{"ref": "iso/1", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/1/", "verse_text": "", "devanagari": "> ॐ ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।\n> तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥१॥", "synonyms": "*ईश*—भगवान् द्वारा; *आवास्यम्*—नियन्त्रित; *इदम्*—यह; *सर्वम्*—सब; *यत् किञ्च*—जो भी; *जगत्याम्*—ब्रह्माण्ड के भीतर; *जगत्*—जो कुछ भी चर अथवा अचर है; *तेन*—उनके द्वारा; *त्यक्तेन*—पृथक् रखा गया अंश; *भुञ्जीथाः*—तुम्हें स्वीकार करना चाहिए; *मा*—मत; *गृधः*—प्राप्त करने का प्रयास करो; *कस्य स्वित्*—किसी अन्य की; *धनम्*—सम्पत्ति।", "translation": "**ब्रह्माण्ड के भीतर जो कुछ भी चर और अचर है, वह सब भगवान् द्वारा नियन्त्रित है और उन्हीं का है। अतः मनुष्य को केवल अपने लिए आवश्यक वस्तुएँ ही स्वीकार करनी चाहिए, जो उसके *भाग* के रूप में निर्धारित हैं, और अन्य वस्तुओं को स्वीकार नहीं करना चाहिए, यह भली-भाँति जानते हुए कि वे किसकी हैं।**", "purport": "वैदिक ज्ञान अभ्रान्त है, क्योंकि यह स्वयं भगवान् से आरम्भ होकर आध्यात्मिक गुरुओं की पूर्ण गुरु-परम्परा द्वारा चला आता है। वैदिक ज्ञान दिव्य स्रोतों से प्राप्त होता है, और प्रथम शब्द स्वयं भगवान् ने कहा था। भगवान् द्वारा कहे गये शब्द अपौरुषेय कहलाते हैं, अर्थात् वे इस लौकिक जगत् के किसी व्यक्ति द्वारा प्रदत्त नहीं हैं। लौकिक जगत् के जीव में चार दोष होते हैं: 1. वह भूल अवश्य करता है, 2. वह कभी-कभी भ्रम में अवश्य पड़ता है, 3. वह दूसरों को ठगने का प्रयत्न करता है, और 4. वह अपूर्ण इन्द्रियों से युक्त है। अपूर्णता के इन चार लक्षणों के साथ कोई सर्वव्यापी ज्ञान के विषय में पूर्ण जानकारी नहीं दे सकता। वेद इस प्रकार के नहीं माने जाते।\n\nवैदिक ज्ञान सर्वप्रथम प्रथम सृजित जीव ब्रह्मा के हृदय में प्रदान किया गया, और ब्रह्मा ने अपनी ओर से यह ज्ञान अपने पुत्रों और शिष्यों में प्रसारित किया, जिन्होंने इतिहास-क्रम में इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। भगवान् पूर्णम्, अर्थात् सर्व-पूर्ण हैं, अतः उनके भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन होने की कोई सम्भावना नहीं है, जबकि जीव और जड़ पदार्थ सभी प्रकृति के नियमों द्वारा, और इस प्रकार अन्ततः भगवान् की शक्ति द्वारा, नियन्त्रित हैं। यह ईशोपनिषद् यजुर्वेद का अंग है, और इस रूप में इसमें ब्रह्माण्ड के भीतर विद्यमान समस्त वस्तुओं के स्वामित्व की जानकारी निहित है। इस बात की पुष्टि भगवद्गीता के सातवें अध्याय में होती है, जहाँ परा और अपरा प्रकृति की चर्चा है: प्रकृति के तत्त्व — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — सब भगवान् की अपरा अथवा भौतिक शक्ति के अन्तर्गत हैं, जबकि जीव, अर्थात् चेतन शक्ति, भगवान् की परा प्रकृति, श्रेष्ठ शक्ति है।\n\nदोनों प्रकृतियाँ अथवा शक्तियाँ भगवान् से ही उद्भूत हैं, और अन्ततः जो कुछ विद्यमान है, उस सबके नियन्ता वे ही हैं। ब्रह्माण्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो परा अथवा अपरा प्रकृति के अन्तर्गत न हो, अतएव प्रत्येक वस्तु परम पुरुष के स्वामित्व के अधीन है। परम पुरुष, परम भगवान्, पूर्ण पुरुष होने के कारण अपनी विभिन्न शक्तियों द्वारा सब कुछ समायोजित करने की पूर्ण और सम्पूर्ण बुद्धि रखते हैं। परम पुरुष की तुलना प्रायः अग्नि से की जाती है, और प्रत्येक वस्तु की — चेतन और जड़ की — अग्नि के ताप और प्रकाश से। जैसे अग्नि ताप और प्रकाश के रूप में ऊर्जा वितरित करती है, वैसे ही भगवान् अपनी शक्ति को विभिन्न रूपों में प्रकट करते हैं। और वे ही सबके चरम नियन्ता, पालक और अधिष्ठाता बने रहते हैं।\n\nवे समस्त शक्तियों से परिपूर्ण हैं, सब कुछ के ज्ञाता हैं, सबके हितैषी हैं, और समस्त अचिन्त्य ऐश्वर्यों — शक्ति, धन, यश, सौन्दर्य, ज्ञान और वैराग्य — से पूर्ण हैं। अतः मनुष्य को इतना बुद्धिमान होना चाहिए कि वह जाने कि भगवान् के अतिरिक्त कोई किसी वस्तु का स्वामी नहीं है; उसे केवल वही वस्तुएँ स्वीकार करनी चाहिए जो भगवान् ने उसके भाग के रूप में निर्धारित की हैं। उदाहरणार्थ, गाय दूध देती है, किन्तु वह स्वयं वह दूध नहीं पीती। उसका दूध मनुष्य के भोजन के रूप में नियत है। गाय घास-फूस खाती है, किन्तु अपना दूध नहीं पीती। ऐसी ही भगवान् की व्यवस्था है, और हमें उन वस्तुओं से सन्तुष्ट रहना चाहिए जो उन्होंने अत्यन्त कृपापूर्वक हमारे लिए निर्धारित की हैं।\n\nहमें सदा यह विचार करना चाहिए कि जिन वस्तुओं पर हमारा अधिकार है, वे वास्तव में किसकी हैं। उदाहरण के लिए हमारा निवास-गृह लीजिए, जो मिट्टी, लकड़ी, पत्थर, लोहे, सीमेंट तथा ऐसी ही अनेक अन्य भौतिक वस्तुओं से बना है। यदि हम श्री ईशोपनिषद् की दृष्टि से विचार करें, तो हमें जानना होगा कि उपर्युक्त निर्माण-सामग्रियों में से कोई भी हम स्वयं उत्पन्न नहीं कर सकते। हम केवल उन्हें एकत्र करके अपने श्रम से उन्हें विभिन्न रूपों में रूपान्तरित कर सकते हैं। कोई श्रमिक केवल इसलिए किसी वस्तु का स्वामी होने का दावा नहीं कर सकता कि उसने उसे बनाने के लिए कठोर परिश्रम किया है। आज के समाज में श्रमिकों और पूँजीपतियों के बीच सदा यह बड़ा विवाद चलता रहता है। इस विवाद ने अब अन्तर्राष्ट्रीय रूप ले लिया है, और संसार संकट में है।\n\nमनुष्य गुर्राते हुए कुत्ते-बिल्लियों की भाँति शत्रुता में एक-दूसरे के सम्मुख खड़े हैं। श्री ईशोपनिषद् कुत्ते-बिल्लियों को परामर्श नहीं दे सकती, किन्तु वह प्रामाणिक आचार्यों, अर्थात् पवित्र शिक्षकों के माध्यम से मनुष्य तक भगवान् का सन्देश पहुँचाती है। और मानव-जाति श्री ईशोपनिषद् से यह वैदिक प्रज्ञा ग्रहण कर सकती है कि किसी को भौतिक सम्पत्ति के लिए कलह नहीं करना चाहिए। मनुष्य को भगवान् की कृपा से जो भी सुविधाएँ प्राप्त हों, उनसे सन्तुष्ट रहना चाहिए। यदि साम्यवादी अथवा पूँजीवादी अथवा कोई अन्य दल प्रकृति के साधनों पर, जो पूर्णतः भगवान् की सम्पत्ति हैं, स्वामित्व का दावा करे, तो शान्ति नहीं हो सकती। पूँजीपति केवल राजनीतिक दाँव-पेच से साम्यवादी को दबा नहीं सकता, और न ही साम्यवादी चुराई हुई रोटी के लिए लड़कर पूँजीपति को परास्त कर सकता है।\n\nयदि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्वामित्व को स्वीकार नहीं करते, तो जिस सम्पत्ति को वे अपनी बताते हैं वह सब चुराई हुई है, और इसलिए वे प्रकृति के नियमों द्वारा दण्ड के भागी होंगे। बम साम्यवादियों और पूँजीवादियों दोनों के हाथ में है, और यदि दोनों परमेश्वर के स्वामित्व को स्वीकार नहीं करते, तो यह सुनिश्चित है कि अन्ततः वह बम दोनों दलों का विनाश कर देगा। अतएव अपनी रक्षा के लिए दोनों को श्री ईशोपनिषद् के उपदेश का पालन करना होगा, और इस प्रकार संसार में शान्ति लानी होगी। मनुष्य कुत्ते-बिल्लियों की भाँति कलह करने के लिए नहीं हैं। उन्हें इतना बुद्धिमान होना चाहिए कि वे मानव-जीवन के महत्त्व को समझें और मानव-जीवन के लक्ष्य को जानें।\n\nवैदिक साहित्य मानवता के लिए है, कुत्ते-बिल्लियों के लिए नहीं। कुत्ते-बिल्लियाँ भोजन के लिए अन्य पशुओं को मार सकते हैं और इसके लिए उन पर पाप का कोई प्रश्न नहीं उठता। किन्तु यदि मनुष्य अपनी अनियन्त्रित स्वाद-लोलुपता की तृप्ति के लिए किसी पशु का वध करता है, तो वह प्रकृति के नियमों को भंग करने का उत्तरदायी है, और इसलिए उसे दण्ड भोगना ही होगा। मनुष्यों के लिए जीवन का एक मानदण्ड है जो पशुओं पर लागू नहीं हो सकता। बाघ चावल, गेहूँ या गाय का दूध नहीं खाता, क्योंकि उसे उसका भोजन-भाग पशु-आहार के रूप में दिया गया है। ऐसे अनेक पशु-पक्षी हैं जो या तो शाकाहारी हैं या मांसाहारी, किन्तु उनमें से कोई भी प्रकृति के उन नियमों का उल्लंघन नहीं करता जो भगवान् की इच्छा से नियत हुए हैं।\n\nजीवों में — चाहे पशु हों, पक्षी हों या सरीसृप — प्रकृति के नियमों का कठोर पालन होता है, इसलिए उनके लिए पाप का कोई प्रश्न नहीं है, और न ही वैदिक उपदेश उनके लिए हैं। अतः केवल मानव-जीवन ही उत्तरदायित्व का जीवन है। यह सोचना भी भूल है कि केवल शाकाहारी बन जाने से मनुष्य प्रकृति के नियमों के उल्लंघन से बच सकता है। वनस्पतियों में भी जीवन है। एक जीवन दूसरे जीव का भोजन बनने के लिए है — यही प्रकृति का नियम है। मनुष्य को कट्टर शाकाहारी होने का गर्व नहीं करना चाहिए। पशुओं में भगवान् को पहचानने योग्य विकसित चेतना नहीं होती, किन्तु मनुष्य इतना बुद्धिमान अवश्य है कि वह वैदिक साहित्य से शिक्षा ग्रहण करे, और इस प्रकार जाने कि प्रकृति के नियम किस प्रकार कार्य कर रहे हैं, तथा उस ज्ञान से लाभ उठाये।\n\nयदि मनुष्य वैदिक साहित्य के उपदेशों की उपेक्षा करता है, तो उसका जीवन अत्यन्त संकटपूर्ण है। अतएव मनुष्य के लिए अपेक्षित है कि वह परमेश्वर के प्रभुत्व को स्वीकार करे। उसे भगवान् का भक्त होना चाहिए। उसे सब कुछ भगवान् की सेवा में अर्पित करना चाहिए और भगवान् को अर्पित भोजन के अवशेष ही ग्रहण करने चाहिए। इससे वह अपना कर्तव्य उचित रूप से सम्पन्न करने में समर्थ होगा। भगवद्गीता में भगवान् स्वयं कहते हैं कि वे शुद्ध भक्त के हाथों से शाकाहारी भोजन स्वीकार करते हैं। अतः मनुष्य को न केवल कट्टर शाकाहारी बनना चाहिए, अपितु भगवान् का भक्त भी बनना चाहिए, अपना समस्त भोजन भगवान् को अर्पित करना चाहिए, और तभी प्रसादम्, अर्थात् भगवान् की कृपा, ग्रहण करनी चाहिए।\n\nऐसा भक्त मानव-जीवन का कर्तव्य उचित रूप से सम्पन्न कर सकता है। जो ऐसा नहीं करते, वे केवल पाप ही खा रहे हैं, और इस प्रकार वे विविध प्रकार के क्लेशों के भागी होंगे, जो विभिन्न पापों के फल हैं। पाप की जड़ है भगवान् के स्वामित्व को स्वीकार न करते हुए प्रकृति के नियमों की जान-बूझकर की गई अवज्ञा। प्रकृति के नियमों की अवज्ञा अथवा भगवान् की आज्ञा की अवज्ञा मनुष्य का विनाश कर देगी। दूसरी ओर, यदि कोई संयत-बुद्धि है और प्रकृति के नियमों को जानता है, तथा अनावश्यक आसक्ति या द्वेष से प्रभावित नहीं होता, तो वह निश्चय ही भगवान् द्वारा पुनः स्वीकार किया जायेगा, और इस प्रकार भगवद्धाम, अपने नित्य घर, वापस जाने का अधिकारी बन जायेगा।"}
{"ref": "iso/2", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/2/", "verse_text": "", "devanagari": "> कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः।\n> एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥", "synonyms": "*कुर्वन्*—निरन्तर करते हुए; *एव*—इस प्रकार; *इह*—इस जीवन-काल में; *कर्माणि*—कर्म; *जिजीविषेत्*—मनुष्य को जीने की इच्छा करनी चाहिए; *शतम्*—एक सौ; *समाः*—वर्ष; *एवम्*—इस प्रकार जीते हुए; *त्वयि*—तुम पर; *न*—नहीं; *अन्यथा*—विकल्प; *इतः*—इस मार्ग से; *अस्ति*—है; *न*—नहीं; *कर्म*—कर्म; *लिप्यते*—बँध सकता है; *नरे*—मनुष्य पर।", "translation": "**यदि मनुष्य निरन्तर उसी रीति से कर्म करता रहे, तो वह सैकड़ों वर्ष जीने की आकांक्षा कर सकता है, क्योंकि इस प्रकार का कर्म उसे *कर्म* के नियम में नहीं बाँधेगा। और मनुष्य के लिए इस मार्ग का कोई विकल्प नहीं है।**", "purport": "कोई मरना नहीं चाहता, और हर कोई जब तक खींच सके तब तक जीना चाहता है। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत रूप में ही नहीं, अपितु सामूहिक रूप में भी — समुदाय, समाज और राष्ट्र में — दिखाई देती है। जीवों के प्रत्येक वर्ग में जीवन के लिए कठोर संघर्ष चलता है, और वेद कहते हैं कि जीव के लिए यह सर्वथा स्वाभाविक है। जीव स्वभाव से नित्य है, किन्तु भौतिक अस्तित्व में बन्धन के कारण उसे एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना पड़ता है। यह प्रक्रिया आत्मा का देहान्तरण कहलाती है। इस देहान्तरण को कर्म-बन्धन भी कहा जाता है, अर्थात् अपने ही कर्म से बँधना। जीव को अपनी जीविका के लिए कर्म करना पड़ता है, क्योंकि यही भौतिक प्रकृति का नियम है; और यदि वह अपने विशेष जीवन के विहित कर्तव्यों के अनुसार कर्म नहीं करता, तो वह प्रकृति के नियम का उल्लंघन करता है और अपने को जन्म-मृत्यु के चक्र में अधिकाधिक बाँध लेता है।\n\nजन्म-मृत्यु का चक्र मानव रूप के अतिरिक्त अन्य जीवन-रूपों में भी विद्यमान है। किन्तु जब जीव को मानव जीवन का अवसर मिलता है, तो यही उसके लिए कर्म के नियम की शृंखला से मुक्त होने का अवसर है। कर्म, अकर्म और विकर्म — इन सिद्धान्तों का भगवद्गीता में अत्यन्त स्पष्ट वर्णन है। प्रकट शास्त्रों में उल्लिखित विहित कर्तव्यों के अनुसार किए गए कार्य कर्म कहलाते हैं। जो कार्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करते हैं, वे अकर्म कहलाते हैं। और जो कार्य अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करके किए जाते हैं और इस प्रकार मनुष्य को जीवन की निम्नतर योनियों की ओर ले जाते हैं, वे विकर्म कहलाते हैं। कार्यों की इन तीन कोटियों में से बुद्धिमान मनुष्य उसी को चुनते हैं, जो कर्म के आगे के बन्धन के चक्र से मुक्त कर दे।\n\nसाधारण मनुष्य अच्छे कर्म करना चाहते हैं ताकि उन्हें मान्यता मिले और वे इस संसार में या स्वर्ग में जीवन की कोई प्रतिष्ठा प्राप्त करें; किन्तु अधिक उन्नत मनुष्य कर्म की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से पूर्णतः मुक्त होना चाहते हैं। बुद्धिमान मनुष्य भली-भाँति जानते हैं कि अच्छे और बुरे — दोनों ही कर्म जीवन के भौतिक दुःखों के समान रूप से कारण हैं। अस्तु, वे ऐसा कर्म करने का प्रयत्न करते हैं जो उन्हें अच्छे और बुरे कर्मों के फलों से मुक्त कर दे। अच्छे और बुरे कर्म से इस मुक्ति का निश्चय यहाँ श्री ईशोपनिषद् में किया गया है। श्री ईशोपनिषद् के उपदेश की और भी अच्छी व्याख्या भगवद्गीता में मिलती है, जिसे कभी-कभी गीतोपनिषद् — समस्त उपनिषदों का सार — कहा जाता है। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वैदिक साहित्य में उल्लिखित विहित कर्तव्यों का आरम्भ किए बिना कोई भी नैष्कर्म्य या अकर्म की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता।\n\nवैदिक साहित्य मनुष्य की कार्य-शक्ति को इस प्रकार नियमित कर सकता है कि वह क्रमशः परम पुरुष की सत्ता का अनुभव कर सके। जब मनुष्य भगवान् की सत्ता का अनुभव कर लेता है, तो समझना चाहिए कि उसने विधेयात्मक ज्ञान की अवस्था प्राप्त कर ली है। जीवन की इस शुद्ध अवस्था में, जहाँ प्रकृति के गुण — सत्त्व, रज और तम — कार्य नहीं कर सकते, मनुष्य नैष्कर्म्य के आधार पर कर्म करने में समर्थ हो जाता है, अर्थात् ऐसा कर्म जो जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं बाँधता। वस्तुतः किसी को भगवान् की भक्ति करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना है। किन्तु जीवन की निम्न अवस्था में मनुष्य न तो तुरन्त भक्ति के कार्य अपना सकता है, न ही फलदायी कर्म को पूर्णतः रोक सकता है।\n\nबद्धजीव इन्द्रियतृप्ति के लिए — अपने तात्कालिक या विस्तारित स्वार्थ के लिए — कर्म करने का अभ्यस्त है। साधारण मनुष्य अपने इन्द्रियभोग के लिए कर्म करना चाहता है, और जब इन्द्रियभोग का यह सिद्धान्त व्यक्ति से बढ़कर सामूहिक समाज, राष्ट्र या समूची मानवता तक विस्तृत हो जाता है, तब वह परोपकारवाद, समाजवाद, साम्यवाद, राष्ट्रवाद, मानवतावाद आदि विविध आकर्षक नाम धारण कर लेता है। ये “वाद” निश्चय ही कर्म-बन्धन के — अपने ही कर्म के बन्धन के — अत्यन्त आकर्षक रूप हैं, किन्तु श्री ईशोपनिषद् का वैदिक उपदेश यह है: यदि आप वास्तव में उपर्युक्त किसी भी वाद के लिए जीते हैं, तो उसे ईश्वर-केन्द्रित बनाइए। गृहस्थ, परोपकारी, समाजवादी, साम्यवादी, राष्ट्रवादी या मानवतावादी बनने में कोई हानि नहीं — किन्तु तभी, जब ऐसे सभी कार्य ईशावास्य अर्थात् ईश्वर-केन्द्रित धारणा के सम्बन्ध में सम्पन्न किए जाएँ।\n\nईश्वर-केन्द्रित कार्यों का मूल्यांकन भगवद्गीता में इतना उच्च किया गया है कि उनका थोड़ा-सा अंश भी मनुष्य को सबसे बड़े संकट से बचा सकता है। जीवन का सबसे बड़ा संकट है — पुनः जन्म-मृत्यु के विकास-चक्र में नीचे फिसल जाना। यदि किसी प्रकार मनुष्य अपने मानव जीवन-रूप द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक अवसर को चूक जाता है और इस प्रकार पुनः विकास-चक्र में फिसल जाता है, तो इसे सर्वाधिक शोचनीय घटना माननी चाहिए — यद्यपि मूर्ख मनुष्य अपनी दोषपूर्ण इन्द्रियों के कारण इसे देख नहीं पाता। अतः श्री ईशोपनिषद् हमें परामर्श देती है कि हम अपनी शक्ति ईशावास्य भाव में लगाएँ, और उस संलग्नता में हम अनेकानेक वर्षों तक जीने की कामना कर सकते हैं। अन्यथा मनुष्य का दीर्घ जीवन उस वृक्ष से उत्तम नहीं, जो स्वयं भी एक जीव है और जो सैकड़ों वर्षों तक जीता है।\n\nवृक्षों की भाँति दीर्घकाल तक जीने में, धौंकनी की भाँति साँस लेने में, सूअर और कुत्ते की भाँति सन्तान उत्पन्न करने में, या ऊँट की भाँति खाने में कोई सार नहीं। ईश्वर-केन्द्रित कार्यों से युक्त विनम्र जीवन भी ईश्वर से रहित तथाकथित परोपकारवाद या समाजवाद के विराट प्रपंच से कहीं अधिक मूल्यवान है। जब परोपकार जैसे कार्य श्री ईशोपनिषद् की भावना में सम्पन्न किए जाते हैं, तब उनमें से प्रत्येक कर्मयोग का रूप बन जाता है, जैसा कि भगवद्गीता में अनुशंसित है। और यह कर्ता को जन्म-मृत्यु की विकास-प्रक्रिया के संकटों से सुरक्षित रखता है। ऐसे ईश्वर-केन्द्रित कार्य अधूरे रह जाने पर भी कर्ता के लिए हितकर हैं, क्योंकि वे उसे अगले जन्म में मानव जीवन-रूप सुनिश्चित कर देंगे। इस रीति से उसे मुक्ति-पथ पर अपनी स्थिति सुधारने का एक और अवसर मिल सकता है।"}
{"ref": "iso/3", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/3/", "verse_text": "", "devanagari": "> असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः।\n> ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥३॥", "synonyms": "*असुर्याः*—असुरों के लिए नियत; *नाम*—इस नाम से प्रसिद्ध; *ते*—वे; *लोकाः*—लोक; *अन्धेन*—अज्ञान द्वारा; *तमसा*—अन्धकार द्वारा; *आवृताः*—आच्छादित; *तान्*—वहाँ; *ते*—वे; *प्रेत्य*—मृत्यु के पश्चात्; *अभिगच्छन्ति*—प्रवेश करते हैं; *ये*—जो भी; *के*—प्रत्येक; *च*—और; *आत्म-हनः*—आत्मा का हन्ता; *जनाः*—व्यक्ति।", "translation": "**आत्मा का हन्ता, चाहे वह कोई भी हो, उन लोकों में अवश्य प्रवेश करता है जो श्रद्धाहीनों के जगत् के रूप में जाने जाते हैं, जो अन्धकार तथा अज्ञान से परिपूर्ण हैं।**", "purport": "मनुष्य-जीवन पशु-जीवन से अपने गुरुतर उत्तरदायित्वों के कारण भिन्न है। जो इन उत्तरदायित्वों के प्रति सजग हैं और उसी भाव से कर्म करते हैं, वे सुर अर्थात् देवस्वभाव वाले कहलाते हैं। और जो या तो इन उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करते हैं या जिन्हें इनकी कोई जानकारी नहीं है, वे असुर कहलाते हैं। समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्यों के केवल ये ही दो प्रकार हैं। ऋग्वेद में कहा गया है कि सुरगण सदा परमेश्वर विष्णु के चरणकमलों को ही लक्ष्य बनाते हैं और तदनुसार आचरण करते हैं। उनके मार्ग सूर्य-पथ के समान प्रकाशित हैं। बुद्धिमान मनुष्यों को सदा स्मरण रखना चाहिए कि शरीर का यह विशेष रूप आत्मा के लाखों-करोड़ों वर्षों के देहान्तरण के विकास-क्रम के पश्चात् प्राप्त होता है।\n\nइस भौतिक जगत् की तुलना कभी-कभी समुद्र से की जाती है, और इस मानव-शरीर की तुलना एक सुदृढ़ नौका से, जो उस समुद्र को पार करने के लिए बनी है। वैदिक शास्त्र तथा आचार्य — सन्त शिक्षक — कुशल नाविक के समान हैं, और मानव-शरीर की सुविधाएँ अनुकूल वायु के समान, जो नौका को सहज रूप से अभीष्ट गन्तव्य तक पहुँचा सकती हैं। यदि इतनी सारी सुविधाओं के रहते हुए भी कोई व्यक्ति अपने मानव-जीवन का पूर्ण उपयोग आत्म-साक्षात्कार के लिए नहीं करता, तो ऐसे असुर को आत्म-हन अर्थात् आत्मा का हन्ता मानना चाहिए। आत्मा का हन्ता अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में प्रवेश कर निरन्तर कष्ट भोगने के लिए बाध्य है, और श्री ईशोपनिषद् यहाँ स्पष्ट शब्दों में यही चेतावनी देती है।\n\nसूकर, कुत्ते, ऊँट, गधे आदि भी हैं, जिनकी आर्थिक आवश्यकताएँ हमारी आवश्यकताओं जितनी ही महत्त्वपूर्ण हैं। किन्तु इन पशुओं की आर्थिक समस्याएँ घृणित परिस्थितियों में हल होती हैं, जबकि मनुष्य को प्रकृति के नियमों द्वारा सुखमय जीवन की समस्त सुविधाएँ दी गई हैं, क्योंकि मानव-जीवन पशु-जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण है। और मनुष्य को सूकर तथा अन्य पशुओं से उत्तम जीवन क्यों दिया गया है? किसी उच्च पदस्थ सेवक को एक साधारण लिपिक की अपेक्षा सुखमय जीवन की सारी सुविधाएँ क्यों दी जाती हैं? उत्तर यह है कि उच्च पदस्थ अधिकारी को उच्चतर स्तर के कर्तव्यों का निर्वाह करना होता है। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में उन पशुओं की अपेक्षा उच्चतर कर्तव्य हैं, जो सदा अपने भूखे पेट भरने के धन्धे में लगे रहते हैं।\n\nफिर भी आधुनिक आत्म-घातिनी सभ्यता ने भूखे पेट की समस्याओं को बढ़ाया ही है। आधुनिक आत्म-घातिनी सभ्यता ने भूखे पेट की समस्याओं को बढ़ाया ही है। हम किसी परिमार्जित पशु — किसी आधुनिक सभ्य मनुष्य — के पास जाते हैं, और वह कहता है कि वह पेट की तृप्ति के लिए काम करना चाहता है तथा आत्म-साक्षात्कार की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु प्रकृति के नियम इतने निर्मम हैं कि पेट के लिए कठोर परिश्रम करने की उसकी उत्कण्ठा के बावजूद, आत्म-साक्षात्कार की सम्भावना को ठुकरा देने के बाद भी, बेकारी का प्रश्न सदा बना रहता है। हमें यह मानव-जीवन गधे, सूकर और कुत्ते की भाँति कठोर परिश्रम करने के लिए नहीं, अपितु जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के लिए दिया गया है।\n\nयदि हम आत्म-साक्षात्कार की चिन्ता नहीं करते, तो प्रकृति के नियम से हमें कठोर परिश्रम करना ही पड़ता है, भले ही हम ऐसा न चाहें। इस युग में मनुष्य को गधे और बैल की भाँति गाड़ी खींचते हुए कठोर परिश्रम करने के लिए विवश किया गया है। श्री ईशोपनिषद् का यह मन्त्र उन प्रदेशों के कुछ उदाहरण प्रकट करता है, जहाँ असुर को कार्य करने के लिए भेजा जाता है। यदि कोई मनुष्य मानव के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वाह में विफल रहता है, तो उसे विवश होकर असुर्य नामक लोकों में अधम योनियों में देहान्तरण करना पड़ता है, ताकि वह अज्ञान और अन्धकार में कठोर परिश्रम करे। भगवद्गीता में भी कहा गया है कि जो अर्ध-आत्म-साक्षात्कृत मनुष्य पूर्व जन्मों में भगवान् तक पहुँचने की प्रक्रिया पूर्ण नहीं कर सके, किन्तु जिन्होंने उसके लिए सच्चा प्रयत्न किया था — दूसरे शब्दों में, जो ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की अनुभूति में सफलता नहीं पा सके — उन्हें शुचि अथवा श्रीमत् कुल में जन्म लेने का अवसर दिया जाता है।\n\nशुचि का अर्थ है आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत ब्राह्मण, और श्रीमत् का अर्थ है वैश्य, अर्थात् वणिक समाज का सदस्य। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे पतित साधकों को उनके पूर्व जन्मों के सच्चे प्रयत्नों के कारण आत्म-साक्षात्कार की साधना का उत्तम अवसर दिया जाता है। यदि पतित साधकों को सम्मानित कुलीन परिवारों में जन्म लेने का अवसर मिलता है, तो जिन्होंने इस प्रयास में पूर्ण सफलता प्राप्त कर ली है, उनकी स्थिति की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ईश्वर-साक्षात्कार का प्रयत्न-मात्र ही यह सुनिश्चित कर देता है कि अगला जन्म किसी कुलीन परिवार में होगा। किन्तु जो ऐसा कोई प्रयत्न ही नहीं करते, जो माया से आवृत रहना चाहते हैं, जो अत्यधिक भौतिकतावादी और भौतिक भोग में आसक्त हैं, उन्हें नरक के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में प्रवेश करना ही पड़ता है — जैसा कि समस्त वैदिक साहित्य में पुष्टि की गई है।\n\nऐसे भौतिकतावादी असुर कभी-कभी धार्मिकता का प्रदर्शन भी करते हैं, जिसका चरम लक्ष्य भौतिक समृद्धि होता है। किन्तु भगवद्गीता उन्हें फटकारती है — ऐसे मनुष्यों के रूप में, जो मिथ्या सिद्धि के बल पर, अज्ञानियों के मतों और भौतिक धन के सहारे महान् कहलाते हैं। आत्म-साक्षात्कार तथा ईशावास्य — भगवान् — की धारणा से रहित ऐसे असुर निश्चय ही घोरतम अन्धकारमय प्रदेशों में प्रवेश करेंगे। निष्कर्ष यह है कि मनुष्य के रूप में हम केवल एक डगमगाते धरातल पर आर्थिक समस्याएँ सुलझाने के लिए ही नहीं हैं, अपितु भौतिक जीवन की उन समस्याओं को भी सुलझाने के लिए हैं, जिनमें प्रकृति की परिस्थितियों ने हमें डाल रखा है।"}
