलय के पश्चात् और ब्रह्मा की रात्रि के बीत जाने के पश्चात्, प्रातःकाल जब ब्रह्मा जागते हैं, तब पुनः सृष्टि होती है, और ये सब प्राणी प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार सृष्टि और संहार का अधीनत्व भौतिक जगत् की प्रकृति है।\n\nbhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ\n\nbhūtvā bhūtvā pralīyate\n\nrātry-āgame 'vaśaḥ pārtha\n\nprabhavaty ahar-āgame\n\n\"बारम्बार दिन आता है, और प्राणियों का यह समूह सक्रिय हो उठता है; और पुनः रात्रि उतरती है, हे पार्थ, और वे विवश होकर विलीन हो जाते हैं।\" (गीता 8.19) यद्यपि जीवों को प्रलय अच्छा नहीं लगता, तथापि वह प्रलय आएगा और लोकों को तब तक आप्लावित करेगा जब तक लोकों पर समस्त जीव ब्रह्मा की रात्रि भर जल में विलीन न रहें। किन्तु ज्यों ही दिन आता है, जल क्रमशः लुप्त हो जाता है।\n\nparas tasmāt tu bhāvo 'nyo\n\n'vyakto 'vyaktāt sanātanaḥ\n\nyaḥ sa sarveṣu bhūteṣu\n\nnaśyatsu na vinaśyati\n\n\"फिर भी एक अन्य प्रकृति है, जो नित्य है और इस प्रकट तथा अप्रकट पदार्थ से परे, दिव्य है। वह परम है और कभी विलीन नहीं होती। जब इस जगत् में सब कुछ विलीन हो जाता है, तब वह अंश ज्यों-का-त्यों बना रहता है।\" (गीता 8.20) हम भौतिक ब्रह्माण्ड की व्याप्ति की गणना नहीं कर सकते, किन्तु हमारे पास यह वैदिक जानकारी है कि सम्पूर्ण सृष्टि के भीतर लाखों ब्रह्माण्ड हैं, और इन भौतिक ब्रह्माण्डों से परे एक अन्य आकाश है, जो आध्यात्मिक है। वहाँ समस्त लोक नित्य हैं, और उन पर निवास करने वाले समस्त प्राणियों के जीवन नित्य हैं। इस श्लोक में भावः शब्द का अर्थ है \"प्रकृति\", और यहाँ एक अन्य प्रकृति इंगित की गई है। इस जगत् में हमें दो प्रकृतियों का अनुभव भी होता है। जीव आत्मा है, और जब तक वह पदार्थ के भीतर है, तब तक पदार्थ गतिशील रहता है, और ज्यों ही जीव, अर्थात् आध्यात्मिक स्फुलिंग, शरीर से बाहर निकलता है, त्यों ही शरीर निश्चल हो जाता है। आध्यात्मिक प्रकृति श्रीकृष्ण की परा प्रकृति कहलाती है, और भौतिक अपरा कहलाती है। इस भौतिक प्रकृति से परे एक परा प्रकृति है, जो पूर्णतः आध्यात्मिक है। इसे प्रायोगिक ज्ञान से समझना सम्भव नहीं है। हम दूरबीन से लाखों-लाखों तारे देख सकते हैं, किन्तु हम उन तक पहुँच नहीं सकते। हमें अपनी असमर्थताओं को समझना होगा। यदि हम भौतिक ब्रह्माण्ड को प्रायोगिक ज्ञान से नहीं समझ सकते, तो भगवान् और उनके राज्य को समझने की क्या सम्भावना है? यह प्रायोगिक रूप से सम्भव नहीं है। हमें भगवद्गीता को सुनकर समझना होगा। हम प्रायोगिक ज्ञान से यह नहीं समझ सकते कि हमारे पिता कौन हैं; हमें अपनी माता के वचन को सुनना और उस पर विश्वास करना होता है। यदि हम उस पर विश्वास न करें, तो जानने का कोई उपाय नहीं है। इसी प्रकार, यदि हम मात्र कृष्णभावनामृत की विधि से जुड़े रहें, तो श्रीकृष्ण और उनके राज्य की समस्त जानकारी प्रकट हो जाएगी।\n\nपरस् तु भावः का अर्थ है \"परा प्रकृति\", और व्यक्तः उसको इंगित करता है जिसे हम प्रकट देखते हैं। हम देख सकते हैं कि भौतिक ब्रह्माण्ड पृथ्वी, सूर्य, तारों और लोकों के माध्यम से प्रकट होता है। और इस ब्रह्माण्ड से परे एक अन्य प्रकृति है, एक नित्य प्रकृति। अव्यक्तात् सनातनः। इस भौतिक प्रकृति का एक आदि और एक अन्त है, किन्तु वह आध्यात्मिक प्रकृति सनातनः—नित्य है। उसका न आदि है और न अन्त। यह कैसे सम्भव है? एक बादल आकाश में होकर गुज़र सकता है, और ऐसा प्रतीत हो सकता है कि वह बहुत बड़ी दूरी को आच्छादित कर रहा है, किन्तु वस्तुतः वह सम्पूर्ण आकाश के एक नगण्य अंश को आच्छादित करता हुआ केवल एक छोटा-सा बिन्दु है। क्योंकि हम इतने छोटे हैं, यदि केवल कुछ सौ मील बादल से आच्छादित हों, तो ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण आकाश आच्छादित है। इसी प्रकार, यह सम्पूर्ण भौतिक ब्रह्माण्ड विशाल आध्यात्मिक आकाश में एक छोटे, नगण्य बादल के समान है। यह महत्-तत्त्व, अर्थात् पदार्थ, से आवेष्टित है। जैसे एक बादल का एक आदि और एक अन्त होता है, वैसे ही इस भौतिक प्रकृति का भी एक आदि और एक अन्त है। जब बादल लुप्त हो जाते हैं और आकाश स्वच्छ हो जाता है, तब हम सब कुछ ज्यों-का-त्यों देखते हैं। इसी प्रकार, शरीर आत्मा पर होकर गुज़रते एक बादल के समान है। वह कुछ समय तक ठहरता है, कुछ उपोत्पाद देता है, क्षीण होता है, और फिर लुप्त हो जाता है। हम जिस किसी प्रकार के भौतिक परिघटना का अवलोकन करते हैं, वह भौतिक प्रकृति के इन छह रूपान्तरणों के अधीन है—वह अस्तित्व में आती है, बढ़ती है, कुछ काल तक ठहरती है, कुछ उपोत्पाद उत्पन्न करती है, क्षीण होती है, और फिर लुप्त हो जाती है। श्रीकृष्ण इंगित करते हैं कि इस परिवर्तनशील, बादल-सी प्रकृति से परे एक आध्यात्मिक प्रकृति है, जो नित्य है। इसके अतिरिक्त, जब यह भौतिक प्रकृति विलीन हो जाती है, तब वह अव्यक्तात् सनातनः बनी रहेगी।