{"ref": "owk/1", "book": "owk", "lang": "hi", "url": "/hi/library/owk/1/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "सुख की ओर राजमार्ग", "purport": "हम में से प्रत्येक सुख की खोज में लगा है, किन्तु हम यह नहीं जानते कि वास्तविक सुख क्या है। हम सुख के विषय में इतना विज्ञापन देखते हैं, किन्तु व्यावहारिक रूप से हमें इतने कम सुखी मनुष्य दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि अत्यल्प मनुष्य ही यह जानते हैं कि वास्तविक सुख का स्तर क्षणभंगुर वस्तुओं से परे है। यही वास्तविक सुख है, जिसका वर्णन भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से *भगवद्गीता* में किया है।\n\nसुख का अनुभव प्रायः हमारी इन्द्रियों के माध्यम से होता है। उदाहरणार्थ, पत्थर की कोई इन्द्रियाँ नहीं हैं और वह सुख-दुःख का अनुभव नहीं कर सकता। विकसित चेतना अविकसित चेतना की अपेक्षा सुख-दुःख का अधिक तीव्रता से अनुभव कर सकती है। वृक्षों में चेतना होती है, किन्तु वह विकसित नहीं होती। वृक्ष सब प्रकार के मौसम में दीर्घकाल तक खड़े रह सकते हैं, किन्तु उनके पास दुःखों के अनुभव का कोई साधन नहीं होता। यदि किसी मनुष्य से कहा जाए कि वह वृक्ष की भाँति केवल तीन दिन अथवा उससे भी कम समय खड़ा रहे, तो वह उसे सहन नहीं कर सकेगा। निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक प्राणी अपनी चेतना के विकास की मात्रा के अनुसार सुख अथवा दुःख का अनुभव करता है।\n\nभौतिक जगत् में हमें जो सुख अनुभव होता है, वह वास्तविक सुख नहीं है। यदि किसी वृक्ष से पूछा जाए, \"क्या तुम सुख का अनुभव कर रहे हो?\" तो वृक्ष, यदि कह सकता, तो शायद कहता, \"हाँ, मैं सुखी हूँ, यहाँ वर्ष भर खड़ा हूँ। मैं वायु तथा हिमपात का भली-भाँति आनन्द ले रहा हूँ, इत्यादि।\" वृक्ष इसका आनन्द भले ही ले, किन्तु मनुष्य के लिए यह भोग का अत्यन्त निम्न स्तर है। जीवों के विभिन्न प्रकार तथा श्रेणियाँ हैं, और सुख की उनकी धारणाएँ तथा अनुभूतियाँ भी सब भिन्न-भिन्न प्रकार तथा श्रेणी की होती हैं। यद्यपि एक पशु यह देख सकता है कि दूसरे पशु का वध हो रहा है, फिर भी वह घास चबाता ही रहता है, क्योंकि उसमें यह समझने का ज्ञान नहीं होता कि अगली बारी उसकी हो सकती है। वह सोचता है कि वह सुखी है, किन्तु अगले ही क्षण उसका वध हो सकता है।\n\nइस प्रकार सुख की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। तथापि इन सबमें सर्वोच्च सुख कौन-सा है? श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:\n\nsukham ātyantikaṁ yat tad\n\nbuddhi-grāhyam atīndriyam\n\nvetti yatra na caivāyaṁ\n\nsthitaś calati tattvataḥ\n\n\"उस आनन्दमय अवस्था (समाधि) में मनुष्य असीम दिव्य सुख में स्थित रहता है और दिव्य इन्द्रियों के माध्यम से आनन्द का अनुभव करता है। इस प्रकार स्थित होकर वह सत्य से कभी विचलित नहीं होता।\" (गीता 6.21)\n\nबुद्धि का अर्थ है मेधा; यदि कोई आनन्द लेना चाहता है, तो उसे बुद्धिमान होना चाहिए। पशुओं में वास्तव में विकसित बुद्धि नहीं होती और इसीलिए वे जीवन का वैसा आनन्द नहीं ले सकते जैसा एक मनुष्य ले सकता है। हाथ, नाक, आँखें, अन्य इन्द्रियाँ तथा सभी अंग एक मृत व्यक्ति में भी विद्यमान रह सकते हैं, किन्तु वह आनन्द नहीं ले सकता। क्यों नहीं? आनन्द लेने वाली ऊर्जा, अर्थात् आध्यात्मिक स्फुलिंग चली गई है, और इसीलिए शरीर में कोई शक्ति नहीं रही। यदि कोई थोड़ी बुद्धि से इस विषय पर अधिक विचार करे, तो वह समझ सकता है कि आनन्द ले रहा शरीर कभी था ही नहीं, अपितु उसके भीतर स्थित वह सूक्ष्म आध्यात्मिक स्फुलिंग ही आनन्द ले रही थी। यद्यपि मनुष्य सोच सकता है कि वह शारीरिक इन्द्रियों से आनन्द ले रहा है, किन्तु वास्तविक भोक्ता वही आध्यात्मिक स्फुलिंग है। उस स्फुलिंग में आनन्द की सामर्थ्य सदा रहती है, किन्तु भौतिक आवरण से ढके होने के कारण वह सदा प्रकट नहीं होती। यद्यपि हमें इसका बोध न हो, किन्तु इस आध्यात्मिक स्फुलिंग की उपस्थिति के बिना शरीर के लिए आनन्द का अनुभव करना सम्भव नहीं है। यदि किसी पुरुष को एक सुन्दर स्त्री का मृत शरीर भेंट किया जाए, तो क्या वह उसे स्वीकार करेगा? नहीं, क्योंकि आध्यात्मिक स्फुलिंग शरीर से बाहर निकल चुकी है। वह न केवल शरीर के भीतर आनन्द ले रही थी, अपितु शरीर का पालन भी कर रही थी। जब वह स्फुलिंग चली जाती है, तो शरीर बस सड़-गल जाता है।\n\nइससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि आत्मा आनन्द लेती है, तो उसकी अपनी इन्द्रियाँ भी अवश्य होंगी, अन्यथा वह आनन्द कैसे ले सकती है? *वेद* इसकी पुष्टि करते हैं कि आत्मा, यद्यपि आकार में अणु-तुल्य है, फिर भी वही वास्तविक भोक्ता है। आत्मा को मापना सम्भव नहीं है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह आयाम-रहित है। कोई वस्तु हमें एक बिन्दु से बड़ी प्रतीत न हो और उसकी कोई लम्बाई या चौड़ाई न जान पड़े, किन्तु जब हम उसे सूक्ष्मदर्शी के नीचे देखते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि उसमें लम्बाई तथा चौड़ाई दोनों हैं। इसी प्रकार आत्मा के भी अपने आयाम हैं, किन्तु हम उन्हें अनुभव नहीं कर सकते। जब हम कोई पोशाक या वस्त्र क्रय करते हैं, तो वह शरीर के अनुरूप बनाया जाता है। आध्यात्मिक स्फुलिंग का अवश्य कोई रूप होगा, अन्यथा भौतिक शरीर उसके अनुरूप समाने हेतु कैसे विकसित हुआ? निष्कर्ष यह है कि आध्यात्मिक स्फुलिंग निर्विशेष नहीं है। वह एक वास्तविक व्यक्ति है। ईश्वर एक वास्तविक व्यक्ति हैं, और आध्यात्मिक स्फुलिंग, जो उनका एक अंश है, वह भी एक व्यक्ति है। यदि पिता में व्यक्तित्व तथा वैयक्तिकता है, तो पुत्र में भी वे होती हैं; और यदि पुत्र में वे हैं, तो हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पिता में भी वे हैं। अतः हम, ईश्वर के पुत्रों के रूप में, अपने व्यक्तित्व तथा वैयक्तिकता का दावा कैसे कर सकते हैं और साथ ही अपने पिता, परमेश्वर के लिए उनका निषेध कैसे कर सकते हैं?\n\n*अतीन्द्रियम्* का अर्थ है कि वास्तविक सुख का आस्वादन करने से पूर्व हमें इन भौतिक इन्द्रियों से परे जाना होगा। *रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्द-चिद्-आत्मनि*—जो योगीजन आध्यात्मिक जीवन की आकांक्षा करते हैं, वे भी अपने भीतर स्थित परमात्मा पर एकाग्र होकर आनन्द का आस्वादन कर रहे हैं। यदि वहाँ कोई आनन्द न हो, यदि वहाँ कोई भोग न हो, तो फिर इन्द्रियों को वश में करने के लिए इतना कष्ट उठाने का क्या प्रयोजन? यदि योगीजन इतना कष्ट उठा रहे हैं, तो वे किस प्रकार के आनन्द का आस्वादन कर रहे हैं? वह आनन्द *अनन्त* है—अन्तहीन। यह कैसे? आत्मा नित्य है, और परमेश्वर नित्य हैं; अतएव उनके प्रेममय आदान-प्रदान का परस्पर विनिमय भी नित्य है। जो वास्तव में बुद्धिमान है, वह इस भौतिक शरीर के क्षणभंगुर इन्द्रिय-भोग से विरत रहेगा और अपने आनन्द को आध्यात्मिक जीवन में स्थिर करेगा। परमेश्वर के साथ आध्यात्मिक जीवन में उसकी यह सहभागिता रास-लीला कहलाती है।\n\nहमने वृन्दावन में गोपियों के साथ श्रीकृष्ण की रास-लीला के विषय में प्रायः सुना है। वह इन भौतिक शरीरों के बीच होने वाले साधारण आदान-प्रदान जैसी नहीं है। अपितु वह आध्यात्मिक शरीरों के माध्यम से भावों का आदान-प्रदान है। इसे समझने के लिए मनुष्य को कुछ बुद्धिमान होना पड़ता है, क्योंकि एक मूर्ख व्यक्ति, जो यह नहीं समझ पाता कि वास्तविक सुख क्या है, वह इस भौतिक जगत् में सुख की खोज करता है। भारत में एक मनुष्य की कथा है, जो यह नहीं जानता था कि गन्ना क्या होता है, और उसे बताया गया कि वह चबाने में बहुत मधुर होता है। \"अरे, वह दिखता कैसा है?\" उसने पूछा। \"वह तो ठीक बाँस की छड़ी जैसा दिखता है,\" किसी ने कहा। अतः वह मूर्ख मनुष्य सब प्रकार की बाँस की छड़ियाँ चबाने लगा। वह गन्ने की मधुरता का अनुभव भला कैसे कर सकता है? इसी प्रकार, हम सुख तथा आनन्द प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु हम उन्हें इस भौतिक शरीर को चबाकर प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं; अतएव वहाँ न कोई सुख है और न कोई आनन्द। कुछ समय के लिए आनन्द की थोड़ी अनुभूति भले हो, किन्तु वह वास्तविक आनन्द नहीं है, क्योंकि वह क्षणिक है। यह उस बिजली की चमक के समान है, जिसे हम आकाश में कौंधते देख सकते हैं, जो क्षण भर के लिए बिजली जैसी प्रतीत हो सकती है, किन्तु वास्तविक बिजली उससे परे है। चूँकि कोई व्यक्ति यह वास्तव में नहीं जानता कि सुख क्या है, इसलिए वह वास्तविक सुख से विचलित हो जाता है।\n\nमनुष्य को वास्तविक सुख में स्थापित करने की प्रक्रिया यही कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया है। कृष्णभावनामृत के द्वारा हम क्रमशः अपनी वास्तविक बुद्धि का विकास कर सकते हैं और आध्यात्मिक प्रगति करते-करते स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक सुख का आस्वादन करते हुए आनन्द ले सकते हैं। ज्यों-ज्यों हम आध्यात्मिक सुख का आस्वादन आरम्भ करते हैं, त्यों-त्यों उसी अनुपात में हम भौतिक सुख को त्यागते जाते हैं। ज्यों-ज्यों हम परम सत्य को समझने में प्रगति करते हैं, त्यों-त्यों हम स्वाभाविक रूप से इस मिथ्या सुख से विरक्त होते जाते हैं। यदि किसी प्रकार कोई मनुष्य कृष्णभावनामृत की उस अवस्था तक उन्नत हो जाए, तो उसका परिणाम क्या होता है?\n\nyaṁ labdhvā cāparaṁ lābhaṁ\n\nmanyate nādhikaṁ tataḥ\n\nyasmin sthito na duḥkhena\n\nguruṇāpi vicālyate\n\n\"इसे प्राप्त करके वह सोचता है कि इससे बड़ा कोई लाभ नहीं है। ऐसी स्थिति में स्थित होकर मनुष्य महान् से महान् कठिनाई के बीच भी कभी विचलित नहीं होता।\" (गीता 6.22)\n\nजब मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब अन्य उपलब्धियाँ तुच्छ प्रतीत होती हैं। इस भौतिक जगत् में हम इतनी सारी वस्तुएँ प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं—धन, स्त्री, यश, सौन्दर्य, ज्ञान, इत्यादि—किन्तु ज्यों ही हम कृष्णभावनामृत में स्थित होते हैं, हम सोचते हैं, \"अरे, इससे श्रेष्ठ कोई उपलब्धि नहीं है।\" कृष्णभावनामृत इतना सामर्थ्यवान् है कि उसका थोड़ा-सा आस्वादन ही मनुष्य को महान् से महान् संकट से बचा सकता है। ज्यों-ज्यों मनुष्य कृष्णभावनामृत के आस्वादन का अनुभव करने लगता है, त्यों-त्यों वह अन्य तथाकथित भोगों तथा उपलब्धियों को नीरस तथा फीका देखने लगता है। और यदि कोई मनुष्य कृष्णभावनामृत में दृढ़तापूर्वक स्थित हो, तो महान् से महान् संकट भी उसे विचलित नहीं कर सकता। जीवन में इतने सारे संकट हैं, क्योंकि यह भौतिक जगत् संकट का स्थान है। हम इसकी ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं, और चूँकि हम मूर्ख हैं, इसलिए हम इन संकटों के साथ समायोजन करने का प्रयत्न करते हैं। हमारे जीवन में अनेक संकटपूर्ण क्षण आ सकते हैं, किन्तु यदि हम स्वयं को कृष्णभावनामृत में प्रशिक्षित कर रहे हैं और स्वयं को घर लौटने, भगवद्धाम लौटने के लिए तैयार कर रहे हैं, तो हम उनकी चिन्ता नहीं करेंगे। तब हमारी मनोवृत्ति ऐसी होगी: \"संकट आते-जाते रहते हैं—अतः उन्हें होने दो।\" जब तक मनुष्य भौतिकतावादी स्तर पर है और इस स्थूल शरीर से, जो नश्वर तत्त्वों से बना है, अपना तादात्म्य कर रहा है, तब तक इस प्रकार का समायोजन करना अत्यन्त कठिन है। किन्तु मनुष्य ज्यों-ज्यों कृष्णभावनामृत में उन्नति करता है, त्यों-त्यों वह दैहिक उपाधियों तथा इस भौतिक बन्धन से अधिकाधिक मुक्त होता जाता है।\n\n*श्रीमद्भागवत* में भौतिक जगत् की तुलना एक विशाल सागर से की गई है। इस भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर लाखों-करोड़ों लोक अन्तरिक्ष में तैर रहे हैं, और हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि वहाँ कितने अटलांटिक तथा प्रशान्त महासागर होंगे। वस्तुतः समूचे भौतिक ब्रह्माण्ड की तुलना दुःख के एक विशाल सागर से, जन्म-मृत्यु के एक सागर से की गई है। अज्ञान के इस विशाल सागर को पार करने के लिए एक सुदृढ़ नौका की आवश्यकता है, और वह सुदृढ़ नौका श्रीकृष्ण के चरणकमल हैं। हमें तत्काल उस नौका पर सवार हो जाना चाहिए। हमें यह सोचकर हिचकिचाना नहीं चाहिए कि श्रीकृष्ण के चरण बहुत छोटे हैं। समूचा ब्रह्माण्ड बस उनकी एक टाँग पर टिका हुआ है। जो उनके चरणों की शरण लेता है, उसके लिए कहा जाता है कि भौतिक ब्रह्माण्ड बछड़े के खुर के चिह्न में भरे जल के एक गड्ढे से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है। ऐसे छोटे गड्ढे को पार करने में निश्चय ही कोई कठिनाई नहीं है।\n\ntaṁ vidyād duḥkha-saṁyoga-\n\nviyogam yoga-saṁjñitam\n\n\"यही वास्तव में भौतिक सम्पर्क से उत्पन्न समस्त दुःखों से वास्तविक मुक्ति है।\" (गीता 6.23)\n\nअनियन्त्रित इन्द्रियों के कारण हम इस भौतिक जगत् में फँसे हुए हैं। योग की प्रक्रिया इन इन्द्रियों को वश में करने के लिए ही है। यदि हम किसी प्रकार इन्द्रियों को वश में करने में सफल हो जाएँ, तो हम अपना मुख वास्तविक आध्यात्मिक सुख की ओर मोड़ सकते हैं और अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।\n\nsa niścayena yoktavyo\n\nyogo 'nirviṇṇa-cetasā\n\nsaṅkalpa-prabhavān kāmāṁs\n\ntyaktvā sarvān aśeṣataḥ\n\nmanasaivendriya-grāmaṁ\n\nviniyamya samantataḥ\n\nśanaiḥ śanair uparamed\n\nbuddhyā dhṛti-gṛhītayā\n\nātma-saṁsthaṁ manaḥ kṛtvā\n\nna kiñcid api cintayet\n\nyato yato niścalati\n\nmanaś cañcalam asthiram\n\ntatas tato niyamyaitad\n\nātmany eva vaśaṁ nayet\n\n\"मनुष्य को अविचलित संकल्प तथा श्रद्धा के साथ योग के अभ्यास में संलग्न होना चाहिए। मिथ्या अहंकार से उत्पन्न समस्त भौतिक इच्छाओं को बिना अपवाद के त्यागकर इस प्रकार मनुष्य को मन के द्वारा सब ओर से समस्त इन्द्रियों को वश में करना चाहिए। क्रमशः, पग-पग, पूर्ण विश्वास के साथ, मनुष्य को बुद्धि के द्वारा समाधि में स्थित होना चाहिए, और इस प्रकार मन को केवल आत्मा पर ही स्थिर करना चाहिए तथा और कुछ नहीं सोचना चाहिए। मन अपने चंचल तथा अस्थिर स्वभाव के कारण जहाँ-जहाँ तथा जिस-जिस वस्तु पर भटके, मनुष्य को निश्चय ही उसे वहाँ से खींचकर वापस आत्मा के नियन्त्रण में ले आना चाहिए।\" (गीता 6.24–26)\n\nमन सदा विचलित रहता है। वह कभी इस ओर तो कभी उस ओर जाता है। योग के अभ्यास से हम सचमुच मन को घसीटकर कृष्णभावनामृत में लाते हैं। मन कृष्णभावनामृत से भटककर इतनी सारी बाह्य वस्तुओं की ओर चला जाता है, क्योंकि अनादि काल से, जन्म-जन्मान्तर से, यही हमारा अभ्यास रहा है। इसी कारण, जब मनुष्य अपने मन को कृष्णभावनामृत में स्थिर करने का प्रयत्न करता है, तो आरम्भ में बड़ी कठिनाई हो सकती है, किन्तु इन समस्त कठिनाइयों पर विजय पाई जा सकती है।\n\nमन चूँकि उद्वेलित रहता है और श्रीकृष्ण पर स्थिर नहीं रहता, इसीलिए वह एक विचार से दूसरे विचार पर जाता रहता है। उदाहरणार्थ, जब हम किसी कार्य में संलग्न रहते हैं, तब दस, बीस, तीस अथवा चालीस वर्ष पूर्व घटी घटनाओं की स्मृतियाँ बिना किसी प्रकट कारण के सहसा हमारे मन में आ सकती हैं। ये विचार हमारे अवचेतन से आते हैं, और चूँकि वे सदा उठते रहते हैं, इसीलिए मन सदा उद्वेलित रहता है। यदि हम किसी झील या तालाब को विलोड़ित करें, तो तल का सारा कीचड़ ऊपर सतह पर आ जाता है। इसी प्रकार, जब मन उद्वेलित होता है, तो अवचेतन से इतने सारे विचार उठ आते हैं, जो वर्षों से वहाँ संचित रहे हैं। यदि हम किसी तालाब को विलोड़ित न करें, तो कीचड़ तल में बैठ जाएगा। यह योग की प्रक्रिया मन को शान्त करने तथा इन समस्त विचारों को नीचे बैठने देने का साधन है। इसी कारण मन को उद्वेलित होने से बचाए रखने के लिए इतने सारे नियम तथा उपनियम पालन करने होते हैं। यदि हम इन नियमों तथा उपनियमों का पालन करें, तो क्रमशः मन वश में आ जाएगा। इतने सारे निषेध तथा इतने सारे विधान हैं, और यदि कोई मन को प्रशिक्षित करने के विषय में गम्भीर है, तो उसे इनका पालन करना ही होगा। यदि वह स्वेच्छाचारी ढंग से कार्य करता है, तो मन के वश में आने की क्या सम्भावना है? जब मन अन्ततः इस सीमा तक प्रशिक्षित हो जाता है कि वह श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोचेगा, तब वह शान्ति को प्राप्त करेगा और अत्यन्त प्रशान्त हो जाएगा।\n\npraśānta-manasaṁ hy enaṁ\n\nyoginaṁ sukham uttamam\n\nupaiti śānta-rajasaṁ\n\nbrahma-bhūtam akalmaṣam\n\n\"जिस योगी का मन मुझ पर स्थिर है, वह निश्चय ही सर्वोच्च सुख को प्राप्त करता है। ब्रह्म के साथ अपने तादात्म्य के कारण वह मुक्त हो जाता है; उसका मन शान्त रहता है, उसके वेग प्रशान्त हो जाते हैं, और वह पाप से मुक्त हो जाता है।\" (गीता 6.27)\n\nमन सदा सुख के लिए वस्तुएँ गढ़ता रहता है। मैं सदा सोचता रहता हूँ, \"इससे मुझे सुख मिलेगा,\" अथवा \"उससे मुझे सुख मिलेगा। सुख यहाँ है। सुख वहाँ है।\" इस प्रकार मन हमें कहीं भी और सर्वत्र ले जाता रहता है। यह ऐसा है मानो हम किसी बेलगाम घोड़े के पीछे एक रथ पर सवार हैं। हमारा इस पर कोई वश नहीं कि हम कहाँ जा रहे हैं, अपितु हम केवल भय से बैठे असहाय रूप से देखते रह सकते हैं। ज्यों ही मन कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया में संलग्न होता है—विशेष रूप से हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करके—त्यों ही मन के जंगली घोड़े क्रमशः हमारे वश में आ जाते हैं। हमें अपने जीवन के प्रत्येक क्षण श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहना चाहिए, ताकि बेचैन तथा उद्दण्ड मन हमें क्षणभंगुर भौतिक जगत् में सुख की व्यर्थ खोज में एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर न घसीट सके।\n\nyuñjann evaṁ sadātmānaṁ\n\nyogī vigata-kalmaṣaḥ\n\nsukhe na brahma-saṁsparśam\n\natyantaṁ sukham aśnute\n\n\"आत्मा में स्थिर रहकर, समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त होकर, योगी परम चेतना के सम्पर्क में सुख की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था को प्राप्त करता है।\" (गीता 6.28)\n\nजो श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित है, उसके लिए वे संरक्षक का कार्य करते हैं। जब कोई कठिनाई में होता है, तब उसका संरक्षक उसकी रक्षा करता है। जैसा कि *भगवद्गीता* में कहा गया है, श्रीकृष्ण प्रत्येक जीव के वास्तविक मित्र हैं, और हमें उनके साथ अपनी मित्रता को पुनर्जीवित करना है। इस मित्रता को पुनर्जीवित करने की विधि कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया है। कृष्णभावनामृत के अभ्यास से सांसारिक रजोगुणी लालसा का अन्त हो जाएगा। यही रजोगुणी लालसा हमें श्रीकृष्ण से पृथक् रखती है। श्रीकृष्ण हमारे भीतर हैं और इस प्रतीक्षा में हैं कि हम उनकी ओर मुड़ें, किन्तु हम भौतिक इच्छा रूपी वृक्ष के फलों को रजोगुणी भाव से खाने में अत्यधिक व्यस्त हैं। इन फलों को भोगने की यह रजोगुणी बाध्यता बन्द होनी चाहिए, और हमें अपनी वास्तविक पहचान—ब्रह्म, अर्थात् शुद्ध आत्मा—में स्वयं को स्थापित करना चाहिए।"}
