{"ref": "pop/1", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/1/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "कर्म रूप में योग", "purport": "*Bhagavad-gītā* के छठे तथा आठवें अध्याय में भगवान् श्री *Kṛṣṇa, the Supreme Personality of Godhead*, समझाते हैं कि अष्टाङ्ग-योग पद्धति मन एवं इन्द्रियों को वश में करने का एक साधन है। तथापि यह विधि लोगों के लिए सम्पन्न करना अत्यन्त कठिन है, विशेषतः इस कलियुग में, जो एक ऐसा युग है जिसका लक्षण अज्ञान एवं अव्यवस्था है।\n\nयद्यपि *Bhagavad-gītā* के छठे अध्याय में इस अष्टाङ्ग-योग पद्धति की विशेष रूप से अनुशंसा की गई है, तथापि भगवान् इस बात पर बल देते हैं कि कर्म-योग की प्रक्रिया — कृष्णभावनामृत में कर्म — श्रेष्ठ है। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार के भरण-पोषण हेतु कर्म करता है, और प्रत्येक व्यक्ति किसी स्वार्थ अथवा व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति की दृष्टि से कार्य कर रहा है, चाहे वह केन्द्रित हो अथवा विस्तृत। किन्तु पूर्ण रूप से कर्म करना कृष्णभावनामृत में कर्म करना है, और इसका अर्थ है कर्म के फलों से अनासक्त रहकर कर्म करना।\n\nकृष्णभावनामृत में कर्म करना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि हम स्वरूपतः परमेश्वर के अंश हैं। शरीर के अंग सम्पूर्ण शरीर की तृप्ति हेतु कार्य करते हैं, अलग-अलग अंगों हेतु नहीं। लक्ष्य सम्पूर्ण समष्टि की तृप्ति है। इसी प्रकार, जीव को परम समष्टि, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की तृप्ति हेतु कर्म करना चाहिए, न कि अपनी व्यक्तिगत तृप्ति हेतु। जो ऐसा कर सकता है, वही पूर्ण संन्यासी एवं पूर्ण योगी है। *Bhagavad-gītā* के छठे अध्याय के, जो साङ्ख्य-योग का प्रतिपादन करता है, प्रथम श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं,\n\nanāśritaḥ karma-phalaṁ\n\nkāryaṁ karma karoti yaḥ\n\nsa sannyāsī ca yogī ca\n\nna niragnir na cākriyaḥ\n\n\"जो मनुष्य अपने कर्म के फलों के प्रति अनासक्त है और जो यथाविहित कर्म करता है, वही संन्यास-आश्रम में स्थित है, और वही सच्चा योगी है — न कि वह जो न तो अग्नि प्रज्वलित करता है और न ही कोई कर्म करता है।\"\n\nकभी-कभी संन्यासी (त्यागी) यह भूल से सोचते हैं कि वे समस्त भौतिक कार्यों से मुक्त हो गए हैं, और इसलिए अब उन्हें अग्नि-होत्र यज्ञ, अर्थात् अग्नि-यज्ञ, नहीं करने पड़ते। यह एक भूल है। शुद्धि हेतु कतिपय यज्ञ प्रत्येक व्यक्ति को सम्पन्न करने पड़ते हैं। चूँकि परम्परा से संन्यासियों को यज्ञ करना आवश्यक नहीं है, अतः वे कभी-कभी सोचते हैं कि अनुष्ठानिक यज्ञों को छोड़कर वे मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं; किन्तु वास्तव में, जब तक मनुष्य कृष्णभावनामृत के स्तर पर नहीं आ जाता, तब तक मुक्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। जो संन्यासी यज्ञ करना त्याग देते हैं, वे वस्तुतः स्वार्थ से कर्म कर रहे हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य निराकार ब्रह्म से एकाकार हो जाना है। यही निर्विशेषवादियों (मायावादियों) का परम लक्ष्य है, जिनका एक प्रमुख लक्ष्य अथवा माँग है: परम निराकार सत्ता से एकाकार हो जाना। भक्तों की ऐसी कोई माँग नहीं होती। वे श्रीकृष्ण की तृप्ति हेतु श्रीकृष्ण की सेवा करते हुए मात्र सन्तुष्ट रहते हैं। वे बदले में कुछ नहीं चाहते। यही शुद्ध भक्ति का लक्षण है।\n\nभगवान् चैतन्य महाप्रभु ही थे जिन्होंने इस भक्तिमय भाव को इतनी संक्षिप्तता से व्यक्त किया:\n\nna dhanaṁ na janaṁ na sundarīṁ\n\nkavitāṁ vā jagad-īśa kāmaye\n\nmama janmani janmanīśvare\n\nbhavatād bhaktir ahaitukī tvayi\n\n\"हे सर्वशक्तिमान् भगवन्! मुझे न तो धन संचित करने की इच्छा है, न सुन्दर स्त्रियों के भोग की। न ही मैं किसी संख्या में अनुयायी चाहता हूँ। मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि जन्म-जन्मान्तर मेरे जीवन में आपकी भक्ति की अहैतुकी कृपा बनी रहे।\" (शिक्षाष्टक 4) सारतः, यही भक्ति-योग पद्धति है। शुद्ध भक्तिमय भाव के अनेक उदाहरण हैं। एक बार भगवान् नृसिंहदेव ने प्रह्लाद महाराज से कहा, \"मेरे प्रिय बालक, तुमने मेरे लिए इतना कष्ट सहा है। तुम जो चाहो, माँग लो।\" शुद्ध भक्त होने के कारण प्रह्लाद महाराज ने कुछ भी माँगने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, \"मेरे प्रिय स्वामी, मैं आपके साथ कोई व्यापारिक लेन-देन नहीं कर रहा। मैं अपनी सेवा का कोई पारिश्रमिक स्वीकार नहीं करूँगा।\" यही शुद्ध भक्तिमय भाव है।\n\nयोगी एवं ज्ञानी परमेश्वर से एकाकार होने की माँग करते हैं, क्योंकि वे भौतिक यातनाएँ भोगते हुए ऐसा तीव्र अनुभव कर चुके होते हैं। वे भगवान् से एकाकार होना चाहते हैं, क्योंकि वे वियोग में कष्ट भोग रहे होते हैं। किन्तु शुद्ध भक्त को यह अनुभव नहीं होता। भगवान् से पृथक् होकर भी वह वियोग में भगवान् की सेवा का पूर्ण आनन्द लेता है। निराकार ब्रह्म से एकाकार होने की, अथवा भगवान् में विलीन हो जाने की इच्छा निश्चय ही किसी भी भौतिक इच्छा से महत्तर है, किन्तु यह स्वार्थ से रहित नहीं है। इसी प्रकार, जो रहस्यवादी योगी अधखुली आँखों से योग-पद्धति का अभ्यास करता है और समस्त भौतिक कार्यों को त्याग देता है, वह अपने व्यक्तिगत स्व हेतु कुछ तृप्ति चाहता है। ऐसे योगी भौतिक शक्ति के अभिलाषी होते हैं, और यही उनकी योग-सिद्धि की धारणा है। वास्तव में, यह योग की सिद्धि नहीं, अपितु एक भौतिकतावादी प्रक्रिया है।\n\nयदि कोई योग के नियामक सिद्धान्तों का अभ्यास करे, तो वह आठ प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है। वह रुई के फाहे से भी हल्का बन सकता है। वह किसी विशाल शिला से भी भारी हो सकता है। वह जो चाहे, तत्काल प्राप्त कर सकता है। कभी-कभी वह कोई लोक तक रच सकता है। यद्यपि दुर्लभ, ऐसे शक्तिशाली योगी वास्तव में विद्यमान हैं। विश्वामित्र योगी एक ताड़ के वृक्ष से मनुष्य उत्पन्न करना चाहते थे। वे सोच रहे थे, \"मनुष्य को अपनी माता के गर्भ में इतने महीनों तक क्यों रहना पड़े? वह फल की भाँति ही क्यों न उत्पन्न हो सके?\" ऐसा सोचते हुए विश्वामित्र योगी ने नारियल की भाँति मनुष्य उत्पन्न किए। कभी-कभी योगी इतने शक्तिशाली होते हैं कि वे ऐसे कार्य कर सकते हैं, किन्तु ये सब भौतिक शक्तियाँ हैं। अन्ततः ऐसे योगी पराजित हो जाते हैं, क्योंकि वे इन भौतिक शक्तियों को अनन्तकाल तक धारण नहीं रख सकते। भक्ति-योगियों की ऐसी शक्तियों में कोई रुचि नहीं होती।\n\nभक्ति-योगी, कृष्णभावनामृत में कर्म करता हुआ, स्वार्थ-रहित होकर समष्टि की तृप्ति हेतु कर्म करता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति आत्म-तृप्ति की इच्छा नहीं करता। अपितु उसकी सफलता की कसौटी श्रीकृष्ण की तृप्ति है; अतः वही पूर्ण संन्यासी एवं पूर्ण योगी माना जाता है।\n\nशुद्ध भक्त तो मोक्ष की भी इच्छा नहीं करता। मोक्षवादी पुनर्जन्म से बचना चाहते हैं, और शून्यवादी भी समस्त भौतिक जीवन का अन्त करना चाहते हैं। किन्तु चैतन्य महाप्रभु ने तो जन्म-जन्मान्तर केवल भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति की ही याचना की; दूसरे शब्दों में, चैतन्य महाप्रभु एक के बाद एक शरीर में भौतिक दुःख सहने को तत्पर थे। तो फिर चैतन्य महाप्रभु की क्या इच्छा थी? वे भगवान् की सेवा में संलग्न होना चाहते थे, और इससे अधिक कुछ नहीं, क्योंकि यही योग की वास्तविक सिद्धि है।\n\nचाहे आध्यात्मिक आकाश में हो अथवा भौतिक आकाश में, व्यक्तिगत आत्मा स्वरूपतः एक ही है। कहा जाता है कि वह केश के अग्रभाग का दस-हज़ारवाँ अंश है। इसका अर्थ है कि हमारी स्थिति एक सूक्ष्म कण की है। किन्तु आत्मा का विस्तार हो सकता है। जिस प्रकार हम भौतिक जगत् में एक भौतिक शरीर विकसित करते हैं, उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत् में हम एक आध्यात्मिक शरीर विकसित करते हैं। भौतिक जगत् में विस्तार पदार्थ के सम्पर्क में होता है। आध्यात्मिक जगत् में यह विस्तार आध्यात्मिक होता है।\n\nवास्तव में, *Bhagavad-gītā* का प्रथम पाठ यही है, \"मैं आत्मा हूँ। मैं इस शरीर से भिन्न हूँ।\" मैं एक जीवित शक्ति हूँ, किन्तु यह भौतिक शरीर जीवित शक्ति नहीं है। यह जड़ पदार्थ है, और यह केवल इसलिए सक्रिय है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक शक्ति विद्यमान है। आध्यात्मिक जगत् में सब कुछ जीवित शक्ति है; वहाँ कोई मृत पदार्थ नहीं है। वहाँ शरीर पूर्णतः आध्यात्मिक है। आत्मा की तुलना तेल से और शरीर की तुलना जल से की जा सकती है। जब तेल जल में होता है, तब एक भेद रहता है, और वह भेद सदा बना रहता है। आध्यात्मिक आकाश में तेल को जल में रखने का प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ सब कुछ आत्मा ही है।\n\nनिर्विशेषवादी शरीर विकसित नहीं करना चाहते। वे केवल आध्यात्मिक कण बने रहना चाहते हैं, और यही उनकी सुख की धारणा है। किन्तु हम भक्ति-योगी (वैष्णवजन) श्रीकृष्ण की सेवा करना चाहते हैं, और इसलिए हमें हाथ, पैर तथा अन्य समस्त शारीरिक अंग चाहिए। वस्तुतः, ये शरीर हमें श्रीकृष्ण की सेवा करने हेतु ही दिए गए हैं। जिस प्रकार हम अपनी माता के गर्भ में एक भौतिक शरीर विकसित करते हैं, उसी प्रकार हम आध्यात्मिक जगत् में एक आध्यात्मिक शरीर विकसित कर सकते हैं।\n\nआध्यात्मिक शरीर कृष्णभावनामृत के अभ्यास द्वारा विकसित होता है। यह भौतिक शरीर इसी भक्ति-योग प्रक्रिया द्वारा आध्यात्मीकृत होता है। यदि तुम लोहे को अग्नि में रखो, तो लोहा इतना तप्त हो जाता है कि वह भी अग्निमय बन जाता है। जब लोहा लाल-तप्त हो जाता है, तब वह अग्नि के समस्त गुण प्राप्त कर लेता है। यदि तुम उस लोहे से किसी वस्तु का स्पर्श करो, तो वह लोहा अग्नि की भाँति कार्य करेगा। इसी प्रकार, यद्यपि यह शरीर भौतिक है, फिर भी यह कृष्णभावनामृत द्वारा आध्यात्मीकृत होकर आत्मा की भाँति कार्य कर सकता है। यद्यपि ताम्र एक धातु मात्र है, ज्यों ही वह विद्युत् के सम्पर्क में आता है, वह विद्युन्मय हो जाता है, और यदि तुम उसका स्पर्श करो, तो तुम्हें विद्युत् का झटका लगेगा।\n\nज्यों ही तुम्हारा शरीर आध्यात्मीकृत होता है, भौतिक कर्म समाप्त हो जाता है। भौतिक कर्म का अर्थ है इन्द्रियतृप्ति हेतु कर्म करना। जैसे-जैसे तुम आध्यात्मीकृत होते हो, भौतिक माँगें घटती जाती हैं, यहाँ तक कि वे शून्य हो जाती हैं। यह कैसे सम्भव है? लोहे को अग्नि की भाँति कार्य करने हेतु, उसे निरन्तर अग्नि के सम्पर्क में रहना पड़ता है। भौतिक शरीर को आध्यात्मीकृत होने हेतु, मनुष्य को निरन्तर कृष्णभावनामृत में रहना पड़ता है। जब यह भौतिक शरीर पूर्ण रूप से आध्यात्मिक कार्यों में संलग्न होता है, तब यह आध्यात्मिक बन जाता है।\n\nवैदिक पद्धति के अनुसार, किसी उच्च व्यक्तित्व, अर्थात् संन्यासी, का शरीर जलाया नहीं जाता, अपितु समाधि दी जाती है, क्योंकि संन्यासी का शरीर आध्यात्मिक माना जाता है, चूँकि उसने भौतिक कार्यों में संलग्न होना त्याग दिया होता है। यदि इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण रूप से कृष्णभावनामृत में संलग्न हो जाए और इन्द्रियतृप्ति हेतु कर्म करना त्याग दे, तो यह समूचा संसार तत्काल आध्यात्मिक बन जाएगा। अतः यह सीखना आवश्यक है कि श्रीकृष्ण की तृप्ति हेतु किस प्रकार कर्म किया जाए। इसे समझने में थोड़ा समय लगता है। यदि किसी वस्तु का प्रयोग श्रीकृष्ण की तृप्ति हेतु किया जाए, तो वह आध्यात्मिक है। चूँकि हम श्रीकृष्ण के विषय में बोलने एवं लिखने हेतु माइक्रोफ़ोन, टाइपराइटर इत्यादि का प्रयोग कर रहे हैं, अतः वे आध्यात्मीकृत हो जाते हैं। प्रसाद तथा साधारण भोजन में क्या अन्तर है? कुछ लोग कह सकते हैं, \"यह प्रसाद क्या है? हम तो वही भोजन खा रहे हैं। तुम इसे प्रसाद क्यों कहते हो?\" यह प्रसाद इसलिए है क्योंकि इसे श्रीकृष्ण की तृप्ति हेतु अर्पित किया गया है और इस प्रकार यह आध्यात्मीकृत हो गया है।\n\nएक उच्चतर अर्थ में, पदार्थ है ही नहीं। सब कुछ आध्यात्मिक है। चूँकि श्रीकृष्ण आध्यात्मिक हैं और पदार्थ श्रीकृष्ण की ऊर्जाओं में से एक है, अतः पदार्थ भी आध्यात्मिक है। श्रीकृष्ण पूर्णतः आध्यात्मिक हैं, और आत्मा आत्मा से ही आती है। किन्तु, चूँकि जीव इस ऊर्जा का दुरुपयोग कर रहे हैं — अर्थात् इसे श्रीकृष्ण के प्रयोजनों से इतर किसी वस्तु हेतु प्रयोग कर रहे हैं — अतः यह भौतिकीकृत हो जाती है, और इसलिए हम इसे पदार्थ कहते हैं। इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रयोजन इस ऊर्जा का पुनराध्यात्मीकरण करना है। हमारा प्रयोजन समूचे संसार का, सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से, पुनराध्यात्मीकरण करना है। निःसन्देह, यह सम्भव न हो, किन्तु यही हमारा आदर्श है। कम-से-कम यदि हम व्यक्तिगत रूप से इस पुनराध्यात्मीकरण की प्रक्रिया को अपना लें, तो हमारा जीवन पूर्ण बन जाता है।\n\n*Bhagavad-gītā* (9.22) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अपने भक्तों को, जिसका उनके पास अभाव है उसे देकर तथा जो उनके पास है उसकी रक्षा करके, उनका योगक्षेम वहन करते हैं। लोग यह कहना बहुत पसन्द करते हैं कि भगवान् उन्हीं की सहायता करते हैं जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं, किन्तु वे यह नहीं समझते कि स्वयं अपनी सहायता करने का अर्थ है स्वयं को श्रीकृष्ण के संरक्षण में रखना। यदि कोई सोचे, \"अरे, मैं स्वयं अपनी सहायता कर सकता हूँ। मैं स्वयं अपनी रक्षा कर सकता हूँ,\" तो वह मूर्खतापूर्ण सोच रहा है। जब तक मेरी अँगुली मेरे शरीर से जुड़ी है, तब तक वह उपयोगी है, और मैं उसकी रक्षा हेतु हज़ारों डॉलर व्यय कर सकता हूँ। किन्तु यदि यह अँगुली काट दी जाए, तो वह व्यर्थ हो जाती है और फेंक दी जाती है। इसी प्रकार, हम श्रीकृष्ण के अंश हैं, और स्वयं अपनी सहायता करने का अर्थ है स्वयं को उनके अंश के रूप में अपनी उचित स्थिति में रखना। अन्यथा हम केवल फेंक दिए जाने के योग्य हैं। अँगुली स्वयं अपनी सहायता तभी कर सकती है जब वह हाथ पर उचित रूप से स्थित हो और सम्पूर्ण शरीर की ओर से कार्य कर रही हो। यदि अँगुली सोचे, \"मैं स्वयं को इस शरीर से पृथक् कर लूँगी और केवल अपनी ही सहायता करूँगी,\" तो वह अँगुली फेंक दी जाएगी और मर जाएगी। ज्यों ही हम सोचते हैं, \"मैं श्रीकृष्ण से स्वतन्त्र होकर जीऊँगा,\" वही हमारी आध्यात्मिक मृत्यु है, और ज्यों ही हम श्रीकृष्ण की सेवा में, उनके अंश के रूप में, संलग्न होते हैं, वही हमारा आध्यात्मिक जीवन है। अतः स्वयं अपनी सहायता करने का अर्थ है अपनी वास्तविक स्थिति को जानना और तदनुसार कर्म करना। अपनी स्थिति को जाने बिना स्वयं अपनी सहायता करना सम्भव नहीं है।\n\nसेवा का अर्थ है कर्म, क्योंकि जब हम किसी की सेवा करते हैं, तब हम कर्म कर रहे होते हैं। जब हम श्रीकृष्ण की सेवा करते हैं, तब हम कृष्णभावनामृत का प्रचार कर रहे होते हैं, या भोजन पका रहे होते हैं, या मन्दिर की सफ़ाई कर रहे होते हैं, या श्रीकृष्ण के विषय में पुस्तकें वितरित कर रहे होते हैं, या उनके विषय में लिख रहे होते हैं, या उन्हें अर्पित करने हेतु खाद्य-सामग्री ख़रीद रहे होते हैं। सेवा करने के अनेकानेक प्रकार हैं। श्रीकृष्ण की सहायता करने का अर्थ है उनके लिए कर्म करना, न कि एक स्थान पर बैठकर कृत्रिम रूप से ध्यान करना। कृष्णभावनामृत का अर्थ है कर्म। हमारे पास जो भी सम्पत्ति है, उसका उपयोग श्रीकृष्ण के लिए किया जाना चाहिए। यही भक्ति-योग की प्रक्रिया है। श्रीकृष्ण ने हमें मन दिया है, और हमें इस मन का उपयोग श्रीकृष्ण का चिन्तन करने में करना चाहिए। हमें ये हाथ दिए गए हैं, और हमें इनका उपयोग मन्दिर धोने अथवा श्रीकृष्ण के लिए भोजन पकाने में करना चाहिए। हमें ये पैर दिए गए हैं, और हमें इनका उपयोग श्रीकृष्ण के मन्दिर जाने में करना चाहिए। हमें एक नासिका दी गई है, और हमें इसका उपयोग उन पुष्पों को सूँघने में करना चाहिए जो श्रीकृष्ण को अर्पित किए गए हैं। भक्ति-योग की प्रक्रिया द्वारा, हम इन समस्त इन्द्रियों को श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न करते हैं, और इस प्रकार इन्द्रियाँ आध्यात्मीकृत होती हैं।\n\n*Bhagavad-gītā* में अर्जुन कर्म करने से इनकार कर रहा था, और श्रीकृष्ण उसे कर्म में प्रवृत्त होने हेतु प्रेरित कर रहे थे। समूची *Bhagavad-gītā* कर्म करने हेतु, कृष्णभावनामृत में संलग्न होने हेतु, श्रीकृष्ण की ओर से कर्म करने हेतु एक प्रेरणा है। श्रीकृष्ण कभी अर्जुन से नहीं कहते, \"मेरे प्रिय मित्र अर्जुन, इस युद्ध की चिन्ता मत करो। बस बैठ जाओ और मेरा ध्यान करो।\" यह *Bhagavad-gītā* का सन्देश नहीं है। हमें समस्त कर्म से विरत नहीं होना है, अपितु केवल उन कर्मों से, जो श्रीकृष्ण के प्रति हमारी भावना में बाधक हैं। ध्यान का अर्थ है समस्त निरर्थक कर्म को रोक देना। जो कृष्णभावनामृत में उन्नत हैं, वे निरन्तर श्रीकृष्ण के लिए कर्म करते रहते हैं।\n\nमाता केवल अपने दुष्ट बालक को ही बैठकर कुछ न करने को कहती है। यदि कोई बालक अपनी माता को विचलित करने के अतिरिक्त कुछ न कर सके, तो माता कहती है, \"मेरे प्यारे बालक, बस यहीं बैठ जाओ और चुप रहो।\" किन्तु यदि बालक भली-भाँति कार्य कर सके, तो माता कहती है, \"मेरे प्यारे बालक, क्या तुम कृपया यह करने में मेरी सहायता करोगे? क्या तुम वहाँ जाकर वह कर दोगे?\" एक स्थान पर निश्चल बैठे रहना केवल उन्हीं के लिए है जो विवेकपूर्वक कार्य करना नहीं जानते। जब तक बालक एक स्थान पर बैठा रहता है, तब तक वह उत्पात नहीं मचाता। निश्चल बैठना निरर्थकता का निषेध करना है; यह सकारात्मक कर्म नहीं है। निषेध में जीवन नहीं है। सकारात्मक कर्म ही जीवन का गठन करते हैं, और सकारात्मक कर्म ही *Bhagavad-gītā* का सन्देश है। आध्यात्मिक जीवन \"यह मत करो\" नहीं है। आध्यात्मिक जीवन \"यह करो!\" है। उचित रूप से कर्म करने हेतु, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें मनुष्य को न करना जानना चाहिए; अतः कुछ कर्म निषिद्ध हैं। किन्तु समूची *Bhagavad-gītā* \"करो\" है। श्रीकृष्ण कहते हैं, \"मेरे लिए युद्ध करो।\" *Bhagavad-gītā* के आरम्भ में, जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, \"मैं युद्ध नहीं करूँगा,\" तब श्रीकृष्ण ने कहा,\n\nkutas tvā kaśmalam idaṁ\n\nviṣame samupasthitam\n\nanārya juṣṭam asvargyaṁ\n\nakīrti-karam arjuna\n\n\"मेरे प्रिय अर्जुन, तुम पर ये कल्मष कहाँ से आ पड़े? ये उस मनुष्य को तनिक भी शोभा नहीं देते जो जीवन के प्रगतिशील मूल्यों को जानता है। ये उच्चतर लोकों की ओर नहीं, अपितु अपयश की ओर ले जाते हैं।\" (भ.गी. 2.2) श्रीकृष्ण सीधे अर्जुन से कहते हैं कि वह एक अनार्य की भाँति बोल रहा है — अर्थात् ऐसे व्यक्ति की भाँति जो जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों को नहीं जानता। अतः कृष्णभावनामृत का अर्थ निष्क्रिय बैठ जाना नहीं है।\n\nश्रीकृष्ण स्वयं निष्क्रिय नहीं बैठते। उनकी समस्त लीलाएँ कर्म से परिपूर्ण हैं। जब हम आध्यात्मिक जगत् में जाएँगे, तब हम देखेंगे कि श्रीकृष्ण सदैव नृत्य करने, भोजन करने तथा आनन्द लेने में संलग्न रहते हैं। वे ध्यान करने हेतु नहीं बैठते। क्या गोपियों के ध्यान करने का कोई वृत्तान्त है? क्या चैतन्य महाप्रभु ध्यान करने बैठे थे? नहीं, वे सदैव नृत्य करते थे तथा हरे कृष्ण का कीर्तन करते थे। आत्मा स्वभावतः सक्रिय है। हम मौन बैठकर कुछ न करते हुए कैसे रह सकते हैं? यह सम्भव नहीं है। अतः, जब श्रीकृष्ण ने *Bhagavad-gītā* के छठे अध्याय में साङ्ख्य-योग पद्धति की रूपरेखा प्रस्तुत की, तब अर्जुन ने स्पष्ट रूप से कहा,\n\nyo 'yaṁ yogas tvayā proktaḥ\n\nsāmyena madhusūdana\n\netasyāhaṁ na paśyāmi\n\ncañcalatvāt sthitiṁ sthirām\n\n\"हे मधुसूदन [कृष्ण], आपने जिस योग-पद्धति का सार बताया है, वह मुझे अव्यावहारिक तथा असह्य प्रतीत होती है, क्योंकि मन चंचल एवं अस्थिर है।\" (भ.गी. 6.33) यद्यपि अर्जुन अत्यन्त उन्नत था और श्रीकृष्ण का घनिष्ठ मित्र था, फिर भी उसने इस साङ्ख्य-योग पद्धति को अपनाने से तत्काल इनकार कर दिया। सारतः, उसने कहा, \"मेरे लिए यह सम्भव नहीं है।\" यह सम्भव कैसे हो सकता था? अर्जुन एक योद्धा था, एक गृहस्थ था, और वह एक राज्य चाहता था। उसके पास ध्यान हेतु समय कहाँ था? उसने इस प्रकार के ध्यानात्मक योग का अभ्यास करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि मन को वश में करना उतना ही कठिन है जितना वायु को (भ.गी. 6.34)। यह एक तथ्य है। मन को कृत्रिम रूप से वश में करना सम्भव नहीं है; अतः हमें मन को कृष्णभावनामृत में संलग्न करना चाहिए। तब वह वश में हो जाता है। यदि अर्जुन को यह प्रक्रिया वायु को वश में करने से भी अधिक कठिन प्रतीत हुई, तो फिर हमारी क्या बात? आख़िर अर्जुन कोई साधारण मनुष्य नहीं था। वह साक्षात् परमेश्वर श्रीकृष्ण से वार्तालाप कर रहा था, और उसने मन को एक प्रचण्ड वायु के समान घोषित किया। हम वायु को कैसे वश में कर सकते हैं? हम मन को केवल श्रीकृष्ण के चरणकमलों पर स्थिर करके ही वश में कर सकते हैं। यही ध्यान की सिद्धि है।