{"ref": "noi/1", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/1/", "verse_text": "", "devanagari": "> वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं\n> जिह्वावेगमुदरोपस्थवेगम् ।\n> एतान् वेगन् यो विषहेत धीरः\n> सर्वामपीमं पृथिवीं स शिष्यात् ॥१॥", "synonyms": "*वाचः*—वाणी का; *वेगम्*—वेग; *मनसः*—मन का; *क्रोध*—क्रोध का; *वेगम्*—वेग; *जिह्वा*—जिह्वा का; *वेगम्*—वेग; *उदर-उपस्थ*—उदर तथा जननेन्द्रियों का; *वेगम्*—वेग; *एतान्*—इन; *वेगान्*—वेगों को; *यः*—जो कोई; *विषहेत*—सहन कर सकता है; *धीरः*—धीर; *सर्वाम्*—समस्त; *अपि*—निश्चय ही; *इमाम्*—इस; *पृथिवीम्*—पृथ्वी का; *सः*—वह व्यक्ति; *शिष्यात्*—शिष्य बना सकता है।", "translation": "**जो धीर व्यक्ति वाणी के वेग, मन की माँगों, क्रोध के आवेगों तथा जिह्वा, उदर एवं जननेन्द्रियों के वेगों को सहन कर सकता है, वह सम्पूर्ण विश्व में शिष्य बनाने का अधिकारी है।**", "purport": "*श्रीमद्भागवत* (6.1.9–10) में परीक्षित महाराज ने श्रील शुकदेव गोस्वामी के समक्ष अनेक बुद्धिमत्तापूर्ण प्रश्न रखे। उनमें से एक प्रश्न यह था: \"यदि लोग अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं रख सकते, तो वे प्रायश्चित्त क्यों करते हैं?\" उदाहरणार्थ, कोई चोर भली-भाँति जान सकता है कि चोरी करने पर वह बन्दी बनाया जा सकता है, और वह वस्तुतः किसी चोर को पुलिस द्वारा पकड़े जाते हुए देख भी सकता है, फिर भी वह चोरी करता रहता है। अनुभव सुनने तथा देखने से एकत्र होता है। जो कम बुद्धिमान होता है, वह देखकर अनुभव संचित करता है, और जो अधिक बुद्धिमान होता है, वह सुनकर अनुभव संचित करता है। जब कोई बुद्धिमान व्यक्ति विधि-ग्रन्थों तथा शास्त्रों से सुनता है कि चोरी करना अच्छा नहीं है और सुनता है कि पकड़े जाने पर चोर को दण्ड मिलता है, तो वह चोरी से विरत हो जाता है। कम बुद्धिमान व्यक्ति को चोरी छोड़ना सीखने हेतु सम्भवतः पहले चोरी के लिए पकड़ा जाना तथा दण्डित होना पड़ता है। तथापि कोई धूर्त, मूर्ख व्यक्ति सुनने तथा देखने—दोनों का अनुभव रखते हुए और दण्डित होकर भी चोरी करता रहता है। यदि ऐसा व्यक्ति प्रायश्चित्त भी करे और सरकार द्वारा दण्डित भी हो, तो भी जेल से बाहर आते ही वह पुनः चोरी कर बैठता है। यदि जेल का दण्ड प्रायश्चित्त माना जाए, तो ऐसे प्रायश्चित्त से क्या लाभ? इस प्रकार परीक्षित महाराज ने पूछा:\n\ndṛṣṭa-śrutābhyāṁ yat pāpaṁ\n\njānann apy ātmano 'hitam\n\nkaroti bhūyo vivaśaḥ\n\nprāyaścittam atho katham\n\n[SB 6.1.9]\n\nkvacin nivartate 'bhadrāt\n\nkvacic carati tat punaḥ\n\nprāyaścittam atho 'pārthaṁ\n\nmanye kuñjara-śaucavat\n\n[SB 6.1.10]\n\nउन्होंने प्रायश्चित्त की तुलना हाथी के स्नान से की। हाथी नदी में अत्यन्त भली-भाँति स्नान कर सकता है, किन्तु तट पर आते ही वह अपने समस्त शरीर पर धूल फेंक लेता है। तब उसके स्नान का क्या मूल्य? इसी प्रकार, अनेक आध्यात्मिक साधक हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते हैं और साथ ही अनेक निषिद्ध कार्य भी करते हैं, यह सोचते हुए कि उनका जप उनके अपराधों को निष्फल कर देगा। भगवान् के पवित्र नाम का जप करते समय जो दस प्रकार के अपराध मनुष्य कर सकता है, उनमें से यह अपराध *नाम्नो बलाद् यस्य हि पाप-बुद्धिः* कहलाता है, अर्थात् हरे कृष्ण महामन्त्र के जप के बल पर पापकर्म करना। इसी प्रकार, कुछ ईसाई अपने पापों को स्वीकार करने हेतु गिरजाघर जाते हैं, यह सोचते हुए कि पुरोहित के समक्ष अपने पाप स्वीकार करने तथा कुछ प्रायश्चित्त करने से वे अपने साप्ताहिक पापों के फलों से मुक्त हो जाएँगे। जैसे ही शनिवार बीतता है और रविवार आता है, वे पुनः अपने पापकर्म आरम्भ कर देते हैं, यह आशा करते हुए कि अगले शनिवार को क्षमा कर दिए जाएँगे। इस प्रकार के प्रायश्चित्त की परीक्षित महाराज ने, जो अपने समय के सर्वाधिक बुद्धिमान राजा थे, निन्दा की है। श्रील शुकदेव गोस्वामी ने, जो समान रूप से बुद्धिमान थे, जैसा कि महाराज परीक्षित के आध्यात्मिक गुरु के लिए उपयुक्त था, राजा को उत्तर दिया और पुष्टि की कि प्रायश्चित्त सम्बन्धी उनका कथन ठीक था। किसी पापकर्म को किसी पुण्यकर्म से निष्फल नहीं किया जा सकता। अतः वास्तविक प्रायश्चित्त हमारी सुप्त कृष्णभावना का जागरण है।\n\nवास्तविक प्रायश्चित्त में वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति निहित है, और इसके लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है। जब मनुष्य किसी नियमित स्वास्थ्य-प्रणाली का पालन करता है, तो वह रोगग्रस्त नहीं होता। मनुष्य का प्रयोजन यह है कि वह अपने मूल ज्ञान को पुनर्जीवित करने हेतु कुछ सिद्धान्तों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाए। ऐसा व्यवस्थित जीवन तपस्या कहलाता है। मनुष्य तपस्या तथा ब्रह्मचर्य के अभ्यास द्वारा, मन के नियन्त्रण द्वारा, इन्द्रियों के नियन्त्रण द्वारा, अपनी सम्पत्ति को दान में देकर, सत्यनिष्ठ रहकर, स्वच्छ रहकर तथा योग-आसनों के अभ्यास द्वारा क्रमशः वास्तविक ज्ञान, अर्थात् कृष्णभावनामृत के स्तर तक उन्नत हो सकता है। तथापि यदि मनुष्य इतना सौभाग्यशाली हो कि उसे किसी शुद्ध भक्त का संग प्राप्त हो जाए, तो वह योग की रहस्यमयी प्रक्रिया द्वारा मन को वश में करने की समस्त साधनाओं को सरलता से लाँघ सकता है—केवल कृष्णभावनामृत के विधि-नियमों का पालन करके, अर्थात् अवैध मैथुन, मांसाहार, नशा तथा द्यूत से विरत रहकर, और प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में परमेश्वर की सेवा में संलग्न होकर। इस सरल प्रक्रिया की अनुशंसा श्रील रूप गोस्वामी कर रहे हैं।\n\nसर्वप्रथम मनुष्य को अपनी वाक्शक्ति को वश में करना चाहिए। हममें से प्रत्येक में वाणी की शक्ति है; अवसर मिलते ही हम बोलने लगते हैं। यदि हम कृष्णभावनामृत के विषय में नहीं बोलते, तो सब प्रकार की निरर्थक बातें करते हैं। खेत में एक मेंढक टर्र-टर्र करके बोलता है, और इसी प्रकार जिसके पास जिह्वा है वह प्रत्येक प्राणी बोलना चाहता है, भले ही उसके पास कहने को केवल बकवास ही हो। मेंढक का टर्राना, तथापि, केवल साँप को निमन्त्रण देता है: \"कृपया यहाँ आएँ और मुझे खा लें।\" फिर भी, यद्यपि वह मृत्यु को निमन्त्रित कर रहा होता है, मेंढक टर्राता ही रहता है। भौतिकतावादी मनुष्यों तथा निर्विशेषवादी मायावादी दार्शनिकों की बातचीत की तुलना मेंढकों के टर्राने से की जा सकती है। वे सदा निरर्थक बातें करते रहते हैं और इस प्रकार मृत्यु को उन्हें पकड़ने का निमन्त्रण देते रहते हैं। तथापि वाणी का नियन्त्रण, जैसा कि मायावादी दार्शनिक सोचते हैं, स्वयं पर थोपा गया मौन (मौन की बाह्य प्रक्रिया) नहीं है। मौन कुछ समय के लिए सहायक प्रतीत हो सकता है, किन्तु अन्ततः वह विफल सिद्ध होता है। श्रील रूप गोस्वामी द्वारा प्रतिपादित नियन्त्रित वाणी का अर्थ कृष्ण-कथा की सकारात्मक प्रक्रिया का समर्थन करता है, अर्थात् वाक्शक्ति को परमेश्वर श्रीकृष्ण की महिमा-गान में संलग्न करना। इस प्रकार जिह्वा भगवान् के नाम, रूप, गुणों तथा लीलाओं की महिमा-गान कर सकती है। कृष्ण-कथा का प्रचारक सदा मृत्यु के चंगुल से परे रहता है। यही वाणी के वेग को वश में करने का महत्त्व है।\n\nमन की चञ्चलता अथवा अस्थिरता (मनो-वेग) तब वश में होती है जब मनुष्य अपने मन को कृष्ण के चरणकमलों में स्थिर कर सकता है। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.31) में कहा गया है:\n\nkṛṣṇa-sūrya-sama; māyā haya andhakāra\n\nyāhāṅ kṛṣṇa, tāhāṅ nāhi māyāra adhikāra\n\nकृष्ण ठीक सूर्य के समान हैं, और माया ठीक अन्धकार के समान है। यदि सूर्य उपस्थित हो, तो अन्धकार का प्रश्न ही नहीं उठता। इसी प्रकार, यदि कृष्ण मन में उपस्थित हों, तो मन के माया के प्रभाव से विचलित होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। समस्त भौतिक विचारों का निषेध करने की योग-प्रक्रिया सहायक नहीं होगी। मन में रिक्तता उत्पन्न करने का प्रयास कृत्रिम है। वह रिक्तता टिकेगी नहीं। तथापि यदि मनुष्य सदा कृष्ण का तथा कृष्ण की सर्वोत्तम सेवा कैसे की जाए, इसका चिन्तन करता रहे, तो उसका मन स्वाभाविक रूप से वश में हो जाएगा।\n\nइसी प्रकार, क्रोध को भी वश में किया जा सकता है। हम क्रोध को पूर्णतः रोक नहीं सकते, किन्तु यदि हम केवल उन्हीं पर क्रोधित हों जो भगवान् अथवा भगवान् के भक्तों की निन्दा करते हैं, तो हम अपने क्रोध को कृष्णभावनामृत में वश में कर लेते हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु उन दुष्ट भाइयों जगाई तथा मादाई पर क्रोधित हुए, जिन्होंने निन्दा की तथा नित्यानन्द प्रभु पर प्रहार किया। अपने शिक्षाष्टक में भगवान् चैतन्य ने लिखा, *तृणाद् अपि सुनीचेन तरोर् अपि सहिष्णुना*: \"मनुष्य को घास से भी अधिक विनम्र तथा वृक्ष से भी अधिक सहनशील होना चाहिए।\" तब कोई पूछ सकता है कि भगवान् ने अपना क्रोध क्यों प्रदर्शित किया। बात यह है कि मनुष्य को अपने प्रति किए गए समस्त अपमानों को सहन करने के लिए तैयार रहना चाहिए, किन्तु जब कृष्ण अथवा उनके शुद्ध भक्त की निन्दा होती है, तब एक सच्चा भक्त क्रोधित हो जाता है और अपराधियों के विरुद्ध अग्नि के समान आचरण करता है। क्रोध को रोका नहीं जा सकता, किन्तु उसका सही प्रयोग किया जा सकता है। क्रोध में ही हनुमान ने लंका को अग्नि के हवाले किया था, किन्तु उनकी पूजा भगवान् रामचन्द्र के महानतम भक्त के रूप में होती है। इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने क्रोध का सही दिशा में उपयोग किया। अर्जुन एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे युद्ध करने को तत्पर नहीं थे, किन्तु कृष्ण ने उनके क्रोध को उद्दीप्त किया: \"तुम्हें अवश्य युद्ध करना होगा!\" क्रोध के बिना युद्ध करना सम्भव नहीं है। तथापि क्रोध तब वश में होता है जब उसका प्रयोग भगवान् की सेवा में होता है।\n\nजहाँ तक जिह्वा के वेगों का प्रश्न है, हम सभी अनुभव करते हैं कि जिह्वा स्वादिष्ट व्यंजन खाना चाहती है। सामान्यतः हमें जिह्वा को अपनी रुचि के अनुसार खाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, अपितु प्रसाद उपलब्ध कराकर जिह्वा को वश में करना चाहिए। भक्त की मनोवृत्ति यह होती है कि वह केवल तभी खाएगा जब कृष्ण उसे प्रसाद देंगे। यही जिह्वा के वेग को वश में करने का उपाय है। मनुष्य को निर्धारित समय पर प्रसाद ग्रहण करना चाहिए और केवल जिह्वा अथवा उदर की सनक तृप्त करने हेतु भोजनालयों या मिष्ठान्न-भंडारों में नहीं खाना चाहिए। यदि हम केवल प्रसाद ग्रहण करने के सिद्धान्त पर अटल रहें, तो उदर तथा जिह्वा के वेग वश में किए जा सकते हैं।\n\nइसी प्रकार, जननेन्द्रियों के वेग, अर्थात् यौन-आवेग को तब वश में किया जा सकता है जब इसका अनावश्यक प्रयोग न किया जाए। जननेन्द्रियों का प्रयोग किसी कृष्णभावनाभावित सन्तान को जन्म देने के लिए करना चाहिए, अन्यथा इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। कृष्णभावनामृत आन्दोलन विवाह को जननेन्द्रियों की तृप्ति के लिए नहीं, अपितु कृष्णभावनाभावित सन्तानों के जनन के लिए प्रोत्साहित करता है। जैसे ही बच्चे कुछ बड़े होते हैं, उन्हें डलास, टेक्सास स्थित हमारी गुरुकुल पाठशाला में भेज दिया जाता है, जहाँ उन्हें पूर्णतः कृष्णभावनाभावित भक्त बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। ऐसे अनेक कृष्णभावनाभावित बच्चे आवश्यक हैं, और जो कृष्णभावनाभावित सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ है, उसे अपनी जननेन्द्रियों का उपयोग करने की अनुमति है।\n\nजब मनुष्य कृष्णभावनापूर्ण नियन्त्रण की विधियों में पूर्णतः अभ्यस्त हो जाता है, तब वह एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु बनने का अधिकारी बन सकता है।\n\nउपदेशामृत पर अपनी अनुवृत्ति-व्याख्या में श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर लिखते हैं कि हमारी भौतिक आत्म-पहचान तीन प्रकार के वेग उत्पन्न करती है—बोलने का वेग, मन का वेग अथवा माँगें, तथा शरीर की माँगें। जब कोई जीव इन तीन प्रकार के वेगों का शिकार बनता है, तो उसका जीवन अमंगलमय हो जाता है। जो इन माँगों अथवा वेगों का प्रतिरोध करने का अभ्यास करता है, वह तपस्वी कहलाता है, अर्थात् वह जो तपस्या का अभ्यास करता है। ऐसी तपस्या द्वारा मनुष्य भौतिक ऊर्जा, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की बहिरंगा शक्ति द्वारा शिकार बनाए जाने से उबर सकता है।\n\nजब हम बोलने के वेग का उल्लेख करते हैं, तो हमारा तात्पर्य व्यर्थ की बातचीत से है, जैसी निर्विशेषवादी मायावादी दार्शनिकों की, अथवा सकाम कर्मों में संलग्न व्यक्तियों की (जो तकनीकी रूप से कर्म-काण्ड कहलाते हैं), अथवा उन भौतिकतावादी लोगों की जो केवल बिना किसी संयम के जीवन का भोग करना चाहते हैं। ऐसी समस्त बातें अथवा साहित्य बोलने के वेग के व्यावहारिक प्रदर्शन हैं। अनेक लोग निरर्थक बातें कर रहे हैं और व्यर्थ की पुस्तकों के अम्बार लिख रहे हैं, और यह सब बोलने के वेग का परिणाम है। इस प्रवृत्ति को निष्फल करने के लिए हमें अपनी बातचीत को कृष्ण के विषय की ओर मोड़ना होगा। इसकी व्याख्या *श्रीमद्भागवत* (1.5.10–11) में की गई है:\n\nna yad vacaś citra-padaṁ harer yaśo\n\njagat-pavitraṁ pragṛṇīta karhicit\n\ntad vāyasaṁ tīrtham uśanti mānasā\n\nna yatra haṁsā niramanty uśik-kṣayāḥ\n\n\"वे शब्द जो भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं करते, जो अकेले ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के वातावरण को पवित्र कर सकते हैं, सन्तजनों द्वारा कौओं के तीर्थस्थान के समान माने जाते हैं। चूँकि सर्व-पूर्ण व्यक्ति दिव्य धाम के निवासी हैं, अतः वे वहाँ कोई आनन्द नहीं प्राप्त करते।\"\n\ntad-vāg-visargo janatāgha-viplavo\n\nyasmin prati-ślokam abaddhavaty api\n\nnāmāny anantasya yaśo 'ṅkitāni yat\n\nśṛṇvanti gāyanti gṛṇanti sādhavaḥ\n\n[ SB 1.5.11]\n\n\"दूसरी ओर, वह साहित्य जो अनन्त परमेश्वर के नाम, यश, रूप, लीला आदि की दिव्य महिमाओं के वर्णन से परिपूर्ण है, एक भिन्न सृष्टि है, जो इस संसार की पथभ्रष्ट सभ्यता के पापमय जीवनों में क्रान्ति लाने की दिशा में निर्दिष्ट दिव्य शब्दों से परिपूर्ण है। ऐसे दिव्य साहित्य, यद्यपि अपूर्ण रूप से रचित हों, तथापि उन शुद्ध व्यक्तियों द्वारा सुने, गाए तथा स्वीकार किए जाते हैं जो पूर्णतः सत्यनिष्ठ हैं।\"\n\nनिष्कर्ष यह है कि केवल तभी जब हम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति के विषय में बात करते हैं, हम व्यर्थ की निरर्थक बातचीत से विरत रह सकते हैं। हमें सदा अपनी वाक्शक्ति का प्रयोग केवल कृष्णभावनामृत के साक्षात्कार के प्रयोजन हेतु करने का प्रयत्न करना चाहिए।\n\nजहाँ तक कलहप्रिय मन के क्षोभों का प्रश्न है, वे दो भागों में विभाजित हैं। पहला अविरोध-प्रीति कहलाता है, अर्थात् अनियन्त्रित आसक्ति, और दूसरा विरोध-युक्त-क्रोध कहलाता है, अर्थात् कुण्ठा से उत्पन्न क्रोध। मायावादियों के दर्शन का अनुसरण, कर्म-वादियों के सकाम फलों में विश्वास, तथा भौतिकतावादी इच्छाओं पर आधारित योजनाओं में विश्वास अविरोध-प्रीति कहलाते हैं। ज्ञानी, कर्मी तथा भौतिकतावादी योजनाकार सामान्यतः बद्धजीवों का ध्यान आकर्षित करते हैं, किन्तु जब भौतिकतावादी अपनी योजनाएँ पूरी नहीं कर पाते और जब उनकी युक्तियाँ विफल हो जाती हैं, तब वे क्रोधित हो जाते हैं। भौतिक इच्छाओं की कुण्ठा क्रोध उत्पन्न करती है।\n\nइसी प्रकार, शरीर की माँगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है—जिह्वा, उदर तथा जननेन्द्रियों की माँगें। मनुष्य यह देख सकता है कि ये तीनों इन्द्रियाँ, जहाँ तक शरीर का सम्बन्ध है, भौतिक रूप से एक सीधी रेखा में स्थित हैं, और शारीरिक माँगें जिह्वा से आरम्भ होती हैं। यदि मनुष्य जिह्वा की क्रियाओं को केवल प्रसाद-ग्रहण तक सीमित करके उसकी माँगों को संयमित कर सके, तो उदर तथा जननेन्द्रियों के वेग स्वतः वश में हो सकते हैं। इस सन्दर्भ में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं:\n\nśarīra avidyā jāla, jaḍendriya tāhe kāla,\n\njīve phele viṣaya-sāgare\n\ntā'ra madhye jihvā ati, lobhamāyā sudurmati,\n\ntā'ke jetā kaṭhina saṁsāre\n\nkṛṣṇa baḍa dayāmaya, karibāre jihvā jaya,\n\nsva-prasāda-anna dila bhāi\n\nsei annāmṛta khāo, rādhā-kṛṣṇa-guṇa gāo,\n\npreme ḍāka caitanya-nitāi\n\n\"हे भगवन्! यह भौतिक शरीर अज्ञान का पिंड है, और इन्द्रियाँ मृत्यु की ओर ले जाने वाले मार्गों का जाल हैं। किसी न किसी प्रकार हम भौतिक इन्द्रिय-भोग के सागर में गिर पड़े हैं, और समस्त इन्द्रियों में जिह्वा सर्वाधिक लोलुप तथा अनियन्त्रित है। इस संसार में जिह्वा पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु आप, हे प्रिय कृष्ण, हम पर अत्यन्त दयालु हैं। आपने जिह्वा पर विजय पाने में हमारी सहायता हेतु यह उत्तम प्रसाद भेजा है; अतः आइए हम इस प्रसाद को अपनी पूर्ण तृप्ति तक ग्रहण करें और आपके युगल-विग्रह श्रीश्री राधा तथा कृष्ण की महिमा-गान करें, और प्रेमपूर्वक भगवान् चैतन्य तथा प्रभु नित्यानन्द की सहायता हेतु पुकारें।\" छह प्रकार के रस (स्वाद) होते हैं, और यदि मनुष्य उनमें से किसी एक से भी विचलित हो जाए, तो वह जिह्वा के वेगों द्वारा नियन्त्रित हो जाता है। कुछ व्यक्ति मांस, मछली, केकड़े, अंडे तथा वीर्य एवं रक्त से उत्पन्न तथा मृत शरीरों के रूप में खाई जाने वाली अन्य वस्तुओं के भक्षण की ओर आकृष्ट होते हैं। अन्य लोग शाक-सब्जियाँ, लताएँ, पालक अथवा दुग्ध-उत्पादों के भक्षण की ओर आकृष्ट होते हैं, किन्तु यह सब जिह्वा की माँगों की तृप्ति के लिए। इन्द्रियतृप्ति के लिए ऐसा भोजन—जिसमें मिर्च तथा इमली जैसे मसालों की अधिक मात्रा का प्रयोग सम्मिलित है—कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों द्वारा त्याग देना चाहिए। पान, हरीतकी, सुपारी, पान बनाने में प्रयुक्त विभिन्न मसाले, तम्बाकू, एल.एस.डी., गाँजा, अफीम, मदिरा, कॉफी तथा चाय का सेवन अवैध माँगों को पूरा करने के लिए किया जाता है। यदि हम केवल कृष्ण को अर्पित भोजन के अवशेष ग्रहण करने का अभ्यास कर सकें, तो माया के शिकार होने से मुक्त होना सम्भव है। शाक-सब्जियाँ, अन्न, फल, दुग्ध-उत्पाद तथा जल भगवान् को अर्पित करने योग्य उचित भोजन हैं, जैसा कि भगवान् कृष्ण ने स्वयं निर्धारित किया है। तथापि यदि मनुष्य प्रसाद को केवल उसके स्वादिष्ट स्वाद के कारण ग्रहण करे और इस प्रकार अधिक खा ले, तो वह भी जिह्वा की माँगों को तृप्त करने के प्रयास का शिकार हो जाता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु ने हमें प्रसाद ग्रहण करते समय भी अत्यन्त स्वादिष्ट व्यंजनों से बचने की शिक्षा दी। यदि हम ऐसे उत्तम भोजन को खाने के अभिप्राय से विग्रह को स्वादिष्ट व्यंजन अर्पित करते हैं, तो हम जिह्वा की माँगों को तृप्त करने के प्रयास में संलग्न हो जाते हैं। यदि हम किसी धनी व्यक्ति का निमन्त्रण स्वादिष्ट भोजन प्राप्त करने के विचार से स्वीकार करते हैं, तो हम भी जिह्वा की माँगों को तृप्त करने का प्रयास कर रहे होते हैं। चैतन्य-चरितामृत (अन्त्य 6.227) में कहा गया है:\n\njihvāra lālase yei iti-uti dhāya\n\nśiśnodara-parāyaṇa kṛṣṇa nāhi pāya\n\n\"वह व्यक्ति जो अपनी जिह्वा को तृप्त करने की खोज में इधर-उधर दौड़ता है और जो सदा अपने उदर तथा जननेन्द्रियों की इच्छाओं में आसक्त रहता है, कृष्ण को प्राप्त करने में असमर्थ है।\"\n\nजैसा कि पूर्व में कहा गया है, जिह्वा, उदर तथा जननेन्द्रियाँ सभी एक सीधी रेखा में स्थित हैं, और वे एक ही श्रेणी में आती हैं। भगवान् चैतन्य ने कहा है, *भाल ना खाइबे आर भाल ना परिबे*: \"विलासितापूर्ण वस्त्र न पहनो और स्वादिष्ट खाद्य-पदार्थ न खाओ।\" (चै.च. अन्त्य 6.236)\n\nजो उदर के रोगों से पीड़ित हैं, वे, कम से कम इस विश्लेषण के अनुसार, उदर के वेगों को वश में करने में अवश्य असमर्थ होंगे। जब हम आवश्यकता से अधिक खाने की इच्छा करते हैं, तब हम स्वतः जीवन में अनेक असुविधाएँ उत्पन्न कर लेते हैं। तथापि यदि हम एकादशी तथा जन्माष्टमी जैसे उपवास के दिनों का पालन करें, तो हम उदर की माँगों को संयमित कर सकते हैं।