\n\nवैदिक साहित्य में भौतिक और आध्यात्मिक आकाशों के विषय में पर्याप्त जानकारी है। श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कन्ध में आध्यात्मिक आकाश तथा उसके निवासियों के वर्णन हैं। यहाँ तक कि यह जानकारी भी दी गई है कि आध्यात्मिक आकाश में आध्यात्मिक विमान हैं और वहाँ के मुक्त प्राणी इन विमानों पर विद्युत् की भाँति यात्रा करते हैं। जो कुछ हम यहाँ पाते हैं, वह वहाँ वास्तविकता में भी पाया जा सकता है। यहाँ भौतिक आकाश में प्रत्येक वस्तु उसका अनुकरण, अथवा छाया है, जो आध्यात्मिक आकाश में विद्यमान है। जैसे चलचित्र में हम मात्र वास्तविक वस्तु का एक प्रदर्शन अथवा प्रतिकृति देखते हैं, वैसे ही श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि यह भौतिक जगत् वास्तविकता के अनुरूप गढ़े गए पदार्थ का मात्र एक संयोग है—ठीक जैसे किसी दुकान की खिड़की में एक बालिका का पुतला किसी बालिका के अनुरूप गढ़ा जाता है। प्रत्येक विवेकशील मनुष्य जानता है कि पुतला एक अनुकरण है। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि क्योंकि आध्यात्मिक जगत् वास्तविक है, अतः यह भौतिक जगत्, जो एक अनुकरण है, वास्तविक प्रतीत होता है। हमें वास्तविकता का अर्थ समझना होगा—वास्तविकता का अर्थ है ऐसा अस्तित्व जिसका विनाश नहीं किया जा सकता; वास्तविकता का अर्थ है नित्यता।\n\nnāsato vidyate bhāvo\n\nnābhāvo vidyate sataḥ\n\nubhayor api dṛṣṭo 'ntas\n\ntv anayos tattva-darśibhiḥ\n\n\"जो सत्य के द्रष्टा हैं, उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि असत् की कोई स्थिति नहीं होती, और सत् का कोई अन्त नहीं होता। यह निष्कर्ष द्रष्टाओं ने दोनों की प्रकृति का अध्ययन करके निकाला है।\" (गीता 2.16)\n\nवास्तविक आनन्द श्रीकृष्ण हैं, जबकि भौतिक आनन्द, जो क्षणिक है, वास्तविक नहीं है। जो वस्तुओं को यथारूप देख सकते हैं, वे छाया-आनन्द में भाग नहीं लेते। मानव जीवन का वास्तविक लक्ष्य आध्यात्मिक आकाश को प्राप्त करना है, किन्तु जैसा श्रीमद्भागवत इंगित करता है, अधिकांश लोग इसके विषय में नहीं जानते। मानव जीवन वास्तविकता को समझने तथा उसमें स्थानान्तरित होने के निमित्त है। समस्त वैदिक साहित्य हमें यह शिक्षा देता है कि हम इस अन्धकार में न रहें। इस भौतिक जगत् की प्रकृति अन्धकार है, किन्तु आध्यात्मिक जगत् प्रकाश से परिपूर्ण है और फिर भी अग्नि अथवा विद्युत् से प्रकाशित नहीं है। श्रीकृष्ण भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय (15.6) में इसका संकेत देते हैं:\n\nna tad bhāsayate sūryo\n\nna śaśāṅko na pāvakaḥ\n\nyad gatvā na nivartante\n\ntad dhāma paramaṁ mama\n\n\"मेरा वह धाम न सूर्य से प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा से, और न ही विद्युत् से। जो उसे प्राप्त कर लेता है, वह पुनः कभी इस भौतिक जगत् में नहीं लौटता।\"\n\nआध्यात्मिक जगत् को अप्रकट कहा जाता है, क्योंकि उसे भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता।\n\navyakto 'kṣara ity uktas\n\ntam āhuḥ paramāṁ gatim\n\nyaṁ prāpya na nivartante\n\ntad dhāma paramaṁ mama\n\n\"वह परम धाम अव्यक्त एवं अविनाशी कहलाता है, और वही परम गन्तव्य है। वहाँ पहुँचकर मनुष्य फिर कभी लौटकर नहीं आता। वही मेरा परम धाम है।\" (गीता 8.21) इस श्लोक में एक महान् यात्रा की ओर संकेत किया गया है। हमें बाह्य आकाश को भेद पाने, भौतिक ब्रह्माण्ड को पार करने, उसके आवरण को बेधने, तथा आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करने में समर्थ होना है। परमां गतिम्—वही यात्रा सर्वोपरि है। इस ग्रह से कुछ सहस्र मील दूर जाकर फिर लौट आने का प्रश्न ही नहीं है। ऐसी यात्रा कोई बहुत वीरतापूर्ण नहीं होती। हमें सम्पूर्ण भौतिक ब्रह्माण्ड को भेदना है। यह हम अन्तरिक्षयानों से नहीं, अपितु कृष्णभावनामृत से कर सकते हैं। जो कोई कृष्णभावनामृत में निमग्न रहता है, और जो मृत्यु के समय श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, वह तत्क्षण वहाँ स्थानान्तरित हो जाता है। यदि हम वास्तव में उस आध्यात्मिक आकाश में जाना और ज्ञानपूर्ण, आनन्दमय, नित्य जीवन का अनुशीलन करना चाहते हैं, तो हमें अभी से सच्चिदानन्द देह का अनुशीलन आरम्भ करना होगा। कहा गया है कि श्रीकृष्ण का सच्चिदानन्द विग्रह है—ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः [ब्र.