\n\nवास्तव में कोई भी बैठकर ध्यान नहीं करना चाहता। हम क्यों करें? हम तो सकारात्मक कर्म हेतु, मनोरंजन हेतु, आनन्द हेतु बने हैं। कृष्णभावनामृत में, हमारा मनोरंजन नृत्य एवं कीर्तन है, और जब हम थक जाते हैं, तब हम प्रसाद ग्रहण करते हैं। क्या नृत्य करना कठिन है? क्या कीर्तन करना कठिन है? हम मन्दिर में नृत्य करने का कोई शुल्क नहीं लेते। यदि तुम किसी नृत्यशाला में जाओ, तो तुम्हें प्रवेश के लिए शुल्क चुकाना पड़ता है, किन्तु हम कोई शुल्क नहीं लेते। संगीत, नृत्य तथा स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेना स्वाभाविक है। ये हमारे मनोरंजन हैं, और यही हमारी ध्यान-विधि है। अतः यह योग-पद्धति तनिक भी श्रमसाध्य नहीं है। यह तो मात्र मनोरंजन है, सुसुखम्। *Bhagavad-gītā* के नवें अध्याय (9.2) में कहा गया है कि यह योग सुसुखम् है — अत्यन्त सुखमय। \"यह शाश्वत है, और इसे आनन्दपूर्वक सम्पन्न किया जाता है।\" यह स्वाभाविक, स्वतःस्फूर्त एवं सहज है। यही आध्यात्मिक जगत् में हमारा वास्तविक जीवन है।\n\nवैकुण्ठ में, आध्यात्मिक जगत् में, कोई चिन्ता नहीं है। वैकुण्ठ का अर्थ है \"चिन्ता से मुक्ति\", और वैकुण्ठ में मुक्त आत्माएँ सदैव नृत्य करती, कीर्तन करती तथा प्रसाद ग्रहण करती रहती हैं। वहाँ न कारख़ाने हैं, न कठोर श्रम, न तकनीकी संस्थान। इन कृत्रिम वस्तुओं की कोई आवश्यकता नहीं है। *Vedānta-sūtra* में कहा गया है, ānandamayo 'bhyāsāt: भगवान् आनन्दमय हैं, आनन्द एवं सुख से परिपूर्ण हैं। चूँकि हम भगवान् के अंश हैं, अतः हम भी इन्हीं समान गुणों से युक्त हैं। अतः हमारी योग-प्रक्रिया का लक्ष्य परम आनन्दमय श्रीकृष्ण के साथ युक्त होना, उनकी नृत्य-मण्डली में सम्मिलित होना है। तब हम वास्तव में सुखी होंगे।\n\nइस पृथ्वी पर हम कृत्रिम रूप से सुखी होने का प्रयास कर रहे हैं और इसलिए निराश हैं। एक बार जब हम कृष्णभावनामृत में स्थित हो जाते हैं, तब हम अपनी मूल स्थिति को पुनर्जीवित कर लेते हैं और मात्र आनन्दमय बन जाते हैं। चूँकि हमारी वास्तविक प्रकृति आनन्दमय है, अतः हम सदैव सुख की खोज में रहते हैं। नगरों में हम विज्ञापनों से भरे रहते हैं। भोजनालय, मदिरालय, रात्रि-क्लब तथा नृत्यशालाएँ सदैव घोषणा करती रहती हैं, \"आओ, यहाँ आनन्द है। यहाँ सुख है।\" इसका कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति आनन्द की, सुख की खोज में है। हमारा कृष्णभावनामृत संघ भी घोषणा कर रहा है, \"यहाँ आनन्द है,\" किन्तु हमारा सुख का स्तर अत्यन्त भिन्न है। किसी भी स्थिति में, लक्ष्य — सुख — एक ही है।\n\nअधिकांश लोग स्थूल भौतिक स्तर पर सुख की तलाश में लगे रहते हैं। जो अधिक उन्नत हैं, वे कल्पना, दर्शन, काव्य अथवा कला में सुख की तलाश करते हैं। किन्तु भक्ति-योगी दिव्य स्तर पर सुख की तलाश करता है, और यही उसका एकमात्र कार्य है। लोग दिन भर इतना कठोर परिश्रम क्यों कर रहे हैं? वे सोच रहे हैं, \"आज रात मैं आनन्द लूँगा। आज रात मैं इस युवती के साथ अथवा अपनी पत्नी के साथ समागम करूँगा।\" इस प्रकार लोग थोड़ा-सा सुख प्राप्त करने हेतु इतना कष्ट उठा रहे हैं। सुख ही परम लक्ष्य है, किन्तु दुर्भाग्यवश, माया के अधीन, लोग नहीं जानते कि वास्तविक सुख कहाँ पाया जाना है। वास्तविक सुख श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप में नित्य विद्यमान है।\n\nसम्भवतः तुमने श्रीकृष्ण के चित्र देखे होंगे, और यदि देखे हों, तो तुमने ध्यान दिया होगा कि श्रीकृष्ण सदैव प्रसन्न रहते हैं। यदि तुम उनकी मण्डली में सम्मिलित हो जाओ, तो तुम भी प्रसन्न बन जाओगे। क्या तुमने कभी श्रीकृष्ण के किसी यन्त्र के साथ कार्य करते हुए चित्र देखे हैं? क्या तुमने कभी श्रीकृष्ण के धूम्रपान करते हुए चित्र देखे हैं? नहीं, वे स्वभाव से आनन्द से परिपूर्ण हैं, और यदि तुम स्वयं को उसी रीति से उद्घाटित करो, तो तुम भी आनन्द पाओगे। आनन्द कृत्रिम रूप से नहीं पाया जा सकता।\n\nānanda-cinmaya-rasa-pratibhāvitābhis\n\ntābhir ya eva nija-rūpatayā kalābhiḥ\n\ngoloka eva nivasaty akhilātma-bhūto\n\ngovindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi\n\n\"मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जो अपने धाम गोलोक में, राधा के साथ निवास करते हैं, जो उनके अपने आध्यात्मिक स्वरूप के सदृश हैं, जो चौंसठ कलाओं से युक्त आह्लादिनी शक्ति की मूर्तिमान् रूप हैं, और जो अपनी सखियों के संग में हैं — जो राधा के शारीरिक स्वरूप के विस्तारों की मूर्तियाँ हैं, तथा भगवान् के सदा-आनन्दमय आध्यात्मिक रस से व्याप्त एवं अनुप्राणित हैं।\" (ब्रह्म-संहिता 5.37)\n\nरस शब्द का अर्थ है \"स्वाद\" अथवा \"माधुर्य\"। हम मिठाई अथवा कैंडी का आनन्द उसके स्वाद के कारण लेते हैं। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी स्वाद का आनन्द लेने का प्रयास कर रहा है, और हम यौन-समागम का आनन्द लेना चाहते हैं क्योंकि उसमें कुछ स्वाद है। उसे आदि स्वाद कहा जाता है। भौतिक स्वाद भिन्न होते हैं, क्योंकि उनका आस्वादन होता है और वे शीघ्र समाप्त हो जाते हैं। भौतिक स्वाद केवल कुछ क्षण तक रहते हैं। तुम कैंडी का एक टुकड़ा ले सकते हो, उसका आस्वादन कर सकते हो, और कह सकते हो, \"अरे, यह तो बहुत अच्छी है,\" किन्तु आनन्द जारी रखने हेतु तुम्हें दूसरी का आस्वादन करना पड़ता है। भौतिक स्वाद असीम नहीं है, किन्तु वास्तविक स्वाद अनन्त है। आध्यात्मिक स्वाद विस्मृत नहीं किया जा सकता; वह बढ़ता ही जाता है। आनन्दाम्बुधि-वर्धनम्। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, \"यह स्वाद सदैव बढ़ता ही रहता है।\" आध्यात्मिक स्वाद इस अर्थ में समुद्र के समान है कि वह अत्यन्त विशाल है। प्रशान्त महासागर सदैव उछलता रहता है, किन्तु वह बढ़ता नहीं है। भगवान् के आदेश से, समुद्र अपनी सीमा से बाहर नहीं फैलता, और यदि वह फैले, तो प्रलय हो जाए। भगवान् चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि एक और समुद्र है, दिव्य आनन्द का एक समुद्र, एक ऐसा समुद्र जो सदैव बढ़ता ही रहता है। ānandāmbudhi-vardhanaṁ prati-padaṁ pūrṇāmṛtāsvādanaṁ/ sarvātma-snapanaṁ paraṁ vijayate śrī-kṛṣṇa-saṅkīrtanam। हरे कृष्ण का कीर्तन करने से, हमारी आनन्द-शक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है।\n\nजिसने श्रीकृष्ण का साक्षात्कार कर लिया है, वह सदैव वृन्दावन में, वैकुण्ठ में निवास करता है। यद्यपि कोई भक्त वृन्दावन से बहुत दूर किसी स्थान पर निवास करता प्रतीत हो सकता है, फिर भी वह सदैव वृन्दावन में ही निवास करता है, क्योंकि वह जानता है कि श्रीकृष्ण सर्वत्र विद्यमान हैं, यहाँ तक कि परमाणु के भीतर भी। परमेश्वर महत्तम से भी महान् हैं और लघुतम से भी लघु हैं। एक बार जब हम पूर्ण रूप से साक्षात्कारयुक्त एवं कृष्णभावनामृत में स्थित हो जाते हैं, तब हम कभी श्रीकृष्ण को दृष्टि से ओझल नहीं होने देते, और हमारा आनन्द सदैव बढ़ता रहता है। यही वास्तविक योग-पद्धति है, भक्ति-योग, जैसा कि भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं *Bhagavad-gītā* में प्रतिपादित किया है।"}
{"ref": "pop/2", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/2/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "मन एवं इन्द्रियों पर अधिकार", "purport": "yaṁ sannyāsam iti prāhur\n\nyogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava\n\nna hy asannyasta-saṅkalpo\n\nyogī bhavati kaścana\n\n\"जिसे संन्यास कहा जाता है, वह योग के, अर्थात् परमेश्वर से स्वयं को युक्त करने के, समान ही है, क्योंकि कोई भी तब तक योगी नहीं बन सकता जब तक वह इन्द्रियतृप्ति की इच्छा का त्याग न कर दे।\" (भ.गी. 6.2)\n\nयही योगाभ्यास का वास्तविक प्रयोजन है। योग शब्द का अर्थ है \"जोड़ना\"। यद्यपि हम स्वभावतः परमेश्वर के अंश हैं, फिर भी अपनी बद्ध अवस्था में हम इस समय पृथक् हो गए हैं। अपने इस वियोग के कारण, हम भगवान् को समझने तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध की चर्चा करने में अनिच्छुक रहते हैं, और ऐसी चर्चा को समय का अपव्यय तक समझने की प्रवृत्ति रखते हैं। किसी गिरजाघर में अथवा किसी कृष्णभावनामृत मन्दिर में, हम भगवान् की चर्चा करते हैं, किन्तु सामान्य लोगों को इसमें अधिक रुचि नहीं होती। वे इसे समय का अपव्यय, आध्यात्मिक उन्नति के नाम पर एक प्रकार का मनोरंजन समझते हैं, और मानते हैं कि इस समय का उपयोग धन कमाने में अथवा किसी रात्रि-क्लब या भोजनालय में स्वयं का मनोरंजन करने में बेहतर ढंग से किया जा सकता था।\n\nअतः, इन्द्रिय-भोग के ही कारण हम भगवान् की ओर आकृष्ट नहीं होते, और इसीलिए कहा गया है कि जो इन्द्रिय-भोग के व्यसनी हैं, वे योगी नहीं बन सकते — अर्थात् वे योग-पद्धति में सम्मिलित होने के पात्र नहीं हैं। कोई भी मनुष्य किसी भी योग-पद्धति में उन्नति नहीं कर सकता यदि वह इन्द्रियतृप्ति में लिप्त हो और फिर बैठकर ध्यान करने का प्रयास करे। यह तो मात्र एक विराट छल है। ऐसे विरोधाभासी कर्म का कोई अर्थ नहीं है। सर्वप्रथम, योग का अर्थ है इन्द्रियों को वश में करना — यम-नियम। योग के आठ चरण हैं — यम, नियम, आसन, ध्यान, धारणा, प्राणायाम, प्रत्याहार तथा समाधि।\n\nइस छठे अध्याय में, जिसमें भगवान् साङ्ख्य-योग पद्धति की चर्चा करते हैं, वे आरम्भ से ही कहते हैं कि कोई भी तब तक योगी नहीं बन सकता जब तक वह इन्द्रियतृप्ति की इच्छा का त्याग न कर दे। अतः, यदि कोई अपनी इन्द्रियों को तृप्त करता है, तो उसे योगी स्वीकार नहीं किया जा सकता। योग कठोर ब्रह्मचर्य की माँग करता है। योग-पद्धति में यौन-जीवन नहीं है। यदि कोई यौन-समागम में लिप्त होता है, तो वह योगी नहीं हो सकता। अनेक तथाकथित योगी भारत से अमेरिका आते हैं और कहते हैं, \"हाँ, तुम जो चाहो कर सकते हो। तुम जितना चाहो यौन-समागम कर सकते हो। बस ध्यान करो। मैं तुम्हें कोई मन्त्र दूँगा, और तुम मुझे कुछ धन दे देना।\" यह सब बकवास है। श्रीकृष्ण के प्रामाणिक कथनों के अनुसार, कोई भी तब तक योगी नहीं बन सकता जब तक वह इन्द्रियतृप्ति की इच्छा का त्याग न कर दे। इसे योगाभ्यास की प्रथम शर्त के रूप में स्पष्ट रूप से कहा गया है।\n\nārurukṣor muner yogaṁ\n\nkarma kāraṇam ucyate\n\nyogārūḍhasya tasyaiva\n\nśamaḥ kāraṇam ucyate\n\n\"अष्टाङ्ग-योग पद्धति में जो नवदीक्षित है, उसके लिए कर्म साधन कहा गया है; और जिसने पहले ही योग को प्राप्त कर लिया है, उसके लिए समस्त भौतिक कार्यों का परित्याग साधन कहा गया है।\" (भ.गी. 6.3) इस श्लोक के अनुसार, कुछ लोग ऐसे हैं जो सिद्ध अवस्था तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं, और कुछ ऐसे हैं जो उस अवस्था को पहले ही प्राप्त कर चुके हैं। जब तक मनुष्य सिद्ध स्तर पर स्थित नहीं हो जाता, तब तक उसे अनेकानेक कर्म करने पड़ते हैं। पश्चिम में अनेक योग-संस्थाएँ आसन-पद्धति का अभ्यास करने का प्रयास कर रही हैं, और इसलिए वे विभिन्न मुद्राओं में बैठने का अभ्यास करती हैं। इससे सहायता मिल सकती है, किन्तु यह केवल एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य वास्तविक स्तर तक पहुँच सकता है। वास्तविक योग-पद्धति, अपनी सिद्ध अवस्था में, इन शारीरिक कसरतों से अत्यन्त भिन्न है।\n\nतथापि यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि आरम्भ से ही कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ध्यान के स्तर पर स्थित होता है, क्योंकि वह सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन कर रहा होता है। निरन्तर श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहने के कारण, वह समस्त भौतिक कार्यों से विरत हो चुका माना जाता है।\n\nyadā hi nendriyārtheṣu\n\nna karmasv anuṣajjate\n\nsarva-saṅkalpa-san nyāsī\n\nyogārūḍhas tadocyate\n\n\"मनुष्य के विषय में तब कहा जाता है कि उसने योग को प्राप्त कर लिया है, जब वह समस्त भौतिक इच्छाओं का परित्याग करके न तो इन्द्रियतृप्ति हेतु कर्म करता है और न ही सकाम कर्म में संलग्न होता है।\" (भ.गी. 6.4)\n\nवास्तव में यही योग की सिद्ध अवस्था है, और जिसने इस अवस्था को प्राप्त कर लिया है, उसके विषय में कहा जाता है कि उसने योग को प्राप्त कर लिया है। इसका तात्पर्य यह है कि उसने स्वयं को परम समष्टि के साथ संयुक्त, युक्त अथवा जोड़ लिया है। यदि कोई पुरज़ा किसी यन्त्र से विलग हो, तो वह कोई कार्य नहीं करता, किन्तु ज्यों ही वह यन्त्र से उचित रूप से जुड़ जाता है, वह भली-भाँति कार्य करता है और अपने विभिन्न कार्यों को सम्पन्न करता है। यही योग का अर्थ है — परम समष्टि के साथ जुड़ना, समस्त यन्त्र के साथ संयोजन में सेवा करना। इस समय हम विलग हैं, और हमारे भौतिक सकाम कर्म मात्र समय का अपव्यय हैं। जो ऐसे कर्म में संलग्न होता है, उसका *Bhagavad-gītā* में मूढ — अर्थात् धूर्त — के रूप में वर्णन किया गया है। यद्यपि कोई प्रतिदिन हज़ारों डॉलर कमा सकता है और एक महत्त्वपूर्ण व्यवसायी हो सकता है, फिर भी *Bhagavad-gītā* में उसका मूढ, धूर्त, के रूप में वर्णन किया गया है, क्योंकि वह केवल खाने, सोने, रक्षा करने तथा समागम करने में अपना समय गँवा रहा है।\n\nलोग यह विचार करने हेतु रुकते ही नहीं कि वे वास्तव में व्यर्थ के लिए ही इतना कठोर परिश्रम कर रहे हैं। जो लाखों डॉलर कमाता है, वह वास्तव में उस मनुष्य से अधिक नहीं खा सकता जो दस डॉलर कमाता है। जो मनुष्य लाखों डॉलर कमाता है, वह लाखों स्त्रियों के साथ समागम नहीं कर सकता। यह उसकी शक्ति के भीतर नहीं है। उसकी समागम-शक्ति उसी के समान है जो दस डॉलर कमाता है, ठीक जैसे उसकी खाने की शक्ति समान है। इसका तात्पर्य यह है कि हमारी भोग की शक्ति सीमित है। अतः मनुष्य को यह सोचना चाहिए, \"मेरा भोग उस मनुष्य के भोग के समान ही है, जो प्रतिदिन दस डॉलर कमा रहा है। तो फिर मैं लाखों डॉलर कमाने हेतु इतना कठोर परिश्रम क्यों कर रहा हूँ? मैं अपनी ऊर्जा क्यों गँवा रहा हूँ? मुझे अपने समय एवं ऊर्जा को भगवान् को समझने में लगाना चाहिए। यही जीवन का प्रयोजन है।\" यदि किसी को कोई आर्थिक समस्या न हो, तो उसके पास कृष्णभावनामृत को समझने हेतु पर्याप्त समय है। यदि वह इस अमूल्य समय को गँवा देता है, तो उसे मूढ, धूर्त अथवा गधा कहा जाता है।\n\nपूर्ववर्ती श्लोक के अनुसार, मनुष्य के विषय में तब कहा जाता है कि उसने योग को प्राप्त कर लिया है, जब उसने समस्त भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर दिया हो। एक बार जब हम योग में पूर्ण रूप से स्थित हो जाते हैं, तब हम सन्तुष्ट रहते हैं। हम अब भौतिक इच्छाओं का अनुभव नहीं करते। हम अब न तो इन्द्रियतृप्ति हेतु कर्म करते हैं और न ही सकाम कर्म में संलग्न होते हैं। जब हम \"सकाम कर्म\" की बात करते हैं, तब हम उन कर्मों की ओर संकेत करते हैं जो इन्द्रियतृप्ति के प्रयोजन से किए जाते हैं। अर्थात्, हम अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने हेतु धन कमा रहे होते हैं। यदि कोई सदाचारी है, तो वह पुण्य-कर्मों में संलग्न होता है — वह दान-संस्थाओं को धन देता है, चिकित्सालय, विद्यालय इत्यादि खोलता है। यद्यपि ये निश्चय ही सद्कर्म हैं, फिर भी ये अन्ततः इन्द्रियतृप्ति हेतु ही होते हैं। यह कैसे? उदाहरणार्थ, यदि मैं किसी शैक्षिक संस्थान को दान दूँ, तो मुझे अच्छी शैक्षिक सुविधाएँ प्राप्त होंगी और मैं अपने अगले जीवन में अत्यधिक शिक्षित बनूँगा। इस प्रकार शिक्षित होकर, मैं एक अच्छा पद प्राप्त करूँगा और अच्छी मात्रा में धन अर्जित करूँगा। तो फिर मैं इस धन का उपयोग कैसे करूँगा? इन्द्रियतृप्ति हेतु। इस प्रकार ये पुण्य एवं सकाम कर्म एक प्रकार का चक्र बनाते हैं।\n\nहम प्रायः \"जीवन का एक बेहतर स्तर\" अभिव्यक्ति सुनते हैं, किन्तु इसका अर्थ क्या है? कहा जाता है कि अमेरिका में जीवन का स्तर भारत के स्तर से श्रेष्ठ है, किन्तु दोनों ही देशों में खाना, सोना, रक्षा करना तथा समागम करना है। निःसन्देह, अमेरिका में भोजन की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है, किन्तु खाने की प्रक्रिया तो वहाँ है ही। एक श्रेष्ठतर जीवन-स्तर का अर्थ श्रेष्ठतर आध्यात्मिक साक्षात्कार नहीं है। इसका अर्थ केवल बेहतर खाना, सोना, समागम तथा रक्षा करना है। इसे सकाम कर्म कहा जाता है, और यह इन्द्रियतृप्ति पर आधारित है।\n\nयोग का इन्द्रियतृप्ति अथवा सकाम कर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। योग का अर्थ है परमेश्वर के साथ जुड़ना। ध्रुव महाराज ने भगवान् को देखने हेतु कठोर तपस्या की, और जब उन्होंने अन्ततः भगवान् को देखा, तब उन्होंने कहा, svāmin kṛtārtho 'smi varaṁ na yāce: \"मेरे प्रिय भगवन्, मैं अब पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हूँ। मैं और कुछ नहीं माँग रहा। मुझे आपसे कोई और वरदान नहीं चाहिए।\" ध्रुव महाराज ने वरदान क्यों नहीं माँगे? \"वरदान\" क्या है? सामान्यतः, वरदान का अर्थ है कोई विशाल राज्य, एक सुन्दर पत्नी, स्वादिष्ट भोजन इत्यादि प्राप्त करना; किन्तु जब कोई वास्तव में भगवान् के साथ जुड़ जाता है, तब वह ऐसे \"वरदान\" नहीं चाहता। वह पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहता है। Svāmin kṛtārtho 'smi varaṁ na yāce।\n\nवास्तव में, ध्रुव महाराज ने आरम्भ में अपने पिता का राज्य प्राप्त करने हेतु भगवान् की खोज की थी। ध्रुव महाराज की माता को उनके पिता ने त्याग दिया था, और उनकी सौतेली माता उनके पिता की गोद में बैठने पर रुष्ट होती थी। वस्तुतः, उसने उन्हें अपने पिता की गोद में बैठने से वर्जित कर दिया, क्योंकि ध्रुव महाराज उसके गर्भ से उत्पन्न नहीं हुए थे। यद्यपि वे केवल पाँच वर्ष के थे, ध्रुव महाराज एक क्षत्रिय थे, और उन्होंने इसे एक महान् अपमान के रूप में लिया। अपनी माता के पास जाकर उन्होंने कहा, \"माते, मेरी सौतेली माता ने मुझे मेरे पिता की गोद में बैठने से वर्जित करके मेरा अपमान किया है।\" तब ध्रुव महाराज रोने लगे, और उनकी माता ने कहा, \"मेरे प्रिय पुत्र, मैं क्या कर सकती हूँ? तुम्हारे पिता तुम्हारी सौतेली माता को मुझसे अधिक प्रेम करते हैं। मैं कुछ नहीं कर सकती।\" तब ध्रुव महाराज ने कहा, \"किन्तु मुझे अपने पिता का राज्य चाहिए। मुझे बताओ कि मैं उसे कैसे प्राप्त कर सकता हूँ।\" उनकी माता ने कहा, \"मेरे प्रिय पुत्र, यदि श्रीकृष्ण, भगवान्, तुम्हें आशीर्वाद दें, तो तुम उसे प्राप्त कर सकते हो।\" ध्रुव महाराज ने पूछा, \"भगवान् कहाँ हैं?\" उनकी माता ने कहा, \"अरे, कहा जाता है कि भगवान् वन में हैं। महान् ऋषि भगवान् की खोज में वन को जाते हैं।\"\n\nयह सुनकर, ध्रुव महाराज सीधे वन को गए और कठोर तपस्या करने लगे। अन्ततः उन्होंने भगवान् को देखा, और जब उन्होंने उन्हें देखा, तब उन्हें अपने पिता के राज्य की इच्छा न रही। अपितु उन्होंने कहा, \"मेरे प्रिय भगवन्, मैं तो कुछ कंकड़ खोज रहा था, किन्तु इसके स्थान पर मुझे अमूल्य रत्न मिल गए हैं। अब मुझे अपने पिता के राज्य की कोई परवाह नहीं। अब मैं पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हूँ।\" जब कोई वास्तव में भगवान् के साथ जुड़ जाता है, तब वह पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रहता है। उसकी सन्तुष्टि इस भौतिक जगत् के तथाकथित भोग से असीम रूप से महान् होती है। यही भगवत्-साक्षात्कार से प्राप्त होने वाली सन्तुष्टि है, और यही योग की सिद्धि है।\n\nजब कोई व्यक्ति भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूर्ण रूप से संलग्न होता है, तब वह अपने में ही प्रसन्न रहता है, और इस प्रकार वह अब न तो इन्द्रियतृप्ति में और न ही सकाम कर्म में संलग्न होता है। अन्यथा, मनुष्य को इन्द्रियतृप्ति में संलग्न होना ही पड़ता है, क्योंकि कोई भी कर्म के बिना नहीं रह सकता। समस्त कर्म को रोक देना असम्भव है। जैसा कि पहले कहा गया है, जीव के रूप में कर्म करना हमारा स्वभाव है। कहा जाता है, \"खाली मन शैतान का घर है।\" यदि हमारे पास कोई कृष्णभावनामृत-संलग्नता न हो, तो हम इन्द्रियतृप्ति अथवा सकाम कर्म में संलग्न होंगे। यदि किसी बालक को प्रशिक्षित अथवा शिक्षित न किया जाए, तो वह बिगड़ जाता है। यदि कोई योग-पद्धति का अभ्यास नहीं करता, यदि वह योग-प्रक्रिया द्वारा अपनी इन्द्रियों को वश में करने का प्रयास नहीं करता, तो वह अपनी इन्द्रियों को उन्हीं की तृप्ति में संलग्न कर देगा। जब कोई अपनी इन्द्रियों को तृप्त कर रहा होता है, तब योगाभ्यास का प्रश्न ही नहीं उठता।\n\nकृष्णभावनामृत के बिना, मनुष्य को सदैव आत्म-केन्द्रित अथवा विस्तृत स्वार्थपूर्ण कार्यों की खोज में रहना ही पड़ता है। किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सब कुछ श्रीकृष्ण की तृप्ति हेतु कर सकता है और इस प्रकार इन्द्रियतृप्ति से पूर्ण रूप से अनासक्त रह सकता है। जिसने श्रीकृष्ण का साक्षात्कार नहीं किया है, उसे योग की सीढ़ी के सर्वोच्च पायदान तक उन्नत होने से पूर्व यान्त्रिक रूप से भौतिक इच्छाओं से बचने का प्रयास करना पड़ता है।\n\nयोग-पद्धति की तुलना एक सोपान-सीढ़ी से की जा सकती है। एक योगी पाँचवें पायदान पर स्थित हो सकता है, दूसरा योगी पचासवें पायदान पर, और कोई और पाँच-सौवें पायदान पर। प्रयोजन, निःसन्देह, शिखर तक पहुँचना है। यद्यपि समूची सीढ़ी को योग-पद्धति कहा जा सकता है, फिर भी जो पाँचवें पायदान पर है, वह उसके समान नहीं है जो अधिक ऊपर है। *Bhagavad-gītā* में श्रीकृष्ण अनेक योग-पद्धतियों का प्रतिपादन करते हैं — कर्म-योग, ज्ञान-योग, ध्यान-योग तथा भक्ति-योग। ये समस्त पद्धतियाँ भगवान्, श्रीकृष्ण, से जुड़ी हैं, ठीक जैसे समूची सीढ़ी सर्वोच्च तल से जुड़ी होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि योग-पद्धति का अभ्यास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सर्वोच्च तल पर स्थित है; केवल वही ऐसा स्थित है जो पूर्ण कृष्णभावनामृत में है। अन्य योग-सीढ़ी के विभिन्न पायदानों पर स्थित हैं।