\n\nजहाँ तक जननेन्द्रियों के वेगों का प्रश्न है, दो प्रकार हैं—उचित तथा अनुचित, अथवा वैध तथा अवैध मैथुन। जब कोई पुरुष ठीक प्रकार से परिपक्व हो जाता है, तब वह शास्त्रों के विधि-नियमों के अनुसार विवाह कर सकता है और उत्तम सन्तानों के जनन हेतु अपनी जननेन्द्रियों का उपयोग कर सकता है। यह वैध तथा धार्मिक है। अन्यथा, वह जननेन्द्रियों की माँगों को तृप्त करने हेतु अनेक कृत्रिम उपाय अपना सकता है, और सम्भवतः वह कोई संयम न बरते। जब मनुष्य अवैध मैथुन में लिप्त होता है, जैसा कि शास्त्रों द्वारा परिभाषित है, चाहे सोचकर, योजना बनाकर, इसके विषय में बात करके अथवा वस्तुतः यौन-संभोग करके, या कृत्रिम उपायों से जननेन्द्रियों को तृप्त करके, तो वह माया के चंगुल में फँस जाता है। ये निर्देश केवल गृहस्थों पर ही नहीं, अपितु त्यागियों, अर्थात् जो संन्यास-आश्रम में हैं, उन पर भी लागू होते हैं। अपने ग्रन्थ प्रेम-विवर्त के सातवें अध्याय में श्रीजगदानन्द पण्डित कहते हैं:\n\nvairāgī bhāi grāmya-kathā nā śunibe kāne\n\ngrāmya-vārtā nā kahibe yabe milibe āne\n\nsvapane o nā kara bhāi strī-sambhāṣaṇa\n\ngṛhe strī chāḍiyā bhāi āsiyācha vana\n\nyadi cāha praṇaya rākhite gaurāṅgera sane\n\nchoṭa haridāsera kathā thāke yena mane\n\nbhāla nā khāibe āra bhāla nā paribe\n\nhṛdayete rādhā-kṛṣṇa sarvadā sevibe\n\n\"मेरे प्रिय भाई, तुम संन्यास-आश्रम में हो और तुम्हें सामान्य सांसारिक बातों के विषय में सुनना नहीं चाहिए, न ही जब तुम दूसरों से मिलो तब सांसारिक बातें करनी चाहिए। स्वप्न में भी स्त्रियों का विचार न करो। तुमने इस व्रत के साथ संन्यास-आश्रम स्वीकार किया है जो तुम्हें स्त्रियों की संगति करने से रोकता है। यदि तुम चैतन्य महाप्रभु की संगति करना चाहते हो, तो तुम्हें सदा छोटा हरिदास की घटना तथा यह स्मरण रखना चाहिए कि भगवान् ने उन्हें कैसे अस्वीकार किया। विलासितापूर्ण व्यंजन न खाओ और न ही उत्तम वस्त्र पहनो, अपितु सदा विनम्र रहो और अपने हृदय के अन्तस्तल में युगल-विग्रह श्रीश्री राधा-कृष्ण की सेवा करो।\"\n\nनिष्कर्ष यह है कि जो इन छह वस्तुओं—वाणी, मन, क्रोध, जिह्वा, उदर तथा जननेन्द्रियों—को वश में कर सकता है, वह स्वामी अथवा गोस्वामी कहलाने योग्य है। *स्वामी* का अर्थ है स्वामी, और *गोस्वामी* का अर्थ है *गो*, अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी। जब मनुष्य संन्यास-आश्रम स्वीकार करता है, तब वह स्वतः स्वामी की उपाधि ग्रहण कर लेता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने परिवार, समुदाय अथवा समाज का स्वामी है; उसे अपनी इन्द्रियों का स्वामी होना चाहिए। जब तक मनुष्य अपनी इन्द्रियों का स्वामी नहीं है, तब तक उसे गोस्वामी नहीं, अपितु गो-दास, अर्थात् इन्द्रियों का सेवक कहा जाना चाहिए। वृन्दावन के छह गोस्वामियों के पदचिह्नों पर चलते हुए, समस्त स्वामियों तथा गोस्वामियों को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में पूर्णतः संलग्न होना चाहिए। इसके विपरीत, गो-दास इन्द्रियों की सेवा अथवा भौतिक जगत् की सेवा में संलग्न रहते हैं। उनका कोई अन्य कार्य नहीं होता। प्रह्लाद महाराज ने गो-दास का आगे *अदान्त-गो* के रूप में वर्णन किया है, जो उसको संकेत करता है जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं। एक *अदान्त-गो* कृष्ण का सेवक नहीं बन सकता। *श्रीमद्भागवत* (7.5.30) में प्रह्लाद महाराज ने कहा है:\n\nmatir na kṛṣṇe parataḥ svato vā\n\nmitho 'bhipadyeta gṛha-vratānām\n\nadānta-gobhir viśatāṁ tamisraṁ\n\npunaḥ punaś carvita-carvaṇānām\n\n\"जिन्होंने अपनी इन्द्रियों की तृप्ति के लिए इस भौतिक जगत् में अपना अस्तित्व बनाए रखने का निश्चय कर लिया है, उनके लिए कृष्णभावनाभावित बनने की कोई सम्भावना नहीं है, न तो व्यक्तिगत प्रयत्न से, न दूसरों के उपदेश से, न संयुक्त गोष्ठियों से। वे अनियन्त्रित इन्द्रियों द्वारा अज्ञान के घोरतम क्षेत्र में घसीटे जाते हैं, और इस प्रकार वे उन्मत्त होकर उसमें संलग्न होते हैं जिसे 'चबाए हुए को चबाना' कहा जाता है।\""}
{"ref": "noi/2", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/2/", "verse_text": "", "devanagari": "> अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमग्रहः ।\n> जनसङ्गश्व लौल्यं च षड्भिर्भक्तिर्विनश्यति ॥२॥", "synonyms": "*अति-आहारः*—अधिक खाना अथवा अधिक संग्रह करना; *प्रयासः*—अति-प्रयत्न; *च*—तथा; *प्रजल्पः*—व्यर्थ की बातचीत; *नियम*—विधि-नियम; *आग्रहः*—के प्रति अत्यधिक आसक्ति (अथवा अग्रहः—की अत्यधिक उपेक्षा); *जन-सङ्गः*—सांसारिक मनोवृत्ति वाले व्यक्तियों की संगति; *च*—तथा; *लौल्यम्*—उत्कट अभिलाषा अथवा लोभ; *च*—तथा; *षड्भिः*—इन छह से; *भक्तिः*—भक्ति; *विनश्यति*—नष्ट हो जाती है।", "translation": "**मनुष्य की भक्ति तब नष्ट हो जाती है जब वह निम्नलिखित छह कार्यों में अत्यधिक उलझ जाता है: (1) आवश्यकता से अधिक खाना अथवा आवश्यकता से अधिक धन संग्रह करना; (2) अत्यन्त दुर्लभ सांसारिक वस्तुओं के लिए अति-प्रयत्न करना; (3) सांसारिक विषयों के बारे में अनावश्यक बातचीत करना; (4) शास्त्रीय विधि-नियमों का पालन केवल पालन के लिए करना, न कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए, अथवा शास्त्रों के विधि-नियमों को अस्वीकार करके स्वतन्त्र रूप से या मनमाने ढंग से कार्य करना; (5) उन सांसारिक मनोवृत्ति वाले व्यक्तियों की संगति करना जिनकी कृष्णभावनामृत में कोई रुचि नहीं है; तथा (6) सांसारिक उपलब्धियों के लिए लोभ करना।**", "purport": "मानव-जीवन सादा जीवन तथा उच्च विचार के लिए है। चूँकि समस्त बद्ध प्राणी भगवान् की तृतीय शक्ति के नियन्त्रण में हैं, अतः यह भौतिक जगत् इस प्रकार रचा गया है कि मनुष्य कार्य करने के लिए बाध्य है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की तीन प्रमुख शक्तियाँ अथवा सामर्थ्य हैं। पहली अन्तरंगा-शक्ति, अर्थात् आन्तरिक शक्ति कहलाती है। दूसरी तटस्था-शक्ति, अर्थात् सीमान्त शक्ति कहलाती है। तीसरी बहिरंगा-शक्ति, अर्थात् बाह्य शक्ति कहलाती है। जीव तटस्था-शक्ति का गठन करते हैं, और वे आन्तरिक तथा बाह्य शक्तियों के मध्य स्थित हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नित्य सेवकों के रूप में अधीनस्थ होने के कारण, जीवात्माओं, अर्थात् अणु-जीवों को आन्तरिक अथवा बाह्य शक्ति में से किसी एक के नियन्त्रण में रहना ही पड़ता है। जब वे आन्तरिक शक्ति के नियन्त्रण में रहते हैं, तब वे अपनी स्वाभाविक, स्वरूपगत क्रिया का प्रदर्शन करते हैं—अर्थात् भगवान् की भक्ति में निरन्तर संलग्नता। यह भगवद्गीता (9.13) में कहा गया है:\n\nmahātmānas tu māṁ pārtha\n\ndaivīṁ prakṛtim āśritāḥ\n\nbhajanty ananya-manaso\n\njñātvā bhūtādim avyayam\n\n\"हे पृथापुत्र, जो मोहग्रस्त नहीं हैं, वे महात्माजन दिव्य प्रकृति के संरक्षण में हैं। वे पूर्णतः भक्ति में संलग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, आदि तथा अक्षय रूप में जानते हैं।\"\n\n*महात्मा* शब्द उन्हें संकेत करता है जो उदारमना हैं, संकीर्णमना नहीं। संकीर्णमना व्यक्ति, जो सदा अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में संलग्न रहते हैं, कभी-कभी राष्ट्रवाद, मानवतावाद अथवा परोपकारवाद जैसे किसी \"वाद\" के माध्यम से दूसरों का भला करने हेतु अपने कार्यों का विस्तार करते हैं। वे दूसरों की इन्द्रियतृप्ति, जैसे अपने परिवार, समुदाय अथवा समाज—चाहे राष्ट्रीय हो या अन्तर्राष्ट्रीय—के सदस्यों की इन्द्रियतृप्ति के लिए अपनी व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति का परित्याग कर सकते हैं। वस्तुतः यह सब विस्तारित इन्द्रियतृप्ति है, व्यक्तिगत से सामुदायिक तथा सामाजिक तक। यह सब भौतिक दृष्टिकोण से भले ही अत्यन्त उत्तम हो, किन्तु ऐसे कार्यों का कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं है। ऐसे कार्य का आधार इन्द्रियतृप्ति है, चाहे व्यक्तिगत हो या विस्तारित। केवल तभी जब कोई व्यक्ति परमेश्वर की इन्द्रियों को तृप्त करता है, उसे महात्मा, अर्थात् उदारमना व्यक्ति कहा जा सकता है।\n\nभगवद्गीता से उपर्युक्त उद्धृत श्लोक में *दैवीं प्रकृतिम्* शब्द पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आन्तरिक शक्ति, अर्थात् आह्लादिनी शक्ति के नियन्त्रण को संकेत करते हैं। यह आह्लादिनी शक्ति श्रीमती राधारानी, अथवा उनके विस्तार लक्ष्मी, भाग्य की देवी के रूप में प्रकट होती है। जब व्यष्टि जीवात्माएँ आन्तरिक शक्ति के नियन्त्रण में रहती हैं, तब उनका एकमात्र कार्य कृष्ण, अथवा विष्णु की तृप्ति है। यही महात्मा की स्थिति है। यदि कोई महात्मा नहीं है, तो वह दुरात्मा, अर्थात् संकीर्णमना व्यक्ति है। ऐसे मानसिक रूप से अपंग दुरात्मा भगवान् की बाह्य शक्ति, महामाया के नियन्त्रण में रखे जाते हैं।\n\nवस्तुतः इस भौतिक जगत् के समस्त जीव महामाया के नियन्त्रण में हैं, जिसका कार्य उन्हें तीन प्रकार के तापों के प्रभाव के अधीन करना है: अधिदैविक-क्लेश (देवताओं द्वारा उत्पन्न कष्ट, जैसे अनावृष्टि, भूकम्प तथा तूफान), अधिभौतिक-क्लेश (कीटों या शत्रुओं जैसे अन्य जीवों द्वारा उत्पन्न कष्ट), तथा अध्यात्मिक-क्लेश (अपने ही शरीर तथा मन द्वारा उत्पन्न कष्ट, जैसे मानसिक तथा शारीरिक दुर्बलताएँ)। *दैव-भूतात्म-हेतवः*: बद्धजीव, बाह्य शक्ति के नियन्त्रण द्वारा इन तीन तापों के अधीन होकर, विभिन्न कठिनाइयाँ भोगते हैं।\n\nबद्धजीवों के समक्ष मुख्य समस्या जन्म, जरा, व्याधि तथा मृत्यु की पुनरावृत्ति है। भौतिक जगत् में मनुष्य को शरीर तथा आत्मा के पालन के लिए कार्य करना पड़ता है, किन्तु मनुष्य ऐसा कार्य इस प्रकार कैसे कर सकता है जो कृष्णभावनामृत के निष्पादन के अनुकूल हो?\n\nप्रत्येक व्यक्ति को शरीर के पालन के लिए आवश्यक अन्न, वस्त्र, धन तथा अन्य वस्तुओं जैसी सम्पत्ति की आवश्यकता होती है, किन्तु मनुष्य को अपनी वास्तविक मूलभूत आवश्यकताओं से अधिक संग्रह नहीं करना चाहिए। यदि इस प्राकृतिक सिद्धान्त का पालन किया जाए, तो शरीर के पालन में कोई कठिनाई नहीं होगी।\n\nप्रकृति की व्यवस्था के अनुसार, विकास-क्रम में निम्न स्तर के जीव आवश्यकता से अधिक न तो खाते हैं और न संग्रह करते हैं। फलस्वरूप पशु-जगत् में सामान्यतः कोई आर्थिक समस्या अथवा आवश्यक वस्तुओं की कमी नहीं होती। यदि चावल की एक बोरी किसी सार्वजनिक स्थान पर रख दी जाए, तो पक्षी कुछ दाने खाने आएँगे और चले जाएँगे। किन्तु मनुष्य समस्त बोरी उठा ले जाएगा। वह उतना खाएगा जितना उसका उदर समा सकता है और तत्पश्चात् शेष को भण्डार में रखने का प्रयास करेगा। शास्त्रों के अनुसार, आवश्यकता से अधिक का यह संग्रह (अत्याहार) निषिद्ध है। अब सम्पूर्ण विश्व इसके कारण कष्ट भोग रहा है।\n\nआवश्यकता से अधिक संग्रह तथा भक्षण प्रयास, अर्थात् अनावश्यक प्रयत्न को भी जन्म देता है। ईश्वर की व्यवस्था से, विश्व के किसी भी भाग में कोई भी व्यक्ति अत्यन्त शान्तिपूर्वक रह सकता है यदि उसके पास कुछ भूमि तथा एक दुधारू गाय हो। मनुष्य को जीविका कमाने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्थानीय रूप से अन्न उत्पन्न कर सकता है और गायों से दूध प्राप्त कर सकता है। यह समस्त आर्थिक समस्याओं का समाधान कर सकता है। सौभाग्य से, मनुष्य को कृष्णभावनामृत की संस्कृति, अथवा ईश्वर, उसके साथ अपने सम्बन्ध, तथा जीवन के परम लक्ष्य, ईश्वर-प्रेम को समझने के लिए उच्च बुद्धि प्रदान की गई है। दुर्भाग्य से, तथाकथित सभ्य मनुष्य, ईश्वर-साक्षात्कार की चिन्ता न करते हुए, अपनी बुद्धि का प्रयोग आवश्यकता से अधिक प्राप्त करने तथा केवल जिह्वा को तृप्त करने हेतु खाने में करता है। ईश्वर की व्यवस्था से सम्पूर्ण विश्व में मनुष्यों के लिए दूध तथा अन्न के उत्पादन की पर्याप्त गुंजाइश है, किन्तु ईश्वर-भावना विकसित करने हेतु अपनी उच्च बुद्धि का प्रयोग करने के बजाय, तथाकथित बुद्धिमान मनुष्य अपनी बुद्धि का दुरुपयोग अनेक अनावश्यक तथा अवांछित वस्तुओं के उत्पादन में करते हैं। इस प्रकार कारखाने, वधशालाएँ, वेश्यालय तथा मदिरालय खोले जाते हैं। यदि लोगों को सलाह दी जाए कि वे अधिक माल संग्रह न करें, अधिक न खाएँ अथवा कृत्रिम सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए अनावश्यक कार्य न करें, तो वे सोचते हैं कि उन्हें आदिम जीवन-शैली की ओर लौटने की सलाह दी जा रही है। सामान्यतः लोग सादा जीवन तथा उच्च विचार को स्वीकार करना पसन्द नहीं करते। यही उनकी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।\n\nमानव-जीवन ईश्वर-साक्षात्कार के लिए है, और मनुष्य को इसी प्रयोजन हेतु उच्च बुद्धि प्रदान की गई है। जो लोग यह मानते हैं कि यह उच्च बुद्धि किसी उच्चतर अवस्था को प्राप्त करने के लिए है, उन्हें वैदिक साहित्य के निर्देशों का अनुसरण करना चाहिए। उच्चतर अधिकारियों से ऐसे निर्देश ग्रहण करके मनुष्य वस्तुतः पूर्ण ज्ञान में स्थित हो सकता है और जीवन को वास्तविक अर्थ प्रदान कर सकता है।\n\n*श्रीमद्भागवत* (1.2.9) में श्रीसूत गोस्वामी उचित मानव-धर्म का इस प्रकार वर्णन करते हैं:\n\ndharmasya hy āpavargyasya\n\nnārtho 'rthāyopakalpate\n\nnārthasya dharmaikāntasya\n\nkāmo lābhāya hi smṛtaḥ\n\n\"समस्त वृत्तिगत कार्य [धर्म] निश्चय ही परम मुक्ति के लिए हैं। उन्हें कभी भी भौतिक लाभ के लिए नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, जो परम वृत्तिगत सेवा [धर्म] में संलग्न है, उसे कभी भी भौतिक लाभ का प्रयोग इन्द्रियतृप्ति विकसित करने के लिए नहीं करना चाहिए।\"\n\nमानव-सभ्यता का प्रथम चरण शास्त्रीय आदेशों के अनुसार सम्पन्न किए गए वृत्तिगत कार्यों से बना है। मनुष्य की उच्चतर बुद्धि को मूलभूत धर्म को समझने हेतु प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। मानव-समाज में हिन्दू, ईसाई, यहूदी, मुसलमान, बौद्ध इत्यादि के रूप में विभिन्न धार्मिक संकल्पनाएँ हैं, क्योंकि धर्म के बिना मानव-समाज पशु-समाज से उत्तम नहीं है।\n\nजैसा कि ऊपर कहा गया है (*धर्मस्य ह्य आपवर्ग्यस्य नार्थो 'र्थायोपकल्पते*), धर्म मुक्ति प्राप्त करने के लिए है, रोटी प्राप्त करने के लिए नहीं। कभी-कभी मानव-समाज भौतिक उन्नति की ओर लक्षित तथाकथित धर्म की एक प्रणाली गढ़ लेता है, किन्तु वह सच्चे धर्म के प्रयोजन से कोसों दूर है। धर्म में ईश्वर के नियमों को समझना निहित है, क्योंकि इन नियमों का उचित निष्पादन अन्ततः मनुष्य को भौतिक बन्धन से बाहर ले जाता है। यही धर्म का सच्चा प्रयोजन है। दुर्भाग्य से लोग धर्म को भौतिक समृद्धि के लिए स्वीकार करते हैं, अत्याहार, अर्थात् ऐसी समृद्धि की अत्यधिक इच्छा के कारण। तथापि सच्चा धर्म लोगों को कृष्णभावनामृत विकसित करते हुए जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से सन्तुष्ट रहने का निर्देश देता है। यद्यपि हमें आर्थिक विकास की आवश्यकता है, तथापि सच्चा धर्म इसकी अनुमति केवल भौतिक अस्तित्व की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही देता है। *जीवस्य तत्त्व जिज्ञासा*: जीवन का वास्तविक प्रयोजन परम सत्य के विषय में जिज्ञासा करना है। यदि हमारा प्रयत्न (प्रयास) परम सत्य के विषय में जिज्ञासा करने का नहीं है, तो हम केवल अपनी कृत्रिम आवश्यकताओं को तृप्त करने हेतु अपना प्रयत्न बढ़ाते जाएँगे। एक आध्यात्मिक साधक को सांसारिक प्रयत्न से बचना चाहिए।\n\nएक अन्य बाधा प्रजल्प, अर्थात् अनावश्यक बातचीत है। जब हम कुछ मित्रों से मिलते हैं, तब हम तत्काल अनावश्यक बातचीत आरम्भ कर देते हैं, ठीक टर्राते मेंढकों के समान सुनाई देते हुए। यदि हमें बात करनी ही है, तो हमें कृष्णभावनामृत आन्दोलन के विषय में बात करनी चाहिए। जो कृष्णभावनामृत आन्दोलन से बाहर हैं, वे ढेरों समाचारपत्र, पत्रिकाएँ तथा उपन्यास पढ़ने, वर्ग-पहेलियाँ सुलझाने तथा अनेक अन्य निरर्थक कार्य करने में रुचि रखते हैं। इस प्रकार लोग अपना मूल्यवान समय तथा ऊर्जा व्यर्थ ही नष्ट कर देते हैं। पश्चिमी देशों में सक्रिय जीवन से अवकाश प्राप्त वृद्ध पुरुष ताश खेलते हैं, मछली पकड़ते हैं, टेलीविजन देखते हैं तथा व्यर्थ की सामाजिक-राजनैतिक योजनाओं पर वाद-विवाद करते हैं। ये समस्त तथा अन्य तुच्छ कार्य प्रजल्प की श्रेणी में सम्मिलित हैं। कृष्णभावनामृत में रुचि रखने वाले बुद्धिमान व्यक्तियों को ऐसे कार्यों में कभी भाग नहीं लेना चाहिए।\n\n*जन-सङ्ग* उन व्यक्तियों की संगति को संकेत करता है जिनकी कृष्णभावनामृत में कोई रुचि नहीं है। मनुष्य को ऐसी संगति का कठोरता से त्याग करना चाहिए। अतः श्रील नरोत्तम दास ठाकुर ने हमें केवल कृष्णभावनाभावित भक्तों की संगति में रहने की सलाह दी है (*भक्त-सने वास*)। मनुष्य को सदा भगवान् के भक्तों की संगति में भगवान् की सेवा में संलग्न रहना चाहिए। किसी समान व्यवसाय में संलग्न लोगों की संगति उस व्यवसाय में उन्नति के लिए अत्यन्त सहायक होती है। फलस्वरूप भौतिकतावादी व्यक्ति अपने प्रयासों को बढ़ाने हेतु विभिन्न संघ तथा क्लब बनाते हैं। उदाहरणार्थ, व्यापार-जगत् में हमें शेयर बाजार तथा वाणिज्य-मण्डल जैसी संस्थाएँ मिलती हैं। इसी प्रकार, हमने लोगों को उनकी संगति का अवसर देने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ की स्थापना की है जिन्होंने कृष्ण को नहीं भुलाया है। हमारे इस्कॉन आन्दोलन द्वारा प्रदान की गई यह आध्यात्मिक संगति दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। विश्व के विभिन्न भागों से अनेक लोग अपनी सुप्त कृष्णभावना को जगाने हेतु इस संघ में सम्मिलित हो रहे हैं।\n\nश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर अपनी अनुवृत्ति-टीका में लिखते हैं कि मनोधर्मियों अथवा शुष्क दार्शनिकों का ज्ञान अर्जित करने का अत्यधिक प्रयत्न अत्याहार (आवश्यकता से अधिक संग्रह) की श्रेणी में आता है। *श्रीमद्भागवत* के अनुसार, कृष्णभावनामृत से रहित शुष्क दर्शन पर पुस्तकों के अम्बार लिखने का दार्शनिक मनोधर्मियों का प्रयत्न पूर्णतः निष्फल है। आर्थिक विकास पर पुस्तकों के अम्बार लिखने वाले कर्मियों का कार्य भी अत्याहार की श्रेणी में आता है। इसी प्रकार, जिन्हें कृष्णभावनामृत की कोई इच्छा नहीं है और जो केवल अधिकाधिक भौतिक वस्तुएँ—चाहे वैज्ञानिक ज्ञान के रूप में हो या आर्थिक लाभ के रूप में—प्राप्त करने में रुचि रखते हैं, वे सभी अत्याहार के नियन्त्रण में सम्मिलित हैं।\n\nकर्मी भावी पीढ़ियों के लिए अधिकाधिक धन संचित करने का परिश्रम केवल इसलिए करते हैं क्योंकि वे अपनी भावी स्थिति को नहीं जानते। केवल अपने पुत्रों तथा पौत्रों के लिए अधिकाधिक धन प्राप्त करने में रुचि रखने वाले ऐसे मूर्ख व्यक्ति यह भी नहीं जानते कि अगले जीवन में उनकी क्या स्थिति होने वाली है। इस बात को स्पष्ट करने वाली अनेक घटनाएँ हैं। एक बार एक महान कर्मी ने अपने पुत्रों तथा पौत्रों के लिए एक विशाल सम्पत्ति संचित की, किन्तु बाद में, अपने कर्म के अनुसार, उसने उसी भवन के निकट स्थित एक चर्मकार के घर में जन्म लिया जिसे उसने अपने पूर्व जीवन में अपनी सन्तानों के लिए बनवाया था। ऐसा हुआ कि जब यही चर्मकार अपने पूर्व घर पर आया, तब उसके पूर्व पुत्रों तथा पौत्रों ने उसे जूतों से पीटा। जब तक कर्मी तथा ज्ञानी कृष्णभावनामृत में रुचि नहीं लेते, तब तक वे केवल अपना जीवन निष्फल कार्यों में व्यर्थ करते रहेंगे।\n\nतात्कालिक लाभ के लिए शास्त्रों के कुछ विधि-नियमों को स्वीकार करना, जैसा कि उपयोगितावादी समर्थन करते हैं, नियम-आग्रह कहलाता है, और शास्त्रों के विधि-नियमों की उपेक्षा करना, जो आध्यात्मिक विकास के लिए हैं, नियम-अग्रह कहलाता है। *आग्रह* शब्द का अर्थ है \"स्वीकार करने की उत्कण्ठा\", और *अग्रह* का अर्थ है \"स्वीकार करने में विफलता\"। इन दोनों में से किसी एक शब्द को *नियम* (\"विधि-नियम\") शब्द के साथ जोड़ने पर *नियमाग्रह* शब्द बनता है। इस प्रकार नियमाग्रह का द्विधा अर्थ है जो शब्दों के विशेष संयोग के अनुसार समझा जाता है। कृष्णभावनामृत में रुचि रखने वालों को आर्थिक उन्नति के लिए विधि-नियमों को स्वीकार करने की उत्कण्ठा नहीं होनी चाहिए, फिर भी उन्हें कृष्णभावनामृत की उन्नति के लिए शास्त्रीय विधि-नियमों को अत्यन्त श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। उन्हें अवैध मैथुन, मांसाहार, द्यूत तथा नशे से बचते हुए विधि-नियमों का कठोरता से पालन करना चाहिए।\n\nमनुष्य को मायावादियों की संगति से भी बचना चाहिए, जो केवल वैष्णवों (भक्तों) की निन्दा करते हैं। भुक्ति-कामी, जो भौतिक सुख में रुचि रखते हैं, मुक्ति-कामी, जो निराकार परब्रह्म (ब्रह्म) के अस्तित्व में लीन होकर मुक्ति की इच्छा करते हैं, तथा सिद्धि-कामी, जो रहस्यमयी योग-साधना की सिद्धि की इच्छा करते हैं, अत्याहारी के रूप में वर्गीकृत हैं। ऐसे व्यक्तियों की संगति किसी भी प्रकार वांछनीय नहीं है।\n\nरहस्यमयी योग की सिद्धि द्वारा मन का विस्तार करने, ब्रह्म के अस्तित्व में लीन होने, अथवा मनमानी भौतिक समृद्धि प्राप्त करने की इच्छाएँ सभी लोभ (लौल्य) की श्रेणी में सम्मिलित हैं। ऐसे भौतिक लाभ अथवा तथाकथित आध्यात्मिक उन्नति को अर्जित करने के समस्त प्रयास कृष्णभावनामृत के मार्ग में बाधाएँ हैं।