{"ref": "owk/2", "book": "owk", "lang": "hi", "url": "/hi/library/owk/2/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "जप तथा श्रीकृष्ण को जानने का मार्ग", "purport": "हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। यह दिव्य ध्वनि-कम्पन है। यह हमें मन रूपी दर्पण से धूल हटाने में सहायता करेगा। इस समय हमने मन रूपी दर्पण पर इतनी अधिक भौतिक धूल एकत्र कर ली है, जैसे सेकंड एवेन्यू (न्यूयॉर्क सिटी) पर भारी यातायात के कारण हर वस्तु पर धूल तथा कालिख जमी रहती है। भौतिक क्रियाओं के अपने व्यवहार के कारण हमारे मन के स्वच्छ दर्पण पर बहुत-सी धूल एकत्र हो गई है, और परिणामस्वरूप हम वस्तुओं को उनके यथार्थ परिप्रेक्ष्य में देखने में असमर्थ हैं। दिव्य ध्वनि (हरे कृष्ण मन्त्र) का यह कम्पन इस धूल को धोकर हटा देगा और हमें अपनी वास्तविक स्वरूप-स्थिति को स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ बनाएगा। ज्यों ही हम यह समझ लेते हैं कि \"मैं यह शरीर नहीं हूँ; मैं आत्मा हूँ, और मेरा लक्षण चेतना है,\" त्यों ही हम स्वयं को वास्तविक सुख में स्थापित कर सकेंगे। ज्यों-ज्यों हमारी चेतना हरे कृष्ण जप की इस प्रक्रिया से शुद्ध होती है, त्यों-त्यों हमारे समस्त भौतिक दुःख लुप्त हो जाएँगे। इस भौतिक जगत् के ऊपर एक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, और प्रत्येक व्यक्ति उसे बुझाने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु जब तक हम अपनी शुद्ध चेतना में, अपने आध्यात्मिक जीवन में स्थित नहीं होते, तब तक भौतिक प्रकृति के दुःखों की इस अग्नि को बुझाने की कोई सम्भावना नहीं है।\n\nइस भौतिक जगत् में भगवान् श्रीकृष्ण के अवतरण अथवा आविर्भाव का एक प्रयोजन यह है कि वे धर्म की स्थापना करके समस्त जीवों के लिए भौतिक अस्तित्व की अग्नि को बुझाएँ।\n\nyadā yadā hi dharmasya\n\nglānir bhavati bhārata\n\nabhyutthānam adharmasya\n\ntadātmānaṁ sṛjāmy aham\n\nparitrāṇāya sādhūnāṁ\n\nvināśāya ca duṣkṛtām\n\ndharma-saṁsthāpanārthāya\n\nsambhavāmi yuge yuge\n\n\"हे भरतवंशी, जब-जब तथा जहाँ-जहाँ धार्मिक आचरण का ह्रास होता है और अधर्म की प्रधानता बढ़ती है—तब-तब मैं स्वयं अवतरित होता हूँ। साधुओं के उद्धार तथा दुष्टों के विनाश के लिए, और साथ ही धर्म के सिद्धान्तों की पुनर्स्थापना के लिए, मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।\" (गीता 4.7–8)\n\nइस श्लोक में *धर्म* शब्द का प्रयोग हुआ है। इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनेक प्रकार से अनुवाद किया गया है। कभी-कभी इसका अनुवाद \"आस्था\" के रूप में किया जाता है, किन्तु वैदिक साहित्य के अनुसार धर्म एक प्रकार की आस्था नहीं है। आस्था बदल सकती है, किन्तु धर्म नहीं बदला जा सकता। जल की तरलता को बदला नहीं जा सकता। यदि उसे बदल दिया जाए—यदि, उदाहरणार्थ, जल ठोस हो जाए—तो वह वास्तव में अपनी स्वरूप-स्थिति में नहीं रहता। वह किसी विशेष विशेषक अवस्था के अधीन विद्यमान रहता है। हमारा धर्म अथवा स्वरूप-स्थिति यह है कि हम परमेश्वर के अभिन्न अंश हैं, और ऐसा होने के कारण हमें अपनी चेतना को परमेश्वर के साथ संयुक्त करना अथवा उनके अधीन करना है।\n\nपरम पूर्ण के प्रति इस दिव्य सेवा की स्थिति भौतिक सम्पर्क के कारण दुरुपयोग में लाई जा रही है। सेवा हमारी स्वरूप-स्थिति में अन्तर्निहित है। प्रत्येक व्यक्ति एक सेवक है, और कोई भी स्वामी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी की सेवा कर रहा है। यद्यपि राष्ट्रपति राज्य का प्रधान कार्यपालक हो सकता है, फिर भी वह राज्य की सेवा कर रहा है, और जब उसकी सेवाओं की और आवश्यकता नहीं रहती, तब राज्य उसे हटा देता है। मन-ही-मन यह सोचना कि \"जो कुछ मैं देखता हूँ, उस सबका मैं स्वामी हूँ,\" माया अर्थात् भ्रम कहलाता है। इस प्रकार भौतिक चेतना में हमारी सेवा विभिन्न उपाधियों के अन्तर्गत दुरुपयोग में लाई जा रही है। जब हम इन उपाधियों से मुक्त हो जाते हैं, अर्थात् जब मन रूपी दर्पण से धूल हट जाती है, तब हम स्वयं को अपनी वास्तविक स्थिति में श्रीकृष्ण के नित्य सेवक के रूप में देख सकेंगे।\n\nमनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि भौतिक जगत् में उसकी सेवा तथा आध्यात्मिक वातावरण में उसकी सेवा एक समान हैं। हम यह सोचकर सिहर सकते हैं, \"अरे, मुक्ति के पश्चात् भी क्या मैं सेवक ही रहूँगा?\" इसका कारण यह है कि हमें अनुभव है कि भौतिक जगत् में सेवक होना बहुत सुखद नहीं है, किन्तु दिव्य सेवा इस जैसी नहीं है। आध्यात्मिक जगत् में सेवक तथा स्वामी के बीच कोई भेद नहीं होता। यहाँ, निःसन्देह, भेद है, किन्तु परम जगत् में सब कुछ एक है। उदाहरणार्थ, *भगवद्गीता* में हम देख सकते हैं कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथि के रूप में सेवक का पद ग्रहण किया है। अपनी स्वरूप-स्थिति में अर्जुन श्रीकृष्ण का सेवक है, किन्तु व्यवहार में हम देख सकते हैं कि कभी-कभी भगवान् सेवक के सेवक बन जाते हैं। अतएव हमें सावधान रहना चाहिए कि हम भौतिकतावादी विचारों को आध्यात्मिक क्षेत्र में न ले जाएँ। हमने भौतिक रूप से जो कुछ भी अनुभव किया है, वह आध्यात्मिक जीवन की वस्तुओं का एक विकृत प्रतिबिम्ब मात्र है।\n\nजब हमारी स्वरूप-स्थिति अथवा धर्म पदार्थ के संदूषणों के कारण क्षीण हो जाता है, तब भगवान् स्वयं अवतार के रूप में आते हैं अथवा अपने कुछ अन्तरंग सेवकों को भेजते हैं। प्रभु ईसा मसीह ने स्वयं को \"ईश्वर का पुत्र\" कहा, और इस प्रकार वे परमेश्वर के एक प्रतिनिधि हैं। इसी प्रकार, मोहम्मद ने स्वयं को परमेश्वर के सेवक के रूप में पहचाना। इस प्रकार जब-जब हमारी स्वरूप-स्थिति में विसंगति आती है, तब-तब परमेश्वर या तो स्वयं आते हैं या अपने प्रतिनिधि को भेजते हैं, ताकि वे हमें जीव की वास्तविक स्थिति से अवगत कराएँ।\n\nअतएव मनुष्य को यह भूल नहीं करनी चाहिए कि वह धर्म को एक रचित आस्था समझ बैठे। अपने उचित अर्थ में धर्म को जीव से पृथक् किया ही नहीं जा सकता। जीव के लिए वह वही है, जो शर्करा के लिए उसकी मिठास है, अथवा नमक के लिए उसका खारापन है, अथवा पत्थर के लिए उसकी ठोसता है। किसी भी स्थिति में उसे काटकर अलग नहीं किया जा सकता। जीव का धर्म सेवा करना है, और हम सहज ही देख सकते हैं कि प्रत्येक जीव में स्वयं की अथवा दूसरों की सेवा करने की प्रवृत्ति होती है। श्रीकृष्ण की सेवा कैसे की जाए, भौतिकतावादी सेवा से स्वयं को कैसे विलग किया जाए, कृष्णभावनामृत कैसे प्राप्त किया जाए तथा भौतिक उपाधियों से कैसे मुक्त हुआ जाए—यह सब श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* में एक विज्ञान के रूप में सिखाया है।\n\nऊपर उद्धृत श्लोक में, जो *परित्राणाय साधूनाम्* से आरम्भ होता है, *साधु* शब्द किसी पवित्र अथवा सन्त पुरुष को इंगित करता है। एक सन्त पुरुष सहिष्णु होता है, सबके प्रति अत्यन्त दयालु होता है, समस्त जीवों का मित्र होता है, किसी का शत्रु नहीं होता और सदा शान्त रहता है। एक पवित्र पुरुष के छब्बीस मूलभूत गुण हैं, और *भगवद्गीता* में हमें यह ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण स्वयं निम्नलिखित निर्णय देते हैं:\n\napi cet su-durācāro\n\nbhajate mām ananya-bhāk\n\nsādhur eva sa mantavyaḥ\n\nsamyag vyavasito hi saḥ\n\n\"यदि कोई अत्यन्त निन्द्य कर्म भी करता है, किन्तु यदि वह भक्ति में संलग्न है, तो उसे साधु ही माना जाना चाहिए, क्योंकि वह ठीक से स्थित है।\" (गीता 9.30)\n\nसांसारिक स्तर पर, जो एक व्यक्ति के लिए नैतिकता है, वह दूसरे के लिए अनैतिकता है, और जो एक व्यक्ति के लिए अनैतिकता है, वह दूसरे के लिए नैतिकता है। हिन्दू धारणा के अनुसार, मदिरापान अनैतिक है, जबकि पाश्चात्य जगत् में मदिरापान अनैतिक नहीं माना जाता, अपितु एक सामान्य बात है। अतः नैतिकता समय, स्थान, परिस्थिति, सामाजिक स्थिति, इत्यादि पर निर्भर है। तथापि सभी समाजों में नैतिकता तथा अनैतिकता का एक बोध रहता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अनैतिक कर्मों में संलग्न है, किन्तु साथ ही पूर्णतया कृष्णभावनामृत में है, तो उसे साधु अथवा सन्त माना जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यद्यपि किसी व्यक्ति में अपनी विगत संगति के कारण कुछ अनैतिक आदतें हो सकती हैं, किन्तु यदि वह पूर्णतया कृष्णभावनामृत में संलग्न है, तो इन आदतों को महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाना चाहिए। चाहे जो भी हो, यदि कोई कृष्णभावनाभावित हो जाता है, तो वह क्रमशः शुद्ध हो जाएगा और एक साधु बन जाएगा। ज्यों-ज्यों मनुष्य कृष्णभावनामृत का पालन करने में प्रगति करता है, त्यों-त्यों उसकी बुरी आदतें घटती जाती हैं, और वह सन्तसुलभ सिद्धि को प्राप्त करता है।\n\nइस सम्बन्ध में एक चोर की कथा है, जो किसी पवित्र नगर की तीर्थयात्रा पर निकला, और मार्ग में वह तथा अन्य तीर्थयात्री रात्रि-विश्राम के लिए एक सराय में रुके। चोरी का व्यसनी होने के कारण उस चोर ने अन्य तीर्थयात्रियों का सामान चुराने की योजनाएँ बनानी आरम्भ कीं, किन्तु उसने सोचा, \"मैं तीर्थयात्रा पर जा रहा हूँ, अतः यह उचित नहीं जान पड़ता कि मैं यह सामान चुराऊँ। नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगा।\" फिर भी, अपनी आदत के कारण वह सामान से अपने हाथ नहीं रोक सका। अतः उसने एक व्यक्ति का थैला उठाकर उसे किसी अन्य स्थान पर रख दिया, और फिर दूसरे व्यक्ति का थैला उठाकर अन्यत्र रख दिया। उसने सारी रात विभिन्न थैलों को विभिन्न स्थानों पर रखने में बिता दी, किन्तु उसका विवेक उसे इतना कचोटता रहा कि वह उनमें से कुछ भी नहीं ले सका। प्रातःकाल, जब अन्य तीर्थयात्री जागे, तो उन्होंने अपने थैलों के लिए चारों ओर देखा, किन्तु वे उन्हें नहीं मिले। बड़ा हो-हल्ला मचा, और अन्ततः एक-एक करके वे विभिन्न स्थानों पर अपने थैले पाने लगे। जब सब मिल गए, तब चोर ने समझाया: \"सज्जनो, मैं व्यवसाय से एक चोर हूँ। चूँकि मुझे रात्रि में चोरी करने की आदत है, इसलिए मैं आपके थैलों से कुछ चुराना चाहता था, किन्तु मैंने सोचा कि चूँकि मैं इस पवित्र स्थान को जा रहा हूँ, इसलिए चोरी करना सम्भव नहीं है। अतः मैंने सामान को इधर-उधर रख दिया होगा, किन्तु मुझे क्षमा करें।\" यह एक बुरी आदत का लक्षण है। वह और चोरी नहीं करना चाहता, किन्तु चूँकि वह अभ्यस्त है, इसलिए कभी-कभी कर बैठता है। अतएव श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिसने अपनी अनैतिक आदतों से विरत रहने तथा कृष्णभावनामृत में प्रगति करने का निश्चय कर लिया है, उसे साधु माना जाना चाहिए, भले ही विगत आदत के कारण अथवा संयोगवश वह अपने दोष के वश में हो जाए। अगले श्लोक में हमें ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nkṣipraṁ bhavati dharmātmā\n\nśaśvac-chāntiṁ nigacchati\n\nkaunteya pratijānīhi\n\nna me bhaktaḥ praṇaśyati\n\n\"वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और स्थायी शान्ति प्राप्त करता है। हे कुन्तीपुत्र, साहसपूर्वक घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता।\" (गीता 9.31)\n\nचूँकि किसी ने स्वयं को कृष्णभावनामृत के प्रति समर्पित कर दिया है, इसीलिए यहाँ श्रीकृष्ण यह उद्घोषित करते हैं कि अत्यल्प समय में वह सन्त बन जाएगा। कोई व्यक्ति किसी बिजली के पंखे का प्लग निकाल सकता है, और विद्युत्-प्रवाह कट जाने पर भी पंखा अभी कुछ क्षण चलता रह सकता है, किन्तु यह समझा जाता है कि पंखा शीघ्र ही रुक जाएगा। एक बार जब हम श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण लेते हैं, तब हम अपनी कर्मगत क्रियाओं का स्विच बन्द कर देते हैं, और यद्यपि ये क्रियाएँ अभी भी चलती रह सकती हैं, फिर भी यह समझा जाना चाहिए कि वे शीघ्र ही क्षीण हो जाएँगी। यह तथ्य है कि जो कोई कृष्णभावनामृत को अपना लेता है, उसे एक अच्छा मनुष्य बनने के लिए स्वतन्त्र रूप से प्रयत्न नहीं करना पड़ता। समस्त उत्तम गुण स्वतः आ जाते हैं। *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है कि जिसने कृष्णभावनामृत प्राप्त कर लिया है, उसने एक साथ ही समस्त उत्तम गुण प्राप्त कर लिए हैं। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति ईश्वर-भावना से रहित है, फिर भी उसमें अनेक उत्तम गुण हैं, तो उसके उत्तम गुणों को व्यर्थ माना जाना चाहिए, क्योंकि वह किसी भी प्रकार अवांछनीय कार्य करने से रोका नहीं जाएगा। यदि कोई कृष्णभावनामृत से रहित है, तो वह निश्चय ही इस भौतिक जगत् में अनिष्ट करेगा।\n\njanma karma ca me divyam\n\nevaṁ yo vetti tattvataḥ\n\ntyaktvā dehaṁ punar janma\n\nnaiti mām eti so 'rjuna\n\n\"हे अर्जुन, जो मेरे आविर्भाव तथा कर्मों के दिव्य स्वरूप को जानता है, वह शरीर त्यागने पर इस भौतिक जगत् में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करता है।\" (गीता 4.9)\n\nजिस प्रयोजन हेतु श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं, उसकी यहाँ आगे व्याख्या की गई है। जब वे किसी प्रयोजन से आते हैं, तब कुछ क्रियाएँ होती हैं। निःसन्देह कुछ दार्शनिक हैं, जो यह विश्वास नहीं करते कि ईश्वर अवतार के रूप में आते हैं। वे कहते हैं, \"ईश्वर इस सड़े-गले संसार में क्यों आएँ?\" किन्तु *भगवद्गीता* से हम कुछ और ही समझते हैं। हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि हम *भगवद्गीता* को शास्त्र के रूप में पढ़ते हैं, और *भगवद्गीता* में जो कुछ कहा गया है, उसे स्वीकार करना ही चाहिए, अन्यथा उसे पढ़ने का कोई कारण नहीं है। *गीता* में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे एक प्रयोजन के साथ अवतार के रूप में आए हैं, और उनके प्रयोजन के साथ-साथ कुछ क्रियाएँ हैं। उदाहरणार्थ, हम देख सकते हैं कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि के रूप में सक्रिय हैं और कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र पर इतनी सारी क्रियाओं में संलग्न हैं। जिस प्रकार जब युद्ध होता है, तब एक व्यक्ति अथवा राष्ट्र दूसरे व्यक्ति अथवा राष्ट्र का पक्ष ले सकता है और पक्षपात दिखा सकता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण युद्धक्षेत्र पर कुछ पक्षपात दिखाते हैं और अर्जुन का पक्ष लेते हैं। वास्तव में श्रीकृष्ण किसी के प्रति पक्षपाती नहीं हैं, किन्तु बाह्य रूप से ऐसा प्रतीत होता है कि वे पक्षपाती हैं। तथापि इस पक्षपात को साधारण अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए।\n\nइस श्लोक में श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि भौतिक जगत् में उनका अवतरण दिव्य है। *दिव्यम्* शब्द का अर्थ है दिव्य अथवा अप्राकृत। उनकी क्रियाएँ किसी भी प्रकार साधारण नहीं हैं। आज भी भारत में, अगस्त के अन्त में, लोग सम्प्रदाय का भेद किए बिना श्रीकृष्ण का जन्मदिन मनाने के अभ्यस्त हैं, ठीक वैसे ही जैसे पाश्चात्य जगत् में प्रभु ईसा मसीह का जन्मदिन क्रिसमस पर मनाया जाता है। श्रीकृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी कहलाता है, और इस श्लोक में श्रीकृष्ण \"मेरे जन्म\" का उल्लेख करते हुए *जन्म* शब्द का प्रयोग करते हैं। चूँकि जन्म होता है, इसलिए कुछ क्रियाएँ होती हैं। श्रीकृष्ण का जन्म तथा क्रियाएँ दिव्य हैं, जिसका अर्थ है कि वे साधारण जन्मों तथा क्रियाओं जैसी नहीं हैं। कोई पूछ सकता है कि उनकी क्रियाएँ दिव्य कैसे हैं। वे जन्म लेते हैं, वे अर्जुन के साथ एक युद्ध में भाग लेते हैं, उनके वसुदेव नामक एक पिता तथा देवकी नामक एक माता तथा एक परिवार है—इसमें दिव्य क्या माना जाए? श्रीकृष्ण कहते हैं, *एवं यो वेत्ति तत्त्वतः*—हमें उनके जन्म तथा क्रियाओं को सत्यतः जानना चाहिए। जब कोई श्रीकृष्ण के जन्म तथा क्रियाओं को सत्यतः जान लेता है, तब परिणाम यह होता है: *त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति माम् एति सोऽर्जुन* [गीता 4.9]—जब वह इस भौतिक शरीर को त्यागता है, तब वह पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु सीधे श्रीकृष्ण के पास जाता है। इसका अर्थ है कि वह एक मुक्त आत्मा बन जाता है। वह नित्य आध्यात्मिक जगत् में जाता है और आनन्द, ज्ञान तथा नित्यता से पूर्ण अपनी स्वरूप-स्थिति को प्राप्त करता है। यह सब केवल श्रीकृष्ण के जन्म तथा क्रियाओं के दिव्य स्वरूप को सत्यतः जानकर प्राप्त किया जा सकता है।\n\nसाधारणतया जब कोई शरीर त्यागता है, तब उसे दूसरा शरीर ग्रहण करना पड़ता है। जीवों के जीवन बस इसी कारण चलते रहते हैं कि जीव अपने कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में वस्त्र बदलते रहते हैं—यही आत्मा का देहान्तरण है। इस समय हम सोच सकते हैं कि यह भौतिक शरीर हमारा वास्तविक शरीर है, किन्तु यह एक वस्त्र के समान है। वास्तव में हमारा एक यथार्थ शरीर है, एक आध्यात्मिक शरीर। यह भौतिक शरीर जीव के वास्तविक आध्यात्मिक शरीर की तुलना में ऊपरी है। जब यह भौतिक शरीर पुराना तथा जीर्ण हो जाता है, अथवा जब किसी दुर्घटना से वह व्यर्थ हो जाता है, तब हम उसे वैसे ही उतार फेंकते हैं जैसे हम किसी मैले अथवा फटे वस्त्र को उतार फेंकें, और दूसरा भौतिक शरीर धारण कर लेते हैं।\n\nvāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya\n\nnavāni gṛhṇāti naro 'parāṇi\n\ntathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny\n\nanyāni saṁyāti navāni dehī\n\n\"जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ शरीरों को त्यागकर नये भौतिक शरीर ग्रहण करती है।\" (गीता 2.22)\n\nआरम्भ में शरीर मटर के दाने के आकार का होता है। फिर वह बढ़कर एक शिशु बनता है, फिर बालक, फिर किशोर, फिर युवक, फिर एक पूर्ण विकसित पुरुष तथा एक वृद्ध, और अन्ततः जब वह व्यर्थ हो जाता है, तब जीव दूसरे शरीर में परिवर्तित हो जाता है। अतः शरीर सदा बदलता रहता है, और मृत्यु बस वर्तमान शरीर का अन्तिम परिवर्तन है।\n\ndehino 'smin yathā dehe\n\nkaumāraṁ yauvanaṁ jarā\n\ntathā dehāntara-prāptir\n\ndhīras tatra na muhyati\n\n\"जिस प्रकार देहधारी आत्मा इस शरीर में निरन्तर बाल्यावस्था से युवावस्था तथा वृद्धावस्था में जाती रहती है, उसी प्रकार आत्मा मृत्यु के समय दूसरे शरीर में चली जाती है। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा ऐसे परिवर्तन से मोहित नहीं होती।\" (गीता 2.13)\n\nयद्यपि शरीर बदलता रहता है, फिर भी शरीर के भीतर का निवासी वही रहता है। यद्यपि बालक बढ़कर पुरुष बन जाता है, फिर भी शरीर के भीतर का जीव नहीं बदलता। ऐसा नहीं है कि जो आत्मा बालक के रूप में वहाँ थी, वह चली गई हो। चिकित्सा विज्ञान भी यह मानता है कि प्रत्येक क्षण भौतिक शरीर बदलता रहता है। जिस प्रकार जीव इससे मोहित नहीं होते, उसी प्रकार एक प्रबुद्ध मनुष्य तब मोहित नहीं होता, जब शरीर मृत्यु के समय अपना अन्तिम परिवर्तन करता है। किन्तु जो व्यक्ति वस्तुओं को उनके यथार्थ रूप में नहीं समझता, वह शोक करता है। भौतिक अवस्था में हम बस सदा शरीर बदलते रहते हैं; यही हमारा रोग है। ऐसा नहीं है कि हम सदा एक मनुष्य-शरीर में ही बदलते हैं। हम अपने कर्मों के अनुसार एक पशु-शरीर अथवा एक देवता-शरीर में भी बदल सकते हैं। *पद्म पुराण* के अनुसार वहाँ मृत्यु पर होते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण वचन देते हैं कि जो उनके जन्म तथा क्रियाओं को सत्यतः जानता है, वह देहान्तरण के इस चक्र से मुक्त हो जाता है।\n\nमनुष्य श्रीकृष्ण के जन्म तथा क्रियाओं को सत्यतः कैसे समझे? इसकी व्याख्या *भगवद्गीता* के अठारहवें अध्याय में की गई है:\n\nbhaktyā mām abhijānāti\n\nyāvān yaś cāsmi tattvataḥ\n\ntato māṁ tattvato jñātvā\n\nviśate tad-anantaram\n\n\"मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम को उनके यथार्थ रूप में केवल भक्ति के द्वारा ही समझ सकता है। और जब कोई ऐसी भक्ति के द्वारा परमेश्वर की पूर्ण चेतना में स्थित होता है, तब वह ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है।\" (गीता 18.55)\n\nयहाँ पुनः *तत्त्वतः*, अर्थात् \"सत्यतः\" शब्द का प्रयोग हुआ है। मनुष्य भक्त बनकर श्रीकृष्ण के विज्ञान को सत्यतः समझ सकता है। जो भक्त नहीं है, जो कृष्णभावनामृत हेतु प्रयास नहीं करता, वह नहीं समझ सकता। चौथे अध्याय के आरम्भ में भी श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं (गीता 4.3) कि वे उसे योग के इस प्राचीन विज्ञान की व्याख्या कर रहे हैं, क्योंकि अर्जुन \"मेरा भक्त तथा मेरा मित्र\" है। जो व्यक्ति *भगवद्गीता* का बस शैक्षणिक अध्ययन करता है, उसके लिए श्रीकृष्ण का विज्ञान एक रहस्य ही बना रहता है। *भगवद्गीता* ऐसी कोई पुस्तक नहीं है, जिसे कोई बस पुस्तकालय से क्रय करके अकेले विद्वत्ता के बल पर समझ ले। अर्जुन न कोई महान् विद्वान् था, न वेदान्ती, न दार्शनिक, न ब्राह्मण, न संन्यासी; वह एक गृहस्थ तथा सैनिक था। फिर भी श्रीकृष्ण ने उसे *भगवद्गीता* का पात्र तथा गुरु-परम्परा में प्रथम अधिकारी बनने के लिए चुना। क्यों? \"क्योंकि तुम मेरे भक्त हो।\" *भगवद्गीता* को यथारूप तथा श्रीकृष्ण को यथास्वरूप समझने की यही योग्यता है—मनुष्य को कृष्णभावनाभावित होना चाहिए।\n\nऔर यह कृष्णभावनामृत क्या है? यह मन के दर्पण से धूल को हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे — इस महामन्त्र के कीर्तन द्वारा स्वच्छ करने की प्रक्रिया है। इस मन्त्र का जप करके तथा *भगवद्गीता* का श्रवण करके हम क्रमशः कृष्णभावनामृत को प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वरः सर्वभूतानाम् [गीता 18.61] — श्रीकृष्ण सदा हमारे हृदय में विराजमान रहते हैं। व्यष्टि आत्मा तथा परमात्मा — दोनों ही शरीररूपी वृक्ष पर बैठे हुए हैं। व्यष्टि आत्मा (जीव) वृक्ष का फल खा रही है, और परमात्मा साक्षी रूप में देख रहे हैं। ज्यों-ज्यों व्यष्टि आत्मा भक्ति की प्रक्रिया आरम्भ करती है और क्रमशः अपने कृष्णभावनामृत का विकास करने लगती है, त्यों-त्यों भीतर विराजमान परमात्मा उसकी सहायता करने लगते हैं कि वह मन के दर्पण से सम्पूर्ण मलिनता को झाड़ सके। श्रीकृष्ण समस्त सन्तजनों के मित्र हैं, और कृष्णभावनाभावित बनने का प्रयत्न एक सन्त-सदृश उद्यम है। श्रवणम् कीर्तनम् — जप तथा श्रवण द्वारा मनुष्य कृष्ण के विज्ञान को समझ सकता है और इस प्रकार स्वयं श्रीकृष्ण को समझ सकता है। और श्रीकृष्ण को समझ लेने पर मनुष्य मृत्यु के क्षण में तत्काल आध्यात्मिक जगत् में उनके धाम को जा सकता है। इस आध्यात्मिक जगत् का वर्णन *भगवद्गीता* में इस प्रकार हुआ है:\n\nna tad bhāsayate sūryo\n\nna śaśāṅko na pāvakaḥ\n\nyad gatvā na nivartante\n\ntad dhāma paramaṁ mama\n\n\"मेरा वह धाम न तो सूर्य से प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा से, और न विद्युत् से। जो उसे प्राप्त कर लेता है, वह कभी इस भौतिक जगत् में नहीं लौटता।\" (गीता 15.6)\n\nयह भौतिक जगत् सदा अन्धकारमय है; इसीलिए हमें सूर्य, चन्द्रमा तथा विद्युत् की आवश्यकता पड़ती है। *वेद* हमें आदेश देते हैं कि हम इस अन्धकार में न रहें, अपितु स्वयं को प्रकाश के जगत् — अर्थात् आध्यात्मिक जगत् — में स्थानान्तरित कर लें। \"अन्धकार\" शब्द का दोहरा अर्थ है; इसका अर्थ केवल प्रकाशहीनता ही नहीं, अपितु अज्ञान भी है।\n\nपरमेश्वर की अनेकानेक शक्तियाँ हैं। ऐसा नहीं है कि वे इस भौतिक जगत् में कोई कार्य करने आते हैं। *वेदों* में कहा गया है कि परमेश्वर के लिए करने को कुछ भी नहीं है। *भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण भी कहते हैं:\n\nna me pārthāsti kartavyaṁ\n\ntriṣu lokeṣu kiñcana\n\nnānavāptam avāptavyaṁ\n\nvarta eva ca karmaṇi\n\n\"हे पृथापुत्र! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्म विहित नहीं है। न मुझे किसी वस्तु का अभाव है, न मुझे कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता है — फिर भी मैं कर्म में संलग्न रहता हूँ।\" (गीता 3.22)\n\nअतः हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि श्रीकृष्ण को इस भौतिक जगत् में अवतरित होकर इतने सारे कार्यों में प्रवृत्त होना अनिवार्य है। कोई भी श्रीकृष्ण के समान अथवा उनसे श्रेष्ठ नहीं है, और उनमें समस्त ज्ञान स्वभावतः विद्यमान है। ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान प्राप्त करने हेतु तपस्या करनी पड़ती हो, अथवा उन्हें किसी समय ज्ञान ग्रहण करना या अर्जित करना पड़ता हो। समस्त कालों में तथा समस्त अवस्थाओं में वे ज्ञान से परिपूर्ण रहते हैं। भले ही वे अर्जुन को *भगवद्गीता* सुना रहे हों, किन्तु उन्हें कभी किसी ने *भगवद्गीता* नहीं पढ़ाई। जो यह समझ लेता है कि श्रीकृष्ण की यही स्थिति है, उसे इस भौतिक जगत् में जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं लौटना पड़ता। माया के प्रभाव में पड़कर हम अपना सम्पूर्ण जीवन इस भौतिक वातावरण के साथ समायोजन करने के प्रयत्न में बिता देते हैं, किन्तु मानव-जीवन का यह प्रयोजन नहीं है। मानव-जीवन तो कृष्ण के विज्ञान को समझने के लिए है।\n\nहमारी भौतिक आवश्यकताएँ ये हैं: भोजन की समस्या, मैथुन की, निद्रा की, अपनी रक्षा करने की तथा इन्द्रियतृप्ति अर्जित करने की। ये समस्याएँ मनुष्यों तथा पशुओं — दोनों में समान हैं। पशु इन समस्याओं को सुलझाने के प्रयत्न में व्यस्त रहते हैं, और यदि हम भी केवल इन्हीं को सुलझाने में लगे रहें तो हम पशुओं से किस प्रकार भिन्न हुए? तथापि मनुष्य में एक विशेष योग्यता है, जिसके द्वारा वह दिव्य कृष्णभावनामृत का विकास कर सकता है; किन्तु यदि वह इसका लाभ नहीं उठाता, तो वह पशु-कोटि में ही है। आधुनिक सभ्यता का दोष यही है कि वह इन जीवन-निर्वाह की समस्याओं को सुलझाने पर अत्यधिक बल देती है। आध्यात्मिक प्राणी होने के नाते हमारा यह कर्तव्य है कि हम स्वयं को जन्म-मृत्यु के इस बन्धन से निकाल लें। अतएव हमें सावधान रहना चाहिए कि मानव-जीवन का यह विशेष अवसर हाथ से न निकल जाए। स्वयं श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* प्रदान करने तथा हमें ईश्वर-भावनाभावित बनने में सहायता देने हेतु आते हैं। वस्तुतः यह समस्त भौतिक सृष्टि ही हमें इसी अनुशीलन के लिए दी गई है। किन्तु यदि इस अवसर तथा मानव-जीवन के इस उपहार को पाकर भी हम उनका उपयोग कृष्णभावनामृत के विकास हेतु न करें, तो हम इस दुर्लभ अवसर को खो बैठेंगे। इस अनुशीलन की प्रक्रिया अत्यन्त सरल है: श्रवणम् कीर्तनम् — श्रवण तथा कीर्तन। हमें श्रवण के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना है, और ध्यानपूर्वक श्रवण करने से प्रकाश निश्चय ही आता है। श्रीकृष्ण निःसन्देह सहायता करेंगे, क्योंकि वे भीतर ही विराजमान हैं। हमें केवल प्रयत्न करना है और थोड़ा-सा समय लगाना है। हमें यह पूछने के लिए किसी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कि हम प्रगति कर रहे हैं या नहीं। हम इसे स्वतः ही जान लेंगे, ठीक जैसे एक भूखा व्यक्ति जान लेता है कि भरपेट भोजन से उसकी तृप्ति हो गई है।\n\nवस्तुतः कृष्णभावनामृत अथवा आत्म-साक्षात्कार की यह प्रक्रिया अधिक कठिन नहीं है। श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* में इसे अर्जुन को सिखाया, और यदि हम *भगवद्गीता* को ठीक उसी प्रकार समझ लें जैसे अर्जुन ने समझा था, तो हमें पूर्ण अवस्था तक पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं होगी। किन्तु यदि हम अपनी ही सांसारिक शैक्षणिक मनोवृत्ति के अनुसार *भगवद्गीता* की व्याख्या करने का प्रयत्न करें, तो हम सब कुछ बिगाड़ देते हैं।\n\nजैसा पहले कहा जा चुका है, हरे कृष्ण का यह कीर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा भौतिक संगति से उत्पन्न समस्त कल्मष मन के दर्पण से दूर हो जाते हैं। अपने कृष्णभावनामृत को पुनर्जाग्रत करने हेतु किसी बाह्य सहायता की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि कृष्णभावनामृत आत्मा के भीतर सुप्त अवस्था में पड़ा रहता है। वास्तव में यह आत्मा का मूल गुण ही है। हमें तो केवल इस प्रक्रिया द्वारा उसका आवाहन करना है। कृष्णभावनामृत एक नित्य तथ्य है। यह किसी संगठन द्वारा थोपा गया कोई सिद्धान्त अथवा मतमतान्तर नहीं है। यह समस्त जीवों के भीतर विद्यमान है, चाहे वे मनुष्य हों अथवा पशु। लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व जब भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु दक्षिण भारत के वनों से होकर जा रहे थे, तब उन्होंने हरे कृष्ण का कीर्तन किया, और समस्त पशु — व्याघ्र, हाथी तथा हरिण — पवित्र नामों पर नृत्य करते हुए उनके साथ सम्मिलित हो गए। निस्सन्देह यह कीर्तन की शुद्धता पर निर्भर करता है। ज्यों-ज्यों हम कीर्तन में प्रगति करते हैं, शुद्धि निश्चय ही आती है।"}
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करने की भावना से करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि हमें अपनी कार्य-प्रक्रिया बदलनी है, अपितु हमें यह समझना अवश्य है कि हम किसके लिए कार्य कर रहे हैं। जो भी क्रिया हमें करनी हो, उसे हमें सम्पन्न करना चाहिए, किन्तु हमें काम अर्थात् वासना के बहाव में नहीं बहना चाहिए। संस्कृत शब्द *काम* का प्रयोग लालसा, इच्छा अथवा इन्द्रियतृप्ति को इंगित करने हेतु होता है। श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं कि हमें *काम* अथवा अपनी ही वासना की तृप्ति हेतु कार्य नहीं करना चाहिए। *भगवद्गीता* की समूची शिक्षा इसी सिद्धान्त पर आधारित है।\n\nअर्जुन अपने सम्बन्धियों से युद्ध न करके अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना चाहता था, किन्तु श्रीकृष्ण ने उसे यह विश्वास दिलाने के लिए कहा कि वह परमेश्वर की तृप्ति हेतु अपने कर्तव्य का पालन करे। भौतिक दृष्टि से यह अत्यन्त धार्मिक प्रतीत हो सकता है कि वह राज्य पर अपना दावा त्याग रहा है और अपने सम्बन्धियों को मारने से इन्कार कर रहा है, किन्तु श्रीकृष्ण ने इसका अनुमोदन नहीं किया, क्योंकि अर्जुन के इस निर्णय का आधार अपनी ही इन्द्रियों को तृप्त करना था। मनुष्य के कार्य अथवा व्यवसाय को बदलने की आवश्यकता नहीं है — जैसे अर्जुन का नहीं बदला गया — किन्तु उसे अपनी चेतना अवश्य बदलनी पड़ती है। तथापि इस चेतना को बदलने हेतु ज्ञान आवश्यक है। वह ज्ञान यह जानना है कि \"मैं श्रीकृष्ण का अंश हूँ, कृष्ण की परा शक्ति हूँ।\" यही वास्तविक ज्ञान है। आपेक्षिक ज्ञान हमें किसी यन्त्र की मरम्मत करना सिखा सकता है, किन्तु वास्तविक ज्ञान तो श्रीकृष्ण के साथ अभिन्न रूप में अपनी स्थिति को जानना है। उनका अंश होने के नाते हमारा सुख, जो आंशिक है, पूर्ण पर निर्भर है। उदाहरणार्थ, मेरा हाथ तभी सुख पा सकता है जब वह मेरे शरीर से जुड़ा रहकर उसकी सेवा करे। वह किसी अन्य के शरीर की सेवा में सुख नहीं पाता। चूँकि हम श्रीकृष्ण के अंश हैं, अतः हमारा सुख उनकी सेवा में ही है। \"मैं तुम्हारी सेवा करके सुखी नहीं हो सकता,\" प्रत्येक व्यक्ति यही सोचता है। \"मैं तो केवल अपनी ही सेवा करके सुखी हो सकता हूँ।\" किन्तु कोई नहीं जानता कि वह \"स्व\" कौन है। वह स्व श्रीकृष्ण ही हैं।\n\nmamaivāṁśo jīva-loke\n\njīva-bhūtaḥ sanātanaḥ\n\nmanaḥ ṣaṣṭhānīndriyāṇi\n\nprakṛti sthāni karṣati\n\n\"इस बद्ध जगत् में समस्त जीव मेरे ही नित्य, खण्डित अंश हैं। बद्ध जीवन के कारण वे छह इन्द्रियों के साथ, जिनमें मन भी सम्मिलित है, अत्यन्त संघर्ष कर रहे हैं।