सं. 5.1]—और हमारा भी नित्यता, ज्ञान एवं आनन्द से युक्त वैसा ही शरीर है, किन्तु वह अत्यन्त सूक्ष्म है और पदार्थ के वस्त्र से ढका हुआ है। यदि किसी प्रकार हम इस मिथ्या वस्त्र को त्याग सकें, तो हम उस आध्यात्मिक राज्य तक पहुँच सकते हैं। यदि एक बार हम उस आध्यात्मिक जगत् को प्राप्त कर लें, तो लौटने की आवश्यकता नहीं रहती (यं प्राप्य न निवर्तन्ते)।\n\nअतः प्रत्येक व्यक्ति को उस धाम परमम्—श्रीकृष्ण के परम धाम—में जाने का प्रयत्न करना चाहिए। श्रीकृष्ण स्वयं हमें बुलाने आते हैं, और वे हमें मार्गदर्शिका के रूप में ग्रन्थ देते हैं तथा अपने प्रामाणिक प्रतिनिधि भेजते हैं। हमें मानव-जीवन को प्रदत्त इस सुविधा का लाभ उठाना चाहिए। जो उस परम धाम तक पहुँच जाता है, उसके लिए तप, तपस्या, योगिक ध्यान आदि की और आवश्यकता नहीं रहती, और जो उस तक नहीं पहुँचता, उसके लिए समस्त तप एवं तपस्याएँ समय का व्यर्थ क्षय मात्र हैं। मानव-जीवन यह वरदान प्राप्त करने का अवसर है, और जिन्होंने यह मानव-रूप प्राप्त किया है, उन्हें जीवन की इस पूर्णता तक उन्नत करना राज्य, माता-पिता, शिक्षकों तथा संरक्षकों का कर्तव्य है। बिल्लियों और कुत्तों की भाँति केवल खाना, सोना, मैथुन करना तथा कलह करना सभ्यता नहीं है। हमें इस मानव-जीवन का समुचित उपयोग करना चाहिए और इस ज्ञान का लाभ उठाकर स्वयं को कृष्णभावनामृत में इस प्रकार सिद्ध करना चाहिए कि दिन के चौबीसों घण्टे हम श्रीकृष्ण में निमग्न रहें और मृत्यु के समय तत्क्षण उस आध्यात्मिक आकाश में स्थानान्तरित हो जाएँ।\n\npuruṣaḥ sa paraḥ pārtha\n\nbhaktyā labhyas tv ananyayā\n\nyasyāntaḥ-sthāni bhūtāni\n\nyena sarvam idaṁ tatam\n\n\"पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो सबसे महान् हैं, अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होते हैं। यद्यपि वे अपने धाम में विद्यमान हैं, तथापि वे सर्वव्यापी हैं, और सब कुछ उन्हीं के भीतर स्थित है।\" (गीता 8.22)\n\nयदि हम वास्तव में उस परम धाम तक पहुँचने में रुचि रखते हैं, तो उसकी विधि, जैसा यहाँ इंगित किया गया है, भक्ति है। भक्त्या का अर्थ है भक्ति, परमेश्वर के प्रति आत्मसमर्पण। भक्त्या का मूल शब्द भज् है, जिसका अर्थ है \"सेवा\"। नारद-पञ्चरात्र में भक्ति की जो परिभाषा दी गई है, वह है \"उपाधियों से मुक्ति\"। यदि कोई उन समस्त उपाधियों से बाहर निकलने के लिए दृढ़संकल्प हो जाए, जो शुद्ध आत्मा से जुड़ी रहती हैं और जो देह के कारण उत्पन्न होती हैं तथा देह बदलने पर सदा बदल जाती हैं, तो वह भक्ति प्राप्त कर सकता है। भक्ति यह अनुभव करना है कि मनुष्य शुद्ध आत्मा है, पदार्थ कदापि नहीं। हमारी वास्तविक पहचान यह देह नहीं है, जो आत्मा का केवल एक आवरण है, अपितु हमारी वास्तविक पहचान दास—श्रीकृष्ण का सेवक—है। जब मनुष्य अपनी वास्तविक पहचान में स्थित होता है और श्रीकृष्ण की सेवा करता है, तब वह भक्त है। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनम्: [चै.च. मध्य 19.170] जब हमारी इन्द्रियाँ भौतिक उपाधियों से मुक्त हो जाती हैं, तब हम उन्हें इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश, अर्थात् श्रीकृष्ण की सेवा में लगाएँगे।\n\nजैसा कि श्रील रूप गोस्वामी बताते हैं, हमें श्रीकृष्ण की अनुकूल भाव से सेवा करनी होती है। प्रायः हम किसी भौतिक प्रयोजन या लाभ के लिए ईश्वर की सेवा करना चाहते हैं। निःसन्देह, जो भौतिक लाभ के लिए ईश्वर के पास जाता है, वह उससे श्रेष्ठ है जो कभी जाता ही नहीं, किन्तु हमें भौतिक लाभ की इच्छा से मुक्त होना चाहिए। हमारा लक्ष्य श्रीकृष्ण को समझना होना चाहिए। निःसन्देह श्रीकृष्ण असीम हैं, और उन्हें समझ पाना सम्भव नहीं, तथापि हमें जितना समझ सकें उतना स्वीकार करना है। *भगवद्गीता* विशेष रूप से हमारी समझ के लिए ही प्रस्तुत की गई है। इस प्रकार ज्ञान ग्रहण करके हमें यह जानना चाहिए कि श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं, और हमें उनके प्रसाद के अनुरूप उनकी अनुकूल सेवा करनी चाहिए। कृष्णभावनामृत विशाल साहित्य से युक्त एक महान् विज्ञान है, और हमें भक्ति की प्राप्ति हेतु उसका उपयोग करना चाहिए।