\n\nपूँजीवादियों तथा साम्यवादियों के बीच छिड़ा आधुनिक युद्ध अत्याहार सम्बन्धी श्रील रूप गोस्वामी की सलाह की उनकी उपेक्षा के कारण है। आधुनिक पूँजीवादी आवश्यकता से अधिक धन संचित करते हैं, और साम्यवादी, उनकी समृद्धि से ईर्ष्या करते हुए, समस्त धन तथा सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण करना चाहते हैं। दुर्भाग्य से साम्यवादी नहीं जानते कि धन तथा उसके वितरण की समस्या का समाधान कैसे किया जाए। फलस्वरूप जब पूँजीवादियों का धन साम्यवादियों के हाथों में आता है, तब कोई समाधान नहीं निकलता। इन दोनों दर्शनों के विपरीत, कृष्णभावनाभावित विचारधारा कहती है कि समस्त धन कृष्ण का है। अतः जब तक समस्त धन कृष्ण के प्रशासन के अधीन नहीं आता, तब तक मानवजाति की आर्थिक समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता। धन को साम्यवादियों अथवा पूँजीवादियों के हाथों में रखने से कुछ भी हल नहीं हो सकता। यदि सड़क पर सौ डॉलर का एक नोट पड़ा हो, तो कोई उसे उठाकर अपनी जेब में रख सकता है। ऐसा व्यक्ति ईमानदार नहीं है। दूसरा व्यक्ति उस धन को देखकर उसे वहीं पड़ा रहने देने का निर्णय कर सकता है, यह सोचते हुए कि उसे दूसरे की सम्पत्ति को नहीं छूना चाहिए। यद्यपि यह दूसरा व्यक्ति अपने प्रयोजनों के लिए धन की चोरी नहीं करता, तथापि वह उसके उचित उपयोग से अनभिज्ञ है। तीसरा व्यक्ति जो सौ डॉलर का नोट देखता है, वह उसे उठा सकता है, उस व्यक्ति को खोज सकता है जिसने उसे खोया था और उसे उसे लौटा सकता है। यह व्यक्ति न तो धन को अपने लिए व्यय करने हेतु चुराता है, न ही उसकी उपेक्षा करके उसे सड़क पर पड़ा रहने देता है। उसे उठाकर तथा उस व्यक्ति को लौटाकर जिसने उसे खोया था, यह व्यक्ति ईमानदार तथा बुद्धिमान दोनों है।\n\nकेवल पूँजीवादियों से साम्यवादियों को धन हस्तान्तरित करना आधुनिक राजनीति की समस्या का समाधान नहीं कर सकता, क्योंकि यह प्रमाणित हो चुका है कि जब किसी साम्यवादी को धन मिलता है, तब वह उसका प्रयोग अपनी ही इन्द्रियतृप्ति के लिए करता है। विश्व का धन वस्तुतः कृष्ण का है, और प्रत्येक जीव, मनुष्य तथा पशु, को अपने पालन हेतु ईश्वर की सम्पत्ति का उपयोग करने का जन्मसिद्ध अधिकार है। जब कोई अपने पालन की आवश्यकता से अधिक लेता है—चाहे वह पूँजीवादी हो या साम्यवादी—तो वह चोर है, और इस रूप में वह प्रकृति के नियमों द्वारा दण्डित होने योग्य है।\n\nविश्व के धन का उपयोग समस्त जीवों के कल्याण के लिए होना चाहिए, क्योंकि यही प्रकृति-माता की योजना है। प्रत्येक व्यक्ति को भगवान् के धन का उपयोग करके जीने का अधिकार है। जब लोग भगवान् की सम्पत्ति का वैज्ञानिक रूप से उपयोग करने की कला सीख जाएँगे, तब वे एक-दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करेंगे। तब एक आदर्श समाज का गठन हो सकता है। ऐसे आध्यात्मिक समाज का मूल सिद्धान्त *श्रीईशोपनिषद्* के प्रथम मन्त्र में कहा गया है:\n\nīśāvāsyam idaṁ sarvaṁ\n\nyat kiñca jagatyāṁ jagat\n\ntena tyaktena bhuñjīthā\n\nmā gṛdhaḥ kasya svid dhanam\n\n\"ब्रह्माण्ड के भीतर जो कुछ भी चर अथवा अचर है, वह भगवान् द्वारा नियन्त्रित तथा स्वामित्व में है। अतः मनुष्य को केवल उन्हीं वस्तुओं को स्वीकार करना चाहिए जो उसके लिए आवश्यक हैं, जो उसके कोटे के रूप में नियत हैं, और अन्य वस्तुओं को स्वीकार नहीं करना चाहिए, यह भली-भाँति जानते हुए कि वे किसकी हैं।\"\n\nकृष्णभावनाभावित भक्त भली-भाँति जानते हैं कि यह भौतिक जगत् भगवान् की पूर्ण व्यवस्था द्वारा समस्त जीवों की जीवन की समस्त आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रचा गया है, बिना उनके एक-दूसरे के जीवन अथवा अधिकारों का अतिक्रमण किए। यह पूर्ण व्यवस्था प्रत्येक को उसकी वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार धन का उचित कोटा प्रदान करती है, और इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति सादा जीवन तथा उच्च विचार के सिद्धान्त के अनुसार शान्तिपूर्वक रह सकता है। दुर्भाग्य से, भौतिकतावादी जिन्हें न तो ईश्वर की योजना में श्रद्धा है और न ही उच्चतर आध्यात्मिक विकास की कोई अभिलाषा है, अपनी ईश्वर-प्रदत्त बुद्धि का दुरुपयोग केवल अपनी भौतिक सम्पत्ति बढ़ाने में करते हैं। वे अपनी भौतिक स्थिति को उन्नत करने हेतु अनेक प्रणालियाँ—जैसे पूँजीवाद तथा भौतिकतावादी साम्यवाद—गढ़ते हैं। उन्हें ईश्वर के नियमों अथवा किसी उच्चतर लक्ष्य में कोई रुचि नहीं होती। इन्द्रियतृप्ति के लिए अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने हेतु सदा व्यग्र रहते हुए, वे अपने सहजीवों का शोषण करने की अपनी क्षमता से सुस्पष्ट हो जाते हैं।\n\nजब मानव-समाज श्रील रूप गोस्वामी द्वारा गिनाए गए इन प्राथमिक दोषों (अत्याहार इत्यादि) का परित्याग कर देगा, तब मनुष्यों तथा पशुओं, पूँजीवादियों तथा साम्यवादियों, इत्यादि के बीच समस्त शत्रुता समाप्त हो जाएगी। इसके अतिरिक्त, आर्थिक अथवा राजनैतिक असन्तुलन तथा अस्थिरता की समस्त समस्याएँ हल हो जाएँगी। यह शुद्ध चेतना कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा वैज्ञानिक रूप से प्रदान की गई उचित आध्यात्मिक शिक्षा तथा साधना से जागृत होती है।\n\nयह कृष्णभावनामृत आन्दोलन एक ऐसा आध्यात्मिक समुदाय प्रदान करता है जो विश्व में शान्तिपूर्ण स्थिति ला सकता है। प्रत्येक बुद्धिमान मनुष्य को इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन की पूर्ण हृदय से शरण लेकर अपनी चेतना को शुद्ध करना चाहिए और स्वयं को भक्ति की उपर्युक्त छह बाधाओं से मुक्त करना चाहिए।"}
{"ref": "noi/3", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/3/", "verse_text": "", "devanagari": "> उत्साहान्निश्चयाद्ढैर्यात्तत्तत्कर्मप्रवर्तनात् ।\n> सङ्गत्यगात् सतो वृत्तेः षड्भिर्भक्तिः प्रसिध्यति ॥३॥", "synonyms": "*उत्साहात्*—उत्साह से; *निश्चयात्*—विश्वास से; *धैर्यात्*—धैर्य से; *तत्-तत्-कर्म*—भक्ति के अनुकूल विविध कार्य; *प्रवर्तनात्*—सम्पन्न करने से; *सङ्ग-त्यागात्*—अभक्तों की संगति त्यागने से; *सतः*—पूर्ववर्ती महान् आचार्यों के; *वृत्तेः*—पदचिह्नों का अनुसरण करने से; *षड्भिः*—इन छह से; *भक्तिः*—भक्ति; *प्रसिध्यति*—उन्नत होती है अथवा सफल होती है।", "translation": "**शुद्ध भक्ति के सम्पादन हेतु छह सिद्धान्त अनुकूल हैं: (1) उत्साही होना, (2) विश्वासपूर्वक प्रयत्न करना, (3) धैर्यवान् होना, (4) विधि-विधानों के अनुसार आचरण करना [जैसे श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणम् [भा. 7.5.23]—श्रीकृष्ण का श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण], (5) अभक्तों की संगति त्यागना, तथा (6) पूर्ववर्ती आचार्यों के पदचिह्नों का अनुसरण करना। ये छह सिद्धान्त निःसन्देह शुद्ध भक्ति की पूर्ण सफलता सुनिश्चित करते हैं।**", "purport": "भक्ति भावुकतापूर्ण कल्पना अथवा कल्पित आनन्द का विषय नहीं है। इसका सार व्यावहारिक क्रियाकलाप है। श्रील रूप गोस्वामी ने अपने भक्ति-रसामृत-सिन्धु (1.1.11) में भक्ति को इस प्रकार परिभाषित किया है:\n\nanyābhilāṣitā-śūnyaṁ\n\n*jñāna*-karmādy-anāvṛtam\n\nānukūlyena kṛṣṇānu-\n\nśīlanaṁ bhaktir uttamā\n\n[Madhya 19.167]\n\n\"उत्तमा भक्ति, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति, में इस प्रकार भक्ति का सम्पादन निहित है जो भगवान् के अनुकूल हो। यह भक्ति किसी बाह्य प्रयोजन से रहित होनी चाहिए तथा सकाम कर्म, निर्विशेष ज्ञान एवं अन्य समस्त स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से विहीन होनी चाहिए।\"\n\nभक्ति एक प्रकार का अनुशीलन है। ज्यों ही हम \"अनुशीलन\" कहते हैं, हमें क्रिया की ओर संकेत करना ही पड़ता है। आध्यात्मिकता के अनुशीलन का अर्थ ध्यान हेतु निष्क्रिय बैठ जाना नहीं है, जैसा कुछ छद्म-योगी सिखाते हैं। ऐसा निष्क्रिय ध्यान उनके लिए उत्तम हो सकता है जिन्हें भक्ति का कोई ज्ञान नहीं है, और इसी कारण कभी-कभी इसकी अनुशंसा चित्त-विक्षेपकारी भौतिक क्रियाओं को रोकने के उपाय के रूप में की जाती है। ध्यान का अर्थ है समस्त निरर्थक क्रियाओं को रोक देना, कम-से-कम कुछ काल के लिए। किन्तु भक्ति न केवल समस्त निरर्थक सांसारिक क्रियाओं का अन्त कर देती है, अपितु मनुष्य को सार्थक भक्तिमय क्रियाओं में संलग्न भी करती है। श्री प्रह्लाद महाराज अनुशंसा करते हैं:\n\nśravaṇaṁ kīrtanaṁ viṣṇoḥ\n\n*smaraṇaṁ pāda*-sevanam\n\narcanaṁ vandanaṁ dāsyaṁ\n\n*sakhyam ātma*-nivedanam\n\n[SB 7.5.23]\n\nभक्ति की नौ विधियाँ इस प्रकार हैं:\n\n1. पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नाम एवं महिमा का श्रवण\n\n2. उनकी महिमा का कीर्तन\n\n3. भगवान् का स्मरण\n\n4. भगवान् के चरणों की सेवा\n\n5. अर्चाविग्रह की पूजा\n\n6. भगवान् को नमस्कार अर्पित करना\n\n7. भगवान् के दास के रूप में आचरण\n\n8. भगवान् से मित्रता करना\n\n9. भगवान् को पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण\n\nश्रवणम्, अर्थात् सुनना, दिव्य ज्ञान प्राप्त करने का प्रथम सोपान है। मनुष्य को अनधिकृत व्यक्तियों को कर्ण-ग्रहण नहीं देना चाहिए, अपितु उपयुक्त व्यक्ति के समीप जाना चाहिए, जैसा कि भगवद्गीता (4.34) में अनुशंसित है:\n\ntad viddhi praṇipātena\n\nparipraśnena sevayā\n\nupadekṣyanti te jñānaṁ\n\n*jñāninas tattva*-darśinaḥ\n\n\"सत्य को जानने का प्रयत्न आध्यात्मिक गुरु के समीप जाकर करो। उनसे विनम्रतापूर्वक प्रश्न करो तथा उनकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकती है, क्योंकि उसने सत्य का दर्शन किया है।\"\n\nमुण्डक उपनिषद् में आगे अनुशंसा की गई है, तद्-विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छेत्: [MU 1.2.12] \"उस दिव्य विज्ञान को समझने हेतु मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना चाहिए।\" अतः दिव्य गोपनीय ज्ञान को विनम्रतापूर्वक ग्रहण करने की यह विधि केवल मानसिक कल्पना पर आधारित नहीं है। इस सन्दर्भ में श्री चैतन्य महाप्रभु ने रूप गोस्वामी से कहा:\n\nbrahmāṇḍa bhramite kona bhāgyavān jīva\n\n*guru*-kṛṣṇa-prasāde pāya bhakti-latā-bīja\n\n\"ब्रह्मा की इस विश्व-सृष्टि में भ्रमण करते हुए, कोई भाग्यवान् जीव भक्ति-लता का बीज, अर्थात् भक्ति-रूपी लता का बीज, प्राप्त कर सकता है। यह सब गुरु तथा श्रीकृष्ण की कृपा से होता है।\" (चैतन्य-चरितामृत, मध्य 19.151) भौतिक जगत् उन जीवों के लिए बन्धन का स्थान है जो स्वभाव से आनन्दमय, अर्थात् सुख-अभिलाषी हैं। वे वास्तव में सापेक्ष सुख के इस जगत् के बन्धन से मुक्त होना चाहते हैं, किन्तु मुक्ति की विधि न जानने के कारण वे एक योनि से दूसरी योनि में तथा एक लोक से दूसरे लोक में देहान्तरण करने को बाध्य रहते हैं। इस प्रकार जीव सम्पूर्ण भौतिक ब्रह्माण्ड में भटकते रहते हैं। जब सौभाग्यवश कोई शुद्ध भक्त के सम्पर्क में आता है और धैर्यपूर्वक उनसे श्रवण करता है, तब वह भक्ति-मार्ग का अनुसरण आरम्भ कर देता है। ऐसा अवसर उस व्यक्ति को प्राप्त होता है जो निष्ठावान् है। अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ समस्त मानवता को ऐसा ही अवसर प्रदान कर रहा है। यदि सौभाग्यवश कोई इस अवसर का लाभ उठाकर भक्ति में संलग्न होता है, तो मुक्ति का मार्ग तत्काल खुल जाता है।\n\nमनुष्य को घर लौटने, भगवद्धाम लौटने के इस अवसर को अत्यन्त उत्साहपूर्वक स्वीकार करना चाहिए। उत्साह के बिना मनुष्य सफल नहीं हो सकता। भौतिक जगत् में भी मनुष्य को सफल होने हेतु अपने विशिष्ट कर्मक्षेत्र में अत्यन्त उत्साही होना पड़ता है। जो विद्यार्थी, व्यवसायी, कलाकार अथवा अन्य कोई अपने क्षेत्र में सफलता चाहता है, उसे उत्साही होना ही चाहिए। इसी प्रकार मनुष्य को भक्ति में भी अत्यन्त उत्साही होना चाहिए। उत्साह का अर्थ है क्रिया, किन्तु किसके लिए क्रिया? उत्तर यह है कि मनुष्य को सदैव श्रीकृष्ण के लिए क्रिया करनी चाहिए—कृष्णार्थाखिल-चेष्टा (भक्ति-रसामृत-सिन्धु)।\n\nजीवन की समस्त अवस्थाओं में मनुष्य को भक्तियोग में पूर्णता प्राप्त करने हेतु आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में भक्तिमय कार्य सम्पन्न करने पड़ते हैं। ऐसा नहीं है कि मनुष्य को अपने कार्यों को सीमित अथवा संकुचित करना पड़े। श्रीकृष्ण सर्वव्यापी हैं। अतः कुछ भी श्रीकृष्ण से स्वतन्त्र नहीं है, जैसा कि स्वयं श्रीकृष्ण भगवद्गीता (9.4) में कहते हैं:\n\nmayā tatam idaṁ sarvaṁ\n\n*jagad avyakta*-mūrtinā-\n\n*mat*-sthāni sarva-bhūtāni\n\nna cāhaṁ teṣv avasthitaḥ\n\n\"मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में, यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है। समस्त प्राणी मुझमें स्थित हैं, किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।\" प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में मनुष्य को प्रत्येक वस्तु को श्रीकृष्ण की सेवा के अनुकूल बनाना पड़ता है। उदाहरणार्थ, इस समय हम एक डिक्टाफोन का प्रयोग कर रहे हैं। जिस भौतिकतावादी ने इस यन्त्र का आविष्कार किया, उसका अभिप्राय इसे व्यवसायियों अथवा सांसारिक विषयों के लेखकों के लिए बनाना था। उसने निश्चय ही कभी इस डिक्टाफोन को भगवान् की सेवा में प्रयोग करने का विचार नहीं किया था, किन्तु हम इस डिक्टाफोन का प्रयोग कृष्णभावनामय साहित्य लिखने में कर रहे हैं। निस्सन्देह, डिक्टाफोन का निर्माण पूर्णतः श्रीकृष्ण की ऊर्जा के अन्तर्गत ही है। उस यन्त्र के समस्त अंग, इलेक्ट्रॉनिक क्रियाओं सहित, पाँच मूलभूत प्रकार की भौतिक ऊर्जा—अर्थात् भूमि, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश—के विविध संयोगों एवं अन्तःक्रियाओं से बने हैं। आविष्कारक ने इस जटिल यन्त्र को बनाने हेतु अपनी बुद्धि का प्रयोग किया, और उसकी बुद्धि तथा साथ ही सामग्री श्रीकृष्ण द्वारा प्रदान की गई थी। श्रीकृष्ण के कथन के अनुसार, मत्-स्थानि सर्व-भूतानि: \"प्रत्येक वस्तु मेरी ऊर्जा पर आश्रित है।\" अतः भक्त यह समझ सकता है कि चूँकि कुछ भी श्रीकृष्ण की ऊर्जा से स्वतन्त्र नहीं है, इसलिए प्रत्येक वस्तु उनकी सेवा में नियोजित होनी चाहिए।\n\nकृष्णभावनामृत में बुद्धिपूर्वक किया गया प्रयत्न उत्साह, अर्थात् उत्साह कहलाता है। भक्तजन वह सही उपाय ढूँढ़ निकालते हैं जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु भगवान् की सेवा में प्रयुक्त की जा सके (निर्बन्धः कृष्ण-सम्बन्धे युक्तं वैराग्यम् उच्यते)। भक्ति का सम्पादन निष्क्रिय ध्यान का विषय नहीं, अपितु आध्यात्मिक जीवन की अग्रभूमि में व्यावहारिक क्रिया है।\n\nये क्रियाएँ धैर्यपूर्वक सम्पन्न की जानी चाहिए। मनुष्य को कृष्णभावनामृत में अधीर नहीं होना चाहिए। वस्तुतः इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का आरम्भ अकेले हाथों से हुआ, और आरम्भ में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, किन्तु चूँकि हम धैर्यपूर्वक अपने भक्तिमय कार्य सम्पन्न करते रहे, इसलिए लोग धीरे-धीरे इस आन्दोलन के महत्त्व को समझने लगे, और अब वे उत्सुकता से इसमें सम्मिलित हो रहे हैं। मनुष्य को भक्ति-सम्पादन में अधीर नहीं होना चाहिए, अपितु आध्यात्मिक गुरु से निर्देश ग्रहण करके, गुरु एवं श्रीकृष्ण की कृपा पर निर्भर रहते हुए, उन्हें धैर्यपूर्वक सम्पन्न करना चाहिए। कृष्णभावनामय कार्यों के सफल सम्पादन हेतु धैर्य तथा विश्वास, दोनों आवश्यक हैं। एक नवविवाहिता कन्या स्वाभाविक रूप से अपने पति से सन्तान की आशा करती है, किन्तु वह विवाह के तुरन्त पश्चात् उन्हें पाने की आशा नहीं कर सकती। निस्सन्देह, विवाहित होते ही वह सन्तान पाने का प्रयत्न कर सकती है, किन्तु उसे अपने पति के प्रति समर्पित होना पड़ता है, इस विश्वास के साथ कि उसकी सन्तान यथासमय विकसित होगी तथा जन्म लेगी। इसी प्रकार, भक्ति में समर्पण का अर्थ है कि मनुष्य को विश्वासी बनना पड़ता है। भक्त सोचता है, अवश्य रक्षिबे कृष्ण: \"श्रीकृष्ण निश्चय ही मेरी रक्षा करेंगे तथा भक्ति के सफल सम्पादन हेतु मुझे सहायता प्रदान करेंगे।\" यही विश्वास कहलाता है।\n\nजैसा पहले समझाया जा चुका है, मनुष्य को निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए, अपितु विधि-विधानों के सम्पादन में अत्यन्त उत्साही होना चाहिए—तत्-तत्-कर्म-प्रवर्तन। विधि-विधानों की उपेक्षा भक्ति को नष्ट कर देगी। इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में चार मूलभूत विधि-विधान हैं, जो अवैध मैथुन, मांस-भक्षण, द्यूतक्रीड़ा तथा नशे का निषेध करते हैं। भक्त को इन सिद्धान्तों के पालन में अत्यन्त उत्साही होना चाहिए। यदि वह इनमें से किसी के पालन में शिथिल हो जाता है, तो उसकी प्रगति निश्चय ही रुक जाएगी। अतः श्रील रूप गोस्वामी अनुशंसा करते हैं, तत्-तत्-कर्म-प्रवर्तनात्: \"मनुष्य को वैधी भक्ति के विधि-विधानों का कठोरता से पालन करना चाहिए।\" इन चार निषेधों (यम) के अतिरिक्त, सकारात्मक विधि-विधान (नियम) भी हैं, जैसे जप-माला पर प्रतिदिन सोलह माला का जप। ये विधि-कर्म उत्साहपूर्वक तथा श्रद्धापूर्वक सम्पन्न किए जाने चाहिए। यही तत्-तत्-कर्म-प्रवर्तन, अर्थात् भक्ति में विविध प्रवृत्ति कहलाता है।\n\nइसके अतिरिक्त, भक्ति में सफल होने हेतु मनुष्य को अवांछित लोगों की संगति त्यागनी पड़ती है। इसमें कर्मी, ज्ञानी, योगी तथा अन्य अभक्त सम्मिलित हैं। एक बार श्री चैतन्य महाप्रभु से उनके एक गृहस्थ भक्त ने वैष्णव-धर्म के सामान्य सिद्धान्तों के विषय में तथा वैष्णव के सामान्य नित्य-कर्मों के विषय में पूछा, और श्री चैतन्य महाप्रभु ने तत्काल उत्तर दिया, असत्-सङ्ग-त्याग,—एइ वैष्णव-आचार: \"वैष्णव की विशेषता यह है कि वह सांसारिक लोगों, अर्थात् अभक्तों, की संगति त्याग देता है।\" अतः श्रील नरोत्तम दास ठाकुर ने अनुशंसा की है, ताँदेर चरण सेवि भक्त-सने वास: मनुष्य को शुद्ध भक्तों की संगति में रहना पड़ता है तथा पूर्ववर्ती आचार्यों, छह गोस्वामियों (अर्थात् श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी तथा श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी) द्वारा निर्धारित विधि-विधानों का पालन करना पड़ता है। यदि मनुष्य भक्तों की संगति में रहता है, तो अभक्तों के साथ संगति की सम्भावना अल्प रहती है। अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ केवल इसी हेतु अनेक केन्द्र खोल रहा है कि लोगों को भक्तों की संगति में रहने तथा आध्यात्मिक जीवन के विधि-विधानों का अभ्यास करने के लिए आमन्त्रित किया जा सके।\n\nभक्ति का अर्थ है दिव्य क्रियाएँ। दिव्य स्तर पर प्रकृति के तीन गुणों का कोई कल्मष नहीं होता। यही विशुद्ध-सत्त्व, अर्थात् शुद्ध सत्त्व का स्तर, अथवा रजोगुण एवं तमोगुण के कल्मष से रहित सत्त्व कहलाता है। इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में हम सभी से अपेक्षा करते हैं कि वे प्रातःकाल शीघ्र, चार बजे तक, उठें तथा मंगल-आरती, अर्थात् प्रातःकालीन पूजा में सम्मिलित हों, तत्पश्चात् श्रीमद्भागवत का पाठ करें, कीर्तन करें, इत्यादि। इस प्रकार हम चौबीस घंटे निरन्तर भक्तिमय क्रियाएँ करते रहते हैं। यही सतो वृत्ति, अर्थात् उन पूर्ववर्ती आचार्यों के पदचिह्नों का अनुसरण कहलाता है जिन्होंने समय के प्रत्येक क्षण को कुशलतापूर्वक कृष्णभावनामय कार्यों से भर दिया।\n\nयदि मनुष्य श्रील रूप गोस्वामी द्वारा इस श्लोक में दी गई सलाह का कठोरता से पालन करता है—अर्थात् उत्साही होना, विश्वासी होना, धैर्यवान् होना, अवांछित व्यक्तियों की संगति त्यागना, विधि-विधानों का पालन करना तथा भक्तों की संगति में बने रहना—तो वह निश्चय ही भक्ति में उन्नति करेगा। इस सन्दर्भ में श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि दार्शनिक कल्पना द्वारा ज्ञान का अनुशीलन, सकाम कर्म की उन्नति द्वारा सांसारिक ऐश्वर्य का संचय, तथा योग-सिद्धियों, अर्थात् भौतिक सिद्धियों की कामना—ये सब भक्ति के सिद्धान्तों के विपरीत हैं। मनुष्य को ऐसी अनित्य क्रियाओं के प्रति पूर्णतः उदासीन बन जाना चाहिए तथा अपना ध्यान इसके स्थान पर भक्ति के विधि-विधानों की ओर मोड़ना चाहिए। भगवद्गीता (2.69) के अनुसार:\n\n*yā niśā sarva*-bhūtānāṁ\n\ntasyāṁ jāgarti saṁyamī\n\nyasyāṁ jāgrati bhūtāni\n\nsā niśā paśyato muneḥ\n\n\"जो समस्त प्राणियों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के लिए जागरण का समय है; और जो समस्त प्राणियों के लिए जागरण का समय है, वह अन्तर्मुखी मुनि के लिए रात्रि है।