\" (गीता 15.7)\n\nजीव, अर्थात् प्राणी, अब भौतिक संसर्ग के कारण पूर्ण से विच्छिन्न हो गए हैं। अतः हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम अपने भीतर विद्यमान सुप्त कृष्णभावनामृत के द्वारा स्वयं को पुनः जोड़ने का प्रयत्न करें। कृत्रिम रूप से हम श्रीकृष्ण को विस्मृत करने तथा स्वतन्त्र रूप से जीने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु यह सम्भव नहीं है। जब हम श्रीकृष्ण से स्वतन्त्र होकर जीने का प्रयत्न करते हैं, तब हम भौतिक प्रकृति के नियमों के प्रभाव में आ जाते हैं। यदि कोई यह सोचे कि वह श्रीकृष्ण से स्वतन्त्र है, तो वह कृष्ण की माया-शक्ति के अधीन हो जाता है, ठीक जैसे यदि कोई यह सोचे कि वह सरकार तथा उसके नियमों से स्वतन्त्र है, तो वह आरक्षी-बल के अधीन हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति स्वतन्त्र बनने का प्रयत्न कर रहा है, और इसी को माया अर्थात् भ्रम कहते हैं। व्यष्टिगत रूप से, सामुदायिक रूप से, सामाजिक रूप से, राष्ट्रीय रूप से अथवा वैश्विक रूप से — किसी भी रूप में स्वतन्त्र होना सम्भव नहीं है। जब हम यह अनुभव कर लेंगे कि हम परतन्त्र हैं, तभी हमने ज्ञान प्राप्त किया होगा। आज इतने सारे लोग संसार में शान्ति हेतु प्रयत्नशील हैं, किन्तु वे नहीं जानते कि उस शान्ति-सूत्र को किस प्रकार कार्यान्वित किया जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ इतने वर्षों से शान्ति हेतु प्रयत्न कर रहा है, फिर भी युद्ध चल ही रहा है।\n\nyac cāpi sarva-bhūtānām-\n\nbījaṁ tad aham arjuna\n\nna tad asti vinā yat syān\n\nmayā bhūtaṁ carācaram\n\n\"इसके अतिरिक्त, हे अर्जुन! मैं समस्त अस्तित्वों का उत्पादक बीज हूँ। कोई भी प्राणी — चर अथवा अचर — ऐसा नहीं है जो मेरे बिना रह सके।\" (गीता 10.39)\n\nइस प्रकार श्रीकृष्ण ही समस्त वस्तुओं के स्वामी हैं, परम भोक्ता हैं तथा प्रत्येक वस्तु के फल के ग्रहणकर्ता हैं। हम स्वयं को अपने श्रम के फलों का स्वामी मान सकते हैं, किन्तु यह एक भ्रान्त धारणा है। हमें यह समझना ही होगा कि हमारे समस्त कर्मों के फलों के परम स्वामी श्रीकृष्ण ही हैं। किसी कार्यालय में सैकड़ों लोग कार्य कर रहे होंगे, किन्तु वे यह समझते हैं कि व्यवसाय जो भी लाभ अर्जित करता है, वह स्वामी का होता है। ज्योंही बैंक का कोई खजांची यह सोचता है, \"ओह, मेरे पास इतना धन है। मैं ही इसका स्वामी हूँ। मैं इसे अपने साथ घर ले चलूँ,\" त्योंही उसका संकट आरम्भ हो जाता है। यदि हम यह सोचें कि हमने जो भी सम्पत्ति एकत्र की है, उसे हम अपनी ही इन्द्रियतृप्ति हेतु प्रयोग कर सकते हैं, तो हम काम अर्थात् वासना से प्रेरित होकर कार्य कर रहे हैं। किन्तु यदि हम यह समझ लें कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह श्रीकृष्ण का है, तो हम मुक्त हो जाते हैं। हमारे हाथ में वही धन हो सकता है, किन्तु ज्योंही हम स्वयं को स्वामी मानने लगते हैं, त्योंही हम माया के प्रभाव में आ जाते हैं। जो इस चेतना में स्थित है कि सब कुछ श्रीकृष्ण का है, वही वास्तव में विद्वान् पुरुष है।\n\nīśāvāsyam idaṁ sarvaṁ\n\nyat kiñca jagatyāṁ jagat\n\ntena tyaktena bhuñjīthā\n\nmā gṛdhaḥ kasya svid dhanam\n\n\"इस ब्रह्माण्ड के भीतर जो भी सजीव अथवा निर्जीव है, वह सब भगवान् द्वारा नियन्त्रित तथा उन्हीं का स्वामित्व है। अतः मनुष्य को केवल उन्हीं वस्तुओं को स्वीकार करना चाहिए जो उसके लिए आवश्यक हैं, जो उसके भाग के रूप में नियत हैं; और यह भली-भाँति जानते हुए कि शेष वस्तुएँ किसकी हैं, उसे उन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिए।\" (*ईशोपनिषद्*, मन्त्र 1)\n\nईशावास्य की यह चेतना — कि सब कुछ श्रीकृष्ण का है — को न केवल व्यष्टिगत रूप से, अपितु राष्ट्रीय तथा वैश्विक रूप से भी पुनर्जाग्रत करना ही होगा। तभी शान्ति होगी। हम प्रायः परोपकारी तथा परहितैषी बनने की प्रवृत्ति रखते हैं, और हम अपने देशवासियों के, अपने परिवारों के तथा संसार के समस्त लोगों के मित्र बनने का प्रयत्न करते हैं — किन्तु यह एक भ्रान्त धारणा पर आधारित है। वास्तविक मित्र तो श्रीकृष्ण ही हैं, और यदि हम अपने परिवार, राष्ट्र अथवा ग्रह का हित करना चाहते हैं, तो हम उन्हीं के लिए कार्य करेंगे। यदि हमारे मन में अपने परिवार का कल्याण हो, तो हम समस्त सदस्यों को कृष्णभावनाभावित बनाने का प्रयत्न करेंगे। ऐसे अनेक लोग हैं जो अपने परिवारों का हित करने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश वे सफल नहीं होते। वे यह नहीं जानते कि वास्तविक समस्या क्या है। जैसा कि *भागवत* कहता है, मनुष्य को तब तक पिता, माता अथवा गुरु बनने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए जब तक वह अपनी सन्तान को मृत्यु से, भौतिक प्रकृति की पकड़ से बचाने में समर्थ न हो। पिता को श्रीकृष्ण के ज्ञान में होना चाहिए, और उसे यह दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि जो निर्दोष सन्तानें उसे सौंपी गई हैं, उन्हें फिर से जन्म-मृत्यु के चक्र से नहीं गुजरना पड़ेगा। उसे यह दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि वह अपनी सन्तान को इस प्रकार प्रशिक्षित करेगा कि उन्हें फिर कभी जन्म-मृत्यु के पीड़ादायक चक्र के अधीन न होना पड़े। किन्तु इससे पूर्व कि कोई यह कर सके, उसे स्वयं को निपुण बनाना होगा। यदि वह कृष्णभावनामृत में निपुण हो जाए, तो वह न केवल अपनी सन्तान की, अपितु अपने समाज तथा राष्ट्र की भी सहायता कर सकता है। किन्तु यदि वह स्वयं ही अज्ञान से बँधा हुआ है, तो वह अन्य लोगों को, जो उसी प्रकार बँधे हुए हैं, किस प्रकार मुक्त कर सकता है? इससे पूर्व कि कोई अन्यों को मुक्त कर सके, उसे स्वयं मुक्त होना चाहिए। वास्तव में कोई भी मुक्त पुरुष नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति भौतिक प्रकृति के वशीभूत है; किन्तु जो श्रीकृष्ण के शरणागत है, उसे माया स्पर्श नहीं कर सकती। समस्त मनुष्यों में वही मुक्त है। यदि कोई स्वयं को सूर्य के प्रकाश में रखे, तो अन्धकार का प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु यदि कोई स्वयं को कृत्रिम प्रकाश में रखे, तो वह टिमटिमा कर बुझ सकता है। श्रीकृष्ण तो ठीक सूर्य के प्रकाश के समान हैं। जहाँ वे विद्यमान हैं, वहाँ अन्धकार तथा अज्ञान का प्रश्न ही नहीं उठता। विवेकी पुरुष, अर्थात् महात्माजन, इसे समझते हैं।\n\nahaṁ sarvasya prabhavo\n\nmattaḥ sarvaṁ pravartate\n\niti matvā bhajante māṁ\n\nbudhā bhāva-samanvitāḥ\n\n\"मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का उद्गम हूँ। प्रत्येक वस्तु मुझसे ही उद्भूत होती है। जो विवेकी इसे भली-भाँति जान लेते हैं, वे मेरी भक्ति में संलग्न होते हैं और पूर्ण हृदय से मेरी आराधना करते हैं।\" (गीता 10.8)\n\nइस श्लोक में *बुध* शब्द का प्रयोग हुआ है, जो विवेकी अथवा विद्वान् पुरुष को इंगित करता है। उसका लक्षण क्या है? वह जानता है कि श्रीकृष्ण ही प्रत्येक वस्तु के, समस्त उद्गमों के मूल स्रोत हैं। वह जानता है कि वह जो भी देखता है, वह श्रीकृष्ण का ही उद्भव है। भौतिक जगत् में काम-जीवन सबसे प्रमुख घटक है। यौन-आकर्षण समस्त जीव-जातियों में पाया जाता है, और कोई पूछ सकता है कि यह कहाँ से आता है। विवेकी पुरुष समझता है कि यह प्रवृत्ति श्रीकृष्ण में विद्यमान है और यह व्रज की गोपियों के साथ उनके सम्बन्धों में प्रकट होती है। इस भौतिक जगत् में जो कुछ भी पाया जाता है, वह श्रीकृष्ण में पूर्ण रूप में भी पाया जा सकता है। अन्तर इतना है कि भौतिक जगत् में प्रत्येक वस्तु विकृत रूप में प्रकट होती है। श्रीकृष्ण में ये समस्त प्रवृत्तियाँ तथा अभिव्यक्तियाँ शुद्ध चेतना में, आत्मा में विद्यमान हैं। जो इसे पूर्ण ज्ञान सहित जान लेता है, वह श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त बन जाता है।\n\nmahātmānas tu māṁ pārtha\n\ndaivīṁ prakṛtim āśritāḥ\n\nbhajanty ananya-manaso\n\njñātvā bhūtādim avyayam\n\n[गीता 9.13]\n\nsatataṁ kīrtayanto māṁ\n\nyatantaś ca dṛḍha-vratāḥ\n\nnamasyantaś ca māṁ bhaktyā\n\nnitya-yuktā upāsate\n\n[गीता 9.14]\n\n\"हे पृथापुत्र! जो मोहरहित हैं, वे महात्माजन दिव्य प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं। वे पूर्णतया भक्ति में संलग्न रहते हैं, क्योंकि वे मुझे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में, आदि तथा अक्षय जानते हैं। सदा मेरी महिमा का कीर्तन करते हुए, दृढ़ संकल्प से प्रयत्नशील रहते हुए, मेरे सम्मुख प्रणाम करते हुए, ये महात्माजन नित्य ही भक्ति सहित मेरी आराधना करते हैं।\" (गीता 9.13)\n\nमहात्मा, अर्थात् महान् आत्मा कौन है? वह वही है जो परा शक्ति के प्रभाव में है। इस समय हम श्रीकृष्ण की अपरा शक्ति के प्रभाव में हैं। जीव होने के नाते हमारी स्थिति तटस्था है — हम स्वयं को इन दोनों शक्तियों में से किसी भी एक में स्थानान्तरित कर सकते हैं। श्रीकृष्ण पूर्णतया स्वतन्त्र हैं, और चूँकि हम उनके अंश हैं, अतः स्वतन्त्रता का यह गुण हम में भी है। इसलिए हमारे पास यह विकल्प है कि हम किस शक्ति के अधीन कार्य करें। चूँकि हम परा प्रकृति से अनभिज्ञ हैं, अतः हमारे पास अपरा प्रकृति में बने रहने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।\n\nकुछ दर्शन यह प्रतिपादित करते हैं कि जिस प्रकृति का अनुभव हम इस समय कर रहे हैं, उसके अतिरिक्त कोई अन्य प्रकृति नहीं है, और इसका एकमात्र समाधान यही है कि इसे शून्य कर दिया जाए और स्वयं शून्य बन जाया जाए। किन्तु हम शून्य नहीं हो सकते, क्योंकि हम जीव हैं। शरीर बदलने मात्र से यह नहीं हो जाता कि हमारा अन्त हो गया। इससे पूर्व कि हम भौतिक प्रकृति के प्रभाव से बाहर निकल सकें, हमें यह समझना होगा कि वास्तव में हमारा स्थान कहाँ है, हमें कहाँ जाना है। यदि हम यह न जानें कि कहाँ जाना है, तो हम केवल यही कहेंगे, \"ओह, हम नहीं जानते कि श्रेष्ठ क्या है और निकृष्ट क्या है। हम तो बस इतना ही जानते हैं, अतः हम यहीं रहें और सड़ते रहें।\" तथापि *भगवद्गीता* हमें परा शक्ति, परा प्रकृति की जानकारी देती है।\n\nश्रीकृष्ण जो भी कहते हैं, वे समस्त नित्यता के लिए कहते हैं; वह बदलता नहीं। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हमारा वर्तमान व्यवसाय क्या है अथवा अर्जुन का व्यवसाय क्या था — हमें तो केवल अपनी चेतना बदलनी है। इस समय हम आत्म-हित की चेतना से संचालित हो रहे हैं, किन्तु हम नहीं जानते कि हमारा वास्तविक आत्म-हित क्या है। वास्तव में हमारा आत्म-हित नहीं, अपितु इन्द्रिय-हित है। हम जो कुछ भी करते हैं, इन्द्रियों को तृप्त करने हेतु करते हैं। यही चेतना है जिसे बदलना ही होगा। उसके स्थान पर हमें अपना वास्तविक आत्म-हित — कृष्णभावनामृत — स्थापित करना होगा।\n\nयह किस प्रकार होता है? जीवन के प्रत्येक चरण में कृष्णभावनाभावित बनना किस प्रकार सम्भव है? वास्तव में श्रीकृष्ण इसे हमारे लिए अत्यन्त सरल बना देते हैं:\n\nraso 'ham apsu kaunteya\n\nprabhāsmi śaśi-sūryayoḥ\n\npraṇavaḥ sarva-vedeṣu\n\nśabdaḥ khe pauruṣaṁ nṛṣu\n\n\"हे कुन्तीपुत्र [अर्जुन]! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, वैदिक मन्त्रों में ओंकार हूँ; मैं आकाश में ध्वनि हूँ और मनुष्य में सामर्थ्य हूँ।\" (गीता 7.8)\n\nइस श्लोक में श्रीकृष्ण वर्णन कर रहे हैं कि हम जीवन की समस्त अवस्थाओं में किस प्रकार पूर्णतया कृष्णभावनाभावित बन सकते हैं। समस्त जीवों को जल पीना ही पड़ता है। जल का स्वाद इतना मधुर है कि जब हम प्यासे होते हैं, तब जल के अतिरिक्त और कुछ काम नहीं आता। कोई भी निर्माता जल के शुद्ध स्वाद का सृजन नहीं कर सकता। इस प्रकार जल पीते समय हम श्रीकृष्ण अथवा ईश्वर का स्मरण कर सकते हैं। कोई भी अपने जीवन के प्रत्येक दिन जल पीने से बच नहीं सकता, अतः ईश्वर-भावना तो वहाँ है ही — हम उसे कैसे भूल सकते हैं?\n\nइसी प्रकार, जहाँ कहीं भी कोई प्रकाश है, वह भी श्रीकृष्ण ही है। आध्यात्मिक आकाश में जो मूल तेज है, अर्थात् ब्रह्मज्योति, वह श्रीकृष्ण के शरीर से ही उद्भूत होती है। यह भौतिक आकाश आच्छादित है। भौतिक ब्रह्माण्ड का स्वभाव ही अन्धकार है, जिसका अनुभव हम रात्रि में करते हैं। यह कृत्रिम रूप से सूर्य द्वारा, चन्द्रमा के परावर्तित प्रकाश द्वारा तथा विद्युत् द्वारा प्रकाशित होता है। यह प्रकाश कहाँ से आ रहा है? सूर्य ब्रह्मज्योति, अर्थात् आध्यात्मिक जगत् के देदीप्यमान तेज द्वारा प्रकाशित हो रहा है। आध्यात्मिक जगत् में सूर्य, चन्द्रमा अथवा विद्युत् की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वहाँ प्रत्येक वस्तु ब्रह्मज्योति द्वारा प्रकाशित है। तथापि इस पृथ्वी पर हम जब कभी सूर्य से कोई प्रकाश देखें, तब श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकते हैं।\n\nजब हम उन वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते हैं जिनका आरम्भ ओम् से होता है, तब भी हम श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकते हैं। ओम्, हरे कृष्ण के समान ही, ईश्वर को सम्बोधन है, और ओम् भी श्रीकृष्ण ही है। *शब्दः* का अर्थ है ध्वनि, और जब कभी हम कोई ध्वनि सुनें, तब हमें यह जानना चाहिए कि वह मूल ध्वनि का — शुद्ध आध्यात्मिक ध्वनि ओम् अथवा हरे कृष्ण का — कम्पन है। भौतिक जगत् में हम जो भी ध्वनि सुनते हैं, वह उसी मूल आध्यात्मिक ध्वनि ओम् का प्रतिबिम्ब मात्र है। इस प्रकार जब हम ध्वनि सुनें, जब हम जल पिएँ, जब हम कोई प्रकाश देखें, तब हम ईश्वर का स्मरण कर सकते हैं। यदि हम यह कर सकें, तो फिर हम ईश्वर का स्मरण कब नहीं करेंगे? यही कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया है। इस प्रकार हम चौबीसों घण्टे श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकते हैं, और इस प्रकार श्रीकृष्ण हमारे साथ रहते हैं। निस्सन्देह श्रीकृष्ण सदा हमारे साथ हैं, किन्तु ज्योंही हम इसका स्मरण करते हैं, त्योंही उनकी उपस्थिति तथ्यपूर्ण हो जाती है और अनुभव में आती है।\n\nईश्वर के साथ संग करने हेतु नौ भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएँ हैं, और संग करने की पहली विधि है श्रवणम् — श्रवण। *भगवद्गीता* का पठन करके हम श्रीकृष्ण के वचनों को सुनते हैं, जिसका अर्थ है कि हम वास्तव में श्रीकृष्ण अथवा ईश्वर के साथ संग कर रहे हैं। (हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि जब हम कृष्ण की बात करते हैं, तब हम ईश्वर का ही उल्लेख करते हैं।) ज्यों-ज्यों हम ईश्वर के साथ संग करते हैं और ज्यों-ज्यों हम श्रीकृष्ण के वचनों तथा उनके नामों को सुनते जाते हैं, त्यों-त्यों भौतिक प्रकृति का कल्मष घटता जाता है। यह समझ लेने पर कि श्रीकृष्ण ध्वनि हैं, प्रकाश हैं, जल हैं, तथा ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं, श्रीकृष्ण से बच पाना असम्भव हो जाता है। यदि हम इस प्रकार श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकें, तो उनके साथ हमारा संग स्थायी हो जाता है।\n\nश्रीकृष्ण के साथ संग सूर्य के प्रकाश के साथ संग के समान है। जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहाँ कोई कल्मष नहीं है। जब तक कोई सूर्य की पराबैंगनी किरणों में रहता है, तब तक वह रोगग्रस्त नहीं होगा। पाश्चात्य चिकित्सा में सभी प्रकार के रोगों हेतु सूर्य-प्रकाश की अनुशंसा की जाती है, और *वेदों* के अनुसार रोगग्रस्त मनुष्य को रोग की चिकित्सा हेतु सूर्य की आराधना करनी चाहिए। इसी प्रकार, यदि हम कृष्णभावनामृत में श्रीकृष्ण के साथ संग करें, तो हमारे रोग दूर हो जाते हैं। हरे कृष्ण का कीर्तन करके हम श्रीकृष्ण के साथ संग कर सकते हैं, और हम जल को कृष्ण रूप में, सूर्य तथा चन्द्रमा को कृष्ण रूप में देख सकते हैं, और हम ध्वनि में श्रीकृष्ण को सुन सकते हैं तथा जल में उनका आस्वादन कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश अपनी वर्तमान अवस्था में हम श्रीकृष्ण को भूल चुके हैं। किन्तु अब हमें उनका स्मरण करके अपने आध्यात्मिक जीवन को पुनर्जाग्रत करना है।\n\nश्रवणम् कीर्तनम् — श्रवण तथा कीर्तन — की इस प्रक्रिया का अनुमोदन भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने किया। जब भगवान् चैतन्य भगवान् के एक मित्र तथा महान् भक्त रामानन्द राय से वार्तालाप कर रहे थे, तब भगवान् ने उनसे आध्यात्मिक साक्षात्कार की विधियों के विषय में प्रश्न किया। रामानन्द ने वर्णाश्रम-धर्म, संन्यास, कर्म का त्याग तथा ऐसी अनेक विधियों की अनुशंसा की, किन्तु भगवान् चैतन्य ने कहा, \"नहीं, ये सब इतनी अच्छी नहीं हैं।\" प्रत्येक बार जब रामानन्द राय कोई सुझाव देते, भगवान् चैतन्य उसे अस्वीकार कर देते और आध्यात्मिक विकास हेतु कोई श्रेष्ठतर विधि माँगते। अन्ततः रामानन्द राय ने एक वैदिक सूत्र उद्धृत किया, जो यह अनुशंसा करता था कि मनुष्य ईश्वर को समझने हेतु मानसिक कल्पना के समस्त अनावश्यक उद्यम को त्याग दे, क्योंकि कल्पना द्वारा परम सत्य तक पहुँचना सम्भव नहीं है। उदाहरणार्थ, वैज्ञानिक दूरस्थ तारों तथा ग्रहों के विषय में कल्पना तो कर सकते हैं, किन्तु अनुभव के बिना वे कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते। मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन-भर कल्पना करता रह सकता है और कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता।\n\nईश्वर के विषय में कल्पना करना तो विशेष रूप से व्यर्थ है। अतएव *श्रीमद्भागवत* यह अनुशंसा करता है कि सभी प्रकार की कल्पना का त्याग कर दिया जाए। इसके स्थान पर यह अनुशंसा की जाती है कि मनुष्य विनम्र बने, यह अनुभव करते हुए कि वह न केवल एक तुच्छ प्राणी है, अपितु यह पृथ्वी भी इस विशाल ब्रह्माण्ड में मात्र एक छोटा-सा बिन्दु है। न्यूयॉर्क नगर अत्यन्त विशाल प्रतीत हो सकता है, किन्तु जब मनुष्य यह अनुभव कर लेता है कि पृथ्वी इतना छोटा-सा स्थान है, और पृथ्वी पर अमेरिका मात्र एक और छोटा-सा स्थान है, और अमेरिका में न्यूयॉर्क नगर मात्र एक छोटा-सा स्थान है, और न्यूयॉर्क में व्यक्ति लाखों में से मात्र एक है, तब मनुष्य समझ सकता है कि वह आखिर इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। ब्रह्माण्ड तथा ईश्वर के समक्ष अपनी तुच्छता का अनुभव करते हुए हमें कृत्रिम रूप से अहंकारग्रस्त नहीं होना चाहिए, अपितु विनम्र होना चाहिए। हमें अत्यन्त सावधान रहना चाहिए कि हम मेंढक-दर्शन के शिकार न हो जाएँ। एक बार एक कुएँ में एक मेंढक था, और जब एक मित्र ने उसे अटलांटिक महासागर के अस्तित्व की सूचना दी, तब उसने अपने मित्र से पूछा, \"ओह, यह अटलांटिक महासागर क्या है?\"\n\n\"यह जल का एक विशाल पिण्ड है,\" उसके मित्र ने उत्तर दिया।\n\n\"कितना विशाल? क्या इस कुएँ से दुगुना बड़ा?\"\n\n\"ओह नहीं, बहुत-बहुत बड़ा,\" उसके मित्र ने उत्तर दिया।\n\n\"कितना बड़ा? दस गुना बड़ा?\" इस प्रकार वह मेंढक गणना करता रहा। किन्तु उस विशाल महासागर की गहराई तथा दूरस्थ विस्तार को समझ पाने की उसमें क्या सम्भावना है? हमारी क्षमताएँ, अनुभव तथा कल्पना-शक्तियाँ सदा सीमित रहती हैं। हम केवल ऐसे ही मेंढक-दर्शन को जन्म दे सकते हैं। अतएव *श्रीमद्भागवत* यह अनुशंसा करता है कि हम परम को समझने के प्रयत्न में कल्पना की विधि को समय की बर्बादी जानकर त्याग दें।\n\nकल्पना का त्याग कर देने के पश्चात् हमें क्या करना चाहिए? *भागवत* यह अनुशंसा करता है कि हम विनम्र बनें और विनम्रतापूर्वक ईश्वर का सन्देश सुनें। यह सन्देश *भगवद्गीता* तथा अन्य वैदिक साहित्य में भी, बाइबिल अथवा कुरान में — किसी भी प्रामाणिक शास्त्र में — पाया जा सकता है, अथवा यह किसी आत्म-साक्षात्कृत आत्मा से सुना जा सकता है। मुख्य बात यह है कि मनुष्य को कल्पना नहीं करनी चाहिए, अपितु केवल ईश्वर के विषय में श्रवण करना चाहिए। ऐसे श्रवण का क्या परिणाम होगा? मनुष्य चाहे जो भी हो — चाहे वह दरिद्र हो अथवा धनी, अमेरिकी हो, यूरोपीय हो अथवा भारतीय, ब्राह्मण हो, शूद्र हो अथवा कुछ भी — यदि मनुष्य ईश्वर के दिव्य वचन को मात्र सुन ले, तो भगवान्, जिन्हें किसी शक्ति अथवा बल से कभी जीता नहीं जा सकता, प्रेम द्वारा जीत लिए जाते हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण का मित्र था, किन्तु श्रीकृष्ण, यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, अर्जुन के सारथी, एक तुच्छ सेवक बन गए। अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रेम करता था, और श्रीकृष्ण ने इस प्रकार उसके प्रेम का प्रत्युत्तर दिया। इसी प्रकार, जब श्रीकृष्ण बालक थे, तब उन्होंने क्रीड़ापूर्वक अपने पिता नन्द महाराज की पादुकाएँ ले लीं और उन्हें अपने सिर पर रख लिया। लोग ईश्वर के साथ एक हो जाने के लिए अत्यधिक प्रयत्न कर सकते हैं, किन्तु वास्तव में हम उससे भी आगे जा सकते हैं — हम ईश्वर के पिता बन सकते हैं। निस्सन्देह ईश्वर समस्त प्राणियों के पिता हैं, और उनका स्वयं कोई पिता नहीं है, किन्तु वे अपने भक्त को, अपने प्रेमी को, पिता के रूप में स्वीकार करते हैं। श्रीकृष्ण प्रेमवश अपने भक्त द्वारा जीते जाने को स्वीकार करते हैं। मनुष्य को केवल इतना करना है कि वह भगवान् के सन्देश को अत्यन्त ध्यानपूर्वक सुने।\n\n*भगवद्गीता* के सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण उन अतिरिक्त उपायों को बताते हैं, जिनके द्वारा उन्हें जीवन के प्रत्येक चरण में अनुभव किया जा सकता है:\n\npuṇyo gandhaḥ pṛthivyāṁ ca\n\ntejaś cāsmi vibhāvasau\n\njīvanaṁ sarva-bhūteṣu\n\ntapaś cāsmi tapasviṣu\n\n\"मैं पृथ्वी की मूल सुगन्ध हूँ, और मैं अग्नि में ताप हूँ। मैं समस्त जीवों का जीवन हूँ, और मैं समस्त तपस्वियों की तपस्या हूँ।\" (गीता 7.9)\n\n*पुण्यो गन्धः* शब्द सुगन्धों की ओर संकेत करते हैं। केवल श्रीकृष्ण ही स्वाद तथा सुगन्धों का सृजन कर सकते हैं। हम संश्लेषण द्वारा कुछ गन्ध अथवा सुगन्ध बना सकते हैं, किन्तु ये उन मूल सुगन्धों के समान उत्तम नहीं होतीं जो प्रकृति में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। जब हम किसी उत्तम प्राकृतिक सुगन्ध को सूँघें, तब हम सोच सकते हैं, \"ओह, यहाँ ईश्वर हैं। यहाँ श्रीकृष्ण हैं।\" अथवा जब हम किसी प्राकृतिक सौन्दर्य को देखें, तब हम सोच सकते हैं, \"ओह, यहाँ श्रीकृष्ण हैं।\" अथवा जब हम किसी असाधारण, शक्तिशाली अथवा अद्भुत वस्तु को देखें, तब हम सोच सकते हैं, \"यहाँ श्रीकृष्ण हैं।\" अथवा जब हम जीवन का कोई भी रूप देखें, चाहे वह किसी वृक्ष में हो, किसी पौधे में, किसी पशु में अथवा किसी मनुष्य में — हमें यह समझना चाहिए कि यह जीवन श्रीकृष्ण का ही अंश है, क्योंकि ज्योंही वह आध्यात्मिक स्फुलिंग, जो श्रीकृष्ण का अंश है, शरीर से निकाल लिया जाता है, त्योंही शरीर विघटित हो जाता है।\n\nbījaṁ māṁ sarva-bhūtānāṁ\n\nviddhi pārtha sanātanam\n\nbuddhir buddhimatām asmi\n\ntejas tejasvinām aham\n\n\"हे पृथापुत्र! जान लो कि मैं समस्त अस्तित्वों का आदि बीज हूँ, बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ, तथा समस्त बलशाली पुरुषों का पराक्रम हूँ।\" (गीता 7.10)\n\nयहाँ फिर स्पष्ट रूप से कहा गया है कि श्रीकृष्ण समस्त जीवों का जीवन हैं। इस प्रकार प्रत्येक चरण पर हम ईश्वर को देख सकते हैं। लोग पूछ सकते हैं, \"क्या आप मुझे ईश्वर दिखा सकते हैं?\" हाँ, निस्सन्देह। ईश्वर को अनेक प्रकार से देखा जा सकता है। किन्तु यदि कोई अपनी आँखें मूँद ले और कहे, \"मैं ईश्वर को नहीं देखूँगा,\" तो फिर उसे ईश्वर कैसे दिखाए जा सकते हैं?\n\nउपर्युक्त श्लोक में *बीजम्* शब्द का अर्थ है बीज, और उस बीज को नित्य (*सनातनम्*) घोषित किया गया है। कोई एक विशाल वृक्ष देख सकता है, किन्तु इस वृक्ष का उद्गम क्या है? वह बीज है, और वह बीज नित्य है। अस्तित्व का बीज प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान है। शरीर तो स्वयं अनेक परिवर्तनों से गुजर सकता है — वह माता के गर्भ में विकसित हो सकता है, एक छोटे शिशु के रूप में बाहर आ सकता है और बाल्यावस्था तथा प्रौढ़ावस्था से होकर बढ़ सकता है — किन्तु उस अस्तित्व का बीज जो भीतर है, वह स्थायी रहता है। अतएव वह सनातन है। अगोचर रूप से हम अपने शरीर को प्रत्येक क्षण, प्रत्येक पल बदल रहे हैं। किन्तु बीजम्, अर्थात् बीज, अर्थात् आध्यात्मिक स्फुलिंग, बदलता नहीं। श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त अस्तित्वों के भीतर विद्यमान यही नित्य बीज घोषित करते हैं। वे बुद्धिमान पुरुष की बुद्धि भी हैं। श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त किए बिना कोई असाधारण रूप से बुद्धिमान नहीं बन सकता। प्रत्येक व्यक्ति अन्यों से अधिक बुद्धिमान बनने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु श्रीकृष्ण की कृपा के बिना यह सम्भव नहीं है। अतएव जब कभी हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जो असाधारण बुद्धि से सम्पन्न हो, तब हमें सोचना चाहिए, \"वह बुद्धि श्रीकृष्ण है।\" इसी प्रकार, जो अत्यन्त प्रभावशाली है, उसका प्रभाव भी श्रीकृष्ण ही है।\n\nbalaṁ balavatāṁ cāhaṁ\n\nkā ma-rāga-vivarjitam\n\ndharmāviruddho bhūteṣu\n\nkāmo 'smi bharatarṣabha\n\n\"मैं बलवानों का बल हूँ, जो आसक्ति तथा कामना से रहित है। मैं वह काम-जीवन हूँ जो धार्मिक सिद्धान्तों के विरुद्ध नहीं है, हे भरतश्रेष्ठ [अर्जुन]!\" (गीता 7.11)\n\nहाथी तथा गोरिल्ला अत्यन्त बलशाली पशु हैं, और हमें यह समझना चाहिए कि उन्हें अपना बल श्रीकृष्ण से ही प्राप्त होता है। मनुष्य अपने ही प्रयत्न से ऐसा बल अर्जित नहीं कर सकता, किन्तु यदि श्रीकृष्ण कृपा करें, तो एक मनुष्य हाथी से हज़ारों गुना अधिक बल प्राप्त कर सकता है। महान् योद्धा भीम, जिन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में लड़ाई की, के विषय में कहा जाता था कि उनमें एक हाथी से दस हज़ार गुना बल था। इसी प्रकार, जो काम अथवा कामना (*काम*) धार्मिक सिद्धान्तों के विरुद्ध नहीं है, उसे भी श्रीकृष्ण के रूप में देखना चाहिए। यह काम क्या है? काम का सामान्यतः अर्थ काम-जीवन होता है, किन्तु यहाँ *काम* उस काम-जीवन की ओर संकेत करता है जो धार्मिक सिद्धान्तों के विरुद्ध नहीं है, अर्थात् उत्तम सन्तान उत्पन्न करने हेतु यौन-सम्बन्ध। यदि कोई उत्तम कृष्णभावनाभावित सन्तान उत्पन्न कर सके, तो वह हज़ारों बार यौन-सम्बन्ध रख सकता है; किन्तु यदि वह केवल ऐसी सन्तान उत्पन्न कर सके जो कुत्ते-बिल्लियों की चेतना में पाली जाएँ, तो उसके काम-जीवन को अधार्मिक माना जाना चाहिए। धार्मिक तथा सभ्य समाजों में विवाह का अभिप्राय इस बात का संकेत है कि एक दम्पति को उत्तम सन्तान उत्पन्न करने हेतु यौन-सम्बन्ध में प्रवृत्त होना है। अतएव विवाहित काम-जीवन को धार्मिक माना जाता है, और अविवाहित काम-जीवन को अधार्मिक। वास्तव में संन्यासी तथा गृहस्थ में कोई अन्तर नहीं है, बशर्ते गृहस्थ की यौन-क्रियाएँ धार्मिक सिद्धान्तों पर आधारित हों।\n\nye caiva sāttvikā bhāvā\n\nrajasas tāmasāś ca ye\n\nmatta eveti tān viddhi\n\nna tv ahaṁ teṣu te mayi\n\n\"समस्त भाव — चाहे वे सत्त्व के हों, रजस् के अथवा तमस् के — मेरी ही शक्ति से प्रकट होते हैं। एक अर्थ में मैं ही सब कुछ हूँ — किन्तु मैं स्वतन्त्र हूँ। मैं इस भौतिक प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूँ।\" (गीता 7.12)\n\nकोई श्रीकृष्ण से इस प्रकार प्रश्न कर सकता है: \"आप कहते हैं कि आप ध्वनि, जल, प्रकाश, सुगन्ध, समस्त वस्तुओं का बीज, बल तथा काम अर्थात् कामना हैं — क्या इसका अर्थ यह है कि आप मात्र सत्त्वगुण में ही विद्यमान हैं?\" भौतिक जगत् में सत्त्व, रजस् तथा तमस् — ये गुण हैं। अब तक श्रीकृष्ण ने स्वयं को उस रूप में वर्णित किया है जो शुभ है (उदाहरणार्थ, धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार विवाह में यौन-सम्बन्ध)। किन्तु अन्य गुणों का क्या? क्या श्रीकृष्ण उनमें विद्यमान नहीं हैं? इसके उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं कि भौतिक जगत् में जो कुछ भी देखा जाता है, वह भौतिक प्रकृति के तीन गुणों की पारस्परिक क्रिया के कारण है। जो कुछ भी अवलोकन किया जा सकता है, वह सत्त्व, रजस् अथवा तमस् का सम्मिश्रण है, और इन सभी अवस्थाओं में ये तीनों अवस्थाएँ \"मेरे द्वारा उत्पन्न\" हैं। चूँकि वे श्रीकृष्ण द्वारा उत्पन्न हैं, अतः उनकी स्थिति उन्हीं में है, किन्तु वे उनमें नहीं हैं, क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण इन तीनों गुणों से परे, दिव्य हैं। इस प्रकार, एक अन्य अर्थ में, बुरी तथा दुष्ट वस्तुएँ, जो तमस् से उत्पन्न होती हैं, वे भी श्रीकृष्ण ही हैं, जब उन्हें श्रीकृष्ण द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। यह कैसे? उदाहरणार्थ, एक विद्युत्-अभियन्ता विद्युत्-ऊर्जा का उत्पादन कर रहा है। अपने घरों में हम इस विद्युत्-ऊर्जा का अनुभव रेफ्रिजरेटर में शीतलता के रूप में अथवा विद्युत्-चूल्हे में ताप के रूप में करते हैं, किन्तु शक्ति-संयन्त्र पर विद्युत्-ऊर्जा न तो शीतल है, न तप्त। इस ऊर्जा की अभिव्यक्तियाँ जीवों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, किन्तु श्रीकृष्ण के लिए वे भिन्न नहीं हैं। अतएव श्रीकृष्ण कभी-कभी उन पर कार्य करते हैं जो रजस् अथवा तमस् के सिद्धान्त प्रतीत होते हैं, किन्तु श्रीकृष्ण के लिए श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, ठीक जैसे विद्युत्-अभियन्ता के लिए विद्युत्-ऊर्जा मात्र विद्युत् है और कुछ नहीं। वह यह भेद नहीं करता कि यह \"शीतल विद्युत्\" है अथवा वह \"तप्त विद्युत्\" है।\n\nप्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण द्वारा ही उत्पन्न की जा रही है। वस्तुतः *वेदान्त-सूत्र* इसकी पुष्टि करता है: अथातो ब्रह्म जिज्ञासा जन्माद्यस्य यतः: [भा. 1.1.1] प्रत्येक वस्तु परम परब्रह्म से ही प्रवाहित हो रही है।\n\nजीव जिसे बुरा अथवा अच्छा मान रहा है, वह केवल जीव के लिए ही ऐसा है, क्योंकि वह बद्ध है। किन्तु चूँकि श्रीकृष्ण बद्ध नहीं हैं, अतः उनके लिए बुरे अथवा अच्छे का प्रश्न ही नहीं उठता। चूँकि हम बद्ध हैं, अतः हम द्वन्द्वों से पीड़ित हैं, किन्तु उनके लिए प्रत्येक वस्तु पूर्ण है।"}
{"ref": "owk/4", "book": "owk", "lang": "hi", "url": "/hi/library/owk/4/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "मूर्ख तथा विवेकी के मार्ग", "purport": "इस प्रकार श्रीकृष्ण अपने यथार्थ स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। तथापि हम उनकी ओर आकृष्ट नहीं होते। ऐसा क्यों है? इसका कारण स्वयं श्रीकृष्ण ही बताते हैं:\n\ndaivī hy eṣā guṇa-mayī\n\nmama māyā duratyayā\n\nmām eva ye prapadyante\n\nmāyām etāṁ taranti te\n\n\"मेरी यह दिव्य शक्ति, जो भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से बनी है, दुर्लंघ्य है। किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं।\" (गीता 7.14)\n\nभौतिक जगत् भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से व्याप्त है। समस्त जीव इन गुणों से प्रभावित हैं। यदि वे मुख्यतः सत्त्वगुण से प्रभावित हैं, तो वे ब्राह्मण कहलाते हैं, और यदि वे रजोगुण से प्रभावित हैं, तो वे क्षत्रिय कहलाते हैं। यदि वे रजोगुण तथा तमोगुण से प्रभावित हैं, तो वे वैश्य हैं, और यदि वे तमोगुण से प्रभावित हैं, तो वे शूद्र हैं। यह जन्म अथवा सामाजिक स्थिति के कारण कोई कृत्रिम आरोपण नहीं है, अपितु गुण, अर्थात् प्रकृति के उस गुण के अनुसार है जिसके अधीन कोई कार्य कर रहा है।\n\ncātur-varṇyaṁ mayā sṛṣṭaṁ\n\nguṇa-karma-vibhāgaśaḥ\n\ntasya kartāram api māṁ\n\nviddhy akartāram avyayam\n\n\"भौतिक प्रकृति के तीन गुणों तथा उनसे सम्बद्ध कर्म के अनुसार, मानव समाज के चार विभाग मेरे द्वारा सृजित किए गए। और यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्रष्टा हूँ, तुम्हें जानना चाहिए कि मैं फिर भी अकर्ता हूँ, क्योंकि मैं अव्यय हूँ।\" (गीता 4.13)\n\nऐसा नहीं है कि यह व्यवस्था भारत में प्रचलित विकृत जाति-प्रथा की ओर संकेत करती है। श्रीकृष्ण विशेष रूप से कहते हैं: गुण-कर्म-विभागशः: मनुष्यों का वर्गीकरण उस गुण अथवा उस गुण के अनुसार होता है जिसके अधीन वे कार्य कर रहे हैं, और यह ब्रह्माण्ड-भर के मनुष्यों पर लागू होता है। जब श्रीकृष्ण बोलते हैं, तब हमें यह समझना चाहिए कि वे जो भी कहते हैं, वह सीमित नहीं, अपितु सार्वभौमिक रूप से सत्य है। वे समस्त जीवों के पिता होने का दावा करते हैं — यहाँ तक कि पशु, जलचर, वृक्ष, पौधे, कृमि, पक्षी तथा भौंरे — इन सभी को उनके पुत्र होने का दावा किया गया है। श्रीकृष्ण यह प्रतिपादित करते हैं कि समूचा ब्रह्माण्ड भौतिक प्रकृति के तीन गुणों की पारस्परिक क्रियाओं से मोहित है, और हम उस भ्रम के वशीभूत हैं; अतएव हम यह नहीं समझ सकते कि ईश्वर क्या हैं।\n\nइस भ्रम का स्वरूप क्या है, और इसे किस प्रकार पार किया जा सकता है? यह भी *भगवद्गीता* में समझाया गया है:\n\ndaivī hy eṣā guṇa-mayī\n\nmama māyā duratyayā\n\nmām eva ye prapadyante\n\nmāyām etaṁ taranti te\n\n\"मेरी यह दिव्य शक्ति, जो भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से बनी है, दुर्लंघ्य है। किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं।\" (गीता 7.14)\n\nमानसिक कल्पना द्वारा कोई भी भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के बन्धन से छुटकारा नहीं पा सकता। ये तीन गुण अत्यन्त प्रबल हैं और इनसे पार पाना कठिन है। क्या हम यह अनुभव नहीं कर पाते कि हम भौतिक प्रकृति की पकड़ में किस प्रकार हैं? गुण शब्द का अर्थ रस्सी भी होता है। जब कोई तीन मज़बूत रस्सियों से बँधा हो, तब वह निश्चय ही अत्यन्त कसकर जकड़ा रहता है। हमारे हाथ-पैर सत्त्व, रजस् तथा तमस् की प्रबल रस्सियों से बँधे हुए हैं। तो क्या हमें आशा छोड़ देनी चाहिए? नहीं, क्योंकि यहाँ श्रीकृष्ण प्रतिज्ञा करते हैं कि जो कोई उनकी शरण ग्रहण करता है, वह तत्काल मुक्त हो जाता है। जब मनुष्य कृष्णभावनाभावित हो जाता है—चाहे इस प्रकार हो या उस प्रकार—तब वह मुक्त हो जाता है।\n\nहम सब श्रीकृष्ण से सम्बन्धित हैं, क्योंकि हम सब उनके पुत्र हैं। पुत्र का अपने पिता से मतभेद हो सकता है, किन्तु उस सम्बन्ध को तोड़ना उसके लिए सम्भव नहीं। जीवन-यात्रा में उससे पूछा जाएगा कि वह कौन है, और उसे उत्तर देना होगा, \"मैं अमुक-अमुक का पुत्र हूँ।