\n\nपुरुषः स परः: आध्यात्मिक आकाश में परमेश्वर परम पुरुष के रूप में विद्यमान हैं। वहाँ असंख्य स्वयं-प्रकाशित ग्रह हैं, और उनमें से प्रत्येक में श्रीकृष्ण का एक विस्तार निवास करता है। वे चतुर्भुज हैं और उनके असंख्य नाम हैं। वे सब व्यक्ति हैं—वे निराकार नहीं हैं। इन पुरुषों तक भक्ति से पहुँचा जा सकता है, न कि चुनौती, दार्शनिक कल्पना या मानसिक कल्पनाओं से, न ही शारीरिक व्यायामों से, अपितु सकाम कर्म के विचलनों से रहित भक्ति से।\n\nवह पुरुषः, परम पुरुष, कैसे हैं? यस्यान्तः-स्थानि भूतानि येन सर्वम् इदं ततम्: प्रत्येक जीव तथा सब कुछ उन्हीं के भीतर है, और फिर भी वे बाहर, सर्वव्यापी हैं। यह कैसे है? वे ठीक सूर्य के समान हैं, जो एक स्थान पर स्थित है और फिर भी अपनी किरणों द्वारा सर्वत्र विद्यमान है। यद्यपि ईश्वर अपने धाम परमम् में स्थित हैं, तथापि उनकी ऊर्जाएँ सर्वत्र वितरित हैं। और वे अपनी ऊर्जाओं से भिन्न भी नहीं हैं, जिस प्रकार सूर्य-प्रकाश और सूर्य अभिन्न हैं। चूँकि श्रीकृष्ण और उनकी ऊर्जाएँ अभिन्न हैं, अतः यदि हम भक्ति में उन्नत हों तो हम श्रीकृष्ण को सर्वत्र देख सकते हैं।\n\npremāñjana-cchurita-bhakti-vilocanena\n\nsantaḥ sadaiva hṛdayeṣu vilokayanti\n\n\"मैं आदि पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जिन्हें वे शुद्ध भक्त, जिनके नेत्र ईश्वर-प्रेम के अंजन से अनुलिप्त हैं, सदा अपने हृदय में निहारते हैं।\" (ब्रह्म-संहिता 5.38) जो ईश्वर-प्रेम से परिपूर्ण हैं, वे ईश्वर को निरन्तर अपने समक्ष देखते हैं। ऐसा नहीं है कि हमने ईश्वर को पिछली रात्रि देखा और अब वे विद्यमान नहीं हैं। नहीं। जो कृष्णभावनाभावित है, उसके लिए श्रीकृष्ण सदा विद्यमान हैं और उनका निरन्तर अनुभव किया जा सकता है। हमें केवल उन्हें देखने के लिए नेत्र विकसित करने हैं।\n\nअपने भौतिक बन्धन, अर्थात् भौतिक इन्द्रियों के आवरण के कारण, हम यह नहीं समझ सकते कि आध्यात्मिक क्या है। किन्तु इस अज्ञान को हरे कृष्ण के इस जप की विधि से दूर किया जा सकता है। यह कैसे? सोते हुए मनुष्य को ध्वनि-कम्पन द्वारा जगाया जा सकता है। यद्यपि मनुष्य सब दृष्टि से अचेत हो—वह देख, अनुभव, सूँघ आदि नहीं सकता—तथापि श्रवण की इन्द्रिय इतनी प्रबल है कि सोते हुए मनुष्य को केवल ध्वनि-कम्पन से ही जगाया जा सकता है। इसी प्रकार, आत्मा, यद्यपि अभी भौतिक संसर्ग की निद्रा से अभिभूत है, तथापि हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के इस दिव्य ध्वनि-कम्पन से पुनः जागृत की जा सकती है। हरे कृष्ण परमेश्वर तथा उनकी ऊर्जाओं को सम्बोधन मात्र है। हरे का अर्थ है ऊर्जा, और कृष्ण परमेश्वर का नाम है, अतः जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं तब हम कहते हैं, \"हे भगवान् की ऊर्जा, हे भगवान्, कृपया मुझे स्वीकार करें।\" भगवान् द्वारा स्वीकार किए जाने के अतिरिक्त हमारी और कोई प्रार्थना नहीं है। दैनिक रोटी के लिए प्रार्थना करने का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि रोटी तो सदा विद्यमान है। हरे कृष्ण परमेश्वर को सम्बोधन मात्र है, जिसमें उनसे हमें स्वीकार करने का अनुरोध किया जाता है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं प्रार्थना की,\n\nayi nanda-tanuja kiṅkaraṁ\n\npatitaṁ māṁ viṣame bhavāmbudhau\n\nkṛpayā tava pāda-paṅkaja-\n\nsthita-dhūlī-sadṛśaṁ vicintaya\n\n\"हे महाराज नन्द के पुत्र! मैं आपका नित्य सेवक हूँ, और ऐसा होते हुए भी किसी प्रकार मैं जन्म-मृत्यु के सागर में गिर पड़ा हूँ। अतः कृपया मुझे इस मृत्यु-सागर से उठा लें और अपने चरण-कमलों के एक परमाणु के रूप में स्थापित कर लें।\" (शिक्षाष्टक 5) सागर के मध्य में गिरे मनुष्य के लिए एकमात्र आशा यही है कि कोई आकर उसे उठा ले। यदि कोई आकर उसे जल से कुछ फुट ही ऊपर खींच ले, तो उसे तत्क्षण राहत मिल जाती है। इसी प्रकार, यदि किसी रीति से हम कृष्णभावनामृत की विधि द्वारा जन्म-मृत्यु के सागर से उठा लिए जाएँ, तो हमें तत्क्षण राहत मिल जाती है।\n\nयद्यपि हम परमेश्वर की, उनके नाम, यश एवं कार्यकलापों की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकते, तथापि यदि हम स्वयं को कृष्णभावनामृत में स्थापित कर लें, तो ईश्वर क्रमशः अपने आप को हमारे समक्ष प्रकट करेंगे। हम अपने प्रयत्न से ईश्वर को नहीं देख सकते, किन्तु यदि हम स्वयं को योग्य बना लें, तो ईश्वर स्वयं को प्रकट करेंगे, और तब हम देखेंगे। कोई भी ईश्वर को आदेश नहीं दे सकता कि वे उसके समक्ष आकर नृत्य करें, अपितु हमें इस प्रकार कार्य करना होता है कि श्रीकृष्ण प्रसन्न होकर स्वयं को हमारे समक्ष प्रकट करें।