\n\nuddhared ātmanātmānaṁ\n\nnātmānam avasādayet\n\nātmaiva hy ātmano bandhur\n\nātmaiva ripur ātmanaḥ\n\n\"मनुष्य को अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, अपना पतन नहीं। मन ही बद्ध आत्मा का मित्र है, और उसका शत्रु भी।\" (भ.गी. 6.5) आत्मा शब्द शरीर, मन तथा आत्मा को सूचित करता है — विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार। योग-पद्धति में मन तथा बद्ध आत्मा विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। चूँकि मन योगाभ्यास का केन्द्र-बिन्दु है, अतः यहाँ आत्मा मन को सूचित करता है। योग-पद्धति का प्रयोजन मन को वश में करना तथा उसे इन्द्रिय-विषयों की आसक्ति से दूर खींचना है। यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि मन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वह बद्ध आत्मा को अज्ञान के पंक से उद्धार कर सके।\n\nअष्टाङ्ग-योग पद्धति में, ये अष्टाङ्ग योग — ध्यान, धारणा इत्यादि — मन को वश में करने हेतु हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मनुष्य को अपना उद्धार करने हेतु अपने मन का उपयोग करना चाहिए। जब तक कोई मन को वश में नहीं कर सकता, तब तक उद्धार का प्रश्न ही नहीं उठता। शरीर एक रथ के समान है, और मन सारथी है। यदि तुम अपने सारथी से कहो, \"कृपया मुझे श्रीकृष्ण के मन्दिर ले चलो,\" तो सारथी तुम्हें वहाँ ले जाएगा, किन्तु यदि तुम उससे कहो, \"कृपया मुझे उस मदिरालय ले चलो,\" तो तुम वहाँ जाओगे। तुम्हें जहाँ भी इच्छा हो वहाँ ले जाना सारथी का कार्य है। यदि तुम सारथी को वश में रख सको, तो वह तुम्हें वहाँ ले जाएगा जहाँ तुम्हें जाना चाहिए, किन्तु यदि नहीं, तो वह अन्ततः तुम्हें वहीं ले जाएगा जहाँ उसकी इच्छा हो। यदि तुम्हारा अपने सारथी पर कोई नियन्त्रण न हो, तो तुम्हारा सारथी तुम्हारा शत्रु है, किन्तु यदि वह तुम्हारे आदेशों के अनुसार कार्य करे, तो वह तुम्हारा मित्र है।\n\nयोग-पद्धति का प्रयोजन मन को इस प्रकार वश में करना है कि मन तुम्हारे मित्र के रूप में कार्य करे। कभी-कभी मन मित्र के रूप में कार्य करता है और कभी शत्रु के रूप में। चूँकि हम परमेश्वर के अंश हैं, जिनके पास अनन्त स्वतन्त्रता है, अतः हमारे पास अणु-मात्र, अर्थात् ससीम, स्वतन्त्रता है। मन ही उस स्वतन्त्रता को नियन्त्रित कर रहा है, और इसलिए वह हमें या तो श्रीकृष्ण के मन्दिर ले जा सकता है अथवा किसी रात्रि-क्लब।\n\nइस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रयोजन मन को श्रीकृष्ण पर स्थिर करना है। जब मन इस प्रकार स्थिर हो जाता है, तब वह हमारे मित्र के रूप में कार्य करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता। उसके पास किसी अन्य रीति से कार्य करने का अवसर ही नहीं रहता। ज्यों ही श्रीकृष्ण मन में आसीन होते हैं, वहाँ प्रकाश हो जाता है, ठीक जैसे जब सूर्य आकाश में होता है, तब अन्धकार दूर हो जाता है। श्रीकृष्ण ठीक सूर्य के समान हैं, और जब वे उपस्थित होते हैं, तब अन्धकार का कोई अवसर नहीं रहता। यदि हम श्रीकृष्ण को अपने मन में रखें, तो माया का अन्धकार कभी प्रवेश नहीं कर पाएगा। मन को श्रीकृष्ण पर स्थिर रखना ही योग की सिद्धि है। यदि मन परमेश्वर पर दृढ़ता से स्थिर हो, तो वह किसी भी निरर्थकता को प्रवेश नहीं करने देगा, और कोई पतन नहीं होगा। यदि मन दृढ़ है, तो सारथी दृढ़ है, और हम जहाँ भी इच्छा हो वहाँ जा सकते हैं। समूची योग-पद्धति का प्रयोजन मन को दृढ़ बनाना है, उसे परमेश्वर से विचलित होने में असमर्थ बनाना है।\n\nSa vai manaḥ kṛṣṇa-padāravindayoḥ। मनुष्य को अपना मन श्रीकृष्ण पर स्थिर करना चाहिए, ठीक जैसे अम्बरीष महाराज ने किया था, जब उनका दुर्वासा मुनि नामक एक महान् अष्टाङ्ग-योगी के साथ विवाद हुआ। चूँकि अम्बरीष महाराज एक गृहस्थ थे, अतः वे एक हिसाब-किताब रखने वाले व्यक्ति थे। इसका अर्थ है कि उन्हें पाउंड, शिलिंग तथा सिक्सपेंस, अथवा डॉलर तथा सेंट का हिसाब रखना पड़ता था। गृहस्थ होने के अतिरिक्त, महाराज अम्बरीष एक महान् राजा एवं भक्त भी थे। दुर्वासा मुनि एक महान् योगी थे, जो संयोगवश महाराज अम्बरीष से अत्यन्त ईर्ष्या करते थे। दुर्वासा मुनि सोच रहे थे, \"मैं एक महान् योगी हूँ, और मैं आकाश में भ्रमण कर सकता हूँ। यह व्यक्ति एक साधारण राजा है, और इसके पास ऐसी योग-शक्तियाँ नहीं हैं। फिर भी लोग इसका अधिक सम्मान करते हैं। ऐसा क्यों है? मैं इसे एक अच्छा पाठ पढ़ाऊँगा।\" तब दुर्वासा मुनि महाराज अम्बरीष से कलह आरम्भ करने लगे, किन्तु चूँकि राजा सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन करते थे, अतः वे इस महान् योगी को पराजित करने में सफल रहे। परिणामस्वरूप दुर्वासा मुनि को नारायण द्वारा महाराज अम्बरीष के चरणों में शरण लेने का निर्देश दिया गया। दुर्वासा मुनि इतने सिद्ध योगी थे कि एक वर्ष के भीतर वे समस्त भौतिक ब्रह्माण्ड में भ्रमण कर सकते थे और आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड में भी प्रवेश कर सकते थे। वस्तुतः, वे सीधे भगवान् के धाम वैकुण्ठ को गए और स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के दर्शन किए। फिर भी दुर्वासा मुनि इतने दुर्बल थे कि उन्हें पृथ्वी पर लौटकर महाराज अम्बरीष के चरणों में गिरना पड़ा। महाराज अम्बरीष एक साधारण राजा थे, किन्तु उनकी एक महान् योग्यता यह थी कि वे सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन करते थे। इस प्रकार उनका मन सदैव वश में रहता था, और वे योग के सर्वोच्च सिद्ध स्तर पर स्थित थे। हम भी अपने भीतर श्रीकृष्ण के चरणकमलों पर मन को स्थिर रखकर अत्यन्त सहजता से उसे वश में कर सकते हैं। केवल श्रीकृष्ण का चिन्तन करने मात्र से, हम विजयी विजेता, सर्वोच्च योगी बन जाते हैं।\n\nYoga indriya-saṁyamaḥ। योग-पद्धति इन्द्रियों को वश में करने हेतु है, और चूँकि मन इन्द्रियों से ऊपर है, अतः यदि हम मन को वश में कर सकें, तो हमारी इन्द्रियाँ स्वतः वश में हो जाती हैं। जिह्वा कुछ अनुचित खाना चाह सकती है, किन्तु यदि मन दृढ़ हो, तो वह कह सकता है, \"नहीं। तुम यह नहीं खा सकती। तुम केवल कृष्ण-प्रसाद ही खा सकती हो।\" इस प्रकार जिह्वा, साथ ही अन्य समस्त इन्द्रियाँ, मन द्वारा वश में की जा सकती हैं। indriyāṇi parāṇy āhur indriyebhyaḥ paraṁ manaḥ [भ.गी. 3.42]। भौतिक शरीर इन्द्रियों से बना है, और परिणामस्वरूप शरीर के कार्य इन्द्रिय-कार्य हैं। किन्तु, इन्द्रियों से ऊपर मन है, और मन से ऊपर बुद्धि है, और बुद्धि से ऊपर आत्मा है। यदि कोई आध्यात्मिक स्तर पर हो, तो उसकी बुद्धि, मन तथा इन्द्रियाँ सभी आध्यात्मीकृत हो जाती हैं। इस कृष्णभावनामृत प्रक्रिया का प्रयोजन इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के आध्यात्मीकरण को साकार करना है। आत्मा सबसे श्रेष्ठ है, किन्तु चूँकि वह सोई हुई है, अतः उसने चंचल मन को मुख़्तारनामा दे दिया है। किन्तु, जब आत्मा जाग जाती है, तब वह पुनः स्वामी बन जाती है, और दास मन अनुचित रूप से कार्य नहीं कर सकता। एक बार जब हम कृष्णभावनामृत में जाग जाते हैं, तब बुद्धि, मन तथा इन्द्रियाँ निरर्थक रूप से कार्य नहीं कर सकतीं। उन्हें आत्मा के आदेशों के अनुसार ही कार्य करना पड़ता है। यही आध्यात्मीकरण एवं शुद्धिकरण है। hṛṣīkeṇa hṛṣīkeśa-sevanaṁ bhaktir ucyate [चै.च. मध्य 19.170]। हमें इन्द्रियों के स्वामी की सेवा इन्द्रियों से ही करनी चाहिए। परमेश्वर को हृषीकेश कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे इन्द्रियों के आदि नियन्ता हैं, ठीक जैसे राजा किसी राज्य की समस्त गतिविधियों का आदि नियन्ता होता है, और नागरिक गौण नियन्ता होते हैं।\n\nभक्ति का अर्थ है हृषीकेश की इच्छाओं के अनुसार आध्यात्मिक रूप से कर्म करना। हम कैसे कर्म कर सकते हैं? चूँकि हमें अपनी इन्द्रियों से कर्म करना ही पड़ता है, अतः उचित रूप से कर्म करने हेतु हमें अपनी इन्द्रियों का आध्यात्मीकरण करना चाहिए। जैसा कि पहले कहा गया है, मौन ध्यान में बैठने का अर्थ है अवांछित कर्म को रोक देना, किन्तु कृष्णभावनामृत में कर्म करना दिव्य है। निरर्थक कर्म का परित्याग अपने आप में सिद्धि नहीं है। हमें पूर्ण रूप से कर्म करना चाहिए। जब तक हम अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश के अनुसार कर्म करने हेतु प्रशिक्षित नहीं करते, तब तक हमारी इन्द्रियाँ पुनः अवांछित कार्यों में संलग्न हो जाएँगी, और हमारा पतन हो जाएगा। अतः हमें अपनी इन्द्रियों को श्रीकृष्ण के लिए कर्म में संलग्न करना चाहिए और इस प्रकार कृष्णभावनामृत में दृढ़ता से स्थिर रहना चाहिए।\n\nभौतिक अस्तित्व में मनुष्य मन तथा इन्द्रियों के प्रभाव के अधीन रहता है। वस्तुतः, शुद्ध आत्मा भौतिक जगत् में मन के अहंकार के कारण उलझी हुई है, जो भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाना चाहता है। अतः मन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वह भौतिक प्रकृति के तड़क-भड़क से आकृष्ट न हो, और इस प्रकार बद्ध आत्मा का उद्धार हो सके। मनुष्य को इन्द्रिय-विषयों के प्रति आकर्षण से अपना पतन नहीं करना चाहिए। जितना अधिक कोई इन्द्रिय-विषयों के प्रति आकृष्ट होता है, उतना ही अधिक वह भौतिक अस्तित्व में उलझ जाता है। स्वयं को सुलझाने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि मन को सदैव कृष्णभावनामृत में संलग्न रखा जाए। छठे अध्याय (*Bhagavad-gītā*) के पाँचवें श्लोक में 'हि' शब्द का प्रयोग इसी बिन्दु पर बल देने हेतु किया गया है — अर्थात् यह कि मनुष्य को ऐसा करना ही चाहिए। यह भी कहा गया है,\n\nmana eva manuṣyāṇāṁ\n\nkāraṇaṁ bandha-mokṣayoḥ\n\nbandhāya viṣayāsaṅgo\n\nmuktyai nirviṣayaṁ manaḥ\n\n\"मनुष्य के लिए, मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मुक्ति का कारण है। इन्द्रिय-विषयों में लीन मन बन्धन का कारण है, और इन्द्रिय-विषयों से अनासक्त मन मुक्ति का कारण है।\" (*Viṣṇu Purāṇa* 6.7.28) जो मन सदैव कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, वही परम मुक्ति का कारण है। जब मन इस प्रकार कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, तब उसके माया-भावना में संलग्न होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। कृष्णभावनामृत में, हम सूर्य-प्रकाश में रहते हैं, और हमारे अन्धकार से आच्छादित होने की कोई सम्भावना नहीं रहती।\n\nचूँकि हमारे पास स्वतन्त्रता, अर्थात् स्वातन्त्र्य, है, अतः हम या तो किसी अन्धकारपूर्ण कक्ष में रह सकते हैं अथवा खुले दिवालोक में बाहर जा सकते हैं। यह हमारा चुनाव है। अन्धकार को प्रकाश से मिटाया जा सकता है, किन्तु प्रकाश को अन्धकार से आच्छादित नहीं किया जा सकता। यदि हम किसी अन्धकारपूर्ण कक्ष में हों और कोई एक दीपक ले आए, तो अन्धकार दूर हो जाता है। किन्तु हम अन्धकार को सूर्य-प्रकाश में नहीं ले जा सकते। यह सम्भव नहीं है। अन्धकार तो बस लुप्त हो जाएगा। kṛṣṇa sūrya-sama māyā haya andhakāra। श्रीकृष्ण सूर्य-प्रकाश के समान हैं, और माया अन्धकार के समान है। तो फिर अन्धकार सूर्य-प्रकाश में कैसे विद्यमान रह सकता है? यदि हम स्वयं को सदैव सूर्य-प्रकाश में रखें, तो अन्धकार हम पर प्रभाव डालने में असफल रहेगा। यही कृष्णभावनामृत का सम्पूर्ण दर्शन है: सदैव कृष्णभावनामय कार्यों में संलग्न रहो, और माया छिन्न-भिन्न हो जाएगी, ठीक जैसे प्रकाश होने पर अन्धकार छिन्न-भिन्न हो जाता है। यह *Śrīmad-Bhāgavatam* (1.7.4) में कहा गया है:\n\nbhakti-yogena manasi\n\nsamyak praṇihite 'male\n\napaśyat puruṣaṁ pūrṇaṁ\n\nmāyāṁ ca tad-apāśrayam\n\n\"जब ऋषि व्यासदेव ने, अपने आध्यात्मिक गुरु नारद के निर्देश पर, अपने मन को स्थिर किया, और उसे भक्ति-योग में संयोजित करके भौतिकता के किसी भी लेश के बिना पूर्ण रूप से संलग्न किया, तब व्यासदेव ने परम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का, उनकी बहिरंगा शक्ति सहित, जो पूर्ण नियन्त्रण में थी, साक्षात्कार किया।\"\n\nमनसि शब्द मन को सूचित करता है। जब कोई भक्ति-योग में प्रबुद्ध होता है, तब मन समस्त कल्मष से पूर्ण रूप से मुक्त हो जाता है (samyak praṇihite 'male)। जब व्यास ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का दर्शन किया, तब उन्होंने पृष्ठभूमि में माया को देखा (māyāṁ ca tad-apāśrayam)। जहाँ कहीं भी प्रकाश होता है, वहाँ अन्धकार के उपस्थित होने की भी सम्भावना होती है। अर्थात्, अन्धकार प्रकाश का दूसरा पक्ष है, अथवा अन्धकार प्रकाश के आश्रय में है, ठीक जैसे यदि मैं अपना हाथ प्रकाश के समक्ष ऊपर उठाऊँ, तो मेरे हाथ का ऊपरी भाग प्रकाश में होगा, और निचला भाग छाया में होगा। दूसरे शब्दों में, एक ओर प्रकाश है और दूसरी ओर अन्धकार। जब व्यासदेव ने परमेश्वर श्रीकृष्ण का दर्शन किया, तब उन्होंने उनके आश्रय में माया, अन्धकार, को भी देखा।\n\nऔर यह माया क्या है? इसे *Śrīmad-Bhāgavatam* (1.7.5) के अगले श्लोक में समझाया गया है:\n\nyayā sammohito jīva\n\nātmānaṁ tri-guṇātmakam\n\nparo 'pi manute 'narthaṁ\n\ntat-kṛtaṁ cābhipadyate\n\n\"बहिरंगा शक्ति के कारण जीव, यद्यपि प्रकृति के तीन गुणों से परे है, स्वयं को एक भौतिक उत्पाद मानता है और इस प्रकार भौतिक दुःखों की प्रतिक्रियाएँ भोगता है।\" इस प्रकार माया-शक्ति ने अस्थायी रूप से बद्धजीवों को आच्छादित कर रखा है। और ये बद्धजीव कौन हैं? यद्यपि सीमित हैं, बद्ध आत्माएँ श्रीकृष्ण के समान ही प्रकाश से परिपूर्ण हैं। समस्या यह है कि बद्ध आत्मा स्वयं को इस भौतिक जगत् से तादात्म्य कर लेती है। इसे ही भ्रम कहते हैं — पदार्थ के साथ मिथ्या तादात्म्य। यद्यपि व्यष्टि आत्मा दिव्य है, तथापि माया के आदेश के अधीन वह अनुचित कर्मों में प्रवृत्त होती है, और इससे उसका बन्धन अथवा मिथ्या तादात्म्य उत्पन्न होता है। इसकी विस्तृत व्याख्या *श्रीमद्भागवत* के प्रथम स्कन्ध के सप्तम अध्याय में हुई है।\n\nनिष्कर्षतः, हमारी वास्तविक स्थिति प्रकाश से परिपूर्ण आध्यात्मिक स्फुलिंगों की है। अब हम अस्थायी रूप से इस माया-शक्ति से आच्छादित हैं, जो हमें आदेश दे रही है। माया के प्रभाव में कर्म करते हुए, हम भौतिक शक्ति में अधिकाधिक उलझते जा रहे हैं। योग-पद्धति हमें इस उलझाव से मुक्त करने हेतु है, और योग की पूर्णता कृष्णभावनामृत है। अतः कृष्णभावनामृत वह सर्वाधिक प्रभावकारी साधन है, जिसके द्वारा हम स्वयं को भौतिक शक्ति के प्रभाव से उन्मुक्त कर सकते हैं।"}
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मैं ही ईश्वर हूँ।\" इस प्रकार मनुष्य एक मिथ्या धारणा के अधीन परिश्रम करता है, और उसका जीवन नष्ट हो जाता है। हम अनेक वस्तुओं को — यहाँ तक कि साम्राज्यों को भी — जीतने का प्रयत्न करते हैं; किन्तु यदि हम मन को जीतने में विफल रहते हैं, तो साम्राज्य जीत लेने पर भी हम विफल ही हैं। सम्राट होते हुए भी हमारे भीतर हमारा सबसे बड़ा शत्रु — हमारा अपना मन — विद्यमान रहेगा।\n\njitātmanaḥ praśāntasya\n\nparamātmā samāhitaḥ\n\nśītoṣṇa-sukha-duḥkheṣu\n\ntathā mānāpamānayoḥ\n\n\"जिसने मन को जीत लिया है, उसके लिए परमात्मा पहले ही प्राप्त हो चुके हैं, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है। ऐसे मनुष्य के लिए सुख और दुःख, शीत और उष्ण, मान और अपमान — सब एक समान हैं।\" (गीता 6.7)\n\nवस्तुतः प्रत्येक जीव का यही प्रयोजन है कि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश के अनुसार रहे, जो परमात्मा रूप में सबके हृदय में विराजमान हैं। जब मन बहिरंगा माया-शक्ति द्वारा भटका दिया जाता है, तब मनुष्य भौतिक कर्मों में उलझ जाता है। अतः ज्योंही किसी योग-पद्धति के द्वारा मनुष्य का मन वश में होता है, त्योंही उसे यह मान लेना चाहिए कि वह गन्तव्य तक पहुँच ही चुका है। मनुष्य को श्रेष्ठ आदेश के अनुसार रहना होता है। जब मन श्रेष्ठ प्रकृति पर स्थिर हो जाता है, तब उसके पास परमेश्वर के आदेश का पालन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता। मन को किसी श्रेष्ठ आदेश को स्वीकार करना और उसका पालन करना ही होगा। जब मन वश में होता है, तब मनुष्य स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन करता है। चूँकि यह दिव्य स्थिति कृष्णभावनामृत में स्थित मनुष्य को तत्काल प्राप्त हो जाती है, इसलिए भगवान् का भक्त भौतिक अस्तित्व की द्वन्द्वात्मकताओं — दुःख और सुख, शीत और उष्ण आदि — से अप्रभावित रहता है। इस अवस्था को समाधि अथवा परमेश्वर में तल्लीनता कहते हैं।\n\njñāna-vijñāna-tṛptātmā\n\nkūṭa-stho vijitendriyaḥ\n\nyukta ity ucyate yogī\n\nsama-loṣṭrāśma-kāñcanaḥ\n\n\"जब कोई व्यक्ति अर्जित ज्ञान और अनुभूति के द्वारा पूर्णतः सन्तुष्ट हो जाता है, तब उसे आत्म-साक्षात्कार में स्थित कहा जाता है और योगी (अथवा योगसिद्ध) कहलाता है। ऐसा व्यक्ति दिव्य स्थिति में स्थित तथा आत्मसंयमी होता है। वह सब वस्तुओं को — चाहे वे कंकड़ हों, पत्थर हों, अथवा स्वर्ण हो — एक समान देखता है।\" (गीता 6.8)\n\nपरम सत्य की अनुभूति के बिना ग्रन्थ-ज्ञान व्यर्थ है। इसे इस प्रकार कहा गया है:\n\nataḥ śrī-kṛṣṇa-nāmādi\n\nna bhaved grāhyam indriyaiḥ\n\nsevonmukhe hi jihvādau\n\nsvayam eva sphuraty adaḥ\n\n[BRS. 1.2.234]\n\n\"अपनी भौतिक रूप से कलुषित इन्द्रियों के द्वारा कोई भी श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकता। केवल तभी, जब मनुष्य भगवान् की दिव्य सेवा के द्वारा आध्यात्मिक रूप से ओतप्रोत हो जाता है, भगवान् के दिव्य नाम, रूप, गुण और लीलाएँ उस पर प्रकट होते हैं।\" (*पद्म पुराण*)\n\nसत्त्व, रजस् और तमस् गुणों में स्थित मनुष्य होते हैं, और इन समस्त बद्धजीवों के उद्धार हेतु अठारह *पुराण* हैं। छह *पुराण* सत्त्वगुण में स्थित जनों के लिए हैं, छह रजोगुण में स्थित जनों के लिए, और छह तमोगुण में स्थित जनों के लिए। *पद्म पुराण* सत्त्वगुण में स्थित जनों के लिए लिखा गया है। चूँकि अनेक भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं, इसलिए अनेक भिन्न-भिन्न वैदिक कर्मकाण्ड हैं। वैदिक साहित्य में ऐसे कर्मकाण्डों और अनुष्ठानों का वर्णन है, जिनमें कालीदेवी के समक्ष किसी बकरे की बलि दी जा सकती है। इसका वर्णन मार्कण्डेय पुराण में है, किन्तु यह पुराण तमोगुण में स्थित जनों के उपदेश हेतु है।\n\nमनुष्य के लिए एक ही बार में अपनी समस्त आसक्तियों का त्याग कर देना अत्यन्त कठिन है। यदि कोई मांसाहार का व्यसनी है और उससे सहसा कह दिया जाए कि उसे मांस नहीं खाना चाहिए, तो वह ऐसा नहीं कर सकता। यदि कोई मद्यपान में आसक्त है और उससे सहसा कह दिया जाए कि मद्य अच्छा नहीं है, तो वह इस परामर्श को स्वीकार नहीं कर सकता। अतः *पुराणों* में हमें कुछ ऐसे उपदेश मिलते हैं, जिनका सार यह है — \"ठीक है, यदि तुम मांस खाना चाहते हो, तो कालीदेवी की पूजा करो और उनके निमित्त एक बकरे की बलि दो। केवल तभी तुम मांस खा सकते हो। तुम बूचड़खाने से मात्र खरीदकर मांस नहीं खा सकते। नहीं, इसमें बलि अथवा संयम अवश्य होना चाहिए।\" कालीदेवी को बकरे की बलि देने के लिए मनुष्य को किसी निश्चित तिथि की व्यवस्था करनी होती है और कुछ निश्चित सामग्री का प्रयोग करना होता है। उस प्रकार की पूजा अमावस्या की रात्रि को ही अनुमत है, अर्थात् मास में एक बार। बकरे की बलि के समय जप करने हेतु कुछ निश्चित मन्त्र भी होते हैं। बकरे से कहा जाता है, \"तेरी जीवन-बलि कालीदेवी के समक्ष दी जा रही है; अतः तू तत्काल मनुष्य-योनि को प्राप्त होगा।\" सामान्यतः मनुष्य-योनि प्राप्त करने के लिए जीव को विकास-क्रम की अनेक योनियों से होकर गुजरना पड़ता है, किन्तु यदि कालीदेवी को किसी बकरे की बलि दी जाए, तो वह तत्काल मनुष्य-योनि को प्राप्त हो जाता है। मन्त्र यह भी कहता है, \"तुझे इस मनुष्य को मारने का अधिकार है, जो तेरी बलि दे रहा है।\" मांस शब्द इंगित करता है कि अपने अगले जन्म में बकरा उस मनुष्य का मांस खाएगा, जो इस समय उसकी बलि दे रहा है। यह बात अपने आप में ही मांसभक्षक को सचेत कर देनी चाहिए। उसे विचार करना चाहिए, \"मैं यह मांस क्यों खा रहा हूँ? मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ? मुझे किसी अन्य जन्म में अपने ही मांस से इसका प्रतिफल चुकाना होगा।\" इस सम्पूर्ण विचार का प्रयोजन मनुष्य को मांसभक्षण से विमुख करना है।\n\nअतः, चूँकि भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं, इसलिए उनके मार्गदर्शन हेतु अठारह *पुराण* हैं। वैदिक साहित्य समस्त मनुष्यों के उद्धार हेतु है, मात्र कुछ थोड़े-से लोगों के नहीं। ऐसा नहीं है कि जो मांसाहारी अथवा मद्यप हैं, वे अस्वीकृत कर दिए जाते हैं। एक चिकित्सक समस्त रोगियों को स्वीकार करता है, और रोग के अनुसार भिन्न-भिन्न औषधियाँ देता है। ऐसा नहीं है कि वह सब रोगों के लिए एक ही औषधि देता हो, अथवा केवल एक ही रोग का उपचार करता हो। नहीं, जो भी उसके पास आता है, उसे वह एक विशिष्ट प्रकार की औषधि देता है, और रोगी का क्रमशः उपचार होता है। तथापि *पद्म पुराण* जैसे सात्त्विक *पुराण* सत्त्वगुण में स्थित जनों के लिए हैं, उन जनों के लिए जो तत्काल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आराधना करने में समर्थ हैं।