\"\n\nभगवान् की भक्ति में संलग्नता ही जीव का प्राण एवं आत्मा है। यही मानव-जीवन का अभीष्ट लक्ष्य तथा परम पूर्णता है। मनुष्य को इस विषय में विश्वासी बनना पड़ता है, और साथ ही यह भी विश्वास रखना पड़ता है कि भक्ति के अतिरिक्त समस्त क्रियाएँ—जैसे मानसिक कल्पना, सकाम कर्म अथवा योग-प्रयत्न—कभी कोई स्थायी लाभ नहीं देंगी। भक्ति-मार्ग में पूर्ण विश्वास मनुष्य को उसके अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में समर्थ बनाएगा, किन्तु अन्य मार्गों का अनुसरण करने का प्रयत्न केवल मनुष्य को अशान्त बनाने में ही सफल होगा। श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में कहा गया है: \"मनुष्य को शान्तभाव से इस बात का विश्वास रखना चाहिए कि जिन्होंने अन्य प्रयोजनों हेतु कठोर तपस्या में संलग्न होने के लिए भक्ति त्याग दी है, वे अपनी उन्नत तपस्या के बावजूद मन से शुद्ध नहीं होते, क्योंकि उन्हें भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा का कोई ज्ञान नहीं है।\"\n\nसप्तम स्कन्ध में आगे कहा गया है: \"यद्यपि मनोधर्मी तथा सकाम कर्मी महान् तपस्या तथा तप कर सकते हैं, फिर भी वे पतित हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें भगवान् के चरणकमलों का कोई ज्ञान नहीं है।\" किन्तु भगवान् के भक्त कभी पतित नहीं होते। भगवद्गीता (9.31) में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अर्जुन को आश्वासन देते हैं, कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति: \"हे कुन्तीपुत्र! साहसपूर्वक घोषित कर दो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।\"\n\nपुनः भगवद्गीता (2.40) में श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\n*nehābhikrama*-nāśo 'sti\n\npratyavāyo na vidyate\n\nsvalpam apy asya dharmasya\n\ntrāyate mahato bhayāt\n\n\"इस प्रयत्न में न कोई हानि है, न कोई ह्रास, और इस मार्ग पर थोड़ी-सी भी प्रगति मनुष्य को अत्यन्त भयानक प्रकार के भय से रक्षा कर सकती है।\"\n\nभक्ति इतनी शुद्ध एवं पूर्ण है कि एक बार आरम्भ करने पर मनुष्य बलपूर्वक परम सफलता की ओर खिंचा चला जाता है। कभी-कभी कोई व्यक्ति अपने सामान्य भौतिक कार्यों को त्यागकर भावनावश परमेश्वर के चरणकमलों की शरण लेता है और इस प्रकार भक्ति का प्रारम्भिक सम्पादन आरम्भ कर देता है। यदि ऐसा अपरिपक्व भक्त पतित भी हो जाए, तो उसकी कोई हानि नहीं होती। दूसरी ओर, उस व्यक्ति को क्या लाभ है जो अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार विहित कर्तव्यों का पालन तो करता है, किन्तु भक्ति ग्रहण नहीं करता? यद्यपि पतित भक्त अपना अगला जन्म निम्न कुल में ले सकता है, तथापि उसकी भक्ति वहीं से पुनः आरम्भ होगी जहाँ वह छूटी थी। भक्ति अहैतुक्यप्रतिहता है; यह किसी सांसारिक कारण का परिणाम नहीं है, न ही इसे किसी सांसारिक कारण से समाप्त किया जा सकता है अथवा किसी भौतिक व्यवधान से स्थायी रूप से कुंठित किया जा सकता है। अतः भक्त को अपनी प्रवृत्ति के विषय में विश्वासी होना चाहिए तथा कर्मियों, ज्ञानियों एवं योगियों के कार्यों में अत्यधिक रुचि नहीं लेनी चाहिए।\n\nसकाम कर्मियों, दार्शनिक कल्पनावादियों तथा योगियों में निश्चय ही अनेक सद्गुण होते हैं, किन्तु समस्त सद्गुण भक्त के चरित्र में स्वतः विकसित हो जाते हैं। किसी बाह्य प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती। जैसा कि श्रीमद्भागवत (5.18.12) में पुष्टि की गई है, देवताओं के समस्त सद्गुण उस व्यक्ति में क्रमशः प्रकट होते हैं जिसने शुद्ध भक्ति का विकास किया है। चूँकि भक्त किसी भौतिक क्रिया में रुचि नहीं रखता, इसलिए वह भौतिक रूप से कल्मषित नहीं होता। वह तत्काल दिव्य जीवन के स्तर पर स्थित हो जाता है। किन्तु जो सांसारिक क्रिया में संलग्न होता है—चाहे वह तथाकथित ज्ञानी, योगी, कर्मी, लोकोपकारी, राष्ट्रवादी अथवा कुछ भी हो—वह महात्मा के उच्चतर स्तर को प्राप्त नहीं कर सकता। वह दुरात्मा, अर्थात् पंगु-बुद्धि वाला व्यक्ति बना रहता है। भगवद्गीता (9.13) के अनुसार:\n\nmahātmānas tu māṁ pārtha\n\ndaivīṁ prakṛtim āśritāḥ\n\n*bhajanty ananya*-manaso\n\njñātvā bhūtādim avyayam\n\n\"हे पृथापुत्र! जो मोहित नहीं हैं, वे महान् आत्माएँ दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहती हैं। वे पूर्ण रूप से भक्ति में संलग्न रहती हैं, क्योंकि वे मुझे आदि एवं अक्षय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में जानती हैं।\"\n\nचूँकि भगवान् के समस्त भक्त उनकी परा शक्ति के संरक्षण में रहते हैं, इसलिए उन्हें भक्ति-मार्ग से विचलित होकर कर्मी, ज्ञानी अथवा योगी का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। यही उत्साहान् निश्चयाद् धैर्यात् तत्-तत्-कर्म-प्रवर्तनात् कहलाता है, अर्थात् धैर्य एवं विश्वास के साथ उत्साहपूर्वक भक्ति के विधि-कर्मों का सम्पादन। इस प्रकार मनुष्य बिना किसी बाधा के भक्ति में उन्नति कर सकता है।"}
{"ref": "noi/4", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/4/", "verse_text": "", "devanagari": "> ददाति प्रतिगृह्णाति गृह्यामाख्याति पृच्छति ।\n> भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥४॥", "synonyms": "*ददाति*—दान देता है; *प्रतिगृह्णाति*—बदले में स्वीकार करता है; *गुह्यम्*—गोपनीय विषय; *आख्याति*—बतलाता है; *पृच्छति*—पूछता है; *भुङ्क्ते*—खाता है; *भोजयते*—भोजन कराता है; *च*—भी; *एव*—निश्चय ही; *षट्-विधम्*—छह प्रकार के; *प्रीति*—प्रेम के; *लक्षणम्*—लक्षण।", "translation": "**दान में उपहार अर्पित करना, दानस्वरूप उपहार स्वीकार करना, विश्वासपूर्वक अपना मन प्रकट करना, गोपनीय रूप से प्रश्न करना, प्रसाद ग्रहण करना तथा प्रसाद अर्पित करना—ये छह एक भक्त तथा दूसरे भक्त के बीच परस्पर प्रेम के लक्षण हैं।**", "purport": "इस श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी समझाते हैं कि अन्य भक्तों की संगति में भक्तिमय कार्य किस प्रकार सम्पन्न करें। छह प्रकार की क्रियाएँ हैं: (1) भक्तों को दान देना, (2) भक्त बदले में जो भी अर्पित करें उसे स्वीकार करना, (3) भक्तों के समक्ष अपना मन खोलना, (4) उनसे भगवान् की गोपनीय सेवा के विषय में प्रश्न करना, (5) भक्तों द्वारा दिए गए प्रसाद, अर्थात् आध्यात्मिक भोजन का आदर करना, तथा (6) भक्तों को प्रसाद खिलाना। एक अनुभवी भक्त समझाता है, और एक अनुभवहीन भक्त उससे सीखता है। यही गुह्यम् आख्याति पृच्छति है। जब कोई भक्त प्रसाद, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित भोजन के अवशेष वितरित करता है, तब अपनी भक्ति की भावना बनाए रखने हेतु हमें इस प्रसाद को शुद्ध भक्तों के माध्यम से प्राप्त भगवान् की कृपा के रूप में स्वीकार करना चाहिए। हमें शुद्ध भक्तों को अपने घर भी आमन्त्रित करना चाहिए, उन्हें प्रसाद अर्पित करना चाहिए तथा सब प्रकार से उन्हें प्रसन्न करने को तत्पर रहना चाहिए। यही भुङ्क्ते भोजयते चैव कहलाता है।\n\nसामान्य सामाजिक क्रियाओं में भी दो प्रेमी मित्रों के बीच इन छह प्रकार के व्यवहारों की नितान्त आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ, जब एक व्यवसायी दूसरे व्यवसायी से सम्पर्क करना चाहता है, तब वह किसी होटल में भोज की व्यवस्था करता है, और भोज के दौरान खुलकर बताता है कि वह क्या करना चाहता है। तत्पश्चात् वह अपने व्यापारी मित्र से पूछता है कि उसे किस प्रकार आचरण करना चाहिए, और कभी-कभी उपहारों का आदान-प्रदान होता है। इस प्रकार जब भी प्रीति, अर्थात् घनिष्ठ व्यवहारों में प्रेम का कोई आदान-प्रदान होता है, तब ये छह क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। पूर्ववर्ती श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी ने सलाह दी थी कि मनुष्य को सांसारिक संगति का त्याग करके भक्तों की संगति करनी चाहिए (सङ्ग-त्यागात् सतो वृत्तेः)। अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ की स्थापना भक्तों के बीच इन छह प्रकार के प्रेममय आदान-प्रदानों को सुगम बनाने हेतु की गई है। इस संघ का आरम्भ अकेले हाथों से हुआ, किन्तु चूँकि लोग आगे आकर लेन-देन की नीति से व्यवहार कर रहे हैं, इसलिए यह संघ अब सम्पूर्ण विश्व में विस्तार पा रहा है। हमें प्रसन्नता है कि लोग संघ की क्रियाओं के विकास हेतु अत्यन्त उदारतापूर्वक दान दे रहे हैं, और लोग उस विनम्र योगदान को भी उत्सुकता से स्वीकार कर रहे हैं जो हम उन्हें पुस्तकों एवं पत्रिकाओं के रूप में दे रहे हैं, जो कठोरता से केवल कृष्णभावनामृत के विषय से सम्बन्ध रखती हैं। हम कभी-कभी हरे कृष्ण उत्सव आयोजित करते हैं और आजीवन सदस्यों एवं मित्रों को प्रसाद ग्रहण करके भोज में सम्मिलित होने हेतु आमन्त्रित करते हैं। यद्यपि हमारे अधिकांश सदस्य समाज के उच्च वर्गों से आते हैं, फिर भी वे आते हैं और जो थोड़ा-सा प्रसाद हम उन्हें अर्पित कर पाते हैं, उसे ग्रहण करते हैं। कभी-कभी सदस्य एवं समर्थक भक्ति के सम्पादन की विधियों के विषय में अत्यन्त गोपनीय रूप से प्रश्न करते हैं, और हम इसे समझाने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार हमारा संघ सम्पूर्ण विश्व में सफलतापूर्वक फैल रहा है, और समस्त देशों का बुद्धिजीवी वर्ग धीरे-धीरे हमारी कृष्णभावनामय क्रियाओं की सराहना कर रहा है। कृष्णभावनामय समाज का जीवन सदस्यों के बीच इन छह प्रकार के प्रेममय आदान-प्रदानों से पोषित होता है; अतः लोगों को इस्कॉन के भक्तों के साथ संगति का अवसर अवश्य दिया जाना चाहिए, क्योंकि ऊपर वर्णित छह विधियों में प्रत्युत्तर देने मात्र से एक सामान्य मनुष्य अपनी सुप्त कृष्णभावना को पूर्णतः पुनर्जीवित कर सकता है। भगवद्गीता (2.62) में कहा गया है, सङ्गात् सञ्जायते कामः: मनुष्य की इच्छाएँ एवं आकांक्षाएँ उसकी संगति के अनुसार विकसित होती हैं। प्रायः कहा जाता है कि मनुष्य अपनी संगति से पहचाना जाता है, और यदि कोई सामान्य मनुष्य भक्तों की संगति करता है, तो वह निश्चय ही अपनी सुप्त कृष्णभावना का विकास करेगा। कृष्णभावना का बोध प्रत्येक जीव में सहज रूप से विद्यमान है, और जब जीव मानव-शरीर धारण करता है, तब यह कुछ सीमा तक पहले से ही विकसित हो जाता है। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.107) में कहा गया है:\n\n*nitya*-siddha kṛṣṇa-prema 'sādhya' kabhu naya\n\n*śravaṇādi-śuddha*-citte karaye udaya\n\n\"श्रीकृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम जीवों के हृदय में नित्य रूप से स्थापित है। यह किसी अन्य स्रोत से प्राप्त की जाने वाली वस्तु नहीं है। जब श्रवण एवं कीर्तन से हृदय शुद्ध होता है, तब जीव में यह स्वाभाविक रूप से जाग्रत हो जाता है।\" चूँकि कृष्णभावना प्रत्येक जीव में अन्तर्निहित है, इसलिए सभी को श्रीकृष्ण के विषय में सुनने का अवसर दिया जाना चाहिए। केवल श्रवण एवं कीर्तन से—श्रवणं कीर्तनम्—मनुष्य का हृदय प्रत्यक्ष रूप से शुद्ध हो जाता है, और उसकी मूल कृष्णभावना तत्काल जाग्रत हो जाती है। कृष्णभावना हृदय पर कृत्रिम रूप से आरोपित नहीं की जाती, वह पहले से ही वहाँ विद्यमान है। जब मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के पवित्र नाम का जप करता है, तब हृदय समस्त सांसारिक कल्मष से स्वच्छ हो जाता है। अपने श्री शिक्षाष्टक के प्रथम श्लोक में भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:\n\n*ceto*-darpaṇa-mārjanam bhava-mahā-dāvāgni-nirvāpaṇaṁ\n\n*śreyaḥ*-kairava-candrikā-vitaraṇaṁ vidyā-vadhū-jīvanam\n\n*ānandāmbudhi*-vardhanaṁ prati-padaṁ pūrṇāmṛtāsvādanaṁ\n\n*sarvātma*-snapanaṁ paraṁ vijayate śrī-kṛṣṇa-saṅkīrtanam\n\n[Cc. Antya 20.12]\n\n\"श्री कृष्ण संकीर्तन की सर्वथा जय हो, जो वर्षों से संचित समस्त धूल से हृदय को स्वच्छ करता है तथा सापेक्ष जीवन की, बारम्बार जन्म-मृत्यु की अग्नि को बुझा देता है। यह संकीर्तन आन्दोलन समस्त मानवता के लिए परम वरदान है, क्योंकि यह कल्याण-रूपी चन्द्रमा की किरणें फैलाता है। यह समस्त दिव्य ज्ञान का जीवन है। यह दिव्य आनन्द के सागर को बढ़ाता है, और यह हमें उस अमृत का पूर्ण आस्वादन कराने में समर्थ बनाता है जिसके लिए हम सदैव व्याकुल रहते हैं।\"\n\nन केवल महामन्त्र का जप करने वाला शुद्ध होता है, अपितु जो कोई हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के दिव्य ध्वनि-कम्पन को सुनता है, उसका हृदय भी स्वच्छ हो जाता है। निम्न पशुओं, कीटों, वृक्षों तथा जीवन की अन्य योनियों में देहधारी आत्माएँ भी इस दिव्य ध्वनि-कम्पन को सुनने मात्र से शुद्ध हो जाती हैं तथा पूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित होने के लिए तैयार हो जाती हैं। यह बात ठाकुर हरिदास ने तब समझाई थी जब चैतन्य महाप्रभु ने उनसे पूछा कि मनुष्यों से निम्न जीव किस प्रकार भौतिक बन्धन से मुक्त किए जा सकते हैं। हरिदास ठाकुर ने कहा कि पवित्र नामों का कीर्तन इतना शक्तिशाली है कि यदि कोई जंगल के अत्यन्त दूरस्थ भागों में भी जप करे, तो वृक्ष एवं पशु उस ध्वनि-कम्पन को सुनने मात्र से कृष्णभावना में उन्नति करेंगे। यह बात स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब वास्तव में सिद्ध की जब वे झारिखण्ड के वन से होकर गुजरे। उस समय बाघ, सर्प, हिरण तथा अन्य समस्त पशु अपनी स्वाभाविक शत्रुता त्यागकर संकीर्तन में कीर्तन एवं नृत्य करने लगे। निस्सन्देह, हम श्री चैतन्य महाप्रभु की क्रियाओं का अनुकरण नहीं कर सकते, किन्तु हमें उनके पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। हम बाघ, सर्प, बिल्ली एवं कुत्ते जैसे निम्न पशुओं को मोहित करने अथवा उन्हें नृत्य के लिए प्रेरित करने में इतने सामर्थ्यवान् नहीं हैं, किन्तु भगवान् के पवित्र नामों का कीर्तन करके हम वास्तव में सम्पूर्ण विश्व के अनेक लोगों को कृष्णभावना की ओर परिवर्तित कर सकते हैं। भगवान् के पवित्र नाम का योगदान अथवा वितरण योगदान अथवा दान देने का एक उदात्त उदाहरण है (ददाति सिद्धान्त)। इसी प्रकार, मनुष्य को प्रतिगृह्णाति सिद्धान्त का भी पालन करना चाहिए तथा दिव्य उपहार प्राप्त करने को इच्छुक एवं तत्पर रहना चाहिए। मनुष्य को कृष्णभावनामृत आन्दोलन के विषय में प्रश्न करना चाहिए तथा इस भौतिक जगत् की स्थिति को समझने के लिए अपना मन खोलना चाहिए। इस प्रकार गुह्यम् आख्याति पृच्छति सिद्धान्तों का पालन हो सकता है।\n\nअन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के सदस्य संघ के सदस्यों एवं समर्थकों को अपने साथ भोजन करने के लिए आमन्त्रित करते हैं, जब वे अपनी समस्त शाखाओं में प्रत्येक रविवार को प्रेम-भोज आयोजित करते हैं। अनेक रुचि रखने वाले लोग प्रसाद का आदर करने आते हैं, और जब भी सम्भव होता है, वे संघ के सदस्यों को अपने घर आमन्त्रित करते हैं तथा उन्हें प्रसाद से भरपूर भोजन कराते हैं। इस प्रकार संघ के सदस्यों तथा सामान्य जनता, दोनों को लाभ होता है। लोगों को तथाकथित योगियों, ज्ञानियों, कर्मियों एवं लोकोपकारियों की संगति त्याग देनी चाहिए, क्योंकि उनकी संगति किसी को लाभ नहीं पहुँचा सकती। यदि कोई वास्तव में मानव-जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे कृष्णभावनामृत आन्दोलन के भक्तों की संगति करनी चाहिए, क्योंकि यही एकमात्र ऐसा आन्दोलन है जो मनुष्य को ईश्वर-प्रेम का विकास करना सिखाता है। धर्म मानव-समाज का विशेष कार्य है, और यही मानव-समाज तथा पशु-समाज के बीच भेद का निर्धारण करता है। पशु-समाज में कोई गिरजाघर, मस्जिद अथवा धार्मिक व्यवस्था नहीं होती। किन्तु विश्व के समस्त भागों में, चाहे मानव-समाज कितना ही पददलित क्यों न हो, कोई-न-कोई धर्म-व्यवस्था अवश्य होती है। जंगलों में रहने वाले जनजातीय आदिवासियों में भी कोई-न-कोई धर्म-व्यवस्था होती है। जब कोई धर्म-व्यवस्था विकसित होकर ईश्वर-प्रेम में परिणत हो जाती है, तब वह सफल होती है। जैसा कि श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध (1.2.6) में कहा गया है:\n\nsa vai puṁsāṁ paro dharmo\n\nyato bhaktir adhokṣaje\n\nahaituky apratihatā\n\nyayātmā suprasīdati\n\n\"समस्त मानवता के लिए परम धर्म वह है जिसके द्वारा मनुष्य दिव्य भगवान् की प्रेममयी भक्ति को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी भक्ति आत्मा को पूर्णतः सन्तुष्ट करने हेतु निष्काम एवं अबाधित होनी चाहिए।\"\n\nयदि मानव-समाज के सदस्य वास्तव में मन की शान्ति, स्थिरता तथा मनुष्यों एवं राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध चाहते हैं, तो उन्हें धर्म की कृष्णभावनामय व्यवस्था का अनुसरण करना चाहिए, जिसके द्वारा वे श्रीकृष्ण, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अपने सुप्त प्रेम का विकास कर सकते हैं। ज्यों ही लोग ऐसा करते हैं, उनके मन तत्काल शान्ति एवं स्थिरता से भर जाएँगे।\n\nइस सन्दर्भ में, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर कृष्णभावनामृत आन्दोलन के प्रसार में संलग्न समस्त भक्तों को चेतावनी देते हैं कि वे निर्विशेषवादी मायावादियों से बात न करें, जो ऐसे आस्तिक आन्दोलनों का विरोध करने हेतु सदैव कृतसंकल्प रहते हैं। संसार मायावादियों एवं नास्तिकों से भरा है, और विश्व के राजनीतिक दल भौतिकवाद को बढ़ावा देने हेतु मायावाद तथा अन्य नास्तिक दर्शनों का लाभ उठाते हैं। कभी-कभी वे कृष्णभावनामृत आन्दोलन का विरोध करने हेतु किसी सशक्त दल का समर्थन तक करते हैं। मायावादी एवं अन्य नास्तिक नहीं चाहते कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन विकसित हो, क्योंकि यह लोगों को ईश्वर-भावना में शिक्षित करता है। नास्तिकों की यही नीति है। सर्प को दूध तथा केले खिलाने में कोई लाभ नहीं, क्योंकि सर्प कभी सन्तुष्ट नहीं होगा। इसके विपरीत, दूध तथा केले पाकर सर्प और भी अधिक विषैला बन जाता है (केवलं विष-वर्धनम्)। यदि सर्प को पीने के लिए दूध दिया जाए, तो उसका विष केवल बढ़ता ही है। इसी प्रकार के कारण से, हमें मायावादियों एवं कर्मियों रूपी सर्पों के समक्ष अपना मन प्रकट नहीं करना चाहिए। ऐसे प्रकटीकरण कभी सहायक नहीं होंगे। सर्वोत्तम यही है कि उनकी संगति से पूर्णतः बचा जाए तथा उनसे कभी कुछ गोपनीय न पूछा जाए, क्योंकि वे अच्छी सलाह नहीं दे सकते। न तो हमें मायावादियों एवं नास्तिकों को निमन्त्रण देना चाहिए, न उनके निमन्त्रण स्वीकार करने चाहिए, क्योंकि ऐसे घनिष्ठ मेल-मिलाप से हम उनकी नास्तिक मनोवृत्ति से प्रभावित हो सकते हैं (सङ्गात् सञ्जायते कामः)। इस श्लोक का निषेधात्मक आदेश यह है कि हमें मायावादियों एवं नास्तिकों को कुछ देने अथवा उनसे कुछ लेने से बचना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी चेतावनी दी है, विषयीर अन्न खाइले दुष्ट हय मन: \"सांसारिक लोगों द्वारा बनाया गया भोजन खाने से मनुष्य का मन दूषित हो जाता है। जब तक कोई अत्यन्त उन्नत न हो, वह कृष्णभावनामृत आन्दोलन को आगे बढ़ाने हेतु प्रत्येक व्यक्ति के योगदान का उपयोग करने में असमर्थ रहता है; अतः सिद्धान्ततः मनुष्य को मायावादियों अथवा नास्तिकों से दान स्वीकार नहीं करना चाहिए। वस्तुतः, श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों को उन सामान्य मनुष्यों से भी संगति करने से मना किया है जो भौतिक इन्द्रियतृप्ति में अत्यधिक आसक्त हैं।\n\nनिष्कर्ष यह है कि हमें सदैव भक्तों की संगति करनी चाहिए, भक्ति के विधि-विधानों का पालन करना चाहिए, आचार्यों के पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए तथा पूर्ण आज्ञाकारिता के साथ आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार हम अपनी भक्ति तथा सुप्त कृष्णभावना का विकास कर सकेंगे। जो भक्त न तो नवदीक्षित है और न महा-भागवत (अत्यन्त उन्नत भक्त), अपितु भक्ति की मध्यम स्थिति में है, उससे अपेक्षा की जाती है कि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से प्रेम करे, भक्तों से मित्रता करे, अज्ञानियों पर कृपा दिखाए तथा ईर्ष्यालु एवं आसुरी जनों का त्याग करे। इस श्लोक में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ प्रेममय व्यवहार करने तथा भक्तों से मित्रता करने की विधि का संक्षेप में उल्लेख है। ददाति सिद्धान्त के अनुसार, एक उन्नत भक्त से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी आय का कम-से-कम पचास प्रतिशत भगवान् एवं उनके भक्तों की सेवा में व्यय करे। श्रील रूप गोस्वामी ने अपने जीवन में ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत किया। जब उन्होंने सेवानिवृत्त होने का निश्चय किया, तब उन्होंने अपने जीवन की आय का पचास प्रतिशत श्रीकृष्ण की सेवा में, पच्चीस प्रतिशत अपने सम्बन्धियों को वितरित कर दिया तथा पच्चीस प्रतिशत व्यक्तिगत आकस्मिकताओं के लिए रख लिया। इस उदाहरण का अनुसरण समस्त भक्तों को करना चाहिए। मनुष्य की आय जो भी हो, उसका पचास प्रतिशत श्रीकृष्ण एवं उनके भक्तों के निमित्त व्यय किया जाना चाहिए, और इससे ददाति की माँग पूर्ण होगी।\n\nअगले श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी हमें बताते हैं कि किस प्रकार के वैष्णव को मित्र के रूप में चुना जाना चाहिए तथा वैष्णवों की सेवा किस प्रकार की जानी चाहिए।"}