\n\nश्रीकृष्ण *भगवद्गीता* में अपने विषय में हमें ज्ञान देते हैं, और उस पर सन्देह करने का कोई प्रश्न नहीं है; हमें तो केवल उसका अनुभव करना है, उसे समझना है। *भगवद्गीता* की समझ हेतु किसी पूर्व-योग्यता की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह परम स्तर से कही गई है। श्रीकृष्ण के नामों के जप की सरल विधि से यह प्रकट हो जाएगा कि मनुष्य क्या है, ईश्वर क्या हैं, भौतिक एवं आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड क्या हैं, हम क्यों बद्ध हैं, उस बन्धन से हम कैसे बाहर निकल सकते हैं—तथा और सब कुछ, पग-पग करके। वस्तुतः, विश्वास तथा प्रकटीकरण की प्रक्रिया हमारे लिए अपरिचित नहीं है। प्रतिदिन हम किसी वस्तु पर श्रद्धा रखते हैं, जिसके विषय में हमें विश्वास होता है कि वह बाद में प्रकट होगी। हम भारत जाने के लिए एक टिकट खरीद सकते हैं, और उस टिकट के आधार पर हमें श्रद्धा होती है कि हम वहाँ पहुँचाए जाएँगे। हम टिकट के लिए धन क्यों चुकाएँ? हम किसी को भी यों ही धन नहीं दे देते। कम्पनी अधिकृत है और विमान-सेवा अधिकृत है, अतः श्रद्धा उत्पन्न होती है। श्रद्धा के बिना हम अपने सामान्य जीवन के क्रम में एक पग भी आगे नहीं बढ़ा सकते। श्रद्धा तो हमें रखनी ही होगी, किन्तु वह उसी में हो जो अधिकृत है। ऐसा नहीं कि हम अन्धश्रद्धा रखें, अपितु हम उसे स्वीकार करते हैं जो मान्यता-प्राप्त है। *भगवद्गीता* भारत में सभी वर्गों के मनुष्यों द्वारा शास्त्र के रूप में मान्यता-प्राप्त एवं स्वीकृत है, और जहाँ तक भारत के बाहर का प्रश्न है, अनेक विद्वान्, धर्मशास्त्री एवं दार्शनिक *भगवद्गीता* को एक महान्, प्रामाणिक कृति के रूप में स्वीकार करते हैं। इसमें कोई प्रश्न ही नहीं कि *भगवद्गीता* प्रमाण है। यहाँ तक कि प्रोफ़ेसर अल्बर्ट आइन्स्टाइन जैसे वैज्ञानिक भी नियमित रूप से *भगवद्गीता* पढ़ते थे।\n\n*भगवद्गीता* से हमें यह स्वीकार करना है कि एक आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड है जो ईश्वर का राज्य है। यदि किसी प्रकार हम ऐसे देश में पहुँचा दिए जाएँ जहाँ हमें सूचित किया जाए कि अब हमें जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु से नहीं गुजरना पड़ेगा, तो क्या हम प्रसन्न नहीं होंगे? यदि हमें ऐसे स्थान के विषय में सुनने को मिले, तो निश्चय ही हम वहाँ जाने का यथासम्भव कठोर प्रयत्न करेंगे। कोई वृद्ध नहीं होना चाहता; कोई मरना नहीं चाहता। वास्तव में, ऐसे दुःखों से मुक्त स्थान हमारे हृदय की अभिलाषा होगा। हम यह क्यों चाहते हैं? क्योंकि इसे चाहने का हमें अधिकार, विशेषाधिकार प्राप्त है। हम नित्य, आनन्दमय एवं ज्ञानपूर्ण हैं, किन्तु इस भौतिक उलझन से आच्छादित होने के कारण हम स्वयं को भूल बैठे हैं। अतः *भगवद्गीता* हमें अपनी मूल स्थिति को पुनः प्राप्त कर सकने का लाभ प्रदान करती है।\n\nशंकरवादी तथा बौद्ध दावा करते हैं कि परलोक शून्य है, किन्तु *भगवद्गीता* हमें इस प्रकार निराश नहीं करती। शून्यवाद के दर्शन ने केवल नास्तिक उत्पन्न किए हैं। हम आध्यात्मिक सत्ता हैं, और हम भोग चाहते हैं, किन्तु ज्यों ही हमारा भविष्य शून्य हो जाता है, हम इस भौतिक जीवन का भोग करने की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। इस प्रकार, निर्विशेषवादी शून्यवाद के दर्शन की चर्चा करते हैं, जबकि साथ ही यथासम्भव इस भौतिक जीवन का भोग करने का प्रयास करते हैं। मनुष्य इस प्रकार कल्पना का आनन्द भले ले ले, किन्तु इसमें कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं है।\n\nbrahma-bhūtaḥ prasannātmā\n\nna śocati na kāṅkṣati\n\nsamaḥ sarveṣu bhūteṣu\n\nmad-bhaktiṁ labhate parām\n\n\"जो इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित होता है, वह तत्क्षण परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह न तो कभी शोक करता है और न ही कुछ पाने की इच्छा करता है; वह प्रत्येक जीव के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है।\" (गीता 18.54)\n\nजो भक्तिमय जीवन में अग्रसर हो चुका है और जो श्रीकृष्ण की सेवा का आस्वादन कर रहा है, वह स्वतः ही भौतिक भोग से विरक्त हो जाता है। भक्ति में निमग्न व्यक्ति का लक्षण यह है कि वह श्रीकृष्ण से पूर्णतः सन्तुष्ट रहता है।"}