\n\nब्रह्मसंहिता में कहा गया है, īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ sac-cid-ānanda-vigrahaḥ [Bs. 5.1]: \"परम नियन्ता श्रीकृष्ण हैं, जिनका नित्य, आनन्दमय, आध्यात्मिक शरीर है।\" यही वैदिक उद्घोषणा है, और इस प्रकार हम श्रीकृष्ण को परमेश्वर के रूप में स्वीकार करते हैं। जो रजोगुण और तमोगुण में स्थित हैं, वे ईश्वर के रूप की कल्पना करने का प्रयत्न करते हैं, और जब वे भ्रमित हो जाते हैं, तो कहते हैं, \"ओह, कोई साकार ईश्वर नहीं है। ईश्वर निराकार अथवा शून्य है।\" यह तो मात्र कुण्ठा का परिणाम है। वस्तुतः ईश्वर के अपने रूप है। और क्यों न हो? *वेदान्त-सूत्र* के अनुसार, janmādy asya yataḥ: [SB 1.1.1] \"परम सत्य वही है, जिससे सब कुछ उद्भूत होता है।\" यह देखना सरल है कि हमारे भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर हैं, भिन्न-भिन्न प्रकार के रूप हैं। हमें विचार करना होगा कि ये रूप कहाँ से आ रहे हैं। ये रूप कहाँ से उद्भूत हुए हैं? हमें थोड़ी सामान्य बुद्धि से काम लेना होगा। यदि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है, तो उसके पुत्र व्यक्ति कैसे हो सकते हैं? यदि तुम्हारा पिता मात्र शून्य है, यदि वह कोई व्यक्ति नहीं है, तो तुम व्यक्ति कैसे हो सकते हो? यदि तुम्हारे पिता का कोई रूप नहीं है, तो तुम्हारा रूप कैसे हो सकता है? यह बहुत कठिन नहीं है; यह तो मात्र सामान्य बुद्धि का प्रश्न है। दुर्भाग्यवश, क्योंकि लोग कुण्ठित हैं, वे किसी रूप की कल्पना करने का प्रयत्न करते हैं, अथवा यह निष्कर्ष निकालते हैं कि चूँकि यह भौतिक रूप अस्थायी और कष्टदायक है, इसलिए ईश्वर अवश्य ही निराकार होगा। निःसन्देह, क्योंकि इस भौतिक जगत् के समस्त रूपों को नष्ट होना ही है, इसलिए ईश्वर अनिवार्यतः निराकार होगा।\n\nब्रह्मसंहिता विशेष रूप से कहती है कि यह धारणा एक भूल है। Īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ sac-cid-ānanda-vigrahaḥ [Bs. 5.1]। ईश्वर के रूप है, किन्तु उनका रूप सच्चिदानन्द-विग्रह है। सत् का अर्थ है \"नित्य\", चित् का अर्थ है \"ज्ञान\", और आनन्द का अर्थ है \"सुख\"। ईश्वर के रूप है, किन्तु उनका रूप नित्य है और ज्ञान तथा सुख से परिपूर्ण है। हम उनके रूप की तुलना अपने रूप से नहीं कर सकते। हमारा रूप न तो नित्य है, न सुख से परिपूर्ण, और न ज्ञान से परिपूर्ण; अतः ईश्वर का रूप भिन्न है।\n\nज्योंही हम रूप की बात करते हैं, त्योंही हम सोचते हैं कि रूप तो हमारे ही समान होगा, और इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह नित्य, सर्वज्ञ और सर्वानन्दमय ईश्वर अवश्य ही निराकार होगा। यह ज्ञान नहीं, अपितु अपूर्ण कल्पना का परिणाम है। *पद्म पुराण* के अनुसार, ataḥ śrī-kṛṣṇa-nāmādi na bhaved grāhyam indriyaiḥ: [BRS. 1.2.234] \"मनुष्य अपनी भौतिक इन्द्रियों के द्वारा ईश्वर के रूप, नाम, गुण अथवा सामग्री को नहीं समझ सकता।\" चूँकि हमारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं, इसलिए हम उनके विषय में कल्पना नहीं कर सकते, जो परम पूर्ण हैं। यह सम्भव नहीं है।\n\nतब फिर उन्हें समझना कैसे सम्भव है? Sevonmukhe hi jihvādau। अपनी इन्द्रियों को प्रशिक्षित और शुद्ध करके हम ईश्वर को समझने और देखने की स्थिति में आ सकते हैं। इस समय हम अशुद्ध, अपूर्ण इन्द्रियों के द्वारा ईश्वर को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी मोतियाबिन्द-ग्रस्त व्यक्ति का देखने का प्रयत्न। केवल इसलिए कि किसी को मोतियाबिन्द है, उसे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि देखने योग्य कुछ है ही नहीं। इसी प्रकार, इस समय हम ईश्वर के रूप की कल्पना नहीं कर सकते, किन्तु जब हमारा मोतियाबिन्द दूर हो जाएगा, तब हम देख सकेंगे। ब्रह्मसंहिता के अनुसार, premāñjana-cchurita-bhakti-vilocanena santaḥ sadaiva hṛdayeṣu vilokayanti: [Bs. 5.38] \"जिन भक्तों के नेत्र ईश्वर-प्रेम के अंजन से अनुरंजित हैं, वे चौबीसों घण्टे अपने हृदय के भीतर ईश्वर को देख सकते हैं।\" इन्द्रियों की शुद्धि ही अपेक्षित है; तब हम ईश्वर के नाम, रूप, गुण और लीलाओं को समझ सकते हैं। तब हम ईश्वर को सर्वत्र और प्रत्येक वस्तु में देखने में समर्थ होंगे।\n\nइन विषयों की वैदिक साहित्य में विस्तृत चर्चा हुई है। उदाहरणार्थ, कहा गया है कि यद्यपि ईश्वर के हाथ अथवा पैर नहीं हैं, तथापि हम जो भी अर्पित करें, उसे वे स्वीकार कर सकते हैं (apāṇi-pādo javano gṛhītā)। यह भी कहा गया है कि यद्यपि ईश्वर के न नेत्र हैं और न कर्ण, तथापि वे सब कुछ देख और सुन सकते हैं। ये प्रत्यक्षतः विरोधाभास प्रतीत होते हैं, किन्तु इनका प्रयोजन हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देना है। जब हम देखने की बात करते हैं, तब हम भौतिक दृष्टि की कल्पना करते हैं। अपनी भौतिक धारणा के कारण हम सोचते हैं कि ईश्वर के नेत्र भी हमारे ही समान होंगे। अतः इन भौतिक धारणाओं को दूर करने के लिए वैदिक साहित्य कहता है कि ईश्वर के न हाथ हैं, न पैर, न नेत्र, न कर्ण आदि। ईश्वर के नेत्र हैं, किन्तु उनकी दृष्टि अनन्त है। वे अन्धकार में देख सकते हैं, और एक ही साथ सर्वत्र देख सकते हैं; अतः उनके नेत्र भिन्न हैं। इसी प्रकार, ईश्वर के कर्ण हैं और वे सुन सकते हैं। वे करोड़ों-करोड़ों मील दूर अपने धाम में हो सकते हैं, फिर भी वे हमारी फुसफुसाहट को सुन सकते हैं, क्योंकि वे भीतर ही विराजमान हैं। हम ईश्वर के देखने, सुनने अथवा स्पर्श करने से बच नहीं सकते।\n\npatraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ\n\nyo me bhaktyā prayacchati\n\ntad ahaṁ bhakty-upahṛtam\n\naśnāmi prayatātmanaḥ\n\n\"यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति सहित एक पत्र, एक पुष्प, फल अथवा जल अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार करूँगा।\" (गीता 9.26) यदि ईश्वर के इन्द्रियाँ नहीं हैं, तो वे उन भेंटों को कैसे स्वीकार और भक्षण कर सकते हैं, जो उन्हें अर्पित की जाती हैं? कर्मकाण्ड के अनुसार हम प्रतिदिन श्रीकृष्ण को भोजन अर्पित करते हैं, और हम देख सकते हैं कि इस भोजन का स्वाद तत्काल बदल जाता है। यह एक व्यावहारिक उदाहरण है। ईश्वर भक्षण करते हैं, किन्तु क्योंकि वे पूर्ण हैं, इसलिए वे हमारे समान भक्षण नहीं करते। यदि मैं तुम्हें भोजन की एक थाली दूँ, तो तुम उसे खा जाओगे, और वह समाप्त हो जाएगी। ईश्वर भूखे नहीं हैं, फिर भी वे भक्षण करते हैं, और साथ ही भोजन को ज्यों-का-त्यों रहने देते हैं, और इस प्रकार वह प्रसाद में, उनकी कृपा में, रूपान्तरित हो जाता है। Pūrṇasya pūrṇam ādāya pūrṇam evāvaśiṣyate। ईश्वर पूर्ण हैं, फिर भी जो भी भोजन हम अर्पित करते हैं, उसे वे स्वीकार करते हैं। तथापि भोजन ज्यों-का-त्यों बना रहता है। वे अपने नेत्रों से भक्षण कर सकते हैं। जैसा कि ब्रह्मसंहिता में कहा गया है, aṅgāni yasya sakalendriya-vṛttimanti: \"भगवान् के शरीर की प्रत्येक इन्द्रिय में अन्य समस्त इन्द्रियों की सामर्थ्य है।\" यद्यपि हम अपने नेत्रों से देख सकते हैं, तथापि हम अपने नेत्रों से भक्षण नहीं कर सकते। किन्तु ईश्वर की इन्द्रियाँ, अनन्त होने के कारण, भिन्न हैं। जो भोजन उन्हें अर्पित किया जाता है, उस पर मात्र दृष्टि डालकर ही वे उसका भक्षण कर लेते हैं।\n\nइस समय यह बात समझ में न आए; अतः *पद्म पुराण* कहता है कि जब मनुष्य भगवान् की दिव्य सेवा करते हुए आध्यात्मिक रूप से ओतप्रोत हो जाता है, तब भगवान् के दिव्य नाम, रूप, गुण और लीलाएँ प्रकट होते हैं। हम अपने प्रयत्न से ईश्वर को नहीं समझ सकते, किन्तु कृपापूर्वक ईश्वर स्वयं को हम पर प्रकट करते हैं। यदि रात्रि है, और तुम सूर्य को देखना चाहते हो, तो तुम्हें प्रातःकाल सूर्य के प्रकट होने की प्रतीक्षा करनी होगी। तुम कोई बड़ी मशाल लेकर बाहर जाकर यह नहीं कह सकते, \"आओ, मैं तुम्हें सूर्य का प्रकाश दिखाता हूँ।\" प्रातःकाल, जब सूर्य अपनी ही इच्छा से उदित होता है, तब हम उसे देख सकते हैं। क्योंकि हमारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं, इसलिए हम अपने प्रयत्न से ईश्वर को नहीं देख सकते। हमें अपनी इन्द्रियों को शुद्ध करना होगा और उस समय की प्रतीक्षा करनी होगी, जब ईश्वर प्रसन्न होकर स्वयं को हम पर प्रकट करेंगे। यही प्रक्रिया है। हम ईश्वर को चुनौती नहीं दे सकते। हम यह नहीं कह सकते, \"हे मेरे प्रिय ईश्वर, हे मेरे प्रिय श्रीकृष्ण! कृपया पधारिए। मैं आपके दर्शन करना चाहता हूँ।\" नहीं, ईश्वर हमारे आज्ञापालक आपूर्तिकर्ता नहीं हैं। वे हमारे सेवक नहीं हैं। जब वे प्रसन्न होंगे, तब हम उनके दर्शन करेंगे; अतः यह कृष्णभावनामृत एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं, जिससे वे स्वयं को हम पर प्रकट करें।\n\nक्योंकि लोग ईश्वर को नहीं देख सकते, इसलिए वे सहज ही किसी को भी स्वीकार कर लेते हैं, जो कहता है, \"मैं ही ईश्वर हूँ।\" क्योंकि लोगों के पास ईश्वर की कोई धारणा नहीं है, इसलिए वे किसी भी धूर्त को स्वीकार करने के लिए उत्सुक रहते हैं, जो आकर अपने को ईश्वर घोषित कर देता है। लोगों को यह कहने का शौक है, \"मैं सत्य की खोज में हूँ\"; किन्तु सत्य की खोज करने के लिए हमें यह जानना होगा कि सत्य क्या है। अन्यथा हम उसकी खोज कैसे कर सकते हैं? यदि हम स्वर्ण खरीदना चाहते हैं, तो हमें कम-से-कम सैद्धान्तिक रूप से यह जानना होगा कि स्वर्ण क्या है, अन्यथा हम ठगे जाएँगे। फलतः, सत्य अथवा ईश्वर की कोई धारणा न होने के कारण लोग ऐसे अनेक धूर्तों द्वारा ठगे जा रहे हैं, जो कहते हैं, \"मैं ही ईश्वर हूँ।\" धूर्तों के समाज में एक धूर्त दूसरे धूर्त को ईश्वर मान लेता है, और यह सब धूर्तता का ही परिणाम है। किन्तु इस सबका ईश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं है। मनुष्य को ईश्वर को देखने और समझने के योग्य स्वयं को बनाना होता है, और योग्यता की उस प्रक्रिया को ही कृष्णभावनामृत कहते हैं। Sevonmukhe hi jihvādau svayam eva sphuraty adaḥ: स्वयं को ईश्वर की सेवा में संलग्न करके हम ईश्वर को देखने के योग्य बनते हैं। अन्यथा यह सम्भव नहीं है। हम महान् वैज्ञानिक अथवा विद्वान् हो सकते हैं, किन्तु हमारी सांसारिक विद्वत्ता हमें ईश्वर को देखने में सहायता नहीं करेगी।\n\nयह *भगवद्गीता* कृष्णभावनामृत का विज्ञान है, और श्रीकृष्ण को समझने के लिए हमें इतना सौभाग्यशाली होना चाहिए कि हम किसी ऐसे व्यक्ति की संगति करें, जो शुद्ध कृष्णभावनामृत में स्थित है। हम मात्र एम.ए., पीएच.डी. अथवा अन्य कोई उपाधि अर्जित करके *भगवद्गीता* को नहीं समझ सकते। *भगवद्गीता* एक दिव्य विज्ञान है, और इसे समझने के लिए भिन्न इन्द्रियों की आवश्यकता होती है। हमारी इन्द्रियों को सेवा-अर्पण के द्वारा शुद्ध होना चाहिए, न कि शैक्षणिक उपाधियों के अर्जन के द्वारा। अनेक पीएच.डी. हैं, अनेक विद्वान् हैं, जो श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकते। अतः श्रीकृष्ण भौतिक जगत् में प्रकट होते हैं। यद्यपि वे अजन्मा हैं (ajo 'pi sann avyayātmā), तथापि वे स्वयं को हम पर प्रकट करने के लिए आते हैं।\n\nइस प्रकार श्रीकृष्ण की अनुभूति श्रीकृष्ण की कृपा से अथवा किसी ऐसे कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की कृपा से होती है, जिसने श्रीकृष्ण की कृपा से श्रीकृष्ण का साक्षात्कार किया है। हम उन्हें शैक्षणिक ज्ञान के द्वारा नहीं समझ सकते। हम श्रीकृष्ण को केवल श्रीकृष्ण की कृपा अर्जित करके ही समझ सकते हैं। एक बार उनकी कृपा अर्जित कर लेने पर हम उनके दर्शन कर सकते हैं, उनसे बात कर सकते हैं — जो भी हम चाहें, कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि श्रीकृष्ण कोई शून्य हैं। वे एक व्यक्ति हैं, परम पुरुष हैं, और हम उनके साथ एक सम्बन्ध रख सकते हैं। यही वैदिक आदेश है। Nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām: \"हम सब नित्य व्यक्ति हैं, और ईश्वर परम नित्य व्यक्ति हैं।\" हम सब नित्य हैं, और ईश्वर परम नित्य हैं। इस समय, क्योंकि हम इन शरीरों में बन्दी हैं, इसलिए हम जन्म और मृत्यु का अनुभव कर रहे हैं, किन्तु वस्तुतः हम जन्म और मृत्यु से परे हैं। हम नित्य आत्माएँ हैं, किन्तु अपने कर्म और इच्छाओं के अनुसार हम एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण कर रहे हैं। इसकी व्याख्या *भगवद्गीता* के द्वितीय अध्याय (2.20) में हुई है,\n\nna jāyate mriyate vā kadācin\n\nnāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ\n\najo nityaḥ śāśvato 'yaṁ purāṇo\n\nna hanyate hanyamāne śarīre\n\n\"आत्मा के लिए न कभी जन्म होता है और न मृत्यु। एक बार होकर भी वह कभी समाप्त नहीं होती। वह अजन्मा, नित्य, सदा-विद्यमान, अमर और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारी जाती।\"\n\nजिस प्रकार ईश्वर नित्य हैं, उसी प्रकार हम भी नित्य हैं, और जब हम उस परम, पूर्ण नित्य के साथ अपना नित्य सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं, तब हमें अपनी नित्यता का साक्षात्कार होता है। Nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām। ईश्वर समस्त जीवों में परम जीव हैं, समस्त नित्यों में परम नित्य हैं। कृष्णभावनामृत के द्वारा, इन्द्रियों की शुद्धि के द्वारा, इस ज्ञान का साक्षात्कार होगा, और हम ईश्वर को देखने की स्थिति में आएँगे।\n\nएक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को श्रीकृष्ण की कृपा से साक्षात्कार-युक्त ज्ञान प्राप्त होता है, क्योंकि वह शुद्ध भक्ति से सन्तुष्ट है। साक्षात्कार-युक्त ज्ञान के द्वारा मनुष्य पूर्ण बनता है। दिव्य ज्ञान के द्वारा मनुष्य अपनी मान्यताओं में दृढ़ रह सकता है, किन्तु मात्र शैक्षणिक ज्ञान के द्वारा मनुष्य सहज ही प्रत्यक्ष विरोधाभासों से भ्रमित और मोहित हो सकता है। वही साक्षात्कार-युक्त आत्मा वास्तव में आत्मसंयमी है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत है। वह दिव्य है, क्योंकि उसका सांसारिक विद्वत्ता से कोई सम्बन्ध नहीं है। उसके लिए सांसारिक विद्वत्ता और मानसिक कल्पना, जो अन्यों के लिए स्वर्ण के समान मूल्यवान हो सकती है, कंकड़ या पत्थरों से अधिक मूल्य नहीं रखती।\n\nयदि कोई निरक्षर भी हो, तो वह केवल स्वयं को विनम्र, दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न करके ही ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है। ईश्वर किसी भौतिक स्थिति के अधीन नहीं हैं। वे परम आत्मा हैं, और उनका साक्षात्कार करने की प्रक्रिया भी भौतिक विचारों से परे है। अतः कोई बहुत विद्वान् पण्डित हो सकता है, फिर भी ईश्वर को समझने में असमर्थ रह सकता है। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि क्योंकि वह बहुत निर्धन है, इसलिए वह ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकता; न ही किसी को यह सोचना चाहिए कि वह केवल इसलिए ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है क्योंकि वह बहुत धनी है। ईश्वर को कोई अशिक्षित व्यक्ति समझ सकता है और कोई महान् शिक्षित व्यक्ति उन्हें न समझ सकता है। ईश्वर का बोध, स्वयं ईश्वर के समान, अप्रतिहत (apratihata) है।\n\n*श्रीमद्भागवत* (1.2.6) में कहा गया है,\n\nsa vai puṁsāṁ paro dharmo\n\nyato bhaktir adhokṣaje\n\nahaituky apratihatā\n\nyayātmā suprasīdati\n\n\"समस्त मानवजाति के लिए परम धर्म वही है, जिसके द्वारा मनुष्य उस दिव्य भगवान् के प्रति प्रेममयी भक्ति को प्राप्त कर सकें। ऐसी भक्ति निष्काम और अविच्छिन्न होनी चाहिए, जिससे आत्मा पूर्णतः सन्तुष्ट हो सके।\" ईश्वर-प्रेम का अनुशीलन — यही प्रथम श्रेणी के धर्म की परिभाषा है। जिस प्रकार भौतिक जगत् में तीन गुण अथवा तीन गुणधर्म होते हैं, उसी प्रकार विविध धर्म हैं, जिनमें से प्रत्येक तीन गुणों में से किसी एक में स्थित है। तथापि हमें इन धार्मिक धारणाओं के विश्लेषण से प्रयोजन नहीं है। हमारे लिए धर्म का प्रयोजन ईश्वर को समझना और ईश्वर से प्रेम करना सीखना है। किसी भी प्रथम श्रेणी की धार्मिक पद्धति का यही वास्तविक प्रयोजन है। यदि कोई धर्म ईश्वर-प्रेम नहीं सिखाता, तो वह व्यर्थ है। मनुष्य अपने धार्मिक सिद्धान्तों का अत्यन्त सावधानी से पालन कर सकता है, किन्तु यदि उसके पास ईश्वर-प्रेम नहीं है, तो उसका धर्म निरर्थक और शून्य है। *श्रीमद्भागवत* (1.2.6) के अनुसार वास्तविक धर्म को अहैतुकी और अप्रतिहता होना चाहिए — स्वार्थमयी प्रेरणा से रहित और बाधा से रहित। ऐसे धर्म का अभ्यास करके हम सब प्रकार से सुखी होंगे।\n\nSa vai puṁsāṁ paro dharmo yato bhaktir adhokṣaje। ईश्वर का एक अन्य नाम अधोक्षज है, जिसका अर्थ है \"वह जिसे भौतिक प्रयासों के द्वारा नहीं देखा जा सकता।\" अर्थात्, ईश्वर उन्हें भौतिक रूप से देखने के हमारे समस्त प्रयासों को परास्त कर देते हैं। अक्षज शब्द प्रायोगिक ज्ञान को इंगित करता है, और अधः का अर्थ है \"अगम्य\"। अतः ईश्वर तक प्रायोगिक ज्ञान के द्वारा नहीं पहुँचा जा सकता। हमें उनसे एक भिन्न रीति से सम्पर्क करना सीखना होगा — विनम्र श्रवण और दिव्य प्रेममयी सेवा के अर्पण के द्वारा।\n\nसच्चा धर्म ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम सिखाता है। वह यह नहीं कहता, \"मैं ईश्वर से प्रेम करता हूँ क्योंकि वे मेरी इन्द्रियतृप्ति के लिए मुझे उत्तम वस्तुएँ प्रदान करते हैं।\" वह प्रेम नहीं है। ईश्वर महान् हैं, ईश्वर हमारे नित्य पिता हैं, और उनसे प्रेम करना हमारा कर्तव्य है। इसमें सौदे या विनिमय का प्रश्न ही नहीं उठता। हमें यह नहीं सोचना चाहिए, \"ओह, ईश्वर मुझे मेरी दैनिक रोटी देते हैं; अतः मैं ईश्वर से प्रेम करता हूँ।\" ईश्वर तो बिल्ली और कुत्तों को भी दैनिक रोटी देते हैं। चूँकि वे सबके पिता हैं, इसलिए वे सबको भोजन प्रदान कर रहे हैं। अतः दैनिक रोटी के लिए ईश्वर से प्रेम करना प्रेम नहीं है। प्रेम निर्हेतुक होता है। यदि ईश्वर हमें हमारी दैनिक रोटी न भी दें, तो भी हमें उनसे प्रेम करना चाहिए। यही सच्चा प्रेम है। जैसा कि चैतन्य महाप्रभु ने कहा, āśliṣya vā pāda-ratāṁ pinaṣṭu mām adarśanān marma-hatāṁ karotu vā: \"मैं श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी को अपना प्रभु नहीं जानता, और वे ही मेरे प्रभु बने रहेंगे, चाहे वे आलिंगन में मुझसे रूखा व्यवहार करें अथवा मेरे समक्ष उपस्थित न होकर मेरा हृदय विदीर्ण कर दें। वे जो कुछ भी करने के लिए पूर्णतः स्वतन्त्र हैं, क्योंकि वे सदा ही मेरे आराध्य प्रभु हैं, निरुपाधिक रूप से।\" यही उस मनुष्य की भावना है, जो ईश्वर के शुद्ध प्रेम में स्थित है। जब हम ईश्वर-प्रेम की उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं, तब हमें ज्ञात होगा कि प्रत्येक वस्तु आनन्द से परिपूर्ण है; ईश्वर आनन्द से परिपूर्ण हैं, और हम भी आनन्द से परिपूर्ण हैं।\n\nsuhṛn-mitrāry-udāsīna-\n\nmadhyastha-dveṣya-bandhuṣu\n\nsādhuṣv api ca pāpeṣu\n\nsama-buddhir viśiṣyate\n\n\"जब कोई व्यक्ति सबको — ईमानदार हितैषी, मित्रों और शत्रुओं को, ईर्ष्यालुओं, धर्मात्माओं, पापियों, तथा उदासीन और निष्पक्ष जनों को — समान दृष्टि से देखता है, तब उसे और भी अधिक उन्नत कहा जाता है।\" (गीता 6.9) यह वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति का चिह्न है। इस भौतिक जगत् में हम लोगों को देहात्म-बुद्धि के आधार पर — अर्थात् इन्द्रियतृप्ति के आधार पर — मित्र और शत्रु मानते हैं। यदि कोई हमारी इन्द्रियों को तृप्त करता है, तो वह हमारा मित्र है, और यदि नहीं करता, तो वह हमारा शत्रु है। तथापि, एक बार ईश्वर अथवा परम सत्य का साक्षात्कार कर लेने पर ऐसी कोई भौतिक धारणाएँ नहीं रहतीं।\n\nइस भौतिक जगत् में समस्त बद्धजीव भ्रम के अधीन हैं। एक चिकित्सक समस्त रोगियों का उपचार करता है, और यद्यपि कोई रोगी प्रलाप कर सकता है और चिकित्सक का अपमान कर सकता है, तथापि चिकित्सक उसका उपचार करने से मना नहीं करता। वह फिर भी आवश्यक औषधि देता है। जैसा कि प्रभु ईसा मसीह ने कहा, हमें पाप से घृणा करनी चाहिए, पापी से नहीं। यह एक अत्यन्त सुन्दर कथन है, क्योंकि पापी भ्रम के अधीन है। वह विक्षिप्त है। यदि हम उससे घृणा करें, तो हम उसका उद्धार कैसे कर सकते हैं? अतः जो उन्नत भक्त हैं, जो वास्तव में ईश्वर के सेवक हैं, वे किसी से घृणा नहीं करते। जब प्रभु ईसा मसीह को क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था, तब उन्होंने कहा, \"हे मेरे ईश्वर, इन्हें क्षमा कर दीजिए। ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।\" यही एक उन्नत भक्त की उचित मनोवृत्ति है। वह समझता है कि बद्धजीवों से घृणा नहीं की जा सकती, क्योंकि वे अपनी भौतिकतावादी विचार-पद्धति के कारण विक्षिप्त हो गए हैं। इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में किसी से घृणा करने का प्रश्न ही नहीं उठता। प्रत्येक व्यक्ति का स्वागत है कि वह आए और हरे कृष्ण का कीर्तन करे, कृष्ण-प्रसाद ग्रहण करे, *भगवद्गीता* के दर्शन का श्रवण करे, और भौतिक, बद्ध जीवन को सुधारने का प्रयत्न करे। यही कृष्णभावनामृत का मूल कार्यक्रम है। अतः भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने कहा,\n\nyāre dekha, tāre kaha 'kṛṣṇa'-upadeśa\n\nāmāra ājñāya guru hañā tāra' ei deśa\n\n\"प्रत्येक व्यक्ति को यह उपदेश दो कि वह भगवान् श्रीकृष्ण के उन आदेशों का पालन करे, जो *भगवद्गीता* और *श्रीमद्भागवत* में दिए गए हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक गुरु बनो और इस भूमि में सबका उद्धार करने का प्रयत्न करो।