{"ref": "noi/5", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/5/", "verse_text": "", "devanagari": "> कृष्णेति यस्य गिरि तं मनसाद्रियेत\n> दीक्षास्ति चेत प्रणतिभिश्च भजन्तमीशम् ।\n> शुश्रूषया भजनविज्ञमनन्यमन्य-\n> निन्दादिशून्यहृदमीप्सितसङ्गलब्ध्या ॥५॥", "synonyms": "*कृष्ण*—भगवान् श्रीकृष्ण का पवित्र नाम; *इति*—इस प्रकार; *यस्य*—जिसके; *गिरि*—वचनों अथवा वाणी में; *तम्*—उसका; *मनसा*—मन से; *आद्रियेत*—आदर करना चाहिए; *दीक्षा*—दीक्षा; *अस्ति*—है; *चेत्*—यदि; *प्रणतिभिः*—प्रणामों द्वारा; *च*—भी; *भजन्तम्*—भक्ति में संलग्न; *ईशम्*—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को; *शुश्रूषया*—व्यावहारिक सेवा द्वारा; *भजन-विज्ञम्*—जो भक्ति में उन्नत है; *अनन्यम्*—बिना विचलन के; *अन्य-निन्दा-आदि*—दूसरों की निन्दा आदि से; *शून्य*—पूर्णतः रहित; *हृदम्*—जिसका हृदय; *ईप्सित*—वांछनीय; *सङ्ग*—संगति; *लब्ध्या*—प्राप्त करके।", "translation": "**जो भक्त भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करता है, उसका मन से आदर करना चाहिए; जिस भक्त ने आध्यात्मिक दीक्षा [दीक्षा] ले ली है और अर्चाविग्रह की पूजा में संलग्न है, उसे विनम्र प्रणाम अर्पित करने चाहिए; और जो शुद्ध भक्त अविचल भक्ति में उन्नत है तथा जिसका हृदय दूसरों की आलोचना करने की प्रवृत्ति से पूर्णतः रहित है, उसकी संगति करनी चाहिए तथा श्रद्धापूर्वक उसकी सेवा करनी चाहिए।**", "purport": "पूर्ववर्ती श्लोक में वर्णित छह प्रकार के प्रेममय आदान-प्रदानों को बुद्धिपूर्वक लागू करने हेतु, मनुष्य को सावधानीपूर्वक विवेक के साथ उपयुक्त व्यक्तियों का चयन करना चाहिए। अतः श्रील रूप गोस्वामी सलाह देते हैं कि हमें वैष्णवों से उनकी विशिष्ट स्थिति के अनुसार उपयुक्त रीति से मिलना चाहिए। इस श्लोक में वे हमें बताते हैं कि तीन प्रकार के भक्तों—कनिष्ठ-अधिकारी, मध्यम-अधिकारी तथा उत्तम-अधिकारी—के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए। कनिष्ठ-अधिकारी वह नवदीक्षित है जिसने आध्यात्मिक गुरु से हरि-नाम दीक्षा प्राप्त की है तथा श्रीकृष्ण के पवित्र नाम का जप करने का प्रयत्न कर रहा है। मनुष्य को अपने मन में ऐसे व्यक्ति का कनिष्ठ-वैष्णव के रूप में आदर करना चाहिए। मध्यम-अधिकारी ने आध्यात्मिक गुरु से आध्यात्मिक दीक्षा प्राप्त की है और गुरु ने उसे भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में पूर्ण रूप से संलग्न कर दिया है। मध्यम-अधिकारी को भक्ति में मध्य-मार्ग में स्थित माना जाना चाहिए। उत्तम-अधिकारी, अर्थात् उच्चतम भक्त, वह है जो भक्ति में अत्यन्त उन्नत है। उत्तम-अधिकारी को दूसरों की निन्दा में कोई रुचि नहीं होती, उसका हृदय पूर्णतः स्वच्छ होता है, और उसने अनन्य कृष्णभावना की साक्षात्कारी अवस्था प्राप्त कर ली होती है। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार, ऐसे महा-भागवत, अर्थात् पूर्ण वैष्णव की संगति एवं सेवा सर्वाधिक वांछनीय है।\n\nमनुष्य को कनिष्ठ-अधिकारी नहीं बने रहना चाहिए, अर्थात् वह जो भक्ति के निम्नतम स्तर पर स्थित है तथा केवल मन्दिर में अर्चाविग्रह की पूजा में रुचि रखता है। ऐसे भक्त का वर्णन श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध (11.2.47) में किया गया है:\n\narcāyām eva haraye\n\npūjāṁ yaḥ śraddhayehate\n\n*na tad*-bhakteṣu cānyeṣu\n\nsa bhaktaḥ prākṛtaḥ smṛtaḥ\n\n\"जो व्यक्ति मन्दिर में अर्चाविग्रह की पूजा में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक संलग्न रहता है, किन्तु जो भक्तों अथवा सामान्य जनों के प्रति व्यवहार करना नहीं जानता, वह प्राकृत-भक्त, अर्थात् कनिष्ठ-अधिकारी कहलाता है।\"\n\nअतः मनुष्य को कनिष्ठ-अधिकारी की स्थिति से उठकर मध्यम-अधिकारी के स्तर तक आना पड़ता है। मध्यम-अधिकारी का वर्णन श्रीमद्भागवत (11.2.46) में इस प्रकार किया गया है:\n\n*īśvare tad*-adhīneṣu\n\nbāliśeṣu dviṣatsu ca\n\n*prema*-maitrī-kṛpopekṣā\n\nyaḥ karoti sa madhyamaḥ\n\n\"मध्यम-अधिकारी वह भक्त है जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की प्रेम के सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में आराधना करता है, भगवान् के भक्तों से मित्रता करता है, अज्ञानियों पर कृपालु रहता है तथा जो स्वभाव से ईर्ष्यालु हैं उनसे बचता है।\"\n\nभक्ति का समुचित अनुशीलन करने का यही मार्ग है; अतः इस श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी ने हमें सलाह दी है कि विविध भक्तों के साथ किस प्रकार व्यवहार करें। हम व्यावहारिक अनुभव से देख सकते हैं कि भिन्न-भिन्न प्रकार के वैष्णव होते हैं। प्राकृत-सहजिया सामान्यतः हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते हैं, फिर भी वे स्त्री, धन तथा नशे में आसक्त रहते हैं। यद्यपि ऐसे व्यक्ति भगवान् के पवित्र नाम का जप कर सकते हैं, तथापि वे अभी समुचित रूप से शुद्ध नहीं हुए हैं। ऐसे लोगों का मन में आदर करना चाहिए, किन्तु उनकी संगति से बचना चाहिए। जो निर्दोष हैं किन्तु केवल बुरी संगति से बहक गए हैं, उन पर कृपा दिखानी चाहिए यदि वे शुद्ध भक्तों से समुचित शिक्षा ग्रहण करने को उत्सुक हों, किन्तु जो नवदीक्षित भक्त वास्तव में प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से दीक्षित हैं तथा गम्भीरतापूर्वक आध्यात्मिक गुरु के आदेशों के पालन में संलग्न हैं, उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम अर्पित किए जाने चाहिए।\n\nइस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में जाति, मत अथवा रंग के भेदभाव के बिना प्रत्येक व्यक्ति को अवसर दिया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को इस आन्दोलन में सम्मिलित होने, हमारे साथ बैठने, प्रसाद ग्रहण करने तथा श्रीकृष्ण के विषय में सुनने के लिए आमन्त्रित किया जाता है। जब हम देखते हैं कि कोई वास्तव में कृष्णभावनामृत में रुचि रखता है तथा दीक्षित होना चाहता है, तब हम उसे भगवान् के पवित्र नाम के जप हेतु शिष्य के रूप में स्वीकार करते हैं। जब कोई नवदीक्षित भक्त वास्तव में दीक्षित हो जाता है तथा आध्यात्मिक गुरु के आदेशों से भक्ति में संलग्न हो जाता है, तब उसे तत्काल प्रामाणिक वैष्णव के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, तथा उसे प्रणाम अर्पित किए जाने चाहिए। ऐसे अनेक वैष्णवों में से कोई एक ऐसा पाया जा सकता है जो भगवान् की सेवा में अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक संलग्न रहता है तथा समस्त विधि-विधानों का कठोरता से पालन करता है, जप-माला पर निर्धारित संख्या में माला का जप करता है तथा सदैव यह सोचता रहता है कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन का विस्तार किस प्रकार किया जाए। ऐसे वैष्णव को उत्तम-अधिकारी, अर्थात् अत्यन्त उन्नत भक्त के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, और उसकी संगति सदैव खोजी जानी चाहिए।\n\nजिस विधि से कोई भक्त श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त होता है, उसका वर्णन चैतन्य-चरितामृत (अन्त्य 4.192) में किया गया है:\n\n*dīkṣā*-kāle bhakta kare ātma-samarpaṇa\n\n*sei*-kāle kṛṣṇa tāre kare ātma-sama\n\n\"दीक्षा के समय, जब भक्त भगवान् की सेवा में पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण करता है, तब श्रीकृष्ण उसे अपने ही समान स्वीकार कर लेते हैं।\"\n\nदीक्षा, अर्थात् आध्यात्मिक दीक्षा को श्रील जीव गोस्वामी ने भक्ति-सन्दर्भ (868) में समझाया है:\n\ndivyaṁ jñānaṁ yato dadyāt\n\nkuryāt pāpasya saṅkṣayam\n\ntasmād dīkṣeti sā proktā\n\n*deśikais tattva*-kovidaiḥ\n\n\"दीक्षा से मनुष्य क्रमशः भौतिक भोग में अरुचि करने लगता है तथा क्रमशः आध्यात्मिक जीवन में रुचि करने लगता है।\"\n\nहमने इसके अनेक व्यावहारिक उदाहरण देखे हैं, विशेषतः यूरोप तथा अमेरिका में। जो अनेक विद्यार्थी हमारे पास धनी एवं प्रतिष्ठित परिवारों से आते हैं, वे भौतिक भोग में समस्त रुचि शीघ्र खो देते हैं तथा आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने को अत्यन्त उत्सुक हो जाते हैं। यद्यपि वे अत्यन्त सम्पन्न परिवारों से आते हैं, उनमें से अनेक ऐसी रहन-सहन की दशाएँ स्वीकार कर लेते हैं जो अधिक सुखद नहीं हैं। वस्तुतः, श्रीकृष्ण के निमित्त वे किसी भी रहन-सहन की दशा को स्वीकार करने के लिए तत्पर रहते हैं, जब तक वे मन्दिर में रह सकें तथा वैष्णवों की संगति कर सकें। जब मनुष्य भौतिक भोग में इतना अनिच्छुक हो जाता है, तब वह आध्यात्मिक गुरु द्वारा दीक्षा के योग्य बन जाता है। आध्यात्मिक जीवन की उन्नति हेतु श्रीमद्भागवत (6.1.13) यह विधान करता है: तपसा ब्रह्मचर्येण शमेन च दमेन च। जब कोई व्यक्ति दीक्षा ग्रहण करने के विषय में गम्भीर होता है, तब उसे तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा मन एवं शरीर के संयम का अभ्यास करने को तत्पर रहना चाहिए। यदि कोई इस प्रकार तत्पर है तथा आध्यात्मिक प्रबोध (दिव्यं ज्ञानम्) प्राप्त करने का इच्छुक है, तो वह दीक्षित होने योग्य है। दिव्यं ज्ञानम् को तकनीकी रूप से तद्-विज्ञान, अर्थात् परम के विषय में ज्ञान कहा जाता है। तद्-विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छेत्: [MU 1.2.12] जब कोई परम सत्य के दिव्य विषय में रुचि रखता है, तब उसे दीक्षित होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को दीक्षा लेने हेतु आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना चाहिए। श्रीमद्भागवत (11.3.21) भी यह विधान करता है: तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। \"जब कोई वास्तव में परम सत्य के दिव्य विज्ञान में रुचि रखता है, तब उसे आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना चाहिए।\"\n\nमनुष्य को आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन किए बिना उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए। न ही मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन का बनावटी प्रदर्शन करने हेतु आध्यात्मिक गुरु स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य को जिज्ञासु, अर्थात् प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से सीखने को अत्यन्त उत्सुक होना चाहिए। मनुष्य जो प्रश्न करे, वे कठोरता से दिव्य विज्ञान से सम्बन्धित होने चाहिए (जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्)। उत्तमम् शब्द उसका द्योतक है जो भौतिक ज्ञान से परे है। तम का अर्थ है \"इस भौतिक जगत् का अन्धकार,\" और उत् का अर्थ है \"दिव्य।\" सामान्यतः लोग सांसारिक विषयों के बारे में प्रश्न करने में अत्यन्त रुचि रखते हैं, किन्तु जब मनुष्य ऐसी रुचि खो देता है और केवल दिव्य विषयों में रुचि रखता है, तब वह दीक्षित होने के पूर्णतः योग्य होता है। जब कोई वास्तव में प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से दीक्षित हो जाता है और जब वह गम्भीरतापूर्वक भगवान् की सेवा में संलग्न होता है, तब उसे मध्यम-अधिकारी के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।\n\nश्रीकृष्ण के पवित्र नामों का जप इतना उदात्त है कि यदि मनुष्य हरे कृष्ण महामन्त्र का अपराधरहित होकर, दस अपराधों से सावधानीपूर्वक बचते हुए जप करे, तो वह निश्चय ही क्रमशः इस बोध के बिन्दु तक उन्नत हो सकता है कि भगवान् के पवित्र नाम तथा स्वयं भगवान् में कोई भेद नहीं है। जिसने ऐसा बोध प्राप्त कर लिया है, उसका नवदीक्षित भक्तों द्वारा अत्यधिक आदर किया जाना चाहिए। मनुष्य को निश्चित रूप से यह जान लेना चाहिए कि भगवान् के पवित्र नाम का अपराधरहित जप किए बिना मनुष्य कृष्णभावनामृत में उन्नति का समुचित पात्र नहीं बन सकता। श्री चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.69) में कहा गया है:\n\nyāhāra komala śraddhā, se 'kaniṣṭha' jana\n\n*krame krame teṅho bhakta ha*-ibe 'uttama'\n\n\"जिसकी श्रद्धा कोमल एवं लचीली है, वह नवदीक्षित कहलाता है, किन्तु क्रमशः विधि का अनुसरण करते हुए वह प्रथम-श्रेणी के भक्त के स्तर तक उठ जाएगा।\" प्रत्येक व्यक्ति अपना भक्तिमय जीवन नवदीक्षित अवस्था से आरम्भ करता है, किन्तु यदि मनुष्य हरिनाम की निर्धारित संख्या में माला का जप समुचित रूप से पूर्ण करता है, तो वह सोपान-दर-सोपान उच्चतम स्तर, उत्तम-अधिकारी तक उन्नत हो जाता है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन प्रतिदिन सोलह माला का विधान करता है, क्योंकि पाश्चात्य देशों के लोग माला पर जप करते समय दीर्घकाल तक एकाग्र नहीं रह सकते। अतः न्यूनतम माला-संख्या का विधान किया गया है। तथापि, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर कहा करते थे कि जब तक मनुष्य कम-से-कम चौंसठ माला जप (एक लाख नाम) न करे, तब तक वह पतित माना जाता है। उनकी गणना के अनुसार, हममें से प्रायः प्रत्येक पतित है, किन्तु चूँकि हम परमेश्वर की सेवा पूर्ण गम्भीरता से तथा बिना किसी कपट के करने का प्रयत्न कर रहे हैं, इसलिए हम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा की आशा कर सकते हैं, जो पतित-पावन, अर्थात् पतितों के उद्धारक के रूप में प्रसिद्ध हैं।\n\nजब श्री चैतन्य महाप्रभु के एक महान् भक्त श्रील सत्यराज खान ने भगवान् से पूछा कि वैष्णव को किस प्रकार पहचाना जा सकता है, तब भगवान् ने उत्तर दिया:\n\n*prabhu kahe,--\"yāṅra mukhe śuni eka*-bāra\n\n*kṛṣṇa*-nāma, sei pūjya,--śreṣṭha sabākāra\"\n\n\"यदि कोई किसी व्यक्ति के मुख से एक बार भी 'कृष्ण' शब्द सुन ले, तो उस व्यक्ति को सामान्य समूह में से सर्वश्रेष्ठ मनुष्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए।\" (चै.च. मध्य 15.106) भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा:\n\n*\"ataeva yāṅra mukhe eka kṛṣṇa*-nāma\n\nsei ta 'vaiṣṇava, kariha tāṅhāra sammāna\"\n\n\"जो श्रीकृष्ण के पवित्र नाम के जप में रुचि रखता है अथवा जो अभ्यास से श्रीकृष्ण के नामों का जप करना पसन्द करता है, उसे वैष्णव के रूप में स्वीकार करना चाहिए तथा कम-से-कम अपने मन में उसे तदनुसार आदर अर्पित करना चाहिए।\" (चै.च. मध्य 15.111) हमारे एक मित्र, एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ संगीतकार, श्रीकृष्ण के पवित्र नामों के जप के प्रति आकृष्ट हो गए हैं, और अपने अभिलेखों में भी उन्होंने कई बार श्रीकृष्ण के पवित्र नाम का उल्लेख किया है। अपने घर में वे श्रीकृष्ण के चित्रों तथा कृष्णभावनामृत के प्रचारकों को भी आदर अर्पित करते हैं। सब प्रकार से, वे श्रीकृष्ण के नाम तथा श्रीकृष्ण की क्रियाओं को अत्यन्त उच्च मानते हैं; अतः हम उन्हें बिना किसी संकोच के आदर अर्पित करते हैं, क्योंकि हम वास्तव में देख रहे हैं कि ये सज्जन क्रमशः कृष्णभावनामृत में उन्नति कर रहे हैं। ऐसे व्यक्ति को सदैव आदर दिखाया जाना चाहिए। निष्कर्ष यह है कि जो कोई नियमित रूप से पवित्र नाम का जप करके कृष्णभावनामृत में उन्नति करने का प्रयत्न कर रहा है, उसे वैष्णवों द्वारा सदैव आदर दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, हमने यह भी देखा है कि हमारे कुछ समकालीन, जो माने जाते हैं कि महान् प्रचारक हैं, क्रमशः जीवन की भौतिक धारणा में पतित हो गए हैं, क्योंकि वे भगवान् के पवित्र नाम का जप करने में असफल रहे।\n\nसनातन गोस्वामी को निर्देश देते समय भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति को तीन श्रेणियों में विभाजित किया।\n\n*śāstra*-yukti nāhi jāne dṛḍha, śraddhāvān\n\n*'madhyama*-adhikārī' sei mahā-bhāgyavān\n\n\"वह व्यक्ति जिसका शास्त्रों का निर्णायक ज्ञान अधिक प्रबल नहीं है, किन्तु जिसने हरे कृष्ण महामन्त्र के जप में दृढ़ श्रद्धा विकसित कर ली है तथा जो अपनी विहित भक्ति के सम्पादन में भी अविचल है, उसे मध्यम-अधिकारी माना जाना चाहिए। ऐसा व्यक्ति अत्यन्त भाग्यवान् है।\" (चै.च. मध्य 22.67) मध्यम-अधिकारी एक श्रद्धावान्, अर्थात् दृढ़ता से श्रद्धालु व्यक्ति है, और वह वास्तव में भक्ति में आगे उन्नति का पात्र है। अतः चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.64) में कहा गया है:\n\n*śraddhāvān jana haya bhakti*-adhikārī\n\n*'uttama', 'madhyama', 'kaniṣṭha'--śraddhā*-anusārī\n\n\"मनुष्य अपनी श्रद्धा [विश्वास] के विकास के अनुसार भक्ति के प्रारम्भिक स्तर, मध्यवर्ती स्तर तथा उच्चतम स्तर पर भक्त के रूप में योग्य बनता है।\" पुनः चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.62) में कहा गया है:\n\n*'śraddhā'-śabde-*-viśvāsa kahe sudṛḍha niścaya\n\n*kṛṣṇe bhakti kaile sarva*-karma kṛta haya\n\n\"'श्रीकृष्ण को दिव्य सेवा अर्पित करने से, मनुष्य स्वतः समस्त गौण क्रियाएँ सम्पन्न कर लेता है।' यह दृढ़, अटल विश्वास, जो भक्ति के सम्पादन के अनुकूल है, श्रद्धा कहलाता है।\" श्रद्धा, अर्थात् श्रीकृष्ण में विश्वास, कृष्णभावनामृत का आरम्भ है। श्रद्धा का अर्थ है प्रबल विश्वास। भगवद्गीता के वचन श्रद्धालु मनुष्यों के लिए प्रामाणिक निर्देश हैं, और श्रीकृष्ण भगवद्गीता में जो भी कहते हैं, उसे बिना किसी व्याख्या के यथावत् स्वीकार करना चाहिए। अर्जुन ने भगवद्गीता को इसी प्रकार स्वीकार किया। भगवद्गीता सुनने के पश्चात् अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा: सर्वम् एतद् ऋतं मन्ये यन् मां वदसि केशव। \"हे श्रीकृष्ण! आप जो कुछ मुझसे कहते हैं, उस सबको मैं पूर्ण रूप से सत्य मानता हूँ।\" (भ.गी. 10.14)\n\nभगवद्गीता को समझने का यही सही मार्ग है, और यही श्रद्धा कहलाता है। ऐसा नहीं है कि मनुष्य अपनी मनमानी व्याख्याओं के अनुसार भगवद्गीता का एक अंश स्वीकार कर ले और फिर दूसरे अंश को अस्वीकार कर दे। यह श्रद्धा नहीं है। श्रद्धा का अर्थ है भगवद्गीता के निर्देशों को उनकी समग्रता में स्वीकार करना, विशेषतः अन्तिम निर्देश: सर्व-धर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज। \"समस्त प्रकार के धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ।\" (भ.गी. 18.66) जब मनुष्य इस निर्देश के विषय में पूर्णतः श्रद्धालु बन जाता है, तब उसकी प्रबल श्रद्धा आध्यात्मिक जीवन में उन्नति का आधार बन जाती है।\n\nजब मनुष्य पूर्ण रूप से हरे कृष्ण महामन्त्र के जप में संलग्न होता है, तब वह क्रमशः अपनी आध्यात्मिक पहचान का साक्षात्कार कर लेता है। जब तक मनुष्य श्रद्धापूर्वक हरे कृष्ण मन्त्र का जप नहीं करता, तब तक श्रीकृष्ण स्वयं को प्रकट नहीं करते: सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयम् एव स्फुरत्य् अदः। (भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.2.234) हम किसी कृत्रिम साधन से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का साक्षात्कार नहीं कर सकते। हमें श्रद्धापूर्वक भगवान् की सेवा में संलग्न होना चाहिए। ऐसी सेवा जिह्वा से आरम्भ होती है (सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ), जिसका अर्थ है कि हमें सदैव भगवान् के पवित्र नामों का जप करना चाहिए तथा कृष्ण-प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। हमें अन्य कुछ भी जप अथवा ग्रहण नहीं करना चाहिए। जब इस विधि का श्रद्धापूर्वक पालन किया जाता है, तब परमेश्वर भक्त के समक्ष स्वयं को प्रकट करते हैं।\n\nजब कोई व्यक्ति स्वयं को श्रीकृष्ण का नित्य सेवक अनुभव करता है, तब वह श्रीकृष्ण की सेवा के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु में रुचि खो देता है। सदैव श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए, श्रीकृष्ण के पवित्र नाम का प्रसार करने के उपाय खोजते हुए, वह समझ लेता है कि उसका एकमात्र कार्य सम्पूर्ण विश्व में कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रसार करना है। ऐसे व्यक्ति को उत्तम-अधिकारी के रूप में पहचाना जाना चाहिए, और छह विधियों के अनुसार (ददाति प्रतिगृह्णाति, इत्यादि) उसकी संगति तत्काल स्वीकार की जानी चाहिए। वस्तुतः, उन्नत उत्तम-अधिकारी वैष्णव भक्त को आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। मनुष्य के पास जो कुछ है, वह सब उसे अर्पित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह आदेश है कि मनुष्य अपने पास जो कुछ है, उसे आध्यात्मिक गुरु को सौंप दे। विशेषतः ब्रह्मचारी से अपेक्षा की जाती है कि वह दूसरों से भिक्षा माँगे तथा उसे आध्यात्मिक गुरु को अर्पित करे। तथापि, मनुष्य को आत्म-साक्षात्कारी हुए बिना किसी उन्नत भक्त अथवा महा-भागवत के आचरण का अनुकरण नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसे अनुकरण से वह अन्ततः पतित हो जाएगा।\n\nइस श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी भक्त को सलाह देते हैं कि वह इतना बुद्धिमान् हो कि कनिष्ठ-अधिकारी, मध्यम-अधिकारी तथा उत्तम-अधिकारी के बीच भेद कर सके। भक्त को अपनी स्थिति भी जाननी चाहिए तथा उच्चतर स्तर पर स्थित भक्त का अनुकरण करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कुछ व्यावहारिक संकेत दिए हैं कि उत्तम-अधिकारी वैष्णव को उसकी इस क्षमता से पहचाना जा सकता है कि वह अनेक पतित आत्माओं को वैष्णव-धर्म की ओर परिवर्तित कर देता है। मनुष्य को तब तक आध्यात्मिक गुरु नहीं बनना चाहिए जब तक वह उत्तम-अधिकारी का स्तर प्राप्त न कर ले। नवदीक्षित वैष्णव अथवा मध्यवर्ती स्तर पर स्थित वैष्णव भी शिष्य स्वीकार कर सकता है, किन्तु ऐसे शिष्य उसी स्तर पर होने चाहिए, और यह समझ लेना चाहिए कि वे उसके अपर्याप्त मार्गदर्शन में जीवन के परम लक्ष्य की ओर भली-भाँति उन्नति नहीं कर सकते। अतः शिष्य को उत्तम-अधिकारी को आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वीकार करने में सावधान रहना चाहिए।"}