{"ref": "iso/4", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/4/", "verse_text": "", "devanagari": "> अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।\n> तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥४॥", "synonyms": "*अनेजत्*—स्थिर; *एकम्*—एक; *मनसः*—मन की अपेक्षा; *जवीयः*—अधिक तीव्र; *न*—नहीं; *एनत्*—इस परमेश्वर को; *देवाः*—इन्द्र आदि देवता; *आप्नुवन्*—पहुँच सकते हैं; *पूर्वम्*—सबसे पहले; *अर्षत्*—जो सब कुछ जानते हैं; *तत्*—वे; *धावतः*—जो दौड़ रहे हैं; *अन्यान्*—अन्यों को; *अत्येति*—पार कर जाते हैं; *तिष्ठत्*—यद्यपि स्थित; *तस्मिन्*—एक स्थान पर; *अपः*—जल; *मातरिश्वा*—वायु तथा वर्षा को नियन्त्रित करने वाले देवता; *दधाति*—सम्पन्न करते हैं", "translation": "**भगवान् यद्यपि अपने *धाम* में स्थिर हैं, फिर भी वे मन से अधिक वेगवान हैं और दौड़ते हुए अन्य सबको पीछे छोड़ सकते हैं। शक्तिशाली देवता भी उन तक नहीं पहुँच सकते। एक स्थान पर रहते हुए भी वायु और वर्षा प्रदान करने वालों पर उनका नियन्त्रण है। वे उत्कृष्टता में सबसे बढ़कर हैं।**", "purport": "परमेश्वर, जो परम पुरुषोत्तम भगवान् हैं, महानतम दार्शनिक के लिए भी मानसिक कल्पना द्वारा ज्ञेय नहीं हैं। उन्हें केवल उनके भक्त ही उनकी कृपा से जान सकते हैं। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि जो अभक्त दार्शनिक मन के वेग से अथवा वायु के वेग से चल सकता है और सैकड़ों वर्षों तक अन्तरिक्ष में यात्रा कर सकता है, वह भी परम तत्त्व को अपने से अत्यन्त दूर ही पाएगा। जैसा कि उपनिषदों में वर्णित है, परम पुरुषोत्तम भगवान् का अपना दिव्य धाम है, जो कृष्णलोक कहलाता है, जहाँ वे अपनी लीलाओं में निमग्न रहते हैं। किन्तु अपनी अचिन्त्य शक्ति से वे एक ही साथ सृजन-शक्ति के प्रत्येक भाग तक पहुँच सकते हैं। विष्णु पुराण में इस शक्ति की तुलना अग्नि के प्रकाश और ताप से की गई है।\n\nअग्नि एक ही स्थान से अपना प्रकाश और ताप वितरित कर सकती है; इसी प्रकार परम पुरुषोत्तम भगवान् अपने दिव्य धाम में स्थित रहते हुए भी अपनी विभिन्न शक्तियों को सर्वत्र फैला सकते हैं। ऐसी शक्तियाँ असंख्य हैं, किन्तु मुख्यतः उन्हें तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है: अन्तरंगा शक्ति, तटस्था शक्ति और बहिरंगा शक्ति। इनमें से प्रत्येक के सैकड़ों-करोड़ों उपभेद हैं। वायु, प्रकाश, वर्षा आदि प्राकृतिक घटनाओं के संचालन पर नियन्त्रण रखने के लिए जिन अधिष्ठाता देवताओं को सामर्थ्य प्रदान किया गया है, वे सब परम पुरुष की तटस्था शक्ति के अन्तर्गत आते हैं। मनुष्यों सहित समस्त जीव भी भगवान् की तटस्था शक्ति की ही उपज हैं। भौतिक जगत् भगवान् की बहिरंगा शक्ति की सृष्टि है, और आध्यात्मिक आकाश, जहाँ भगवद्धाम स्थित है, उनकी अन्तरंगा शक्ति की अभिव्यक्ति है।\n\nपरमेश्वर की विभिन्न ऊर्जाएँ उनकी विभिन्न शक्तियों के रूप में सर्वत्र विद्यमान हैं। यद्यपि उनमें और उनकी शक्तियों में कोई भेद नहीं है, तथापि यह भ्रान्त निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि इस प्रकार सर्वत्र व्याप्त होने के कारण परमेश्वर का व्यक्तिगत अस्तित्व केवल निराकार ब्रह्म में ही है। मनुष्य अपनी समझने की क्षमता के अनुसार ही निष्कर्ष निकालने के अभ्यस्त हैं। किन्तु परमेश्वर हमारी सीमित बोध-क्षमता के अधीन नहीं हैं। इसी कारण उपनिषदें हमें सावधान करती हैं: कोई भी अपनी सीमित शक्ति से भगवान् तक नहीं पहुँच सकता। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि कोई भी — यहाँ तक कि बड़े-बड़े ऋषि और सुर भी — उन्हें नहीं जान सकते। तो फिर उन असुरों के विषय में क्या कहा जाए, जो भगवान् की रीतियों को समझने के योग्य भी नहीं हैं?\n\nश्री ईशोपनिषद् के चौथे मन्त्र में कहे गए ये सभी शब्द अत्यन्त स्पष्ट रूप से संकेत करते हैं कि परम सत्य अन्ततः परम पुरुष है; अन्यथा उनके साकार स्वरूप के समर्थन में इतनी विविध बातों के उल्लेख की कोई आवश्यकता न होती। भगवान् की शक्तियों के व्यक्तिगत अंशों में यद्यपि स्वयं भगवान् के सभी लक्षण विद्यमान हैं, तथापि उनके कार्य-क्षेत्र सीमित हैं, अतः वे सब सीमित हैं। अंश कभी पूर्ण के समान नहीं होते। फलतः अंश भगवान् की पूर्ण शक्ति का आकलन नहीं कर सकते। मूर्ख और अज्ञानी जीव, जो भगवान् के ही अंश हैं, भौतिक शक्ति के प्रभाव में आकर भगवान् की दिव्य स्थिति के विषय में अटकल लगाने का प्रयत्न करते हैं।\n\nश्री ईशोपनिषद् उन्हें सावधान करती है कि वे भगवान् के स्वरूप के विषय में कोई मानसिक कल्पना न करें। दिव्य तत्त्व को वेदों जैसे श्रेष्ठ स्रोत से जानने का प्रयत्न करना चाहिए, जो दिव्य तत्त्व के ज्ञान में पहले से ही स्थित हैं। पूर्ण समग्र के प्रत्येक अंश को कार्य करने के लिए कोई विशेष शक्ति प्रदान की गई है, और उस अंश द्वारा अपने विशेष कार्यों की विस्मृति ही माया अर्थात् भ्रम कहलाती है। अतएव श्री ईशोपनिषद् ने आरम्भ से ही हमें सावधान किया है कि भगवान् ने हमारे लिए जो भूमिका निर्दिष्ट की है, उसे निभाने में हम सतर्क रहें। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि व्यक्तिगत आत्मा का अपना कोई उपक्रम नहीं है। चूँकि जीव भगवान् का अंश है, उसमें भगवान् का उपक्रम भी अवश्य विद्यमान होगा।\n\nयह बुद्धि रखते हुए कि सब कुछ भगवान् की ही शक्ति है, अपने उपक्रम — अपने सक्रिय स्वभाव — का समुचित उपयोग मनुष्य को उसकी मूल चेतना के पुनर्जागरण की ओर ले जा सकता है, जो माया अर्थात् बहिरंगा शक्ति के संग के कारण खो गई थी। समस्त शक्ति भगवान् से ही प्राप्त होती है; इसलिए प्रत्येक विशेष शक्ति का उपयोग भगवान् की इच्छा को पूर्ण करने में ही होना चाहिए, अन्यथा नहीं। भगवान् को वही जान सकता है जिसने विनम्र भाव अपनाया है। पूर्ण ज्ञान का अर्थ है भगवान् को उनके समस्त पक्षों सहित जानना, उनकी शक्तियों को जानना और यह जानना कि वे शक्तियाँ उनकी इच्छा से किस प्रकार कार्य करती हैं। इन बातों का वर्णन भगवान् ने विशेष रूप से भगवद्गीता में किया है, जो समस्त उपनिषदों का सार है।"}
{"ref": "iso/5", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/5/", "verse_text": "", "devanagari": "> तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके।\n> तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥", "synonyms": "*तत्*—यह परमेश्वर; *एजति*—चलते हैं; *तत्*—वे; *न*—नहीं; *एजति*—चलते हैं; *तत्*—वे; *दूरे*—बहुत दूर; *तत्*—वे; *उ*—भी; *अन्तिके*—अति समीप; *तत्*—वे; *अन्तः*—भीतर; *अस्य*—इसके; *सर्वस्य*—सबके; *तत्*—वे; *उ*—भी; *सर्वस्य*—सबके; *अस्य*—इसके; *बाह्यतः*—बाहर।", "translation": "***परमेश्वर* चलते हैं और नहीं चलते। वे बहुत दूर हैं, किन्तु अत्यन्त निकट भी हैं। वे प्रत्येक वस्तु के भीतर हैं, और फिर वे प्रत्येक वस्तु के बाहर भी हैं।**", "purport": "यहाँ परमेश्वर की अचिन्त्य शक्तियों द्वारा सम्पन्न उनके दिव्य कार्यकलापों की व्याख्या है। भगवान् की अचिन्त्य शक्ति सिद्ध करने के लिए यहाँ परस्पर-विरोधी शब्दों के दो युग्मों का उल्लेख है। वे चलते हैं, और वे नहीं चलते। ये दोनों कथन परस्पर विरोधी हैं। यदि कोई चल सकता है, तो यह कहना अनुचित है कि वह नहीं चल सकता। ये विरोधाभास ईश्वर की अचिन्त्य शक्ति दर्शाते हैं। अपने सीमित ज्ञान-कोष से हम ऐसी बातों को समाहित नहीं कर सकते, इसलिए भगवान् की धारणा हम अपनी सीमित बोध-शक्ति के अनुसार ही बना लेते हैं। मायावाद सम्प्रदाय के निर्विशेषवादी दार्शनिक भगवान् के कार्यकलापों के केवल निर्विशेष पक्ष को स्वीकार करते हैं और उनके साकार स्वरूप का खण्डन करते हैं। किन्तु भागवत सम्प्रदाय भगवान् को दोनों रूपों में — साकार और निराकार — स्वीकार करता है।\n\nऔर भागवतजन उनकी अचिन्त्य शक्तियों को भी स्वीकार करते हैं। अचिन्त्य शक्ति के बिना \"परमेश्वर\" शब्द का कोई अर्थ नहीं रहता। हमें यह मान नहीं लेना चाहिए कि चूँकि हम ईश्वर को अपनी आँखों के सामने नहीं देख सकते, इसलिए भगवान् का कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है। इस प्रकार के तर्क का खण्डन करने के लिए श्री ईशोपनिषद् हमें सचेत करती है कि भगवान् हमसे बहुत दूर हैं, किन्तु हमारे अत्यन्त निकट भी हैं। भगवान् का धाम भौतिक आकाश से परे है। हमारे पास तो भौतिक आकाश को मापने का भी कोई साधन नहीं है। यदि केवल भौतिक आकाश ही हमसे इतनी दूर है, तो उस आध्यात्मिक आकाश की बात ही क्या, जो भौतिक आकाश से सर्वथा परे है? आध्यात्मिक आकाश भौतिक जगत् से अत्यन्त दूर स्थित है — इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी होती है।\n\nकिन्तु इतनी दूर होते हुए भी भगवान् क्षण-भर से भी कम समय में, मन अथवा वायु से भी अधिक प्रबल वेग से, तुरन्त हमारे समक्ष अवतरित हो सकते हैं। वे इतनी शीघ्रता से चल सकते हैं कि कोई उनसे आगे नहीं निकल सकता। इस तथ्य का वर्णन पिछले मन्त्र में किया जा चुका है। किन्तु जब भगवान् इस प्रकार हमारे समक्ष आते हैं, तब हम उनकी उपेक्षा कर देते हैं। मूर्ख लोगों की इस उपेक्षा की भर्त्सना भगवान् ने भगवद्गीता में की है। भगवान् कहते हैं कि मूर्ख लोग उन्हें मरणशील प्राणियों में से एक मानकर उनका उपहास करते हैं। किन्तु वे न तो मरणशील प्राणी हैं, और न ही वे भौतिक प्रकृति से उत्पन्न शरीर लेकर हमारे समक्ष आते हैं।\n\nऐसे अनेक तथाकथित विद्वान हैं जो कहते हैं कि जब भगवान् अवतरित होते हैं, तो वे एक साधारण जीव की भाँति भौतिक शरीर में अवतरित होते हैं। ऐसे मूर्ख मनुष्य भगवान् की अचिन्त्य शक्ति को न जानने के कारण उन्हें साधारण मनुष्य के स्तर पर रख देते हैं। चूँकि भगवान् अचिन्त्य शक्तियों से पूर्ण हैं, वे किसी भी माध्यम से हमारी सेवा स्वीकार कर सकते हैं, और अपनी इच्छा के अनुसार अपनी विभिन्न शक्तियों का रूपान्तरण कर सकते हैं। अविश्वासी तर्क करते हैं कि भगवान् स्वयं अवतार ले ही नहीं सकते, अथवा यदि लेते भी हैं, तो भौतिक शक्ति के किसी रूप में अवतरित होते हैं। यदि हम उनकी अचिन्त्य शक्तियों को वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लें, तो यह तर्क निरस्त हो जाता है। यदि वे भौतिक शक्ति के रूप में हमारे समक्ष प्रकट भी हों, तो भी उनके लिए भौतिक शक्ति को आध्यात्मिक शक्ति में रूपान्तरित कर देना पूर्णतः सम्भव है।\n\nशक्तियों का स्रोत एक ही होने के कारण उन शक्तियों का उपयोग उस शक्तिमान स्रोत की इच्छा के अनुसार यथोचित रीति से किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, भगवान् अर्चा-रूप में प्रकट होते हैं — ऐसे श्रीविग्रहों के रूप में, जो देखने में मिट्टी या पत्थर के बने प्रतीत होते हैं। ये रूप, जो काष्ठ, पाषाण अथवा अन्य किसी पदार्थ से गढ़े जाते हैं, मूर्तिभंजकों की मान्यता के विपरीत जड़ प्रतिमाएँ नहीं हैं। हमारे अपूर्ण भौतिक अस्तित्व की वर्तमान अवस्था में अपनी अपूर्ण दृष्टि के कारण हम परमेश्वर को देख नहीं सकते। तथापि, जो भक्त भौतिक दृष्टि से उनके दर्शन करना चाहते हैं, उन पर भगवान् कृपा करते हैं और तथाकथित भौतिक रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों की सेवा स्वीकार करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि भक्ति के निम्नतम सोपान पर स्थित ऐसे भक्त किसी जड़ प्रतिमा की पूजा कर रहे हैं।\n\nवस्तुतः वे भगवान् की ही पूजा कर रहे हैं, जिन्होंने उनके समक्ष ऐसे विशेष रूप में प्रकट होना स्वीकार किया है, जो उनके लिए सुलभ है। यह अर्चा-रूप पूजक के आदेश अथवा मनमानी के अनुसार गढ़ा हुआ नहीं है। यह अपनी समस्त साज-सामग्री सहित नित्य विद्यमान है। इसका वास्तविक अनुभव एक निष्ठावान भक्त कर सकता है, नास्तिक नहीं। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि भक्त जिस मात्रा में शरणागति करता है, उसी अनुपात में वे उसके साथ व्यवहार करते हैं। वे यह अधिकार सुरक्षित रखते हैं कि जो उनके शरणागत नहीं हैं, उन सबके समक्ष वे स्वयं को प्रकट न करें। अतः शरणागत आत्मा के लिए वे सदा सुलभ हैं, जबकि अशरणागत आत्मा के लिए वे बहुत दूर हैं और उन तक पहुँचा नहीं जा सकता।\n\nइस सन्दर्भ में प्रकट शास्त्रों के दो शब्द महत्त्वपूर्ण हैं: सगुण और निर्गुण — गुणों सहित और गुणों से रहित। सगुण का अर्थ यह नहीं कि भगवान् जब प्रकट होते हैं, तो भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन हो जाते हैं, यद्यपि उनमें गुण होते हैं और वे भौतिक रूप में प्रकट होते हैं। उनके लिए भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों में कोई भेद नहीं है, क्योंकि वे ही इन शक्तियों के स्रोत हैं। वे विभिन्न शक्तियों के नियन्ता हैं, अतः वे हमारी भाँति किसी भी समय उनके प्रभाव में नहीं आ सकते। भौतिक शक्ति उनके निर्देश के अनुसार कार्य करती है; इसलिए वे भौतिक शक्ति का उपयोग अपने प्रयोजन के लिए कर सकते हैं, किन्तु अपनी शक्तियों के किसी भी गुण से कभी प्रभावित हुए बिना।\n\nऔर न ही इस प्रयोजन के लिए वे किसी समय निराकार सत्ता बन जाते हैं। अन्ततः वे ही नित्य रूप हैं — आदि भगवान्। और निर्विशेष स्वरूप, अर्थात् ब्रह्म-ज्योति, उनकी व्यक्तिगत किरणों की आभा है, जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्यदेव की आभा हैं। जब बाल-सन्त प्रह्लाद महाराज अपने नास्तिक पिता के समक्ष थे, तो पिता ने उनसे पूछा, \"कहाँ है तेरा ईश्वर?\" बालक प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि ईश्वर सर्वत्र निवास करते हैं। तब पिता ने क्रुद्ध होकर पूछा कि क्या उसका ईश्वर राजमहल के इस स्तम्भ के भीतर भी है, और बालक ने कहा — हाँ। उसी क्षण उस नास्तिक राजा ने अपने सामने के स्तम्भ को खण्ड-खण्ड कर डाला, और तभी भगवान् उस स्तम्भ के भीतर से नृसिंह (अर्ध-नर, अर्ध-सिंह अवतार) रूप में प्रकट हुए और उन्होंने उस नास्तिक राजा का वध कर दिया।\n\nइसका अर्थ है कि भगवान् प्रत्येक वस्तु के भीतर हैं, जो उनकी विभिन्न शक्तियों से सृजित है। और अपनी अचिन्त्य शक्ति से वे अपने निष्ठावान भक्त पर अनुग्रह करने के लिए किसी भी स्थान पर प्रकट हो सकते हैं। भगवान् नृसिंह स्तम्भ के भीतर से नास्तिक राजा के आदेश से नहीं, अपितु भक्त प्रह्लाद की इच्छा से प्रकट हुए। कोई नास्तिक भगवान् को प्रकट होने का आदेश नहीं दे सकता, किन्तु अपने भक्त पर कृपा करने के लिए भगवान् कहीं भी और सर्वत्र प्रकट हो सकते हैं। भगवद्गीता इसी की पुष्टि करती है — इस कथन में कि भगवान् अविश्वासियों के विनाश और विश्वासियों की रक्षा के लिए अवतरित होते हैं। यों तो किसी अविश्वासी का विनाश करने के लिए भगवान् के पास पर्याप्त शक्तियाँ और प्रतिनिधि हैं, जो यह कार्य कर सकते हैं, किन्तु भक्त पर अनुग्रह करना उनके लिए आनन्ददायक कार्य है, इसीलिए वे अवतार रूप में अवतरित होते हैं।\n\nअतएव वे ऐसा केवल अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए ही करते हैं, किसी अन्य प्रयोजन से नहीं। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि गोविन्द, आदि भगवान्, अपने पूर्ण अंश द्वारा प्रत्येक वस्तु में प्रवेश करते हैं। वे ब्रह्माण्ड में भी प्रवेश करते हैं और ब्रह्माण्ड के परमाणु में भी। वे विराट रूप में बाहर हैं, और अन्तर्यामी रूप में भीतर। अन्तर्यामी रूप में वे हमारे प्रत्येक कर्म के साक्षी हैं, और वे ही हमें हमारे कर्मों का फल कर्मफल के रूप में देते हैं। हम स्वयं भले ही भूल जाएँ कि हमने पूर्व जन्मों में क्या किया था, किन्तु चूँकि भगवान् हमारे कर्मों के साक्षी हैं, हमारे कर्मों का फल सदा विद्यमान रहता है, और हमें उसके प्रतिफल भोगने ही पड़ते हैं। वस्तुतः भीतर और बाहर ईश्वर के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।\n\nसब कुछ उनकी विभिन्न शक्तियों की ही अभिव्यक्ति है, जैसे अग्नि के ताप और प्रकाश; इसका अर्थ है कि विविध शक्तियों में एकत्व है। किन्तु इस एकत्व के होते हुए भी भगवान् अपने साकार रूप में उन समस्त वस्तुओं का भोग करते हैं, जो अंश-रूप क्षुद्र जीवों की क्षुद्र इन्द्रियों के लिए भोग्य हैं।"}
{"ref": "iso/6", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/6/", "verse_text": "", "devanagari": "> यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।\n> सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥६॥", "synonyms": "*यः*—वह जो; *तु*—किन्तु; *सर्वाणि*—समस्त; *भूतानि*—जीव; *आत्मनि*—परमेश्वर के सम्बन्ध में; *एव*—केवल; *अनुपश्यति*—व्यवस्थित रीति से देखता है; *सर्व-भूतेषु*—प्रत्येक जीव में; *च*—और; *आत्मानम्*—परमात्मा को; *ततः*—तत्पश्चात्; *न*—नहीं; *विजुगुप्सते*—किसी से द्वेष करता है।", "translation": "**जो व्यक्ति प्रत्येक वस्तु को परमेश्वर के सम्बन्ध में देखता है, समस्त जीवों को उनके *अंश*-रूप में देखता है, और परमेश्वर को प्रत्येक वस्तु के भीतर देखता है, वह न तो किसी वस्तु से घृणा करता है, न किसी प्राणी से।**", "purport": "यहाँ महाभागवत की व्याख्या है — उस महान् व्यक्तित्व की, जो प्रत्येक वस्तु को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के सम्बन्ध में देखता है। परमेश्वर की उपस्थिति की अनुभूति की तीन अवस्थाएँ हैं: कनिष्ठ अधिकारी, अर्थात् भगवद्-अनुभूति की निम्नतम अवस्था में स्थित व्यक्ति, अपनी विशेष धार्मिक आस्था के अनुसार किसी एक पूजा-स्थल — मन्दिर, गिरजाघर अथवा मस्जिद — में जाता है और शास्त्रीय विधानों के अनुसार वहाँ पूजा करता है। ऐसे भक्त मानते हैं कि भगवान् उसी पूजा-स्थल में हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। ऐसे भक्त यह नहीं पहचान सकते कि भक्ति-पथ में अथवा परमेश्वर की अनुभूति की दृष्टि से कौन किस स्थिति में है। वे नियमित विधि-विधानों का पालन करते हैं और कभी-कभी आपस में झगड़ते भी हैं — एक विशेष प्रकार की उपासना को दूसरी से श्रेष्ठ मानते हुए।\n\nभक्ति की निम्नतम अवस्था में स्थित ये कनिष्ठ अधिकारी भौतिकतावादी भक्त कहलाते हैं, अर्थात् ऐसे भक्त जो आध्यात्मिक धरातल तक पहुँचने के लिए भौतिक सीमा को पार करने का प्रयास-मात्र कर रहे हैं। इन कनिष्ठ अधिकारियों से ऊपर मध्यम अधिकारी हैं — वे भक्त जो भक्ति की मध्यवर्ती अवस्था में हैं। ये मध्यम अधिकारी परमेश्वर के सम्बन्ध में चार सिद्धान्तों का पालन करते हैं, जो इस प्रकार हैं: 1. वे सर्वप्रथम परमेश्वर को देखते हैं; 2. तत्पश्चात् वे भगवान् के भक्तों को देखते हैं; 3. वे उन भोले-भाले लोगों को भी देखते हैं, जिन्हें ईश्वर का कोई ज्ञान नहीं है; और अन्त में, 4. वे उन नास्तिकों को देखते हैं, जिनकी भगवान् में कोई श्रद्धा नहीं है और जो भक्ति-पथ के अनुयायियों से घृणा करते हैं। मध्यम अधिकारी भक्त उपर्युक्त चार वर्गों के प्रति भिन्न-भिन्न व्यवहार करता है।\n\nवह भगवान् को प्रेम का लक्ष्य मानकर उनकी आराधना करता है, और जो भक्ति-पथ पर हैं, उनसे मित्रता करता है। वह भोले-भाले लोगों के हृदयों में सुप्त भगवत्प्रेम जगाने का प्रयत्न करता है, किन्तु उन नास्तिकों के पास नहीं जाता, जो भगवान् के नाम-मात्र का उपहास करते हैं। मध्यम अधिकारी से ऊपर उत्तम अधिकारी भक्त है, जो प्रत्येक वस्तु को परमेश्वर के सम्बन्ध में देखता है। वह नास्तिक और आस्तिक में कोई विशेष भेद नहीं करता, अपितु उनमें से प्रत्येक में ईश्वर का अंश देखता है। वह जानता है कि एक परम विद्वान ब्राह्मण और गली के कुत्ते में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि दोनों ही भगवान् के हैं — यद्यपि भौतिक कर्म के भिन्न-भिन्न गुणों के कारण वे भिन्न-भिन्न शरीरों में हैं।\n\nपरमेश्वर के ब्राह्मण-रूप अंश ने भगवान् द्वारा प्रदत्त अपनी अल्प स्वतन्त्रता का दुरुपयोग नहीं किया है, किन्तु कुत्ते-रूप अंश ने अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग किया है, फलतः प्रकृति के नियम ने उसे दण्डित किया है और वह कुत्ते के अज्ञानमय रूप में बन्दी है। ब्राह्मण और कुत्ते के अपने-अपने कर्मों पर विचार किए बिना उत्तम अधिकारी दोनों का भला करने का प्रयत्न करता है। भगवान् का ऐसा विद्वान भक्त ब्राह्मण और कुत्ते के भौतिक शरीरों से भ्रमित नहीं होता, अपितु वह उन दोनों प्राणियों के भीतर स्थित आध्यात्मिक स्फुलिंग की ओर आकृष्ट होता है। जो लोग एकत्व या बन्धुत्व की भावना के नाम पर उत्तम अधिकारी का अनुकरण तो करते हैं, किन्तु व्यवहार शारीरिक सम्बन्धों के धरातल पर करते हैं, वे मिथ्या परोपकारी हैं।\n\nअतः विश्व-बन्धुत्व की अवधारणा भगवान् के उत्तम अधिकारी भक्त से सीखनी चाहिए, न कि किसी ऐसे मूर्ख व्यक्ति से, जिसे व्यक्तिगत आत्मा तथा परमात्मा — परमेश्वर के उस पूर्ण विस्तार, जो सर्वत्र वास करते हैं — की समुचित दृष्टि प्राप्त नहीं है। श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कि मनुष्य को अवलोकन करना चाहिए, अर्थात् देखना चाहिए। इसका अर्थ है कि पूर्ववर्ती आचार्य — सिद्ध शिक्षक — का अनुसरण करना चाहिए। इस प्रसंग में प्रयुक्त यथार्थ संस्कृत शब्द है अनुपश्यति। अनु का अर्थ है अवलोकन करना। मनुष्य को वस्तुओं को नंगी आँखों से देखने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। नंगी आँख अपनी भौतिक त्रुटियों के कारण कुछ भी ठीक से नहीं देख सकती। जब तक किसी श्रेष्ठ स्रोत से सुना न जाए, तब तक कोई ठीक से देख नहीं सकता।\n\nऔर सर्वोच्च स्रोत है स्वयं भगवान् द्वारा कही गई वैदिक प्रज्ञा। यह सत्य गुरु-परम्परा से चला आ रहा है — भगवान् से ब्रह्मा को, ब्रह्मा से नारद को, नारद से व्यास को, और व्यास से उनके अनेक शिष्यों को। पहले वेदों के सन्देश को लिपिबद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि पूर्व युगों के लोग अधिक बुद्धिमान थे, उनकी स्मरण-शक्ति अधिक तीव्र थी, और वे प्रामाणिक गुरु के मुख से केवल एक बार सुनकर ही निर्देशों का पालन कर सकते थे। वर्तमान में प्रकट शास्त्रों पर अनेक भाष्य हैं, किन्तु उनमें से अधिकांश श्रील व्यासदेव की परम्परा में नहीं हैं, जिन्होंने मूलतः वैदिक प्रज्ञा की शिक्षा दी। श्रील व्यासदेव की अन्तिम, सर्वाधिक पूर्ण एवं उदात्त कृति श्रीमद्भागवत है, जो वेदान्त-सूत्र का यथार्थ भाष्य है।\n\nइसी प्रकार भगवद्गीता है, जो स्वयं भगवान् द्वारा कही गई और जिसे व्यासदेव ने लिपिबद्ध किया। अनेक प्रकट शास्त्रों में ये अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, और कोई भी भाष्य जो गीता अथवा श्रीमद्भागवत के सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं है, अप्रामाणिक है। उपनिषदों, वेदान्त, वेदों, भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत में पूर्ण संगति एवं एकरूपता है। अतएव किसी को भी व्यासदेव की परम्परा के सदस्यों से — अथवा कम-से-कम उन लोगों से, जो भगवान् और उनकी विविध शक्तियों में विश्वास रखते हैं — शिक्षा पाए बिना वेदों के विषय में कोई निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता के अनुसार केवल वही व्यक्ति, जो पहले से मुक्त अवस्था में स्थित है, उत्तम अधिकारी भक्त बन सकता है और प्रत्येक व्यक्ति अथवा प्रत्येक जीव को अपना भाई देख सकता है।\n\nयह दृष्टि उन राजनीतिज्ञों को प्राप्त नहीं हो सकती, जो सदा किसी-न-किसी भौतिक लाभ के पीछे रहते हैं। इस मुक्त अवस्था का अनुकरण (यश अथवा ऐसे ही किसी प्रतिफल के लिए) बाह्य शरीर की सेवा है, आत्मा की सेवा नहीं। ऐसे अनुकरण करने वालों को आध्यात्मिक जगत् की कोई जानकारी नहीं है। उत्तम अधिकारी प्रत्येक प्राणी की आत्मा को देखता है और उसकी आत्म-रूप में सेवा करता है, जिसमें भौतिक पक्ष स्वतः सम्मिलित हो जाता है।"}