{"ref": "bbd/5", "book": "bbd", "lang": "hi", "url": "/hi/library/bbd/5/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "श्रीकृष्ण के साथ संग", "purport": "यदि मनुष्य को कुछ श्रेष्ठ मिल जाए, तो वह स्वभावतः सभी निम्न वस्तुओं को त्याग देता है। हम भोग चाहते हैं, किन्तु निराकारवाद एवं शून्यवाद ने ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया है कि हम भौतिक भोग के व्यसनी बन गए हैं। परम पुरुष (पुरुषः स परः), जिन्हें हम आमने-सामने देख सकते हैं, के सम्बन्ध में अवश्य ही भोग होना चाहिए। आध्यात्मिक आकाश में हम ईश्वर के साथ व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर सकते हैं, उनके साथ खेल सकते हैं, उनके साथ भोजन कर सकते हैं, इत्यादि। यह सब भक्त्या—दिव्य प्रेममयी सेवा—द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। तथापि, यह सेवा मिलावट-रहित होनी चाहिए, अर्थात् हमें भौतिक प्रतिफल की अपेक्षा किए बिना ईश्वर से प्रेम करना चाहिए। ईश्वर से एकाकार होने के लिए उनसे प्रेम करना भी मिलावट का ही एक रूप है।\n\nआध्यात्मिक आकाश एवं भौतिक आकाश के बीच एक प्रमुख भेद यह है कि आध्यात्मिक आकाश में आध्यात्मिक ग्रहों के अधिनायक या नेता का कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं होता। समस्त स्थितियों में, आध्यात्मिक ग्रहों में प्रधान व्यक्ति श्रीकृष्ण का एक पूर्ण विस्तार होता है। परमेश्वर तथा उनके बहुविध प्रकटीकरण समस्त वैकुण्ठ ग्रहों पर अधिष्ठित रहते हैं। पृथ्वी पर, उदाहरणार्थ, राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री के पद हेतु प्रतिद्वन्द्विता रहती है, किन्तु आध्यात्मिक आकाश में सभी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को परम स्वीकार करते हैं। जो उन्हें स्वीकार नहीं करते और उनकी प्रतिद्वन्द्विता करने का प्रयास करते हैं, उन्हें भौतिक ब्रह्माण्ड में डाल दिया जाता है, जो ठीक एक कारागार के समान है। जिस प्रकार किसी भी नगर में एक कारागार होता है, और वह कारागार सम्पूर्ण नगर का एक अत्यन्त नगण्य भाग होता है, उसी प्रकार भौतिक ब्रह्माण्ड बद्धजीवों के लिए एक कारागार है। वह आध्यात्मिक आकाश का एक नगण्य भाग है, किन्तु वह आध्यात्मिक आकाश से बाहर नहीं है, जैसे कारागार नगर से बाहर नहीं होता।\n\nआध्यात्मिक आकाश में वैकुण्ठ ग्रहों के निवासी सभी मुक्त आत्माएँ हैं। *श्रीमद्भागवत* में हमें सूचित किया गया है कि उनके शारीरिक लक्षण ठीक ईश्वर के समान हैं। इनमें से कुछ ग्रहों पर ईश्वर दो भुजाओं से प्रकट हैं, और अन्य पर उनकी चार भुजाएँ हैं। इन ग्रहों के निवासी भी, परमेश्वर के समान, दो तथा चार भुजाएँ प्रकट करते हैं, और कहा जाता है कि उनमें तथा परम पुरुष में भेद नहीं किया जा सकता। आध्यात्मिक जगत् में पाँच प्रकार की मुक्ति है। सायुज्य-मुक्ति वह मुक्ति है जिसमें मनुष्य परमेश्वर के निराकार अस्तित्व, जिसे ब्रह्म कहा जाता है, में लीन हो जाता है। मुक्ति का दूसरा रूप सारूप्य-मुक्ति है, जिससे मनुष्य ठीक ईश्वर के समान लक्षण प्राप्त करता है। तीसरा है सालोक्य-मुक्ति, जिससे मनुष्य ईश्वर के साथ एक ही ग्रह में रह सकता है। सार्ष्टि-मुक्ति से मनुष्य परमेश्वर के समान ऐश्वर्य पा सकता है। एक अन्य प्रकार मनुष्य को सदा ईश्वर के एक पार्षद के रूप में उनके साथ रहने में समर्थ बनाता है, ठीक अर्जुन के समान, जो सदा श्रीकृष्ण के सखा के रूप में उनके साथ रहता है। मनुष्य इन पाँच रूपों में से कोई भी मुक्ति पा सकता है, किन्तु पाँचों में से सायुज्य-मुक्ति, अर्थात् निराकार पक्ष में लीन हो जाना, वैष्णव भक्तों द्वारा स्वीकार नहीं की जाती। वैष्णव ईश्वर की उनके यथार्थ रूप में आराधना करना और उनकी सेवा हेतु अपनी पृथक् व्यक्तिगत सत्ता बनाए रखना चाहता है, जबकि मायावादी निराकारवादी दार्शनिक अपनी व्यक्तिगत सत्ता खोकर परम के अस्तित्व में लीन हो जाना चाहता है। इस लीन हो जाने की न तो *भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण द्वारा, और न ही वैष्णव दार्शनिकों की गुरु-परम्परा द्वारा अनुशंसा की गई है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक (4) में इस विषय पर लिखा:\n\nna dhanaṁ na janaṁ na sundarīṁ\n\nkavitāṁ vā jagad-īśa kāmaye\n\nmama janmani janmanīśvare\n\nbhavatād bhaktir ahaitukī tvayi\n\n\"हे सर्वशक्तिमान् भगवान्! मुझे न तो धन संचित करने की इच्छा है, न ही सुन्दर स्त्रियों के भोग की कोई इच्छा है, न ही मुझे किसी भी संख्या में अनुयायी चाहिए। मैं केवल यही चाहता हूँ कि मुझे जन्म-जन्मान्तर अपने जीवन में आपकी अहैतुकी भक्ति प्राप्त हो।