\" वह सम्बन्ध तोड़ा नहीं जा सकता। हम सब ईश्वर के पुत्र हैं, और उनके साथ वह सम्बन्ध नित्य है, किन्तु हम केवल भूल गए हैं। श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान्, सर्वयशस्वी, सर्वैश्वर्यवान्, सर्वसुन्दर, सर्वज्ञ हैं, और वे वैराग्य से भी पूर्ण हैं। यद्यपि हम ऐसी महान् दिव्य विभूति के मित्र हैं, हम इसे भूल गए हैं। यदि किसी धनी व्यक्ति का पुत्र अपने पिता को भुलाकर घर छोड़ दे और उन्मत्त हो जाए, तो वह सोने के लिए सड़क पर पड़ा रहे, अथवा भोजन के लिए धन माँगे—किन्तु यह सब उसकी विस्मृति के कारण ही है। तथापि यदि कोई उसे यह सूचना दे कि वह केवल इसलिए कष्ट भोग रहा है क्योंकि उसने अपने पिता का घर त्याग दिया है, और यह कि उसके पिता, जो अत्यन्त धनवान् व्यक्ति तथा विशाल सम्पत्ति के स्वामी हैं, उसके लौटने हेतु उत्सुक हैं—तो वह व्यक्ति महान् उपकारी है।\n\nइस भौतिक जगत् में हम सदा तीन प्रकार के दुःखों के अधीन कष्ट भोगते रहते हैं—वे दुःख जो शरीर तथा मन से उत्पन्न होते हैं, जो अन्य जीवों से उत्पन्न होते हैं, और जो प्राकृतिक प्रकोपों से उत्पन्न होते हैं। माया से, अर्थात् प्रकृति के गुणों से आच्छादित होने के कारण, हम इन दुःखों का ध्यान ही नहीं रखते। तथापि हमें सदा यह जानना चाहिए कि इस भौतिक जगत् में हम इतना कष्ट सहन कर रहे हैं। जिसकी चेतना पर्याप्त रूप से विकसित हो चुकी है, जो बुद्धिमान् है, वह पूछता है कि वह कष्ट क्यों भोग रहा है। \"मैं दुःख नहीं चाहता। मैं कष्ट क्यों भोग रहा हूँ?\" जब यह प्रश्न उठता है, तब कृष्णभावनाभावित होने का अवसर रहता है।\n\nज्यों ही हम स्वयं को श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित करते हैं, वे हमारा अत्यन्त सहृदयता से स्वागत करते हैं। यह ठीक उस खोए हुए बालक के समान है जो अपने पिता के पास लौटता है और कहता है, \"हे मेरे पिता, किसी भ्रान्ति के कारण मैंने आपका संरक्षण छोड़ दिया, किन्तु मैंने कष्ट सहा है। अब मैं आपके पास लौट आया हूँ।\" पिता अपने पुत्र को आलिंगन में लेकर कहते हैं, \"हे मेरे प्यारे पुत्र, आ जाओ। जितने दिन तुम गए रहे, मैं तुम्हारे लिए अत्यन्त व्याकुल रहा, और अब तुम लौट आए हो, इससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।\" पिता इतने दयालु हैं। हम भी उसी स्थिति में हैं। हमें श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत होना है, और यह अत्यन्त कठिन नहीं है। जब पुत्र पिता के प्रति शरणागत होता है, तो क्या यह कोई अत्यन्त कठिन कार्य है? यह तो अत्यन्त स्वाभाविक है, और पिता सदैव पुत्र को ग्रहण करने हेतु प्रतीक्षा करते रहते हैं। इसमें अपमान का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यदि हम अपने परम पिता के समक्ष नतमस्तक होकर उनके चरण स्पर्श करें, तो इसमें हमारी कोई हानि नहीं, न ही यह कठिन है। वस्तुतः यह तो हमारे लिए गौरव की बात है। हम ऐसा क्यों न करें? श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत होकर हम तत्काल उनके संरक्षण में आ जाते हैं और समस्त दुःखों से मुक्त हो जाते हैं। इसकी पुष्टि समस्त शास्त्र करते हैं। *भगवद्गीता* के अन्त में श्रीकृष्ण कहते हैं—\n\nsarva-dharmān parityajya\n\nmam ekaṁ śaraṇaṁ vraja\n\nahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo\n\nmokṣayiṣyāmi mā śucaḥ\n\n\"समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करके केवल मेरी ही शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापकर्मों के फल से मुक्त कर दूँगा। भयभीत मत होओ।\" (गीता 18.66)\n\nजब हम स्वयं को ईश्वर के चरणों में डाल देते हैं, तब हम उनके संरक्षण में आ जाते हैं, और उस समय से हमारे लिए कोई भय नहीं रहता। जब बालक अपने माता-पिता के संरक्षण में होते हैं, तब वे निर्भय रहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनके माता-पिता उन्हें हानि नहीं पहुँचने देंगे। मां एव ये प्रपद्यन्ते : श्रीकृष्ण प्रतिज्ञा करते हैं कि जो उनकी शरण लेते हैं, उन्हें भय का कोई कारण नहीं रहता।\n\nयदि श्रीकृष्ण के प्रति शरणागति इतनी सरल वस्तु है, तो फिर लोग ऐसा क्यों नहीं करते? इसके विपरीत बहुत-से ऐसे हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को ही चुनौती देते हैं, यह दावा करते हुए कि प्रकृति तथा विज्ञान ही सब कुछ हैं और ईश्वर कुछ भी नहीं। ज्ञान में सभ्यता की तथाकथित उन्नति का अर्थ यह है कि जनसमुदाय अधिकाधिक उन्मत्त होता जा रहा है। रोग के निवारण के स्थान पर रोग बढ़ता जा रहा है। लोग ईश्वर की परवाह नहीं करते, किन्तु वे प्रकृति की परवाह करते हैं, और प्रकृति का काम है तीन प्रकार के दुःखों के रूप में प्रहार करना। वह चौबीसों घंटे निरन्तर ये प्रहार करती रहती है। तथापि हम प्रहार सहने के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि हम इसे ठीक समझते हैं और इसे वस्तुओं का सामान्य क्रम मान लेते हैं। हम अपनी शिक्षा पर अत्यन्त गर्वित हो गए हैं, किन्तु हम भौतिक प्रकृति से कहते हैं, \"मुझ पर प्रहार करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। अब कृपया जारी रखें।\" इस प्रकार भ्रमित होकर हम सोचते हैं कि हमने भौतिक प्रकृति को जीत भी लिया है। किन्तु यह कैसे सम्भव है? प्रकृति अब भी हम पर जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु के दुःख थोपती रहती है। क्या किसी ने इन समस्याओं को हल किया है? तो फिर ज्ञान तथा सभ्यता में हमने वास्तव में क्या उन्नति की है? हम भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों के अधीन हैं, फिर भी हम यह सोचते हैं कि हमने उसे जीत लिया है। इसी को माया कहते हैं।\n\nइस शरीर के पिता के प्रति शरणागति में कुछ कठिनाई हो सकती है, क्योंकि उसका ज्ञान तथा सामर्थ्य सीमित है, किन्तु श्रीकृष्ण किसी सामान्य पिता के समान नहीं हैं। श्रीकृष्ण असीम हैं तथा पूर्ण ज्ञान, पूर्ण शक्ति, पूर्ण ऐश्वर्य, पूर्ण सौन्दर्य, पूर्ण यश तथा पूर्ण वैराग्य से युक्त हैं। क्या हमें स्वयं को सौभाग्यशाली नहीं मानना चाहिए कि हम ऐसे पिता के पास जाएँ और उनकी सम्पत्ति का उपभोग करें? तथापि इसकी परवाह कोई नहीं करता प्रतीत होता, और अब प्रत्येक यह प्रचार कर रहा है कि कोई ईश्वर नहीं है। लोग उन्हें खोजने का प्रयत्न क्यों नहीं करते? इसका उत्तर *भगवद्गीता* के अगले श्लोक में दिया गया है—\n\nna māṁ duṣkṛtino mūḍhāḥ\n\nprapadyante narādhamāḥ\n\nmāyayāpahṛta jñāna\n\nāsuraṁ bhāvam āśritāḥ\n\n\"जो दुष्कर्मी अत्यन्त मूढ़ हैं, मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है, और जो असुरों की नास्तिक प्रकृति को धारण करते हैं, वे मेरी शरण नहीं लेते।\" (गीता 7.15)\n\nइस प्रकार मूर्खों का वर्गीकरण किया जाता है। दुष्कृती सदा शास्त्रीय विधानों के विरुद्ध कर्म करता रहता है। वर्तमान सभ्यता का कार्य ही शास्त्रीय नियमों का उल्लंघन करना है—बस इतना ही। परिभाषा के अनुसार, पुण्यात्मा वही है जो ऐसा नहीं करता। दुष्कृती (दुष्कर्मी) तथा सुकृती (पुण्यात्मा) में भेद करने के लिए कोई मानदण्ड अवश्य होना चाहिए। प्रत्येक सभ्य देश में कोई-न-कोई शास्त्र होता है—चाहे वह ईसाई हो, हिन्दू, मुसलमान अथवा बौद्ध। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। बात यह है कि प्रमाणस्वरूप ग्रन्थ, अर्थात् शास्त्र, वहाँ विद्यमान है। जो उसके विधानों का पालन नहीं करता, वह अपराधी माना जाता है।\n\nइस श्लोक में उल्लिखित एक अन्य वर्ग मूढ़ है, अर्थात् मूर्ख नम्बर एक। नराधम वह है जो मानव-स्तर में निम्न है, और मायया-पहृत-ज्ञान उसकी ओर संकेत करता है जिसका ज्ञान माया, अर्थात् भ्रम द्वारा हर लिया गया है। आसुरं भावम् आश्रिताः उनकी ओर संकेत करता है जो पूर्णतः नास्तिक हैं। यद्यपि परम पिता के प्रति शरणागति में कोई हानि नहीं है, तथापि जो लोग इस प्रकार लक्षित हैं, वे कभी ऐसा नहीं करते। परिणामस्वरूप, वे पिता के अभिकर्ताओं द्वारा निरन्तर दण्डित किए जाते हैं। उन्हें कठोरता से थप्पड़, छड़ी तथा प्रहार सहने पड़ते हैं, और उन्हें कष्ट भोगना पड़ता है। जिस प्रकार पिता को अपने उद्दण्ड पुत्र को ताड़ना देनी पड़ती है, उसी प्रकार भौतिक प्रकृति को कुछ दण्ड प्रयुक्त करने पड़ते हैं। साथ ही प्रकृति हमें भोजन तथा अन्य आवश्यकताएँ प्रदान करके हमारा पोषण भी करती है। दोनों प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं, क्योंकि हम सबसे धनवान् पिता के पुत्र हैं, और श्रीकृष्ण दयालु हैं, यद्यपि हम उनकी शरण नहीं लेते। फिर भी पिता द्वारा इतने उत्तम रूप से सुसज्जित किए जाने पर भी दुष्कृती अब भी अविहित कर्म करता रहता है। यदि कोई दण्डित होते रहने पर भी अड़ा रहे, तो वह मूर्ख है, और यदि कोई इस मानव-रूप का उपयोग श्रीकृष्ण को समझने में न करे, तो वह मानव-स्तर में निम्न है। यदि कोई मनुष्य अपने जीवन का उपयोग अपने वास्तविक पिता के साथ जो सम्बन्ध है, उसे पुनर्जागृत करने में न करे, तो उसे मानव-स्तर में पतित माना जाना चाहिए।\n\nपशु केवल खाते हैं, सोते हैं, अपनी रक्षा करते हैं, मैथुन करते हैं और मर जाते हैं। वे उच्चतर चेतना का लाभ नहीं उठाते, क्योंकि निम्नतर जीवन-रूपों में यह सम्भव नहीं है। यदि कोई मनुष्य पशुओं के कार्यों का अनुसरण करता है और अपनी चेतना को उन्नत करने की अपनी क्षमता का लाभ नहीं उठाता, तो वह मानव-स्तर से नीचे गिर जाता है और अपने अगले जीवन में पशु-शरीर की तैयारी करता है। श्रीकृष्ण की कृपा से हमें अत्यधिक विकसित शरीर तथा बुद्धि दी गई है, किन्तु यदि हम उनका उपयोग न करें, तो वे उन्हें हमें फिर क्यों दें? हमें यह समझना चाहिए कि यह मानव-शरीर लाखों-लाखों वर्षों के विकास के पश्चात् विकसित हुआ है और यह कि स्वयं में यह जन्म-मृत्यु के चक्र से, जिसमें अस्सी लाख से अधिक जीव-योनियाँ विकसित होती हैं, बाहर निकलने का अवसर है। यह अवसर श्रीकृष्ण की कृपा से दिया गया है, और यदि हम इसे न लें, तो क्या हम मनुष्यों में निम्नतम नहीं हैं? कोई किसी विश्वविद्यालय से उपाधिधारी हो सकता है—एम.ए., पी-एच.डी. आदि—किन्तु माया यह सांसारिक ज्ञान हर लेती है। जो वास्तव में बुद्धिमान् है, वह अपनी बुद्धि का प्रयोग यह समझने में करेगा कि वह कौन है, ईश्वर कौन हैं, भौतिक प्रकृति क्या है, वह भौतिक प्रकृति में कष्ट क्यों भोग रहा है, और इस कष्ट का उपचार क्या है।\n\nहम अपनी बुद्धि का प्रयोग इन्द्रियतृप्ति के लिए मोटरगाड़ी, रेडियो अथवा टेलीविज़न बनाने में कर सकते हैं, किन्तु हमें यह समझना होगा कि यह ज्ञान नहीं है। अपितु यह तो लुटी हुई बुद्धि है। बुद्धि मनुष्य को जीवन की समस्याओं को समझने के लिए दी गई थी, किन्तु उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। लोग यह सोच रहे हैं कि उन्होंने ज्ञान अर्जित कर लिया है, क्योंकि वे जानते हैं कि गाड़ियाँ कैसे बनाई और चलाई जाती हैं, किन्तु गाड़ी के यहाँ आने से पूर्व भी लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तो जाते ही थे। केवल इतना हुआ है कि सुविधा बढ़ गई है, किन्तु इस सुविधा के साथ ही अतिरिक्त समस्याएँ भी आती हैं—वायु-प्रदूषण तथा अत्यधिक भीड़भाड़ वाले राजमार्ग। यही माया है; हम सुविधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं, किन्तु ये सुविधाएँ बदले में इतनी सारी समस्याएँ उत्पन्न कर रही हैं।\n\nस्वयं को इतनी सारी सुविधाएँ तथा आधुनिक सुख-साधन जुटाने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने के स्थान पर, हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग यह समझने में करना चाहिए कि हम कौन हैं और क्या हैं। हम कष्ट भोगना नहीं चाहते, किन्तु हमें यह समझना चाहिए कि हम पर कष्ट क्यों थोपा जा रहा है। तथाकथित ज्ञान से हम केवल परमाणु बम बनाने में ही सफल हुए हैं। इस प्रकार वध की प्रक्रिया त्वरित हो गई है। हम यह सोचकर इतने गर्वित हैं कि यह ज्ञान की उन्नति है, किन्तु यदि हम ऐसी कोई वस्तु बना सकें जो मृत्यु को रोक सके, तो हमने वास्तव में ज्ञान में उन्नति की है। मृत्यु तो भौतिक प्रकृति में पहले से ही विद्यमान है, किन्तु हम सबको एक ही प्रहार में मार डालकर उसे बढ़ावा देने के लिए इतने उत्सुक हैं—इसी को मायया-पहृत-ज्ञान कहते हैं, अर्थात् भ्रम द्वारा हर लिया गया ज्ञान।\n\nअसुर, अर्थात् राक्षस तथा घोषित नास्तिक, वस्तुतः ईश्वर को चुनौती देते हैं। यदि हमारे परम पिता न होते, तो हम दिन का प्रकाश ही न देख पाते, तो फिर उन्हें चुनौती देने का क्या औचित्य है? *वेदों* में कहा गया है कि मनुष्यों के दो वर्ग हैं—देव तथा असुर, अर्थात् देवता तथा राक्षस। देव कौन हैं? परमेश्वर के भक्त देव कहलाते हैं, क्योंकि वे भी ईश्वर के समान हो जाते हैं, जबकि जो परम सत्ता के अधिकार की अवहेलना करते हैं, वे असुर अथवा राक्षस कहलाते हैं। ये दोनों वर्ग मानव-समाज में सदा पाए जाते हैं।\n\nजिस प्रकार चार प्रकार के दुष्कर्मी हैं जो कभी श्रीकृष्ण की शरण नहीं लेते, उसी प्रकार चार प्रकार के भाग्यशाली मनुष्य हैं जो उनकी आराधना करते हैं, और अगले श्लोक में उनका वर्गीकरण किया गया है—\n\ncatur-vidhā bhajante māṁ\n\njanāḥ sukṛtino 'rjuna\n\nārto jijñāsur arthārthī\n\njñānī ca bharatarṣabha\n\n\"हे भरतश्रेष्ठ [अर्जुन], चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी भक्ति करते हैं—आर्त, धन का अभिलाषी, जिज्ञासु, तथा वह जो परम सत्य के ज्ञान की खोज में है।\" (गीता 7.16)\n\nयह भौतिक जगत् दुःखों से परिपूर्ण है, और पुण्यात्मा तथा पापी दोनों ही उसके अधीन हैं। शीतकाल की ठंड सबके साथ एक समान व्यवहार करती है। वह न पुण्यात्मा की परवाह करती है न पापी की, न धनी की न दरिद्र की। तथापि पुण्यात्मा तथा पापी में अन्तर यह है कि पुण्यात्मा अपनी दुःखमय अवस्था में ईश्वर का स्मरण करता है। प्रायः जब मनुष्य दुःखी होता है, तब वह गिरजाघर जाकर प्रार्थना करता है, \"हे मेरे प्रभु, मैं संकट में हूँ। कृपया मेरी सहायता करें।\" यद्यपि वह किसी भौतिक आवश्यकता के लिए प्रार्थना कर रहा है, तथापि ऐसे मनुष्य को पुण्यात्मा ही माना जाना चाहिए, क्योंकि वह अपने दुःख में ईश्वर के पास आया है। इसी प्रकार, कोई दरिद्र व्यक्ति गिरजाघर जाकर प्रार्थना कर सकता है, \"हे मेरे प्रभु, कृपया मुझे कुछ धन दीजिए।\" दूसरी ओर, जिज्ञासु प्रायः बुद्धिमान् होते हैं। वे सदा वस्तुओं को समझने हेतु अनुसन्धान करते रहते हैं। वे पूछ सकते हैं, \"ईश्वर क्या है?\" और फिर इसका पता लगाने हेतु वैज्ञानिक अनुसन्धान करते हैं। उन्हें भी पुण्यात्मा माना जाता है, क्योंकि उनका अनुसन्धान उचित लक्ष्य की ओर निर्देशित है। ज्ञानवान् मनुष्य ज्ञानी कहलाता है—वह जिसने अपनी स्वरूपगत स्थिति को समझ लिया है। ऐसे ज्ञानी की ईश्वर के विषय में निराकार धारणा हो सकती है, किन्तु क्योंकि वह परम, अर्थात् परम परब्रह्म की शरण ले रहा है, अतः उसे भी पुण्यात्मा माना जाना चाहिए। इन चार प्रकार के मनुष्यों को सुकृती—पुण्यात्मा—कहा जाता है, क्योंकि वे सब ईश्वर के पीछे हैं।\n\nteṣāṁ jñānī nitya-yukta\n\neka-bhaktir viśiṣyate\n\npriyo hi jñānino 'tyartham\n\nahaṁ sa ca mama priyaḥ\n\n\"इनमें से वह ज्ञानी जो पूर्ण ज्ञान में स्थित होकर शुद्ध भक्ति के द्वारा मुझसे युक्त है, सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि मैं उसे अत्यन्त प्रिय हूँ, और वह मुझे प्रिय है।\" (गीता 7.17)\n\nईश्वर के पास आने वाले चार वर्ग के मनुष्यों में से, जो दार्शनिक दृष्टि से ईश्वर के स्वरूप को समझने का प्रयत्न कर रहा है, जो कृष्णभावनाभावित होने का प्रयत्न कर रहा है—विशिष्यते—वही सर्वाधिक योग्य है। वस्तुतः श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति उन्हें अत्यन्त प्रिय है, क्योंकि उसका ईश्वर को समझने के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य नहीं है। अन्य निम्नतर हैं। किसी को कुछ माँगने हेतु ईश्वर से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं, और जो ऐसा करता है वह मूर्ख है, क्योंकि वह यह नहीं जानता कि सर्वज्ञ ईश्वर उसके हृदय के भीतर हैं और भली-भाँति जानते हैं कि वह कब दुःख में है अथवा धन की आवश्यकता में है। ज्ञानवान् मनुष्य इसका अनुभव करता है और भौतिक दुःखों से छुटकारे हेतु प्रार्थना नहीं करता। अपितु वह ईश्वर की महिमा करने तथा दूसरों को यह बताने हेतु प्रार्थना करता है कि वे कितने महान् हैं। वह अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु—रोटी, वस्त्र अथवा आश्रय हेतु—प्रार्थना नहीं करता। शुद्ध भक्त, जब वह दुःखी होता है, तब कहता है, \"हे प्रभु, यह आपकी कृपा है। आपने मुझे केवल सुधारने हेतु ही दुःख में डाला है। मुझे तो कहीं अधिक बड़े दुःख में डाला जाना चाहिए था, किन्तु अपनी कृपा से आपने इसे न्यून कर दिया है।\" यह उस शुद्ध भक्त की दृष्टि है जो विचलित नहीं होता।\n\nजो कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह भौतिक दुःख, अपमान अथवा सम्मान की परवाह नहीं करता, क्योंकि वह इन सबसे पृथक् है। वह भली-भाँति जानता है कि दुःख, सम्मान तथा अपमान केवल शरीर से सम्बन्धित हैं और यह कि वह शरीर नहीं है। उदाहरणार्थ, सुकरात, जो आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे, मृत्युदण्ड दिए गए, और जब उनसे पूछा गया कि वे किस प्रकार दफनाया जाना चाहेंगे, तो उन्होंने उत्तर दिया, \"सर्वप्रथम तो आपको मुझे पकड़ना पड़ेगा।