{"ref": "iso/7", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/7/", "verse_text": "", "devanagari": "> यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।\n> तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥", "synonyms": "*यस्मिन्*—जिस स्थिति में; *सर्वाणि*—समस्त; *भूतानि*—जीव; *आत्मा*—चित्कण अथवा आध्यात्मिक स्फुलिंग; *एव*—केवल; *अभूत्*—के रूप में विद्यमान; *विजानतः*—जो जानता है उसके; *तत्र*—वहाँ; *कः*—कैसा; *मोहः*—मोह; *कः*—कैसा; *शोकः*—चिन्ता; *एकत्वम्*—गुण में एकत्व; *अनुपश्यतः*—जो प्रामाणिक दृष्टि से देखता है, अथवा जो सदा वैसा ही देखता है उसके।", "translation": "**जो सदा समस्त जीवों को आध्यात्मिक *स्फुलिंगों* के रूप में — गुण की दृष्टि से भगवान् से अभिन्न — देखता है, वह वस्तुओं का यथार्थ ज्ञाता बन जाता है। उसके लिए फिर भ्रम क्या और चिन्ता क्या?**", "purport": "ऊपर वर्णित दो अधिक उन्नत भक्तों के अतिरिक्त कोई भी जीव की आध्यात्मिक स्थिति को सही रूप में नहीं देख सकता। जीव गुण की दृष्टि से परमेश्वर से अभिन्न हैं, जिस प्रकार अग्नि के स्फुलिंग गुण की दृष्टि से अग्नि के स्वभाव से अभिन्न होते हैं। किन्तु मात्रा की दृष्टि से स्फुलिंग अग्नि नहीं हैं। अग्नि में विद्यमान ताप और प्रकाश की मात्रा स्फुलिंगों में विद्यमान ताप और प्रकाश की मात्रा के समान नहीं होती। महाभागवत, अर्थात् महान् भक्त, एकत्व इस अर्थ में देखता है कि सब कुछ परमेश्वर की ही शक्ति है। और चूँकि शक्ति और शक्तिमान में कोई भेद नहीं है, इसलिए एकत्व का बोध होता है। ताप और प्रकाश के बिना अग्नि का कोई अर्थ नहीं, फिर भी विश्लेषण की दृष्टि से ताप और प्रकाश अग्नि से भिन्न हैं।\n\nकिन्तु समन्वय की दृष्टि से ताप, प्रकाश और अग्नि — तीनों एक ही वस्तु हैं। यहाँ प्रयुक्त संस्कृत शब्दों एकत्वम् अनुपश्यतः का अर्थ है — प्रकट शास्त्रों के दृष्टिकोण से जीवों के एकत्व को देखना। परम पूर्ण के प्रत्येक व्यक्तिगत स्फुलिंग में पूर्ण के ज्ञात गुणों का लगभग अस्सी प्रतिशत विद्यमान है, किन्तु वे परमेश्वर के तुल्य नहीं हैं। ये गुण सूक्ष्म मात्रा में विद्यमान हैं, क्योंकि जीव परम पूर्ण का एक सूक्ष्म अंश-मात्र है। यह जल की बूँद और समुद्र के समान है: बूँद में विद्यमान लवण की मात्रा समूचे समुद्र में विद्यमान लवण की मात्रा से कभी तुलनीय नहीं होती। किन्तु बूँद में विद्यमान लवण गुण में — रासायनिक संघटन में — समुद्र में विद्यमान लवण के समान ही होता है।\n\nयदि व्यक्तिगत जीव गुण और मात्रा दोनों में समान होता, तो उसके भौतिक शक्ति के प्रभाव में डूबने का प्रश्न ही न उठता। पिछले मन्त्रों में इसकी चर्चा हो चुकी है कि कोई भी जीव — यहाँ तक कि शक्तिशाली देवता भी — किसी भी दृष्टि से परम पुरुष से बढ़कर नहीं हो सकता। अतः एकत्वम् का अर्थ यह नहीं कि जीव सभी दृष्टियों से परमेश्वर के समान है। इसका व्यापक अर्थ यह है कि हित एक ही है — ठीक जैसे किसी परिवार में सभी सदस्यों का हित एक होता है। किसी राष्ट्र में, यद्यपि भिन्न-भिन्न नागरिक होते हैं, राष्ट्रीय हित एक ही होता है। इसी प्रकार, जीव उसी परम परिवार के अंश हैं, अतएव परम पुरुष का हित और अंशों का हित भिन्न नहीं है।\n\nप्रत्येक जीव परम पुरुष का पुत्र है। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, समस्त ब्रह्माण्ड के सभी प्राणी — पक्षी, सरीसृप, चींटियाँ, जलचर, वृक्ष इत्यादि — सब परमेश्वर की तटस्था शक्ति से उद्भूत हैं। फलतः वे सब परम पुरुष के एक ही परिवार के हैं। आध्यात्मिक जीवन में हितों का कोई टकराव नहीं है। आध्यात्मिक सत्ताएँ आनन्द के लिए हैं। स्वभाव से, संरचना से, प्रत्येक जीव — परमेश्वर तथा प्रत्येक भिन्न अंश — नित्य आनन्द के लिए है। भौतिक देह-पिंजर में बन्दी जीव भी निरन्तर आनन्द खोज रहे हैं, किन्तु वे अपना आनन्द ऐसे धरातल पर खोज रहे हैं, जो उनके लिए है ही नहीं।\n\nइस भौतिक जगत् से परे वह आध्यात्मिक धरातल है, जहाँ परम पुरुष अपने असंख्य पार्षदों के साथ, भौतिक गुणों के लेश-मात्र के बिना, आनन्द-विहार करते हैं। वह धरातल निर्गुण कहलाता है। निर्गुण धरातल पर भोग का कोई टकराव नहीं है। यहाँ भौतिक जगत् में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के बीच सदा टकराव रहता है, क्योंकि यहाँ आनन्द का केन्द्र खो गया है। आनन्द के केन्द्र परमेश्वर हैं, जो उदात्त एवं आध्यात्मिक रास-नृत्य के केन्द्र हैं। हम सब उनके साथ जुड़ने और एक दिव्य हित के साथ, बिना किसी टकराव के, जीवन का आनन्द लेने के लिए हैं। यही आध्यात्मिक हित का उच्च धरातल है, और ज्यों ही एकत्व के इस पूर्ण रूप की अनुभूति होती है, त्यों ही भ्रम अथवा शोक का कोई प्रश्न नहीं रह जाता।\n\nमाया, अर्थात् भ्रम, का अर्थ है ईश्वरविहीन सभ्यता, जिसका परिणाम है शोक। आधुनिक राजनीतिज्ञों द्वारा पोषित ईश्वरविहीन सभ्यता सदा चिन्ताओं से भरी रहती है, और यही प्रकृति का नियम है। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, कोई भी इस नियम का अतिक्रमण नहीं कर सकता। केवल वे ही, जो परमेश्वर के चरणकमलों में शरणागत होते हैं, प्रकृति के कठोर नियमों को पार कर सकते हैं। अतएव, यदि हम समस्त प्रकार के भ्रम और चिन्ता से छूटना चाहते हैं और विविध हितों की एकता स्थापित करना चाहते हैं, तो हमें अपने समस्त कार्यकलापों में ईश्वर को लाना होगा। हमारे कर्मों के फल का उपयोग भगवान् के हित की सेवा में ही होना चाहिए, किसी अन्य प्रयोजन में नहीं, क्योंकि भगवान् के हित की सेवा करके ही हम उस आत्म-भूत हित का अनुभव कर सकते हैं, जिसका उल्लेख यहाँ श्री ईशोपनिषद् में हुआ है।\n\nयह तथा भगवद्गीता में उल्लिखित ब्रह्म-भूत हित — दोनों एक ही वस्तु हैं: परम आत्मा, अर्थात् परमात्मा, स्वयं भगवान् हैं, और सूक्ष्म आत्मा जीव है। परम आत्मा अर्थात् परमात्मा ही समस्त व्यक्तिगत सूक्ष्म जीवों का पालन करते हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके स्नेह से आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं। पिता अपनी सन्तानों के रूप में अपना विस्तार करता है और आनन्द पाने के लिए उनका पालन-पोषण करता है। यदि सन्तानें पिता की इच्छा के अनुकूल चलें, तो पारिवारिक कार्य एक हित और सुखद वातावरण के साथ सुचारु रूप से चलते हैं। ठीक यही व्यवस्था परब्रह्म — परम आत्मा — के ब्रह्म अर्थात् परम परिवार में दिव्य रूप से विद्यमान है। परब्रह्म भी उतने ही पुरुष (व्यक्ति) हैं, जितने व्यक्तिगत जीव हैं।\n\nइनमें से कोई भी निर्विशेष नहीं है। ऐसे दिव्य पुरुष दिव्य आनन्द, ज्ञान और नित्य जीवन से परिपूर्ण हैं। यही आध्यात्मिक अस्तित्व की वास्तविक स्थिति है, और ज्यों ही कोई इस दिव्य स्थिति से पूर्णतः अवगत होता है, त्यों ही वह परम पुरुष श्रीकृष्ण के चरणकमलों में शरणागत हो जाता है। किन्तु ऐसे महात्मा — महान् आत्माएँ — अत्यन्त दुर्लभ हैं, क्योंकि ऐसी दिव्य अनुभूति अनेकानेक जन्मों के पश्चात् ही प्राप्त होती है। तथापि, एक बार प्राप्त हो जाने पर फिर न भ्रम रहता है, न शोक, न भौतिक अस्तित्व के दुःख, और न ही जन्म-मृत्यु, जैसा कि हम अपने जीवन की वर्तमान अवस्था में अनुभव करते हैं। यही वह ज्ञान है, जो हमें श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र से प्राप्त होता है।"}
{"ref": "iso/8", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/8/", "verse_text": "", "devanagari": "> स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम्।\n> कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्\n> व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥", "synonyms": "*सः*—वह व्यक्ति; *पर्यगात्*—को वस्तुतः जानना चाहिए; *शुक्रम्*—सर्वशक्तिमान्; *अकायम्*—देहरहित; *अव्रणम्*—निर्दोष; *अस्नाविरम्*—शिराओं से रहित; *शुद्धम्*—संक्रमणनाशक; *अपाप-विद्धम्*—रोगनिवारक; *कविः*—सर्वज्ञ; *मनीषी*—दार्शनिक; *परिभूः*—सबसे महान्; *स्वयम्भूः*—स्वयंपर्याप्त; *याथातथ्यतः*—ठीक के अनुसरण में; *अर्थान्*—वांछनीय वस्तुएँ; *व्यदधात्*—प्रदान करते हैं; *शाश्वतीभ्यः*—अनादि; *समाभ्यः*—काल।", "translation": "**ऐसे व्यक्ति को वस्तुतः उन सर्वश्रेष्ठ को जानना चाहिए, जो अशरीरी, *सर्वज्ञ*, निन्दा से परे, नसों से रहित, शुद्ध एवं निष्कलुष हैं — वे आत्मनिर्भर दार्शनिक, जो अनादि काल से प्रत्येक जीव की कामनाएँ पूर्ण करते आ रहे हैं।**", "purport": "यहाँ परम पुरुषोत्तम भगवान् के दिव्य एवं नित्य रूप का वर्णन है। परमेश्वर निराकार नहीं हैं। उनका अपना दिव्य रूप है, जो इस लौकिक जगत् के रूपों से तनिक भी मिलता-जुलता नहीं। इस संसार के जीवों के शरीर भौतिक प्रकृति द्वारा निर्मित होते हैं, और वे किसी भी भौतिक यन्त्र की भाँति कार्य करते हैं। जीव के शरीर की शारीरिक एवं रचनात्मक संरचना यान्त्रिक होती है, जिसमें नसें आदि होती हैं। किन्तु भगवान् के दिव्य शरीर में नसों जैसा कुछ नहीं है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि वे अशरीरी हैं। इसका अर्थ है कि उनके शरीर और आत्मा में कोई भेद नहीं है, और न ही वे हमारी भाँति प्रकृति के नियम से शरीर धारण करते हैं।\n\nजीवन की भौतिक देहात्म-बुद्धि में आत्मा स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन से भिन्न होती है। किन्तु परमेश्वर ऐसी किसी विभाजित व्यवस्था से परे हैं। परमेश्वर में शरीर और मन के भेद जैसा कुछ नहीं है। वे पूर्ण समग्र हैं, और उनका मन, उनका शरीर तथा वे स्वयं — सब एक ही हैं। ब्रह्म-संहिता में परमेश्वर के शरीर का ऐसा ही वर्णन है। वहाँ उन्हें सच्चिदानन्द-विग्रह कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे नित्य रूप हैं, जो दिव्य सत्ता, ज्ञान एवं आनन्द का पूर्ण प्रतिनिधित्व करता है। वैदिक साहित्य स्पष्ट कहता है कि उनका दिव्य शरीर सर्वथा भिन्न प्रकार का है, और इसी कारण उन्हें कभी-कभी निराकार कहा जाता है।\n\nइस निराकारता का अर्थ यह है कि उनका रूप हमारे जैसा नहीं है, अथवा वे ऐसे रूप से रहित हैं जिसे हम देख-समझ सकें। ब्रह्म-संहिता में आगे कहा गया है कि भगवान् अपने शरीर के किसी भी अंग से कुछ भी और सब कुछ कर सकते हैं। वहाँ कहा गया है कि अपने शरीर के प्रत्येक अंग से, यथा हाथ से, वे अन्य इन्द्रियों का कार्य कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि भगवान् अपने हाथों से चल सकते हैं, अपने पैरों से कोई वस्तु ग्रहण कर सकते हैं, अपने हाथों और पैरों से देख सकते हैं, और अपनी आँखों से खा सकते हैं। श्रुति-मन्त्रों में कहा गया है कि उनके हाथ-पैर हमारे जैसे नहीं हैं, अपितु उनके हाथ-पैर भिन्न प्रकार के हैं, जिनसे वे हमारा अर्पित किया हुआ सब कुछ ग्रहण कर सकते हैं और किसी से भी अधिक वेग से कहीं भी चल सकते हैं।\n\nश्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में सर्वशक्तिमान् जैसे शब्दों के प्रयोग से इन्हीं बातों की पुष्टि होती है। भगवान् का श्रीविग्रह — उनका आराध्य रूप — जिसे मन्त्र सात के अनुसार भगवान् का साक्षात्कार कर चुके अधिकृत आचार्यगण मन्दिरों में स्थापित करते हैं, भगवान् के आदि रूप से अभिन्न है। भगवान् का आदि रूप श्रीकृष्ण का रूप है। श्रीकृष्ण अपने आपको बलदेव, राम, नृसिंह, वराह आदि असंख्य रूपों में विस्तारित करते हैं — और ये सभी एक ही भगवान् हैं। इसी प्रकार मन्दिरों में पूजित अर्चा-विग्रह भी भगवान् का ही विस्तारित रूप है। भगवान् के अर्चा-विग्रह की आराधना करके मनुष्य तत्काल भगवान् के समीप पहुँच सकता है, जो अपनी सर्वशक्तिमयी ऊर्जा से, बिना किसी आपत्ति के, भक्त की सेवा स्वीकार करते हैं।\n\nभगवान् का विग्रह आचार्यों — पवित्र गुरुजनों — की प्रार्थना पर अवतरित होता है और उनकी सर्वशक्तिमयी ऊर्जा से ठीक मूल रूप की भाँति कार्य करता है। मूर्ख लोग, जिन्हें श्री ईशोपनिषद् के इन मन्त्रों का अथवा किसी अन्य श्रुति-मन्त्र का ज्ञान नहीं है, समझते हैं कि शुद्ध भक्तों द्वारा पूजित श्रीविग्रह भौतिक तत्त्वों से बना है। मूर्ख लोगों की अपूर्ण दृष्टि में, अर्थात् कनिष्ठ अधिकारियों की दृष्टि में, यह रूप भौतिक प्रतीत होता है। किन्तु ऐसे अल्पज्ञानी लोग यह नहीं जानते कि सर्वशक्तिमान् एवं सर्वज्ञ होने के कारण भगवान् इच्छानुसार पदार्थ को चेतन में और चेतन को पदार्थ में परिणत कर सकते हैं। भगवद्गीता में भगवान् ऐसे अल्पज्ञानी मनुष्यों की पतित दशा पर खेद प्रकट करते हैं, जो भगवान् के शरीर को भौतिक मानते हैं, क्योंकि वे मनुष्य की भाँति इस संसार में अवतरित होते हैं।\n\nऐसे अल्पज्ञ व्यक्ति भगवान् की सर्वशक्तिमत्ता को नहीं जानते। अतः मनोधर्मियों के समक्ष भगवान् अपने पूर्ण रूप में प्रकट नहीं होते। उन्हें उतना ही जाना जा सकता है, जितना मनुष्य उनके प्रति शरणागत होता है। और जीवों की पतित दशा का कारण पूर्णतः ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की विस्मृति है। इस मन्त्र में, तथा वेदों के अन्य अनेक मन्त्रों में, स्पष्ट कहा गया है कि अनादि काल से भगवान् ही सब कुछ प्रदान करते आ रहे हैं। जीव पहले इच्छा करता है, और फिर भगवान् उसकी योग्यता के अनुपात में उसकी इच्छित वस्तु प्रदान करते हैं। यदि कोई मनुष्य उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनना चाहे, तो उसे न केवल आवश्यक योग्यताएँ अर्जित करनी होंगी, अपितु उसे सम्बन्धित अधिकारी की अनुकूलता पर भी निर्भर रहना होगा, जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की उपाधि प्रदान कर सकता है।\n\nउच्च न्यायालय के न्यायाधीश की योग्यताएँ मात्र अर्जित कर लेना उस पद को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। वह पद किसी उच्चतर अधिकारी द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए। इसी प्रकार भगवान् जीव को उसकी योग्यताओं के अनुपात में — दूसरे शब्दों में, कर्म के नियम से — भोग प्रदान करते हैं। किन्तु भगवान् की कृपा के बिना वे योग्यताएँ पर्याप्त नहीं होतीं। साधारणतया जीव यह नहीं जानता कि भगवान् से क्या माँगे अथवा किस पद के लिए अपने को योग्य बनाए। किन्तु जब जीव अपनी स्वरूपगत स्थिति को जान लेता है, तब वह भगवान् की दिव्य संगति में स्वीकार किए जाने की याचना करता है, ताकि वह उनकी दिव्य प्रेममयी सेवा कर सके। इसके स्थान पर भौतिक प्रकृति के वशीभूत जीव अन्य अनेक वस्तुएँ माँगता है, और उसकी इस मनोवृत्ति को भगवद्गीता में विभाजित अथवा बहुशाखायुक्त बुद्धि कहा गया है।\n\nआध्यात्मिक बुद्धि एक होती है, किन्तु उसकी विपरीत बुद्धि अनेक प्रकार की होती है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि जो व्यक्ति बहिरंगा शक्ति के क्षणिक सौन्दर्य पर मोहित हो जाते हैं, वे जीवन के वास्तविक लक्ष्य — भगवद्धाम वापस जाना — को भूल जाते हैं। इसे भूलकर मनुष्य विविध योजनाओं और कार्यक्रमों से स्थिति सुधारने का प्रयत्न करता है, जिसकी तुलना चबाए हुए को फिर चबाने की प्रक्रिया से की गई है। किन्तु भगवान् इतने दयालु हैं कि वे विस्मृत जीव को उसके कार्यों में हस्तक्षेप किए बिना ऐसा करने देते हैं। यदि कोई जीव नरक जाना चाहे, तो भगवान् बिना हस्तक्षेप के उसे जाने देते हैं, और यदि वह अपने घर, भगवद्धाम, वापस जाना चाहे, तो भगवान् उसमें भी उसकी सहायता करते हैं।\n\nयहाँ ईश्वर को परिभूः — सबसे महान् — कहा गया है। न कोई उनसे बड़ा है, न कोई उनके समान। अन्य जीवों का वर्णन यहाँ याचकों के रूप में हुआ है, जो भगवान् से माँगते हैं, और भगवान् उनकी इच्छित वस्तुएँ प्रदान करते हैं। यदि अन्य जीव शक्ति में भगवान् के समान होते, यदि वे सर्वशक्तिमान् या सर्वज्ञ होते, तो भगवान् से तथाकथित मुक्ति तक माँगने का प्रश्न ही नहीं उठता। जीव की वास्तविक मुक्ति है भगवद्धाम वापस जाना। अन्यथा निर्विशेषवादी की कल्पित मुक्ति एक कोरी कल्पना ही रह जाती है, और इन्द्रियतृप्ति के लिए भीख माँगने का यह व्यापार अनन्त काल तक चलता रहता है, जब तक याचक को सद्बुद्धि न आए और वह अपनी स्वरूपगत स्थिति का अनुभव न कर ले। परमेश्वर आत्मनिर्भर हैं।\n\nजब भगवान् श्रीकृष्ण पाँच हज़ार वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रकट हुए, तब उन्होंने अपनी विविध लीलाओं द्वारा भगवत्ता की पूर्ण अभिव्यक्ति प्रदर्शित की। अपने बाल्यकाल में उन्होंने अनेक शक्तिशाली असुरों का वध किया, और ऐसी शक्ति किसी बाह्य प्रयास से अर्जित करने का प्रश्न ही नहीं था। उन्होंने भारोत्तोलन के किसी अभ्यास के बिना गोवर्धन पर्वत उठा लिया। उन्होंने बिना किसी सामाजिक प्रतिबन्ध और बिना किसी निन्दा के गोपियों के साथ नृत्य किया। यद्यपि गोपियाँ उनके पास प्रणय-भाव से आईं, तथापि गोपियों और भगवान् श्रीकृष्ण के इस मिलन की आराधना स्वयं भगवान् चैतन्य ने भी की है, जो कठोर संन्यासी और अनुशासन-नियमों के दृढ़ पालक थे। इसकी पुष्टि करते हुए श्री ईशोपनिषद् कहता है कि वे “रोगाणुनाशक” और “रोगनिरोधक” हैं — शुद्ध एवं निष्कलुष। वे रोगाणुनाशक इस अर्थ में हैं कि लौकिक जगत् की दृष्टि में अपवित्र वस्तु भी मात्र उनके स्पर्श से पवित्र हो जाती है।\n\nरोगनिरोधक शब्द उनकी संगति का सूचक है, और इसका उल्लेख भगवद्गीता में हुआ है। वहाँ कहा गया है कि कोई निष्ठावान् भक्त आरम्भ में दुराचार अर्थात् सदाचारहीन प्रतीत हो सकता है। फिर भी उसे शुद्ध ही मानना चाहिए, क्योंकि वह सही मार्ग पर है। यही भगवान् की संगति का रोगनिरोधक स्वभाव है। भगवान् अपापविद्धम् हैं, अर्थात् पाप जैसी कोई वस्तु उन्हें स्पर्श नहीं कर सकती। यदि वे कोई ऐसा कार्य भी करें जो पापमय प्रतीत हो, तो भी वे सब कार्य शुभ ही होते हैं, क्योंकि भगवान् के पाप से प्रभावित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। वे समस्त परिस्थितियों में शुद्धम् — परम पवित्र — हैं, जिनकी तुलना प्रायः सूर्य से की जाती है। सूर्य पृथ्वी के अनेक अस्पृश्य स्थानों से नमी खींचता है, फिर भी स्वयं शुद्ध रहता है। वस्तुतः वह अपने शोधक प्रभाव से घृणित वस्तुओं को भी पवित्र कर देता है। यदि सूर्य, जो मात्र एक भौतिक पिण्ड है, इतना शक्तिशाली है, तो हम सर्वशक्तिमान् भगवान् की पवित्रता और शक्ति की कल्पना कर सकते हैं।"}
{"ref": "iso/9", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/9/", "verse_text": "", "devanagari": "> अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।\n> ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः॥९॥", "synonyms": "*अन्धम्*—घोर अज्ञान; *तमः*—अन्धकार; *प्रविशन्ति*—में प्रवेश करते हैं; *ये*—जो; *अविद्याम्*—अविद्या; *उपासते*—पूजते हैं; *ततः*—उससे; *भूयः*—और भी अधिक; *इव*—समान; *ते*—वे; *तमः*—अन्धकार; *ये*—जो; *उ*—भी; *विद्यायाम्*—ज्ञान की संस्कृति में; *रताः*—संलग्न।", "translation": "**जो लोग *अविद्यामय* कर्मों की साधना में लगे हैं, वे अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में प्रवेश करेंगे। उनसे भी बुरे वे हैं, जो तथाकथित ज्ञान की साधना में लगे हैं।**", "purport": "इस मन्त्र में विद्या और अविद्या का तुलनात्मक अध्ययन है। अविद्या अर्थात् अज्ञान निःसन्देह संकटमय है, किन्तु विद्या अर्थात् ज्ञान जब भ्रान्त या पथभ्रष्ट हो जाए, तो वह और भी अधिक संकटमय है। आधुनिक मानव सभ्यता में श्री ईशोपनिषद् की यह व्याख्या अतीत के किसी भी काल की अपेक्षा अधिक लागू होती है। आधुनिक सभ्यता ने जन-शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है, फिर भी परिणाम यह है कि लोग पहले से अधिक दुखी हैं, क्योंकि भौतिक उन्नति पर अत्यधिक बल दिया गया है और जीवन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष — आध्यात्मिक पक्ष — के प्रति कोई रुचि नहीं है। जहाँ तक विद्या का प्रश्न है, श्री ईशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र ने अत्यन्त स्पष्ट रूप से समझाया है कि परमेश्वर ही सब वस्तुओं के स्वामी हैं, और इस तथ्य की विस्मृति ही अज्ञान कहलाती है।\n\nमनुष्य जीवन के इस तथ्य को जितना अधिक भूलता है, उतना ही अधिक वह अन्धकार में रहता है; और इस दृष्टि से, शिक्षा की तथाकथित उन्नति की ओर उन्मुख ईश्वरविहीन सभ्यता उस सभ्यता से अधिक संकटमय है जिसमें जन-साधारण कम उन्नत हों। मनुष्यों के विभिन्न वर्ग हैं — कर्मी, ज्ञानी तथा योगी। कर्मी वे हैं जो इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में लगे रहते हैं। आधुनिक सभ्यता में प्रायः 99.9 प्रतिशत लोग औद्योगीकरण, आर्थिक विकास, परोपकार, राजनीतिक चेतना आदि विविध कार्यों के झण्डों तले इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में ही लगे हैं। किन्तु ये सब कार्य न्यूनाधिक इन्द्रियों की तुष्टि पर ही आधारित हैं, जिनमें श्री ईशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र में वर्णित ईश्वर-भावना का कोई स्थान नहीं है।\n\nभगवद्गीता की भाषा में, स्थूल इन्द्रियतृप्ति में लगे लोग मूढ़ हैं — गधे के समान अन्धकार में, जो मूर्खता का प्रतीक है। जो लोग जीवन में किसी वास्तविक लाभ के बिना केवल इन्द्रियतृप्ति की खोज में लगे हैं, वे श्री ईशोपनिषद् की दृष्टि में अविद्या की उपासना कर रहे हैं। और जो लोग शैक्षिक उन्नति के नाम पर इस प्रकार की सभ्यता की सहायता करने की भूमिका निभाते हैं, वे स्थूल इन्द्रियतृप्ति के धरातल पर स्थित लोगों से भी अधिक हानि कर रहे हैं। ईश्वरविहीन लोगों द्वारा विद्या की उन्नति उतनी ही संकटमय है जितना किसी नाग के फन पर जड़ा बहुमूल्य रत्न। ऐसे बहुमूल्य रत्न से सुसज्जित नाग उतना ही भयानक है जितना बिना रत्न वाला नाग।\n\nपुनः, हरि-भक्ति-सुधोदय के अनुसार, ईश्वरविहीन लोगों द्वारा शैक्षिक कार्यों की उन्नति मृत शरीर के शृंगार के समान है। भारत में, अन्य अनेक देशों की भाँति, कुछ लोग शोकाकुल परिजनों की प्रसन्नता के लिए सजाए हुए शव के साथ शोभायात्रा निकालने की प्रथा का पालन करते हैं। इसी अर्थ में आधुनिक सभ्यता भौतिक अस्तित्व के नित्य दुखों को ढकने के लिए की गई गतिविधियों की जोड़-तोड़ मात्र है। ऐसे सब कार्य इन्द्रियतृप्ति को लक्ष्य बनाकर किए जाते हैं, किन्तु इन्द्रियों के ऊपर मन है, मन के ऊपर बुद्धि है, और बुद्धि के ऊपर आत्मा है। अतएव शिक्षा का लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार — आत्मा के आध्यात्मिक मूल्यों की अनुभूति — होना चाहिए। जो शिक्षा जीवन की ऐसी अनुभूति तक न ले जाए, उसे अविद्या अर्थात् अज्ञान ही मानना चाहिए।\n\nऔर ऐसी अविद्या की साधना का अर्थ है अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश में गिरना। ऐसे भ्रान्त शिक्षक वैदिक भाषा में चार नामों से जाने जाते हैं: 1. वेद-वाद-रत, 2. मायया अपहृत-ज्ञान, 3. आसुरं भावम्, 4. नराधम। वेद-वाद-रत लोग अपने को वैदिक साहित्य का परम विद्वान् बताते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश वे वेदों के प्रयोजन से पूर्णतः विमुख हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि वेदों का प्रयोजन भगवान् को जानना है, किन्तु इन वेद-वाद-रत मनुष्यों की भगवान् में तनिक भी रुचि नहीं होती। इसके विपरीत, वे स्वर्ग-प्राप्ति जैसे फलों पर मोहित रहते हैं। जैसा कि श्री ईशोपनिषद् के मन्त्र एक में कहा गया है, हमें जानना चाहिए कि भगवान् ही सब वस्तुओं के स्वामी हैं, और हमें जीवन की आवश्यकताओं के अपने नियत अंश से सन्तुष्ट रहना चाहिए।\n\nसम्पूर्ण वैदिक साहित्य का प्रयोजन विस्मृत जीव में इस ईश्वर-भावना को जगाना है, और यही सिद्धान्त मूर्ख मानव-जाति की समझ के लिए संसार के विविध शास्त्रों में विविध रूपों में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार चरम प्रयोजन मनुष्य को भगवद्धाम वापस ले जाना है। किन्तु वेद-वाद-रत लोग वेदों का तात्पर्य समझने के बजाय यह मान बैठते हैं कि इन्द्रियतृप्ति हेतु स्वर्गिक सुख की प्राप्ति जैसे गौण विषय — जिनकी लालसा ही मूलतः उनके भौतिक बन्धन का कारण है — वेदों का चरम लक्ष्य हैं। ऐसे लोग वैदिक साहित्य की मिथ्या व्याख्या करके दूसरों को पथभ्रष्ट करते हैं, और कभी-कभी वे पुराणों की निन्दा करते हैं, जो साधारण जनों के लिए प्रामाणिक वैदिक व्याख्याएँ हैं।\n\nवेद-वाद-रत लोग आचार्य कहलाने वाले महान् गुरुजनों के प्रामाण्य की उपेक्षा करके वेदों की अपनी ही व्याख्याएँ गढ़ते हैं; और वे अपने ही बीच से किसी अनैतिक व्यक्ति को वैदिक ज्ञान के अग्रणी व्याख्याता के रूप में खड़ा कर देते हैं। श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में ऐसे मनुष्यों की विशेष रूप से भर्त्सना अत्यन्त उपयुक्त संस्कृत शब्द विद्या-रत से की गई है। विद्या का अर्थ है वेद, क्योंकि वेद समस्त ज्ञान का मूल है; और रत का अर्थ है संलग्न। विद्या-रत का अर्थ है वेदों के अध्ययन में संलग्न। अतएव तथाकथित विद्या-रत लोगों की यहाँ भर्त्सना की गई है, क्योंकि आचार्यों की अवज्ञा के कारण वे यह नहीं जानते कि वेदों का प्रयोजन क्या है। ऐसे वेद-वाद-रत लोग वेदों के प्रत्येक शब्द में अपने प्रयोजन के अनुकूल अर्थ ढूँढ़ने के अभ्यस्त होते हैं।\n\nवे नहीं जानते कि वैदिक साहित्य साधारण पुस्तकों का संग्रह नहीं है और गुरु-परम्परा की शृंखला के बिना उसे समझा नहीं जा सकता। वेदों के दिव्य सन्देश को समझने के लिए मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना चाहिए। यही कठ उपनिषद् का निर्देश है। किन्तु इन वेद-वाद-रत लोगों का अपना ही आचार्य होता है, जो दिव्य गुरु-परम्परा की शृंखला में नहीं है। इस प्रकार वे वैदिक साहित्य की मिथ्या व्याख्या करके अज्ञान के घोरतम अन्धकारमय प्रदेश की ओर बढ़ेंगे — उनसे भी आगे, जिन्हें वेदों का कोई ज्ञान ही नहीं है। मायया अपहृत-ज्ञान वर्ग के मनुष्य स्वयंभू “ईश्वर” होते हैं। ऐसे लोग समझते हैं कि वे स्वयं ही ईश्वर हैं और किसी अन्य ईश्वर की आराधना की कोई आवश्यकता नहीं है।\n\nवे किसी साधारण मनुष्य की पूजा करने को सहमत हो जाएँगे, यदि वह धनी हो, किन्तु वास्तविक भगवान् की आराधना कभी नहीं करेंगे। ऐसे मूर्ख मनुष्य इस प्रश्न के विषय में अपनी ही मूर्खता नहीं पहचान पाते कि ईश्वर भला कभी माया के जाल में कैसे फँस सकते हैं। यदि ईश्वर कभी माया के वश में आ जाएँ, तो माया ईश्वर से अधिक शक्तिशाली ठहरेगी। किन्तु वे यह भी कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं। यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं, तो माया उन्हें कैसे पराभूत कर सकती है? ये स्वयंभू ईश्वर इन सब प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाते, किन्तु वे इसी में सन्तुष्ट रहते हैं कि वे स्वयं ईश्वर बन गए हैं।"}