\" यहाँ भगवान् चैतन्य महाप्रभु \"जन्म-जन्मान्तर\" का उल्लेख करते हैं। जब जन्म-जन्मान्तर होता है, तब मुक्ति नहीं होती। मुक्ति में मनुष्य या तो आध्यात्मिक ग्रहों को प्राप्त करता है या परम के अस्तित्व में लीन हो जाता है—दोनों में से किसी भी दशा में, भौतिक जगत् में पुनर्जन्म का प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु चैतन्य महाप्रभु इसकी चिन्ता नहीं करते कि वे मुक्त हैं या नहीं: उनकी एकमात्र चिन्ता कृष्णभावनामृत में संलग्न रहने, परमेश्वर की सेवा करने की है। भक्त इसकी चिन्ता नहीं करता कि वह कहाँ है, न ही वह इसकी चिन्ता करता है कि वह पशु-समाज, मानव-समाज, देवता-समाज, या किसी भी अन्य में जन्म लेता है—वह तो केवल ईश्वर से यही प्रार्थना करता है कि वह उन्हें न भूले और सदा उनकी दिव्य सेवा में संलग्न रह सके। ये शुद्ध भक्ति के लक्षण हैं। निःसन्देह भक्त, वह जहाँ भी हो, आध्यात्मिक राज्य में ही रहता है, चाहे वह इस भौतिक देह में ही क्यों न हो। किन्तु वह अपनी निजी उन्नति या सुख-सुविधा हेतु ईश्वर से कुछ नहीं माँगता।\n\nयद्यपि श्रीकृष्ण यह संकेत करते हैं कि जो उनके प्रति समर्पित है उसके द्वारा वे सरलता से प्राप्त किए जा सकते हैं, तथापि उन योगियों के लिए, जो योग की अन्य विधियों का अभ्यास करते हैं, इसमें जोखिम का एक तत्त्व सम्मिलित है। उनके लिए उन्होंने *भगवद्गीता* (8.23) में स्थूल देह को त्यागने के उपयुक्त समय के विषय में निर्देश दिए हैं।\n\nyatra kāle tv anāvṛttim\n\nāvṛttiṁ caiva yoginaḥ\n\nprayātā yānti taṁ kālaṁ\n\nvakṣyāmi bharatarṣabha\n\n\"हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं तुम्हें उन भिन्न-भिन्न कालों को बताऊँगा जिनमें इस संसार से प्रयाण करके मनुष्य या तो लौटता है या नहीं लौटता।\" यहाँ श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि यदि कोई किसी विशेष काल में अपनी देह त्याग पाए, तो वह मुक्त हो सकता है, और भौतिक जगत् में फिर कभी नहीं लौटता। वहीं, वे यह भी संकेत करते हैं कि यदि कोई किसी अन्य काल में मरता है, तो उसे लौटना पड़ता है। संयोग का यह तत्त्व विद्यमान है, किन्तु सदा कृष्णभावनामृत में रहने वाले भक्त के लिए संयोग का कोई प्रश्न नहीं, क्योंकि भगवान् के प्रति अपनी भक्ति के बल पर उसे श्रीकृष्ण के धाम में प्रवेश का आश्वासन प्राप्त है।\n\nagnir jyotir ahaḥ śuklaḥ\n\nṣaṇ-māsā uttarāyaṇam\n\ntatra prayātā gacchanti\n\nbrahma brahma-vido janāḥ\n\n\"जो परब्रह्म को जानते हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव में, प्रकाश में, शुभ मुहूर्त में, चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष में तथा उन छह मासों में, जब सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है, संसार से प्रयाण करते हैं।\" (गीता 8.24) सूर्य छह मास विषुवत्-रेखा के उत्तरी ओर तथा छह मास दक्षिणी ओर व्यतीत करता है। *श्रीमद्भागवत* में हमें यह जानकारी मिलती है कि जैसे ग्रह गति कर रहे हैं, वैसे ही सूर्य भी गति कर रहा है। यदि कोई तब मरता है जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध में स्थित होता है, तो वह मुक्ति प्राप्त करता है।\n\ndhūmo rātris tathā kṛṣṇaḥ\n\nṣaṇ-māsā dakṣiṇāyanam\n\ntatra cāndramasaṁ jyotir\n\nyogī prāpya nivartate\n\nśukla-kṛṣṇe gatī hy ete\n\njagataḥ śāśvate mate\n\nekayā yāty anāvṛttim\n\nanyayāvartate punaḥ\n\n\"जो योगी इस संसार से धूम्र में, रात्रि में, चन्द्रहीन पक्ष में, अथवा उन छह मासों में, जब सूर्य दक्षिण की ओर जाता है, प्रयाण करता है, या जो चन्द्रलोक को प्राप्त करता है, वह पुनः लौट आता है। *वेदों* के अनुसार, इस संसार से प्रयाण करने के दो मार्ग हैं—एक प्रकाश में और एक अन्धकार में। जब मनुष्य प्रकाश में प्रयाण करता है, तब वह नहीं लौटता; किन्तु जब वह अन्धकार में प्रयाण करता है, तब वह लौट आता है।\" (गीता 8.25–26)\n\nयह सब संयोग पर निर्भर है। हम नहीं जानते कि हम कब मरेंगे, और हम किसी भी समय आकस्मिक रूप से मर सकते हैं। किन्तु जो भक्ति-योगी है, जो कृष्णभावनामृत में स्थापित है, उसके लिए संयोग का कोई प्रश्न नहीं। वह सदा निश्चिन्त रहता है।\n\nnaite sṛtī pārtha jānan\n\nyogī muhyati kaścana\n\ntasmāt sarveṣu kāleṣu\n\nyoga-yukto bhavārjuna\n\n\"हे अर्जुन, जो भक्त इन दोनों मार्गों को जानते हैं, वे कभी मोहित नहीं होते। अतः सदा भक्ति में स्थिर रहो।\" (गीता 8.27)\n\nयह पहले ही निश्चित किया जा चुका है कि मृत्यु के समय, यदि कोई श्रीकृष्ण का स्मरण कर सके, तो वह तत्क्षण श्रीकृष्ण के धाम में स्थानान्तरित हो जाता है।\n\nanta-kāle ca mām eva\n\nsmaran muktvā kalevaram\n\nyaḥ prayāti sa mad-bhāvaṁ\n\nyāti nāsty atra saṁśayaḥ\n\nabhyāsa-yoga-yuktena\n\ncetasā nānya-gāminā\n\nparamaṁ puruṣaṁ divyaṁ\n\nyāti pārthānucintayan\n\n\"और जो कोई मृत्यु के समय केवल मेरा ही स्मरण करते हुए अपनी देह त्यागता है, वह तत्क्षण मेरे स्वभाव को प्राप्त होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ध्यान करता है, और जिसका मन निरन्तर मेरे स्मरण में संलग्न रहता है, मार्ग से अविचलित रहकर, वह, हे पार्थ [अर्जुन], निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है।