\" (चै.च. मध्य 7.128)\n\nyogi yuñjīta satatam\n\nātmānaṁ rahasi sthitaḥ\n\nekākī yata-cittātmā\n\nnirāśīr aparigrahaḥ\n\n\"योगसाधक को सदा परम आत्मा पर अपने मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करना चाहिए; उसे किसी एकान्त स्थान में अकेले रहना चाहिए और सदा सावधानी से अपने मन को वश में रखना चाहिए। उसे इच्छाओं और स्वामित्व की भावना से मुक्त रहना चाहिए।\" (गीता 6.10)\n\nइस अध्याय में, जिसमें भगवान् योग-पद्धति के सिद्धान्तों की शिक्षा दे रहे हैं, वे यहाँ यह इंगित करते हैं कि योगसाधक को सदा परम आत्मा पर अपने मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करना चाहिए। \"परम आत्मा\" श्रीकृष्ण को, परमेश्वर को, इंगित करता है। जैसा कि पूर्व में समझाया गया है (nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām), ईश्वर परम नित्य हैं, परम जीव हैं, परम आत्मा हैं। सम्पूर्ण योग-पद्धति का प्रयोजन इस परम आत्मा पर मन को एकाग्र करना है। हम परम आत्मा नहीं हैं। यह समझ लेना चाहिए। परम आत्मा ईश्वर हैं। यही द्वैतवाद है — द्वैत। द्वैत का अर्थ है कि ईश्वर मुझसे भिन्न हैं। वे परम हैं, और मैं अधीन हूँ। वे महान् हैं, और मैं लघु हूँ। वे अनन्त हैं, और मैं अणु हूँ। हमारे और ईश्वर के बीच यही सम्बन्ध है, जिसे हमें इसी रूप में समझना चाहिए। क्योंकि हम अणु हैं, इसलिए हमें अपने मन को अनन्त परम आत्मा पर एकाग्र करना चाहिए। ऐसा करने के लिए हमें अकेले रहना चाहिए, और \"अकेले रहने\" का अर्थ है कि हमें उनके साथ नहीं रहना चाहिए, जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं। आदर्श रूप में, इसका अर्थ है कि मनुष्य को किसी एकान्त स्थान में, जैसे किसी वन अथवा जंगल में, रहना चाहिए; किन्तु इस युग में ऐसा एकान्त स्थान मिलना अत्यन्त कठिन है। अतः \"एकान्त स्थान\" उस स्थान को इंगित करता है, जहाँ ईश्वर-भावना की शिक्षा दी जाती है।\n\nयोगसाधक को सावधानीपूर्वक अपने मन को भी वश में रखना चाहिए, और इसका अर्थ है मन को परम आत्मा पर, अथवा श्रीकृष्ण पर, स्थिर करना। जैसा कि पूर्व में समझाया गया है, श्रीकृष्ण ठीक सूर्य के समान हैं, और यदि मन उन पर स्थिर हो जाए, तो अन्धकार का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि श्रीकृष्ण सदा हमारे मन में रहें, तो माया अथवा भ्रम कभी प्रवेश नहीं कर सकता। यही एकाग्रता की प्रक्रिया है।\n\nयोगसाधक को इच्छाओं और स्वामित्व की भावना से भी मुक्त रहना चाहिए। लोग भौतिक रूप से रुग्ण हैं, क्योंकि वे वस्तुओं की इच्छा करते हैं और उन्हें अपने अधिकार में करना चाहते हैं। हम उसकी इच्छा करते हैं, जो हमारे पास नहीं है, और उसके लिए शोक करते हैं, जो हम खो चुके हैं। Brahma-bhūtaḥ prasannātmā [Bg. 18.54]। जो वास्तव में ईश्वर-भावनाभावित है, वह भौतिक सम्पत्ति की इच्छा नहीं करता। उसकी केवल एक ही इच्छा होती है — श्रीकृष्ण की सेवा करने की। इच्छा का त्याग कर देना सम्भव नहीं है, किन्तु अपनी इच्छाओं को शुद्ध कर लेना सम्भव है। जीव का स्वभाव ही है कि उसमें कोई-न-कोई इच्छा रहे, किन्तु बद्ध अवस्था में मनुष्य की इच्छा कलुषित होती है। बद्ध होकर मनुष्य सोचता है, \"मैं भौतिक सम्पत्ति के द्वारा अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना चाहता हूँ।\" शुद्ध इच्छा श्रीकृष्ण के लिए की गई इच्छा है, और यदि हम श्रीकृष्ण की इच्छा करें, तो भौतिक सम्पत्ति की इच्छाएँ स्वतः ही विलीन हो जाएँगी।\n\nśucau deśe pratiṣṭhāpya\n\nsthiram āsanam ātmanaḥ\n\nnāty-ucchritaṁ nāti-nīcaṁ\n\ncailājina-kuśottaram\n\ntatraikāgraṁ manaḥ kṛtvā\n\nyata-cittendriya-kriyaḥ\n\nupaviśyāsane yuñjyād\n\nyogam ātma-viśuddhaye\n\n\"योग का अभ्यास करने के लिए मनुष्य को किसी एकान्त स्थान में जाना चाहिए और भूमि पर कुश घास बिछाकर उसे मृगचर्म तथा एक कोमल वस्त्र से ढक लेना चाहिए। आसन न तो बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा, और किसी पवित्र स्थान में स्थित हो। तदुपरान्त योगी को उस पर अत्यन्त दृढ़ता से बैठना चाहिए और मन तथा इन्द्रियों को वश में करके, हृदय को शुद्ध करके, और मन को एक बिन्दु पर स्थिर करके योग का अभ्यास करना चाहिए।\" (गीता 6.11–12) इन श्लोकों में इस बात पर बल दिया गया है कि मनुष्य को कैसे और कहाँ बैठना चाहिए। संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य पाश्चात्य देशों में अनेक तथाकथित योग-संस्थाएँ हैं, किन्तु वे इन विधानों के अनुसार योग का अभ्यास नहीं करतीं। \"पवित्र स्थान\" तीर्थस्थान को इंगित करता है। भारत में योगी, योगसाधक, अथवा भक्त — सभी घर छोड़कर प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन, हृषीकेश और हरिद्वार जैसे पवित्र स्थानों में निवास करते हैं और एकान्त में योग का अभ्यास करते हैं, जहाँ यमुना और गंगा जैसी पवित्र नदियाँ प्रवाहित होती हैं। तो इस युग में यह कैसे सम्भव है? कितने लोग ऐसा पवित्र स्थान ढूँढ़ने के लिए तत्पर हैं? अपनी जीविका अर्जित करने के लिए मनुष्य को किसी घनी आबादी वाले नगर में रहना पड़ता है। पवित्र स्थान ढूँढ़ने का प्रश्न ही नहीं उठता, किन्तु योग के अभ्यास के लिए यही प्रथम पूर्व-आवश्यकता है।\n\nअतः इस भक्तियोग-पद्धति में मन्दिर को पवित्र स्थान माना जाता है। मन्दिर निर्गुण है — दिव्य। *वेदों* के अनुसार, नगर रजोगुण में है, और वन सत्त्वगुण में है। किन्तु मन्दिर दिव्य है। यदि तुम किसी नगर या कस्बे में रहते हो, तो तुम ऐसे स्थान में रहते हो, जहाँ रजोगुण प्रधान है; और यदि तुम इससे बचना चाहो, तो तुम किसी वन में, सत्त्वगुण के स्थान में, जा सकते हो। किन्तु ईश्वर का मन्दिर रजोगुण और सत्त्वगुण से ऊपर है; अतः श्रीकृष्ण का मन्दिर ही इस युग के लिए एकमात्र एकान्त स्थान है। इस युग में किसी वन में जाकर रहना सम्भव नहीं है; न ही तथाकथित योग-संस्थाओं में योग के अभ्यास का दिखावा करना और साथ ही निरर्थक कार्यों में संलग्न रहना उपयोगी है।\n\nअतः बृहन्नारदीय पुराण में कहा गया है कि कलियुग में, जब लोग सामान्यतः अल्पायु, आध्यात्मिक साक्षात्कार में मन्द, और सदा विविध चिन्ताओं से व्यथित रहते हैं, तब आध्यात्मिक साक्षात्कार का सर्वोत्तम साधन भगवान् के पवित्र नामों का कीर्तन है।\n\nharer nāma harer nāma\n\nharer nāmaiva kevalam\n\nkalau nāsty eva nāsty eva\n\nnāsty eva gatir anyathā\n\n[Adi 17.21]\n\n\"कलह और दम्भ के इस युग में मुक्ति का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है। कोई अन्य मार्ग नहीं है। कोई अन्य मार्ग नहीं है। कोई अन्य मार्ग नहीं है।\"\n\nयही समाधान है, चैतन्य महाप्रभु का परम उपहार। इस युग में अन्य योग-अभ्यास साध्य नहीं हैं, किन्तु यह अभ्यास इतना सरल और सर्वजनीन है कि एक बालक भी इसे अपना सकता है।"}
{"ref": "pop/4", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/4/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "योग में संयम", "purport": "*भगवद्गीता* के इस छठे अध्याय में सांख्य-योग की पद्धति पर बल दिया गया है, जो ध्यानात्मक अष्टांग-योग की पद्धति है। ज्ञान-योग विश्लेषण की उस दार्शनिक प्रक्रिया पर बल देता है, जिसके द्वारा हम यह निर्धारित करते हैं कि ब्रह्म क्या है और ब्रह्म क्या नहीं है। यह प्रक्रिया नेति-नेति प्रक्रिया, अथवा \"यह नहीं, वह नहीं\", के रूप में जानी जाती है। *वेदान्त-सूत्र* के आरम्भ में कहा गया है, janmādy asya yataḥ: [SB 1.1.1] \"परम ब्रह्म, परम सत्य, वही है, जिससे सब कुछ उद्भूत होता है।\" यह एक संकेत है, और इससे हमें उस परम ब्रह्म की प्रकृति को समझने का प्रयत्न करना चाहिए, जिससे सब कुछ उद्भूत हो रहा है। उस परम सत्य की प्रकृति की विस्तृत व्याख्या *श्रीमद्भागवत* में हुई है।\n\n*श्रीमद्भागवत* के प्रथम श्लोक में कहा गया है,\n\noṁ namo bhagavate vāsudevāya\n\njanmādy asya yato 'nvayād itarataś cārtheṣv abhijñaḥ svarāṭ\n\ntene brahma hṛdā ya ādi-kavaye muhyanti yat sūrayaḥ\n\ntejo-vāri-mṛdāṁ yathā vinimayo yatra tri-sargo 'mṛṣā\n\ndhāmnā svena sadā nirasta-kuhakaṁ satyaṁ paraṁ dhīmahi\n\n\"हे मेरे प्रभु, हे वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण, हे सर्वव्यापी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्! मैं आपको अपना सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ। मैं भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम सत्य हैं और प्रकट विश्वों की सृष्टि, पालन और संहार के समस्त कारणों के आदि कारण हैं। वे समस्त प्रकटनों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञाता हैं, और वे स्वतन्त्र हैं, क्योंकि उनसे परे कोई अन्य कारण नहीं है। उन्होंने ही सर्वप्रथम आदि जीव ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान का संचार किया। उन्हीं के द्वारा महान् ऋषि और देवता भी भ्रम में डाल दिए जाते हैं, जिस प्रकार कोई अग्नि में जल अथवा जल पर भूमि के मायावी प्रतिबिम्बों से मोहित हो जाता है। केवल उन्हीं के कारण प्रकृति के तीन गुणों की प्रतिक्रियाओं से अस्थायी रूप से प्रकट भौतिक विश्व वास्तविक प्रतीत होते हैं, यद्यपि वे अवास्तविक हैं। अतः मैं उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, जो उस दिव्य धाम में नित्य विद्यमान हैं, जो भौतिक जगत् के मायावी प्रतिबिम्बों से सदा मुक्त है। मैं उन्हीं का ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम सत्य हैं।\"\n\nइस प्रकार *श्रीमद्भागवत* के प्रारम्भ से ही परम सत्य को चेतन घोषित किया गया है। वे मृत अथवा शून्य नहीं हैं। और उनकी चेतना की प्रकृति क्या है? Anvayād itarataś cārtheṣu: \"वे समस्त प्रकटनों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञाता हैं।\" एक सीमित मात्रा तक प्रत्येक जीव चेतन है, किन्तु हम पूर्णतः चेतन नहीं हैं। मैं दावा कर सकता हूँ, \"यह मेरा सिर है\"; किन्तु यदि कोई मुझसे पूछे, \"क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे सिर पर कितने बाल हैं?\", तो मैं उत्तर देने में असमर्थ रहूँगा। निःसन्देह, इस प्रकार का ज्ञान दिव्य नहीं है, किन्तु *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है कि परम सत्य सब कुछ जानते हैं, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से। मैं जान सकता हूँ कि मैं भोजन कर रहा हूँ, किन्तु मैं भोजन की प्रक्रिया की पेचीदगियों को नहीं जानता — मेरा शरीर ठीक-ठीक कैसे भोजन को आत्मसात् कर रहा है, रक्त कैसे मेरी शिराओं में प्रवाहित हो रहा है, आदि। मैं चेतन हूँ कि मेरा शरीर कार्य कर रहा है, किन्तु मैं नहीं जानता कि ये प्रक्रियाएँ कैसे पूर्ण रूप से और एक ही साथ कार्य कर रही हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मेरा ज्ञान सीमित है।\n\nपरिभाषा के अनुसार, ईश्वर वही हैं, जो सब कुछ जानते हैं। वे जानते हैं कि उनकी सृष्टि के प्रत्येक कोने में क्या हो रहा है; अतः प्रारम्भ से ही *श्रीमद्भागवत* यह व्याख्या करता है कि वह परम सत्य, जिससे सब कुछ उद्भूत हो रहा है, परम चेतन (abhijñaḥ) है। कोई पूछ सकता है, \"यदि परम सत्य इतने शक्तिशाली, बुद्धिमान् और चेतन हैं, तो उन्होंने यह ज्ञान अवश्य ही किसी समान सत्ता से प्राप्त किया होगा।\" किन्तु ऐसा नहीं है। यदि वे अपना ज्ञान किसी अन्य से प्राप्त करते हैं, तो वे ईश्वर नहीं हैं। Svarāṭ। वे स्वतन्त्र हैं, और उनका ज्ञान स्वतः ही विद्यमान है।\n\n*श्रीमद्भागवत* ज्ञान-योग और भक्ति-योग — दोनों पद्धतियों का परम संयोग है, क्योंकि यह उस परम सत्ता की प्रकृति का विस्तार से विश्लेषण करता है, जिससे सब कुछ उद्भूत हो रहा है। ज्ञान-योग की पद्धति के द्वारा मनुष्य परम सत्य की प्रकृति को दार्शनिक रीति से समझने का प्रयत्न करता है। भक्ति-योग की पद्धति में लक्ष्य वही है। तथापि कार्यविधि कुछ भिन्न है। जहाँ ज्ञानी परमेश्वर पर अपने मन को दार्शनिक रूप से एकाग्र करने का प्रयत्न करता है, वहीं भक्त मात्र स्वयं को परमेश्वर की सेवा में संलग्न कर देता है, और भगवान् स्वयं को प्रकट कर देते हैं। ज्ञान की विधि आरोही प्रक्रिया कहलाती है, और भक्ति की विधि अवरोही प्रक्रिया कहलाती है। यदि हम रात्रि के अन्धकार में हैं, तो हम किसी शक्तिशाली राकेट में ऊपर चढ़कर सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकते हैं। किन्तु अवरोही प्रक्रिया के अनुसार, हम मात्र सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं, और तब हम तत्काल समझ जाते हैं।\n\nआरोही प्रक्रिया के द्वारा हम अपने ही प्रयत्न से, आगमन की प्रक्रिया के द्वारा, परम तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। आगमन के द्वारा हम सहस्रों मनुष्यों का अध्ययन करके यह पता लगाने का प्रयत्न कर सकते हैं कि मनुष्य मरणशील है या नहीं, यह देखने का प्रयत्न करते हुए कि वे मरणशील हैं या अमर। निःसन्देह, इसमें बहुत अधिक समय लगेगा। किन्तु यदि मैं किसी श्रेष्ठ अधिकारी से यह तथ्य स्वीकार कर लूँ कि समस्त मनुष्य मरणशील हैं, तो मेरा ज्ञान पूर्ण और तत्काल है। इस प्रकार *श्रीमद्भागवत* (10.14.29) में कहा गया है, \"हे मेरे प्रभु, जिस व्यक्ति को आपसे थोड़ी-सी कृपा प्राप्त हुई है, वह आपको अत्यन्त शीघ्र समझ सकता है। किन्तु जो आरोही प्रक्रिया के द्वारा आपको समझने का प्रयत्न कर रहे हैं, वे करोड़ों वर्षों तक कल्पना करते रह सकते हैं और फिर भी आपको कभी नहीं समझ सकते।\"\n\nमानसिक कल्पना के द्वारा मनुष्य अधिक सम्भावना यही है कि वह मात्र कुण्ठा और भ्रम के बिन्दु तक पहुँचे और यह निष्कर्ष निकाले, \"ओह, ईश्वर शून्य है।\" किन्तु यदि ईश्वर शून्य है, तो उससे इतने सारे अंक कैसे उद्भूत हो रहे हैं? जैसा कि वेदान्त कहता है (janmādy asya yataḥ [SB 1.1.1]), \"सब कुछ परम से उत्पन्न हो रहा है।\" अतः परम शून्य नहीं हो सकता। हमें यह अध्ययन करना होगा कि इतने सारे रूप, इतने सारे अनन्त जीव, परम से कैसे उत्पन्न हो रहे हैं। इसकी व्याख्या *वेदान्त-सूत्र* में भी हुई है, जो परम ज्ञान का अध्ययन है। वेद शब्द का अर्थ है \"ज्ञान\", और अन्त का अर्थ है \"परम\"। परम ज्ञान परमेश्वर का ज्ञान है।\n\nतो श्रीकृष्ण के रूप को समझना कैसे सम्भव है? यदि कहा गया है कि ईश्वर के हमारे समान नेत्र, अंग और इन्द्रियाँ नहीं हैं, तो हम उनकी दिव्य इन्द्रियों को, उनके दिव्य रूप को, कैसे समझें? यह मानसिक कल्पना के द्वारा सम्भव नहीं है। हमें मात्र उनकी सेवा करनी होगी, और तब वे स्वयं को हम पर प्रकट कर देंगे। जैसा कि श्रीकृष्ण स्वयं *भगवद्गीता* के दसवें अध्याय (10.11) में कहते हैं,\n\nteṣām evānukampārtham\n\naham ajñāna-jaṁ tamaḥ\n\nnāśayāmy ātma-bhāva-stho\n\njñāna-dīpena bhāsvatā\n\n\"उन पर करुणा करके, मैं, उनके हृदयों में निवास करते हुए, ज्ञान के देदीप्यमान दीपक से अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को नष्ट कर देता हूँ।\" श्रीकृष्ण हमारे भीतर हैं, और जब हम भक्ति की प्रक्रिया के द्वारा निष्ठापूर्वक उनकी खोज कर रहे होते हैं, तब वे स्वयं को प्रकट कर देंगे।\n\nपुनः, जैसा कि *भगवद्गीता* के अठारहवें अध्याय (18.55) में कहा गया है,\n\nbhaktyā mām abhijānāti\n\nyāvān yaś cāsmi tattvataḥ\n\ntato māṁ tattvato jñātvā\n\nviśate tad-anantaram\n\n\"पूर्ण पुरुषोत्तम को जैसे वे हैं वैसा केवल भक्ति के द्वारा ही समझा जा सकता है। और जब कोई ऐसी भक्ति के द्वारा परमेश्वर की पूर्ण भावना में स्थित हो जाता है, तब वह ईश्वर के धाम में प्रवेश कर सकता है।\" इस प्रकार ईश्वर को भक्तियोग की इस प्रक्रिया के द्वारा समझना होता है, जो śravaṇaṁ kīrtanaṁ viṣṇoḥ [SB 7.5.23] की प्रक्रिया है — विष्णु के विषय में श्रवण और कीर्तन। यही भक्तियोग की प्रक्रिया का आरम्भ है। यदि हम मात्र निष्ठापूर्वक और विनम्रतापूर्वक श्रवण करें, तो हम समझ जाएँगे। श्रीकृष्ण स्वयं को प्रकट कर देंगे। Śravaṇaṁ kīrtanaṁ viṣṇoḥ smaraṇaṁ pāda-sevanam arcanaṁ vandanaṁ dāsyam। भक्तियोग की पद्धति में नौ भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। वन्दनम् के द्वारा हम प्रार्थनाएँ अर्पित करते हैं, और वह भी भक्ति है। श्रवणम् श्रीकृष्ण के विषय में *भगवद्गीता*, *श्रीमद्भागवत* और अन्य शास्त्रों से श्रवण करना है। कीर्तनम् उनकी महिमाओं का कीर्तन करना है, हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करना है। यही भक्तियोग की प्रक्रिया का आरम्भ है। Śravaṇam kīrtanaṁ viṣṇoḥ [SB 7.5.23]। सब कुछ विष्णु है, और ध्यान विष्णु पर है। विष्णु के बिना भक्ति होना सम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण विष्णु के आदि रूप हैं (kṛṣṇas tu bhagavān svayam: \"श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदि रूप हैं\")। यदि हम मात्र इस भक्तियोग की प्रक्रिया का अनुसरण करें, तो हम परम को समझने में समर्थ होंगे, और समस्त सन्देह दूर हो जाएँगे।\n\nअष्टांग-योग की प्रक्रिया का *भगवद्गीता* के छठे अध्याय (6.13–14) में अत्यन्त विशेष रूप से वर्णन किया गया है:\n\nsamaṁ kāya-śiro-grīvam-\n\ndhārayann acalaṁ sthiraḥ\n\nsamprekṣya nāsikāgraṁ svaṁ\n\ndiśaś cānavalokayan\n\npraśāntātmā vigata-bhīr\n\nbrahmacāri-vrate sthitaḥ\n\nmanaḥ saṁyamya mac-citto\n\nyukta āsīta mat-paraḥ\n\n\"मनुष्य को अपने शरीर, ग्रीवा तथा सिर को एक सीधी रेखा में सीधा रखकर नासिका के अग्रभाग पर अविचल दृष्टि टिकानी चाहिए। इस प्रकार, अविचलित, संयमित मन से, भयरहित होकर तथा यौन-जीवन से पूर्णतः मुक्त रहकर, मनुष्य को हृदय के भीतर मेरा ध्यान करना चाहिए और मुझे ही जीवन का परम लक्ष्य बनाना चाहिए।\" योग का अर्थ किसी कक्षा में जाना, कुछ धन देना, व्यायाम में संलग्न होना, और फिर घर लौटकर मद्यपान, धूम्रपान तथा भोग करना नहीं है। ऐसा योग ठगने वालों तथा ठगे जाने वालों के समाजों में प्रचलित है। प्रामाणिक योग-पद्धति को यहाँ परम अधिकारी श्रीकृष्ण ने स्वयं प्रतिपादित किया है। *पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण* से बढ़कर अन्य कौन-सा योगी हो सकता है? सर्वप्रथम मनुष्य को एकाकी किसी पवित्र स्थान में जाना होता है और एक सीधी रेखा में बैठकर, अपने शरीर, ग्रीवा तथा सिर को सीधा रखकर, नासिका के अग्रभाग पर अविचल दृष्टि टिकानी होती है। ऐसा क्यों? यह मन को एकाग्र करने में सहायता की एक विधि है। बस इतना ही। किन्तु योग का वास्तविक प्रयोजन यह है कि मनुष्य सदा इस भाव में रहे कि भगवान् श्रीकृष्ण भीतर विराजमान हैं।\n\nध्यान में बैठकर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाने का एक संकट यह है कि मनुष्य निद्रा में चला जाता है। मैंने अनेक तथाकथित ध्यानी इसी प्रकार बैठे और खर्राटे लेते देखे हैं। ज्यों ही कोई अपने नेत्र बन्द करता है, निद्रा का अनुभव होना स्वाभाविक है; अतः यह अनुशंसित है कि नेत्र अर्ध-मुँदे रहें। इसी कारण कहा जाता है कि मनुष्य को अपनी नासिका के अग्रभाग की ओर देखना चाहिए। इस प्रकार दृष्टि को एकाग्र करके मन को संयमित तथा अविचलित रखना चाहिए। भारत में योगी प्रायः एकान्त में ऐसे ध्यान का अभ्यास करने हेतु किसी जंगल में जाता है। किन्तु जंगल में योगी सोच सकता है, \"कहीं कोई बाघ या सर्प तो नहीं आ रहा? यह शब्द कैसा है?\" इस प्रकार उसका मन विचलित हो सकता है; इसी कारण विशेष रूप से कहा गया है कि योगी को \"भयरहित\" होना चाहिए। योग-आसन के रूप में मृगचर्म की विशेष रूप से अनुशंसा की जाती है, क्योंकि उसमें एक ऐसा रासायनिक गुण होता है जो सर्पों को दूर भगाता है; इस प्रकार योगी सर्पों से विचलित नहीं होगा। चाहे जो भी हो—सर्प, बाघ अथवा सिंह—मनुष्य वस्तुतः तभी निर्भय हो सकता है जब वह कृष्णभावनामृत में स्थित हो। विकृत स्मृति के कारण बद्ध आत्मा स्वभावतः भयभीत रहती है। भय श्रीकृष्ण के साथ अपने नित्य सम्बन्ध को भूल जाने के कारण होता है। *श्रीमद्भागवत* (11.2.37) के अनुसार: bhayaṁ dvitīyābhiniveśataḥ syād īśād apetasya viparyayo 'smṛtiḥ। कृष्णभावनामृत ही निर्भयता का एकमात्र वास्तविक आधार प्रदान करता है; अतः जो कृष्णभावनाभावित नहीं है, उसके लिए योग का पूर्ण अभ्यास सम्भव नहीं है।\n\nयोगी को \"यौन-जीवन से पूर्णतः मुक्त\" भी होना चाहिए। यदि कोई यौन-भोग में लिप्त होता है, तो वह एकाग्र नहीं हो सकता; अतः मन को स्थिर करने हेतु brahmacarya, अर्थात् पूर्ण ब्रह्मचर्य की अनुशंसा की जाती है। ब्रह्मचर्य का पालन करके मनुष्य संकल्प-शक्ति का विकास करता है। ऐसे संकल्प का एक आधुनिक उदाहरण महात्मा गांधी का है, जिन्होंने अहिंसा के माध्यम से शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतिरोध करने का दृढ़ निश्चय किया था। उस समय भारत ब्रिटेन पर आश्रित था, और लोगों के पास कोई शस्त्र नहीं थे। ब्रिटिश लोग अधिक शक्तिशाली होने के कारण, लोग जो भी हिंसक क्रान्तियाँ करने का प्रयास करते, उन्हें सहज ही कुचल देते थे। अतः गांधी ने अहिंसा तथा असहयोग का आश्रय लिया। उन्होंने घोषणा की, \"मैं ब्रिटिश लोगों से युद्ध नहीं करूँगा, और यदि वे हिंसा से भी प्रत्युत्तर दें, तो भी मैं अहिंसक रहूँगा। इस प्रकार संसार हमारे प्रति सहानुभूति प्रकट करेगा।