{"ref": "iso/10", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/10/", "verse_text": "", "devanagari": "> अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया।\n> इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१०॥", "synonyms": "*अन्यत्*—भिन्न; *एव*—निश्चय ही; *आहुः*—कहा; *विद्यया*—ज्ञान की संस्कृति से; *अन्यत्*—भिन्न; *आहुः*—कहा; *अविद्यया*—अविद्या की संस्कृति से; *इति*—इस प्रकार; *शुश्रुम*—मैंने सुना; *धीराणाम्*—धीरों से; *ये*—जिन्होंने; *नः*—हमें; *तत्*—वह; *विचचक्षिरे*—समझाया।", "translation": "**ज्ञानियों ने हमें समझाया है कि *विद्या* के अनुशीलन से एक फल प्राप्त होता है, और कहा गया है कि *अविद्या* के अनुशीलन से भिन्न फल प्राप्त होता है।**", "purport": "ज्ञान का अनुशीलन व्यावहारिक रूप से निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है, जैसा कि भगवद्गीता (त्रयोदश अध्याय) में परामर्श दिया गया है। वहाँ कहा गया है कि: 1. मनुष्य को स्वयं पूर्ण रूप से शिष्ट बनना चाहिए और अपने से भिन्न व्यक्तियों को समुचित आदर देना सीखना चाहिए। 2. मनुष्य को केवल नाम और यश के लिए स्वयं को धार्मिक के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। 3. मनुष्य को अपने शरीर, मन या वाणी के कार्यों से दूसरों के लिए चिन्ता का कारण नहीं बनना चाहिए। 4. दूसरों के उकसाने पर भी मनुष्य को सहनशीलता सीखनी चाहिए। 5. मनुष्य को दूसरों के साथ व्यवहार में कपट से बचना सीखना चाहिए। 6. मनुष्य के पास एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु होना चाहिए, जो उसे क्रमशः आध्यात्मिक अनुभूति की अवस्था तक ले जा सके, और ऐसे आचार्य अर्थात् आध्यात्मिक गुरु के प्रति उसे सेवा तथा प्रासंगिक प्रश्नों सहित आत्मसमर्पण करना चाहिए।\n\n7. आत्म-साक्षात्कार के धरातल तक पहुँचने के लिए मनुष्य को प्रामाणिक शास्त्रों में विहित विधि-विधानों का पालन करना चाहिए। 8. मनुष्य को प्रामाणिक शास्त्रों के सिद्धान्तों में दृढ़ रहना चाहिए। 9. मनुष्य को उन आचरणों से पूर्णतः विरत रहना चाहिए जो आत्म-साक्षात्कार के हित में बाधक हैं। 10. मनुष्य को शरीर-निर्वाह के लिए आवश्यकता से अधिक स्वीकार नहीं करना चाहिए। 11. मनुष्य को स्थूल शरीर के भौतिक आवरण के साथ मिथ्या तादात्म्य नहीं करना चाहिए, न ही शरीर से सम्बन्धित जनों को अपना मानना चाहिए। 12. मनुष्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि जब तक उसके पास भौतिक शरीर है, तब तक उसे बारम्बार जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के कष्टों का सामना करना ही पड़ेगा।\n\nभौतिक शरीर के इन कष्टों से छुटकारा पाने की योजनाएँ बनाने से कोई लाभ नहीं। सर्वोत्तम तो यह है कि वह साधन खोजा जाए जिससे मनुष्य अपना आध्यात्मिक स्वरूप पुनः प्राप्त कर सके। 13. मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक जीवन-निर्वाह की वस्तुओं से अधिक में आसक्त नहीं होना चाहिए। 14. मनुष्य को पत्नी, सन्तान और घर में प्रामाणिक शास्त्रों द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक आसक्त नहीं होना चाहिए। 15. मन द्वारा रचित प्रिय तथा अप्रिय वस्तुओं को लेकर मनुष्य को न सुखी होना चाहिए, न दुःखी। 16. मनुष्य को भगवान् श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त बनना चाहिए और एकाग्र चित्त से उनकी सेवा करनी चाहिए। 17. मनुष्य को आध्यात्मिक अनुशीलन के अनुकूल शान्त एवं स्थिर वातावरण वाले एकान्त स्थान में निवास की रुचि विकसित करनी चाहिए, और इस प्रकार उन भीड़-भरे स्थानों से बचना चाहिए जहाँ अभक्तजन एकत्र होते हैं।\n\n18. मनुष्य को वैज्ञानिक या दार्शनिक बनकर आध्यात्मिक ज्ञान का अनुसन्धान करना चाहिए — भौतिक ज्ञान का नहीं — यह जानते हुए कि आध्यात्मिक ज्ञान स्थायी है, जबकि भौतिक ज्ञान शरीर की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। ये अठारह बातें वास्तविक ज्ञान के विकास की क्रमिक प्रक्रिया हैं। इन अठारह के अतिरिक्त अन्य जो भी बातें हैं, वे सब अविद्या की कोटि में आती हैं। महान आचार्य श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है कि भौतिक ज्ञान के समस्त रूप माया की मोहिनी शक्ति के बाह्य लक्षण मात्र हैं, और इनका अनुशीलन करने से मनुष्य गधे से तनिक भी अच्छा नहीं बनता। यहाँ श्री ईशोपनिषद् में उसी सिद्धान्त को दोहराया गया है। ज्ञान की भौतिक उन्नति का अर्थ वस्तुतः मनुष्य को गधे की स्थिति में बदल देना है। कुछ भौतिकतावादी राजनेता आध्यात्मिक वेश की आड़ में वर्तमान सभ्यता-प्रणाली को आसुरी कहकर उसकी निन्दा अवश्य करते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश वे उस वास्तविक ज्ञान के अनुशीलन की चिन्ता नहीं करते जिसका वर्णन भगवद्गीता में हुआ है, और इसी कारण वे इस आसुरी स्थिति को बदल नहीं पाते।\n\nआधुनिक व्यवस्था में तो एक बालक भी अपने को आत्मनिर्भर मानता है और बड़े-बूढ़ों का कोई आदर नहीं करता। इस प्रकार हमारे विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाने वाली गलत प्रकार की शिक्षा के कारण संसार-भर के बालक वृद्धजनों के लिए सिरदर्द बन गए हैं। अतएव श्री ईशोपनिषद् अत्यन्त दृढ़ता से सावधान करती है कि अविद्या का अनुशीलन विद्या के अनुशीलन से भिन्न है। विश्वविद्यालय, कहा जाए तो, केवल अविद्या के केन्द्र हैं; फलतः वैज्ञानिक अन्य देशों के अस्तित्व को मिटा देने के लिए घातक अस्त्रों की खोज में व्यस्त हैं। आज विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य के विधि-विधानों — जीवन की आध्यात्मिक प्रक्रिया — का कोई निर्देश नहीं दिया जाता, न ही उन्हें शास्त्रों के आदेशों में कोई श्रद्धा है। धार्मिक सिद्धान्त केवल नाम और यश के लिए सिखाए जाते हैं, व्यावहारिक आचरण के लिए नहीं।\n\nइसीलिए केवल सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में ही नहीं, धर्म के क्षेत्र में भी वैमनस्य व्याप्त है। संसार के विभिन्न भागों में राष्ट्रवाद भी जनता की इसी अविद्यामय शिक्षा के कारण पनपा है। लोगों को यह ज्ञान ही नहीं कि यह नन्ही पृथ्वी पदार्थ का एक पिण्ड मात्र है, जो अपार भौतिक अन्तरिक्ष में अन्य अनेक पिण्डों के साथ तैर रही है। अन्तरिक्ष की विशालता की तुलना में ये भौतिक पिण्ड वायु में उड़ते धूल-कणों के समान हैं। चूँकि भगवान् ने कृपापूर्वक इन भौतिक पिण्डों को अपने आप में पूर्ण बनाया है, अतः ये अन्तरिक्ष में तैरते रहने की समस्त आवश्यक व्यवस्थाओं से भली-भाँति सुसज्जित हैं। हमारे स्पुतनिक-चालक अपनी उपलब्धियों पर बड़ा गर्व करते हैं, किन्तु वे ग्रह कहलाने वाले इन कहीं बड़े, विराट स्पुतनिकों के परम चालक की ओर दृष्टि नहीं डालते।\n\nअन्तरिक्ष में असंख्य सूर्य हैं और ग्रह-मण्डलों की असंख्य व्यवस्थाएँ हैं। हम क्षुद्र प्राणी, परमेश्वर के अणु-स्वरूप अंश होते हुए, बारम्बार जन्म-मृत्यु के द्वारा इन असीम ग्रहों पर प्रभुत्व जमाने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु प्रायः वृद्धावस्था और रोग से हताश हो जाते हैं। मनुष्य की यह आयु लगभग सौ वर्ष नियत है, यद्यपि वह घटते-घटते बीस-तीस वर्ष की सीमा तक आ रही है। अविद्यामय शिक्षा के अनुशीलन के फलस्वरूप मूर्ख बने मनुष्यों ने इन ग्रहों के भीतर अपने-अपने राष्ट्रवाद रच लिए हैं, ताकि इन्हीं बीस-तीस वर्षों में इन्द्रियभोग बटोर सकें। ऐसे मूर्ख लोग पृथ्वी के किसी सीमांकित भाग को यथासम्भव पूर्ण बनाने की नाना योजनाएँ बना रहे हैं, जो अन्ततः हास्यास्पद है।\n\nऔर इसी प्रयोजन से प्रत्येक राष्ट्र दूसरों के लिए चिन्ता का कारण बन गया है। उनकी आधी से अधिक शक्ति रक्षा-उपायों में नष्ट होती है; वास्तविक ज्ञान के अनुशीलन की किसी को चिन्ता नहीं, और वे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ज्ञानों में उन्नत होने का मिथ्या गर्व करते हैं। श्री ईशोपनिषद् शिक्षा की इस दोषपूर्ण पद्धति के विषय में सावधान करती है, और भगवद्गीता वास्तविक ज्ञान के विकास का निर्देश देती है। इस मन्त्र में संकेत है कि विद्या अर्थात् ज्ञान की शिक्षा धीर से ही प्राप्त करनी चाहिए। धीर का अर्थ है अविचलित — जो भौतिक मोह से विचलित नहीं होता। पूर्ण आध्यात्मिक अनुभूति के बिना कोई अविचलित नहीं हो सकता। जिसे पूर्ण आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त हो जाती है, वह न किसी प्राप्त वस्तु की लालसा करता है, न किसी खोई हुई वस्तु का शोक।\n\nऐसे धीर ने यह अनुभव कर लिया है कि संयोगवश भौतिक संग से प्राप्त यह भौतिक शरीर और मन पराये तत्त्व हैं, अतः वह केवल बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करता है। भौतिक शरीर और मन आध्यात्मिक जीव के लिए बुरे सौदे हैं। जीव के वास्तविक कार्य चेतन जगत् में हैं, किन्तु यह भौतिक जगत् मृत है। जब तक जीवन्त आध्यात्मिक स्फुलिंग पदार्थ के मृत पिण्डों को संचालित करते हैं, तब तक यह मृत जगत् जीवित जगत् प्रतीत होता है। वस्तुतः जीवित आत्माएँ ही, जो परम जीवन्त सत्ता के अंश हैं, इस जगत् को चलाती हैं। धीर वे हैं जिन्होंने श्रेष्ठ अधिकारियों से श्रवण करके इन समस्त तथ्यों को जान लिया है और विधि-विधानों का पालन करके इनकी अनुभूति कर ली है।\n\nविधि-विधानों का पालन करने के लिए मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण लेनी चाहिए। दिव्य सन्देश विधि-विधानों के साथ आध्यात्मिक गुरु से शिष्य तक उतरता है — अविद्यामय शिक्षा के जोखिम-भरे मार्ग से नहीं। भगवान् से इस प्रकार विनम्र श्रवण करने से ही मनुष्य धीर बन सकता है। पूर्ण शिष्य को अर्जुन के समान होना चाहिए, और आध्यात्मिक गुरु को साक्षात् भगवान् के समान। धीर अर्थात् अविचलित पुरुष से विद्या — ज्ञान — सीखने की यही प्रक्रिया है। अधीर — जिसने धीर का प्रशिक्षण नहीं पाया — शिक्षाप्रद नेता नहीं हो सकता। आधुनिक राजनेता जो स्वयं को धीर के रूप में प्रस्तुत करते हैं, स्वयं अधीर हैं। उनसे पूर्ण ज्ञान की आशा नहीं की जा सकती। वे डॉलर और पाउण्ड में अपने पारिश्रमिक में व्यस्त हैं। वे जन-समूह को आत्म-साक्षात्कार के सही पथ पर कैसे ले जा सकते हैं? जीवन में वास्तविक शिक्षा पाने के लिए मनुष्य को धीर से विनम्रतापूर्वक श्रवण करना चाहिए।"}
{"ref": "iso/11", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/11/", "verse_text": "", "devanagari": "> विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँ सह।\n> अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥११॥", "synonyms": "*विद्याम्*—यथार्थ ज्ञान; *च*—तथा; *अविद्याम्*—अविद्या; *च*—तथा; *यः*—जो व्यक्ति; *तत्*—वह; *वेद*—जानता है; *उभयम्*—दोनों; *सह*—एक साथ; *अविद्यया*—अविद्या की संस्कृति से; *मृत्युम्*—बारम्बार मृत्यु; *तीर्त्वा*—पार करते हुए; *विद्यया*—ज्ञान की संस्कृति से; *अमृतम्*—अमरत्व; *अश्नुते*—भोगता है।", "translation": "**केवल वही, जो *अविद्या* की प्रक्रिया और *दिव्य ज्ञान* की प्रक्रिया को साथ-साथ सीख सकता है, बारम्बार जन्म-मृत्यु के प्रभाव को लाँघकर अमरता के पूर्ण आशीर्वाद का भोग कर सकता है।**", "purport": "भौतिक जगत् के आरम्भ से ही प्रत्येक प्राणी स्थायी जीवन के लिए प्रयत्नशील है, किन्तु प्रकृति का नियम इतना निष्ठुर है कि कोई भी मृत्यु के हाथ से बच नहीं सका। कोई मरना नहीं चाहता — यह प्रत्यक्ष तथ्य है। न ही कोई वृद्ध या रोगी होना चाहता है। किन्तु प्रकृति का नियम किसी को भी मृत्यु, वृद्धावस्था या रोग से छूट नहीं देता। भौतिक ज्ञान की उन्नति ने जीवन की इन समस्याओं को हल नहीं किया है। भौतिक विज्ञान मृत्यु की प्रक्रिया को त्वरित करने के लिए परमाणु बम का आविष्कार कर सकता है, किन्तु ऐसी कोई वस्तु नहीं खोज सकता जो मनुष्य को मृत्यु, रोग और वृद्धावस्था के निष्ठुर हाथों से बचा सके। पुराणों से हमें हिरण्यकशिपु के कार्यकलापों का ज्ञान मिलता है: यह राजा भौतिक दृष्टि से अत्यन्त उन्नत था, और अपनी भौतिक उपलब्धियों से, अपनी अविद्या के बल से, वह मृत्यु को जीत लेना चाहता था।\n\nउसने ऐसा कठोर ध्यान किया कि उसकी योगशक्तियों से समस्त ग्रह-मण्डल विचलित हो उठे। उसने ब्रह्माण्ड के स्रष्टा, ब्रह्मा नामक देवता को, विवश करके अपने पास बुलाया और फिर उनसे अमर — कभी न मरने वाला — बनने का वरदान माँगा। किन्तु ब्रह्मा ने यह वरदान देना अस्वीकार कर दिया, क्योंकि स्वयं वे भी, जो भौतिक स्रष्टा हैं और जिनका समस्त ग्रहों पर आधिपत्य है, अमर नहीं हैं। उनकी आयु दीर्घ अवश्य है, जैसा कि भगवद्गीता में पुष्टि की गई है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें मरना नहीं पड़ता। हिरण्य का अर्थ है स्वर्ण, और कशिपु का अर्थ है कोमल शय्या। यह महाशय इन्हीं दो वस्तुओं — धन और स्त्री — में रुचि रखता था, और कृत्रिम रूप से अमर बनकर इसी प्रकार के जीवन का भोग करना चाहता था।\n\nअमर बनने की अपनी इच्छा पूरी करने की आशा में उसने ब्रह्मा से घुमा-फिराकर अनेक वरदान माँगे। उसने वर माँगा कि उसे कोई मनुष्य, पशु, देवता अथवा चौरासी लाख योनियों के अन्तर्गत कोई भी जीव न मार सके। उसने यह भी माँगा कि वह न थल में मरे, न वायु में, न जल में, न ही किसी अस्त्र से। इस प्रकार आगे-आगे माँगता हुआ हिरण्यकशिपु मूर्खतावश सोचता रहा कि इससे उसे मृत्यु से अभय मिल जाएगा। किन्तु अन्त में, यद्यपि ब्रह्मा ने उसे ये सारे वरदान दे दिए, वह आधे-मनुष्य, आधे-सिंह के रूपधारी भगवान् के द्वारा मारा गया। और उसे मारने में भगवान् के नखों के अतिरिक्त किसी अस्त्र का प्रयोग नहीं हुआ। वह उस अद्भुत जीवन्त सत्ता की गोद में मारा गया, जो उसकी कल्पना से परे थी।\n\nयहाँ सारी बात यह है कि भौतिकतावादियों में सर्वाधिक शक्तिशाली हिरण्यकशिपु भी अपनी नाना योजनाओं से अमर नहीं हो सका। तो फिर आज के नन्हे हिरण्यकशिपुओं से क्या होगा, जिनकी योजनाएँ क्षण-क्षण में ध्वस्त होती रहती हैं? श्री ईशोपनिषद् हमें शिक्षा देती है कि हम अस्तित्व के संघर्ष को जीतने के एकांगी प्रयत्न न करें। हर कोई अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष कर रहा है, किन्तु भौतिक प्रकृति का नियम इतना कठोर और अटल है कि वह किसी को उसे लाँघने नहीं देता। स्थायी जीवन पाने के लिए मनुष्य को भगवद्धाम वापस जाने के लिए उद्यत होना चाहिए। भगवद्धाम वापसी की यह प्रक्रिया ज्ञान की एक भिन्न शाखा है, और इसे उपनिषद्, वेदान्त, भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत आदि प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों से सीखना होता है।\n\nअतएव इस जीवन में सुखी होने तथा इस भौतिक शरीर को छोड़ने के पश्चात् स्थायी आनन्दमय जीवन पाने के लिए मनुष्य को इस पवित्र साहित्य का आश्रय लेकर दिव्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। बद्धजीव भगवान् के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को भूल गया है, और उसने भूलवश अपने अस्थायी जन्म-स्थान को ही सर्वस्व मान लिया है। भगवान् ने कृपा करके विस्मरणशील मनुष्य को यह स्मरण कराने के लिए कि उसका घर इस भौतिक जगत् में नहीं है, भारत में उपर्युक्त शास्त्र तथा अन्य देशों में अन्य शास्त्र प्रदान किए हैं। जीव आध्यात्मिक सत्ता है, और वह भगवान् के पास, अपने आध्यात्मिक घर लौटकर ही सुखी हो सकता है। भगवान् अपने धाम से अपने प्रामाणिक सेवकों को भगवद्धाम-वापसी के इस सन्देश का प्रचार करने के लिए भेजते हैं, और कभी-कभी इस कार्य के लिए वे स्वयं आते हैं।\n\nसभी जीव भगवान् के प्रिय पुत्र हैं, उनके अंश हैं; अतः भौतिक दशा में हम जो कष्ट निरन्तर भोग रहे हैं, उनके लिए भगवान् हमसे भी अधिक दुःखी होते हैं। भौतिक जगत् के दुःख मृत पदार्थ के साथ हमारी अननुकूलता के अप्रत्यक्ष स्मारक भी हैं, और बुद्धिमान जीव प्रायः इन स्मारकों पर ध्यान देते हैं तथा साथ-साथ विद्या अर्थात् दिव्य ज्ञान के अनुशीलन में लग जाते हैं। मनुष्य-जीवन आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन का सर्वोत्तम अवसर है, और जो मनुष्य इस अवसर का लाभ नहीं उठाता, वह नराधम — मनुष्यों में अधम — कहलाता है। अविद्या का मार्ग, अर्थात् इन्द्रियतृप्ति के लिए ज्ञान की भौतिक उन्नति का मार्ग, बारम्बार मृत्यु और बारम्बार जन्म का भी मार्ग है।\n\nजीव, जैसा कि वह आध्यात्मिक रूप से है, न जन्म लेता है, न मरता है। जन्म और मृत्यु आत्मा के बाहरी आवरण — शरीर — से सम्बन्धित हैं। इसकी तुलना बाहरी वस्त्रों के पहनने और उतारने से की गई है। अविद्या के अनुशीलन में घोर रूप से लीन मूर्ख मनुष्य इस निष्ठुर प्रक्रिया की परवाह नहीं करते, अपितु माया के सौन्दर्य पर मोहित होकर वही कार्य बारम्बार करते रहते हैं और प्रकृति के नियम से कोई शिक्षा नहीं लेते। मनुष्य के लिए विद्या अर्थात् दिव्य ज्ञान का अनुशीलन अनिवार्य है। इन्द्रियों की रुग्ण, भौतिक दशा में अनियन्त्रित इन्द्रियभोग को यथासम्भव नियन्त्रित करना चाहिए। इस शारीरिक दशा में अनियन्त्रित इन्द्रियभोग अज्ञान और मृत्यु का पथ है।\n\nजीव आध्यात्मिक इन्द्रियों से रहित नहीं हैं। प्रत्येक जीव के पास अपने मूल आध्यात्मिक स्वरूप में वे सभी इन्द्रियाँ हैं, जो अब शरीर और मन से आच्छादित होकर भौतिक हो गई हैं। भौतिक इन्द्रियों के कार्यकलाप आध्यात्मिक लीलाओं के विकृत प्रतिबिम्ब हैं। भौतिक आवरण के अधीन आत्मा की संलग्नता आत्मा की रुग्ण दशा है। और वास्तविक इन्द्रिय-सुख तभी सम्भव है जब यह रोग दूर हो जाए। समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त, अपने शुद्ध आध्यात्मिक स्वरूप में ही इन्द्रियों का शुद्ध भोग सम्भव है। अतः मनुष्य-जीवन का लक्ष्य विकृत इन्द्रियभोग नहीं, अपितु इस भौतिक रोग का उपचार होना चाहिए। भौतिक रोग को बढ़ाना ज्ञान का लक्षण नहीं है। यह अविद्या अर्थात् अज्ञान के अनुशीलन का लक्षण है।\n\nअच्छे स्वास्थ्य के लिए ज्वर को 105 डिग्री से बढ़ाकर 107 डिग्री नहीं किया जाता। उसे घटाकर 98.6 की सामान्य अवस्था पर लाना होता है। यही मनुष्य-जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। भौतिक सभ्यता की आधुनिक प्रवृत्ति इस ज्वरग्रस्त भौतिक दशा का ताप बढ़ाने की है, जो परमाणु-ऊर्जा के रूप में 107 डिग्री तक पहुँच चुका है, और मूर्ख राजनेता चिल्ला रहे हैं कि किसी भी क्षण संसार नरक में जा सकता है। यह भौतिक ज्ञान की उन्नति का तथा जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग — आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन — की उपेक्षा का परिणाम है। श्री ईशोपनिषद् में यहाँ चेतावनी है कि हम मृत्यु की ओर ले जाने वाले ऐसे संकटपूर्ण पथ का अनुसरण न करें।\n\nइसके विपरीत, हमें साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन विकसित करना चाहिए, ताकि हम मृत्यु के निष्ठुर हाथों से पूर्णतः मुक्त हो सकें। इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर-निर्वाह के समस्त नागरिक कार्यकलाप रोक दिए जाएँ। कार्य रोकने का प्रश्न ही नहीं उठता, जैसे रोग से उबरने के प्रयत्न में शरीर का तापमान पूरी तरह मिटा देने का प्रश्न नहीं उठता। हम \"बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग\" कहकर इस बात को समझाने का प्रयास पहले ही कर चुके हैं। आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन इसी शरीर और मन की सहायता से करना होता है; अतएव यदि हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचना है, तो शरीर और मन का पालन आवश्यक है।\n\nसामान्य तापमान 98.6 डिग्री पर बनाए रखना चाहिए, उसे मूर्खतावश 107 डिग्री तक नहीं बढ़ाना चाहिए। भारत के महान साधु-सन्त भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान के सन्तुलित कार्यक्रम द्वारा इसी सामान्य तापमान को बनाए रखना चाहते थे। उन्होंने रुग्ण इन्द्रियतृप्ति के लिए मानव-बुद्धि का दुरुपयोग कभी नहीं होने दिया। इन्द्रियतृप्ति की प्रवृत्ति से रुग्ण मानव-कार्यकलापों को वेदों में मोक्ष के सिद्धान्तों के अन्तर्गत नियमित किया गया है। यह व्यवस्था चार विभागों में मिलती है: धर्म, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति और मोक्ष। वर्तमान समय में लोगों की रुचि न धर्म में है, न मोक्ष में। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है इन्द्रियतृप्ति, और इसी की पूर्ति के लिए वे आर्थिक विकास की नाना योजनाएँ बनाते हैं।\n\nपथभ्रष्ट मनुष्य सोचता है कि धर्म को इसलिए बनाए रखना चाहिए कि वह आर्थिक विकास में योगदान देता है, और आर्थिक विकास इन्द्रियतृप्ति के लिए आवश्यक है। और मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग में आगे भी इन्द्रियतृप्ति सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक अनुष्ठानों की कोई व्यवस्था कर ली जाती है। किन्तु मोक्ष के सिद्धान्तों का यह प्रयोजन नहीं है। धर्म का पथ वस्तुतः आत्म-साक्षात्कार के लिए है। आर्थिक विकास केवल शरीर को स्वस्थ, सुदृढ़ दशा में बनाए रखने के लिए आवश्यक है। मनुष्य को स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के साथ इसीलिए जीना चाहिए कि वह विद्या — सच्चे ज्ञान — की अनुभूति कर सके, जो मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है। यह जीवन गधे की भाँति परिश्रम करने, अविद्या के अनुशीलन या इन्द्रियतृप्ति के लिए नहीं है।\n\nविद्या का पथ श्रीमद्भागवत में सर्वाधिक पूर्ण रूप से प्रस्तुत हुआ है। भागवत मनुष्य को निर्देश देता है कि वह अपने जीवन का उपयोग परम सत्य की जिज्ञासा में करे। परम सत्य की अनुभूति क्रमशः ब्रह्म, परमात्मा और अन्त में भगवान् — पुरुषोत्तम भगवान् — के रूप में होती है। परम सत्य की यह अनुभूति उस उदारचेता मनुष्य को होती है जिसने ऊपर वर्णित भगवद्गीता के अठारह सिद्धान्तों का पालन करके ज्ञान और वैराग्य प्राप्त कर लिया है। इन अठारह सिद्धान्तों का केन्द्रबिन्दु है भगवान् की दिव्य भक्ति की प्राप्ति। अतएव सभी श्रेणियों के मनुष्यों को भगवद्भक्ति की कला सीखने की अनुशंसा की जाती है। भगवद्भक्ति की प्राप्ति के लक्ष्य से रहित धार्मिकता, आर्थिक विकास और इन्द्रियतृप्ति — ये सब अविद्या के ही विभिन्न रूप हैं, जैसा कि आगे श्री ईशोपनिषद् में दिखाया जाएगा। अतः विद्या के अनुशीलन के लिए, विशेषतः इस युग में, मनुष्य को एकाग्र चित्त से उन भगवान् पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, जो समस्त अध्यात्मवादियों के स्वामी हैं, सदा श्रवण, कीर्तन और आराधना करनी चाहिए।"}