\" (गीता 8.5, 8.8) श्रीकृष्ण का ऐसा ध्यान अत्यन्त कठिन प्रतीत हो सकता है, किन्तु ऐसा है नहीं। यदि कोई हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे महामन्त्र का जप करके कृष्णभावनामृत का अभ्यास करे, तो उसकी शीघ्र सहायता होगी। श्रीकृष्ण तथा उनका नाम अभिन्न हैं, और श्रीकृष्ण तथा उनका दिव्य धाम भी अभिन्न हैं। ध्वनि-कम्पन द्वारा हम श्रीकृष्ण को अपने साथ संगति में रख सकते हैं। यदि, उदाहरणार्थ, हम मार्ग पर हरे कृष्ण का जप करें, तो हम देखेंगे कि श्रीकृष्ण हमारे साथ जा रहे हैं, ठीक जैसे जब हम ऊपर देखकर सिर के ऊपर चन्द्रमा को देखते हैं, तो हमें प्रतीत होता है कि वह भी हमारे साथ जा रहा है। यदि श्रीकृष्ण की निम्न ऊर्जा हमारे साथ जाती प्रतीत हो सकती है, तो जब हम उनके नामों का जप करते हैं तब क्या स्वयं श्रीकृष्ण का हमारे साथ होना सम्भव नहीं? वे हमारी संगति करेंगे, किन्तु उनकी संगति में रहने के लिए हमें योग्य होना होगा। तथापि, यदि हम सदा श्रीकृष्ण के चिन्तन में निमग्न रहें, तो हमें निश्चिन्त रहना चाहिए कि श्रीकृष्ण सदा हमारे साथ हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु प्रार्थना करते हैं,\n\nnāmnām akāri bahudhā nija-sarva-śaktis\n\ntatrārpitā niyamitaḥ smaraṇe na kālaḥ\n\netādṛśī tava kṛpā bhagavan mamāpi\n\ndurdaivam īdṛśam ihājani nānurāgaḥ\n\n\"हे मेरे प्रभु! आपका पवित्र नाम ही जीवों पर समस्त आशीर्वाद प्रदान कर सकता है, और इसीलिए आपके कृष्ण तथा गोविन्द जैसे सैकड़ों-करोड़ों नाम हैं। इन दिव्य नामों में आपने अपनी समस्त दिव्य ऊर्जाएँ निवेशित कर दी हैं, और इन पवित्र नामों के जप के लिए कोई कठोर एवं अटल नियम नहीं है। हे मेरे प्रभु! आपने अपने पवित्र नामों द्वारा अपने तक पहुँचना इतना सरल बना दिया है, किन्तु मैं इतना अभागा हूँ कि उनके प्रति मेरा कोई अनुराग नहीं।\" (शिक्षाष्टक 2)\n\nकेवल जप के द्वारा ही हम श्रीकृष्ण की व्यक्तिगत संगति के समस्त लाभ पा सकते हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु, जिन्हें न केवल एक सिद्ध आत्मा अपितु स्वयं श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है, ने यह बताया है कि इस कलियुग में, यद्यपि मनुष्यों के पास आत्म-साक्षात्कार की कोई वास्तविक सुविधा नहीं है, तथापि श्रीकृष्ण इतने कृपालु हैं कि उन्होंने इस शब्द (ध्वनि-अवतार) को इस युग की साक्षात्कार-विधि, अर्थात् युग-धर्म के रूप में प्रयोग किए जाने हेतु प्रदान किया है। इस विधि के लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं; हमें संस्कृत जानने की भी आवश्यकता नहीं। हरे कृष्ण के कम्पन इतने सामर्थ्यवान् हैं कि कोई भी, संस्कृत के किसी भी ज्ञान के बिना, तत्क्षण उनका जप आरम्भ कर सकता है।\n\nvedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva\n\ndāneṣu yat puṇya-phalaṁ pradiṣṭam\n\natyeti tat sarvam idaṁ viditvā\n\nyogī paraṁ sthānam upaiti cādyam\n\n\"जो व्यक्ति भक्ति का मार्ग स्वीकार करता है, वह *वेदों* के अध्ययन, कठोर यज्ञों के सम्पादन, दान देने, अथवा दार्शनिक एवं सकाम कर्मों के अनुसरण से प्राप्त होने वाले फलों से वंचित नहीं रहता। अन्त में वह परम धाम को प्राप्त करता है।\" (गीता 8.28) यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि समस्त वैदिक शिक्षाओं का प्रयोजन जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति—भगवद्धाम लौटना—है। समस्त देशों के समस्त शास्त्र इसी लक्ष्य की ओर इंगित करते हैं। यह समस्त धार्मिक सुधारकों अथवा आचार्यों का भी सन्देश रहा है। पश्चिम में, उदाहरणार्थ, प्रभु ईसा मसीह ने यही सन्देश फैलाया। इसी प्रकार, भगवान् बुद्ध एवं मुहम्मद ने भी। कोई हमें यह सलाह नहीं देता कि हम यहाँ इस भौतिक जगत् में अपना स्थायी निवास बना लें। देश, काल एवं परिस्थिति के अनुसार, तथा शास्त्रीय आदेश के अनुसार छोटे-छोटे भेद हो सकते हैं, किन्तु यह मुख्य सिद्धान्त कि हम इस भौतिक जगत् के लिए नहीं अपितु आध्यात्मिक जगत् के लिए बने हैं, समस्त प्रामाणिक दिव्यवादियों द्वारा स्वीकार किया जाता है। हमारी आत्मा की अन्तर्तम इच्छाओं की तृप्ति के समस्त संकेत श्रीकृष्ण के उन जन्म-मृत्यु से परे लोकों की ओर इंगित करते हैं।"}