{"ref": "noi/6", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/6/", "verse_text": "", "devanagari": "> दृष्टैः स्वभावजनितैर्वपुषश्च दोषैर्\n> न प्राकृतत्वमीह भक्तजनस्य पश्येत् ।\n> गङ्गाम्भसां न खलु बुद्बुदफेन पङ्कैः\n> र्ब्रह्मद्रवत्वमपगच्छतिनीरधर्मैः ॥६॥", "synonyms": "*दृष्टैः*—सामान्य दृष्टि से देखे गए; *स्वभाव-जनितैः*—अपने ही स्वभाव से उत्पन्न; *वपुषः*—शरीर के; *च*—और; *दोषैः*—दोषों से; *न*—नहीं; *प्राकृतत्वम्*—भौतिक होने की अवस्था; *इह*—इस जगत् में; *भक्त जनस्य*—शुद्ध भक्त की; *पश्येत्*—देखना चाहिए; *गङ्गा-अम्भसाम्*—गंगाजल का; *न*—नहीं; *खलु*—निश्चय ही; *बुद्बुद-फेन-पङ्कैः*—बुलबुलों, फेन और कीचड़ से; *ब्रह्म-द्रवत्वम्*—दिव्य स्वरूप; *अपगच्छति*—नष्ट होता है; *नीर-धर्मैः*—जल के गुणों से।", "translation": "**अपनी मूल कृष्णभावनामृत-अवस्था में स्थित होने के कारण शुद्ध भक्त शरीर से अपनी तदात्म्यता नहीं करता। ऐसे भक्त को भौतिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। वस्तुतः मनुष्य को भक्त के निम्न कुल में जन्मे शरीर, बुरे वर्ण वाले शरीर, विकृत शरीर अथवा रोगग्रस्त या दुर्बल शरीर की उपेक्षा कर देनी चाहिए। सामान्य दृष्टि के अनुसार शुद्ध भक्त के शरीर में ऐसी अपूर्णताएँ प्रमुख प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु ऐसे आभासी दोषों के होते हुए भी शुद्ध भक्त का शरीर दूषित नहीं हो सकता। यह ठीक गंगाजल के समान है, जो कभी-कभी वर्षाकाल में बुलबुलों, फेन और कीचड़ से भरा रहता है। गंगाजल दूषित नहीं होता। जो आध्यात्मिक बोध में उन्नत हैं, वे जल की दशा का विचार किए बिना गंगा में स्नान करते हैं।**", "purport": "शुद्ध-भक्ति—आत्मा की उचित क्रिया, अर्थात् भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्नता—मुक्त अवस्था में सम्पन्न होती है। भगवद्गीता (14.26) में कहा गया है:\n\nmāṁ ca yo 'vyabhicāreṇa\n\n*bhakti*-yogena sevate\n\nsa guṇān samatītyaitān\n\n*brahma*-bhūyāya kalpate\n\n\"जो पूर्ण भक्ति में संलग्न रहता है और किसी भी परिस्थिति में पतित नहीं होता, वह तत्काल प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म-स्तर पर पहुँच जाता है।\"\n\nअव्यभिचारिणी भक्ति का अर्थ है अनन्य भक्ति। भक्ति में संलग्न व्यक्ति को भौतिक उद्देश्यों से मुक्त होना चाहिए। इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में मनुष्य की चेतना का परिवर्तन होना चाहिए। यदि चेतना भौतिक भोग की ओर लक्षित है, तो वह भौतिक चेतना है, और यदि वह श्रीकृष्ण की सेवा की ओर लक्षित है, तो वह कृष्णभावना है। शरणागत आत्मा बिना किसी भौतिक विचार के श्रीकृष्ण की सेवा करती है (अन्याभिलाषिता-शून्यम् [भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.1.11])। ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्—अनन्य भक्ति, जो शरीर एवं मन की क्रियाओं, यथा ज्ञान (मानसिक कल्पना) एवं कर्म (सकाम कर्म), से दिव्य है, वही शुद्ध भक्तियोग कहलाती है। भक्तियोग आत्मा की उचित क्रिया है, और जब मनुष्य वास्तव में अनन्य, अदूषित भक्ति में संलग्न होता है, तब वह पहले से ही मुक्त रहता है (स गुणान् समतीत्यैतान् [भ.गी. 14.26])। श्रीकृष्ण का भक्त भौतिक अवस्था के अधीन नहीं होता, भले ही उसके शरीर के लक्षण भौतिक रूप से बद्ध प्रतीत हों। अतः शुद्ध भक्त को भौतिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। जब तक मनुष्य वास्तव में भक्त न हो, तब तक वह दूसरे भक्त को पूर्ण रूप से नहीं देख सकता। जैसा कि पूर्व श्लोक में समझाया गया है, भक्त तीन प्रकार के होते हैं—कनिष्ठ-अधिकारी, मध्यम-अधिकारी और उत्तम-अधिकारी। कनिष्ठ-अधिकारी भक्त और अभक्त में भेद नहीं कर सकता। वह केवल मन्दिर में विग्रह की आराधना से ही सरोकार रखता है। किन्तु मध्यम-अधिकारी भक्त एवं अभक्त में, साथ ही भक्त एवं भगवान् में, भेद कर सकता है। इस प्रकार वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, भक्त एवं अभक्त के साथ भिन्न-भिन्न रीति से व्यवहार करता है।\n\nकिसी को भी शुद्ध भक्त के शारीरिक दोषों की आलोचना नहीं करनी चाहिए। यदि ऐसे दोष हों, तो उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिए। जिस बात का ध्यान रखना चाहिए वह है आध्यात्मिक गुरु का मुख्य कार्य, जो भक्ति है—परमेश्वर की शुद्ध सेवा। जैसा कि भगवद्गीता (9.30) में कहा गया है:\n\napi cet sudurācāro\n\n*bhajate mām ananya*-bhāk\n\nsādhur eva sa mantavyaḥ\n\nsamyag vyavasito hi saḥ\n\nयद्यपि कोई भक्त कभी-कभी गर्हित कर्मों में संलग्न प्रतीत हो, तथापि उसे साधु, अर्थात् सन्त-पुरुष माना जाना चाहिए, क्योंकि उसकी वास्तविक पहचान भगवान् की प्रेममयी सेवा में संलग्न व्यक्ति की है। दूसरे शब्दों में, उसे सामान्य मनुष्य नहीं माना जाना चाहिए।\n\nयद्यपि शुद्ध भक्त ब्राह्मण अथवा गोस्वामी कुल में जन्मा न हो, फिर भी यदि वह भगवान् की सेवा में संलग्न है, तो उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। वास्तव में भौतिक विचारों, जाति अथवा वंशानुक्रम पर आधारित गोस्वामियों का कुल हो ही नहीं सकता। गोस्वामी उपाधि वस्तुतः शुद्ध भक्तों का ही एकाधिकार है; अतः हम छह गोस्वामियों की बात करते हैं, जिनमें प्रमुख रूप गोस्वामी एवं सनातन गोस्वामी हैं। रूप गोस्वामी एवं सनातन गोस्वामी व्यावहारिक रूप से मुसलमान बन चुके थे और इसी कारण उन्होंने अपने नाम बदलकर दबीर खास एवं साकर मल्लिक रख लिए थे, किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभु ने स्वयं उन्हें गोस्वामी बनाया। अतः गोस्वामी उपाधि वंशानुगत नहीं है। गोस्वामी शब्द उस व्यक्ति को इंगित करता है जो अपनी इन्द्रियों को वश में रख सके, जो इन्द्रियों का स्वामी हो। भक्त इन्द्रियों के वश में नहीं होता, अपितु इन्द्रियों का नियन्त्रक होता है। फलतः उसे स्वामी अथवा गोस्वामी कहा जाना चाहिए, भले ही वह गोस्वामी कुल में जन्मा न हो।\n\nइस सूत्र के अनुसार श्रीनित्यानन्द प्रभु एवं श्रीअद्वैत प्रभु के वंशज गोस्वामी निश्चय ही भक्त हैं, किन्तु अन्य कुलों से आए भक्तों के प्रति भेदभाव नहीं करना चाहिए; वस्तुतः भक्त चाहे पूर्व आचार्यों के कुल से आएँ अथवा सामान्य कुल से, उनके साथ समान व्यवहार होना चाहिए। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि \"ओह, यह तो अमेरिकन गोस्वामी है,\" और उसके प्रति भेदभाव करना चाहिए। न ही यह सोचना चाहिए कि \"यह तो नित्यानन्द-वंश-गोस्वामी है।\" कृष्णभावनामृत आन्दोलन के अमेरिकन वैष्णवों को गोस्वामी उपाधि प्रदान करने के विरुद्ध एक भीतरी विरोध की लहर है। कभी-कभी लोग सीधे ही अमेरिकन भक्तों से कहते हैं कि उनका संन्यास अथवा गोस्वामी उपाधि प्रामाणिक नहीं है। किन्तु इस श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी के कथनों के अनुसार, अमेरिकन गोस्वामी और आचार्यों के कुल का गोस्वामी अभिन्न हैं।\n\nदूसरी ओर, जिस भक्त ने गोस्वामी उपाधि प्राप्त कर ली हो किन्तु जो ब्राह्मण पिता से अथवा नित्यानन्द या अद्वैत प्रभु के कुल के गोस्वामी से जन्मा न हो, उसे यह सोचकर कृत्रिम रूप से अहंकारग्रस्त नहीं होना चाहिए कि वह गोस्वामी बन गया है। उसे सदा स्मरण रखना चाहिए कि ज्यों ही वह भौतिक रूप से अहंकारग्रस्त होता है, त्यों ही तत्काल पतित हो जाता है। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन एक दिव्य विज्ञान है, और इसमें ईर्ष्या के लिए कोई स्थान नहीं है। यह आन्दोलन उन परमहंसों के लिए है जो समस्त ईर्ष्या से पूर्णतः मुक्त हैं (परमं निर्मत्सराणाम्)। मनुष्य को ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, चाहे वह गोस्वामियों के कुल में जन्मा हो अथवा उसे गोस्वामी उपाधि प्रदान की गई हो। ज्यों ही कोई ईर्ष्यालु होता है, त्यों ही वह परमहंस-स्तर से पतित हो जाता है।\n\nयदि हम किसी वैष्णव के शारीरिक दोषों का विचार करते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि हम वैष्णव के चरणकमलों में अपराध कर रहे हैं। वैष्णव के चरणकमलों में किया गया अपराध अत्यन्त गम्भीर है। वस्तुतः श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस अपराध को हाती-माता, अर्थात् मत्त हाथी का अपराध, कहा है। मत्त हाथी विनाश उत्पन्न कर सकता है, विशेषकर जब वह किसी भली-भाँति सँवारे गए उद्यान में घुस जाए। अतः मनुष्य को अत्यन्त सावधान रहना चाहिए कि वह किसी वैष्णव के विरुद्ध कोई अपराध न करे। प्रत्येक भक्त को किसी श्रेष्ठ वैष्णव से शिक्षा ग्रहण करने हेतु तत्पर रहना चाहिए, और श्रेष्ठ वैष्णव को निम्न वैष्णव की सब प्रकार से सहायता करने हेतु तत्पर रहना चाहिए। मनुष्य कृष्णभावनामृत में अपने आध्यात्मिक विकास के अनुसार श्रेष्ठ अथवा निम्न होता है। मनुष्य को शुद्ध वैष्णव के कर्मों का भौतिक दृष्टिकोण से अवलोकन करने का निषेध है। विशेषकर नवदीक्षित के लिए शुद्ध भक्त को भौतिक दृष्टिकोण से देखना अत्यन्त हानिकारक है। अतः मनुष्य को शुद्ध भक्त का बाह्य रूप से अवलोकन करने से बचना चाहिए, अपितु आन्तरिक लक्षणों को देखने का प्रयास करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि वह किस प्रकार भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न है। इस प्रकार मनुष्य शुद्ध भक्त को भौतिक दृष्टिकोण से देखने से बच सकता है, और इस प्रकार स्वयं भी क्रमशः शुद्ध भक्त बन सकता है।\n\nजो लोग यह सोचते हैं कि कृष्णभावनामृत किसी विशेष वर्ग के लोगों, किसी विशेष वर्ग के भक्तों अथवा किसी विशेष भूखण्ड तक सीमित है, वे प्रायः भक्त के बाह्य लक्षणों को देखने की प्रवृत्ति रखते हैं। ऐसे नवदीक्षित, उन्नत भक्त की उत्कृष्ट सेवा की सराहना करने में असमर्थ होने के कारण, महा-भागवत को अपने स्तर पर लाने का प्रयास करते हैं। इस कृष्णभावनामृत का सम्पूर्ण विश्व में प्रचार करते समय हम ऐसी कठिनाई का अनुभव करते हैं। दुर्भाग्यवश हम ऐसे नवदीक्षित गुरुभाइयों से घिरे हुए हैं जो सम्पूर्ण विश्व में कृष्णभावनामृत के प्रसार की असाधारण क्रियाओं की सराहना नहीं करते। वे केवल हमें अपने स्तर पर लाने का प्रयास करते हैं, और वे हमारी प्रत्येक दृष्टि से आलोचना करने का प्रयत्न करते हैं। हमें उनकी भोली क्रियाओं एवं ज्ञान के अल्प भण्डार पर अत्यन्त खेद होता है। जो अधिकृत व्यक्ति वास्तव में भगवान् की गोपनीय सेवा में संलग्न है, उसके साथ सामान्य मनुष्य के समान व्यवहार नहीं करना चाहिए, क्योंकि कहा गया है कि जब तक मनुष्य श्रीकृष्ण द्वारा सामर्थ्य-सम्पन्न न किया जाए, तब तक वह सम्पूर्ण विश्व में कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रसार नहीं कर सकता।\n\nजब मनुष्य इस प्रकार किसी शुद्ध भक्त की आलोचना करता है, तब वह ऐसा अपराध (वैष्णव-अपराध) करता है जो कृष्णभावनामृत में उन्नति करने के इच्छुक लोगों के लिए अत्यन्त बाधक एवं संकटपूर्ण है। जब मनुष्य किसी वैष्णव के चरणकमलों में अपराध करता है, तब वह कोई आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अत्यन्त सावधान रहना चाहिए कि वह किसी सामर्थ्य-सम्पन्न वैष्णव, अर्थात् शुद्ध-वैष्णव, से ईर्ष्या न करे। किसी सामर्थ्य-सम्पन्न वैष्णव को अनुशासनात्मक कार्रवाई का पात्र मानना भी अपराध है। उसे उपदेश देने अथवा उसे सुधारने का प्रयास करना अपराध है। मनुष्य नवदीक्षित वैष्णव एवं उन्नत वैष्णव में उनके कर्मों के आधार पर भेद कर सकता है। उन्नत वैष्णव सदा आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्थित रहता है, और नवदीक्षित सदा उसका शिष्य माना जाता है। आध्यात्मिक गुरु को किसी शिष्य के उपदेश के अधीन नहीं किया जाना चाहिए, न ही आध्यात्मिक गुरु को उनसे शिक्षा लेने के लिए बाध्य होना चाहिए जो उसके शिष्य नहीं हैं। यही छठे श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी के उपदेश का सार-तत्त्व है।"}
{"ref": "noi/7", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/7/", "verse_text": "", "devanagari": "> स्यात् कृष्णनामचरितादिसिताप्यविद्या-\n> पित्तोपतप्तरसनस्य न रोचिका नु ।\n> किन्त्वादरादनुदिनं खलु सैव जुष्टा\n> स्वाद्वी क्रमाद्भवति तद्गदमूलहन्त्री ॥७॥", "synonyms": "*स्यात्*—है; *कृष्ण*—भगवान् श्रीकृष्ण का; *नाम*—पवित्र नाम; *चरित-आदि*—चरित्र, लीलाएँ इत्यादि; *सिता*—मिश्री; *अपि*—यद्यपि; *अविद्या*—अज्ञान के; *पित्त*—पित्त द्वारा; *उपतप्त*—पीड़ित; *रसनस्य*—जिह्वा की; *न*—नहीं; *रोचिका*—स्वादिष्ट; *नु*—ओह, यह कितना अद्भुत है; *किन्तु*—किन्तु; *आदरात्*—सावधानीपूर्वक; *अनुदिनम्*—प्रतिदिन, अथवा दिन-रात चौबीसों घण्टे; *खलु*—स्वभावतः; *सा*—वह (पवित्र नाम की मिश्री); *एव*—निश्चय ही; *जुष्टा*—ग्रहण की गई अथवा जपी गई; *स्वाद्वी*—आस्वादनीय; *क्रमात्*—क्रमशः; *भवति*—हो जाती है; *तत्-गद*—उस रोग के; *मूल*—मूल का; *हन्त्री*—विनाशक।", "translation": "**श्रीकृष्ण का पवित्र नाम, चरित्र, लीलाएँ एवं कार्यकलाप—सभी मिश्री के समान दिव्य रूप से मधुर हैं। यद्यपि अविद्या [अज्ञान] के पीलिया से पीड़ित मनुष्य की जिह्वा किसी मधुर वस्तु का स्वाद नहीं ले सकती, तथापि यह आश्चर्यजनक है कि इन मधुर नामों का प्रतिदिन सावधानीपूर्वक जप करने मात्र से उसकी जिह्वा में एक स्वाभाविक रुचि जाग उठती है, और उसका रोग क्रमशः जड़ से नष्ट हो जाता है।**", "purport": "भगवान् श्रीकृष्ण का पवित्र नाम, उनका गुण, लीलाएँ इत्यादि—ये सभी परम सत्य, सौन्दर्य एवं आनन्द के स्वरूप हैं। स्वभावतः वे अत्यन्त मधुर हैं, मिश्री के समान, जो प्रत्येक व्यक्ति को रुचिकर लगती है। किन्तु अज्ञान की तुलना पीलिया नामक रोग से की जाती है, जो पित्त के स्राव से उत्पन्न होता है। पीलिया से ग्रस्त रोगी की जिह्वा मिश्री का स्वादपूर्वक आस्वादन नहीं कर सकती। अपितु पीलिया-ग्रस्त व्यक्ति किसी मधुर वस्तु का स्वाद अत्यन्त कड़वा अनुभव करता है। इसी प्रकार अविद्या (अज्ञान) श्रीकृष्ण के दिव्य रूप से आस्वादनीय नाम, गुण, रूप एवं लीलाओं का आस्वादन करने की क्षमता को विकृत कर देती है। इस रोग के होते हुए भी, यदि मनुष्य अत्यन्त सावधानी एवं ध्यान के साथ कृष्णभावनामृत को अपना ले, पवित्र नाम का जप करे और श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का श्रवण करे, तो उसका अज्ञान नष्ट हो जाएगा और उसकी जिह्वा श्रीकृष्ण एवं उनके परिकर के दिव्य स्वरूप की मधुरता का आस्वादन करने में समर्थ हो जाएगी। ऐसे आध्यात्मिक स्वास्थ्य की पुनःप्राप्ति केवल कृष्णभावनामृत के नियमित अनुशीलन से ही सम्भव है।\n\nजब भौतिक जगत् में कोई मनुष्य कृष्णभावनामृत की अपेक्षा भौतिकतावादी जीवन-शैली में अधिक रुचि लेता है, तब वह रोगग्रस्त अवस्था में माना जाता है। सामान्य अवस्था तो भगवान् का नित्य सेवक बने रहना है (जीवेर 'स्वरूप' हय—कृष्णेर 'नित्य-दास' [चै.च. मध्य 20.108])। यह स्वस्थ अवस्था तब लुप्त हो जाती है जब जीव श्रीकृष्ण की माया-शक्ति के बाह्य लक्षणों से आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण को भूल जाता है। माया का यह जगत् दुराश्रय कहलाता है, जिसका अर्थ है \"मिथ्या अथवा बुरा आश्रय।\" जो मनुष्य दुराश्रय में अपनी श्रद्धा रखता है, वह व्यर्थ आशा करने का पात्र बन जाता है। भौतिक जगत् में प्रत्येक व्यक्ति सुखी होने का प्रयास कर रहा है, और यद्यपि उसके भौतिक प्रयत्न हर प्रकार से विफल हो जाते हैं, तथापि अपने अज्ञान के कारण वे अपनी भूलें नहीं समझ पाते। लोग एक भूल को दूसरी भूल करके सुधारने का प्रयास करते हैं। भौतिक जगत् में अस्तित्व के संघर्ष का यही ढंग है। यदि इस अवस्था में किसी मनुष्य को कृष्णभावनामृत अपनाकर सुखी होने का परामर्श दिया जाए, तो वह ऐसी शिक्षाओं को स्वीकार नहीं करता।\n\nयह कृष्णभावनामृत आन्दोलन इसी घोर अज्ञान का प्रतिकार करने के लिए सम्पूर्ण विश्व में फैलाया जा रहा है। लोग सामान्यतः अन्धे नेताओं द्वारा भटकाए जाते हैं। मानव-समाज के नेता—राजनीतिज्ञ, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक—अन्धे हैं, क्योंकि वे कृष्णभावनाभावित नहीं हैं। भगवद्गीता के अनुसार, अपनी नास्तिक जीवन-शैली के कारण समस्त वास्तविक ज्ञान से वंचित होने से, वे वस्तुतः पापी धूर्त हैं और मनुष्यों में सबसे निकृष्ट हैं।\n\nna māṁ duṣkṛtino mūḍhāḥ\n\nprapadyante narādhamāḥ\n\nmāyayāpahṛta jñānā-\n\nāsuraṁ bhāvam āśritāḥ\n\n\"वे दुष्कर्मी जो घोर रूप से मूर्ख हैं, मनुष्यों में सबसे निकृष्ट हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है, और जो असुरों के नास्तिक स्वभाव को धारण करते हैं, मेरी शरण नहीं लेते।\" (भ.गी. 7.15)\n\nऐसे लोग कभी श्रीकृष्ण की शरण नहीं लेते, और जो लोग श्रीकृष्ण का आश्रय ग्रहण करना चाहते हैं, उनके प्रयास का वे विरोध करते हैं। जब ऐसे नास्तिक समाज के नेता बन जाते हैं, तब सम्पूर्ण वातावरण अज्ञान से भर उठता है। ऐसी अवस्था में लोग इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन को ग्रहण करने में अत्यधिक उत्साह नहीं दिखाते, ठीक जैसे पीलिया से पीड़ित रोगी मिश्री का स्वाद नहीं चखता। किन्तु मनुष्य को जानना चाहिए कि पीलिया के लिए मिश्री ही एकमात्र विशिष्ट औषधि है। इसी प्रकार, मानवता की वर्तमान भ्रमित अवस्था में, कृष्णभावनामृत, भगवान् के पवित्र नाम का जप—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—ही संसार को ठीक करने का एकमात्र उपचार है। यद्यपि कृष्णभावनामृत किसी रोगग्रस्त व्यक्ति के लिए अत्यन्त रुचिकर न हो, तथापि श्रील रूप गोस्वामी परामर्श देते हैं कि यदि कोई भौतिक रोग से मुक्त होना चाहता है, तो उसे अत्यन्त सावधानी एवं ध्यान के साथ इसे अपनाना चाहिए। मनुष्य अपना उपचार हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करके आरम्भ करता है, क्योंकि भगवान् के इस पवित्र नाम का जप करने से भौतिक अवस्था में स्थित व्यक्ति समस्त मिथ्या धारणाओं से मुक्त हो जाएगा (चेतो-दर्पण-मार्जनम् [चै.च. अन्त्य 20.12])। अविद्या, अर्थात् अपनी आध्यात्मिक पहचान के विषय में मिथ्या धारणा, हृदय के भीतर अहंकार, अर्थात् मिथ्या अहंकार, की नींव प्रदान करती है।\n\nवास्तविक रोग हृदय में है। किन्तु यदि मन शुद्ध हो जाए, यदि चेतना शुद्ध हो जाए, तो मनुष्य को भौतिक रोग हानि नहीं पहुँचा सकता। मन एवं हृदय को समस्त मिथ्या धारणाओं से शुद्ध करने हेतु मनुष्य को हरे कृष्ण महामन्त्र का यह जप अपनाना चाहिए। यह सरल भी है और लाभकारी भी। भगवान् के पवित्र नाम का जप करने से मनुष्य तत्काल भौतिक अस्तित्व की प्रचण्ड अग्नि से मुक्त हो जाता है।\n\nभगवान् के पवित्र नाम के जप में तीन अवस्थाएँ होती हैं—अपराधयुक्त अवस्था, अपराध-क्षय की अवस्था, और शुद्ध अवस्था। जब कोई नवदीक्षित हरे कृष्ण मन्त्र का जप अपनाता है, तब वह प्रायः अनेक अपराध करता है। दस मूल अपराध होते हैं, और यदि भक्त इनसे बचता है, तो वह अगली अवस्था की झलक पा सकता है, जो अपराधयुक्त जप एवं शुद्ध जप के बीच स्थित है। जब मनुष्य शुद्ध अवस्था को प्राप्त करता है, तब वह तत्काल मुक्त हो जाता है। यह भव-महा-दावाग्नि-निर्वापनम् कहलाता है। ज्यों ही मनुष्य भौतिक अस्तित्व की प्रचण्ड अग्नि से मुक्त होता है, त्यों ही वह दिव्य जीवन की मधुरता का आस्वादन कर सकता है।\n\nनिष्कर्ष यह है कि भौतिक रोग से मुक्त होने के लिए मनुष्य को हरे कृष्ण मन्त्र का जप अपनाना चाहिए। कृष्णभावनामृत आन्दोलन विशेष रूप से ऐसा वातावरण उत्पन्न करने के लिए है जिसमें लोग हरे कृष्ण मन्त्र का जप अपना सकें। मनुष्य को श्रद्धा से आरम्भ करना चाहिए, और जब यह श्रद्धा जप द्वारा बढ़ती है, तब व्यक्ति इस संघ का सदस्य बन सकता है। हम संकीर्तन-मण्डलियाँ सम्पूर्ण विश्व में भेज रहे हैं, और वे अनुभव कर रहे हैं कि संसार के सुदूरतम भाग में भी, जहाँ श्रीकृष्ण का कोई ज्ञान नहीं है, हरे कृष्ण महामन्त्र हमारे शिविर की ओर सहस्रों मनुष्यों को आकृष्ट कर लेता है। कुछ क्षेत्रों में, मन्त्र सुनने के कुछ ही दिनों बाद, लोग अपने सिर मुँड़वाकर एवं हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करके भक्तों का अनुकरण करने लगते हैं। यह अनुकरणात्मक हो सकता है, किन्तु किसी श्रेष्ठ वस्तु का अनुकरण वांछनीय है। कुछ अनुकर्ता क्रमशः आध्यात्मिक गुरु से दीक्षा लेने में रुचि लेने लगते हैं और दीक्षा के लिए स्वयं को प्रस्तुत करते हैं।