{"ref": "iso/12", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/12/", "verse_text": "", "devanagari": "> अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते।\n> ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँ रताः॥१२॥", "synonyms": "*अन्धम्*—अज्ञान; *तमः*—अन्धकार; *प्रविशन्ति*—में प्रवेश करते हैं; *ये*—जो; *असम्भूतिम्*—देवता; *उपासते*—पूजते हैं; *ततः*—उससे; *भूयः*—और भी अधिक; *इव*—उसी प्रकार; *ते*—वे; *तमः*—अन्धकार; *ये*—जो; *उ*—भी; *सम्भूत्याम्*—परम सत्य में; *रताः*—संलग्न।", "translation": "**जो *देवताओं* की पूजा में संलग्न हैं, वे अज्ञान के घोरतम अन्धकार-प्रदेश में प्रवेश करते हैं, और *निर्विशेष परम तत्त्व* के उपासक उनसे भी अधिक।**", "purport": "संस्कृत शब्द असम्भूति का अर्थ है वे जिनका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। सम्भूति हैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो सबसे सर्वथा स्वतन्त्र हैं। भगवद्गीता में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं अपना सकारात्मक वर्णन इन शब्दों में करते हैं: \"देवताओं, महर्षियों और योगियों को प्रदत्त शक्तियों का परम कारण मैं हूँ। और चूँकि ये सीमित शक्तियों से युक्त हैं, इनके लिए यह जानना अत्यन्त कठिन है कि मैं अपनी अन्तरंगा शक्ति से किस प्रकार स्वयं मनुष्य-रूप में प्रकट होता हूँ।\" सभी दार्शनिक और बड़े-बड़े ऋषि अर्थात् योगीजन अपनी क्षुद्र बुद्धि के बल से परम को सापेक्ष से पृथक् करने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु इससे वे केवल सापेक्षता के निषेध के बिन्दु तक ही पहुँच सकते हैं, परम के किसी सकारात्मक चिह्न की अनुभूति किए बिना।\n\nनिषेध द्वारा परम की परिभाषा कोई पूर्ण धारणा नहीं है। ऐसी निषेधात्मक परिभाषाएँ मनुष्य को अपनी ही एक धारणा गढ़ने की ओर ले जाती हैं, और तब वह कल्पना करता है कि परम अवश्य ही रूपहीन और गुणहीन होगा। किन्तु ये निषेध सापेक्ष रूपों और गुणों के विपरीत अंक मात्र हैं, अतः स्वयं भी सापेक्ष हैं। परम की ऐसी धारणा से मनुष्य अधिक-से-अधिक भगवान् के निर्विशेष तेज तक पहुँच सकता है, जिसे ब्रह्म कहते हैं; किन्तु वह भगवान् — पुरुषोत्तम भगवान् — की अवस्था तक आगे नहीं बढ़ सकता। ऐसे मनोधर्मी यह नहीं जानते कि श्रीकृष्ण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, कि निर्विशेष ब्रह्म उनके दिव्य शरीर का देदीप्यमान तेज है, और परमात्मा उनका सर्वव्यापी प्रतिनिधि-स्वरूप है।\n\nवे नहीं जानते कि श्रीकृष्ण का नित्य आनन्द और ज्ञान के दिव्य गुणों से युक्त सनातन रूप है। आश्रित देवता और बड़े-बड़े ऋषि उन्हें अपूर्ण रूप से शक्तिशाली देवताओं में से एक मान लेते हैं और ब्रह्म-तेज को ही चरम परम सत्य समझते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण के भक्त — जो अपनी अनन्य भक्ति के बल से उनके शरणागत होते हैं — जान सकते हैं कि वे ही परम पुरुष हैं और सब कुछ उन्हीं से उद्भूत होता है। ऐसे भक्त सबके उद्गम श्रीकृष्ण की निरन्तर प्रेममयी सेवा करते रहते हैं। भगवद्गीता में यह भी कहा गया है कि केवल मोहग्रस्त व्यक्ति ही, इन्द्रियतृप्ति की प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर, क्षणिक समस्याओं के समाधान हेतु देवताओं की पूजा करते हैं। किसी देवता की कृपा से किसी कठिनाई से अस्थायी छुटकारा पाना अल्पबुद्धि व्यक्तियों की माँग है।\n\nजीव भौतिक उलझन में पड़ा है, और स्थायी छुटकारे के लिए उसे भौतिक बन्धन से पूर्णतः मुक्त होकर उस आध्यात्मिक धरातल पर पहुँचना होगा जहाँ नित्य आनन्द, जीवन और ज्ञान विद्यमान हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि देवताओं के उपासक उन-उन देवताओं के लोकों को जा सकते हैं। चन्द्रमा के उपासक चन्द्रलोक जा सकते हैं, सूर्य के उपासक सूर्यलोक, इत्यादि। आधुनिक वैज्ञानिक अब रॉकेटों की सहायता से चन्द्रमा पर जाने का प्रयत्न कर रहे हैं — जो वस्तुतः कोई नया प्रयास नहीं है। अपनी विकसित चेतना के कारण मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति अन्तरिक्ष में यात्रा करने और अन्य ग्रहों तक पहुँचने की है — चाहे स्पुतनिकों से, चाहे योगशक्तियों से, चाहे उस ग्रह के अधिष्ठाता देवता की उपासना से।\n\nवैदिक शास्त्रों में कहा गया है कि उपर्युक्त किसी भी उपाय से — प्रायः उस ग्रह के अधिष्ठाता देवता की उपासना से — मनुष्य अन्य ग्रहों तक पहुँच सकता है। किन्तु ये सब ग्रह अस्थायी निवास-स्थान हैं; स्थायी लोक तो केवल वैकुण्ठलोक हैं, जो आध्यात्मिक आकाश में हैं और जहाँ स्वयं भगवान् विराजते हैं। भगवद्गीता इसकी पुष्टि इस प्रकार करती है: चाहे कोई सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक तक भी क्यों न पहुँच जाए, उसे फिर लौटना ही पड़ता है। किन्तु जो मुझे (आध्यात्मिक जगत् में) प्राप्त कर लेता है, उसे फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। श्री ईशोपनिषद् संकेत करती है कि साधन चाहे जो भी हों, भौतिक ग्रहों पर मँडराते रहने से मनुष्य घोरतम अन्धकार-प्रदेश में ही रहता है। समूचा ब्रह्माण्ड विराट भौतिक तत्त्वों से आच्छादित है — ठीक उस नारियल के गोले की भाँति जो आधा जल से भरा हो।\n\nचूँकि यह वायुरुद्ध और पूर्णतः आच्छादित है, भीतर का अन्धकार घना है; इसीलिए ब्रह्माण्ड के भीतरी भाग को प्रकाशित करने के लिए सूर्य और चन्द्रमा जैसे ग्रहों की आवश्यकता होती है। ब्रह्माण्ड के बाहर असीम ब्रह्मज्योति का विशाल विस्तार है, जो वैकुण्ठलोकों से परिपूर्ण है। ब्रह्मज्योति का सबसे बड़ा और सर्वोच्च लोक कृष्णलोक अर्थात् गोलोक वृन्दावन है, जहाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उस कृष्णलोक को, जहाँ वे अपने नित्य पार्षदों के साथ रहते हैं, कभी नहीं छोड़ते; फिर भी वे सम्पूर्ण भौतिक और आध्यात्मिक विश्व-स्थिति में सर्वव्यापी हैं। इस तथ्य की व्याख्या श्री ईशोपनिषद् के चौथे मन्त्र में पहले ही की जा चुकी है। भगवान् सर्वत्र उसी प्रकार उपस्थित हैं जैसे सूर्य। मनुष्य अधिकतम सम्भव गति से अन्तरिक्ष में चलता रहे, फिर भी वह पाएगा कि सूर्य वहीं है — यद्यपि सूर्य अपनी अविचल कक्षा में ही स्थित है।\n\nचन्द्रमा पर जाने से जीवन की समस्या हल नहीं हो सकती। अनेक ऐसे छद्म-उपासक हैं जो केवल नाम और यश के लिए धार्मिक बनते हैं। ऐसे छद्म-धार्मिक इस ब्रह्माण्ड से निकलकर आध्यात्मिक आकाश तक पहुँचना नहीं चाहते। वे तो भगवान् की उपासना के वेश में भौतिक जगत् में केवल यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। और नास्तिक तथा निर्विशेषवादी नास्तिकता के मत का प्रचार करके ऐसे मूर्ख छद्म-धार्मिकों को घोरतम अन्धकार-प्रदेशों की ओर ले जाते हैं। नास्तिक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अस्तित्व को सीधे नकारता है, और निर्विशेषवादी परमेश्वर के निर्विशेष अस्तित्व का प्रचार करके नास्तिक का समर्थन करता है। श्री ईशोपनिषद् में अब तक हमें ऐसा कोई मन्त्र नहीं मिला जिसमें भगवान् का निषेध किया गया हो।\n\nकहा गया है कि वे किसी से भी अधिक तीव्र दौड़ सकते हैं। जो ग्रहों के पीछे दौड़ रहे हैं, वे निश्चय ही व्यक्ति हैं; और यदि भगवान् उन सबसे तीव्र दौड़ सकते हैं, तो उन्हें निर्विशेष क्यों माना जाए? परमेश्वर की निर्विशेष धारणा अज्ञान का ही दूसरा मुख है, जो परम सत्य के अपूर्ण दर्शन से उत्पन्न होती है। और इस प्रकार अज्ञानी छद्म-धार्मिक — तथाकथित अवतारों के निर्माता — वैदिक आदेशों का प्रत्यक्ष उल्लंघन करते हुए, अपने अनुयायियों को पथभ्रष्ट करने के अपने धन्धे के कारण ब्रह्माण्ड के घोरतम अन्धकार-प्रदेश में प्रवेश के भागी होते हैं। ये निर्विशेषवादी प्रायः उन मूर्खों के समक्ष, जिन्हें वैदिक प्रज्ञा का कोई ज्ञान नहीं, स्वयं को भगवान् का अवतार बताते हैं। और यदि ऐसे मूर्खों के पास कुछ ज्ञान हो भी, तो उनके हाथों में वह अज्ञान से भी अधिक संकटपूर्ण है।\n\nऐसे निर्विशेषवादी तो शास्त्रों में अनुशंसित देवताओं की उपासना तक नहीं करते। शास्त्रों में विभिन्न परिस्थितियों में देवताओं की उपासना की अनुशंसा है, किन्तु साथ ही यह भी कहा गया है कि वस्तुतः इसकी कोई आवश्यकता नहीं। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि देवताओं की उपासना के फल स्थायी नहीं होते। समूचा भौतिक जगत् ही अस्थायी है; अतः भौतिक अस्तित्व के इस अन्धकार में जो कुछ प्राप्त किया जाता है, वह भी अनित्य है। तब समस्या यह है कि वास्तविक और स्थायी जीवन कैसे प्राप्त हो। भगवान् कहते हैं कि ज्योंही कोई भक्ति के द्वारा — जो भगवान् तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है — उन्हें प्राप्त कर लेता है, त्योंही उसे जन्म-मृत्यु के बन्धन से पूर्ण मुक्ति मिल जाती है।\n\nदूसरे शब्दों में, मोक्ष का अर्थात् भौतिक चंगुल से निकलने का मार्ग पूर्णतः ज्ञान और वैराग्य के सिद्धान्तों पर निर्भर है। और छद्म-धार्मिकों के पास न ज्ञान है, न भौतिक विषयों से वैराग्य। उनमें से अधिकांश परोपकारी और लोकहितैषी कार्यों की छाया में, धार्मिक सिद्धान्तों के नाम पर, भौतिक बन्धन की सुनहरी बेड़ियों में ही बने रहना चाहते हैं। मिथ्या धार्मिक भावुकता से वे भक्ति का दिखावा रचते हैं और साथ ही सब प्रकार के अनैतिक आचरण में लिप्त रहते हैं — फिर भी आध्यात्मिक गुरु और भगवद्भक्त कहलाते हैं। धार्मिक सिद्धान्तों के ऐसे उल्लंघनकर्ताओं को कठोर गुरु-परम्परा के अधिकृत आचार्यों — पवित्र शिक्षकों — के प्रति कोई आदर नहीं है; और सामान्य जनता को पथभ्रष्ट करने के लिए वे स्वयं ही तथाकथित आचार्य बन बैठते हैं, जबकि वे आचार्यों के सिद्धान्तों का पालन तक नहीं करते।\n\nमानव-समाज के ये धूर्त सबसे संकटपूर्ण तत्त्व हैं, और धार्मिक शासन के अभाव में वे राज्य के विधान से दण्डित हुए बिना बचे रहते हैं। किन्तु वे परमेश्वर के विधान से नहीं बच सकते, जिन्होंने भगवद्गीता में स्पष्ट घोषणा की है कि धर्म-प्रचारकों के वेश में ये ईर्ष्यालु असुर नरक के घोरतम अन्धकार-प्रदेश में फेंक दिए जाएँगे। श्री ईशोपनिषद् में पुष्टि की गई है कि ये छद्म-धार्मिक, आध्यात्मिक गुरुपन का धन्धा — जो केवल इन्द्रियतृप्ति के लिए है — समाप्त करने के पश्चात्, ब्रह्माण्ड के सर्वाधिक घृणित स्थान की ओर बढ़ रहे हैं।"}
{"ref": "iso/13", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/13/", "verse_text": "", "devanagari": "> अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्।\n> इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१३॥", "synonyms": "*अन्यत्*—भिन्न; *एव*—निश्चय ही; *आहुः*—कहा जाता है; *सम्भवात्*—समस्त कारणों के कारणस्वरूप परमेश्वर की आराधना से; *अन्यत्*—भिन्न; *आहुः*—कहा जाता है; *असम्भवात्*—जो परम नहीं है, उसकी आराधना से; *इति*—इस प्रकार; *शुश्रुम*—मैंने इसे सुना; *धीराणाम्*—अविचलित अधिकारियों से; *ये*—जिन्होंने; *नः*—हमें; *तत्*—उस विषय में; *विचचक्षिरे*—भली-भाँति समझाया।", "translation": "**कहा गया है कि समस्त कारणों के *परम कारण* की उपासना से एक फल प्राप्त होता है, और जो परम नहीं है उसकी उपासना से दूसरा फल प्राप्त होता है। यह सब उन अविचलित प्रामाणिक आचार्यों से सुना गया, जिन्होंने इसे स्पष्ट रूप से समझाया।**", "purport": "श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में अविचलित प्रामाणिक आचार्यों से श्रवण करने की पद्धति की पुष्टि होती है। जब तक मनुष्य उस प्रामाणिक आचार्य से नहीं सुनता, जो भौतिक जगत् के परिवर्तनों से कभी विचलित नहीं होते, तब तक उसे दिव्य ज्ञान की वास्तविक कुंजी नहीं मिल सकती। प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने स्वयं भी अपने अविचलित आचार्य से श्रुति-मन्त्र अर्थात् वैदिक ज्ञान सुना है, कभी ऐसी कोई बात न गढ़ते हैं, न प्रस्तुत करते हैं, जिसका उल्लेख वैदिक साहित्य में न हो। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि पितरों के उपासक पितरों के पास पहुँचते हैं, इस संसार में यहीं रहने की योजनाएँ बनाने वाले स्थूल भौतिकतावादी यहीं रह जाते हैं, और भगवान् के वे भक्त, जो समस्त कारणों के परम कारण भगवान् श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी की उपासना नहीं करते, आध्यात्मिक आकाश में उनके धाम में उन्हें प्राप्त करते हैं।\n\nयहाँ श्री ईशोपनिषद् में भी कहा गया है कि उपासना की भिन्न-भिन्न विधियों से भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। यदि हम परमेश्वर की उपासना करें, तो निश्चय ही हम उनके नित्य धाम में परमेश्वर को प्राप्त करेंगे, और यदि हम सूर्य व चन्द्र जैसे देवताओं की उपासना करें, तो निःसन्देह हम उन-उन लोकों तक पहुँच सकते हैं। और यदि हम अपने योजना-आयोगों तथा अपनी अस्थायी राजनीतिक जोड़-तोड़ के साथ इस शोचनीय ग्रह पर ही रहना चाहें, तो निश्चय ही वह भी कर सकते हैं। प्रामाणिक शास्त्रों में कहीं नहीं कहा गया कि आप जो भी करें और जिसकी भी उपासना करें, अन्ततः उसी एक लक्ष्य पर पहुँचेंगे। ऐसे मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त वे स्वयंभू गुरु प्रस्तुत करते हैं, जिनका परम्परा अर्थात् गुरु-परम्परा की प्रामाणिक पद्धति से कोई सम्बन्ध नहीं है।\n\nप्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु यह नहीं कह सकते कि जिस किसी की अपनी-अपनी उपासना-पद्धति है — चाहे वह देवताओं की उपासना हो या परमेश्वर की — वह सबको एक ही लक्ष्य तक ले जाती है। सामान्य मनुष्य के लिए यह समझना अत्यन्त सरल है कि बम्बई से रेलगाड़ी द्वारा चलने वाला व्यक्ति उसी गन्तव्य तक पहुँच सकता है, जिसका उसने टिकट लिया है, अन्यत्र नहीं। जिसने कलकत्ता का टिकट लिया है, वह कलकत्ता पहुँच सकता है। किन्तु आज के तथाकथित गुरु यह प्रचार करते हैं कि आप चाहे जो आध्यात्मिक टिकट लें, वह आपको परम लक्ष्य तक पहुँचा देगा। ऐसे लौकिक तथा समझौतापूर्ण प्रस्ताव अनेक मूर्ख प्राणियों को आकृष्ट करते हैं, जो आध्यात्मिक साक्षात्कार की अपनी गढ़ी हुई विधियों के दर्प में फूल उठते हैं, किन्तु वैदिक उपदेश इनका समर्थन नहीं करता।\n\nजब तक मनुष्य ने प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से — जो गुरु-परम्परा की मान्य श्रृंखला में स्थित हों — ज्ञान प्राप्त नहीं किया, तब तक उसे वस्तु यथारूप प्राप्त नहीं हो सकती। भगवद्गीता कहती है: इस प्रकार, हे शत्रुदमन! [गीता के] ये योग-सिद्धान्त महान् राजाओं को ज्ञात थे। किन्तु परम्परा-पद्धति के खण्डित हो जाने से ये सिद्धान्त अब लुप्त-से प्रतीत होते हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण इस जगत् में उपस्थित थे, तब भगवद्गीता में परिभाषित भक्तियोग के सिद्धान्त विकृत हो चुके थे, अतः भगवान् को अर्जुन से आरम्भ करके गुरु-परम्परा की पद्धति पुनः स्थापित करनी पड़ी, जो भगवान् के परम विश्वस्त सखा और भक्त थे। भगवान् ने अर्जुन से स्पष्ट कहा कि चूँकि वे उनके भक्त और सखा थे, इसी कारण गीता के सिद्धान्त उनके लिए बोधगम्य थे।\n\nदूसरे शब्दों में, जो भगवान् का भक्त और सखा नहीं है, वह गीता को नहीं समझ सकता। इसका अर्थ है कि केवल वही गीता को समझ सकता है, जो अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है। वर्तमान समय में इस उदात्त संवाद के अनेक भाष्यकार हैं, जिनका अर्जुन या भगवान् श्रीकृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे भगवद्गीता के श्लोकों की अपने-अपने ढंग से व्याख्या करते हैं और गीता के नाम पर सब प्रकार की निरर्थक बातें प्रतिपादित करते हैं। ऐसे भाष्यकार न श्रीकृष्ण में विश्वास करते हैं, न उनके नित्य धाम में। तो फिर वे भगवद्गीता के विषय में क्या समझा सकते हैं? गीता स्पष्ट कहती है कि केवल वे ही देवताओं की उपासना करते हैं, जिनकी बुद्धि मारी गई है। श्रीकृष्ण अन्ततः यही उपदेश देते हैं कि मनुष्य उपासना के अन्य सब मार्गों और विधियों को त्यागकर केवल उनकी ही पूर्ण शरण ग्रहण करे।\n\nजो व्यक्ति समस्त पाप-फलों से शुद्ध हो चुके हैं, वे ही परमेश्वर में ऐसी अविचल श्रद्धा रख सकते हैं। शेष लोग उपासना की अपनी तुच्छ विधियों के साथ भौतिक क्षेत्र में ही मँडराते रहेंगे, और इस मिथ्या धारणा के वशीभूत होकर कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं, वास्तविक पथ से भटक जाएँगे। इस मन्त्र में संस्कृत शब्द सम्भवात् — परम कारण की उपासना — अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवान् श्रीकृष्ण आदि पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और जो कुछ विद्यमान है, वह सब उन्हीं से उद्भूत हुआ है। गीता में भगवान् स्वयं अपना परिचय देते हैं। वे वहाँ कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित सबके स्रष्टा वे ही हैं। और चूँकि भौतिक जगत् के ये तीनों प्रधान देव भगवान् द्वारा सृजित हैं, अतएव भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों में जो कुछ भी विद्यमान है, उस सबके स्रष्टा वे ही हैं।\n\nअथर्ववेद में भी इसी प्रकार कहा गया है कि जो ब्रह्मा की सृष्टि से पूर्व विद्यमान थे और जिन्होंने ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान से प्रकाशित किया, वे भगवान् श्रीकृष्ण हैं। “परम पुरुष ने जीवों की सृष्टि करने की इच्छा की, और इस प्रकार नारायण ने समस्त प्राणियों की रचना की। नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न हुए। नारायण ने समस्त प्रजापतियों की रचना की। नारायण ने इन्द्र की रचना की। नारायण ने आठ वसुओं की रचना की। नारायण ने ग्यारह रुद्रों की रचना की। नारायण ने बारह आदित्यों की रचना की।” यह नारायण भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण प्रकाश होने से, नारायण और श्रीकृष्ण एक ही हैं। परवर्ती पाठ भी हैं, जो कहते हैं कि वही परमेश्वर देवकी के पुत्र हैं। देवकी और वसुदेव के साथ उनके बाल्यकाल तथा नारायण से उनकी अभिन्नता की पुष्टि श्रीपाद शंकराचार्य ने भी की है, यद्यपि शंकर वैष्णव अर्थात् साकारवादी सम्प्रदाय के नहीं हैं।\n\nअथर्ववेद में ही ऐसे अन्य पाठ भी हैं, जैसे यह: “आदि में केवल नारायण विद्यमान थे; न ब्रह्मा का अस्तित्व था, न शिव का, न अग्नि का, न जल का। न तारे थे, न सूर्य था, न चन्द्रमा। वे अकेले नहीं रहते। वे अपनी इच्छानुसार सृष्टि करते हैं।” मोक्षधर्म में कहा गया है: “मैंने प्रजापतियों और रुद्रों की रचना की। उन्हें मेरा पूर्ण ज्ञान नहीं है, क्योंकि वे भी मेरी मायाशक्ति से आवृत हैं।” वराह पुराण में कहा गया है: “नारायण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और उन्हीं से चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए, तथा रुद्र भी, जो आगे चलकर सर्वज्ञ हुए।” इस प्रकार समस्त वैदिक साहित्य इस मत की पुष्टि करता है कि नारायण अथवा श्रीकृष्ण ही समस्त कारणों के कारण हैं।\n\nब्रह्म-संहिता में भी कहा गया है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण हैं। वे “गोविन्द” हैं — प्रत्येक जीव को आनन्द देने वाले — और वे समस्त कारणों के आदि कारण हैं। वास्तविक विद्वान् व्यक्ति महान् ऋषियों तथा वेदों के प्रमाण से यह सब जानेगा और इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को सर्वस्व मानकर उनकी आराधना का निश्चय करेगा। वे ही व्यक्ति बुध अर्थात् वास्तविक विद्वान् कहलाते हैं, जो केवल श्रीकृष्ण की आराधना में ही दृढ़ रहते हैं। यह दृढ़ निश्चय तब स्थापित होता है, जब मनुष्य श्रद्धा और प्रेमपूर्वक अविचलित आचार्य से दिव्य सन्देश सुनता है। जिसे भगवान् श्रीकृष्ण में न श्रद्धा है, न प्रेम, वह इस सरल सत्य के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता। ऐसे श्रद्धाहीन व्यक्तियों को भगवद्गीता में मूढ़ — गधे के समान मूर्ख — कहा गया है।\n\nकहा गया है कि मूढ़ लोग भगवान् का उपहास करते हैं, क्योंकि उन्हें अविचलित आचार्य से पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता। जो भौतिक शक्ति की भँवर-गतियों से विचलित है, वह आचार्य बनने का अधिकारी नहीं है। गीता सुनने से पूर्व अर्जुन इसी भँवर से — परिवार, समाज तथा जाति-स्नेह की प्रतिक्रिया से — विचलित थे, और इसी कारण वे संसार के एक परोपकारी तथा अहिंसावादी पुरुष बनना चाहते थे। किन्तु जब वे परम पुरुष से भगवद्गीता का वैदिक ज्ञान सुनकर बुध बन गए, तब उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया और भगवान् श्रीकृष्ण के आराधक बन गए, जिन्होंने स्वयं कुरुक्षेत्र-युद्ध की योजना रची थी। अर्जुन ने अपने तथाकथित सम्बन्धियों से युद्ध करके भगवान् की आराधना की, और इस प्रकार वे भगवान् के शुद्ध भक्त बन गए।\n\nऐसी उपलब्धियाँ केवल वास्तविक श्रीकृष्ण की आराधना से ही सम्भव हैं, न कि उन मूर्खों द्वारा चलाए गए किसी गढ़े हुए “कृष्ण” की उपासना से, जिन्हें गीता तथा श्रीमद्भागवत में वर्णित कृष्ण-विज्ञान की सूक्ष्मताओं का कोई ज्ञान नहीं है। वेदान्त-सूत्र के अनुसार सम्भूत जन्म और पालन के स्रोत हैं, तथा संहार के पश्चात् आश्रय हैं। श्रीमद्भागवत, जो उसी रचयिता द्वारा वेदान्त-सूत्रों पर की गई स्वाभाविक टीका है, यह स्पष्ट करता है कि समस्त उद्भवों का स्रोत कोई जड़ पत्थर नहीं, अपितु अभिज्ञ अर्थात् पूर्ण चेतन है। फलतः आदि भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि वे भूत, वर्तमान और भविष्य से पूर्णतः अभिज्ञ हैं, और शिव तथा ब्रह्मा जैसे देवताओं सहित कोई भी उन्हें पूर्ण रूप से नहीं जानता।\n\nजो भौतिक अस्तित्व की लहरों से विचलित हैं, वे उन्हें पूर्ण रूप से नहीं जान सकते। ऐसे अर्ध-शिक्षित आध्यात्मिक गुरु कुछ समझौता करने का प्रयत्न करते हैं और जनसमूह को ही उपासना का विषय बना देते हैं। वे नहीं जानते कि जनसमूह की ऐसी उपासना सम्भव नहीं है, न ही जनसमूह पूर्ण है। यह कुछ ऐसा है, जैसे जड़ को सींचने के स्थान पर वृक्ष की पत्तियों पर जल डालना। उपासना की स्वाभाविक विधि यह है कि वृक्ष की उस जड़ में जल डाला जाए, जिससे पत्तियाँ उगती हैं। किन्तु आज के विचलित नेता जड़ की अपेक्षा पत्तियों के प्रति अधिक आकृष्ट हो जाते हैं, और इस कारण निरन्तर पत्तियों को सींचते रहने पर भी पोषण के अभाव में सब कुछ सूखता जा रहा है। श्री ईशोपनिषद् हमें जड़ को — समस्त अंकुरण के स्रोत को — सींचने का परामर्श देता है।\n\nशारीरिक सेवा द्वारा — जो कभी पूर्ण नहीं हो सकती — जनसमूह की उपासना करना आत्मा की सेवा की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण है। आत्मा ही वह जड़ है, जो कर्म अर्थात् भौतिक प्रतिक्रिया के नियम के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर उत्पन्न करती है। बूचड़खानों में बेचारे पशुओं के गले काटते हुए केवल मनुष्य की चिकित्सा-सहायता, सामाजिक सुविधाओं तथा शिक्षा-सुविधाओं द्वारा सेवा करना जीवों की कोई वास्तविक सेवा नहीं है। जीव भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों में जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि के भौतिक रोग से निरन्तर पीड़ित है। मानव-जीवन भौतिक अस्तित्व के इस जंजाल से निकलने का एक अवसर है। यह केवल जीव के परमेश्वर के साथ खोए हुए सम्बन्ध की पुनः स्थापना से ही सम्भव है।\n\nऔर भगवान् स्वयं आकर हमें परम अर्थात् सम्भूतम् की शरणागति का यह दर्शन सिखाते हैं। मानवता की वास्तविक सेवा यही है कि लोगों को परमेश्वर की शरणागति की शिक्षा दी जाए और पूर्ण प्रेम तथा शक्ति से केवल उन्हीं की आराधना की जाए। इस मन्त्र में श्री ईशोपनिषद् का यही उपदेश है। इस अशान्ति के युग में परमेश्वर की आराधना का सरल मार्ग है — उनके महान् कार्यकलापों का श्रवण और कीर्तन। किन्तु मनोधर्मी भगवान् के कार्यकलापों को काल्पनिक मानते हैं, अतः वे ऐसी किसी श्रवण-विधि से दूर रहते हैं और बेचारे भोले जनसमूह का ध्यान बँटाने के लिए सारहीन शब्दों का इन्द्रजाल रच लेते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के कार्यकलापों का श्रवण करने के स्थान पर वे अपने अनुयायियों से छद्म गुरु का ही गुणगान करवाकर अपना प्रचार करना अधिक पसन्द करते हैं।\n\nआधुनिक काल में ऐसे पाखण्डियों की संख्या पर्याप्त रूप से बढ़ गई है, और भगवान् के शुद्ध भक्तों के लिए यह एक समस्या बन गई है कि जनसमूह को इन पाखण्डियों तथा भगवान् के नकली अवतारों के अपवित्र प्रचार से कैसे बचाया जाए। उपनिषद् परोक्ष रूप से हमारा ध्यान आदि भगवान् श्रीकृष्ण की ओर आकृष्ट करते हैं, और भगवद्गीता, जो समस्त उपनिषदों का सार है, प्रत्यक्ष रूप से श्रीकृष्ण की ओर संकेत करती है। अतएव मनुष्य को चाहिए कि वह श्रीकृष्ण के विषय में वैसा ही सुने, जैसे वे गीता या श्रीमद्भागवत में हैं; इससे क्रमशः उसके मन को समस्त दूषित वस्तुओं से स्वच्छ होने में सहायता मिलेगी। भागवत कहता है: “भगवान् के कार्यकलापों के श्रवण से मनुष्य भगवान् का ध्यान भक्त की ओर आकृष्ट करता है।\n\nऔर भगवान्, प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित होने के कारण, भक्त को उचित दिशा-निर्देश देकर उसकी सहायता करते हैं।” भगवद्गीता भी इसकी पुष्टि करती है। भगवान् का यह आन्तरिक निर्देश भक्त के हृदय को उन समस्त मलिनताओं से स्वच्छ कर देता है, जो रजो तथा तमो — इन भौतिक गुणों से उत्पन्न होती हैं। अभक्त रजोगुण और तमोगुण के निर्देशन में रहते हैं। रजोगुण के कारण मनुष्य भौतिक आसक्ति से विरक्त नहीं हो पाता, और तमोगुण के कारण वह यह नहीं जान पाता कि वह वास्तव में क्या है और भगवान् क्या हैं। इस प्रकार रजोगुण की अवस्था में आत्म-साक्षात्कार की कोई सम्भावना नहीं रहती, चाहे मनुष्य धर्मात्मा का मिथ्या अभिनय कितना ही क्यों न करे। भक्त के लिए, भगवान् की कृपा से, रजोगुण और तमोगुण हट जाते हैं, और वह तुरन्त सतोगुण में स्थित हो जाता है, जो पूर्ण ब्राह्मण का लक्षण है।\n\nब्राह्मण-योग्यता की यह अवस्था कोई भी और हर कोई अर्जित कर सकता है, यदि वह प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति के पथ का अनुसरण करे। भागवत कहता है कि कोई भी निम्न-जन्मा जीव भगवान् के शुद्ध भक्त के मार्गदर्शन में पवित्र बनाया जा सकता है, क्योंकि भगवान् असाधारण रूप से शक्तिमान् हैं। ब्राह्मण-योग्यता का पहला लक्षण यह है कि साधक प्रसन्न हो जाता है और भगवान् की भक्ति के विषय में उत्साही बन जाता है। इससे उसके सम्मुख ईश्वर-विज्ञान का सम्पूर्ण रहस्य स्वतः अनावृत हो जाता है। और इस प्रकार ईश्वर-विज्ञान को जानकर वह क्रमशः अपनी भौतिक आसक्तियों से मुक्त होता जाता है, तथा भगवान् की कृपा से उसका सन्देहग्रस्त मन स्फटिक-सा निर्मल हो जाता है। इसी अवस्था में मनुष्य मुक्त आत्मा बन सकता है और जीवन के पग-पग पर भगवान् का दर्शन कर सकता है। यही श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में वर्णित सम्भवात् की पूर्णता है।"}