\" ऐसी नीति के लिए अत्यधिक संकल्प-शक्ति अपेक्षित थी, और गांधी का संकल्प अत्यन्त दृढ़ था क्योंकि वे brahmacārī थे। यद्यपि उनके सन्तान तथा पत्नी थीं, उन्होंने छत्तीस वर्ष की आयु में यौन-जीवन का त्याग कर दिया था। यह यौन-त्याग ही था जिसने उन्हें इतना दृढ़ निश्चयी बनाया कि वे अपने देश का नेतृत्व कर सके और ब्रिटिश लोगों को भारत से बाहर कर सके।\n\nइस प्रकार यौन से विरत रहना मनुष्य को अत्यन्त दृढ़ निश्चयी तथा शक्तिशाली बनाता है। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यह एक रहस्य है जिससे लोग अनभिज्ञ हैं। यदि तुम किसी कार्य को दृढ़ संकल्प के साथ करना चाहते हो, तो तुम्हें यौन से विरत रहना होगा। पद्धति चाहे जो भी हो—haṭha-yoga, bhakti-yoga, jñāna-yoga, अथवा कुछ और—यौन-भोग की अनुमति नहीं है। यौन की अनुमति केवल उन गृहस्थों को है जो सुसन्तान उत्पन्न करना और उन्हें कृष्णभावनामृत में पालना चाहते हैं। यौन इन्द्रिय-भोग के लिए अभिप्रेत नहीं है, यद्यपि भोग तो उसमें स्वभावतः विद्यमान है। जब तक उसमें कुछ भोग न हो, मनुष्य सन्तान उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व क्यों ग्रहण करे? यही प्रकृति की देन का रहस्य है, किन्तु हमें इसका अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए। ये जीवन के रहस्य हैं। अनुचित लाभ उठाकर और यौन-जीवन में लिप्त होकर हम केवल अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं। यदि कोई तुमसे कहे कि तुम जितना चाहो उतना यौन-भोग कर सकते हो और साथ ही योगी भी बन सकते हो, तो वह तुम्हें ठग रहा है। यदि कोई तथाकथित गुरु तुमसे किसी mantra के बदले धन देने को कहे और कहे कि तुम सब प्रकार की बकवास में संलग्न होते रह सकते हो, तो वह केवल तुम्हें ठग रहा है। क्योंकि हम कुछ उदात्त चाहते हैं और फिर भी उसे सस्ते में चाहते हैं, इसी कारण हम स्वयं को ठगे जाने की स्थिति में डाल देते हैं। इसका अर्थ है कि वस्तुतः हम स्वयं ठगे जाना चाहते हैं। यदि हम कोई मूल्यवान वस्तु चाहते हैं, तो हमें उसका मूल्य चुकाना होगा। हम किसी आभूषण की दुकान में जाकर मात्र दस सेन्ट में सर्वाधिक मूल्यवान रत्न की माँग करने की अपेक्षा नहीं कर सकते। नहीं, हमें अत्यधिक मूल्य चुकाना होगा। इसी प्रकार, यदि हम योग में सिद्धि चाहते हैं, तो हमें यौन से विरत रहकर उसका मूल्य चुकाना होगा। योग में सिद्धि कोई बालपन का खेल नहीं है, और *भगवद्गीता* हमें शिक्षा देती है कि यदि हम योग को कोई बालपन का खेल बनाने का प्रयास करें, तो हम ठगे जाएँगे। अनेक ठग हमारी प्रतीक्षा में हैं, जो हमारा धन ले लेने, हमें कुछ न देने, और फिर चले जाने की ताक में हैं। किन्तु *भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण के प्रामाणिक कथन के अनुसार, मनुष्य को \"यौन-जीवन से पूर्णतः मुक्त\" होना चाहिए। यौन से मुक्त होकर मनुष्य को \"हृदय के भीतर मेरा ध्यान करना चाहिए और मुझे ही जीवन का परम लक्ष्य बनाना चाहिए।\" यही वास्तविक ध्यान है।\n\nश्रीकृष्ण शून्य पर ध्यान करने की अनुशंसा नहीं करते। वे विशेष रूप से कहते हैं, \"मेरा ध्यान करो।\" viṣṇu-mūrti मनुष्य के हृदय में स्थित है, और उन पर ध्यान करना ही योग का लक्ष्य है। यह sāṅkhya-yoga पद्धति है, जिसका सर्वप्रथम अभ्यास भगवान् के अवतार भगवान् कपिलदेव ने किया था। सीधा बैठकर, नासिका के अग्रभाग पर अविचल दृष्टि टिकाकर, अपने मन को संयमित करके, तथा यौन से विरत रहकर, मनुष्य हृदय के भीतर स्थित viṣṇu-mūrti पर मन को एकाग्र करने में समर्थ हो सकता है। जब हम विष्णु-रूप, अर्थात् viṣṇu-mūrti का उल्लेख करते हैं, तो हम श्रीकृष्ण का ही उल्लेख करते हैं।\n\nइस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में हम साक्षात् श्रीकृष्ण का ध्यान कर रहे हैं। यह व्यावहारिक ध्यान की एक पद्धति है। इस आन्दोलन के सदस्य, चाहे उनका विशिष्ट कार्य कुछ भी हो, अपने मन को श्रीकृष्ण पर एकाग्र कर रहे हैं। कोई उद्यान में कार्य कर रहा हो और भूमि खोद रहा हो, किन्तु वह सोचता है, \"मैं श्रीकृष्ण को अर्पित करने हेतु सुन्दर गुलाब उगा रहा हूँ।\" कोई रसोई में पाक कर रहा हो, किन्तु वह सदा सोचता है, \"मैं श्रीकृष्ण को अर्पित करने हेतु स्वादिष्ट भोजन तैयार कर रहा हूँ।\" इसी प्रकार, मन्दिर में जप तथा नृत्य करना भी श्रीकृष्ण पर ध्यान करने के रूप हैं। इस प्रकार कृष्णभावनामृत के इस संघ के युवक तथा युवतियाँ पूर्ण योगी हैं, क्योंकि वे चौबीसों घण्टे श्रीकृष्ण का ध्यान करते हैं। हम पूर्ण योग-पद्धति की शिक्षा दे रहे हैं, अपनी व्यक्तिगत सनक के अनुसार नहीं, अपितु *भगवद्गीता* के प्रामाण्य के अनुसार। कुछ भी गढ़ा या निर्मित नहीं किया गया है। *भगवद्गीता* के श्लोक सबके देखने हेतु विद्यमान हैं। इस आन्दोलन में bhakti-yogī की क्रियाएँ इस प्रकार ढाली गई हैं कि अभ्यासी सदा श्रीकृष्ण का ही चिन्तन किए बिना नहीं रह सकते। श्रीकृष्ण कहते हैं, \"हृदय के भीतर मेरा ध्यान करो, और मुझे ही जीवन का परम लक्ष्य बनाओ।\" यही पूर्ण योग-पद्धति है, और जो इसका अभ्यास करता है वह स्वयं को कृष्णलोक में स्थानान्तरित होने हेतु तैयार करता है।\n\nyuñjann evaṁ sadātmānaṁ\n\nyogī niyata-mānasa h\n\nśāntiṁ nirvāṇa-paramāṁ\n\nmat-saṁsthām adhigacchati\n\n\"इस प्रकार शरीर, मन तथा कर्मों का नियन्त्रण करते हुए, योग का अभ्यास करने वाला योगी भौतिक अस्तित्व की समाप्ति के द्वारा भगवद्धाम [अथवा श्रीकृष्ण के धाम] को प्राप्त होता है।\" (गीता 6.15)\n\nइस श्लोक में संस्कृत में कहा गया है, śāntiṁ nirvāṇa-paramām; अर्थात्, मनुष्य nirvāṇa-paramām, अर्थात् भौतिक क्रियाओं की समाप्ति के द्वारा शान्ति प्राप्त करता है। Nirvāṇa का अभिप्राय शून्य नहीं, अपितु भौतिकतावादी क्रियाओं का अन्त करना है। जब तक मनुष्य उनका अन्त नहीं करता, तब तक शान्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। जब हिरण्यकशिपु ने अपने पाँच वर्षीय पुत्र प्रह्लाद महाराज से पूछा, \"हे प्रिय पुत्र, अब तक तुमने जो सर्वोत्तम वस्तु सीखी है वह क्या है?\" तो प्रह्लाद ने तुरन्त उत्तर दिया, tat sādhu manye 'sura-varya dehināṁ sadā samudvigna-dhiyām asad-grahāt [SB 7.5.5]: \"हे मेरे पिता, हे असुरों में श्रेष्ठ, भौतिकतावादी लोग सदा चिन्ता से भरे रहते हैं क्योंकि उन्होंने अनित्य वस्तु को वास्तविक मान लिया है।\" asad-grahāt शब्द महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह संकेत करता है कि भौतिकतावादी सदा किसी अनित्य वस्तु को पकड़ने अथवा उसका स्वामित्व पाने हेतु लालायित रहते हैं। इतिहास हमें अनेक उदाहरण देता है। श्री केनेडी एक अत्यन्त धनी व्यक्ति थे जो राष्ट्रपति बनना चाहते थे, और उन्होंने उस उच्च पद को प्राप्त करने में अत्यधिक धन व्यय किया। फिर भी, यद्यपि उनके पास एक उत्तम पत्नी, सन्तान तथा राष्ट्रपति-पद था, सब कुछ एक क्षण में समाप्त हो गया। भौतिक जगत् में लोग सदा किसी अनित्य वस्तु को पकड़ने का प्रयास करते रहते हैं। दुर्भाग्यवश, लोग सचेत नहीं होते और यह नहीं समझते, \"मैं नित्य हूँ। मैं आत्मा हूँ। मैं किसी अनित्य वस्तु के पीछे क्यों लालायित हूँ?\"\n\nहम सदा इस शरीर हेतु सुख-सुविधाएँ जुटाने में व्यस्त रहते हैं, यह विचार किए बिना कि आज, कल, अथवा सौ वर्ष में यह शरीर समाप्त हो जाएगा। जहाँ तक वास्तविक \"मैं\" का सम्बन्ध है, \"मैं आत्मा हूँ। मेरा कोई जन्म नहीं। मेरी कोई मृत्यु नहीं। तब, मेरा उचित कार्य क्या है?\" जब हम भौतिक धरातल पर कार्य करते हैं, तो हम दैहिक कार्यों में संलग्न रहते हैं; अतः प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि लोग चिन्तित रहते हैं क्योंकि उनके सभी कार्य किसी अनित्य वस्तु को पकड़ने तथा उसका स्वामित्व पाने पर लक्षित होते हैं। समस्त जीव—मनुष्य, पशु, पक्षी, अथवा जो भी हों—सदा चिन्ता से भरे रहते हैं, और यही भौतिक रोग है। यदि हम सदा चिन्ता से भरे रहें, तो हम शान्ति कैसे प्राप्त कर सकते हैं? लोग किसी अत्यन्त सुन्दर घर में रहते हैं, किन्तु बाहर वे ऐसे चिह्न लगा देते हैं, \"कुत्ते से सावधान,\" अथवा \"अतिक्रमण निषिद्ध।\" इसका अर्थ है कि यद्यपि वे सुखपूर्वक रह रहे हैं, फिर भी वे चिन्तित रहते हैं कि कोई आकर उन्हें सताएगा। किसी कार्यालय में बैठकर तथा अत्यन्त अच्छा वेतन अर्जित करते हुए भी मनुष्य सदा सोचता रहता है, \"ओह, आशा है कि मैं यह पद न खो दूँ।\" अमेरिकी राष्ट्र अत्यन्त धनी है, किन्तु इसी कारण उसे एक विशाल रक्षा-शक्ति बनाए रखनी पड़ती है। तो फिर चिन्ता से मुक्त कौन है? निष्कर्ष यह है कि यदि हम चिन्ता-रहित शान्ति चाहते हैं, तो हमें कृष्णभावनामृत में आना होगा। इसका कोई विकल्प नहीं है।\n\nशान्ति प्राप्त करने हेतु हमें श्रीकृष्ण का ध्यान करना होगा, और श्रीकृष्ण का ध्यान करके हम शरीर को नियन्त्रित कर सकते हैं। शरीर का जो प्रथम अंग नियन्त्रित करना है वह है जिह्वा, और अगला अंग है जननेन्द्रिय। जब इन्हें नियन्त्रित कर लिया जाता है, तो सब कुछ नियन्त्रित हो जाता है। जिह्वा को जप करके तथा kṛṣṇa-prasāda ग्रहण करके नियन्त्रित किया जाता है। ज्यों ही जिह्वा नियन्त्रित होती है, उदर नियन्त्रित होता है, और तत्पश्चात् जननेन्द्रिय नियन्त्रित होती है। वस्तुतः शरीर तथा मन को नियन्त्रित करना एक अत्यन्त सरल प्रक्रिया है। जब मन श्रीकृष्ण पर स्थिर होता है और उसका कोई अन्य कार्य नहीं रहता, तो वह स्वतः नियन्त्रित हो जाता है। कार्य सदा श्रीकृष्ण के लिए कार्य करने पर केन्द्रित होने चाहिए—बागवानी, टंकण, पाक, सफाई, जो भी हो। शरीर, मन तथा कर्मों को श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न करके मनुष्य परम nirvāṇa को प्राप्त करता है, जो श्रीकृष्ण में स्थित है। सब कुछ श्रीकृष्ण में है; अतः हम कृष्णभावनाभावित कार्यों के बाहर शान्ति नहीं पा सकते।\n\nइस प्रकार योग का परम लक्ष्य स्पष्ट रूप से समझाया गया है। योग किसी प्रकार की भौतिक सुविधा प्राप्त करने हेतु अभिप्रेत नहीं है; यह समस्त भौतिक अस्तित्व की समाप्ति को सम्भव बनाने हेतु है। जब तक हमें कुछ भौतिक सुविधाओं की आवश्यकता रहेगी, तब तक हमें वे मिलती रहेंगी। किन्तु ये सुविधाएँ जीवन की समस्याओं का समाधान नहीं करेंगी। मैंने सम्पूर्ण संसार की यात्रा की है, और मेरा मत है कि अमेरिकी युवक तथा युवतियों के पास सर्वोत्तम भौतिक सुविधाएँ हैं, किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि उन्होंने शान्ति प्राप्त कर ली है? क्या कोई कह सकता है, \"हाँ, मैं पूर्णतः शान्त हूँ\"? यदि ऐसा है, तो अमेरिकी युवजन इतने कुण्ठित तथा भ्रमित क्यों हैं?\n\nजब तक हम किसी भौतिक सुविधा को प्राप्त करने हेतु योग का अभ्यास करते रहेंगे, तब तक शान्ति का प्रश्न ही नहीं उठेगा। योग का अभ्यास केवल श्रीकृष्ण को समझने हेतु करना चाहिए। योग श्रीकृष्ण के साथ हमारे लुप्त सम्बन्ध की पुनः-स्थापना हेतु अभिप्रेत है। सामान्यतः मनुष्य अपना स्वास्थ्य सुधारने, मोटापा घटाने हेतु किसी योग-संस्था में सम्मिलित होता है। धनी राष्ट्रों के लोग अधिक खाते हैं, मोटे हो जाते हैं, और फिर वजन घटाने हेतु तथाकथित योग-प्रशिक्षकों को अत्यधिक मूल्य चुकाते हैं। लोग इन सब कृत्रिम व्यायामों से वजन घटाने का प्रयास करते हैं; वे यह नहीं समझते कि यदि वे केवल सब्जियाँ अथवा फल और अनाज खाएँ, तो वे कभी मोटे नहीं होंगे। लोग इसलिए मोटे होते हैं क्योंकि वे प्रचुर मात्रा में खाते हैं, क्योंकि वे माँस खाते हैं। जो लोग प्रचुर मात्रा में खाते हैं वे मधुमेह, अतिभार, हृदयाघात आदि से पीड़ित होते हैं, और जो अपर्याप्त खाते हैं वे क्षय-रोग से पीड़ित होते हैं। अतः संयम अपेक्षित है, और आहार में संयम का अर्थ है कि हम केवल उतना ही खाएँ जितना शरीर और आत्मा को साथ रखने हेतु आवश्यक हो। यदि हम आवश्यकता से अधिक अथवा कम खाएँगे, तो हम रोगग्रस्त हो जाएँगे। यह सब निम्नलिखित श्लोकों में समझाया गया है:\n\nnāty-aśnatas tu yogo 'sti\n\nna caikāntam anaśnataḥ\n\nna cāti-svapna-śīlasya\n\njāgrato naiva cārjuna\n\n\"हे अर्जुन! जो बहुत अधिक खाता है अथवा बहुत कम खाता है, बहुत अधिक सोता है अथवा पर्याप्त नहीं सोता, उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है।\" (गीता 6.16)\n\nyuktāhāra-vihārasya\n\nyukta-ceṣṭasya karmasu\n\nyukta-svapnāvabodhasya\n\nyogo bhavati duḥkha-hā\n\n\"जो मनुष्य आहार, निद्रा, कर्म तथा मनोरंजन की अपनी आदतों में संयमी है, वह योग-पद्धति का अभ्यास करके समस्त भौतिक दुःखों को शमित कर सकता है।\" (गीता 6.17) ऐसा नहीं है कि हमें स्वयं को भूखा रखना है। शरीर को किसी भी अभ्यास हेतु स्वस्थ रखना चाहिए; अतः आहार अपेक्षित है, और अपने कार्यक्रम के अनुसार हम केवल kṛṣṇa-prasāda ही ग्रहण करते हैं। यदि तुम सुखपूर्वक प्रतिदिन दस पाउण्ड भोजन कर सकते हो, तो उतना करो, किन्तु यदि तुम लोभ अथवा लालच से दस पाउण्ड खाने का प्रयास करोगे, तो तुम कष्ट भोगोगे।\n\nअतः कृष्णभावनामृत के अभ्यास में ये सभी क्रियाएँ विद्यमान हैं, किन्तु वे आध्यात्मीकृत हो जाती हैं। भौतिक अस्तित्व की समाप्ति का अर्थ \"शून्य\" में प्रवेश करना नहीं है, जो केवल एक कल्पना मात्र है। भगवान् की सृष्टि के भीतर कहीं भी शून्य नहीं है। मैं शून्य नहीं, अपितु आत्मा हूँ। यदि मैं शून्य होता, तो मेरे शरीर का विकास कैसे होता? यह \"शून्य\" कहाँ है? यदि हम भूमि में कोई बीज बोते हैं, तो वह एक पौधे अथवा विशाल वृक्ष के रूप में विकसित होता है। पिता माता के गर्भ में एक बीज प्रविष्ट करता है, और शरीर वृक्ष की भाँति विकसित होता है। शून्य कहाँ है? *भगवद्गीता* के चौदहवें अध्याय (14.4) में श्रीकृष्ण कहते हैं,\n\nsarva-yoniṣu kaunteya\n\nmūrtayaḥ sambhavanti yāḥ\n\ntāsāṁ brahma mahad yonir\n\nahaṁ bīja-pradaḥ pitā\n\n\"हे कुन्तीपुत्र! यह समझना चाहिए कि जीवन की समस्त योनियाँ इस भौतिक प्रकृति में जन्म के द्वारा सम्भव होती हैं, और मैं ही बीज-प्रदाता पिता हूँ।\" बीज मूलतः श्रीकृष्ण द्वारा दिया जाता है, भौतिक प्रकृति के गर्भ में स्थापित किया जाता है, और इस प्रकार अनेक जीव उत्पन्न होते हैं। इस प्रक्रिया के विरुद्ध कोई कैसे तर्क कर सकता है? यदि अस्तित्व का बीज शून्य है, तो यह शरीर कैसे विकसित हुआ है?\n\nNirvāṇa का वास्तविक अर्थ है दूसरा भौतिक शरीर स्वीकार न करना। ऐसा नहीं है कि हम इस शरीर को शून्य बनाने का प्रयास करें। Nirvāṇa का अर्थ है इस दुःखमय, भौतिक, बद्ध शरीर को शून्य बनाना—अर्थात्, भौतिक शरीर को आध्यात्मिक शरीर में परिवर्तित करना। इसका अर्थ है भगवद्धाम में प्रवेश करना, जिसका वर्णन *भगवद्गीता* के पन्द्रहवें अध्याय (15.6) में किया गया है:\n\nna tad bhāsayate sūryo\n\nsa śaśāṅko na pāvakaḥ\n\nyad gatvā na nivartante\n\ntad dhāma paramaṁ mama\n\n\"मेरा वह धाम न तो सूर्य द्वारा प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा द्वारा, और न ही विद्युत् द्वारा। जो उस तक पहुँचता है वह कभी इस भौतिक जगत् में नहीं लौटता।\"\n\nअतः भगवान् की सृष्टि के भीतर कहीं भी शून्य नहीं है। आध्यात्मिक आकाश के समस्त लोक सूर्य की भाँति स्वयं-प्रकाशित हैं। भगवद्धाम सर्वत्र है, किन्तु आध्यात्मिक आकाश तथा उसके लोक सभी paraṁ dhāma, अर्थात् श्रेष्ठ धाम हैं। जैसा कि कहा गया, paraṁ-dhāma में सूर्य-प्रकाश, चन्द्र-प्रकाश अथवा विद्युत् अपेक्षित नहीं है। ऐसा धाम हम इस ब्रह्माण्ड के भीतर नहीं पा सकते। हम अपने अन्तरिक्ष-यानों में यथासम्भव दूर तक यात्रा करें, फिर भी हमें ऐसा कोई स्थान नहीं मिलेगा जहाँ सूर्य-प्रकाश न हो। सूर्य-प्रकाश इतना विस्तृत है कि वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। अतः वह धाम जहाँ सूर्य-प्रकाश, चन्द्र-प्रकाश अथवा विद्युत् नहीं है, इस भौतिक आकाश से परे है। इस भौतिक प्रकृति से परे एक आध्यात्मिक प्रकृति है। वस्तुतः हम इस भौतिक प्रकृति के विषय में भी कुछ नहीं जानते; हम यह भी नहीं जानते कि यह मूलतः कैसे बनी। तो फिर हम उससे परे की आध्यात्मिक प्रकृति के विषय में कुछ कैसे जान सकते हैं? हमें श्रीकृष्ण से सीखना होगा, जो वहाँ निवास करते हैं; अन्यथा हम अज्ञान में ही रहते हैं।\n\nइस *भगवद्गीता* में आध्यात्मिक आकाश की जानकारी दी गई है। जिस तक हम पहुँच ही नहीं सकते, उसके विषय में हम कुछ कैसे जान सकते हैं? हमारी इन्द्रियाँ इतनी अपूर्ण हैं, हम ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकते हैं? हमें केवल सुनना तथा स्वीकार करना होता है। हम कभी कैसे जान पाएँगे कि हमारे पिता कौन हैं, जब तक हम अपनी माता के वचन को स्वीकार न करें? हमारी माता कहती है, \"यह तुम्हारे पिता हैं,\" और हमें इसे स्वीकार करना होता है। हम इधर-उधर पूछताछ करके अथवा प्रयोग करने का प्रयास करके अपने पिता का निर्धारण नहीं कर सकते। यह ज्ञान हमारी सामर्थ्य से परे है। इसी प्रकार, यदि हम आध्यात्मिक आकाश, भगवद्धाम के विषय में सीखना चाहते हैं, तो हमें अधिकारी, माता *वेद* से सुनना होगा। *वेद* को veda-mātā, अर्थात् माता *वेद* कहा जाता है, क्योंकि उसमें प्रदत्त ज्ञान वैसा ही है जैसा ज्ञान माता से प्राप्त होता है। ज्ञान प्राप्त करने हेतु हमें विश्वास करना होता है। अपनी अपूर्ण इन्द्रियों से प्रयोग करके इस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने की कोई सम्भावना नहीं है।\n\nएक पूर्ण योगी, जो भगवान् श्रीकृष्ण को समझने में सिद्ध है, जैसा कि यहाँ स्वयं भगवान् ने स्पष्ट रूप से कहा है (śāntiṁ nirvāṇa-paramāṁ mat-saṁsthām adhigacchati), वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है और अन्ततः भगवान् के परम धाम को पहुँच सकता है। इस धाम को कृष्णलोक, अथवा गोलोक वृन्दावन कहा जाता है। Brahma-saṁhitā में स्पष्ट रूप से कहा गया है (goloka eva nivasaty akhilātma-bhūtaḥ [Bs. 5.37]) कि भगवान्, यद्यपि सदा अपने गोलोक नामक धाम में निवास करते हैं, फिर भी अपनी श्रेष्ठ आध्यात्मिक ऊर्जाओं के बल पर वे सर्वव्यापी ब्रह्म तथा स्थानिक परमात्मा भी हैं। श्रीकृष्ण तथा उनके पूर्ण विस्तार विष्णु को भली-भाँति समझे बिना कोई भी आध्यात्मिक आकाश को नहीं पहुँच सकता अथवा भगवान् के नित्य धाम (वैकुण्ठ, गोलोक वृन्दावन) में प्रवेश नहीं कर सकता। और Brahma-saṁhitā के अनुसार, हमें अपनी अधिकृत माता, veda-mātā से सीखना आवश्यक है। Brahma-saṁhitā कहती है कि परमेश्वर केवल अपने धाम, गोलोक वृन्दावन में ही नहीं, अपितु सर्वत्र निवास करते हैं: goloka eva nivasaty akhilātma-bhūtaḥ [Bs. 5.37]। वे सूर्य के समान हैं, जो लाखों मील दूर होते हुए भी इस कक्ष के भीतर विद्यमान है।\n\nनिष्कर्षतः, जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कार्य करता है वही पूर्ण योगी है, क्योंकि उसका मन सदा श्रीकृष्ण की क्रियाओं में लीन रहता है। Sa vai manaḥ kṛṣṇa-padāravindayoḥ। *वेद* में हम यह भी सीखते हैं, tam eva viditvāti mṛtyum eti: \"मनुष्य केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझकर ही जन्म-मृत्यु के मार्ग को पार कर सकता है।\" इस प्रकार योग की सिद्धि भौतिक अस्तित्व से मुक्ति की प्राप्ति है, न कि भोले-भाले लोगों को मूर्ख बनाने हेतु कोई जादुई बाजीगरी अथवा व्यायाम का करतब।\n\nइस योग-पद्धति में संयम अपेक्षित है; अतः कहा गया है कि हमें न तो बहुत अधिक खाना चाहिए, न बहुत कम, न बहुत अधिक सोना चाहिए, न बहुत कम, और न बहुत अधिक कार्य करना चाहिए, न बहुत कम। ये सभी क्रियाएँ इसलिए विद्यमान हैं क्योंकि हमें इस भौतिक शरीर के साथ योग-पद्धति को सम्पन्न करना होता है। दूसरे शब्दों में, हमें एक बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करना होता है। भौतिक शरीर इस अर्थ में एक बुरा सौदा है कि यह समस्त दुःखों का स्रोत है। आत्मा दुःख का अनुभव नहीं करती, और जीव की सामान्य अवस्था उसका स्वस्थ, आध्यात्मिक जीवन है। दुःख तथा रोग भौतिक संदूषण, रोग, संक्रमण के कारण होते हैं। तो एक अर्थ में, भौतिक अस्तित्व आत्मा की एक रुग्ण अवस्था है। और वह रोग क्या है? इसका उत्तर कोई महान् रहस्य नहीं है। रोग यही शरीर है। यह शरीर वस्तुतः मेरे लिए अभिप्रेत नहीं है। यह \"मेरा\" शरीर हो सकता है, किन्तु यह मेरी रुग्ण अवस्था का एक लक्षण है। चाहे जो हो, मुझे इस शरीर के साथ अपना तादात्म्य उससे अधिक नहीं करना चाहिए जितना मुझे अपने वस्त्रों के साथ करना चाहिए। इस संसार में हम सभी भिन्न-भिन्न वस्त्र पहने हुए हैं। हम लाल मनुष्य, भूरे मनुष्य, श्वेत मनुष्य, काले मनुष्य, पीले मनुष्य आदि के रूप में, अथवा भारतीय, अमेरिकी, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि के रूप में वस्त्र पहने हुए हैं। ये सभी उपाधियाँ हमारी वास्तविक स्थिति की नहीं, अपितु हमारी रुग्ण अवस्था की द्योतक हैं। योग-पद्धति इस रोग को परमेश्वर के साथ हमें पुनः जोड़कर ठीक करने हेतु अभिप्रेत है।