\n\nयदि कोई निष्ठावान् हो, तो उसे दीक्षा दी जाती है, और यह अवस्था भजन-क्रिया कहलाती है। तब वह प्रतिदिन सोलह माला हरे कृष्ण महामन्त्र का नियमित जप करके, तथा अवैध मैथुन, नशा, मांसाहार एवं द्यूत से विरत रहकर, वास्तव में भगवान् की सेवा में संलग्न होता है। भजन-क्रिया द्वारा मनुष्य भौतिकतावादी जीवन के कल्मष से मुक्ति प्राप्त करता है। वह अब मांस एवं प्याज से बने तथाकथित स्वादिष्ट व्यंजनों को चखने के लिए किसी भोजनालय अथवा होटल में नहीं जाता, न ही वह धूम्रपान करने अथवा चाय या कॉफ़ी पीने की परवाह करता है। वह न केवल अवैध मैथुन से विरत रहता है, अपितु मैथुन-जीवन से पूर्णतः बचता है। न ही उसे कल्पना अथवा द्यूत में अपना समय व्यर्थ करने में रुचि रहती है। इस प्रकार यह समझा जाना चाहिए कि मनुष्य अनिष्ट वस्तुओं से शुद्ध होता जा रहा है (अनर्थ-निवृत्ति)। अनर्थ शब्द अनिष्ट वस्तुओं को इंगित करता है। अनर्थ तब परास्त होते हैं जब मनुष्य कृष्णभावनामृत आन्दोलन से आसक्त हो जाता है।\n\nजब मनुष्य अनिष्ट वस्तुओं से मुक्त हो जाता है, तब वह अपने कृष्ण-सम्बन्धी कार्यों को सम्पन्न करने में दृढ़ हो जाता है। वस्तुतः वह ऐसे कार्यों के प्रति आसक्त हो जाता है और भक्ति सम्पन्न करने में भावोल्लास का अनुभव करता है। यह भाव कहलाता है, अर्थात् भगवत्प्रेम का प्रारम्भिक प्रसुप्त जागरण। इस प्रकार बद्ध आत्मा भौतिक अस्तित्व से मुक्त हो जाती है और जीवन की देहात्म-बुद्धि में अपनी रुचि खो देती है, जिसमें भौतिक ऐश्वर्य, भौतिक ज्ञान एवं समस्त प्रकार के भौतिक आकर्षण सम्मिलित हैं। ऐसे समय में मनुष्य समझ सकता है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कौन हैं और उनकी माया क्या है।\n\nयद्यपि माया विद्यमान रहती है, तथापि भाव-अवस्था को प्राप्त कर लेने पर वह भक्त को विचलित नहीं कर सकती। इसका कारण यह है कि भक्त माया की वास्तविक स्थिति को देख सकता है। माया का अर्थ है श्रीकृष्ण का विस्मरण, और श्रीकृष्ण का विस्मरण एवं कृष्णभावनामृत प्रकाश एवं छाया के समान साथ-साथ खड़े रहते हैं। यदि मनुष्य छाया में रहता है, तो वह प्रकाश द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का भोग नहीं कर सकता, और यदि मनुष्य प्रकाश में रहता है, तो उसे छाया का अन्धकार विचलित नहीं कर सकता। कृष्णभावनामृत को अपनाकर मनुष्य क्रमशः मुक्त हो जाता है और प्रकाश में रहता है। वस्तुतः वह अन्धकार का स्पर्श तक नहीं करता। जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.31) में पुष्टि की गई है:\n\n*kṛṣṇa-*-sūrya-sama; māyā haya andhakāra\n\nyāhāṅ kṛṣṇa, tāhāṅ nāhi māyāra adhikāra\n\n\"श्रीकृष्ण की तुलना सूर्य-प्रकाश से की जाती है, और माया की तुलना अन्धकार से की जाती है। जहाँ सूर्य-प्रकाश है, वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता। ज्यों ही मनुष्य कृष्णभावनामृत को अपनाता है, त्यों ही माया का अन्धकार, अर्थात् बहिरंगा शक्ति का प्रभाव, तत्काल लुप्त हो जाएगा।\""}
{"ref": "noi/8", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/8/", "verse_text": "", "devanagari": "> तन्नामरूपचरितादिसुकीर्तनानु-\n> स्मृत्योः क्रमेण रसनामनसी नियोज्य ।\n> तिष्ठन् व्रजे तदनुरागिजनानुगामी\n> कालं नयेदखिलमित्युपदेशसारम ॥८॥", "synonyms": "*तत्*—भगवान् श्रीकृष्ण का; *नाम*—पवित्र नाम; *रूप*—रूप; *चरित-आदि*—चरित्र, लीलाएँ इत्यादि; *सु-कीर्तन*—भली-भाँति चर्चा अथवा कीर्तन करने में; *अनुस्मृत्योः*—और स्मरण करने में; *क्रमेण*—क्रमशः; *रसना*—जिह्वा; *मनसी*—और अपना मन; *नियोज्य*—संलग्न करते हुए; *तिष्ठन्*—निवास करते हुए; *व्रजे*—व्रज में; *तत्*—भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति; *अनुरागि*—आसक्त; *जन*—व्यक्तियों के; *अनुगामी*—अनुसरण करते हुए; *कालम्*—समय; *नयेत्*—उपयोग करना चाहिए; *अखिलम्*—सम्पूर्ण; *इति*—इस प्रकार; *उपदेश*—परामर्श अथवा उपदेश का; *सारम्*—सार।", "translation": "**समस्त उपदेशों का सार यह है कि मनुष्य को अपना सम्पूर्ण समय—दिन-रात चौबीसों घण्टे—भगवान् के दिव्य नाम, दिव्य रूप, गुणों एवं नित्य लीलाओं का भली-भाँति कीर्तन एवं स्मरण करने में लगाना चाहिए, और इस प्रकार क्रमशः अपनी जिह्वा एवं मन को संलग्न करना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य को व्रज [गोलोक वृन्दावन धाम] में निवास करना चाहिए और भक्तों के मार्गदर्शन में श्रीकृष्ण की सेवा करनी चाहिए। मनुष्य को भगवान् के उन प्रिय भक्तों के पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए, जो उनकी भक्ति के प्रति गहराई से आसक्त हैं।**", "purport": "चूँकि मन या तो मनुष्य का शत्रु हो सकता है या मित्र, अतः मनुष्य को मन को अपना मित्र बनाने हेतु प्रशिक्षित करना होता है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन विशेष रूप से मन को सदा श्रीकृष्ण के कार्य में संलग्न रहने हेतु प्रशिक्षित करने के लिए है। मन में सैकड़ों एवं सहस्रों संस्कार रहते हैं, न केवल इस जीवन के, अपितु अनेकानेक पूर्व जीवनों के भी। ये संस्कार कभी-कभी एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और विरोधाभासी चित्र उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार मन का कार्य बद्ध आत्मा के लिए संकटपूर्ण बन सकता है। मनोविज्ञान के विद्यार्थी मन के विविध मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों से परिचित हैं। भगवद्गीता (8.6) में कहा गया है:\n\nyaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ\n\ntyajaty ante kalevaram\n\ntaṁ taṁ evaiti kaunteya\n\n*sadā tad*-bhāva-bhāvitaḥ\n\n\"मनुष्य शरीर त्यागते समय जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, उसी-उसी भाव को वह निश्चित रूप से प्राप्त करता है।\"\n\nमृत्यु के समय जीव का मन एवं बुद्धि अगले जीवन हेतु किसी निश्चित प्रकार के शरीर का सूक्ष्म रूप रचते हैं। यदि मन सहसा किसी ऐसी वस्तु का चिन्तन करता है जो बहुत अनुकूल नहीं है, तो मनुष्य को अगले जीवन में उसके अनुरूप जन्म लेना पड़ता है। दूसरी ओर, यदि मनुष्य मृत्यु के समय श्रीकृष्ण का चिन्तन कर सके, तो वह आध्यात्मिक जगत्, गोलोक वृन्दावन, में स्थानान्तरित हो सकता है। देहान्तरण की यह प्रक्रिया अत्यन्त सूक्ष्म है; अतः श्रील रूप गोस्वामी भक्तों को परामर्श देते हैं कि वे अपने मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करें कि वे श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी और का स्मरण न कर सकें। इसी प्रकार, जिह्वा को केवल श्रीकृष्ण के विषय में बोलने हेतु एवं केवल कृष्ण-प्रसाद का आस्वादन करने हेतु प्रशिक्षित करना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी आगे परामर्श देते हैं, तिष्ठन् व्रजे—मनुष्य को वृन्दावन में अथवा व्रजभूमि के किसी भाग में निवास करना चाहिए। व्रजभूमि, अर्थात् वृन्दावन की भूमि, चौरासी क्रोश के क्षेत्र में मानी जाती है। एक क्रोश दो वर्ग मील के बराबर होता है। जब मनुष्य वृन्दावन को अपना निवास बनाता है, तब उसे वहाँ किसी उन्नत भक्त की शरण लेनी चाहिए। इस प्रकार मनुष्य को सदा श्रीकृष्ण एवं उनकी लीलाओं का चिन्तन करना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी ने अपने भक्ति-रसामृत-सिन्धु (1.2.294) में इसकी और व्याख्या की है:\n\nkṛṣṇaṁ smaran janaṁ cāsya\n\n*preṣṭhaṁ nija*-samīhitam\n\n*tat*-tat-kathā-rataś cāsau\n\nkuryād vāsaṁ vraje sadā\n\n\"भक्त को सदा व्रज के दिव्य धाम में निवास करना चाहिए और सदा कृष्णं स्मरन् जनं चास्य प्रेष्ठम्, अर्थात् श्रीकृष्ण एवं उनके प्रिय पार्षदों के स्मरण में संलग्न रहना चाहिए। ऐसे पार्षदों के पदचिह्नों का अनुसरण करके एवं उनके नित्य मार्गदर्शन में प्रवेश करके, मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करने की तीव्र अभिलाषा प्राप्त कर सकता है।\"\n\nश्रील रूप गोस्वामी पुनः भक्ति-रसामृत-सिन्धु (1.2.295) में कहते हैं:\n\n*sevā sādhaka*-rūpeṇa\n\n*siddha*-rūpeṇa cātra hi\n\n*tad*-bhāva-lipsunā kāryā\n\n*vraja*-lokānusārataḥ\n\n\"व्रज के दिव्य धाम [व्रज-धाम] में मनुष्य को परमेश्वर श्रीकृष्ण की सेवा उनके पार्षदों के समान भाव से करनी चाहिए, और उसे स्वयं को श्रीकृष्ण के किसी विशेष पार्षद के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में स्थापित करना चाहिए तथा उसके पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। यह विधि साधन [बन्धन की अवस्था में सम्पन्न आध्यात्मिक साधना] की अवस्था में तथा साध्य [ईश्वर-साक्षात्कार] की अवस्था में, जब मनुष्य सिद्ध-पुरुष, अर्थात् आध्यात्मिक रूप से पूर्ण आत्मा होता है, दोनों में लागू होती है।\"\n\nश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने इस श्लोक पर इस प्रकार टिप्पणी की है: \"जिसने अभी तक कृष्णभावनामृत में रुचि विकसित नहीं की है, उसे समस्त भौतिक उद्देश्यों को त्याग देना चाहिए और प्रगतिशील नियामक सिद्धान्तों का पालन करते हुए, अर्थात् श्रीकृष्ण एवं उनके नाम, रूप, गुण, लीलाओं इत्यादि का जप एवं स्मरण करते हुए, अपने मन को प्रशिक्षित करना चाहिए। इस प्रकार ऐसी वस्तुओं के प्रति रुचि विकसित कर लेने के पश्चात्, मनुष्य को वृन्दावन में निवास करने का प्रयास करना चाहिए और किसी निपुण भक्त के निर्देशन एवं संरक्षण में अपना समय श्रीकृष्ण के नाम, यश, लीलाओं एवं गुणों का निरन्तर स्मरण करते हुए व्यतीत करना चाहिए। भक्ति के अनुशीलन सम्बन्धी समस्त उपदेश का यही सार-तत्त्व है।\n\n\"नवदीक्षित अवस्था में मनुष्य को सदा कृष्ण-कथा के श्रवण में संलग्न रहना चाहिए। यह श्रवण-दशा, अर्थात् श्रवण की अवस्था, कहलाती है। श्रीकृष्ण के दिव्य पवित्र नाम का निरन्तर श्रवण करके एवं उनके दिव्य रूप, गुणों एवं लीलाओं का श्रवण करके, मनुष्य वरण-दशा नामक स्वीकृति की अवस्था तक पहुँच सकता है। जब मनुष्य इस अवस्था को प्राप्त करता है, तब वह कृष्ण-कथा के श्रवण के प्रति आसक्त हो जाता है। जब मनुष्य भावोल्लास में जप करने में समर्थ होता है, तब वह स्मरणावस्था, अर्थात् स्मरण की अवस्था, प्राप्त करता है। स्मृति, तल्लीनता, ध्यान, निरन्तर स्मरण एवं समाधि—ये प्रगतिशील कृष्ण-स्मरण के पाँच अंग हैं। प्रारम्भ में श्रीकृष्ण का स्मरण अन्तराल पर बाधित हो सकता है, किन्तु बाद में स्मरण अबाधित रूप से चलता रहता है। जब स्मरण अबाधित होता है, तब वह एकाग्र हो जाता है और ध्यान कहलाता है। जब ध्यान विस्तृत होकर निरन्तर हो जाता है, तब वह अनुस्मृति कहलाता है। अबाधित एवं अविच्छिन्न अनुस्मृति द्वारा मनुष्य समाधि, अर्थात् आध्यात्मिक समाधि, की अवस्था में प्रवेश करता है। स्मरण-दशा अथवा समाधि के पूर्ण रूप से विकसित हो जाने के पश्चात्, आत्मा अपनी मूल स्वरूपगत स्थिति को समझ लेती है। उस समय वह श्रीकृष्ण के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को पूर्ण एवं स्पष्ट रूप से समझ सकती है। यह सम्पत्ति-दशा, अर्थात् जीवन की पूर्णता, कहलाती है।\n\n\"चैतन्य-चरितामृत नवदीक्षितों को परामर्श देता है कि वे समस्त प्रकार की सोद्देश्य इच्छाओं को त्याग दें और केवल शास्त्र के निर्देशों के अनुसार भगवान् की नियामक भक्ति में संलग्न हों। इस प्रकार नवदीक्षित क्रमशः श्रीकृष्ण के नाम, यश, रूप, गुणों इत्यादि के प्रति आसक्ति विकसित कर सकता है। जब मनुष्य ऐसी आसक्ति विकसित कर लेता है, तब वह नियामक सिद्धान्तों का पालन किए बिना भी स्वतःस्फूर्त रूप से श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा कर सकता है। यह अवस्था राग-भक्ति, अर्थात् स्वतःस्फूर्त प्रेम में की गई भक्ति, कहलाती है। उस अवस्था में भक्त वृन्दावन में श्रीकृष्ण के किसी नित्य पार्षद के पदचिह्नों का अनुसरण कर सकता है। यह रागानुगा-भक्ति कहलाती है। रागानुगा-भक्ति, अर्थात् स्वतःस्फूर्त भक्ति, शान्त-रस में तब सम्पन्न की जा सकती है जब मनुष्य श्रीकृष्ण की गायों के समान, अथवा श्रीकृष्ण के हाथ की छड़ी या बाँसुरी के समान, अथवा श्रीकृष्ण के गले की मालाओं के पुष्पों के समान बनने की अभिलाषा करता है। दास्य-रस में मनुष्य चित्रक, पत्रक अथवा रक्तक जैसे सेवकों के पदचिह्नों का अनुसरण करता है। मैत्रीपूर्ण सख्य-रस में मनुष्य बलदेव, श्रीदामा अथवा सुदामा जैसा मित्र बन सकता है। वात्सल्य-रस में, जो माता-पिता के स्नेह से युक्त है, मनुष्य नन्द महाराज एवं यशोदा जैसा बन सकता है, और माधुर्य-रस में, जो दाम्पत्य प्रेम से युक्त है, मनुष्य श्रीमती राधारानी अथवा उनकी सखियों जैसे ललिता एवं उनकी सेविकाओं (मञ्जरियों) जैसे रूप एवं रति के समान बन सकता है। भक्ति के विषय में समस्त उपदेश का यही सार है।\""}
{"ref": "noi/9", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/9/", "verse_text": "", "devanagari": "> वैकुण्ठाज्जनितो वरा मधुपुरी तत्रापि रासोत्सवाद्\n> वृन्दारण्यमुदारपाणिरमणात्तत्रापि गोवर्धनः ।\n> राधाकुन्डमिहापि गोकुलापतेः प्रेमामृताप्लावनात्\n> कुर्यादस्य विराजतो गिरितटे सेवां विवेकी न् कः ॥९॥", "synonyms": "*वैकुण्ठात्*—वैकुण्ठ, अर्थात् आध्यात्मिक जगत् की अपेक्षा; *जनितः*—जन्म के कारण; *वरा*—श्रेष्ठ; *मधु-पुरी*—मथुरा नामक दिव्य नगरी; *तत्र अपि*—उससे श्रेष्ठ; *रास-उत्सवात्*—रास-लीला के सम्पादन के कारण; *वृन्दा-अरण्यम्*—वृन्दावन का वन; *उदार-पाणि*—भगवान् श्रीकृष्ण की; *रमणात्*—विविध प्रकार की प्रेममयी लीलाओं के कारण; *तत्र अपि*—उससे श्रेष्ठ; *गोवर्धनः*—गोवर्धन पर्वत; *राधा-कुण्डम्*—राधा-कुण्ड नामक स्थान; *इह अपि*—इससे श्रेष्ठ; *गोकुल-पतेः*—गोकुल के स्वामी श्रीकृष्ण के; *प्रेम-अमृत*—दिव्य प्रेम के अमृत से; *आप्लावनात्*—आप्लावित होने के कारण; *कुर्यात्*—करेगा; *अस्य*—इस (राधा-कुण्ड) की; *विराजतः*—स्थित; *गिरि-तटे*—गोवर्धन पर्वत की तलहटी में; *सेवाम्*—सेवा; *विवेकी*—जो बुद्धिमान् है; *न*—नहीं; *कः*—कौन।", "translation": "**मथुरा नामक पवित्र स्थान वैकुण्ठ, अर्थात् दिव्य जगत्, से आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ है, क्योंकि भगवान् वहाँ प्रकट हुए। मथुरा-पुरी से श्रेष्ठ वृन्दावन का दिव्य वन है, क्योंकि वहाँ श्रीकृष्ण की रास-लीला की लीलाएँ हुईं। और वृन्दावन के वन से श्रेष्ठ गोवर्धन पर्वत है, क्योंकि इसे श्रीकृष्ण के दिव्य हाथ ने उठाया था और यह उनकी विविध प्रेममयी लीलाओं का स्थल था। और सबसे बढ़कर, अत्युत्कृष्ट श्रीराधा-कुण्ड सर्वोपरि है, क्योंकि यह गोकुल के स्वामी, श्रीकृष्ण, के अमृतमय सुधामय प्रेम से आप्लावित है। तब फिर वह बुद्धिमान् व्यक्ति कहाँ है जो गोवर्धन पर्वत की तलहटी में स्थित इस दिव्य राधा-कुण्ड की सेवा करने को अनिच्छुक हो?**", "purport": "आध्यात्मिक जगत् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की समस्त सृष्टि का तीन-चौथाई भाग है, और वह सर्वाधिक उत्कृष्ट क्षेत्र है। आध्यात्मिक जगत् स्वभावतः भौतिक जगत् से श्रेष्ठ है; किन्तु मथुरा एवं उससे लगे क्षेत्र, यद्यपि भौतिक जगत् में प्रकट होते हैं, आध्यात्मिक जगत् से श्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वयं मथुरा में प्रकट हुए। वृन्दावन के भीतरी वन मथुरा से श्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि वहाँ बारह वनों (द्वादश-वन) की उपस्थिति है, यथा तालवन, मधुवन एवं बहुलावन, जो भगवान् की विविध लीलाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार भीतरी वृन्दावन-वन मथुरा से श्रेष्ठ माना जाता है, किन्तु इन वनों से श्रेष्ठ दिव्य गोवर्धन पर्वत है, क्योंकि श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को छाते के समान उठा लिया, उसे अपने कमल-सदृश सुन्दर हाथ से ऊपर उठाकर, ताकि वे अपने पार्षदों, अर्थात् व्रजवासियों, को देवताओं के राजा क्रुद्ध इन्द्र द्वारा भेजी गई मूसलाधार वर्षा से रक्षा कर सकें। गोवर्धन पर्वत पर ही श्रीकृष्ण अपने गोप-सखाओं के साथ गायों को चराते हैं, और वहीं उनकी अपनी परम प्रिया श्रीराधा से भेंट हुई एवं उन्होंने उनके साथ प्रेममयी लीलाएँ कीं। गोवर्धन की तलहटी में स्थित राधा-कुण्ड सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वहीं श्रीकृष्ण का प्रेम उमड़ता है। उन्नत भक्त राधा-कुण्ड में निवास करना अधिक पसन्द करते हैं, क्योंकि यह स्थान श्रीकृष्ण एवं राधारानी के बीच की नित्य प्रेम-लीलाओं (रति-विलास) की अनेक स्मृतियों का स्थल है।\n\nचैतन्य-चरितामृत (मध्य-लीला) में कहा गया है कि जब श्रीचैतन्य महाप्रभु ने व्रजभूमि के क्षेत्र में पहली बार पधारे, तब वे आरम्भ में राधा-कुण्ड का स्थान नहीं ढूँढ़ सके। इसका अर्थ है कि श्रीचैतन्य महाप्रभु वस्तुतः राधा-कुण्ड के यथार्थ स्थान को खोज रहे थे। अन्ततः उन्होंने उस पवित्र स्थल को पा लिया, और वहाँ एक छोटा तालाब था। उन्होंने उस छोटे तालाब में स्नान किया और अपने भक्तों से कहा कि वास्तविक राधा-कुण्ड वहीं स्थित है। बाद में उस तालाब को भगवान् चैतन्य के भक्तों ने खुदवाया, जिनमें प्रमुख रूप से पहले छह गोस्वामी थे, यथा रूप एवं रघुनाथ दास। वर्तमान में वहाँ राधा-कुण्ड नामक एक बड़ा सरोवर है। श्रील रूप गोस्वामी ने राधा-कुण्ड पर बहुत बल दिया है, क्योंकि श्रीचैतन्य महाप्रभु की उसे ढूँढ़ने की अभिलाषा थी। तब फिर कौन राधा-कुण्ड को त्यागकर अन्यत्र निवास करने का प्रयास करेगा? दिव्य बुद्धि वाला कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करेगा। किन्तु राधा-कुण्ड के महत्त्व का बोध अन्य वैष्णव सम्प्रदाय नहीं कर सकते, न ही जो लोग भगवान् चैतन्य महाप्रभु की भक्ति में रुचि नहीं रखते, वे राधा-कुण्ड के आध्यात्मिक महत्त्व एवं दिव्य स्वरूप को समझ सकते हैं। इस प्रकार राधा-कुण्ड की मुख्यतः गौड़ीय वैष्णवों द्वारा, अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों द्वारा, आराधना की जाती है।"}