{"ref": "iso/14", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/14/", "verse_text": "", "devanagari": "> सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयँ सह।\n> विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते॥१४॥", "synonyms": "*सम्भूतिम्*—नित्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, उनका दिव्य नाम, रूप, लीला, गुण तथा परिकर, उनके धाम की विविधता आदि; *च*—तथा; *विनाशम्*—देवताओं, मनुष्यों, पशुओं आदि का क्षणिक भौतिक प्रकटीकरण, उनके मिथ्या नाम, यश आदि सहित; *च*—भी; *यः*—जो; *तत्*—उसे; *वेद*—जानता है; *उभयम्*—दोनों को; *सह*—साथ-साथ; *विनाशेन*—विनष्ट होने योग्य सब कुछ के साथ; *मृत्युम्*—मृत्यु को; *तीर्त्वा*—लाँघकर; *सम्-भूत्या*—भगवान् के नित्य राज्य में; *अमृतम्*—अमरता; *अश्नुते*—भोगता है।", "translation": "**मनुष्य को भगवान् तथा उनके दिव्य नाम को भली-भाँति जानना चाहिए, और साथ ही अपने क्षणभंगुर देवताओं, मनुष्यों तथा पशुओं सहित इस अस्थायी भौतिक सृष्टि को भी। जब मनुष्य इन्हें जान लेता है, तब वह मृत्यु को, और उसके साथ इस *नश्वर* विश्व-प्रकटीकरण को भी, लाँघ जाता है, और भगवान् के नित्य राज्य में आनन्द तथा ज्ञान से युक्त अपने शाश्वत जीवन का भोग करता है।**", "purport": "मानव-सभ्यता ने ज्ञान की अपनी तथाकथित प्रगति से अन्तरिक्ष-यानों तथा परमाणु-ऊर्जा सहित अनेक भौतिक वस्तुएँ बना ली हैं। किन्तु वह ऐसी स्थिति बनाने में असफल रही है, जिसमें मनुष्य को न मरना पड़े, न पुनः जन्म लेना पड़े, न वृद्ध होना पड़े, न रोगों से पीड़ित होना पड़े। जब भी कोई बुद्धिमान् व्यक्ति किसी तथाकथित वैज्ञानिक के सम्मुख ये प्रश्न उठाता है, तो वैज्ञानिक बड़ी चतुराई से उत्तर देता है कि भौतिक विज्ञान प्रगति कर रहा है और अन्ततः मनुष्य को मृत्युहीन तथा जराहीन बनाना सम्भव हो जाएगा। भौतिक वैज्ञानिकों के ऐसे उत्तर भौतिक प्रकृति के विषय में उनके घोर अज्ञान को सिद्ध करते हैं। भौतिक प्रकृति में सब कुछ पदार्थ के कठोर नियमों के अधीन है और उसे अस्तित्व की छह अवस्थाओं से होकर जाना पड़ता है: जन्म, वृद्धि, स्थिति, परिवर्तन, क्षय और अन्त में मृत्यु।\n\nजो कुछ भी भौतिक प्रकृति के संस्पर्श में है, वह अस्तित्व के उपर्युक्त छह नियमों से परे नहीं हो सकता; अतः कोई भी — चाहे देवता हो, मनुष्य हो, पशु हो या वृक्ष — इस भौतिक जगत् में सदा के लिए जीवित नहीं रह सकता। जीवन की अवधि भिन्न-भिन्न योनियों में भिन्न हो सकती है। इस भौतिक जगत् के प्रधान जीव ब्रह्माजी करोड़ों-करोड़ों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं, जबकि सूक्ष्म कीटाणु केवल कुछ घण्टे जीते हैं; इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस भौतिक जगत् में कोई भी शाश्वत रूप से जीवित नहीं रह सकता। यहाँ वस्तुएँ कुछ विशेष परिस्थितियों में जन्म लेती हैं या रची जाती हैं, कुछ काल तक रहती हैं, और यदि उनमें जीवन हो तो वे बढ़ती हैं, सन्तति उत्पन्न करती हैं, फिर क्रमशः क्षीण होती हैं और अन्त में नष्ट हो जाती हैं। इस नियम से तो ब्रह्मागण भी (भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डों में करोड़ों ब्रह्मा हैं — एक-से-एक बड़े) आज या कल मृत्यु के अधीन हैं।\n\nइसीलिए सम्पूर्ण भौतिक जगत् मर्त्यलोक अर्थात् मृत्यु का स्थान कहलाता है। भौतिक वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ इस स्थान को मृत्युहीन बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं, क्योंकि वैदिक साहित्य के अज्ञान के कारण उन्हें मृत्युरहित आध्यात्मिक प्रकृति की कोई जानकारी नहीं है। वैदिक साहित्य अनुभव से परिपक्व ज्ञान से परिपूर्ण है। किन्तु आधुनिक मनुष्य वेदों, पुराणों तथा अन्य शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करने से विमुख है। विष्णु पुराण से हमें यह जानकारी मिलती है कि भगवान् विष्णु की भिन्न-भिन्न शक्तियाँ हैं, जो परा अर्थात् श्रेष्ठ, तथा अपरा या अविद्या अर्थात् निकृष्ट कहलाती हैं। जिस भौतिक शक्ति में हम इस समय फँसे हुए हैं, वह अविद्या अर्थात् अपरा शक्ति कहलाती है, और भौतिक सृष्टि इसी शक्ति से सम्भव होती है। किन्तु एक अन्य, श्रेष्ठ शक्ति है, जो परा-शक्ति कहलाती है, जहाँ सब कुछ इस निकृष्ट भौतिक प्रकृति से भिन्न है।\n\nवह प्रकृति भगवान् की नित्य अर्थात् मृत्युरहित सृष्टि है। समस्त भौतिक लोक — ऊपरी, निचले और मध्यवर्ती, जिनमें सूर्य, चन्द्र और शुक्र सम्मिलित हैं — ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए हैं। ये लोक केवल ब्रह्मा की आयु-पर्यन्त ही विद्यमान रहते हैं। तथापि कुछ निचले लोक ब्रह्मा के एक दिन की समाप्ति पर नष्ट हो जाते हैं और ब्रह्मा के अगले दिन में पुनः रचे जाते हैं। ऊपरी लोकों में काल की गणना हमारी गणना से भिन्न है। हमारा एक वर्ष अनेक ऊपरी लोकों के चौबीस घण्टों अर्थात् एक दिन-रात के बराबर है। पृथ्वी के चार युग (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) इन ऊपरी लोकों के काल के अनुसार बाईस हज़ार वर्ष और पाँच महीनों की अवधि बनाते हैं।\n\nइतनी काल-अवधि को एक हज़ार से गुणा करने पर ब्रह्मा का एक दिन होता है, और ब्रह्मा की एक रात्रि भी उतनी ही होती है। ऐसे दिनों और रात्रियों के महीनों और वर्षों में संचित होने पर ब्रह्मा की आयु सौ वर्ष आँकी जाती है। और उनकी आयु के अन्त में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-प्रकटीकरण नष्ट हो जाता है। सूर्य और चन्द्र में निवास करने वाले जीव, तथा मर्त्यलोक-व्यवस्था के जीव भी — जिसमें यह पृथ्वी और पृथ्वी के नीचे के अनेक लोक सम्मिलित हैं — ब्रह्मा की रात्रि के समय प्रलय के जल में विलीन हो जाते हैं। इस काल में कोई जीव या जीव-योनि प्रकट नहीं रहती, यद्यपि आध्यात्मिक रूप से उनका अस्तित्व बना रहता है। यह अप्रकट अवस्था अव्यक्त कहलाती है। और पुनः, जब ब्रह्मा की आयु के अन्त में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नष्ट हो जाता है, तब भी अव्यक्त अवस्था होती है।\n\nकिन्तु इन दोनों अप्रकट अवस्थाओं से परे एक और — आध्यात्मिक — वातावरण या प्रकृति है, जहाँ बड़ी संख्या में आध्यात्मिक लोक हैं, जो तब भी नित्य रूप से विद्यमान रहते हैं, जब इस भौतिक ब्रह्माण्ड के समस्त लोक नष्ट हो जाते हैं। विभिन्न ब्रह्माओं के अधिकार-क्षेत्र के भीतर का विश्व-प्रकटीकरण भगवान् की शक्ति के एक-चौथाई भाग का प्रदर्शन है, और यह शक्ति अपरा कहलाती है। ब्रह्मा के अधिकार-क्षेत्र से परे की आध्यात्मिक प्रकृति त्रिपाद-विभूति कहलाती है — भगवान् की शक्ति का तीन-चौथाई भाग — और यही श्रेष्ठ शक्ति अर्थात् परा-प्रकृति है। आध्यात्मिक प्रकृति में अधिष्ठाता परम पुरुष भगवान् श्रीकृष्ण हैं। उन तक केवल अनन्य भक्ति से ही पहुँचा जा सकता है, किसी अन्य साधन से नहीं — न ज्ञान (दर्शन) और योग (योगसाधना) की विधियों से, कर्म (सकाम कर्म) की तो बात ही क्या।\n\nकर्मी अर्थात् सकाम कर्म करने वाले अपने को सूर्य और चन्द्र सहित स्वर्गलोक के लोकों तक उठा सकते हैं। ज्ञानी और योगी इनसे भी ऊँचे लोकों तक, जैसे ब्रह्मलोक तक, पहुँच सकते हैं; और भक्ति द्वारा और भी अधिक योग्य बनकर उन्हें आध्यात्मिक प्रकृति में प्रवेश की अनुमति मिलती है — योग्यता के अनुसार या तो आध्यात्मिक आकाश के प्रकाशमान विश्व-वातावरण (ब्रह्म) में, या लोकों पर। किन्तु यह निश्चित है कि भक्ति में प्रशिक्षित हुए बिना कोई भी वैकुण्ठ नामक आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश नहीं कर सकता। भौतिक लोकों पर ब्रह्मा से लेकर चींटी तक प्रत्येक प्राणी भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने का प्रयत्न कर रहा है, और यही भौतिक रोग कहलाता है। जब तक यह भौतिक रोग चलता रहता है, तब तक जीव को शरीर बदलने की प्रक्रिया से होकर जाना पड़ता है — चाहे देवता के रूप में, मनुष्य के रूप में या पशु के रूप में; और अन्ततः उसे दो प्रकार के प्रलयों के समय — ब्रह्मा की रात्रि में तथा ब्रह्मा की आयु के अन्त में — अप्रकट अवस्था सहनी पड़ती है।\n\nयदि हम बारम्बार जन्म-मृत्यु की प्रक्रिया को, तथा उसके सहवर्ती जरा और व्याधि को, समाप्त करना चाहते हैं, तो हमें आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश का प्रयत्न करना होगा, और भगवान् श्रीकृष्ण अपने पूर्ण विस्तारों के द्वारा उनमें से प्रत्येक लोक के अधिष्ठाता हैं। श्रीकृष्ण पर कोई प्रभुत्व नहीं जमा सकता। और जो कोई भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने का प्रयत्न करता है, वह बद्धजीव कहलाता है, जो भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन होकर बारम्बार जन्म-मृत्यु की पीड़ा भोगता है। भगवान् यहाँ धर्म के सिद्धान्तों की पुनः स्थापना करने आते हैं, और मूल सिद्धान्त है — उनके प्रति शरणागति का भाव विकसित करना। भगवान् भगवद्गीता के अन्तिम भाग में यही सिखाते हैं, किन्तु मूर्ख लोगों ने बड़ी चतुराई से इस प्रधान शिक्षा का अपार्थ किया है और लोगों को नाना प्रकार से पथभ्रष्ट किया है।\n\nउन्हें अस्पताल खोलने के लिए प्रेरित किया गया है, किन्तु भक्ति के द्वारा आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश हेतु स्वयं को शिक्षित करने में उनकी कोई रुचि नहीं है। उन्हें केवल अस्थायी सहायता-कार्यों में रुचि लेना सिखाया गया है, जो जीव के लिए वास्तविक सुख कभी नहीं ला सकते। वे प्रकृति की विनाशकारी शक्ति से निपटने के लिए नाना प्रकार की सार्वजनिक और अर्ध-सरकारी संस्थाएँ खड़ी करते हैं। किन्तु वे नहीं जानते कि दुर्लंघ्य प्रकृति को कैसे शान्त किया जाए। अनेक व्यक्तियों का प्रचार भगवद्गीता के महान् विद्वानों के रूप में किया जाता है, किन्तु वे भौतिक प्रकृति को शान्त करने की उस वास्तविक विधि की उपेक्षा कर देते हैं, जो वहाँ प्रस्तुत की गई है। प्रबल प्रकृति केवल ईश्वर-भावना के जागरण से ही शान्त की जा सकती है, जैसा कि गीता में स्पष्ट कहा गया है। तथापि श्री ईशोपनिषद् इस मन्त्र में यह सिखाता है कि मनुष्य को सम्भूति और विनाश — दोनों को साथ-साथ पूर्ण रूप से जानना चाहिए।\n\nकेवल विनाश को — अस्थायी भौतिक प्रकटीकरण को — जानने से आप कुछ भी नहीं बचा सकते: प्रकृति के क्रम में प्रतिक्षण विनाश होता रहता है। अस्पताल खोलने के किसी भी प्रयास से इन विनाशों से किसी को नहीं बचाया जा सकता। उन्हें केवल आनन्द और ज्ञान से युक्त शाश्वत जीवन के पूर्ण ज्ञान से ही बचाया जा सकता है। सम्पूर्ण वैदिक योजना का उद्देश्य मनुष्यों को शाश्वत जीवन प्राप्त करने की इस कला की शिक्षा देना है। लोग प्रायः इन्द्रियतृप्ति पर आधारित अन्य, क्षणिक रूप से आकर्षक वस्तुओं से पथभ्रष्ट हो जाते हैं, किन्तु इस प्रकार उन्हें भटकाने वाली ऐसी सेवा अत्यन्त पतित है। आपको अपने सहजीवी मनुष्य की रक्षा सही अर्थ में करनी चाहिए। सत्य को पसन्द या नापसन्द करने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो है ही। यदि आप बारम्बार के जन्म-मृत्यु से बचना चाहते हैं, तो आपको भगवान् की भक्ति को अपनाना ही होगा। अनिवार्यता के विषय में कोई समझौता नहीं हो सकता।"}
{"ref": "iso/15", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/15/", "verse_text": "", "devanagari": "> हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।\n> तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥१५॥", "synonyms": "*हिरण्मयेन*—प्रकाश के तेज से; *पात्रेण*—चकाचौंध करने वाले आवरण से; *सत्यस्य*—परम सत्य का; *अपिहितम्*—आच्छादित; *मुखम्*—मुख; *तत्*—उस आवरण को; *त्वम्*—आप; *पूषन्*—हे पालक; *अपावृणु*—कृपया हटाइए; *सत्य*—शुद्ध; *धर्माय*—भक्त के समक्ष; *दृष्टये*—प्रदर्शित करने हेतु।", "translation": "**हे मेरे प्रभु, समस्त जीवों के पालक, आपका वास्तविक मुख आपके चकाचौंध करने वाले तेज से आच्छादित है। कृपया उस आवरण को हटाइए और अपने आपको अपने शुद्ध भक्त के समक्ष प्रकट कीजिए।**", "purport": "भगवद्गीता में भगवान् अपनी व्यक्तिगत किरणों के विषय में — जो ब्रह्मज्योति कहलाती हैं, अर्थात् उनके स्वरूप का चकाचौंध करने वाला तेज — इस प्रकार बताते हैं: मैं उस निराकार ब्रह्म का आश्रय हूँ, जो अमर्त्य, अविनाशी और नित्य है, तथा चरम सुख की स्वरूपगत स्थिति है। (गीता 14/27) ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् — ये एक ही परम सत्य के दर्शन के तीन कोण हैं। ब्रह्म परम सत्य का वह पक्ष है, जो आरम्भिक साधक को सबसे अधिक बोधगम्य होता है। परमात्मा परम सत्य का वह पक्ष है, जो प्रगति कर चुके साधकों के लिए है। और भगवान् परम सत्य का चरम साक्षात्कार हैं। इसकी पुष्टि गीता में होती है, जहाँ भगवान् कहते हैं कि वे ही परम सत्य की चरम अवधारणा हैं। वे ब्रह्मज्योति के, तथा सर्वव्यापी परमात्मा-स्वरूप के भी, स्रोत हैं।\n\nजैसे वे कहते हैं कि वे ब्रह्मज्योति अर्थात् परम सत्य की निर्विशेष अवधारणा के चरम आश्रय हैं, वैसे ही वे गीता में यह भी कहते हैं कि उनकी असीम शक्ति की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है: संक्षेप में इतना कहा जा सकता है कि अपने एक पूर्ण अंश — सर्वव्यापी परमात्मा — के द्वारा वे सम्पूर्ण भौतिक विश्व-सृष्टि का पालन करते हैं। और आध्यात्मिक जगत् में भी वे समस्त प्रकटीकरणों का पालन करते हैं। अतएव श्री ईशोपनिषद् के श्रुति-मन्त्र में उन्हें पूषन् अर्थात् चरम पालनकर्ता कहकर सम्बोधित किया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण सदा दिव्य आनन्द से परिपूर्ण रहते हैं। जब वे पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भारत में वृन्दावन में उपस्थित थे, तब वे अपनी बाल-लीलाओं के आरम्भ से ही सदा दिव्य आनन्द में रहे। अघ, बक, पूतना और प्रलम्ब जैसे नाना असुरों का वध भी उनके लिए आनन्द-विहार ही था।\n\nजब वे अपने गाँव में थे, तब वे नटखट माखनचोर के रूप में अपनी माता, बहनों और सखाओं के साथ आनन्द मनाते थे, और उनकी चोरी से उनके सभी पार्षद दिव्य आनन्द का अनुभव करते थे। भगवान् माखनचोर के नाम से प्रसिद्ध हैं, किन्तु यह शब्द कभी निन्दा के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता। भगवान् के प्रसंग में माखनचोर शब्द उनके शुद्ध भक्तों के आनन्द के भाव से प्रयुक्त होता है। वृन्दावन में भगवान् ने जो कुछ किया, वह सब वहाँ के उनके पार्षदों के आनन्द के लिए था। ऐसे प्रकटीकरण उन्होंने दिव्य मार्ग के शुष्क चिन्तकों को, तथा परम सत्य को खोजने का प्रयत्न करने वाले तथाकथित हठयोग-पद्धति के नटों को भी, आकृष्ट करने के लिए रचे।\n\nअपने सखाओं — ग्वालबालों — के साथ भगवान् की बाल-क्रीड़ा के विषय में श्रील शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद्भागवत में कहा: जिन भगवान् की अनुभूति आनन्दमय निराकार ब्रह्म के रूप में होती है, जिनकी आराधना भक्तजन परमेश्वर के रूप में करते हैं, और जिन्हें संसारी लोग एक साधारण मनुष्य मानते हैं, वे उन ग्वालबालों के साथ खेले, जिन्होंने पुण्यकर्मों के विपुल संचय के पश्चात् वह पद प्राप्त किया था। इस प्रकार भगवान् अपने आध्यात्मिक पार्षदों के साथ शान्त (शान्ति), दास्य (सेवा-भाव), सख्य (मैत्री), वात्सल्य (पितृ-स्नेह) और माधुर्य (दाम्पत्य प्रेम) — इन विविध सम्बन्धों में सदा दिव्य प्रेममय लीलाओं में संलग्न रहते हैं। कहा जाता है कि भगवान् वृन्दावन-धाम से कभी बाहर नहीं जाते, तो फिर यह पूछा जा सकता है कि वे अपनी विभिन्न सृष्टियों का कार्य कैसे चलाते हैं।\n\nइसका उत्तर गीता में दिया गया है: वे अपने पूर्ण अंश के द्वारा, जो पुरुष-अवतार कहलाता है, समस्त भौतिक सृष्टि में व्याप्त रहते हैं। भगवान् को भौतिक सृष्टि, पालन और संहार से स्वयं कुछ लेना-देना नहीं है, किन्तु वे यह सब अपने पूर्ण विस्तार — इस परमात्मा-स्वरूप — के द्वारा सम्पन्न कराते हैं। प्रत्येक जीव आत्मा कहलाता है। वह प्रधान आत्मा, जो इन सबका नियन्त्रण करते हैं, परमात्मा हैं। ईश्वर-साक्षात्कार की सम्पूर्ण पद्धति एक महान् विज्ञान है। भौतिकतावादी केवल भौतिक सृष्टि के चौबीस तत्त्वों का विश्लेषण और उन पर मनन कर सकते हैं। पुरुष अर्थात् भगवान् के विषय में उन्हें बहुत थोड़ी जानकारी है। निर्विशेषवादी अध्यात्मवादी ब्रह्मज्योति के प्रखर तेज से ही मोहित रह जाते हैं। यदि कोई परम सत्य को पूर्ण रूप में देखना चाहे, तो उसे चौबीस भौतिक तत्त्वों के, तथा इस प्रखर तेज के भी, पार जाना होगा।\n\nश्री ईशोपनिषद् इसी दिशा का संकेत करता है, जब वह हिरण्मय पात्र — चकाचौंध करने वाले आवरण — को हटाने की प्रार्थना करता है। जब तक यह आवरण हटाया नहीं जाता, और जब तक मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का यथारूप दर्शन नहीं कर पाता, तब तक परम सत्य का वास्तविक साक्षात्कार कभी प्राप्त नहीं हो सकता। भगवान् का परमात्मा-स्वरूप उन तीन पूर्ण विस्तारों में से एक है, जो सामूहिक रूप से विष्णु-तत्त्व कहलाते हैं। ब्रह्माण्ड के भीतर का विष्णु-तत्त्व (तीन प्रधान देवों — ब्रह्मा, विष्णु और शिव — में से एक) क्षीरोदकशायी विष्णु के नाम से जाने जाते हैं। वे ही प्रत्येक व्यक्तिगत जीव में सर्वव्यापी परमात्मा हैं। और गर्भोदकशायी विष्णु समस्त जीवों के सामूहिक परमात्मा हैं। इन दोनों से परे कारण-सागर में शयन करने वाले कारणोदकशायी विष्णु हैं। वे समस्त ब्रह्माण्डों के स्रष्टा हैं।\n\nयोग-पद्धति गम्भीर साधक को यह सिखाती है कि वह विश्व-सृष्टि के चौबीस भौतिक तत्त्वों को पार करने के पश्चात् ऐसे विष्णु-तत्त्वों से भेंट करे। अनुभववादी दर्शन की साधना निराकार ब्रह्मज्योति की अनुभूति में सहायता करती है, जो भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य शरीर का प्रखर तेज है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में तथा ब्रह्म-संहिता (5/40) में भी होती है: करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्डों में असंख्य लोक हैं; उनमें से प्रत्येक अपनी विश्व-रचना में दूसरों से भिन्न है, और वे सभी ब्रह्मज्योति के एक कोने में स्थित हैं। यह ब्रह्मज्योति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की व्यक्तिगत किरण है, जिनकी मैं आराधना करता हूँ। ब्रह्म-संहिता का यह मन्त्र परम सत्य के वास्तविक साक्षात्कार की स्थिति है, और विचाराधीन श्री ईशोपनिषद् का श्रुति-मन्त्र साक्षात्कार की विधि के रूप में इसी मन्त्र की पुष्टि है।\n\nयह भगवान् से एक सरल प्रार्थना है कि वे ब्रह्मज्योति को हटा दें, ताकि मनुष्य ईश्वर का वास्तविक मुख देख सके। पूर्ण ज्ञान का अर्थ है — ब्रह्म के मूल को जानना। ब्रह्म के मूल भगवान् श्रीकृष्ण हैं, और श्रीमद्भागवत जैसे शास्त्रों में कृष्ण-विज्ञान का पूर्ण विस्तार किया गया है। भागवत में रचयिता श्रील व्यासदेव ने अनुभूति के आधार पर यह स्थापित किया है कि परम सत्य का वर्णन ब्रह्म, परमात्मा अथवा भगवान् के रूप में होता है। किन्तु उन्होंने कहीं नहीं कहा कि परम सत्य का वर्णन कहीं जीव — साधारण जीवात्मा — के रूप में हुआ है। अतः जीव सर्वशक्तिमान् परम सत्य नहीं है। अन्यथा, भगवान् का वास्तविक मुख देखने के लिए चकाचौंध करने वाले आवरण को हटाने हेतु जीव द्वारा प्रार्थना की कोई आवश्यकता ही न होती।\n\nअतएव निष्कर्ष यह है कि परम सत्य के शक्तिमान् प्रकटीकरणों के अभाव में निराकार ब्रह्म की अनुभूति होती है। इसी प्रकार, जब भगवान् की भौतिक शक्तियों की अनुभूति होती है और आध्यात्मिक शक्ति की बहुत थोड़ी या कोई जानकारी नहीं होती, तब वह परमात्मा-साक्षात्कार कहलाता है। अतः परम सत्य के ब्रह्म और परमात्मा — दोनों साक्षात्कार आंशिक साक्षात्कार हैं। किन्तु जब मनुष्य हिरण्मय पात्र के हटने के पश्चात् — जैसी इस मन्त्र में प्रार्थना की गई है — पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण शक्ति सहित साक्षात्कार करता है, तब वह अनुभव करता है कि वासुदेवः सर्वम् इति: वासुदेव नाम से विख्यात भगवान् श्रीकृष्ण ही सब कुछ हैं — ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्। वे भगवान् हैं — मूल — और ब्रह्म तथा परमात्मा उनकी शाखाएँ हैं। भगवद्गीता में तीन कोटि के अध्यात्मवादियों का तुलनात्मक विश्लेषण है — ज्ञानी, जो निराकार ब्रह्म के उपासक हैं; योगी, जो परमात्मा-स्वरूप के उपासक हैं; और भक्त, जो भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त हैं।\n\nगीता में कहा गया है कि सभी प्रकार के अध्यात्मवादियों में वह ज्ञानी श्रेष्ठ है, जिसने वैदिक ज्ञान की साधना की है। तो भी योगी ज्ञानियों से भी बढ़कर हैं। योगी सकाम कर्मियों से तो कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं ही। और सभी प्रकार के योगियों में “जो अपनी समस्त शक्ति से निरन्तर भगवान् की सेवा करता है, वही सर्वोच्च है।” सारांश यह है कि दार्शनिक श्रमिक से उत्तम है, और योगी दार्शनिक से कहीं श्रेष्ठ है। और समस्त योगियों में वह सर्वोच्च है, जो भक्तियोग का अनुसरण करता है, जो निरन्तर भगवान् की सेवा में संलग्न रहता है। श्री ईशोपनिषद् हमें जीवन की इसी पूर्णता की ओर निर्देशित करता है।"}