\n\nहम परमेश्वर के साथ जुड़े रहने हेतु अभिप्रेत हैं, ठीक जैसे हमारा हाथ हमारे शरीर से जुड़े रहने हेतु अभिप्रेत है। हम परमेश्वर के अंश हैं, ठीक जैसे हाथ शरीर का अंश है। जब हाथ शरीर से कट जाता है, तो वह मूल्यहीन हो जाता है, किन्तु जब वह शरीर से जुड़ा होता है, तो वह अमूल्य होता है। इसी प्रकार, इस भौतिक अवस्था में हम भगवान् से विच्छिन्न हैं। वस्तुतः, विच्छिन्न शब्द ठीक नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध तो सदा बना रहता है। भगवान् सदा हमारी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण के बिना कुछ भी विद्यमान नहीं रह सकता, अतः हम उनसे विच्छिन्न नहीं हो सकते। अपितु यह कहना अधिक उचित है कि हम भूल गए हैं कि हम श्रीकृष्ण से जुड़े हुए हैं। इसी विस्मृति के कारण हम ब्रह्माण्ड के दण्ड-विभाग में प्रविष्ट हुए हैं। सरकार अब भी अपने अपराधियों की देखभाल करती है, किन्तु वे नागरिक राज्य से वैधानिक रूप से विच्छिन्न रहते हैं। हमारा विच्छेद अपनी इन्द्रियों को अपने कृष्णभावनाभावित कर्तव्यों के निर्वाह में लगाने के स्थान पर इतने सारे निरर्थक कार्यों में संलग्न होने का परिणाम है।\n\nयह सोचने के स्थान पर कि \"मैं भगवान्, अथवा श्रीकृष्ण का नित्य सेवक हूँ,\" हम सोचते हैं, \"मैं अपने समाज, अपने देश, अपने पति, अपनी पत्नी, अपने कुत्ते, अथवा जो भी हो, उसका सेवक हूँ।\" इसे ही विस्मृति कहते हैं। यह कैसे हुआ? ये सभी मिथ्या धारणाएँ इस शरीर के कारण उत्पन्न हुई हैं। क्योंकि मैं अमेरिका में जन्मा, इसलिए मैं सोचता हूँ कि मैं अमेरिकी हूँ। प्रत्येक समाज अपने नागरिकों को इसी प्रकार सोचना सिखाता है। क्योंकि मैं सोचता हूँ कि मैं अमेरिकी हूँ, अतः अमेरिकी सरकार मुझसे कह सकती है, \"आओ और लड़ो। अपने देश के लिए अपना जीवन दे दो।\" यह सब दैहिक धारणा के कारण है; अतः बुद्धिमान व्यक्ति को यह जानना चाहिए कि वह अपने शरीर के कारण दुःख भोग रहा है और उसे इस प्रकार कार्य नहीं करना चाहिए कि वह जन्म-जन्मान्तर भौतिक शरीर में बन्दी बना रहे। *पद्म पुराण* के अनुसार, जीवन की चौरासी लाख योनियाँ हैं, और सभी संदूषण के विभिन्न रूप मात्र हैं—चाहे किसी का अमेरिकी शरीर हो, भारतीय शरीर हो, कुत्ते का शरीर हो, सूअर का शरीर हो, अथवा जो भी हो। अतः योग की प्रथम शिक्षा यह है, \"मैं यह शरीर नहीं हूँ।\"\n\nभौतिक शरीर के संदूषण से मुक्ति प्राप्त करना *भगवद्गीता* की प्रथम शिक्षा है। दूसरे अध्याय में, अर्जुन के श्रीकृष्ण से यह कहने पर कि \"मैं युद्ध नहीं करूँगा,\" भगवान् ने कहा, \"विद्वत्तापूर्ण वचन बोलते हुए भी तुम उसके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं है। जो बुद्धिमान हैं, वे न तो जीवित के लिए शोक करते हैं और न मृत के लिए।\" (गीता 2.11) दूसरे शब्दों में, अर्जुन दैहिक धरातल पर सोच रहे थे। वे युद्धभूमि छोड़ना चाहते थे क्योंकि वे अपने सम्बन्धियों से युद्ध नहीं करना चाहते थे। उनकी समस्त धारणाएँ दैहिक परिवेश के भीतर थीं; अतः अर्जुन के श्रीकृष्ण को अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार करने के पश्चात्, भगवान् ने तुरन्त उन्हें फटकारा, ठीक जैसे एक गुरु अपने शिष्य को शिक्षा देने हेतु फटकारता है। सारतः, श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, \"तुम बहुत बुद्धिमत्तापूर्वक बोल रहे हो, मानो तुम इतनी सारी बातें जानते हो, किन्तु वस्तुतः तुम बकवास कर रहे हो, क्योंकि तुम दैहिक स्थिति से बोल रहे हो।\" इसी प्रकार, सम्पूर्ण संसार के लोग स्वयं को शिक्षा, विज्ञान, दर्शन, राजनीति आदि में अत्यन्त उन्नत के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, किन्तु उनकी स्थिति दैहिक धरातल पर है।\n\nएक गिद्ध आकाश में अत्यन्त ऊँचा—सात या आठ मील तक—उठ सकता है, और उसे इस प्रकार उड़ते देखना अद्भुत है। उसके नेत्र भी प्रबल होते हैं, क्योंकि वह बहुत दूर से ही किसी शव को देख लेता है। फिर भी इन समस्त महान् योग्यताओं का लक्ष्य क्या है? एक मृत शरीर, एक सड़ता हुआ शव। उसकी सिद्धि बस इतनी है कि माँस का एक मृत टुकड़ा खोज ले और उसे खा ले। बस इतना ही। इसी प्रकार, हमारे पास अत्यन्त उच्च शिक्षा हो सकती है, किन्तु हमारा उद्देश्य क्या है? इन्द्रिय-भोग, इस भौतिक शरीर का भोग। हम अपने अन्तरिक्ष-यानों के साथ अत्यन्त ऊँचे उठ सकते हैं, किन्तु प्रयोजन क्या है? इन्द्रियतृप्ति, बस इतना ही। इसका अर्थ है कि यह समस्त प्रयास तथा यह समस्त उच्च शिक्षा मात्र पाशविक धरातल पर है।\n\nअतः हमें सर्वप्रथम यह जानना चाहिए कि हमारी दुःखमय भौतिक अवस्था इस शरीर के कारण है। साथ ही, हमें यह जानना चाहिए कि यह शरीर नित्य नहीं है। यद्यपि मैं अपने शरीर, परिवार, समाज, देश तथा अन्य अनेक वस्तुओं के साथ तादात्म्य करता हूँ, ये वस्तुएँ कब तक रहेंगी? वे नित्य नहीं हैं। Asat एक शब्द है जिसका अर्थ है कि वे विद्यमान रहना बन्द कर देंगी। Asann api kleśada āsa dehaḥ: [SB 5.5.4] \"यह शरीर केवल कष्टकारी तथा अनित्य है।\"\n\nअनेक लोग हमारे पास आकर कहते हैं, \"स्वामीजी, मेरी स्थिति बड़ी कष्टकारी है,\" किन्तु ज्यों ही हम औषधि सुझाते हैं, वे उसे स्वीकार नहीं करेंगे। इसका अर्थ है कि लोग अपनी ही औषधि गढ़ना चाहते हैं। यदि हम स्वयं का उपचार करना चाहते हैं, तो हम चिकित्सक के पास क्यों जाते हैं? लोग केवल उसे ही स्वीकार करना चाहते हैं जिसे वे रुचिकर समझते हैं।\n\nयद्यपि हम यह सुझा रहे हैं कि यह शरीर व्यर्थ है और संदूषण का एक रूप है, हम यह अनुशंसा नहीं कर रहे कि इसके साथ दुर्व्यवहार किया जाए। हम कार्य पर ले जाने हेतु किसी कार का प्रयोग कर सकते हैं, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हमें कार की देखभाल नहीं करनी चाहिए। हमें कार की देखभाल करनी चाहिए ताकि वह हमें इधर-उधर ले जाती रहे, किन्तु हमें उसके प्रति इतना आसक्त नहीं हो जाना चाहिए कि हम उसे प्रतिदिन चमकाते रहें। हमें इस भौतिक शरीर का उपयोग कृष्णभावनामृत को सम्पन्न करने हेतु करना चाहिए, और इस प्रयोजन हेतु हमें इसे स्वस्थ तथा सुदृढ़ रखना चाहिए, किन्तु हमें इसके प्रति अत्यधिक आसक्त नहीं हो जाना चाहिए। इसे ही yukta-vairāgya कहते हैं। शरीर की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मन तथा शरीर को स्वस्थ रखने हेतु हमें नियमित स्नान करना चाहिए, नियमित आहार लेना चाहिए, नियमित निद्रा लेनी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि शरीर का त्याग कर देना चाहिए और हमें कुछ नशीली दवाएँ लेकर स्वयं को मादकता में छोड़ देना चाहिए, किन्तु यह कोई योग-प्रक्रिया नहीं है। श्रीकृष्ण ने हमें उत्तम भोजन दिया है—फल, अनाज, सब्जियाँ तथा दुग्ध—और हम सैकड़ों-हज़ारों उत्तम व्यंजन तैयार करके उन्हें भगवान् को अर्पित कर सकते हैं। हमारी प्रक्रिया यही है कि हम kṛṣṇa-prasāda ग्रहण करें और इस प्रकार जिह्वा को सन्तुष्ट करें। किन्तु हमें लोभी नहीं होना चाहिए और दर्जनों समोसे, मिष्टान्न तथा रसगुल्ले नहीं खाने चाहिए। नहीं। हमें शरीर को सुदृढ़ रखने हेतु केवल उतना ही खाना और सोना चाहिए, उससे अधिक नहीं। कहा गया है,\n\nyuktāhāra-vihārasya\n\nyukta-ceṣṭasya karmasu\n\nyukta-svapnāvabodhasya\n\nyogo bhavati duḥkha-hā\n\n\"जो मनुष्य आहार, निद्रा, कर्म तथा मनोरंजन की अपनी आदतों में संयमी है, वह योग-पद्धति का अभ्यास करके समस्त भौतिक दुःखों को शमित कर सकता है।\" (गीता 6.17)\n\nयद्यपि हमें अपने आहार तथा निद्रा को न्यूनतम करना चाहिए, किन्तु हमें रोगग्रस्त होने का जोखिम उठाकर इसे बहुत तीव्रता से करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। चूँकि लोग प्रचुर मात्रा में खाने के अभ्यस्त हैं, अतः उपवास के विधान हैं। हम अपनी निद्रा तथा आहार को घटा सकते हैं, किन्तु हमें आध्यात्मिक प्रयोजनों हेतु उत्तम स्वास्थ्य में बने रहना चाहिए। हमें आहार तथा निद्रा को बहुत तीव्रता से अथवा कृत्रिम रूप से घटाने का प्रयास नहीं करना चाहिए; जब हम उन्नति करते हैं तो इन स्वाभाविक दैहिक प्रक्रियाओं की कमी से हमें स्वभावतः कोई कष्ट नहीं होता। इस विषय में रघुनाथ दास गोस्वामी एक उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यद्यपि वे एक अत्यन्त धनी व्यक्ति के पुत्र थे, रघुनाथ दास भगवान् चैतन्य महाप्रभु के साथ सम्मिलित होने हेतु अपना घर छोड़कर चले गए। चूँकि वे एकमात्र पुत्र थे, अतः रघुनाथ दास अपने पिता को अत्यन्त प्रिय थे। यह समझकर कि उनका पुत्र भगवान् चैतन्य के साथ सम्मिलित होने हेतु जगन्नाथ पुरी चला गया है, पिता ने उनकी सेवा हेतु धन के साथ चार सेवक भेजे। आरम्भ में रघुनाथ ने यह सोचकर धन स्वीकार कर लिया, \"ओह, चूँकि मेरे पिता ने यह सब धन भेजा है, मैं इसे स्वीकार कर लूँगा और समस्त sannyāsī को भोज पर आमन्त्रित करूँगा।\"\n\nकिन्तु कुछ समय पश्चात् भोज समाप्त हो गए। तब भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अपने सचिव स्वरूप दामोदर से पूछा, \"आजकल मुझे रघुनाथ से कोई आमन्त्रण नहीं मिलता। क्या हुआ है?\"\n\n\"वह इसलिए कि रघुनाथ ने अपने पिता का धन स्वीकार करना बन्द कर दिया है।\"\n\nचैतन्य महाप्रभु ने कहा, \"ओह, यह तो बहुत उत्तम है।\"\n\n\"रघुनाथ सोच रहे थे, 'यद्यपि मैंने सब कुछ त्याग दिया है, फिर भी मैं अपने पिता के धन का भोग कर रहा हूँ। यह तो पाखण्ड है।' अतः उन्होंने सेवकों को घर लौट जाने को कह दिया है और धन अस्वीकार कर दिया है।\"\n\nचैतन्य महाप्रभु ने पूछा, \"तो फिर वह कैसे रह रहा है?\"\n\n\"ओह, वह जगन्नाथ मन्दिर की सीढ़ियों पर खड़ा रहता है, और जब पुजारी अपने घर लौटते समय उसके पास से निकलते हैं, तो वे उसे कुछ prasāda दे देते हैं। इस प्रकार वह सन्तुष्ट रहता है।\"\n\nचैतन्य महाप्रभु ने टिप्पणी की, \"यह तो बहुत उत्तम है।\"\n\nनियमित रूप से जगन्नाथ मन्दिर जाते हुए भगवान् चैतन्य महाप्रभु रघुनाथ को सीढ़ियों पर खड़ा देखा करते थे। किन्तु कुछ दिनों पश्चात् उन्होंने उसे वहाँ और नहीं देखा। अतः भगवान् ने अपने सचिव से टिप्पणी की, \"अब मुझे रघुनाथ मन्दिर की सीढ़ियों पर खड़ा दिखाई नहीं देता।\"\n\nस्वरूप दामोदर ने समझाया, \"उसने वह भी छोड़ दिया है। वह सोच रहा था, 'ओह, मैं यहाँ किसी वेश्या की भाँति खड़ा हूँ, इस प्रतीक्षा में कि कोई आकर मुझे भोजन दे। नहीं। मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता।' \"\n\nचैतन्य महाप्रभु ने कहा, \"यह तो बहुत उत्तम है, किन्तु वह भोजन कैसे कर रहा है?\"\n\n\"वह प्रतिदिन रसोई से कुछ त्यक्त भात एकत्र कर रहा है और उसे ही खा रहा है।\"\n\nरघुनाथ को प्रोत्साहित करने हेतु, चैतन्य महाप्रभु एक दिन उसके पास गए। भगवान् ने कहा, \"रघुनाथ, मैं सुनता हूँ कि तुम अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन कर रहे हो। तुम मुझे आमन्त्रित क्यों नहीं करते?\"\n\nरघुनाथ ने कोई उत्तर नहीं दिया, किन्तु भगवान् ने शीघ्र ही वह स्थान खोज लिया जहाँ वह भात रखता था, और भगवान् ने तुरन्त उसमें से कुछ लिया और उसे खाने लगे।\n\nरघुनाथ ने विनती की, \"हे प्रिय प्रभु, कृपया इसे न खाएँ। यह आपके योग्य नहीं है।\"\n\n\"ओह, नहीं? तुम क्यों कहते हो कि यह मेरे योग्य नहीं है? यह तो भगवान् जगन्नाथ का prasāda है!\"\n\nभगवान् चैतन्य महाप्रभु ने यह लीला केवल इसलिए की ताकि रघुनाथ को यह सोचने से रोका जा सके, \"मैं यह दुःखमय, त्यक्त भात खा रहा हूँ।\" भगवान् के प्रोत्साहन से रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपने भोजन की दैनिक मात्रा को तब तक घटाया जब तक वे अन्ततः एक दिन छोड़कर केवल एक डली मक्खन ही खाने लगे। और प्रतिदिन वे सैकड़ों बार दण्डवत् प्रणाम भी करते थे और निरन्तर पवित्र नामों का जप करते थे। Saṅkhyā-pūrvaka-nāma-gāna-natibhiḥ kālāvasānī-kṛtau।\n\nयद्यपि यह समस्त भौतिक आवश्यकताओं को न्यूनतम करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, हमें इसका अनुकरण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। एक साधारण मनुष्य के लिए रघुनाथ दास गोस्वामी का अनुकरण करना सम्भव नहीं है, जो छह गोस्वामियों में से एक थे, स्वयं भगवान् चैतन्य महाप्रभु के एक अत्यन्त उन्नत पार्षद। छह गोस्वामियों में से प्रत्येक ने इसका एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया कि मनुष्य कृष्णभावनामृत में किस प्रकार उन्नति कर सकता है, किन्तु उनका अनुकरण करना हमारा कर्तव्य नहीं है। हमें केवल यथासम्भव उनके पदचिह्नों पर चलने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम तुरन्त रघुनाथ दास गोस्वामी का अनुकरण करके उनके समान बनने का प्रयास करें, तो हम निश्चय ही असफल होंगे, और जो भी प्रगति हमने की है वह विफल हो जाएगी। अतः भगवान् कहते हैं (गीता 6.16) कि यदि कोई बहुत अधिक अथवा बहुत कम खाता है तो उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है।\n\nयही संयम निद्रा पर भी लागू होता है। सम्प्रति मैं प्रतिदिन दस घण्टे सोता हूँ, किन्तु यदि मैं पाँच घण्टे सोकर स्वयं को सुदृढ़ रख सकता हूँ, तो दस घण्टे क्यों सोऊँ? जहाँ तक शरीर का सम्बन्ध है, इसकी चार माँगें हैं—आहार, निद्रा, मैथुन तथा रक्षण। आधुनिक सभ्यता की समस्या यह है कि वह इन माँगों को बढ़ाने का प्रयास कर रही है, किन्तु इसके स्थान पर इन्हें घटाना चाहिए। जितना आवश्यक हो उतना खाएँ, और जब आवश्यक हो तब सोएँ, और हमारा स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कृत्रिम अनुकरण का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।\n\nऔर जो मनुष्य अपनी आदतों में संयमी है, उसे क्या फल प्राप्त होता है?\n\nyadā viniyataṁ cittam\n\nātmany evāvatiṣṭhate\n\nnispṛhaḥ sarva-kāmebhyo\n\nyukta ity ucyate tadā\n\n\"जब योगी, योग के अभ्यास द्वारा अपनी मानसिक क्रियाओं को अनुशासित करता है और दिव्यता में स्थित हो जाता है—समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित—तो कहा जाता है कि उसने योग को प्राप्त कर लिया है।\" (गीता 6.18)\n\nयोग की सिद्धि का अर्थ है मन को सन्तुलन की अवस्था में रखना। भौतिक दृष्टि से यह असम्भव है। किसी सांसारिक उपन्यास को एक बार पढ़ने के पश्चात्, तुम उसे पुनः पढ़ना नहीं चाहोगे, किन्तु तुम *भगवद्गीता* को दिन में चार बार पढ़ सकते हो और फिर भी उससे ऊब नहीं सकते। तुम किसी का नाम आधा घण्टा जप सकते हो, अथवा कोई सांसारिक गीत तीन या चार बार गा सकते हो, किन्तु शीघ्र ही यह नीरस हो जाता है। किन्तु हरे कृष्ण का जप दिन-रात किया जा सकता है, और मनुष्य उससे कभी नहीं ऊबेगा। अतः केवल दिव्य ध्वनि-कम्पन के माध्यम से ही मन को सन्तुलन की अवस्था में रखा जा सकता है। जब इस प्रकार मनुष्य की मानसिक क्रियाएँ स्थिर हो जाती हैं, तो कहा जाता है कि उसने योग को प्राप्त कर लिया है।\n\nयोग की सिद्ध अवस्था राजा अम्बरीष द्वारा प्रदर्शित की गई, जिन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियों को भगवान् की सेवा में संलग्न किया। जैसा कि *श्रीमद्भागवत* (9.4.18–20) में कहा गया है,\n\nsa vai manaḥ kṛṣṇa-padāravindayor\n\nvacāṁsi vaikuṇṭha-guṇānuvarṇane\n\nkarau harer mandira-mārjanādiṣu\n\nśrutiṁ cakārācyuta-sat-kathodaye\n\nmukunda-liṅgālaya-darśane dṛśau\n\ntad-bhṛtya-gātra-sparśe 'ṅga-saṅgamam\n\nghrāṇaṁ ca tat-pāda-saroja-saurabhe\n\nśrīmat-tulasyā rasanaṁ tad-arpite\n\npādau hareḥ kṣetra-padānusarpaṇe\n\nśiro hṛṣīkeśa-padābhivandane\n\nkāmaṁ ca dāsye na tu kāma-kāmyayā\n\nyathottamaśloka-janāśrayā ratiḥ\n\n\"राजा अम्बरीष ने सर्वप्रथम अपने मन को भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में संलग्न किया; तत्पश्चात्, एक-एक करके, उन्होंने अपने वचनों को भगवान् के दिव्य गुणों का वर्णन करने में, अपने हाथों को भगवान् के मन्दिर की मार्जना करने में, अपने कानों को भगवान् की क्रियाओं के श्रवण में, अपने नेत्रों को भगवान् के दिव्य रूपों के दर्शन में, अपने शरीर को भक्तगण के शरीरों के स्पर्श में, अपनी घ्राण-इन्द्रिय को भगवान् को अर्पित कमल-पुष्पों के गन्ध को सूँघने में, अपनी जिह्वा को भगवान् के मन्दिर में अर्पित tulasī-पत्र के स्वाद में, अपने मस्तक को भगवान् को प्रणाम अर्पित करने में, तथा अपनी इच्छाओं को भगवान् के मिशन को सम्पन्न करने में संलग्न किया। ये समस्त दिव्य क्रियाएँ एक शुद्ध भक्त के सर्वथा अनुरूप हैं।\"\n\nतो फिर, यही समस्त भौतिक इच्छा से रहित योग की सिद्धि है। यदि हमारी समस्त इच्छाएँ श्रीकृष्ण के लिए हों, तो भौतिक इच्छा का कोई अवकाश नहीं रहता। समस्त भौतिक इच्छा स्वतः समाप्त हो जाती है। हमें कृत्रिम रूप से एकाग्र होने का प्रयास नहीं करना पड़ता। कृष्णभावनामृत में समस्त सिद्धि विद्यमान है क्योंकि यह आध्यात्मिक धरातल पर है। आध्यात्मिक धरातल पर होने के कारण, यह परम योग नित्य, आनन्दमय तथा ज्ञान से परिपूर्ण है। अतः इसमें कोई आशंका अथवा भौतिक बाधाएँ नहीं हैं।"}
{"ref": "pop/5", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/5/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "योग में संकल्प तथा स्थिरता", "purport": "yathā dīpo nivāta-stho\n\nneṅgate sopamā smṛtā\n\nyogino yata-cittasya\n\nyuñjato yogam ātmanaḥ\n\n\"जैसे वायुरहित स्थान में दीपक नहीं काँपता, वैसे ही वह दिव्यवादी, जिसका मन संयमित है, दिव्य आत्मा पर अपने ध्यान में सदा स्थिर रहता है।\" (गीता 6.19)\n\nयदि मन कृष्णभावनामृत में लीन है, तो वह उस मोमबत्ती की ज्योति के समान स्थिर रहेगा जो ऐसे कक्ष में है जहाँ कोई वायु नहीं है। अतः कहा जाता है कि एक सच्चा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति, जो सदा दिव्यता में लीन रहता है, अपने आराध्य भगवान् के निरन्तर अविचलित ध्यान में, वायुरहित स्थान में दीपक अथवा मोमबत्ती के समान स्थिर रहता है। जैसे ज्योति विचलित नहीं होती, वैसे ही मन विचलित नहीं होता, और वही स्थिरता योग की सिद्धि है।\n\nइस प्रकार दिव्य आत्मा, अथवा परमेश्वर पर ध्यान में स्थिरतापूर्वक स्थित मनुष्य की अवस्था को श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* (6.20–23) के निम्नलिखित श्लोकों में वर्णित किया है:\n\nyatroparamate cittaṁ\n\nniruddhaṁ yoga-sevayā\n\nyatra caivātmanātmānaṁ\n\npaśyann ātmani tuṣyati\n\nsukham ātyantikaṁ yat tad\n\nbuddhi-grāhyam atīndriyam\n\nvetti yatra na caivāyaṁ\n\nsthitaś calati tattvataḥ\n\nyaṁ labdhvā cāparaṁ lābhaṁ\n\nmanyate nādhikaṁ tataḥ\n\nyasmin sthito na duḥkhena\n\nguruṇāpi vicālyate\n\ntaṁ vidyād duḥkha-saṁyoga-\n\nviyogaṁ yoga-saṁjñitam\n\n\"सिद्धि की अवस्था को समाधि, अथवा समाधि कहा जाता है, जब योग के अभ्यास द्वारा मनुष्य का मन भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्णतः निरुद्ध हो जाता है। यह शुद्ध मन से आत्मा को देखने तथा आत्मा में आस्वादन एवं आनन्द लेने की मनुष्य की क्षमता द्वारा लक्षित होती है। उस आनन्दमय अवस्था में मनुष्य असीम दिव्य सुख में स्थित होता है और दिव्य इन्द्रियों के माध्यम से आनन्द भोगता है। इस प्रकार स्थित होकर मनुष्य कभी सत्य से विचलित नहीं होता, और इसे प्राप्त करने पर वह सोचता है कि इससे बड़ा कोई लाभ नहीं है। ऐसी अवस्था में स्थित होकर मनुष्य महानतम कठिनाई के मध्य भी कभी विचलित नहीं होता। यही वस्तुतः भौतिक संसर्ग से उत्पन्न समस्त दुःखों से वास्तविक मुक्ति है।\"\n\nसमाधि का अर्थ स्वयं को शून्य बनाना अथवा शून्य में विलीन हो जाना नहीं है। यह असम्भव है। Kleśo 'dhikataras teṣām avyaktāsakta-cetasām [गीता 12.5]। कुछ योगी कहते हैं कि मनुष्य को समस्त क्रियाओं का अन्त कर देना चाहिए और स्वयं को निश्चल बना लेना चाहिए, किन्तु यह कैसे सम्भव है? स्वभावतः जीव एक गतिशील, क्रियाशील आत्मा है। \"निश्चल\" का अर्थ है भौतिक गति का अन्त करना और कृष्णभावनामृत में स्थिर होना। ऐसी अवस्था में मनुष्य भौतिक प्रवृत्तियों से और विचलित नहीं होता। ज्यों-ज्यों मनुष्य भौतिक दृष्टि से निश्चल होता जाता है, त्यों-त्यों कृष्णभावनामृत में उसकी गतियाँ बढ़ती जाती हैं। ज्यों-ज्यों मनुष्य कृष्णभावनामृत में क्रियाशील होता जाता है, त्यों-त्यों वह भौतिक क्रियाओं के सम्बन्ध में स्वतः निश्चल हो जाता है।\n\nमैंने प्रायः एक चंचल बालक का उदाहरण दिया है। चूँकि ऐसे बालक को निश्चल बनाना असम्भव है, अतः उसे कुछ खिलौने अथवा देखने हेतु कुछ चित्र देना आवश्यक होता है। इस प्रकार वह संलग्न रहेगा, अथवा इस अर्थ में निश्चल रहेगा कि वह कोई उत्पात नहीं करेगा। किन्तु यदि कोई वस्तुतः उसे निश्चल बनाना चाहता है, तो उसे कृष्णभावनामृत में कोई कार्य देना होगा। तब कृष्णभावनामृत में अनुभूति के कारण उत्पाती क्रियाओं का कोई अवकाश नहीं रहेगा। कृष्णभावनामृत में संलग्न होने हेतु मनुष्य को सर्वप्रथम यह अनुभव करना चाहिए, \"मैं श्रीकृष्ण का हूँ। मैं यह पदार्थ नहीं हूँ। मैं इस राष्ट्र अथवा इस समाज का नहीं हूँ। मैं इस धूर्त अथवा उस धूर्त का नहीं हूँ। मैं केवल श्रीकृष्ण का हूँ।\" यह निश्चलता है; यह पूर्ण ज्ञान है, श्रीकृष्ण के अंश के रूप में अपनी वास्तविक स्थिति का अनुभव करना। जैसा कि पन्द्रहवें अध्याय (गीता 15.7) में कहा गया है, mamaivāṁśo jīva-loke: \"इस बद्ध जगत् में जीव मेरे नित्य, खण्ड अंश हैं।\" ज्यों ही हम इसे समझते हैं, हम तुरन्त अपनी भौतिक क्रियाओं को बन्द कर देते हैं, और निश्चल होने का यही अर्थ है। इस अवस्था में मनुष्य शुद्ध मन से आत्मा को देखता है और आत्मा में आस्वादन एवं आनन्द लेता है। \"शुद्ध मन\" का अर्थ है यह समझना, \"मैं श्रीकृष्ण का हूँ।\" वर्तमान क्षण में मन संदूषित है क्योंकि हम सोचते हैं, \"मैं इसका हूँ; मैं उसका हूँ।\" मन तब शुद्ध होता है जब वह समझता है, \"मैं श्रीकृष्ण का हूँ।