\" अतः जो यह जानता है कि वह शरीर नहीं है, वह विचलित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि आत्मा को न तो पकड़ा जा सकता है, न यातना दी जा सकती है, न मारा जा सकता है, न दफनाया जा सकता है। जो श्रीकृष्ण के विज्ञान से परिचित है, वह पूर्ण रूप से भली-भाँति जानता है कि वह शरीर नहीं है, कि वह श्रीकृष्ण का अंश है, कि उसका वास्तविक सम्बन्ध श्रीकृष्ण से है, और यह कि किसी-न-किसी प्रकार, यद्यपि उसे भौतिक शरीर में डाला गया है, उसे भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से पृथक् रहना चाहिए। उसका सरोकार सत्त्व, रजस् अथवा तमस् के गुणों से नहीं, अपितु श्रीकृष्ण से है। जो इसे समझता है वह ज्ञानी है, अर्थात् ज्ञानवान् मनुष्य, और वह श्रीकृष्ण को अत्यधिक प्रिय है। दुःखी मनुष्य जब ऐश्वर्य में डाला जाता है, तब वह ईश्वर को भूल सकता है, किन्तु ज्ञानी, जो ईश्वर की वास्तविक स्थिति को जानता है, उन्हें कभी नहीं भूलेगा।\n\nज्ञानियों का एक वर्ग है जिसे निराकारवादी कहते हैं, जो कहते हैं कि क्योंकि निराकार की आराधना अत्यन्त कठिन है, अतः ईश्वर के किसी रूप की कल्पना करनी पड़ती है। ये वास्तविक ज्ञानी नहीं हैं—ये मूर्ख हैं। ईश्वर के रूप की कल्पना कोई नहीं कर सकता, क्योंकि ईश्वर इतने महान् हैं। कोई किसी रूप की कल्पना कर सकता है, किन्तु वह एक गढ़ी हुई वस्तु है; वह वास्तविक रूप नहीं है। ऐसे लोग हैं जो ईश्वर के रूप की कल्पना करते हैं, और ऐसे लोग भी हैं जो ईश्वर के रूप का निषेध करते हैं। दोनों में से कोई ज्ञानी नहीं है। जो रूप की कल्पना करते हैं, वे मूर्तिभंजक कहलाते हैं। भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगों के समय, कुछ हिन्दू मुसलमानों की मस्जिद में जाकर ईश्वर की मूर्तियाँ तथा प्रतिमाएँ तोड़ देते थे, और मुसलमान भी उसी प्रकार प्रत्युत्तर देते थे। इस प्रकार वे दोनों यह सोचते थे, \"हमने हिन्दू ईश्वर को मार डाला। हमने मुसलमान ईश्वर को मार डाला\" इत्यादि। इसी प्रकार, जब गांधी अपना प्रतिरोध-आन्दोलन चला रहे थे, तब अनेक भारतीय सड़क पर जाकर डाक-पेटियाँ नष्ट कर देते थे और इस प्रकार सोचते थे कि वे सरकारी डाक-सेवा को नष्ट कर रहे हैं। ऐसी मनोवृत्ति वाले लोग ज्ञानी नहीं हैं। हिन्दुओं तथा मुसलमानों, और ईसाइयों तथा गैर-ईसाइयों के बीच के धार्मिक युद्ध सब अज्ञान के आधार पर चलाए गए थे। जो ज्ञान में स्थित है, वह जानता है कि ईश्वर एक है; वे न मुसलमान हो सकते हैं, न हिन्दू, न ईसाई।\n\nयह हमारी कल्पना है कि ईश्वर ऐसे हैं और वैसे हैं और इस प्रकार हैं और उस प्रकार हैं। यह सब कल्पना ही है। वास्तविक ज्ञानवान् मनुष्य जानता है कि ईश्वर दिव्य हैं। जो यह जानता है कि ईश्वर भौतिक गुणों से परे हैं, वह वास्तव में ईश्वर को जानता है। ईश्वर सदा हमारे समीप हैं, हमारे हृदयों में विद्यमान हैं। जब हम शरीर त्यागते हैं, तब ईश्वर भी हमारे साथ जाते हैं, और जब हम दूसरा शरीर धारण करते हैं, तब वे यह देखने हेतु ही वहाँ हमारे साथ जाते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। हम कब अपना मुख उनकी ओर मोड़ेंगे? वे सदा प्रतीक्षा करते रहते हैं। ज्यों ही हम अपना मुख ईश्वर की ओर मोड़ते हैं, वे कहते हैं, \"हे मेरे प्यारे पुत्र, आ जाओ—स च मम प्रियः—तुम मुझे नित्य प्रिय हो। अब तुम अपना मुख मेरी ओर मोड़ रहे हो, और मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।\"\n\nज्ञानवान् मनुष्य, अर्थात् ज्ञानी, वस्तुतः ईश्वर के विज्ञान को समझता है। जो केवल इतना समझता है कि \"ईश्वर भले हैं\", वह प्रारम्भिक अवस्था में है, किन्तु जो वास्तव में यह समझता है कि ईश्वर कितने महान् तथा भले हैं, वह आगे बढ़ा हुआ है। वह ज्ञान *श्रीमद्भागवत* तथा *भगवद्गीता* में प्राप्त होता है। जो वास्तव में ईश्वर में रुचि रखता है, उसे ईश्वर के विज्ञान, अर्थात् *भगवद्गीता* का अध्ययन करना चाहिए।\n\nidaṁ tu te guhyatamaṁ\n\npravakṣyāmy anasūyave\n\njñānaṁ vijñāna-sahitaṁ\n\nyaj jñātvā mokṣyase 'śubhāt\n\n\"हे मेरे प्रिय अर्जुन, क्योंकि तुम मुझसे कभी ईर्ष्या नहीं करते, अतः मैं तुम्हें यह परम गुह्य ज्ञान प्रदान करूँगा, जिसे जानकर तुम भौतिक अस्तित्व के दुःखों से मुक्त हो जाओगे।\" (गीता 9.1)\n\n*भगवद्गीता* में प्रदत्त ईश्वर का ज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म तथा गोपनीय है। यह ज्ञान, अर्थात् आध्यात्मिक प्रज्ञा, तथा विज्ञान, अर्थात् वैज्ञानिक ज्ञान, से परिपूर्ण है। और यह रहस्य से भी परिपूर्ण है। इस ज्ञान को कोई कैसे समझ सकता है? इसे स्वयं ईश्वर अथवा ईश्वर के किसी प्रामाणिक प्रतिनिधि द्वारा ही प्रदान किया जाना चाहिए। अतः श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब ईश्वर के विज्ञान को समझने में कोई विसंगति होती है, तब-तब वे स्वयं अवतरित होते हैं।\n\nन ही ज्ञान भावुकता से आता है। भक्ति भावुकता नहीं है। यह एक विज्ञान है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं, \"वैदिक ज्ञान के सन्दर्भ के बिना आध्यात्मिकता का प्रदर्शन समाज के लिए केवल एक उपद्रव मात्र है।\" मनुष्य को भक्ति के अमृत का आस्वादन तर्क, युक्ति तथा ज्ञान द्वारा करना चाहिए, और फिर उसे इसे दूसरों तक पहुँचाना चाहिए। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि कृष्णभावनामृत केवल भावुकता मात्र है। यह नृत्य तथा गायन सब वैज्ञानिक हैं। यहाँ विज्ञान है, और यहाँ प्रेममय आदान-प्रदान भी है। श्रीकृष्ण ज्ञानवान् मनुष्य को अत्यन्त प्रिय हैं, और ज्ञानवान् मनुष्य श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है। श्रीकृष्ण हमारे प्रेम को सहस्रगुना लौटाएँगे। हम ससीम प्राणियों में श्रीकृष्ण से प्रेम करने की क्या क्षमता है? किन्तु श्रीकृष्ण में प्रेम की अपार क्षमता—असीम क्षमता—है।"}
{"ref": "owk/5", "book": "owk", "lang": "hi", "url": "/hi/library/owk/5/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "परम की ओर अग्रसर", "purport": "udārāḥ sarva evaite\n\njñānī tv ātmaiva me matam\n\nāsthitaḥ sa hi yuktātmā\n\nmām evānuttamāṁ gatim\n\n\"ये सभी भक्त निःसन्देह उदार आत्माएँ हैं, किन्तु जो मेरे ज्ञान में स्थित है, उसे मैं निश्चय ही अपने भीतर निवास करने वाला मानता हूँ। मेरी दिव्य सेवा में संलग्न होने के कारण वह मुझे प्राप्त करता है।\" (गीता 7.18)\n\nयहाँ श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जो सभी मनुष्य उनके पास आते हैं—चाहे वे दुःखी हों, धन की आवश्यकता में हों, जिज्ञासु हों, इत्यादि—उन सबका स्वागत किया जाता है, किन्तु उनमें से जो व्यक्ति ज्ञान में स्थित है, वह उन्हें अत्यन्त प्रिय है। अन्य का स्वागत इसलिए किया जाता है, क्योंकि यह समझा जाता है कि समय के साथ, यदि वे ईश्वर के पथ पर चलते रहें, तो वे भी ज्ञानवान् मनुष्य के समान उत्तम हो जाएँगे। तथापि सामान्यतः ऐसा होता है कि जब कोई लाभ हेतु गिरजाघर जाता है, और धन नहीं आता, तब वह यह निष्कर्ष निकाल लेता है कि ईश्वर के पास जाना निरर्थक है, और वह गिरजाघर से समस्त सम्बन्ध त्याग देता है। यही गुप्त उद्देश्यों से ईश्वर के पास जाने का संकट है। उदाहरणार्थ, द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यह बताया गया था कि जर्मन सैनिकों की अनेक पत्नियाँ अपने पतियों की सकुशल वापसी हेतु प्रार्थना करने गिरजाघर जाती थीं, किन्तु जब उन्हें ज्ञात हुआ कि वे युद्ध में मारे गए हैं, तब वे नास्तिक हो गईं। इस प्रकार हम चाहते हैं कि ईश्वर हमारे आदेश की पूर्ति करने वाले बन जाएँ, और जब वे हमारे आदेश की पूर्ति नहीं करते, तब हम कहते हैं कि कोई ईश्वर नहीं है। यही भौतिक वस्तुओं हेतु प्रार्थना करने का परिणाम है।\n\nइसी सन्दर्भ में एक छोटे बालक की कथा है, जो लगभग पाँच वर्ष का था, जिसका नाम ध्रुव था, और जो एक राजपरिवार से सम्बन्धित था। समय बीतने पर उसके पिता, राजा, उसकी माता से ऊब गए और उन्हें अपनी रानी के पद से हटा दिया। फिर उन्होंने दूसरी स्त्री को रानी बना लिया, और वह उस बालक की सौतेली माता हो गई। वह उससे अत्यन्त ईर्ष्या करती थी, और एक दिन, जब ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठा था, तब उसने उसका अपमान किया। उसने कहा, \"अरे, तू अपने पिता की गोद में नहीं बैठ सकता, क्योंकि तू मुझसे उत्पन्न नहीं हुआ है।\" उसने ध्रुव को उसके पिता की गोद से खींच लिया और वह बालक अत्यन्त क्रोधित हो गया। वह एक क्षत्रिय का पुत्र था, और क्षत्रिय अपने तीव्र क्रोध के लिए कुख्यात होते हैं। ध्रुव ने इसे एक महान् अपमान माना, और वह अपनी उस माता के पास गया जिसे पद से हटा दिया गया था।\n\nउसने कहा, \"हे माता, मेरी सौतेली माता ने मुझे मेरे पिता की गोद से खींचकर मेरा अपमान किया है।\"\n\nमाता ने उत्तर दिया, \"हे पुत्र, मैं क्या कर सकती हूँ? मैं असहाय हूँ, और तेरे पिता अब मेरी परवाह नहीं करते।\n\nबालक ने पूछा, \"तो भला, मैं प्रतिशोध कैसे ले सकता हूँ?\"\n\n\"हे मेरे पुत्र, तू असहाय है। केवल यदि ईश्वर तेरी सहायता करें, तभी तू प्रतिशोध ले सकता है।\"\n\nध्रुव ने उत्साहपूर्वक पूछा, \"अरे, ईश्वर कहाँ हैं?\"\n\nमाता ने उत्तर दिया, \"मुझे ज्ञात है कि अनेक ऋषि ईश्वर के दर्शन हेतु जंगल तथा वन में जाते हैं। वे ईश्वर को वहाँ पाने हेतु महान् तपस्या तथा तप करते हैं।\"\n\nतत्काल ध्रुव वन में चला गया और बाघ तथा हाथी से पूछने लगा, \"अरे, क्या तुम ईश्वर हो? क्या तुम ईश्वर हो?\" इस प्रकार वह समस्त पशुओं से पूछता रहा। यह देखकर कि ध्रुव अत्यन्त जिज्ञासु है, श्रीकृष्ण ने स्थिति देखने हेतु नारद मुनि को भेजा। नारद शीघ्र ही वन में गए और उन्होंने ध्रुव को पाया।\n\nनारद ने कहा, \"हे मेरे प्यारे बालक, तुम राजपरिवार से सम्बन्धित हो। तुम यह समस्त तपस्या तथा तप नहीं सह सकते। कृपया अपने घर लौट जाओ। तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लिए अत्यन्त व्याकुल हैं।\"\n\nबालक ने कहा, \"कृपया मुझे इस प्रकार पथभ्रष्ट करने का प्रयत्न न करें। यदि आप ईश्वर के विषय में कुछ जानते हैं, अथवा यदि आप जानते हैं कि मैं ईश्वर का दर्शन कैसे कर सकता हूँ, तो कृपया मुझे बताएँ। अन्यथा चले जाएँ और मुझे विचलित न करें।\"\n\nजब नारद ने देखा कि ध्रुव इतना दृढ़निश्चयी है, तब उन्होंने उसे शिष्य के रूप में दीक्षित किया और उसे मन्त्र दिया, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ध्रुव ने इस मन्त्र का जप किया और सिद्ध हो गया, और ईश्वर उसके समक्ष प्रकट हुए।\n\n\"हे मेरे प्यारे ध्रुव, तुम क्या चाहते हो? तुम मुझसे जो चाहो ले सकते हो।\"\n\nबालक ने उत्तर दिया, \"हे मेरे प्रभु, मैं केवल अपने पिता के राज्य तथा भूमि के लिए ऐसी कठोर तपस्या कर रहा था, किन्तु अब मैंने आपका दर्शन कर लिया है। महान् ऋषि तथा सन्त भी आपका दर्शन नहीं कर पाते। मेरा क्या लाभ है? मैंने अपना घर केवल काँच के कुछ टुकड़े तथा कूड़ा-करकट खोजने हेतु छोड़ा था, और इसके स्थान पर मैंने एक अत्यन्त मूल्यवान् हीरा पा लिया है। अब मैं सन्तुष्ट हूँ। मुझे आपसे कुछ भी माँगने की आवश्यकता नहीं है।\"\n\nइस प्रकार यद्यपि कोई दरिद्रता से पीड़ित अथवा दुःख में हो, यदि वह ध्रुव के ही समान दृढ़ निश्चय के साथ ईश्वर के पास जाए, ईश्वर का दर्शन करने तथा उनका आशीर्वाद लेने का संकल्प लेकर, और यदि उसे ईश्वर का दर्शन हो जाए, तो उसे फिर कोई भी भौतिक वस्तु नहीं चाहिए। वह भौतिक सम्पत्तियों की मूर्खता को समझ जाता है, और वह भ्रम को त्यागकर वास्तविक वस्तु की ओर अग्रसर होता है। जब मनुष्य ध्रुव महाराज के समान कृष्णभावनामृत में स्थित हो जाता है, तब वह पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो जाता है और कुछ भी नहीं चाहता।\n\nज्ञानी, अर्थात् ज्ञानवान् मनुष्य, जानता है कि भौतिक वस्तुएँ क्षणभंगुर हैं। वह यह भी जानता है कि तीन ऐसे पक्ष हैं जो समस्त भौतिक लाभ को जटिल बनाते हैं—मनुष्य अपने कार्य से लाभ चाहता है, मनुष्य अपने धन के कारण दूसरों से प्रशंसा चाहता है, और मनुष्य अपनी सम्पत्ति के कारण यश चाहता है। किसी भी स्थिति में, वह जानता है कि ये सब केवल शरीर पर ही लागू होते हैं और जब शरीर समाप्त हो जाता है, तब ये भी चले जाते हैं। जब शरीर मरता है, तब मनुष्य अब धनी नहीं रहता अपितु एक आत्मा होता है, और अपने कर्म के अनुसार उसे दूसरे शरीर में प्रवेश करना पड़ता है। *गीता* कहती है कि ज्ञानवान् मनुष्य इससे विमोहित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि क्या है। तो फिर वह भौतिक सम्पत्ति प्राप्त करने हेतु स्वयं को क्यों कष्ट दे? उसका भाव यह है, \"परमेश्वर श्रीकृष्ण से मेरा नित्य सम्बन्ध है। अब मुझे उस सम्बन्ध को दृढ़ता से स्थापित करने दो, ताकि श्रीकृष्ण मुझे वापस अपने राज्य में ले जाएँ।\"\n\nयह विश्व-स्थिति हमें श्रीकृष्ण के साथ इस सम्बन्ध को पुनः स्थापित करने तथा भगवद्धाम लौटने हेतु समस्त सुविधा दे रही है। यही हमारे जीवन का ध्येय होना चाहिए। जिस वस्तु की हमें आवश्यकता है, वह सब ईश्वर द्वारा प्रदान की जा रही है—भूमि, अनाज, फल, दूध, आश्रय तथा वस्त्र। हमें केवल शान्तिपूर्वक रहना है और कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करना है। यही हमारे जीवन का ध्येय होना चाहिए। अतः हमें ईश्वर ने भोजन, आश्रय, रक्षा तथा मैथुन के रूप में जो प्रदान किया है, उससे सन्तुष्ट रहना चाहिए, और अधिकाधिक की कामना नहीं करनी चाहिए। सभ्यता का सर्वोत्तम प्रकार वही है जो \"सरल जीवन तथा उच्च विचार\" के सिद्धान्त को मानता है। कारखाने में भोजन अथवा मैथुन का निर्माण करना सम्भव नहीं है। ये तथा जो भी अन्य वस्तु हमें चाहिए, वह ईश्वर द्वारा प्रदान की जाती है। हमारा कार्य इन वस्तुओं का लाभ उठाना तथा ईश्वर-भावनाभावित होना है।\n\nयद्यपि ईश्वर ने हमें इस पृथ्वी पर शान्तिपूर्वक रहने, कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करने, और अन्ततः उनके पास आने हेतु समस्त सुविधाएँ दी हैं, तथापि इस युग में हम अभागे हैं। हम अल्पायु हैं, और इतने सारे लोग भोजन, आश्रय, वैवाहिक जीवन अथवा प्रकृति के प्रहारों से रक्षा के बिना हैं। यह इस कलियुग के प्रभाव के कारण है। अतः भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने, इस युग की भयावह स्थिति को देखकर, आध्यात्मिक जीवन के अनुशीलन की परम आवश्यकता पर बल दिया। और हमें यह कैसे करना चाहिए? चैतन्य महाप्रभु यह सूत्र देते हैं—\n\nharer nāma harer nāma\n\nharer nāmaiva kevalam\n\nkalau nāsty eva nāsty eva\n\nnāsty eva gatir anyathā\n\n[Adi 17.21]\n\n\"बस सदा हरे कृष्ण का जप करते रहो।\" इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि तुम किसी कारखाने में हो अथवा किसी नरक में, किसी झोपड़ी में हो अथवा किसी गगनचुम्बी भवन में—कोई अन्तर नहीं पड़ता। बस हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करते जाओ। इसमें कोई व्यय नहीं, कोई बाधा नहीं, कोई जाति नहीं, कोई पंथ नहीं, कोई वर्ण नहीं—कोई भी इसे कर सकता है। बस जप करो और श्रवण करो।\n\nकिसी-न-किसी प्रकार, यदि कोई कृष्णभावनामृत के सम्पर्क में आ जाए और किसी प्रामाणिक मार्गदर्शक के निर्देशन में इस प्रक्रिया को सम्पन्न करे, तो वह निश्चय ही ईश्वर के पास वापस जाएगा।\n\nbahūnāṁ janmanām ante\n\njñānavān māṁ prapadyate\n\nvāsudevaḥ sarvam iti\n\nsa mahātmā sudurlabhaḥ\n\n\"अनेक जन्मों तथा मृत्युओं के पश्चात्, जो वास्तव में ज्ञान में स्थित है, वह मुझे समस्त कारणों का कारण तथा जो कुछ भी है, उस सबका मूल जानकर मेरी शरण में आता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।\" (गीता 7.19)\n\nईश्वर के विज्ञान में दार्शनिक अनुसन्धान को अनेक जन्मों तक चलाना पड़ता है। ईश्वर-साक्षात्कार अत्यन्त सरल है, किन्तु साथ ही वह अत्यन्त कठिन है। उनके लिए यह सरल है जो श्रीकृष्ण के वचन को सत्य मानकर स्वीकार करते हैं, किन्तु जो अनुसन्धान-कार्य द्वारा, ज्ञान की उन्नति के बल पर समझने का प्रयत्न करते हैं, उन्हें इतना सारा अनुसन्धान-कार्य समाप्त करने के पश्चात् अपनी श्रद्धा का निर्माण करना पड़ता है, और इस प्रक्रिया में अनेक जन्म लगते हैं। दिव्यवादियों के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिन्हें तत्त्ववित् कहते हैं, जो परम सत्य को जानते हैं। दिव्यवादी परम सत्य को वह कहते हैं जिसमें कोई द्वैत नहीं है। परम सत्य में कोई द्वैत नहीं है—सब कुछ एक ही स्तर पर है। जो इसे सत्य रूप में जानता है, वह तत्त्ववित् कहलाता है।