{"ref": "iso/16", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/16/", "verse_text": "", "devanagari": "> पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः।\n> यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते\n> पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥१६॥", "synonyms": "*पूषन्*—हे पालक; *एक-ऋषे*—आदि दार्शनिक; *यम*—नियामक सिद्धान्त; *सूर्य*—सूरियों (महान् भक्तों) के गन्तव्य; *प्राजापत्य*—प्रजापतियों (मानवजाति के पूर्वजों) के हितैषी; *व्यूह*—कृपया व्यवस्था कीजिए; *रश्मीन्*—किरणें; *समूह*—समेट लीजिए; *तेजः*—तेज; *यत्*—जिससे कि; *ते*—आपका; *रूपम्*—रूप; *कल्याण-तमम्*—परम मंगलमय; *तत्*—वह; *ते*—आपका; *पश्यामि*—मैं देख सकूँ; *यः*—जो हैं; *असौ*—सूर्य; *असौ*—वह; *पुरुषः*—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; *सः*—स्वयं; *अहम्*—मैं; *अस्मि*—हूँ।", "translation": "**हे मेरे प्रभु, हे आदि दार्शनिक, ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता, हे नियामक तत्त्व, शुद्ध भक्तों के गन्तव्य, मानवजाति के पूर्वजों के हितैषी! कृपया अपनी दिव्य किरणों के तेज को हटा लीजिए, ताकि मैं आपके *आनन्दमय* स्वरूप का दर्शन कर सकूँ। आप सूर्य के समान नित्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जैसा कि मैं भी हूँ।**", "purport": "सूर्य और सूर्य की किरणें गुण की दृष्टि से एक ही हैं। इसी प्रकार भगवान् और जीव गुण में एक समान हैं। सूर्य एक है, किन्तु सूर्य-किरणों के अणु असंख्य हैं। सूर्य की किरणें सूर्य का अंश हैं; सूर्य और किरणें मिलकर ही सम्पूर्ण सूर्य हैं। सूर्यलोक के भीतर सूर्यदेव हैं, और इसी प्रकार परम आध्यात्मिक लोक गोलोक वृन्दावन के भीतर, जिससे तेजोमय ब्रह्मज्योति निकल रही है, नित्य भगवान् विराजमान हैं, जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है: भगवान् श्रीकृष्ण का दिव्य धाम चिन्तामणियों की भूमि है, जिनसे वहाँ के भवन बने हैं और जिन पर कल्पवृक्षों की छाया है। वहाँ भगवान् सुरभि गायों को चराने में संलग्न रहते हैं, और सहस्रों लक्ष्मियाँ पूर्ण आदर के साथ सदा उनकी सेवा करती हुई उन्हें घेरे रहती हैं।\n\nभगवान् श्रीकृष्ण के इस दिव्य धाम का वर्णन ब्रह्म-संहिता में है, और वहाँ ब्रह्मज्योति का वर्णन उस लोक से निकलने वाली परम किरणों के रूप में किया गया है, ठीक जैसे सूर्य की किरणें सूर्य-मण्डल से आती हैं। जब तक मनुष्य ब्रह्मज्योति की चकाचौंध को पार नहीं कर लेता, तब तक उसे भगवान् के धाम की कोई जानकारी नहीं मिल सकती। निर्विशेषवादी दार्शनिक चमचमाती ब्रह्मज्योति से अन्धा होकर न तो भगवान् के वास्तविक धाम का साक्षात्कार कर सकता है, न उनके दिव्य रूप का। ऐसे अल्प ज्ञान से ग्रस्त चिन्तक भगवान् श्रीकृष्ण के सर्वानन्दमय दिव्य रूप को नहीं समझ सकते। अतः श्री ईशोपनिषद् भगवान् से यह प्रार्थना करती है कि वे ब्रह्मज्योति की तेजोमय किरणों को हटा लें, ताकि शुद्ध भक्त उनके सर्वानन्दमय दिव्य रूप का दर्शन कर सके।\n\nनिराकार ब्रह्मज्योति के साक्षात्कार से मनुष्य परमेश्वर के मंगलमय पक्ष का अनुभव करता है; परमात्मा अर्थात् परमेश्वर के सर्वव्यापी स्वरूप की अनुभूति से वह और भी अधिक मंगलमय प्रकाश का अनुभव करता है; और भगवान् से आमने-सामने मिलकर भक्त परमेश्वर के सर्वाधिक मंगलमय स्वरूप का अनुभव करता है। चूँकि परम सत्य को दार्शनिक, पालनकर्ता, हितैषी आदि रूपों में सम्बोधित किया गया है, अतः उन्हें निराकार नहीं माना जा सकता। यही श्री ईशोपनिषद् का संकेत है। “पालनकर्ता” शब्द विशेष महत्त्वपूर्ण है: यद्यपि भगवान् समस्त प्राणियों के पालनकर्ता हैं, तथापि वे अपने भक्तों का विशेष रूप से पालन करते हैं। निराकार ब्रह्मज्योति को पार करके जब भक्त भगवान् के साकार पक्ष और उनके परम मंगलमय नित्य रूप का दर्शन करता है, तब वह परम सत्य का पूर्ण साक्षात्कार करता है।\n\nश्रील जीव गोस्वामी अपने भगवत्-सन्दर्भ में इस प्रकार कहते हैं: परम सत्य की पूर्ण धारणा का साक्षात्कार भगवान् में होता है, क्योंकि वे सर्वशक्तिमान् हैं और दिव्यता में पूर्ण शक्ति से युक्त हैं। ब्रह्मज्योति में परम सत्य की पूर्ण शक्ति का साक्षात्कार नहीं होता, इसलिए ब्रह्म-साक्षात्कार भगवान् का आंशिक साक्षात्कार मात्र है। हे विद्वान ऋषियो, “भगवान्” शब्द का पहला अक्षर (भ) दो अर्थों में सार्थक है: पहला, “जो पूर्ण रूप से पालन करता है” के अर्थ में, और दूसरा “संरक्षक” के अर्थ में। दूसरे अक्षर “ग” का अर्थ है मार्गदर्शक, नेता या सृष्टिकर्ता। अक्षर “व” (अथवा “ब”) का अर्थ है कि प्रत्येक प्राणी उनमें वास करता है और वे भी प्रत्येक प्राणी में वास करते हैं। दूसरे शब्दों में, दिव्य ध्वनि “भगवान्” अनन्त ज्ञान, सामर्थ्य, ऊर्जा, ऐश्वर्य, बल और प्रभाव का — भौतिक विकारों के लेशमात्र स्पर्श से रहित — प्रतिनिधित्व करती है।\n\nभगवान् अपने अनन्य भक्तों का पूर्ण पालन करते हैं, और वे ऐसे भक्तों को भक्ति की पूर्णता के पथ पर क्रमशः आगे ले जाते हैं। अपने भक्तों के नेता के रूप में वे अन्ततः स्वयं को अपने भक्तों को सौंपकर भक्ति का वांछित फल प्रदान करते हैं। भगवान् के भक्त भगवान् की अहैतुकी कृपा से उनका साक्षात् दर्शन करते हैं, और इस प्रकार भगवान् अपने भक्तों को सर्वोच्च आध्यात्मिक लोक गोलोक वृन्दावन तक पहुँचने में सहायता करते हैं। सृष्टिकर्ता के रूप में वे अपने भक्त में सभी आवश्यक योग्यताएँ उत्पन्न कर सकते हैं, ताकि भक्त अन्ततः उन तक पहुँच सके। भगवान् समस्त कारणों के कारण हैं, और उनका कोई कारण नहीं, क्योंकि वे आदि कारण हैं। फलतः वे अपनी अन्तरंगा शक्ति को प्रकट करके स्वयं अपने आत्मस्वरूप का आनन्द लेते हैं।\n\nबहिरंगा शक्ति ठीक-ठीक उनके द्वारा स्वयं प्रकट नहीं होती, क्योंकि वे पुरुषों के रूप में अपना विस्तार करते हैं, और इन्हीं रूपों में वे भौतिक प्रकटीकरण के स्वरूपों का पालन करते हैं। ऐसे विस्तारों द्वारा ही वे विश्व-प्रकटीकरण की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। जीव भी उनके आत्मस्वरूप के भिन्नांश विस्तार हैं, और चूँकि कुछ जीव परमेश्वर का अनुकरण करते हुए स्वयं स्वामी बनना चाहते हैं, अतः भगवान् उन्हें प्रभुत्व जताने की अपनी प्रवृत्ति का पूर्ण उपयोग करने के विकल्प सहित विश्व-सृष्टि में प्रवेश करने देते हैं। उनके भिन्नांशों — जीवों — की उपस्थिति के कारण ही यह सम्पूर्ण दृश्य जगत् क्रिया-प्रतिक्रिया में गतिमान होता है। जीवों को भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की पूरी सुविधा दी जाती है, किन्तु परम नियन्ता स्वयं भगवान् ही हैं — अपने पूर्णांश स्वरूप परमात्मा के रूप में, जो पुरुषों में से एक हैं।\n\nअतएव आत्मा कहलाने वाले जीव और परमात्मा कहलाने वाले नियन्ता भगवान् के बीच — आत्मा और परमात्मा के बीच — आकाश-पाताल का अन्तर है। परमात्मा नियन्ता हैं और आत्मा नियन्त्रित; इसलिए वे एक ही स्तर पर नहीं हो सकते। परमात्मा आत्मा के साथ पूर्ण सहयोग करते हैं, और इसीलिए वे जीव के नित्य संगी कहलाते हैं। भगवान् का यह सर्वव्यापी स्वरूप — जो जाग्रत और सुषुप्ति की समस्त अवस्थाओं में, तथा अव्यक्त अवस्थाओं में भी विद्यमान रहता है, और जिससे जीव-शक्ति बद्ध और मुक्त दोनों आत्माओं के रूप में उत्पन्न होती है — ब्रह्म कहलाता है। इस प्रकार भगवान् परमात्मा और ब्रह्म दोनों के उद्गम हैं, अतः वे समस्त जीवों के तथा अन्य समस्त विद्यमान वस्तुओं के भी उद्गम हैं।\n\nजो यह जान लेता है, वह तुरन्त भगवान् की भक्ति में संलग्न हो जाता है। भगवान् का ऐसा शुद्ध एवं पूर्ण ज्ञानयुक्त भक्त तन-मन से उनमें पूर्णतः अनुरक्त रहता है, और जब भी ऐसा भक्त अपने समान भक्तों के साथ एकत्र होता है, तब उन्हें भगवान् की दिव्य लीलाओं के सन्दर्भ में उनका गुणगान करने के अतिरिक्त और कोई कार्य नहीं रहता। जो शुद्ध भक्तों जितने पूर्ण नहीं हैं — जिन्होंने भगवान् के केवल ब्रह्म-स्वरूप या परमात्मा-स्वरूप का ही साक्षात्कार किया है — वे ऐसे पूर्ण भक्तों के कार्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकते। किन्तु भगवान् ऐसे शुद्ध भक्तों के हृदय में आवश्यक ज्ञान देकर सदा उनकी सहायता करते हैं, और अपनी विशेष कृपा से वे अज्ञान के समस्त अन्धकार को नष्ट कर देते हैं। दार्शनिक और योगी इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि वे न्यूनाधिक अपने ही बल पर निर्भर रहते हैं।\n\nजैसा कि कठोपनिषद् में कहा गया है, भगवान् को केवल वही जान सकते हैं जिन पर वे कृपा करते हैं, अन्य कोई नहीं। और ऐसी विशेष कृपा केवल उनके शुद्ध भक्तों पर ही की जाती है। श्री ईशोपनिषद् यहाँ भगवान् की ऐसी ही कृपा की ओर संकेत करती है, जो ब्रह्मज्योति की सीमा से परे है।"}
{"ref": "iso/17", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/17/", "verse_text": "", "devanagari": "> वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतँ शरीरम्।\n> ॐ क्रतो स्मर कृतँ स्मर क्रतो स्मर कृतँ स्मर॥१७॥", "synonyms": "*वायुः*—प्राण-वायु; *अनिलम्*—वायु का समग्र आगार; *अमृतम्*—अविनाशी; *अथ*—अब; *इदम्*—यह; *भस्मान्तम्*—भस्म हो जाने के पश्चात्; *शरीरम्*—शरीर; *ओम्*—हे प्रभु; *क्रतो*—हे समस्त यज्ञों के भोक्ता; *स्मर*—कृपया स्मरण कीजिए; *कृतम्*—मेरे द्वारा किया गया सब कुछ; *स्मर*—कृपया स्मरण कीजिए; *क्रतो*—हे परम लाभार्थी; *स्मर*—कृपया स्मरण कीजिए; *कृतम्*—जो कुछ मैंने आपके लिए किया है; *स्मर*—कृपया स्मरण कीजिए।", "translation": "**यह नश्वर शरीर भस्म हो जाए, और प्राण-वायु समष्टि वायु में विलीन हो जाए। अब, हे मेरे प्रभु, कृपया मेरे सभी *यज्ञों* का स्मरण कीजिए, और चूँकि आप ही परम भोक्ता हैं, कृपया वह सब स्मरण कीजिए जो मैंने आपके लिए किया है।**", "purport": "यह अस्थायी भौतिक शरीर निश्चय ही एक पराया वस्त्र है। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि भौतिक शरीर के नष्ट होने पर जीव का विनाश नहीं होता, न ही वह अपना स्वत्व खोता है। अतः जीव का स्वत्व कभी निराकार या रूपरहित नहीं होता; इसके विपरीत, भौतिक वस्त्र ही रूपरहित है, जो उस अविनाशी पुरुष के रूप के अनुसार आकार ग्रहण करता है। कोई भी जीव मूलतः रूपरहित नहीं है, जैसा कि अल्पज्ञानी व्यक्ति भूलवश मान लेते हैं। यहाँ श्री ईशोपनिषद् के सत्रहवें मन्त्र में भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि होती है कि भौतिक शरीर के विनाश के पश्चात् जीव विद्यमान रहता है। भौतिक जगत् में भौतिक प्रकृति की अद्भुत कारीगरी दिखाई देती है, जो जीवों की इन्द्रियतृप्ति की प्रवृत्तियों के अनुसार उनके लिए विभिन्न प्रकार के शरीरों की रचना करती है।\n\nजो मल का स्वाद लेना चाहता था, उसे ऐसा भौतिक शरीर दिया जाता है जो मल खाने के सर्वथा उपयुक्त हो — सूअर का शरीर। इसी प्रकार बाघ को ऐसा शरीर मिलता है जिससे वह दूसरे पशुओं का रक्त पीकर और उनका मांस खाकर जी सके। मनुष्य मल या मांस खाने के लिए नहीं बना है, क्योंकि उसके दाँतों की बनावट भिन्न है। न ही जीवन की आदिमतम अवस्था में भी उसे मल चखने की कोई इच्छा होती है। मनुष्य के दाँत ऐसे बने हैं कि वे फल और शाक चबा व काट सकें, साथ में दो रदनक दाँत भी हैं, जिनसे मनुष्य मांस भी खा सकता है। सभी पशुओं और मनुष्यों के भौतिक शरीर जीव के लिए पराये हैं, और जीव की इन्द्रियतृप्ति की इच्छा के अनुसार बदलते रहते हैं।\n\nविकास के इस चक्र में जीव एक के बाद एक शरीर बदलता है: जलचर जीवन से — जब संसार जल से भरा था — वनस्पति जीवन में, वनस्पति जीवन से कृमि जीवन में, कृमि जीवन से पक्षी जीवन में, पक्षी जीवन से पशु जीवन में, और पशु जीवन से मानव रूप में। जीवन का सर्वोच्च विकास यह मानव रूप तब है, जब यह आध्यात्मिक ज्ञान की पूर्ण चेतना से युक्त हो; और आध्यात्मिक चेतना का सर्वोच्च विकास वेद के इस मन्त्र में वर्णित है: मनुष्य को यह भौतिक शरीर भस्म होने के लिए त्याग देना चाहिए और प्राण-वायु को वायु के नित्य आगार में विलीन हो जाने देना चाहिए। जीव की क्रियाएँ शरीर के भीतर विभिन्न प्रकार की वायुओं की गति से सम्पन्न होती हैं, जिन्हें समष्टि रूप में प्राण-वायु कहा जाता है।\n\nयोगीजन सामान्यतः शरीर की वायुओं को वश में करने का अभ्यास करते हैं, और माना जाता है कि आत्मा वायु के एक चक्र से दूसरे चक्र तक ऊपर उठती है, जब तक वह ब्रह्म-रन्ध्र — वायु के सर्वोच्च चक्र — तक नहीं पहुँच जाती। तब सिद्ध योगी अपने को इच्छानुसार किसी भी लोक में स्थानान्तरित कर सकता है। यह प्रक्रिया है — शरीर त्यागना और फिर दूसरे शरीर में प्रवेश करना; और ऐसे देह-परिवर्तन की सर्वोच्च सिद्धि तब सम्भव होती है, जब जीव इस भौतिक शरीर का पूर्णतः परित्याग कर सके, जैसा कि इस मन्त्र में सुझाया गया है। तब वह आध्यात्मिक वातावरण में प्रवेश कर सकता है, जहाँ वह सर्वथा भिन्न कोटि का शरीर — आध्यात्मिक शरीर — विकसित करता है, जिसे कभी मृत्यु या परिवर्तन का सामना नहीं करना पड़ता। यहाँ भौतिक जगत् में मनुष्य को इन्द्रियतृप्ति की अपनी विभिन्न इच्छाओं के कारण भौतिक प्रकृति द्वारा बाध्य होकर शरीर बदलना पड़ता है।\n\nये इच्छाएँ जीवन की विभिन्न योनियों में प्रतिबिम्बित होती हैं — कीटाणुओं से लेकर ब्रह्मा और देवताओं के सर्वाधिक पूर्ण भौतिक शरीरों तक। इन सबके शरीर भिन्न-भिन्न आकारों के भौतिक शरीर हैं, और बुद्धिमान व्यक्ति शरीरों की विविधता में नहीं, अपितु आध्यात्मिक स्वत्व में एकता देखता है। परमेश्वर का भिन्नांश आध्यात्मिक स्फुलिंग सूअर के शरीर में हो या देवता के शरीर में — एक ही है। जीव के पुण्य और पाप कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर मिलते हैं। मानव शरीर उच्च विकसित है, जिसमें शरीर की संरचना की पूर्ण चेतना रहती है; और वैदिक शास्त्रों के अनुसार सर्वाधिक पूर्ण मनुष्य वह है, जो अनेकानेक जन्मों तक ज्ञान का अनुशीलन करने के पश्चात् भगवान् की शरण ग्रहण करता है।\n\nज्ञान का अनुशीलन तभी पूर्णता को प्राप्त होता है, जब ज्ञाता वासुदेव कहलाने वाले परमेश्वर की शरणागति के बिन्दु तक पहुँचता है। किन्तु अपने आध्यात्मिक स्वत्व का ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी, जब तक मनुष्य यह नहीं जान लेता कि जीव पूर्ण के नित्य भिन्नांश हैं और वे कभी पूर्ण नहीं बन सकते, तब तक उसे — ब्रह्मज्योति से एकाकार हो जाने के बाद भी — पुनः भौतिक वातावरण में गिरना पड़ता है। भगवान् के दिव्य शरीर से निकलने वाली ब्रह्मज्योति आध्यात्मिक स्फुलिंगों से परिपूर्ण है। ये आध्यात्मिक स्फुलिंग, अस्तित्व की पूर्ण चेतना से युक्त व्यक्तिगत स्वत्व होने के कारण, कभी-कभी इन्द्रियों के भोक्ता बनने की इच्छा करते हैं, और इस प्रकार उन्हें भौतिक जगत् में स्थान दिया जाता है, जहाँ वे इन्द्रियों के आदेश पर मिथ्या स्वामी बन सकें।\n\nप्रभुत्व जताने की यह भावना ही जीव का भौतिक रोग है, और ऐसे इन्द्रियभोग के वशीभूत होकर वह भौतिक जगत् में प्रकट विभिन्न शरीर-रूपों में देहान्तरण करता रहता है। अतः ब्रह्मज्योति से एकाकार होने की भावना परिपक्व ज्ञान नहीं है। भगवान् की पूर्ण शरणागति और आध्यात्मिक सेवा-भाव का विकास ही सर्वोच्च सिद्धावस्था है। इस मन्त्र में जीव भौतिक शरीर और भौतिक वायु को त्यागकर भगवान् के आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश की प्रार्थना करता है। भक्त भगवान् से प्रार्थना करता है कि वे उसके कार्यों और उसके द्वारा किए गए यज्ञों का स्मरण करें — अब, उसके भौतिक शरीर के भस्म होने से पूर्व। यह प्रार्थना मृत्यु के समय की जाती है — अपने विगत कर्मों और चरम लक्ष्य की पूर्ण चेतना के साथ।\n\nजो पूर्णतः भौतिक नियम के अधीन है, वह अपने भौतिक शरीर के अस्तित्व के दौरान किए गए जघन्य कार्यों का स्मरण करता है, और इसीलिए मृत्यु के बाद उसे दूसरा भौतिक शरीर मिलता है। भगवद्गीता इस सत्य की पुष्टि करती है। उसमें कहा गया है कि मृत्यु के समय मन मरणासन्न प्राणी की प्रवृत्तियों को अपने साथ ले जाता है, और उसी मानसिक अवस्था के अनुसार अगला जीवन प्राप्त होता है। साधारण पशुओं के विपरीत, जिनका मन विकसित नहीं होता, मनुष्य अपने बीतते जीवन के कार्यों का स्मरण रात के स्वप्नों की भाँति कर सकता है; अतएव उसका मन भौतिक इच्छाओं से भरा रहता है, और वह आध्यात्मिक शरीर के साथ आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। किन्तु भक्तगण भगवान् की भक्ति के अभ्यास से भगवत्प्रेम का भाव विकसित कर लेते हैं।\n\nऔर यदि मृत्यु के समय भक्त को अपनी भगवत्सेवा का स्मरण न भी रहे, तो भी भगवान् उसे नहीं भूलते। यह प्रार्थना भगवान् को भक्त के यज्ञों का स्मरण कराने के लिए है, किन्तु ऐसा स्मरण कराए बिना भी भगवान् शुद्ध भक्त की भक्ति को नहीं भूलते। गीता में भगवान् अपने भक्तों के साथ अपने घनिष्ठ सम्बन्ध का स्पष्ट वर्णन करते हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर इस प्रसंग में गीता के श्लोकों की व्याख्या इस प्रकार करते हैं: सन्तों के सही मार्ग पर चलने वाले भक्त को स्वीकार करना चाहिए, भले ही ऐसा भक्त शिथिल आचरण वाला प्रतीत हो। “शिथिल आचरण” शब्दों का वास्तविक अभिप्राय समझने का प्रयत्न करना चाहिए। बद्धजीव को दोहरे कार्य करने पड़ते हैं — एक शरीर के पालन के लिए और दूसरा आत्म-साक्षात्कार के लिए।\n\nसामाजिक स्थिति, मानसिक विकास, स्वच्छता, तपस्या, पोषण और अस्तित्व के लिए संघर्ष — ये सब शरीर के पालन के लिए हैं। और उसके कार्यों का आत्म-साक्षात्कार वाला अंश भगवान् के भक्त के रूप में उसकी वृत्ति में सम्पन्न होता है, और वह उस सम्बन्ध में भी कर्म करता है। ये दो भिन्न कार्य समानान्तर रेखाओं में चलते हैं, क्योंकि बद्धजीव शरीर का पालन नहीं छोड़ सकता। किन्तु जिस अनुपात में भक्ति बढ़ती है, उसी अनुपात में शरीर-पालन के कार्यों का अनुपात घटता जाता है। और जब तक भक्ति का अनुपात उचित बिन्दु तक नहीं पहुँचता, तब तक यदा-कदा सांसारिकता के प्रदर्शन की सम्भावना रहती है। किन्तु ध्यान रहे कि ऐसी सांसारिकता अधिक समय तक नहीं चल सकती, क्योंकि भगवान् की कृपा से ऐसी अपूर्णताएँ शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगी।\n\nअतएव भक्ति का मार्ग ही एकमात्र सही मार्ग है। सही मार्ग पर रहते हुए, कभी-कभार सांसारिकता का प्रकट हो जाना भी आत्म-साक्षात्कार की प्रगति में बाधक नहीं होता। और स्वयं गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: जो भक्ति में संलग्न है, वह अत्यन्त गर्हित कर्म करने पर भी साधु ही माना जाना चाहिए, क्योंकि वह सही मार्ग पर स्थित है। वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! यह मेरी प्रतिज्ञा है कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होगा। हे पृथापुत्र! जो कोई मेरी शरण ग्रहण करेगा — चाहे वह स्त्री हो, वैश्य हो या निम्न कुल में जन्मा हो — वह भी परम गन्तव्य को प्राप्त कर सकता है। फिर ब्राह्मणों, धर्मात्माओं, भक्तों और साधु राजाओं की तो बात ही क्या!\n\nइस दुःखमय संसार में ये सब भगवान् की भक्ति में दृढ़ रहते हैं। मेरी सेवा में लगो और मेरी शरण ग्रहण करो। मुझमें पूर्णतः तल्लीन होकर तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त करोगे। (गीता 9.30-34) भक्ति की ऐसी सुविधाएँ निर्विशेषवादियों को नहीं मिलतीं, क्योंकि वे भगवान् के ब्रह्मज्योति-स्वरूप में आसक्त हैं। वे न तो ब्रह्मज्योति को भेद सकते हैं, जैसा कि पिछले मन्त्रों में सुझाया गया है, और न ही वे भगवान् में विश्वास करते हैं। उनका कार्य अधिकतर शब्दार्थ-विवेचन और मनोकल्पित शब्दों के इन्द्रजाल तक सीमित रहता है। फलतः निर्विशेषवादी निष्फल श्रम करते हैं, जैसा कि भगवद्गीता के बारहवें अध्याय में पुष्टि की गई है। श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में सुझाई गई सभी सुविधाएँ परम सत्य के साकार स्वरूप के निरन्तर सम्पर्क से सहज ही प्राप्त की जा सकती हैं।\n\nभगवान् की भक्ति मूलतः भक्त की ओर से नौ दिव्य क्रियाओं से बनी है: 1. भगवान् के विषय में श्रवण, 2. भगवान् का गुणगान, 3. भगवान् का स्मरण, 4. भगवान् के चरणकमलों की सेवा, 5. भगवान् की पूजा, 6. भगवान् की वन्दना, 7. भगवान् की सेवा, 8. भगवान् से मैत्रीपूर्ण संग, 9. भगवान् को सर्वस्व समर्पण। भक्ति के ये नौ सिद्धान्त — सम्पूर्ण रूप में या एक-एक करके — भक्त को निरन्तर भगवान् के सम्पर्क में रहने में सहायता करते हैं, और इसीलिए जीवन के अन्त में भक्त के लिए भगवान् का स्मरण करना सरल होता है। इन नौ सिद्धान्तों में से केवल एक को अपनाकर भगवान् के निम्नलिखित विख्यात भक्तों के लिए सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करना सम्भव हुआ: 1.\n\nकेवल श्रवण से श्रीमद्भागवत के नायक महाराज परीक्षित ने वांछित फल प्राप्त किया। 2. केवल भगवान् का गुणगान करके श्रीमद्भागवत के वक्ता शुकदेव गोस्वामी ने अपनी सिद्धि प्राप्त की। 3. वन्दना से अक्रूर ने वांछित फल प्राप्त किया। 4. स्मरण से प्रह्लाद महाराज ने वांछित फल प्राप्त किया। 5. पूजा से पृथु महाराज ने सिद्धि प्राप्त की। 6. भगवान् के चरणकमलों की सेवा से भाग्य की देवी लक्ष्मीजी ने सिद्धि प्राप्त की। 7. भगवान् की व्यक्तिगत सेवा से हनुमान् ने वांछित फल प्राप्त किया। 8. मैत्री से अर्जुन ने फल प्राप्त किया। 9. अपना सर्वस्व समर्पित करके महाराज बलि ने वांछित फल प्राप्त किया। वस्तुतः इस मन्त्र की तथा वैदिक स्तोत्रों के प्रायः सभी मन्त्रों की व्याख्या वेदान्त-सूत्रों में संक्षेपित है; और फिर श्रीमद्भागवत में उनकी समुचित व्याख्या की गई है।\n\nश्रीमद्भागवत वैदिक ज्ञान-वृक्ष का पका हुआ फल है। श्रीमद्भागवत में इस विशेष मन्त्र की व्याख्या महाराज परीक्षित और शुकदेव गोस्वामी की भेंट के आरम्भ में ही उनके प्रश्नोत्तरों में की गई है। चूँकि भगवद्विज्ञान का श्रवण और कीर्तन भक्तिमय जीवन का मूल सिद्धान्त है, अतः सम्पूर्ण भागवत महाराज परीक्षित द्वारा सुना गया और गोस्वामी शुकदेव द्वारा कहा गया। महाराज परीक्षित ने शुकदेव से इसलिए जिज्ञासा की, क्योंकि शुकदेव अपने समय के किसी भी महान् योगी या अध्यात्मवादी से बढ़कर आध्यात्मिक गुरु थे। महाराज परीक्षित का प्रश्न था: “प्रत्येक मनुष्य का — विशेषतः मृत्यु के समय — क्या कर्तव्य है?” गोस्वामी शुकदेव का उत्तर था कि जो कोई समस्त चिन्ताओं से मुक्त होना चाहता है, उसे सदा भगवान् के विषय में श्रवण और उनका गुणगान करना चाहिए, जो सबके परम निर्देशक हैं, समस्त कठिनाइयों के हर्ता हैं और समस्त जीवों के परमात्मा हैं।\n\nतथाकथित मानव समाज सामान्यतः रात में सोने या विषय-भोग में लगा रहता है। और दिन में लोग यथासम्भव अधिक धन कमाने में, अथवा परिवार के भरण-पोषण हेतु वस्तुएँ क्रय करने में लगे रहते हैं। लोगों के पास भगवान् के विषय में बात करने या उनके विषय में कोई जिज्ञासा करने का समय बहुत कम है। उन्होंने भगवान् के अस्तित्व के प्रश्न को अनेक प्रकार से नकार दिया है — विशेषतः उन्हें निराकार, अर्थात् इन्द्रिय-बोध से रहित, घोषित करके। किन्तु वैदिक साहित्य में — चाहे उपनिषद् हों, वेदान्त-सूत्र हों, भगवद्गीता हो या श्रीमद्भागवत — प्रत्येक शास्त्र में यह घोषित किया गया है कि भगवान् चेतन सत्ता हैं, अन्य समस्त जीवों से परम श्रेष्ठ। और उनकी महिमामय लीलाएँ उनके स्वरूप से अभिन्न हैं।\n\nअतः मनुष्य को सांसारिक राजनेताओं और समाज के तथाकथित बड़े लोगों के तुच्छ कार्यकलापों के श्रवण और चर्चा में नहीं लगना चाहिए, अपितु अपना जीवन ऐसा ढालना चाहिए कि एक क्षण भी भगवत्कार्यों में संलग्न हुए बिना व्यर्थ न जाए। श्री ईशोपनिषद् हमें ऐसे ही कार्यों की ओर निर्देशित करती है। जब तक मनुष्य इस भक्तिमय अभ्यास का अभ्यस्त नहीं होता, तब मृत्यु के समय, जब शरीर छिन्न-भिन्न हो रहा होगा, वह क्या स्मरण करेगा, और वह सर्वशक्तिमान् भगवान् से अपने यज्ञों के स्मरण की प्रार्थना कैसे कर सकेगा? यज्ञ का अर्थ है इन्द्रियों के स्वार्थ का त्याग। यह कला मनुष्य को जीवनकाल में इन्द्रियों को भगवान् की सेवा में लगाकर सीखनी होती है, ताकि वह मृत्यु के समय उसके फल का उपयोग कर सके।"}
{"ref": "iso/18", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/18/", "verse_text": "", "devanagari": "> अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।\n> युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥१८॥", "synonyms": "*अग्ने*—हे मेरे प्रभु, अग्नि के समान शक्तिशाली; *नय*—कृपया ले चलें; *सुपथा*—उचित मार्ग से; *राये*—आप तक पहुँचने हेतु; *अस्मान्*—हमें; *विश्वानि*—समस्त; *देव*—हे मेरे प्रभु; *वयुनानि*—कर्म; *विद्वान्*—ज्ञाता; *युयोधि*—कृपया दूर करें; *अस्मत्*—हमसे; *जुहुराणम्*—मार्ग की समस्त बाधाएँ; *एनः*—समस्त दोष; *भूयिष्ठाम्*—सर्वाधिक; *ते*—आपको; *नमः उक्तिम्*—नमस्कार के वचन; *विधेम*—मैं करता हूँ।", "translation": "**हे मेरे प्रभु, *अग्नि* के समान शक्तिशाली, हे सर्वशक्तिमान्! अब मैं भूमि पर आपके चरणों में गिरकर आपको सम्पूर्ण नमस्कार अर्पित करता हूँ। हे मेरे प्रभु, कृपया मुझे आप तक पहुँचने के सही मार्ग पर ले चलिए, और चूँकि आप वह सब जानते हैं जो मैंने अतीत में किया है, कृपया मुझे मेरे विगत पापों के फलों से मुक्त कर दीजिए, ताकि मेरी प्रगति में कोई बाधा न रहे।**", "purport": "शरणागति की यह प्रक्रिया और भगवान् की अहैतुकी कृपा के लिए प्रार्थना भक्त को पूर्ण आत्म-साक्षात्कार के पथ पर क्रमशः आगे ले जाती है। भगवान् को अग्नि के रूप में सम्बोधित किया गया है, क्योंकि वे किसी भी वस्तु को — शरणागत आत्मा के पापों सहित — जलाकर भस्म कर सकते हैं। जैसा कि पिछले मन्त्रों में वर्णित है, परम सत्य का वास्तविक या चरम पक्ष उनका भगवान्-स्वरूप है। उनका निराकार ब्रह्मज्योति-स्वरूप भगवान् के मुखमण्डल पर एक चकाचौंध भरा आवरण है। सकाम कर्म, अर्थात् आत्म-साक्षात्कार का कर्म-काण्ड मार्ग, इस प्रयास की निम्नतम अवस्था है। ज्यों ही ऐसे कर्म वेदों के विधि-विधानों से तनिक भी विचलित होते हैं, त्यों ही वे विकर्म में — अर्थात् कर्ता के हित के विरुद्ध कर्मों में — परिणत हो जाते हैं।\n\nऐसा विकर्म मोहग्रस्त जीव केवल इन्द्रियतृप्ति के लिए करते हैं, और इस प्रकार ऐसे कर्म आत्म-साक्षात्कार के पथ में बाधक बन जाते हैं। आत्म-साक्षात्कार मानव जीवन-रूप में ही सम्भव है, अन्य रूपों में नहीं। जीवों की 84,00,000 योनियाँ या रूप हैं — जिनमें ब्राह्मण-संस्कृति की योग्यताओं से युक्त मानव रूप ही दिव्य तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र अवसर प्रस्तुत करता है। ब्राह्मण-संस्कृति का अर्थ है सत्यनिष्ठा, इन्द्रिय-संयम, सहनशीलता, सरलता, पूर्ण ज्ञान, ईश्वर में पूर्ण श्रद्धा — न कि अपने उच्च कुल का मिथ्या गर्व। ब्राह्मण का पुत्र होना ब्राह्मण बनने का एक अवसर है, ठीक वैसे ही जैसे किसी बड़े व्यक्ति का पुत्र होना बड़ा व्यक्ति बनने का अवसर है।\n\nकिन्तु ऐसा जन्मसिद्ध अधिकार ही सब कुछ नहीं है, क्योंकि मनुष्य को ब्राह्मणोचित योग्यताएँ स्वयं अर्जित करनी होती हैं। ज्यों ही कोई ब्राह्मण-पुत्र के रूप में अपने जन्म का गर्व करने लगता है और वास्तविक ब्राह्मण की योग्यताएँ अर्जित करने की उपेक्षा करता है, त्यों ही वह पतित होकर आत्म-साक्षात्कार के पथ से विचलित हो जाता है, और मनुष्य के रूप में उसका जीवन-लक्ष्य विफल हो जाता है। भगवद्गीता में भगवान् हमें आश्वासन देते हैं कि योगभ्रष्टों को — अर्थात् आत्म-साक्षात्कार के पथ से गिरी हुई आत्माओं को — सुधार का अवसर दिया जाता है: या तो सदाचारी ब्राह्मणों के कुलों में या धनी वैश्यों के कुलों में जन्म लेकर। आत्म-साक्षात्कार के ये उच्चतर अवसर हैं — धनी व्यक्ति का पुत्र बनना, अथवा सदाचारी ब्राह्मण का पुत्र बनना।