{"ref": "noi/10", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/10/", "verse_text": "", "devanagari": "> कर्मिभ्यः परितो हरेः प्रियतया व्यक्तिं यायुर्ज्ञानिनस्\n> तेभ्यो ज्ञानविमुक्तभक्तिपरमाः प्रेमैकनिष्ठास्ततः ।\n> तेभ्यास्ताः पशुपालपङ्कजदृशस्ताभ्योऽपि सा राधिका\n> प्रेष्ठा तद्वदियं तदीयसरसी तां नाश्रयेत कः कृती ॥१०॥", "synonyms": "*कर्मिभ्यः*—समस्त सकाम कर्मियों की अपेक्षा; *परितः*—सब प्रकार से; *हरेः*—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा; *प्रियतया*—प्रिय होने के कारण; *व्यक्तिं ययुः*—शास्त्र में कहा गया है; *ज्ञानिनः*—जो ज्ञान में उन्नत हैं; *तेभ्यः*—उनसे श्रेष्ठ; *ज्ञान-विमुक्त*—ज्ञान द्वारा मुक्त; *भक्ति-परमाः*—जो भक्ति में संलग्न हैं; *प्रेम-एक-निष्ठाः*—जिन्होंने भगवान् का शुद्ध प्रेम प्राप्त कर लिया है; *ततः*—उनसे श्रेष्ठ; *तेभ्यः*—उनसे श्रेष्ठ; *ताः*—वे; *पशु-पाल-पङ्कज-दृशः*—गोपियाँ, जो सदा गोप-बालक श्रीकृष्ण पर आश्रित रहती हैं; *ताभ्यः*—उन सबसे ऊपर; *अपि*—निश्चय ही; *सा*—वह; *राधिका*—श्रीमती राधिका; *प्रेष्ठा*—अत्यन्त प्रिय; *तद्वत्*—इसी प्रकार; *इयम्*—यह; *तदीय-सरसी*—उनका सरोवर, श्रीराधा-कुण्ड; *ताम्*—राधा-कुण्ड; *न*—नहीं; *आश्रयेत्*—शरण ग्रहण करेगा; *कः*—कौन; *कृती*—सर्वाधिक भाग्यशाली।", "translation": "**शास्त्र में कहा गया है कि समस्त प्रकार के सकाम कर्मियों में से, जो जीवन के उच्चतर मूल्यों के ज्ञान में उन्नत है, वह परमेश्वर हरि का प्रिय होता है। ज्ञान में उन्नत ऐसे अनेक लोगों [ज्ञानियों] में से, जो अपने ज्ञान के बल पर व्यावहारिक रूप से मुक्त हो, वह भक्ति को अपना सकता है। वह अन्य लोगों से श्रेष्ठ है। किन्तु जिसने वास्तव में प्रेम, अर्थात् श्रीकृष्ण का शुद्ध प्रेम, प्राप्त कर लिया है, वह उससे श्रेष्ठ है। गोपियाँ समस्त उन्नत भक्तों से ऊपर उत्कृष्ट हैं, क्योंकि वे सदा पूर्ण रूप से दिव्य गोप-बालक श्रीकृष्ण पर आश्रित रहती हैं। गोपियों में, श्रीमती राधारानी श्रीकृष्ण को सबसे प्रिय हैं। उनका कुण्ड [सरोवर] भगवान् श्रीकृष्ण को उतना ही गहराई से प्रिय है जितनी गोपियों में यह सर्वाधिक प्रिया। तब फिर कौन ऐसा होगा जो राधा-कुण्ड में निवास न करे और भावोल्लासपूर्ण भक्ति-भावों से ओतप्रोत आध्यात्मिक शरीर [अप्राकृत-भाव] में, उस दिव्य युगल श्रीश्री राधा-गोविन्द की प्रेममयी सेवा न करे, जो अपनी अष्टकालीय-लीला, अर्थात् अपनी नित्य अष्ट प्रहर की दैनिक लीलाएँ, सम्पन्न करते हैं। वस्तुतः जो राधा-कुण्ड के तट पर भक्ति सम्पन्न करते हैं, वे ब्रह्माण्ड में सर्वाधिक भाग्यशाली व्यक्ति हैं।**", "purport": "इस समय लगभग प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के सकाम कर्म में संलग्न है। जो लोग कर्म करके भौतिक लाभ प्राप्त करने के इच्छुक हैं, वे कर्मी, अर्थात् सकाम कर्मी, कहलाते हैं। इस भौतिक जगत् के भीतर समस्त जीव माया के वशीभूत हो गए हैं। इसका वर्णन विष्णु पुराण (6.7.61) में हुआ है:\n\nviṣṇu-śaktiḥ parā proktā\n\nkṣetrajñākhyā tathā parā\n\n*avidyā*-karma-saṁjñānyā\n\ntṛtīyā śaktir iṣyate\n\n[Cc. Madhya 6.154]\n\nऋषियों ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शक्तियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है—अर्थात् आध्यात्मिक शक्ति, तटस्थ शक्ति एवं भौतिक शक्ति। भौतिक शक्ति तृतीय-श्रेणी की शक्ति (तृतीया शक्तिः) मानी जाती है। भौतिक शक्ति के अधिकार-क्षेत्र के भीतर रहने वाले वे जीव कभी-कभी कुत्तों एवं सूकरों के समान केवल इन्द्रियतृप्ति के लिए अत्यन्त कठोर परिश्रम में संलग्न रहते हैं। किन्तु इस जीवन में, अथवा पुण्य कर्म करने के पश्चात्, अगले जीवन में, कुछ कर्मी वेदों में वर्णित विविध प्रकार के यज्ञों को सम्पन्न करने के प्रति प्रबल रूप से आकृष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार अपने पुण्य के बल पर, वे स्वर्गलोकों में उन्नत किए जाते हैं। वस्तुतः जो लोग वैदिक विधानों के अनुसार ठीक-ठीक यज्ञ करते हैं, वे चन्द्रलोक एवं चन्द्र से ऊपर के लोकों में उन्नत किए जाते हैं। जैसा कि भगवद्गीता (9.21) में कहा गया है, क्षीणे पुण्ये मर्त्य-लोकं विशन्ति—अपने तथाकथित पुण्य कर्मों के फल समाप्त होने पर, वे पुनः पृथ्वी पर लौट आते हैं, जो मर्त्य-लोक, अर्थात् मृत्यु का स्थान, कहलाती है। यद्यपि ऐसे व्यक्ति अपने पुण्य कर्मों द्वारा स्वर्गलोकों में उन्नत किए जा सकते हैं और यद्यपि वे वहाँ अनेक सहस्र वर्षों तक जीवन का भोग कर सकते हैं, तथापि अपने पुण्य कर्मों के फल समाप्त होने पर उन्हें इस लोक में लौटना ही पड़ता है।\n\nसमस्त कर्मियों की यही स्थिति है, उनकी भी जो पुण्य करते हैं और उनकी भी जो पाप करते हैं। इस लोक में हमें अनेक व्यवसायी, राजनीतिज्ञ एवं अन्य ऐसे लोग मिलते हैं जो केवल भौतिक सुख में रुचि रखते हैं। वे हर प्रकार से धन कमाने का प्रयास करते हैं, यह विचार किए बिना कि ऐसे साधन पुण्यमय हैं या पापमय। ऐसे लोग कर्मी, अर्थात् घोर भौतिकतावादी, कहलाते हैं। कर्मियों में कुछ विकर्मी होते हैं, अर्थात् ऐसे लोग जो वैदिक ज्ञान के मार्गदर्शन के बिना कर्म करते हैं। जो लोग वैदिक ज्ञान के आधार पर कर्म करते हैं, वे भगवान् विष्णु की तुष्टि हेतु एवं उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु यज्ञ करते हैं। इस प्रकार वे उच्चतर लोकों में उन्नत किए जाते हैं। ऐसे कर्मी विकर्मियों से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे वेदों के निर्देशों के प्रति निष्ठावान् हैं और निश्चय ही श्रीकृष्ण को प्रिय हैं। भगवद्गीता (4.11) में श्रीकृष्ण कहते हैं: ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस् तथैव भजाम्य् अहम्। \"जो जिस प्रकार मेरी शरण लेता है, मैं उसे उसी प्रकार फल देता हूँ।\" श्रीकृष्ण इतने कृपालु हैं कि उन्होंने कर्मियों एवं ज्ञानियों की इच्छाएँ पूर्ण कीं, भक्तों की तो बात ही क्या। यद्यपि कर्मी कभी-कभी उच्चतर लोकों में उन्नत किए जाते हैं, तथापि जब तक वे सकाम कर्म के प्रति आसक्त रहते हैं, तब तक उन्हें मृत्यु के पश्चात् नए भौतिक शरीर ग्रहण करने ही पड़ते हैं। यदि कोई पुण्य कर्म करता है, तो वह उच्चतर लोकों में देवताओं के बीच नया शरीर प्राप्त कर सकता है, अथवा वह कोई अन्य स्थिति प्राप्त कर सकता है जिसमें वह भौतिक सुख के उच्चतर स्तर का भोग कर सके। दूसरी ओर, जो लोग पाप कर्मों में संलग्न हैं, वे पतित हो जाते हैं और पशुओं, वृक्षों एवं पौधों के रूप में जन्म लेते हैं। इस प्रकार वे सकाम कर्ता जो वैदिक निर्देशों की परवाह नहीं करते (विकर्मी), विद्वान् सन्त-पुरुषों द्वारा सराहे नहीं जाते। जैसा कि श्रीमद्भागवत (5.5.4) में कहा गया है:\n\nnūnaṁ pramattaḥ kurute vikarma\n\n*yad indriya*-prītaya āpṛṇoti\n\nna sādhu manye yata ātmano 'yam\n\nasann api kleśada āsa dehaḥ\n\n\"वे भौतिकतावादी जो कुत्तों एवं सूकरों के समान केवल इन्द्रियतृप्ति के लिए कठोर परिश्रम करते हैं, वस्तुतः उन्मत्त हैं। वे केवल इन्द्रियतृप्ति के लिए ही समस्त प्रकार के गर्हित कर्म करते हैं। भौतिकतावादी कर्म बुद्धिमान् मनुष्य के लिए तनिक भी योग्य नहीं हैं, क्योंकि ऐसे कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य को एक भौतिक शरीर मिलता है, जो दुःख से भरा होता है।\" मानव जीवन का प्रयोजन उन त्रिविध दुःखमय अवस्थाओं से बाहर निकलना है, जो भौतिक अस्तित्व के साथ अनिवार्यतः जुड़ी हैं। दुर्भाग्यवश, सकाम कर्मी हर प्रकार से धन कमाने एवं क्षणिक भौतिक सुख-सुविधाएँ अर्जित करने के लिए उन्मत्त हैं; अतः वे जीवन की निम्नतर योनियों में पतित होने का जोखिम उठाते हैं। भौतिकतावादी मूर्खतापूर्वक इस भौतिक जगत् में सुखी होने की अनेक योजनाएँ बनाते हैं। वे यह विचार करने के लिए नहीं रुकते कि वे केवल कुछ ही वर्ष जीवित रहेंगे, जिनमें से उन्हें अधिकांश भाग इन्द्रियतृप्ति के लिए धन अर्जित करने में व्यतीत करना पड़ता है। अन्ततः ऐसे कर्म मृत्यु में समाप्त होते हैं। भौतिकतावादी यह विचार नहीं करते कि शरीर त्यागने के पश्चात् वे निम्नतर पशुओं, पौधों अथवा वृक्षों के रूप में देहधारी हो सकते हैं। इस प्रकार उनके समस्त कर्म जीवन के प्रयोजन को ही विफल कर देते हैं। वे न केवल अज्ञानी जन्म लेते हैं, अपितु अज्ञान के स्तर पर ही कर्म करते हैं, यह सोचते हुए कि वे गगनचुम्बी भवनों, बड़ी कारों, सम्मानित पदों इत्यादि के रूप में भौतिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। भौतिकतावादी यह नहीं जानते कि अगले जीवन में वे पतित होंगे और उनके समस्त कर्म केवल पराभव, अर्थात् उनकी पराजय, के रूप में ही काम आते हैं। यही श्रीमद्भागवत (5.5.5) का निर्णय है: पराभवस् तावद् अबोध जातः।\n\nअतः मनुष्य को आत्मा के विज्ञान (आत्म-तत्त्व) को समझने हेतु उत्सुक होना चाहिए। जब तक मनुष्य आत्म-तत्त्व के स्तर पर नहीं आता, जिसके द्वारा वह यह समझता है कि आत्मा ही, न कि शरीर, वह स्वयं है, तब तक वह अज्ञान के स्तर पर ही रहता है। सहस्रों एवं लाखों अज्ञानी लोगों में से, जो केवल अपनी इन्द्रियों को तृप्त करते हुए अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं, कोई एक ज्ञान के स्तर पर आ सकता है और जीवन के उच्चतर मूल्यों को समझ सकता है। ऐसा व्यक्ति ज्ञानी कहलाता है। ज्ञानी जानता है कि सकाम कर्म उसे भौतिक अस्तित्व में बाँधेंगे और उसे एक प्रकार के शरीर से दूसरे प्रकार के शरीर में देहान्तरण कराएँगे। जैसा कि श्रीमद्भागवत में शरीर-बन्ध (देह-अस्तित्व में बद्ध) शब्द से इंगित किया गया है, जब तक मनुष्य इन्द्रिय-भोग की कोई भी धारणा बनाए रखता है, तब तक उसका मन कर्म, अर्थात् सकाम क्रिया, में लीन रहेगा, और यह उसे एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण के लिए बाध्य करेगा।\n\nइस प्रकार ज्ञानी को कर्मी से श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि वह कम से कम इन्द्रिय-भोग की अन्धी क्रियाओं से विरत रहता है। यही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का निर्णय है। किन्तु यद्यपि ज्ञानी कर्मियों के अज्ञान से मुक्त हो सकता है, तथापि जब तक वह भक्ति के स्तर पर नहीं आता, तब तक वह अभी भी अज्ञान (अविद्या) में ही माना जाता है। यद्यपि मनुष्य को ज्ञानी, अर्थात् ज्ञान में उन्नत, के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, तथापि उसका ज्ञान अशुद्ध माना जाता है, क्योंकि उसके पास भक्ति की कोई जानकारी नहीं है और इस प्रकार वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों की प्रत्यक्ष आराधना की उपेक्षा करता है।\n\nजब ज्ञानी भक्ति को अपनाता है, तब वह शीघ्र ही एक सामान्य ज्ञानी से श्रेष्ठ बन जाता है। ऐसे उन्नत व्यक्ति को ज्ञान-विमुक्त-भक्ति-परम के रूप में वर्णित किया जाता है। ज्ञानी किस प्रकार भक्ति को अपनाता है, इसका उल्लेख भगवद्गीता (7.19) में हुआ है, जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nbahūnāṁ janmanām ante\n\njñānavān māṁ prapadyate\n\nvāsudevaḥ sarvam iti\n\nsa mahātmā sudurlabhaḥ\n\n\"अनेक जन्मों एवं मृत्युओं के पश्चात्, जो वास्तव में ज्ञानवान् है, वह मुझे समस्त कारणों का कारण एवं सब कुछ जानकर मेरी शरण लेता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।\" वस्तुतः मनुष्य तब बुद्धिमान् होता है जब वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण लेता है, किन्तु ऐसा महात्मा, अर्थात् महान् आत्मा, अत्यन्त दुर्लभ है।\n\nनियामक सिद्धान्तों के अन्तर्गत भक्ति को अपनाने के पश्चात्, मनुष्य नारद एवं सनक एवं सनातन जैसे महान् भक्तों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, भगवत्प्रेम की स्वतःस्फूर्त अवस्था तक पहुँच सकता है। तब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् उसे श्रेष्ठ मान लेते हैं। जिन भक्तों ने भगवत्प्रेम विकसित कर लिया है, वे निश्चय ही एक उत्कृष्ट स्थिति में हैं।\n\nइन समस्त भक्तों में से, गोपियाँ श्रेष्ठ मानी जाती हैं, क्योंकि वे श्रीकृष्ण को तृप्त करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानतीं। न ही गोपियाँ श्रीकृष्ण से किसी प्रतिफल की अपेक्षा करती हैं। वस्तुतः कभी-कभी श्रीकृष्ण स्वयं को उनसे पृथक् करके उन्हें अत्यधिक दुःख में डाल देते हैं। फिर भी, वे श्रीकृष्ण को भूल नहीं सकतीं। जब श्रीकृष्ण ने मथुरा के लिए वृन्दावन छोड़ा, तब गोपियाँ अत्यन्त खिन्न हो गईं और उन्होंने अपना शेष जीवन केवल श्रीकृष्ण के वियोग में रोते हुए व्यतीत किया। इसका अर्थ है कि एक अर्थ में वे श्रीकृष्ण से वास्तव में कभी पृथक् नहीं हुईं। श्रीकृष्ण का चिन्तन करने एवं उनके संग रहने में कोई भेद नहीं है। अपितु विप्रलम्भ-सेवा, अर्थात् वियोग में श्रीकृष्ण का चिन्तन करना, जैसा कि श्रीचैतन्य महाप्रभु ने किया, श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष सेवा करने से कहीं श्रेष्ठ है। इस प्रकार उन समस्त भक्तों में से जिन्होंने श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति-प्रेम विकसित कर लिया है, गोपियाँ सर्वाधिक उत्कृष्ट हैं, और इन समस्त उत्कृष्ट गोपियों में से, श्रीमती राधारानी सर्वोच्च हैं। श्रीमती राधारानी की भक्ति को कोई नहीं लाँघ सकता। वस्तुतः श्रीकृष्ण भी श्रीमती राधारानी के भाव को नहीं समझ सकते; अतः उन्होंने उनकी स्थिति ग्रहण की और श्रीचैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए, केवल उनके दिव्य भावों को समझने के लिए।\n\nइस प्रकार श्रील रूप गोस्वामी क्रमशः यह निष्कर्ष निकालते हैं कि श्रीमती राधारानी श्रीकृष्ण की सर्वाधिक उत्कृष्ट भक्त हैं और उनका कुण्ड (सरोवर), श्रीराधा-कुण्ड, सर्वाधिक उत्कृष्ट स्थान है। इसकी पुष्टि लघु-भागवतामृत (उत्तर-खण्ड 45) के एक उद्धरण में होती है, जैसा कि चैतन्य-चरितामृत में उद्धृत किया गया है:\n\nyathā rādhā priyā viṣṇos\n\ntasyāḥ kuṇḍaṁ priyaṁ tathā\n\n*sarva*-gopīṣu saivaikā\n\n*viṣṇor atyanta*-vallabhā\n\n\"जिस प्रकार श्रीमती राधारानी परमेश्वर श्रीकृष्ण [विष्णु] को प्रिय हैं, उसी प्रकार उनका स्नान-स्थल [राधा-कुण्ड] श्रीकृष्ण को समान रूप से प्रिय है। समस्त गोपियों में, केवल वही भगवान् की सर्वाधिक प्रिया के रूप में सर्वोपरि हैं।\"\n\nअतः कृष्णभावनामृत में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अन्ततः राधा-कुण्ड की शरण लेनी चाहिए और वहाँ अपने सम्पूर्ण जीवन भर भक्ति सम्पन्न करनी चाहिए। उपदेशामृत के दसवें श्लोक में रूप गोस्वामी का यही निष्कर्ष है।"}
{"ref": "noi/11", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/11/", "verse_text": "", "devanagari": "> कृष्णस्योच्चैः प्रणयवसतिः प्रेयसीभ्योपि राधा \n> कुंडम चास्या मुनिभिरभितस्तादृगेव व्याधायि ।\n> यत्प्रेष्ठैरप्यलमसुलभं किं पुनर्भक्तिभाजाम\n> तत्प्रेमेदं सकृदपि सरः स्नातुराविष्करोति ॥११॥", "synonyms": "*कृष्णस्य*—भगवान् श्रीकृष्ण का; *उच्चैः*—अत्यन्त उच्च रूप से; *प्रणय-वसतिः*—प्रेम का पात्र; *प्रेयसीभ्यः*—अनेक प्रेमपात्र गोपियों में से; *अपि*—निश्चय ही; *राधा*—श्रीमती राधारानी; *कुण्डम्*—सरोवर; *च*—भी; *अस्याः*—उनका; *मुनिभिः*—महान् ऋषियों द्वारा; *अभितः*—सब प्रकार से; *तादृक् एव*—इसी प्रकार; *व्यधायि*—वर्णित है; *यत्*—जो; *प्रेष्ठैः*—सर्वाधिक उन्नत भक्तों द्वारा; *अपि*—भी; *अलम्*—पर्याप्त; *असुलभम्*—प्राप्त करने में कठिन; *किम्*—क्या; *पुनः*—पुनः; *भक्ति-भाजाम्*—भक्ति में संलग्न व्यक्तियों के लिए; *तत्*—वह; *प्रेम*—भगवत्प्रेम; *इदम्*—यह; *सकृत्*—एक बार; *अपि*—भी; *सरः*—सरोवर; *स्नातुः*—जिसने स्नान किया है उसका; *आविष्करोति*—जगा देता है।", "translation": "**प्रिय आनन्द के अनेक पात्रों में से एवं व्रजभूमि की समस्त प्रेमपात्र गोपियों में से, श्रीमती राधारानी निश्चय ही श्रीकृष्ण के प्रेम का सर्वाधिक मूल्यवान् पात्र हैं। और सब प्रकार से, उनका दिव्य कुण्ड महान् ऋषियों द्वारा उनके समान ही श्रीकृष्ण को प्रिय वर्णित किया गया है। निःसन्देह राधा-कुण्ड महान् भक्तों के द्वारा भी अत्यन्त विरल रूप से प्राप्त होता है; अतः सामान्य भक्तों के लिए उसे प्राप्त करना और भी कठिन है। यदि मनुष्य उन पवित्र जलों में केवल एक बार भी स्नान कर ले, तो श्रीकृष्ण के प्रति उसका शुद्ध प्रेम पूर्ण रूप से जाग उठता है।**", "purport": "राधा-कुण्ड इतना उत्कृष्ट क्यों है? यह सरोवर इसलिए इतना उत्कृष्ट है, क्योंकि यह श्रीमती राधारानी का है, जो श्रीकृष्ण की सर्वाधिक प्रिया हैं। समस्त गोपियों में, वे सर्वाधिक प्रिया हैं। इसी प्रकार, उनका सरोवर, श्रीराधा-कुण्ड, भी महान् ऋषियों द्वारा उस सरोवर के रूप में वर्णित किया गया है जो श्रीकृष्ण को उतना ही प्रिय है जितनी स्वयं राधा। वस्तुतः राधा-कुण्ड एवं श्रीमती राधारानी के प्रति श्रीकृष्ण का प्रेम सब प्रकार से समान है। राधा-कुण्ड अत्यन्त विरल रूप से प्राप्त होता है, भक्ति में पूर्ण रूप से संलग्न महान् विभूतियों द्वारा भी, फिर उन सामान्य भक्तों की तो बात ही क्या जो केवल वैधी भक्ति के अभ्यास में संलग्न हैं।\n\nकहा गया है कि यदि कोई भक्त राधा-कुण्ड में एक बार स्नान कर ले, तो वह तत्काल गोपियों के अनुसरण में श्रीकृष्ण का शुद्ध प्रेम विकसित कर लेगा। श्रील रूप गोस्वामी यह अनुशंसा करते हैं कि भले ही मनुष्य राधा-कुण्ड के तट पर स्थायी रूप से निवास न कर सके, उसे कम से कम यथासम्भव अधिक से अधिक बार सरोवर में स्नान करना चाहिए। भक्ति के सम्पादन में यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर इस सन्दर्भ में लिखते हैं कि श्रीराधा-कुण्ड उन लोगों के लिए सर्वाधिक चयनित स्थान है, जो श्रीमती राधारानी की सखियों (सखियों) एवं गोपनीय सेविकाओं (मञ्जरियों) के अनुसरण में अपनी भक्ति को उन्नत करने में रुचि रखते हैं। जो जीव अपने आध्यात्मिक शरीरों (सिद्ध-देह) की प्राप्ति के द्वारा भगवान् के दिव्य राज्य, गोलोक वृन्दावन, में अपने घर लौटने के लिए उत्सुक हैं, उन्हें राधा-कुण्ड में निवास करना चाहिए, श्रीराधा की गोपनीय सेविकाओं की शरण लेनी चाहिए\n\nऔर उनके निर्देशन में निरन्तर उनकी सेवा में संलग्न रहना चाहिए। श्रीचैतन्य महाप्रभु के संरक्षण में भक्ति में संलग्न लोगों के लिए यह सर्वाधिक उत्कृष्ट विधि है। इस सन्दर्भ में श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर लिखते हैं कि नारद एवं सनक जैसे महान् ऋषियों एवं महान् भक्तों को भी राधा-कुण्ड में आकर अपना स्नान करने का अवसर प्राप्त नहीं होता। तब फिर सामान्य भक्तों की तो बात ही क्या? यदि किसी को महान् सौभाग्य से राधा-कुण्ड में आकर एक बार भी स्नान करने का अवसर मिल जाए, तो वह श्रीकृष्ण के प्रति अपना दिव्य प्रेम ठीक वैसे ही विकसित कर सकता है, जैसे गोपियों ने किया। यह भी अनुशंसित है कि मनुष्य को राधा-कुण्ड के तट पर निवास करना चाहिए और भगवान् की प्रेममयी सेवा में तल्लीन रहना चाहिए। उसे वहाँ नियमित रूप से स्नान करना चाहिए और समस्त भौतिक धारणाओं को त्यागकर श्रीराधा एवं उनकी सहायक गोपियों की शरण लेनी चाहिए। यदि मनुष्य इस प्रकार अपने जीवनकाल में निरन्तर संलग्न रहे, तो शरीर त्यागने के पश्चात् वह श्रीराधा की सेवा करने हेतु ठीक उसी प्रकार भगवद्धाम लौटेगा, जैसा उसने राधा-कुण्ड के तट पर अपने जीवन के दौरान चिन्तन किया था। निष्कर्ष यह है कि राधा-कुण्ड के तट पर निवास करना एवं वहाँ प्रतिदिन स्नान करना भक्ति की उच्चतम पूर्णता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसे प्राप्त करना नारद जैसे महान् ऋषियों एवं भक्तों के लिए भी कठिन है। इस प्रकार श्रीराधा-कुण्ड की महिमा की कोई सीमा नहीं है। राधा-कुण्ड की सेवा करके मनुष्य गोपियों के नित्य मार्गदर्शन में श्रीमती राधारानी की सहायिका बनने का अवसर प्राप्त कर सकता है।"}
{"ref": "noi/0a", "book": "noi", "lang": "hi", "url": "/hi/library/noi/0a/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "कृष्णभावनामृत आन्दोलन श्रील रूप गोस्वामी के निर्देशन में सञ्चालित होता है। गौड़ीय वैष्णव, अथवा बंगाली वैष्णव, अधिकांशतः श्रीचैतन्य महाप्रभु के अनुयायी हैं, जिनके साक्षात् शिष्य वृन्दावन के छह गोस्वामी हैं। अतः श्रील नरोत्तम दास ठाकुर ने गाया है:", "purport": "rūpa-raghunātha-pade ha-ibe ākuti\n\nkabe hāma bujhaba se yugala-pīriti\n\n\"जब मुझमें गोस्वामियों द्वारा प्रदत्त साहित्य को समझने की उत्कट अभिलाषा जागेगी, तब मैं राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम-प्रसंगों को समझ सकूँगा।\" श्रीचैतन्य महाप्रभु मानव-समाज को कृष्ण-विज्ञान का वरदान प्रदान करने हेतु अवतरित हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की समस्त लीलाओं में सर्वोत्कृष्ट लीला गोपियों के साथ उनकी माधुर्य-प्रेम-लीला है। श्रीचैतन्य महाप्रभु गोपियों में श्रेष्ठ श्रीमती राधारानी के भाव में अवतरित हुए। अतएव भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के मिशन को समझने तथा उनके पदचिह्नों पर चलने के लिए मनुष्य को छह गोस्वामियों—श्रीरूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्रीजीव, गोपाल भट्ट तथा दास रघुनाथ—के पदचिह्नों का अत्यन्त गम्भीरता से अनुसरण करना चाहिए।\n\nश्रीरूप गोस्वामी समस्त गोस्वामियों के नायक थे, और हमारे कार्यों का मार्गदर्शन करने हेतु उन्होंने हमें अनुसरण करने के लिए यह उपदेशामृत (*उपदेशामृत*) प्रदान किया। जिस प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभु अपने पीछे शिक्षाष्टक नामक आठ श्लोक छोड़ गए, उसी प्रकार रूप गोस्वामी ने हमें उपदेशामृत प्रदान किया, ताकि हम शुद्ध वैष्णव बन सकें।\n\nसमस्त आध्यात्मिक कार्यों में मनुष्य का प्रथम कर्तव्य अपने मन तथा इन्द्रियों का नियन्त्रण करना है। जब तक मनुष्य अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में नहीं करता, तब तक वह आध्यात्मिक जीवन में कोई उन्नति नहीं कर सकता। इस भौतिक जगत् में प्रत्येक प्राणी रजोगुण तथा तमोगुण में लीन है। मनुष्य को रूप गोस्वामी के निर्देशों का अनुसरण करते हुए स्वयं को सत्त्वगुण के स्तर तक उन्नत करना चाहिए, और तब आगे की प्रगति कैसे करनी है, इससे सम्बन्धित सब कुछ प्रकट हो जाएगा।\n\nकृष्णभावनामृत में उन्नति अनुयायी की मनोवृत्ति पर निर्भर करती है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन के अनुयायी को एक पूर्ण गोस्वामी बनना चाहिए। वैष्णव सामान्यतः गोस्वामी के रूप में जाने जाते हैं। वृन्दावन में प्रत्येक मन्दिर का संचालक इसी उपाधि से जाना जाता है। जो कृष्ण का पूर्ण भक्त बनना चाहता है, उसे गोस्वामी बनना चाहिए। *गो* का अर्थ है \"इन्द्रियाँ\", और *स्वामी* का अर्थ है \"स्वामी\"। जब तक मनुष्य अपनी इन्द्रियों तथा मन को वश में नहीं करता, तब तक वह गोस्वामी नहीं बन सकता। गोस्वामी और तत्पश्चात् भगवान् का शुद्ध भक्त बनकर जीवन की सर्वोच्च सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को उपदेशामृत नामक उन निर्देशों का अनुसरण करना चाहिए, जो श्रील रूप गोस्वामी द्वारा प्रदान किए गए हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने *भक्ति-रसामृत-सिन्धु*, विदग्ध-माधव तथा ललित-माधव जैसे अनेक अन्य ग्रन्थ भी दिए हैं, किन्तु उपदेशामृत नवदीक्षित भक्तों के लिए प्रथम निर्देश हैं। मनुष्य को इन निर्देशों का अत्यन्त कठोरता से पालन करना चाहिए। तब अपने जीवन को सफल बनाना सरल हो जाएगा। हरे कृष्ण।\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी\n\nविश्वरूप-महोत्सव\n\nकृष्ण-बलराम मन्दिर\n\nरमण-रेति\n\nवृन्दावन, भारत"}