\n\nश्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि परम सत्य तीन पक्षों में ज्ञात होता है—ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान्—निराकार ब्रह्म-तेज, स्थानिक परमात्मा, तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्। इस प्रकार तीन कोण हैं जिनसे मनुष्य परम सत्य की कल्पना कर सकता है। मनुष्य किसी पर्वत को बहुत दूर से देख सकता है और इस प्रकार उसे दृष्टि के एक कोण से देखता है। ज्यों-ज्यों वह समीप आता है, वह पर्वत के वृक्षों तथा पत्तियों को देख सकता है, और यदि वह पर्वत पर चढ़ने लगे, तो उसे वृक्षों, पौधों तथा पशुओं में इतनी विविधता मिलेगी। लक्ष्य वही है, किन्तु दृष्टि के भिन्न-भिन्न कोणों के कारण, ऋषियों की परम सत्य के विषय में भिन्न-भिन्न धारणाएँ हैं। एक अन्य उदाहरण—सूर्य का प्रकाश है, सूर्यमण्डल है, तथा सूर्यदेव हैं। जो सूर्य के प्रकाश में है, वह यह दावा नहीं कर सकता कि वह स्वयं सूर्य पर है, और जो सूर्य में स्थित है, वह दृष्टि की दृष्टि से बेहतर स्थित है। सूर्य के प्रकाश की तुलना सर्वव्यापी ब्रह्मज्योति-तेज से की जा सकती है, स्थानिक सूर्यमण्डल की तुलना परमात्मा के स्थानिक पक्ष से की जा सकती है, और सूर्य के भीतर निवास करने वाले सूर्यदेव की तुलना भगवान् के व्यक्तित्व से की जा सकती है। जैसे इस पृथ्वी-ग्रह पर हमारे यहाँ जीवों की बहुविधता है, वैसे ही हम वैदिक साहित्य से यह समझ सकते हैं कि सूर्य में भी जीवों की विविधता है, किन्तु उनके शरीर अग्नि से बने हैं, ठीक जैसे हमारे शरीर पृथ्वी से बने हैं।\n\nभौतिक प्रकृति में पाँच स्थूल तत्त्व हैं—पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश। विभिन्न ग्रहों में इन पाँच में से किसी एक तत्त्व की प्रधानता के कारण भिन्न-भिन्न वायुमण्डल हैं, और जीवों के लिए भिन्न-भिन्न शरीर हैं, जो किसी विशेष ग्रह पर जो भी तत्त्व प्रधान हो, उससे बने होते हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि समस्त ग्रहों में जीवन का गुण एक समान है, तथापि इस अर्थ में एकरूपता है कि ये पाँच तत्त्व किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं। इस प्रकार कुछ ग्रहों पर पृथ्वी प्रमुख है, अग्नि प्रमुख है, जल प्रमुख है, तथा वायु और आकाश प्रमुख हैं। अतः हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि केवल इसलिए कि कोई ग्रह मुख्यतः पृथ्वी से नहीं बना है, अथवा क्योंकि उसका वायुमण्डल हमारे वायुमण्डल की प्रतिलिपि नहीं है, इन ग्रहों पर कोई जीवन नहीं है। वैदिक साहित्य हमें यह सूचना देता है कि असंख्य ग्रह हैं जो भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों वाले जीवों से परिपूर्ण हैं। जैसे किसी भौतिक समायोजन के द्वारा हम भिन्न-भिन्न भौतिक ग्रहों में प्रवेश करने के योग्य हो सकते हैं, वैसे ही योग्यता के द्वारा हम उस आध्यात्मिक ग्रह में प्रवेश कर सकते हैं जहाँ परमेश्वर निवास करते हैं।\n\nyānti deva-vratā devān\n\npitṝn yānti pitṛ-vrataḥ\n\nbhūtāni yānti bhūtejyā\n\nyānti mad-yājino 'pi mām\n\n\"जो देवताओं की आराधना करते हैं, वे देवताओं के बीच जन्म लेंगे; जो पितरों की आराधना करते हैं, वे पितरों के पास जाते हैं; और जो मेरी आराधना करते हैं, वे मेरे साथ निवास करेंगे।\" (गीता 9.25)\n\nजो उच्चतर ग्रहों में प्रवेश करने का प्रयत्न कर रहे हैं, वे वहाँ जा सकते हैं, और जो श्रीकृष्ण के ग्रह, गोलोक वृन्दावन में प्रवेश करने की योग्यता प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं, वे भी कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया द्वारा वहाँ प्रवेश कर सकते हैं। भारत जाने से पूर्व, हम इसका विवरण प्राप्त कर सकते हैं कि वह देश कैसा है; किसी स्थान का श्रवण ही प्रथम अनुभव है। इसी प्रकार, यदि हम उस ग्रह के विषय में सूचना प्राप्त करना चाहते हैं जहाँ ईश्वर निवास करते हैं, तो हमें श्रवण करना होगा। हम तत्काल कोई प्रयोग करके वहाँ नहीं जा सकते। यह सम्भव नहीं है। किन्तु वैदिक साहित्य में हमारे पास उस परम ग्रह के इतने सारे विवरण हैं। उदाहरणार्थ, ब्रह्म-संहिता कहती है—\n\ncintāmaṇi-prakara-sadmasu kalpa-vṛkṣa-\n\nlakṣāvṛteṣu surabhīr abhipālayantam\n\nlakṣmī-sahasra-śata-sambhrama-sevyamānaṁ\n\ngovindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi\n\n[Bs. 5.29]\n\n\"मैं उन गोविन्द की आराधना करता हूँ, जो आदिपुरुष हैं, प्रथम जनक हैं, जो गौओं का पालन करते हुए, समस्त इच्छाओं की पूर्ति करते हुए, चिन्तामणि-रत्नों से निर्मित धामों में, लाखों कल्पवृक्षों से घिरे हुए, सहस्रों लक्ष्मियों, अर्थात् गोपियों द्वारा महान् श्रद्धा तथा स्नेह से सेवित होते हुए विराजमान हैं।\" विशेष रूप से ब्रह्म-संहिता में अन्य विस्तृत विवरण भी दिए गए हैं।\n\nजो परम सत्य का साक्षात्कार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें परम सत्य के उस पक्ष के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है जिस पर वे ध्यान केन्द्रित करते हैं। जो ब्रह्म पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, अर्थात् निराकारवादी, वे ब्रह्मवादी कहलाते हैं। सामान्यतः, जो परम सत्य का साक्षात्कार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, वे सर्वप्रथम ब्रह्मज्योति का साक्षात्कार करते हैं। जो परमात्मा पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, अर्थात् हृदय में भगवान् के स्थानिक रूप पर, जिसे परमात्मा कहते हैं, वे परमात्मावादी कहलाते हैं। परमेश्वर, अपने पूर्ण अंश द्वारा, प्रत्येक के हृदय में विराजमान हैं, और ध्यान तथा एकाग्रता द्वारा मनुष्य इस रूप का अनुभव कर सकता है। वे न केवल प्रत्येक के हृदय के भीतर हैं, अपितु वे सृष्टि के प्रत्येक परमाणु के भीतर भी स्थित हैं। यह परमात्मा-साक्षात्कार दूसरी अवस्था है। तीसरी तथा अन्तिम अवस्था भगवान्, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का साक्षात्कार है। क्योंकि साक्षात्कार की तीन मुख्य अवस्थाएँ हैं, अतः परम परब्रह्म एक ही जन्म में प्राप्त नहीं होता। बहूनां जन्मनाम् अन्ते [गीता 7.19]। यदि कोई भाग्यशाली हो, तो वह एक ही क्षण में परम वस्तु को प्राप्त कर सकता है। किन्तु सामान्यतः यह समझने में कि ईश्वर क्या हैं, अनेकानेक वर्ष तथा अनेकानेक जन्म लगते हैं।\n\nahaṁ sarvasya prabhavo\n\nmattaḥ sarvaṁ pravartate\n\niti matvā bhajante māṁ\n\nbudhā bhāva-samanvitāḥ\n\n\"मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का स्रोत हूँ। प्रत्येक वस्तु मुझसे उद्भूत होती है। जो बुद्धिमान् इसे भली-भाँति जानते हैं, वे मेरी भक्ति में प्रवृत्त होते हैं और सम्पूर्ण हृदय से मेरी आराधना करते हैं।\" (गीता 10.8)\n\n*वेदान्त-सूत्र* भी इसकी पुष्टि करता है कि परम सत्य वे हैं जिनसे प्रत्येक वस्तु जन्म लेती है। यदि हम सत्य रूप में यह विश्वास करते हैं कि श्रीकृष्ण समस्त वस्तुओं के मूल हैं, और यदि हम उनकी आराधना करते हैं, तो हमारा समस्त लेखा-जोखा एक ही क्षण में चुक जाता है। किन्तु यदि कोई विश्वास नहीं करता और कहता है, \"अरे, मैं देखना चाहता हूँ कि ईश्वर क्या है\", तो उसे चरण-दर-चरण निराकार ब्रह्म-तेज, और फिर स्थानिक पक्ष परमात्मा का साक्षात्कार करते हुए, अन्ततः इस अन्तिम अवस्था में आने से पूर्व जाना पड़ता है कि \"अरे, यहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।\" तथापि यह समझा जाना चाहिए कि इस प्रक्रिया में अधिक समय लगता है। जब कोई अनेक वर्षों के अनुसन्धान के द्वारा परम सत्य का साक्षात्कार करता है, तब वह यह निष्कर्ष निकालता है—वासुदेवः सर्वम् इति [गीता 7.19]—\"वासुदेव ही सब कुछ हैं।\" वासुदेव श्रीकृष्ण का एक नाम है, और इसका अर्थ है \"वे जो सर्वत्र निवास करते हैं।\" यह साक्षात्कार करके कि वासुदेव ही प्रत्येक वस्तु के मूल हैं—मां प्रपद्यते—वह शरणागत होता है। शरणागति की प्रक्रिया ही परम लक्ष्य है; या तो कोई इसे तत्काल करता है, अथवा अनुसन्धान-कार्य के अनेक जन्मों के पश्चात्। किसी भी स्थिति में, यह साक्षात्कार करके कि \"ईश्वर महान् हैं, और मैं उनका अधीनस्थ हूँ\", शरणागति अवश्य होनी चाहिए।\n\nइसे समझकर, ज्ञानवान् मनुष्य तत्काल शरणागत हो जाएगा और अनेकानेक जन्म लेने हेतु प्रतीक्षा नहीं करेगा। वह समझता है कि यह सूचना परमेश्वर द्वारा बद्धजीवों पर अपनी अनन्त कृपा से दी गई है। हम सब बद्धजीव हैं, जो इस भौतिक जगत् के तीन प्रकार के दुःख भोग रहे हैं। अब परमेश्वर हमें शरणागति की प्रक्रिया द्वारा इन दुःखों से बचने का अवसर दे रहे हैं।\n\nइस बिन्दु पर कोई पूछ सकता है कि यदि पूर्ण पुरुषोत्तम ही परम लक्ष्य हैं और मनुष्य को उन्हीं की शरण लेनी है, तो संसार में आराधना की इतनी सारी भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएँ क्यों हैं? इस प्रश्न का उत्तर अगले श्लोक में दिया गया है।\n\nkāmais tais tair hṛta jñānāḥ\n\nprapadyante 'nya-devatāḥ\n\ntaṁ taṁ niyamam āsthāya\n\nprakṛtyā niyatāḥ svayā\n\n\"जिनके मन भौतिक कामनाओं से विकृत हो गए हैं, वे देवताओं की शरण लेते हैं और अपने-अपने स्वभाव के अनुसार आराधना के विशिष्ट नियमों तथा विधियों का पालन करते हैं।\" (गीता 7.20)\n\nसंसार में अनेक भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं, और वे भौतिक प्रकृति के भिन्न-भिन्न गुणों के अधीन कार्य कर रहे हैं। सामान्यतः कहें तो, अधिकांश मनुष्य मुक्ति के पीछे नहीं हैं। यदि वे आध्यात्मिकता को ग्रहण करते हैं, तो वे आध्यात्मिक शक्ति द्वारा कुछ पाना चाहते हैं। भारत में किसी व्यक्ति का किसी स्वामी के पास जाकर यह कहना असामान्य नहीं है, \"हे स्वामीजी, क्या आप मुझे कुछ औषधि दे सकते हैं? मैं इस रोग से पीड़ित हूँ।\" वह सोचता है कि क्योंकि चिकित्सक अत्यन्त महँगा है, अतः वह किसी ऐसे स्वामी के पास जा सकता है जो चमत्कार कर सके। भारत में ऐसे भी स्वामी हैं जो लोगों के घरों में जाकर प्रचार करते हैं, \"यदि आप मुझे एक औंस सोना दें, तो मैं उसे सौ औंस सोना बना सकता हूँ।\" लोग सोचते हैं, \"मेरे पास पाँच औंस सोना है। मैं इसे इन्हें दे दूँ, और मुझे पाँच सौ औंस मिलेंगे।\" इस प्रकार वह स्वामी गाँव का समस्त सोना एकत्र कर लेता है, और उसे एकत्र करने के पश्चात् वह अन्तर्धान हो जाता है। यही हमारा रोग है—जब हम किसी स्वामी के पास, अथवा किसी मन्दिर या गिरजाघर में जाते हैं, तब हमारे हृदय भौतिक कामनाओं से भरे होते हैं। आध्यात्मिक जीवन से कुछ भौतिक लाभ चाहते हुए, हम केवल अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने हेतु योग का अभ्यास करते हैं। किन्तु, स्वस्थ रहने हेतु योग की शरण क्यों लें? हम नियमित व्यायाम तथा नियमित आहार के द्वारा स्वस्थ हो सकते हैं। योग का सहारा क्यों लें? क्योंकि—कामैस् तैस् तैर् हृत-ज्ञानाः [गीता 7.20]। हमारे भीतर स्वयं को स्वस्थ रखने तथा गिरजाघर जाकर और ईश्वर को अपने आदेश की पूर्ति करने वाला बनाकर जीवन का आनन्द लेने की भौतिक कामना है।\n\nभौतिक कामनाएँ रखते हुए, मनुष्य विभिन्न देवताओं की आराधना करते हैं। उन्हें यह कोई विचार नहीं है कि भौतिक पदार्थ से कैसे बाहर निकला जाए; वे भौतिक जगत् का उसकी पूरी सामर्थ्य तक उपयोग करना चाहते हैं। उदाहरणार्थ, वैदिक साहित्य में इतनी सारी अनुशंसाएँ हैं—यदि कोई अपने रोग को दूर करना चाहे, तो वह सूर्य की आराधना करता है, अथवा यदि कोई कन्या अच्छा पति चाहे, तो वह शिवजी की आराधना करती है, अथवा यदि कोई सुन्दर बनना चाहे, तो वह अमुक-अमुक देवता की आराधना करता है, अथवा यदि कोई शिक्षित बनना चाहे, तो वह देवी सरस्वती की आराधना करता है। इस प्रकार पाश्चात्य लोग प्रायः यह सोचते हैं कि हिन्दू बहुदेववादी हैं, किन्तु वस्तुतः यह आराधना ईश्वर की नहीं, अपितु देवताओं की है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि देवता ही ईश्वर हैं। ईश्वर एक है, किन्तु देवता हैं जो हमारे ही समान जीव हैं। अन्तर यह है कि उनके पास पर्याप्त मात्रा में शक्ति है। इस पृथ्वी पर कोई राजा अथवा राष्ट्रपति अथवा तानाशाह हो सकता है—ये हमारे ही समान मनुष्य हैं, किन्तु उनके पास कुछ असाधारण शक्ति है, और उनसे अनुग्रह प्राप्त करने हेतु, उनकी शक्ति का लाभ उठाने हेतु, हम किसी-न-किसी प्रकार से उनकी आराधना करते हैं। किन्तु *भगवद्गीता* देवताओं की आराधना की निन्दा करती है। यह श्लोक स्पष्ट रूप से कहता है कि लोग काम, अर्थात् भौतिक वासना के कारण देवताओं की आराधना करते हैं।\n\nयह भौतिक जीवन केवल वासना पर आधारित है; हम इस संसार का भोग करना चाहते हैं, और हम इस भौतिक जगत् से प्रेम करते हैं, क्योंकि हम अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना चाहते हैं। यह वासना ईश्वर के प्रति हमारे प्रेम का विकृत प्रतिबिम्ब है। अपने मूल स्वरूप में हम ईश्वर से प्रेम करने हेतु बने हैं, किन्तु क्योंकि हम ईश्वर को भूल गए हैं, अतः हम पदार्थ से प्रेम करते हैं। प्रेम तो है ही। या तो हम पदार्थ से प्रेम करते हैं, या हम ईश्वर से प्रेम करते हैं। किन्तु किसी भी स्थिति में हम इस प्रेम-प्रवृत्ति से बाहर नहीं निकल सकते; वस्तुतः हम प्रायः यह देखते हैं कि जब किसी के सन्तान नहीं होती, तब वह किसी बिल्ली अथवा कुत्ते से प्रेम करता है। क्यों? क्योंकि हम किसी वस्तु से प्रेम करना चाहते हैं और हमें इसकी आवश्यकता है। वास्तविकता के अभाव में, हम अपनी श्रद्धा तथा प्रेम बिल्लियों तथा कुत्तों में लगा देते हैं। प्रेम तो सदा है ही, किन्तु वह वासना के रूप में विकृत हो जाता है। जब यह वासना विफल होती है, तब हम क्रोधित हो जाते हैं; जब हम क्रोधित हो जाते हैं, तब हम विमोहित हो जाते हैं; और जब हम विमोहित हो जाते हैं, तब हम विनष्ट हो जाते हैं। यही प्रक्रिया चल रही है, किन्तु हमें इस प्रक्रिया को उलटना है और वासना को प्रेम में बदलना है। यदि हम ईश्वर से प्रेम करें, तो हम प्रत्येक वस्तु से प्रेम करते हैं। किन्तु यदि हम ईश्वर से प्रेम न करें, तो किसी भी वस्तु से प्रेम करना सम्भव नहीं है। हम सोच सकते हैं कि यह प्रेम है, किन्तु यह केवल वासना का एक चमकीला रूप मात्र है। जो वासना के कुत्ते बन गए हैं, उनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने अपना समस्त सद्विवेक खो दिया है—कामैस् तैस् तैर् हृत-ज्ञानाः [गीता 7.20]।\n\nशास्त्रों में देवताओं की आराधना हेतु अनेक नियम तथा विधियाँ हैं, और कोई यह प्रश्न कर सकता है कि वैदिक साहित्य ने उनकी आराधना की अनुशंसा क्यों की। इसकी आवश्यकता है। जो वासना से प्रेरित हैं, वे किसी वस्तु से प्रेम करने का अवसर चाहते हैं, और देवता परमेश्वर के अधिकारियों के रूप में स्वीकृत हैं। भाव यह है कि ज्यों-ज्यों कोई इन देवताओं की आराधना करता है, त्यों-त्यों वह क्रमशः कृष्णभावनामृत विकसित करेगा। किन्तु यदि कोई पूर्णतः नास्तिक तथा अवज्ञाकारी हो और किसी भी अधिकारी के विरुद्ध विद्रोही हो, तो भला क्या आशा है? अतः किसी उच्चतर व्यक्ति के प्रति किसी की आज्ञाकारिता देवताओं से आरम्भ हो सकती है।\n\nतथापि यदि हम सीधे परमेश्वर की आराधना को ग्रहण कर लें, तो देवताओं की आराधना की आवश्यकता नहीं है। जो परमेश्वर की सीधे आराधना करते हैं, वे देवताओं को समस्त आदर प्रदर्शित करते हैं, किन्तु उन्हें उनकी आराधना करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि वे जानते हैं कि देवताओं के पीछे जो परम सत्ता है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और वे उन्हीं की आराधना में संलग्न हैं। किसी भी स्थिति में, आदर तो रहता ही है। भगवान् का भक्त एक चींटी तक के प्रति आदर प्रदर्शित करता है, फिर देवताओं की तो बात ही क्या? भक्त इस बात के प्रति सचेत है कि समस्त जीव परमेश्वर के अंश हैं और वे केवल भिन्न-भिन्न भूमिकाएँ निभा रहे हैं।\n\nपरमेश्वर के सम्बन्ध में, समस्त प्राणी आदरणीय हैं। अतः भक्त दूसरों को \"प्रभु\" कहकर सम्बोधित करता है, जिसका अर्थ है \"हे महोदय, हे मेरे स्वामी।\" विनम्रता भगवान् के भक्त की एक योग्यता है। भक्त दयालु तथा आज्ञाकारी होते हैं, और उनमें समस्त शुभ योग्यताएँ होती हैं। निष्कर्ष यह है कि यदि कोई भगवान् का भक्त बन जाए, तो समस्त शुभ योग्यताएँ स्वतः विकसित हो जाएँगी। स्वभावतः जीव पूर्ण है, किन्तु वासना के संदूषण के कारण वह दुष्ट हो जाता है। जो स्वर्ण का अंश है, वह भी स्वर्ण है, और जो पूर्ण पूर्ण का अंश है, वह भी पूर्ण है।\n\noṁ pūrṇam adaḥ pūrṇam idaṁ\n\npūrṇāt pūrṇam udacyate\n\npūrṇasya pūrṇam ādāya\n\npūrṇam evāvaśiṣyate\n\n\"भगवान् का व्यक्तित्व पूर्ण तथा सम्पूर्ण है। क्योंकि वे पूर्णतः पूर्ण हैं, अतः उनसे उद्भूत समस्त वस्तुएँ, जैसे यह दृश्य जगत्, एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में पूर्ण रूप से सुसज्जित हैं। जो कुछ भी सम्पूर्ण से उत्पन्न होता है, वह भी स्वयं में पूर्ण है। क्योंकि वे सम्पूर्ण हैं, अतः यद्यपि उनसे इतनी सारी पूर्ण इकाइयाँ उद्भूत होती हैं, तथापि वे पूर्ण सन्तुलन बने रहते हैं।\" (*श्री ईशोपनिषद्*, मंगलाचरण)\n\nपदार्थ के संदूषण के कारण, पूर्ण जीव नीचे गिर जाता है, किन्तु कृष्णभावनामृत की यह प्रक्रिया उसे पुनः पूर्ण बना देगी। इसके द्वारा, वह वास्तव में सुखी हो सकता है, और भौतिक शरीर को त्यागने के पश्चात्, उस राज्य में प्रवेश कर सकता है जहाँ नित्य जीवन, आनन्द तथा पूर्ण ज्ञान है।"}