\n\nऔर यदि मोहग्रस्त मनुष्य इन अवसरों का दुरुपयोग करता है, तो परिणाम यह होता है कि वह सर्वशक्तिमान् भगवान् द्वारा प्रदत्त मानव जीवन का सुअवसर खो देता है। विधि-विधान ऐसे हैं कि जो उनका पालन करता है, वह सकाम कर्म के स्तर से दिव्य ज्ञान के स्तर तक उन्नत होता है, और दिव्य ज्ञान से वह अनेकानेक जन्मों के पश्चात्, जब वह भगवान् की शरण ग्रहण करता है, पूर्ण बनता है। यह सामान्य क्रम है। किन्तु जो आरम्भ में ही शरणागत हो जाता है — जैसा कि इस मन्त्र में उल्लिखित है — वह केवल भक्ति-भाव अपनाकर प्रगति की सभी अवस्थाओं को तुरन्त पार कर जाता है। जैसा कि गीता में कहा गया है, भगवान् ऐसी शरणागत आत्मा का भार तुरन्त अपने ऊपर ले लेते हैं और उसे उसके पापकर्मों के सभी फलों से मुक्त कर देते हैं।\n\nकर्म-काण्ड के कार्यों में अनेक पापकर्म होते हैं, और ज्ञान-काण्ड में — दार्शनिक विकास के मार्ग में — ऐसे कर्मों की संख्या कम होती है। किन्तु भगवान् की भक्ति में — भक्ति के मार्ग में — पापफलों की प्रायः कोई सम्भावना ही नहीं रहती। जो भगवान् का भक्त है, वह स्वयं भगवान् के सभी सद्गुण प्राप्त कर लेता है — ब्राह्मण बनने की तो बात ही क्या। भक्त स्वतः यज्ञ करने के लिए अधिकृत निपुण ब्राह्मण की योग्यताएँ प्राप्त कर लेता है, भले ही ऐसे भक्त ने ब्राह्मण कुल में जन्म न लिया हो। भगवान् की सर्वशक्तिमत्ता ऐसी है कि वे ब्राह्मण कुल में जन्मे व्यक्ति को निम्न कुल में जन्मे श्वपच जितना पतित बना सकते हैं, और केवल भक्ति के बल पर निम्न कुल में जन्मे श्वपच को योग्य ब्राह्मण से भी बढ़कर बना सकते हैं।\n\nसर्वशक्तिमान् भगवान्, प्रत्येक के हृदय में स्थित होने के कारण, अपने निष्कपट भक्त को सही मार्ग का निर्देश दे सकते हैं। ऐसे निर्देश विशेष रूप से भक्त को ही दिए जाते हैं — भले ही वह कुछ और चाहता हो। दूसरों के लिए भगवान् कर्ता को केवल कर्ता के अपने जोखिम पर अनुमति देते हैं, किन्तु भक्त के विषय में भगवान् उसे ऐसा निर्देश देते हैं कि वह कभी त्रुटिपूर्ण कार्य न करे। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भगवान् अपने भक्त पर इतने दयालु हैं कि यद्यपि वह कभी-कभी विकर्म के — वेदों के निर्देशों के विरुद्ध कर्मों के — जाल में फँस जाता है, तथापि भगवान् भक्त के हृदय के भीतर से उसकी त्रुटियों को तुरन्त सुधार देते हैं, क्योंकि ऐसे भक्त भगवान् को अत्यन्त प्रिय हैं।\n\nयहाँ इस मन्त्र में भक्त भगवान् से प्रार्थना करता है कि वे उसके हृदय के भीतर से उसे सुधारें। भूल करना मानव-स्वभाव है: बद्धजीव प्रायः भूलें करने को प्रवृत्त रहता है, और ऐसे अज्ञात पापों का एकमात्र उपचार यही है कि मनुष्य अपने आपको भगवान् के चरणकमलों में समर्पित कर दे, ताकि वे भक्त का मार्गदर्शन करें। पूर्ण शरणागत आत्माओं का यह भार भगवान् स्वयं लेते हैं, और इस प्रकार केवल भगवान् की शरण ग्रहण करके और उनके निर्देशों के अनुसार कर्म करके सारी समस्याएँ हल हो जाती हैं। ऐसे निर्देश निष्कपट भक्त को दो प्रकार से दिए जाते हैं। एक — सन्तों, शास्त्रों और आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से, और दूसरा — प्रत्येक के हृदय में निवास करने वाले स्वयं भगवान् के द्वारा।\n\nइस प्रकार भक्त सभी प्रकार से सुरक्षित रहता है। वैदिक ज्ञान दिव्य है और इसे केवल सांसारिक शिक्षा-पद्धतियों से नहीं समझा जा सकता। वैदिक मन्त्रों को मनुष्य केवल भगवान् और आध्यात्मिक गुरु की कृपा से ही समझ सकता है। यदि कोई प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण ग्रहण करता है, तो यह समझना चाहिए कि उसे भगवान् की कृपा प्राप्त हो गई है। भगवान् ही भक्त के लिए आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रकट होते हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक गुरु, वैदिक आदेश और भीतर से स्वयं भगवान् — ये सब पूर्ण बल से भक्त का मार्गदर्शन करते हैं, और ऐसे भक्त के पुनः भौतिक मोह के दलदल में गिरने की कोई सम्भावना नहीं रहती। इस प्रकार सब ओर से सुरक्षित भक्त निश्चित रूप से पूर्णता के चरम गन्तव्य तक पहुँचता है।\n\nइस सम्पूर्ण प्रक्रिया का संकेत श्री ईशोपनिषद् के इस मन्त्र में दिया गया है, और श्रीमद्भागवत इसकी और भी विस्तृत व्याख्या करता है। भगवान् की महिमा का श्रवण और कीर्तन स्वयं में पुण्यकर्म हैं। भगवान् चाहते हैं कि सभी ऐसा करें, क्योंकि वे समस्त जीवों के हितैषी हैं। और भगवान् की महिमा के इस श्रवण और कीर्तन के अभ्यास से मनुष्य अपने भीतर की समस्त अवांछित वस्तुओं से शुद्ध हो जाता है। उसकी भक्ति भगवान् में स्थिर हो जाती है। इस अवस्था में भक्त ब्राह्मणोचित योग्यताएँ प्राप्त कर लेता है, और निम्न गुणों के फलस्वरूप उत्पन्न प्रतिक्रियाएँ पूर्णतः विलीन हो जाती हैं। ऐसी भक्ति से वह पूर्ण प्रबुद्ध हो जाता है और इस प्रकार भगवान् के पथ को तथा उन्हें प्राप्त करने के उपाय को जान लेता है। सारे सन्देह क्षीण हो जाते हैं, और वह शुद्ध भक्त बन जाता है। इस प्रकार श्री ईशोपनिषद् के भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं — वह ज्ञान, जो मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के समीप ले जाता है।"}
{"ref": "iso/0a", "book": "iso", "lang": "hi", "url": "/hi/library/iso/0a/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "\"वेदों की शिक्षाएँ\"", "purport": "(वेदों की शिक्षाएँ) [हिज़ डिवाइन ग्रेस ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद द्वारा 6 अक्टूबर, 1969 को कॉनवे हॉल, लन्दन, इंग्लैण्ड में प्रवचन रूप में प्रदत्त।] देवियो और सज्जनो, आज का विषय है वेदों की शिक्षाएँ। वेद क्या हैं? वेद शब्द की संस्कृत धातु की व्याख्या अनेक प्रकार से की जा सकती है, किन्तु तात्पर्य अन्ततः एक ही है। वेद का अर्थ है ज्ञान। आप जो भी ज्ञान स्वीकार करते हैं, वह वेद है, क्योंकि वेदों की शिक्षाएँ ही आदि ज्ञान हैं। बद्ध अवस्था में हमारा ज्ञान अनेक त्रुटियों के अधीन रहता है। बद्धजीव और मुक्त जीव में अन्तर यह है कि बद्धजीव में चार प्रकार के दोष होते हैं। पहला दोष यह है कि वह भूल अवश्य करता है। उदाहरणार्थ, हमारे देश में महात्मा गांधी अत्यन्त महान व्यक्ति माने जाते थे, किन्तु उन्होंने अनेक भूलें कीं।\n\nजीवन की अन्तिम अवस्था में भी उनके सहायक ने चेतावनी दी, \"महात्मा गांधी, नई दिल्ली की सभा में न जाइए। मेरे कुछ मित्र हैं और मैंने सुना है कि वहाँ संकट है।\" किन्तु उन्होंने नहीं सुना। वे जाने पर अड़े रहे और मारे गये। महात्मा गांधी, राष्ट्रपति केनेडी जैसे महान व्यक्ति भी — ऐसे अनेक हैं — भूलें करते हैं। भूल करना मानव-स्वभाव है। यह बद्धजीव का एक दोष है। दूसरा दोष: भ्रम में पड़ना। भ्रम का अर्थ है उसे स्वीकार करना जो नहीं है: माया। माया का अर्थ है 'जो नहीं है'। प्रत्येक व्यक्ति शरीर को ही आत्मा मान रहा है। यदि मैं आपसे पूछूँ कि आप क्या हैं, तो आप कहेंगे, \"मैं मिस्टर जॉन हूँ; मैं धनी व्यक्ति हूँ; मैं यह हूँ, मैं वह हूँ।\" ये सब शारीरिक पहचानें हैं।\n\nकिन्तु आप यह शरीर नहीं हैं। यही भ्रम है। तीसरा दोष है ठगने की प्रवृत्ति। प्रत्येक व्यक्ति में दूसरों को ठगने की प्रवृत्ति होती है। यद्यपि कोई व्यक्ति मूर्खों में अग्रणी होता है, फिर भी वह स्वयं को अत्यन्त बुद्धिमान के रूप में प्रस्तुत करता है। यद्यपि यह पहले ही इंगित किया जा चुका है कि वह भ्रम में है और भूलें करता है, तो भी वह सिद्धान्त गढ़ेगा: \"मेरे विचार से यह ऐसा है, वह वैसा है।\" किन्तु वह अपनी स्थिति तक नहीं जानता। दोषयुक्त होते हुए भी वह दर्शनशास्त्र की पुस्तकें लिखता है। यही उसका रोग है। यही ठगी है। अन्त में, हमारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं। हमें अपनी आँखों पर बड़ा गर्व है। प्रायः कोई चुनौती देता है, \"क्या आप मुझे भगवान् दिखा सकते हैं?\" किन्तु क्या आपके पास भगवान् को देखने योग्य आँखें हैं? यदि आँखें ही नहीं हैं, तो आप कभी नहीं देख सकेंगे।\n\nयदि कमरे में सहसा अन्धकार हो जाये, तो आप अपने हाथ तक नहीं देख सकते। तो देखने की आपमें कितनी शक्ति है? अतः इन अपूर्ण इन्द्रियों से हम ज्ञान (वेद) की आशा नहीं कर सकते। इन समस्त त्रुटियों के साथ, बद्ध जीवन में, हम किसी को पूर्ण ज्ञान नहीं दे सकते। न ही हम स्वयं पूर्ण हैं। इसलिए हम वेदों को ज्यों-का-त्यों स्वीकार करते हैं। आप वेदों को हिन्दू कह सकते हैं, किन्तु 'हिन्दू' एक विदेशी नाम है। हम हिन्दू नहीं हैं। हमारी वास्तविक पहचान वर्णाश्रम है। वर्णाश्रम वेदों के अनुयायियों का सूचक है, उनका जो मानव-समाज को वर्ण और आश्रम के आठ विभागों में स्वीकार करते हैं। समाज के चार विभाग हैं और आध्यात्मिक जीवन के चार विभाग। इसी को वर्णाश्रम कहते हैं। भगवद्गीता में कहा गया है, \"ये विभाग सर्वत्र हैं, क्योंकि इन्हें भगवान् ने बनाया है।\" समाज के विभाग हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।\n\nब्राह्मण से तात्पर्य अत्यन्त बुद्धिमान वर्ग के मनुष्यों से है, उनसे जो जानते हैं कि ब्रह्म क्या है। इसी प्रकार क्षत्रिय, अर्थात् प्रशासक वर्ग, उसके बाद के बुद्धिमान वर्ग के मनुष्य हैं। फिर वैश्य, अर्थात् वाणिज्य वर्ग। ये स्वाभाविक वर्गीकरण सर्वत्र पाये जाते हैं। यही वैदिक सिद्धान्त है, और हम इसे स्वीकार करते हैं। वैदिक सिद्धान्त स्वयंसिद्ध सत्य के रूप में स्वीकार किये जाते हैं, क्योंकि उनमें कोई भूल नहीं हो सकती। यही स्वीकृति है। उदाहरणार्थ, भारत में गोबर पवित्र माना जाता है, यद्यपि गोबर एक पशु का मल है। एक स्थान पर आपको वैदिक आदेश मिलेगा कि यदि आप मल का स्पर्श करें, तो आपको तुरन्त स्नान करना होगा। किन्तु अन्यत्र कहा गया है कि गाय का मल पवित्र है।\n\nयदि आप किसी अपवित्र स्थान पर गोबर लीप दें, तो वह स्थान पवित्र हो जाता है। अपनी सामान्य बुद्धि से हम तर्क कर सकते हैं, \"यह तो परस्पर-विरोधी है।\" वस्तुतः सामान्य दृष्टि से यह विरोधाभासी है, किन्तु मिथ्या नहीं है। यह तथ्य है। कलकत्ता में एक अत्यन्त प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और डॉक्टर ने गोबर का विश्लेषण किया और पाया कि उसमें समस्त रोगाणुनाशक गुण विद्यमान हैं। भारत में यदि एक व्यक्ति दूसरे से कहे, \"तुम्हें यह करना ही होगा,\" तो दूसरा पक्ष कह सकता है, \"आपका क्या अभिप्राय है? क्या यह कोई वैदिक आदेश है कि मुझे बिना किसी तर्क के आपका अनुसरण करना पड़े?\" वैदिक आदेशों की मनमानी व्याख्या नहीं की जा सकती। किन्तु अन्ततः, यदि आप ध्यानपूर्वक अध्ययन करें कि ये आदेश क्यों हैं, तो आप पायेंगे कि वे सब सही हैं। वेद मानव-ज्ञान के संकलन नहीं हैं।\n\nवैदिक ज्ञान आध्यात्मिक जगत् से, भगवान् श्रीकृष्ण से आता है। वेदों का दूसरा नाम है श्रुति। श्रुति उस ज्ञान का सूचक है जो श्रवण द्वारा प्राप्त किया जाता है। यह प्रयोगसिद्ध ज्ञान नहीं है। श्रुति को माता के समान माना जाता है। हम अपनी माता से कितना ही ज्ञान ग्रहण करते हैं। उदाहरणार्थ, यदि आप जानना चाहें कि आपका पिता कौन है, तो इसका उत्तर कौन दे सकता है? आपकी माता। यदि माता कहे, \"ये तुम्हारे पिता हैं,\" तो आपको यह स्वीकार करना ही होगा। यह प्रयोग करके पता लगाना सम्भव नहीं है कि वे आपके पिता हैं या नहीं। इसी प्रकार, यदि आप अपने अनुभव से परे, अपने प्रयोगसिद्ध ज्ञान से परे, इन्द्रियों की गतिविधियों से परे कुछ जानना चाहें, तो आपको वेदों को स्वीकार करना होगा। प्रयोग का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।\n\nउसका प्रयोग पहले ही हो चुका है। वह पहले से निर्णीत है। माता के कथन को, उदाहरणार्थ, सत्य मानकर स्वीकार करना ही पड़ता है। अन्य कोई उपाय नहीं है। वेद माता माने जाते हैं और ब्रह्मा पितामह, पूर्वज कहे जाते हैं, क्योंकि सर्वप्रथम उन्हीं को वैदिक ज्ञान का उपदेश दिया गया था। आदि में प्रथम जीव ब्रह्मा थे। उन्होंने यह वैदिक ज्ञान प्राप्त किया और उसे नारद तथा अन्य शिष्यों व पुत्रों को प्रदान किया, और उन्होंने भी इसे अपने शिष्यों में वितरित किया। इस प्रकार वैदिक ज्ञान गुरु-परम्परा से चला आता है। भगवद्गीता में भी इसकी पुष्टि होती है कि वैदिक ज्ञान इसी रीति से समझा जाता है। यदि आप प्रयोगात्मक प्रयास करें, तो भी आप उसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे, किन्तु समय बचाने के लिए आपको स्वीकार कर लेना चाहिए।\n\nयदि आप जानना चाहें कि आपका पिता कौन है और यदि आप माता को प्रमाण मानें, तो वे जो कुछ कहें उसे बिना तर्क के स्वीकार किया जा सकता है। प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं: प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। प्रत्यक्ष का अर्थ है सीधा अनुभव। प्रत्यक्ष प्रमाण उतना अच्छा नहीं है, क्योंकि हमारी इन्द्रियाँ पूर्ण नहीं हैं। हम प्रतिदिन सूर्य को देखते हैं, और वह हमें एक छोटे-से बिम्ब जैसा दिखाई देता है, किन्तु वस्तुतः वह अनेक ग्रहों से कहीं अधिक बड़ा है। इस देखने का क्या मूल्य है? अतएव हमें पुस्तकें पढ़नी पड़ती हैं, तभी हम सूर्य के विषय में समझ सकते हैं। अतः प्रत्यक्ष अनुभव पूर्ण नहीं है। फिर आगमनात्मक ज्ञान है: \"यह ऐसा हो सकता है\" — परिकल्पना। उदाहरणार्थ, डार्विन का सिद्धान्त कहता है कि यह ऐसा हो सकता है, वैसा हो सकता है, किन्तु वह विज्ञान नहीं है।\n\nवह तो एक सुझाव मात्र है, और वह भी पूर्ण नहीं है। किन्तु यदि आप प्रामाणिक स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करें, तो वह पूर्ण होता है। यदि आपको रेडियो केन्द्र के अधिकारियों से कार्यक्रम-सूची प्राप्त हो, तो आप उसे स्वीकार कर लेते हैं। आप उसका खण्डन नहीं करते; आपको प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वह प्रामाणिक स्रोत से प्राप्त हुई है। वैदिक ज्ञान शब्द-प्रमाण कहलाता है। उसका दूसरा नाम है श्रुति। श्रुति का अर्थ है कि यह ज्ञान केवल कर्ण-श्रवण द्वारा ग्रहण करना होता है। वेद उपदेश देते हैं कि दिव्य ज्ञान को समझने के लिए हमें प्रमाणस्वरूप अधिकारी से सुनना होगा। दिव्य ज्ञान इस ब्रह्माण्ड से परे का ज्ञान है। इस ब्रह्माण्ड के भीतर भौतिक ज्ञान है, और इस ब्रह्माण्ड से परे दिव्य ज्ञान है। हम ब्रह्माण्ड के छोर तक भी नहीं जा सकते, तो आध्यात्मिक जगत् तक कैसे जा सकेंगे?\n\nअतएव पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना असम्भव है। एक आध्यात्मिक आकाश है। एक अन्य प्रकृति है जो व्यक्त और अव्यक्त से परे है। किन्तु आप यह कैसे जानेंगे कि एक ऐसा आकाश है जहाँ के लोक और निवासी नित्य हैं? यह सारा ज्ञान विद्यमान है, किन्तु आप प्रयोग कैसे करेंगे? यह सम्भव नहीं है। इसलिए आपको वेदों की सहायता लेनी होगी। इसी को वैदिक ज्ञान कहते हैं। हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन में हम सर्वोच्च प्रमाण श्रीकृष्ण से ज्ञान ग्रहण कर रहे हैं। श्रीकृष्ण सभी वर्गों के मनुष्यों द्वारा सर्वोच्च प्रमाण के रूप में स्वीकृत हैं। मैं सर्वप्रथम दो वर्गों के अध्यात्मवादियों की बात कर रहा हूँ। अध्यात्मवादियों का एक वर्ग निर्विशेषवादी, मायावादी कहलाता है। वे सामान्यतः वेदान्ती के रूप में जाने जाते हैं, जिनके अग्रणी हैं शंकराचार्य।\n\nऔर अध्यात्मवादियों का एक अन्य वर्ग है, जो वैष्णव कहलाता है — जैसे रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी। शंकर-सम्प्रदाय और वैष्णव-सम्प्रदाय दोनों ने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार किया है। शंकराचार्य निर्विशेषवादी माने जाते हैं, जिन्होंने निर्विशेषवाद, निराकार ब्रह्म का प्रचार किया, किन्तु यह तथ्य है कि वे प्रच्छन्न सगुणवादी हैं। भगवद्गीता पर अपने भाष्य में उन्होंने लिखा, \"पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण इस विश्व-प्रकटीकरण से परे हैं।\" और फिर पुनः वे पुष्टि करते हैं, \"वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण ही कृष्ण हैं। वे देवकी और वसुदेव के पुत्र रूप में आये हैं।\" उन्होंने विशेष रूप से उनके माता-पिता के नामों का उल्लेख किया है। अतः श्रीकृष्ण समस्त अध्यात्मवादियों द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकृत हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है।\n\nकृष्णभावनामृत में हमारे ज्ञान का स्रोत प्रत्यक्षतः श्रीकृष्ण से है — भगवद्गीता। हमने 'भगवद्गीता यथारूप' प्रकाशित की है, क्योंकि हम श्रीकृष्ण को, जैसा वे कहते हैं वैसा ही, बिना किसी मनमानी व्याख्या के स्वीकार करते हैं। यही वैदिक ज्ञान है। चूँकि वैदिक ज्ञान शुद्ध है, हम उसे स्वीकार करते हैं। श्रीकृष्ण जो कुछ कहते हैं, हम स्वीकार करते हैं। यही कृष्णभावनामृत है। इससे बहुत समय बचता है। यदि आप सही प्रमाण अथवा ज्ञान के स्रोत को स्वीकार कर लें, तो आपका बहुत समय बचता है। उदाहरणार्थ, भौतिक जगत् में ज्ञान की दो पद्धतियाँ हैं — आगमनात्मक और निगमनात्मक। निगमन से आप स्वीकार करते हैं कि मनुष्य मरणशील है। आपके पिता कहते हैं कि मनुष्य मरणशील है, आपकी बहन कहती है कि मनुष्य मरणशील है, सभी कहते हैं कि मनुष्य मरणशील है — किन्तु आप प्रयोग नहीं करते। आप इसे तथ्य रूप में स्वीकार करते हैं कि मनुष्य मरणशील है।\n\nयदि आप शोध करके यह पता लगाना चाहें कि मनुष्य मरणशील है या नहीं, तो आपको एक-एक मनुष्य का अध्ययन करना होगा, और आपके मन में यह विचार आ सकता है कि सम्भवतः कोई ऐसा मनुष्य भी हो जो नहीं मरता, किन्तु आपने उसे अभी तक देखा नहीं है। इस प्रकार आपका शोध कभी समाप्त नहीं होगा। यह प्रक्रिया संस्कृत में आरोह, अर्थात् आरोहण-पथ कहलाती है। यदि आप किसी निजी प्रयास से, अपनी अपूर्ण इन्द्रियों के बल पर ज्ञान प्राप्त करना चाहें, तो आप कभी सही निष्कर्षों पर नहीं पहुँचेंगे। यह सम्भव नहीं है। ब्रह्म-संहिता में एक कथन है: उस विमान पर चढ़िए जो मन के वेग से चलता है। हमारे भौतिक विमान दो हज़ार मील प्रति घण्टा चल सकते हैं, किन्तु मन का वेग क्या है?\n\nआप घर बैठे हैं, आप तुरन्त भारत का स्मरण करते हैं — मान लीजिए दस हज़ार मील दूर — और वह तत्क्षण आपके घर में उपस्थित है। आपका मन वहाँ पहुँच गया। मन का वेग इतना तीव्र है। इसीलिए कहा गया है, \"यदि आप इस वेग से लाखों वर्षों तक यात्रा करें, तो आप पायेंगे कि आध्यात्मिक आकाश असीम है।\" उसके समीप पहुँचना भी सम्भव नहीं है। अतएव वैदिक आदेश है कि मनुष्य को — 'अनिवार्य' शब्द का प्रयोग हुआ है — किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के पास जाना ही होगा। और आध्यात्मिक गुरु की योग्यता क्या है? उन्होंने सही स्रोत से वैदिक सन्देश को सही रूप में सुना हो। अन्यथा वे प्रामाणिक नहीं हैं। उन्हें व्यवहारतः ब्रह्म में दृढ़ रूप से स्थित होना चाहिए। ये दो योग्यताएँ हैं।\n\nयह कृष्णभावनामृत आन्दोलन वैदिक सिद्धान्तों से पूर्णतः प्रमाणित है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, \"वैदिक अनुसन्धान का वास्तविक लक्ष्य कृष्ण को पाना है।\" ब्रह्म-संहिता में भी कहा गया है, \"कृष्ण, गोविन्द, के असंख्य रूप हैं, किन्तु वे सब एक हैं।\" वे हमारे रूपों जैसे नहीं हैं, जो नश्वर हैं। उनका रूप अच्युत है। मेरे रूप का आरम्भ है, किन्तु उनके रूप का कोई आरम्भ नहीं। वह अनन्त है। और उनके रूप का — इतने बहुरूपों का — कोई अन्त नहीं है। मेरा रूप यहाँ बैठा है, अपने निवास में नहीं। आप वहाँ बैठे हैं, अपने निवास में नहीं। किन्तु श्रीकृष्ण एक ही समय सर्वत्र रह सकते हैं। वे गोलोक वृन्दावन में विराजमान रह सकते हैं और साथ ही सर्वत्र हैं, सर्वव्यापी हैं।\n\nवे आदि हैं, पुराणतम हैं, किन्तु जब भी आप श्रीकृष्ण का चित्र देखेंगे, आपको पन्द्रह-बीस वर्ष का एक तरुण दिखाई देगा। आपको कभी कोई वृद्ध नहीं मिलेगा। आपने भगवद्गीता के सारथी रूप में श्रीकृष्ण के चित्र देखे हैं। उस समय वे सौ वर्ष से कम के नहीं थे। उनके प्रपौत्र थे, किन्तु वे किशोर जैसे ही दिखते थे। श्रीकृष्ण, भगवान्, कभी वृद्ध नहीं होते। यही उनकी परम शक्ति है। और यदि आप वैदिक साहित्य का अध्ययन करके श्रीकृष्ण को खोजना चाहें, तो आप असमंजस में पड़ जायेंगे। यह सम्भव हो सकता है, किन्तु अत्यन्त कठिन है। किन्तु आप उनके भक्त से उनके विषय में बहुत सरलता से जान सकते हैं। उनका भक्त उन्हें आपको प्रदान कर सकता है: \"ये रहे भगवान्, इन्हें ग्रहण कीजिए।\" यही श्रीकृष्ण के भक्तों की शक्ति है।\n\nमूलतः वेद एक ही था, और उसे पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी। लोग इतने बुद्धिमान थे और उनकी स्मरणशक्ति इतनी प्रखर थी कि आध्यात्मिक गुरु के मुख से एक बार सुनकर ही वे समझ जाते थे। वे तुरन्त सम्पूर्ण तात्पर्य ग्रहण कर लेते थे। किन्तु पाँच हज़ार वर्ष पूर्व व्यासदेव ने इस युग के, कलियुग के लोगों के लिए वेदों को लिपिबद्ध किया। वे जानते थे कि कालान्तर में लोग अल्पायु होंगे, उनकी स्मरणशक्ति अत्यन्त दुर्बल होगी और उनकी बुद्धि बहुत प्रखर नहीं रहेगी। \"इसलिए मैं इस वैदिक ज्ञान की शिक्षा लिखित रूप में दूँ।\" उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया: ऋग्, साम, अथर्व और यजुः। तत्पश्चात् उन्होंने इन वेदों का भार अपने भिन्न-भिन्न शिष्यों को सौंपा। फिर उन्होंने अल्पबुद्धि वर्ग के मनुष्यों — स्त्री, शूद्र और द्विज-बन्धु — का विचार किया।\n\nउन्होंने स्त्री वर्ग, शूद्र वर्ग (श्रमिक वर्ग) और द्विज-बन्धुओं पर विचार किया। द्विज-बन्धु वे कहलाते हैं जो उच्च कुल में जन्मे हैं, किन्तु तदनुरूप योग्य नहीं हैं। ब्राह्मण कुल में जन्मा व्यक्ति, जो ब्राह्मण के रूप में योग्य नहीं है, द्विज-बन्धु कहलाता है। इन व्यक्तियों के लिए उन्होंने महाभारत का, जो भारत का इतिहास कहलाता है, तथा अठारह पुराणों का संकलन किया। ये सब वैदिक साहित्य हैं: पुराण, महाभारत, चारों वेद और उपनिषद्। उपनिषद् वेदों के ही अंग हैं। फिर व्यासदेव ने विद्वानों और दार्शनिकों के लिए सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान का सार उसमें प्रस्तुत किया जो वेदान्त-सूत्र कहलाता है। यह वेदों का अन्तिम शब्द है। व्यासदेव ने अपने गुरु महाराज, आध्यात्मिक गुरु नारद के निर्देशानुसार स्वयं वेदान्त-सूत्र लिखा, तथापि वे सन्तुष्ट नहीं हुए।\n\nयह एक लम्बी कथा है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत में हुआ है। वेदव्यास अनेक पुराणों और उपनिषदों का संकलन करने के बाद भी, यहाँ तक कि वेदान्त-सूत्र के बाद भी, बहुत सन्तुष्ट नहीं थे। तब उनके आध्यात्मिक गुरु नारद ने उन्हें निर्देश दिया, \"तुम वेदान्त की व्याख्या करो।\" वेदान्त का अर्थ है चरम ज्ञान, और चरम ज्ञान श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि समस्त वेदों के द्वारा कृष्ण को ही समझना है। वेदान्त-कृद् वेद-विद् एव चाहम्। श्रीकृष्ण कहते हैं, \"मैं वेदान्त का रचयिता हूँ, और मैं ही वेदों का ज्ञाता हूँ।\" अतएव चरम लक्ष्य श्रीकृष्ण हैं। वेदान्त दर्शन पर समस्त वैष्णव भाष्यों में इसकी व्याख्या की गई है। हम गौड़ीय वैष्णवों के पास वेदान्त दर्शन पर अपना भाष्य है, जो बलदेव विद्याभूषण कृत गोविन्द-भाष्य कहलाता है। इसी प्रकार रामानुजाचार्य का एक भाष्य है और मध्वाचार्य का भी एक है। शंकराचार्य का पाठ ही एकमात्र भाष्य नहीं है।\n\nवेदान्त के अनेक भाष्य हैं, किन्तु चूँकि वैष्णवों ने पहला वेदान्त-भाष्य प्रस्तुत नहीं किया, इसलिए लोग इस भ्रान्त धारणा में हैं कि शंकराचार्य का भाष्य ही एकमात्र वेदान्त-भाष्य है। इसके अतिरिक्त, व्यासदेव ने स्वयं पूर्ण वेदान्त-भाष्य लिखा — श्रीमद्भागवत। श्रीमद्भागवत का आरम्भ भी वेदान्त-सूत्र के प्रथम शब्दों से होता है: जन्माद्यस्य यतः। और उस जन्माद्यस्य यतः की पूर्ण व्याख्या श्रीमद्भागवत में हुई है। वेदान्त-सूत्र केवल संकेत करता है कि ब्रह्म, परम सत्य, क्या है: \"परम सत्य वह है जिससे सब कुछ उद्भूत होता है।\" यह एक सार-कथन है, किन्तु इसकी विस्तृत व्याख्या श्रीमद्भागवत में है। यदि सब कुछ परम सत्य से उद्भूत हो रहा है, तो परम सत्य का स्वरूप क्या है? इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवत में की गई है। परम सत्य को चेतन होना चाहिए।\n\nस्वराट्। वे स्वयं-प्रकाशित हैं। हम दूसरों से ज्ञान प्राप्त करके अपनी चेतना और अपने ज्ञान का विकास करते हैं, किन्तु उनके विषय में कहा गया है कि वे स्वयं-प्रकाशित हैं। सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान का सार वेदान्त-सूत्र है, और वेदान्त-सूत्र की व्याख्या स्वयं उसके रचयिता ने श्रीमद्भागवत में की है। अन्त में हम उनसे, जो वास्तव में वैदिक ज्ञान के अभिलाषी हैं, निवेदन करते हैं कि वे समस्त वैदिक ज्ञान की व्याख्या श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता से समझने का प्रयास करें।"}
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