\"\n\nआत्मा में आनन्द लेने का अर्थ है श्रीकृष्ण के साथ आनन्द लेना। श्रीकृष्ण परमात्मा, अथवा परम आत्मा हैं। मैं व्यष्टि आत्मा, अथवा व्यष्टि स्व हूँ। परम आत्मा तथा आत्मा एक साथ आनन्द लेते हैं। आनन्द एकाकी नहीं हो सकता; दो का होना आवश्यक है। एकाकी आनन्द का हमें क्या अनुभव है? एकाकी आनन्द सम्भव नहीं है। आनन्द का अर्थ है दो: श्रीकृष्ण, जो परमात्मा हैं, तथा व्यष्टि आत्मा।\n\nयदि कोई इस बात से आश्वस्त है कि \"मैं श्रीकृष्ण का अंश हूँ,\" तो वह महानतम कठिनाइयों के मध्य भी विचलित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि श्रीकृष्ण रक्षा करेंगे। यही शरणागति है। इस स्थिति को प्राप्त करने हेतु मनुष्य को अपना सर्वोत्तम प्रयास करना चाहिए, अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए, और श्रीकृष्ण में विश्वास करना चाहिए। Bālasya neha śaraṇaṁ pitarau nṛsiṁha (भा. 7.9.19)। यदि श्रीकृष्ण हमारी रक्षा नहीं करते, तो कुछ भी हमें नहीं बचा सकता। यदि श्रीकृष्ण हमारी उपेक्षा करते हैं, तो कोई उपाय नहीं है, और स्वयं को बचाने हेतु हम जो भी उपाय करें वे अन्ततः विफल हो जाएँगे। किसी रोगी का उपचार करते हुए अनेक कुशल चिकित्सक हो सकते हैं, किन्तु इसकी कोई गारण्टी नहीं कि वह जीवित रहेगा। यदि श्रीकृष्ण की ऐसी इच्छा हो, तो सर्वोत्तम चिकित्सकों तथा औषधियों के होते हुए भी व्यक्ति मर जाएगा। दूसरी ओर, यदि श्रीकृष्ण हमारी रक्षा कर रहे हैं, तो हम चिकित्सीय उपचार के बिना भी जीवित रहेंगे। जब कोई श्रीकृष्ण के प्रति पूर्णतः शरणागत हो जाता है, तो वह यह जानकर प्रसन्न हो जाता है कि परिस्थिति चाहे जो हो, श्रीकृष्ण उसकी रक्षा करेंगे। वह ठीक उस बालक के समान है जो अपने माता-पिता के प्रति पूर्णतः शरणागत है, इस विश्वास से कि वे उसकी रक्षा हेतु वहाँ हैं। जैसा कि यामुनाचार्य ने अपने Stotra-ratna (43) में कहा है, kadāham aikāntika-nitya-kiṅkaraḥ praharṣayiṣyāmi sanātha jīvitam: \"हे प्रभु, मैं आपके स्थायी, नित्य सेवक के रूप में कब संलग्न होऊँगा और ऐसे पूर्ण स्वामी को पाकर सदा आनन्दित अनुभव करूँगा?\" यदि हम जानते हैं कि कोई अत्यन्त शक्तिशाली है जो हमारा संरक्षक तथा उद्धारक है, तो क्या हम प्रसन्न नहीं होते? किन्तु यदि हम अपने बल पर तथा अपने ही जोखिम पर कार्य करने का प्रयास करें, तो हम कैसे प्रसन्न हो सकते हैं? प्रसन्नता का अर्थ है कृष्णभावनामृत में रहना और इस बात से आश्वस्त होना कि \"श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करेंगे,\" और श्रीकृष्ण के प्रति सच्चे रहना। अन्यथा प्रसन्न होना सम्भव नहीं है।\n\nनिस्सन्देह, श्रीकृष्ण समस्त जीवों को, उनकी विद्रोही अवस्था में भी, रक्षा प्रदान कर रहे हैं (eko bahūnāṁ yo vidadhāti kāmān)। श्रीकृष्ण की रक्षा के बिना हम एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते। जब हम श्रीकृष्ण की कृपा को स्वीकार करते तथा पहचानते हैं, तो हम प्रसन्न हो जाते हैं। श्रीकृष्ण हमारी प्रति क्षण रक्षा कर रहे हैं, किन्तु हम इसे नहीं समझते, क्योंकि हमने जीवन को अपने ही जोखिम पर ग्रहण किया है। श्रीकृष्ण हमें एक निश्चित मात्रा में स्वतन्त्रता देते हैं, यह कहते हुए, \"ठीक है, जो चाहो करो। यथासम्भव, मैं तुम्हें रक्षा दूँगा।\" किन्तु जब जीव श्रीकृष्ण के प्रति पूर्णतः शरणागत हो जाता है, तो श्रीकृष्ण सम्पूर्ण उत्तरदायित्व ग्रहण कर लेते हैं और विशेष रक्षा प्रदान करते हैं। यदि कोई बालक बड़ा हो जाए और अपने पिता की परवाह न करे तथा स्वच्छन्द आचरण करे, तो उसका पिता क्या कर सकता है? वह केवल इतना कह सकता है, \"जो चाहो करो।\" किन्तु जब कोई पुत्र स्वयं को पूर्णतः अपने पिता की रक्षा में रख देता है, तो उसे अधिक देखभाल प्राप्त होती है। जैसा कि श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* के नवें अध्याय (9.29) में कहते हैं,\n\nsamo 'haṁ sarva-bhūteṣu\n\nna me dveṣyo 'sti na priyaḥ\n\nye bhajanti tu māṁ bhaktyā\n\nmayi te teṣu cāpy aham\n\n\"मैं किसी से द्वेष नहीं करता, न ही किसी के प्रति पक्षपाती हूँ। मैं सबके प्रति समान हूँ। किन्तु जो कोई भक्ति से मेरी सेवा करता है, वह मित्र है, मुझमें है, और मैं भी उसका मित्र हूँ।\"\n\nश्रीकृष्ण किसी से द्वेष कैसे कर सकते हैं? प्रत्येक जीव श्रीकृष्ण का पुत्र है। इसी प्रकार, श्रीकृष्ण किसी के प्रति शत्रु कैसे हो सकते हैं? चूँकि समस्त जीव श्रीकृष्ण के पुत्र हैं, अतः वे सबके मित्र हैं। दुर्भाग्यवश, हम उनकी मित्रता का लाभ नहीं उठा रहे, और यही हमारा रोग है। एक बार जब हम श्रीकृष्ण को अपने नित्य पिता तथा मित्र के रूप में पहचान लेते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि वे सदा हमारी रक्षा कर रहे हैं, और इस प्रकार हम प्रसन्न हो सकते हैं।\n\nsa niścayena yoktavyo\n\nyogo 'nirviṇṇa-cetasā\n\nsaṅkalpa-prabhavān kāmāṁs\n\ntyaktvā sarvān aśeṣataḥ\n\nmanasaivendriya-grāmaṁ\n\nviniyamya samantataḥ\n\n\"मनुष्य को अविचल संकल्प एवं श्रद्धा सहित योग का अभ्यास करना चाहिए। उसे मिथ्या अहंकार से उत्पन्न समस्त भौतिक इच्छाओं को बिना किसी अपवाद के त्याग देना चाहिए और इस प्रकार मन के द्वारा सभी ओर से समस्त इन्द्रियों का संयम करना चाहिए।\" (गीता 6.24)\n\nजैसा पूर्व में कहा गया, यह संकल्प केवल उसी को प्राप्त होता है जो मैथुन में लिप्त नहीं होता। ब्रह्मचर्य मनुष्य के संकल्प को दृढ़ बनाता है; अतः आरम्भ से ही श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगी मैथुन में प्रवृत्त नहीं होता। यदि कोई मैथुन में लिप्त होता है, तो उसका संकल्प डगमगाता रहेगा। इसी कारण मैथुन-जीवन को गृहस्थ-आश्रम के नियमों एवं विधानों के अनुसार संयमित करना चाहिए, अथवा मैथुन को पूर्णतः त्याग देना चाहिए। वस्तुतः इसका पूर्णतः परित्याग ही करना चाहिए, किन्तु यदि यह सम्भव न हो, तो इसे संयमित अवश्य करना चाहिए। तब संकल्प आएगा, क्योंकि अन्ततः संकल्प एक दैहिक विषय है। संकल्प का अर्थ है धैर्य एवं अध्यवसाय के साथ कृष्णभावनामृत का अभ्यास निरन्तर बनाए रखना। यदि किसी को तत्काल अभीष्ट फल प्राप्त न हो, तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए, \"ओह, यह कृष्णभावनामृत क्या है? मैं इसे छोड़ दूँगा।\" नहीं, हमें संकल्प तथा श्रीकृष्ण के वचनों में श्रद्धा रखनी चाहिए।\n\nइस सम्बन्ध में एक लौकिक उदाहरण है। जब कोई युवती विवाहित होती है, तो वह तुरन्त सन्तान की कामना करने लगती है। वह सोचती है, \"अब मेरा विवाह हो गया है। मुझे तत्काल सन्तान होनी चाहिए।\" किन्तु यह कैसे सम्भव है? उस युवती को धैर्य रखना होगा, निष्ठावान् पत्नी बनना होगा, अपने पति की सेवा करनी होगी, और अपने प्रेम को विकसित होने देना होगा। अन्ततः, क्योंकि वह विवाहित है, यह निश्चित है कि उसे सन्तान होगी। इसी प्रकार, जब हम कृष्णभावनामृत में स्थित होते हैं, तो हमारी सिद्धि सुनिश्चित है, किन्तु हमें धैर्य एवं संकल्प रखना होगा। हमें यह सोचना चाहिए, \"मुझे अपने कर्तव्यों का पालन करना है और अधीर नहीं होना चाहिए।\" अधीरता संकल्प के ह्रास के कारण होती है, और संकल्प का ह्रास अत्यधिक मैथुन के कारण होता है।\n\nयोगी को संकल्पवान् होना चाहिए और धैर्यपूर्वक, बिना विचलित हुए, कृष्णभावनामृत का अनुसरण करते रहना चाहिए। मनुष्य को अन्त में सफलता के विषय में निश्चिन्त रहकर महान् अध्यवसाय के साथ इस मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए, और सफलता की प्राप्ति में किसी विलम्ब के होने पर हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। दृढ़ अभ्यासी के लिए सफलता निश्चित है। भक्तियोग के विषय में श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं,\n\n*utsāhān niścayād dhairyāt*\n\n*tat-tat-karma-pravartanāt*\n\n*saṅga-tyāgāt sato vṛtteḥ*\n\n*ṣaḍbhir bhaktiḥ prasidhyati*\n\n\"भक्तियोग की प्रक्रिया को पूर्ण-हृदय उत्साह, अध्यवसाय एवं संकल्प के साथ, भक्तों की संगति में विहित कर्तव्यों का पालन करते हुए तथा सत्त्व-गुण की क्रियाओं में पूर्णतः संलग्न रहकर सफलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।\" (उपदेशामृत 3)\n\nसंकल्प के विषय में, मनुष्य को उस चटक (गौरैया) का उदाहरण लेना चाहिए जिसने समुद्र की लहरों में अपने अंडे खो दिए थे। एक चटक ने समुद्र के तट पर अपने अंडे दिए, किन्तु विशाल समुद्र अपनी लहरों पर उन अंडों को बहा ले गया। चटक अत्यन्त व्याकुल हो उठी और उसने समुद्र से अपने अंडे लौटाने को कहा। समुद्र ने उसकी प्रार्थना पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। अतः चटक ने समुद्र को सुखा डालने का निश्चय किया। वह अपनी छोटी-सी चोंच में जल भरकर निकालने लगी, और सब उसके इस असम्भव संकल्प पर हँसने लगे। उसकी इस क्रिया का समाचार फैल गया, और जब अन्ततः भगवान् विष्णु के विशालकाय पक्षीवाहन गरुड ने यह सुना, तो उन्हें अपनी इस नन्ही बहिन पक्षी पर करुणा उमड़ आई, और इसी कारण वे उसे देखने आए। गरुड उस छोटी चटक के संकल्प से अत्यन्त प्रसन्न हुए, और उन्होंने सहायता का वचन दिया। इस प्रकार गरुड ने तत्काल समुद्र को उसके अंडे लौटाने को कहा, अन्यथा वे स्वयं चटक का कार्य अपने हाथ में ले लेंगे। इससे समुद्र भयभीत हो गया, और उसने अंडे लौटा दिए। इस प्रकार गरुड की कृपा से चटक प्रसन्न हो गई।\n\nइसी प्रकार, योग का अभ्यास, विशेषतः कृष्णभावनामृत में भक्तियोग, अत्यन्त कठिन कार्य प्रतीत हो सकता है। किन्तु यदि कोई महान् संकल्प के साथ इन सिद्धान्तों का अनुसरण करे, तो भगवान् निश्चय ही सहायता करेंगे, क्योंकि ईश्वर उन्हीं की सहायता करते हैं जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं,\n\n*śanaiḥ śanair uparamed*\n\n*buddhyā dhṛti-gṛhītayā*\n\n*ātma-saṁsthaṁ manaḥ kṛtvā*\n\n*na kiñcid api cintayet*\n\n\"क्रमशः, पग-पग पर, पूर्ण विश्वास के साथ, मनुष्य को बुद्धि के द्वारा समाधि में स्थित होना चाहिए, और इस प्रकार मन को केवल आत्मा पर ही स्थिर करना चाहिए तथा अन्य किसी का चिन्तन नहीं करना चाहिए।\" (गीता 6.25)\n\nहम आत्मा हैं, और श्रीकृष्ण भी परमात्मा हैं। जब सूर्य का प्रकाश होता है, तो हम सूर्य को तथा स्वयं को भी देख सकते हैं। किन्तु जब घोर अन्धकार होता है, तब कभी-कभी हम अपना शरीर भी नहीं देख पाते। यद्यपि शरीर वहाँ विद्यमान है, तथापि अन्धकार इतना सघन है कि मैं स्वयं को नहीं देख पाता। परन्तु जब सूर्य का प्रकाश उपस्थित होता है, तब मैं सूर्य के साथ-साथ स्वयं को भी देख सकता हूँ। इसी प्रकार, आत्मा को देखने का अर्थ है सर्वप्रथम परम आत्मा, श्रीकृष्ण को देखना। कठोपनिषद् में कहा गया है, *nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām*: \"परम आत्मा समस्त नित्यों में प्रमुख नित्य हैं, और वे समस्त जीवों में प्रमुख जीव हैं।\" कृष्णभावनामृत का अर्थ है मन को श्रीकृष्ण पर स्थिर करना, और जब मन इस प्रकार स्थिर हो जाता है, तब वह पूर्ण समष्टि पर स्थिर हो जाता है। यदि उदर का ध्यान रखा जाए और उसे पोषक भोजन दिया जाए, तो शरीर के समस्त अंग पुष्ट होते हैं, और हम उत्तम स्वास्थ्य में रहते हैं। इसी प्रकार, यदि हम किसी वृक्ष की जड़ को सींचते हैं, तो उसकी समस्त शाखाएँ, पत्तियाँ, पुष्प तथा टहनियाँ स्वतः ही सिंच जाती हैं। श्रीकृष्ण की सेवा करने से हम स्वतः ही अन्य सभी की सर्वोत्तम सेवा करते हैं।\n\nजैसा पूर्व में कहा गया, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति आलस्य में बैठा नहीं रहता। वह जानता है कि कृष्णभावनामृत इतना महत्त्वपूर्ण दर्शन है कि इसका वितरण होना चाहिए। अतः इस कृष्णभावनामृत समाज के सदस्य केवल मन्दिर में बैठे नहीं रहते, अपितु संकीर्तन-दलों के साथ बाहर निकलते हैं, इस परम दर्शन का प्रचार एवं वितरण करते हैं। यही श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु तथा उनके शिष्यों का मिशन है। अन्य योगी अपने ही उत्थान से सन्तुष्ट होकर एकान्त स्थानों में बैठकर योग का अभ्यास कर सकते हैं। उनके लिए योग उनके निजी सरोकार से अधिक कुछ नहीं है। भक्त, तथापि, केवल अपने वैयक्तिक उत्थान से सन्तुष्ट नहीं होता।\n\n*vāñchā-kalpatarubhyaś ca*\n\n*kṛpā-sindhubhya eva ca*\n\n*patitānāṁ pāvanebhyo*\n\n*vaiṣṇavebhyo namo namaḥ*\n\n\"मैं भगवान् के समस्त वैष्णव भक्तों को सादर नमस्कार करता हूँ, जो इच्छा-तरुओं के समान सबकी इच्छाएँ पूर्ण कर सकते हैं, और जो पतित आत्माओं के प्रति करुणा से परिपूर्ण हैं।\" भक्त बद्ध आत्माओं के प्रति महान् करुणा प्रदर्शित करता है। *kṛpā* शब्द का अर्थ है \"दया\", और *sindhu* का अर्थ है \"समुद्र\"। भक्त दया का समुद्र है, और वह स्वभावतः इस दया को वितरित करना चाहता है। उदाहरणार्थ, प्रभु ईसा मसीह ईश्वर-भावनाभावित, कृष्णभावनाभावित थे, किन्तु वे इस ज्ञान को अपने तक ही सीमित रखने से सन्तुष्ट नहीं थे। यदि वे अकेले ही ईश्वर-भावना में जीवन व्यतीत करते रहते, तो उन्हें क्रूस पर न चढ़ना पड़ता। किन्तु नहीं। भक्त होने तथा स्वभावतः करुणामय होने के कारण, वे दूसरों को भी ईश्वर-भावनाभावित बनाकर उनकी देखभाल करना चाहते थे। यद्यपि उन्हें ईश्वर-भावना का प्रचार करने से रोका गया, तथापि उन्होंने अपने प्राणों के संकट पर भी ऐसा करना जारी रखा। यही भक्त का स्वभाव है।\n\nअतएव *भगवद्गीता* (18.68–69) में कहा गया है कि जो भक्त प्रचार करता है, वह भगवान् को सर्वाधिक प्रिय है।\n\n*ya idaṁ paramaṁ guhyaṁ*\n\n*mad-bhakteṣv abhidhāsyati*\n\n*bhaktiṁ mayi parāṁ kṛtvā*\n\n*mām evaiṣyaty asaṁśayaḥ*\n\n\"जो इस परम रहस्य को भक्तों को समझाता है, उसके लिए भक्ति सुनिश्चित है, और अन्त में वह मेरे पास लौट आएगा।\"\n\n*na ca tasmān manuṣyeṣu*\n\n*kaścin me priya-kṛttamaḥ*\n\n*bhavitā na ca me tasmād*\n\n*anyaḥ priyataro bhuvi*\n\n\"इस संसार में उससे अधिक प्रिय मेरा कोई सेवक नहीं है, और न ही कभी उससे अधिक प्रिय कोई होगा।\" अतः भक्त प्रचार करने हेतु बाहर निकलते हैं, और आगे बढ़ते हुए, उन्हें कभी-कभी विरोधी तत्त्वों का सामना करना पड़ता है। कभी वे पराजित होते हैं, कभी निराश होते हैं, कभी आश्वस्त कर पाते हैं, तो कभी नहीं कर पाते। ऐसा नहीं है कि प्रत्येक भक्त प्रचार करने हेतु सुसज्जित होता है। जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के लोग होते हैं, उसी प्रकार भक्तों की तीन श्रेणियाँ होती हैं। तृतीय श्रेणी में वे होते हैं जिनमें श्रद्धा नहीं होती। यदि वे किसी गुप्त प्रयोजन से, औपचारिक रूप से भक्ति में संलग्न होते हैं, तो वे उच्चतम सिद्धि की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकते। सम्भवतः वे कुछ समय पश्चात् फिसल जाएँगे। वे संलग्न तो हो सकते हैं, किन्तु क्योंकि उनमें पूर्ण विश्वास तथा श्रद्धा नहीं होती, उनके लिए कृष्णभावनामृत में बने रहना अत्यन्त कठिन होता है। हमें अपनी प्रचार-गतिविधि के निर्वहन में व्यावहारिक अनुभव है कि कुछ लोग किसी छिपे हुए उद्देश्य से कृष्णभावनामृत में लग जाते हैं, और ज्यों ही वे आर्थिक रूप से कुछ स्थिर हो जाते हैं, वे इस प्रक्रिया को त्यागकर पुनः अपने पुराने ढर्रे पर लौट जाते हैं। केवल श्रद्धा से ही मनुष्य कृष्णभावनामृत में उन्नति कर सकता है। जहाँ तक श्रद्धा के विकास का प्रश्न है, जो भक्ति-सेवा के साहित्य में निष्णात है तथा दृढ़ श्रद्धा की अवस्था को प्राप्त कर चुका है, वह कृष्णभावनामृत में प्रथम श्रेणी का व्यक्ति कहलाता है। और द्वितीय श्रेणी में वे होते हैं जो भक्ति-शास्त्रों को समझने में बहुत अधिक उन्नत नहीं होते, किन्तु जिनमें स्वतः ही यह दृढ़ श्रद्धा होती है कि कृष्ण-भक्ति, अर्थात् श्रीकृष्ण की सेवा, श्रेष्ठतम मार्ग है, और इस प्रकार सद्भाव से उन्होंने उसे ग्रहण कर लिया है। अतः वे तृतीय श्रेणी से श्रेष्ठ हैं, जिनके पास न तो शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान है और न ही उत्तम श्रद्धा, किन्तु संगति एवं सरलता के बल पर अनुसरण करने का प्रयास कर रहे हैं। कृष्णभावनामृत में तृतीय श्रेणी का व्यक्ति पतित हो सकता है, किन्तु जब कोई द्वितीय श्रेणी अथवा प्रथम श्रेणी में होता है, तो वह पतित नहीं होता। प्रथम श्रेणी का व्यक्ति निश्चय ही उन्नति करेगा और अन्त में फल प्राप्त करेगा। जहाँ तक कृष्णभावनामृत में तृतीय श्रेणी के व्यक्ति का प्रश्न है, यद्यपि उसे इस विश्वास में श्रद्धा है कि श्रीकृष्ण की भक्ति-सेवा अत्यन्त उत्तम है, तथापि उसे *श्रीमद्भागवत* तथा *भगवद्गीता* जैसे शास्त्रों के माध्यम से श्रीकृष्ण का ज्ञान नहीं होता। कभी-कभी कृष्णभावनामृत में ये तृतीय श्रेणी के व्यक्ति कर्म-योग तथा ज्ञान-योग की ओर कुछ प्रवृत्ति रखते हैं, और कभी-कभी वे विचलित हो जाते हैं, किन्तु ज्यों ही कर्म-योग अथवा ज्ञान-योग का संक्रमण नष्ट हो जाता है, वे कृष्णभावनामृत में द्वितीय श्रेणी अथवा प्रथम श्रेणी के व्यक्ति बन जाते हैं। श्रीकृष्ण में श्रद्धा भी तीन अवस्थाओं में विभाजित है और *श्रीमद्भागवत* में वर्णित है। प्रथम श्रेणी की आसक्ति, द्वितीय श्रेणी की आसक्ति, और तृतीय श्रेणी की आसक्ति भी *श्रीमद्भागवत* में, एकादश स्कन्ध में, समझाई गई हैं।\n\nमनुष्य चाहे जिस भी स्थिति में हो, उसमें कृष्णभावनामृत का प्रचार करने हेतु बाहर निकलने का संकल्प होना चाहिए। वह प्रयास कम-से-कम वहाँ अवश्य होना चाहिए, और जो इस प्रकार प्रचार का प्रयत्न करता है, वह भगवान् की सर्वोत्तम सेवा करता है। विरोध के बावजूद, मनुष्य को लोगों को आत्म-साक्षात्कार के उच्चतम स्तर तक उठाने का प्रयास करना चाहिए। जिसने वास्तव में सत्य को देख लिया है, जो आत्म-साक्षात्कार की समाधि में स्थित है, वह यों आलस्य में बैठा नहीं रह सकता। उसे बाहर निकलना ही होगा। उदाहरणार्थ, श्रील रामानुजाचार्य ने हरे कृष्ण मन्त्र की सार्वजनिक रूप से घोषणा की। उन्होंने इसे किसी शुल्क के बदले गुप्त रूप से वितरित नहीं किया। हाल ही में, एक भारतीय योगी अमेरिका आया और कुछ \"निजी मन्त्र\" देने लगा। किन्तु यदि किसी मन्त्र में कोई शक्ति है, तो वह निजी क्यों होना चाहिए? यदि कोई मन्त्र शक्तिशाली है, तो उसकी सार्वजनिक घोषणा क्यों न की जाए, ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके? हम कह रहे हैं कि यह हरे कृष्ण महामन्त्र सबका उद्धार कर सकता है, और इसी कारण हम इसे निःशुल्क, सार्वजनिक रूप से वितरित कर रहे हैं। किन्तु इस युग में लोग इतने मूर्ख हैं कि वे इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। अपितु, वे किसी गुप्त मन्त्र के लिए लालायित रहते हैं और इसी कारण किसी \"योगी\" को कुछ \"निजी मन्त्र\" के बदले पैंतीस डॉलर या जो कुछ भी हो, चुका देते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग ठगे जाना चाहते हैं। किन्तु भक्त बिना किसी शुल्क के प्रचार कर रहे हैं, सड़कों, उद्यानों एवं सर्वत्र घोषणा कर रहे हैं, \"यह लो! यह रहा हरे कृष्ण महामन्त्र। आओ, इसे ग्रहण करो!\" किन्तु माया, अर्थात् भ्रम, के वशीभूत होकर लोग सोचते हैं, \"ओह, यह अच्छा नहीं है।\" किन्तु यदि तुम कुछ शुल्क लो और लोगों को छलो एवं ठगो, तो वे तुम्हारा अनुसरण करेंगे।\n\nइस सम्बन्ध में एक हिन्दी दोहा है जिसमें कहा गया है कि कलियुग ऐसा निन्द्य युग है कि यदि कोई सत्य बोले, तो लोग आकर उसे पीटेंगे। किन्तु यदि कोई छले, ठगे और झूठ बोले, तो लोग भ्रमित होंगे, उसे पसन्द करेंगे, और उसे स्वीकार कर लेंगे। यदि मैं कहूँ, \"मैं ईश्वर हूँ,\" तो लोग कहेंगे, \"ओह, ये रहे स्वामीजी। ये रहे ईश्वर।\" इस युग में लोगों में इतनी बुद्धि नहीं है कि वे पूछ सकें, \"आप ईश्वर कैसे बन गए? ईश्वर के क्या लक्षण होते हैं? क्या आप में ये सब लक्षण हैं?\" क्योंकि लोग ऐसी जिज्ञासाएँ नहीं करते, इसी कारण वे ठगे जाते हैं। अतः आत्मा की चेतना में स्थिर रहना आवश्यक है। जब तक मनुष्य वास्तविक आत्मा तथा परमात्मा को जानकर नहीं समझता, तब तक वह ठगा जाता रहेगा। वास्तविक योग का अर्थ है आत्म-साक्षात्कार की इस प्रक्रिया को समझना।\n\n*yato yato niścalati*\n\n*manaś cañcalam asthiram*\n\n*tatas tato niyamyaitad*\n\n*ātmany eva vaśaṁ nayet*\n\n\"मन अपनी चंचल एवं अस्थिर प्रकृति के कारण जहाँ-जहाँ भी और जिस-जिस से भी विचलित हो, मनुष्य को निश्चय ही उसे वहाँ से खींचकर पुनः आत्मा के संयम में ले आना चाहिए।\" (गीता 6.26) यही वास्तविक योग-प्रक्रिया है। यदि तुम अपने मन को श्रीकृष्ण पर एकाग्र करने का प्रयास कर रहे हो, और मन भटक जाए—किसी चलचित्र अथवा अन्यत्र जाकर—तो तुम्हें मन को यह सोचते हुए खींच लेना चाहिए, \"वहाँ नहीं, कृपया। यहाँ।\" यही योग है: मन को श्रीकृष्ण से भटकने न देना।\n\nमन को एक स्थान पर बैठे हुए श्रीकृष्ण पर स्थिर रखने हेतु अत्यन्त गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। यह वस्तुतः अत्यन्त कठिन कार्य है। यदि कोई इतना अभ्यस्त नहीं है और इस प्रक्रिया का अनुकरण करने का प्रयास करता है, तो वह निश्चय ही भ्रमित हो जाएगा। इसके स्थान पर, हमें सदैव अपने को कृष्णभावनामृत में संलग्न रखना चाहिए, अपने प्रत्येक कार्य को श्रीकृष्ण से जोड़ते हुए। हमारी सामान्य गतिविधियों को इस प्रकार ढाला जाना चाहिए कि वे श्रीकृष्ण के निमित्त की जाएँ। इस प्रकार मन श्रीकृष्ण पर स्थिर रहेगा। जैसा पूर्व में कहा गया, हमें बैठकर अपनी नासिका के अग्रभाग को निहारने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वर्तमान समय में, उस प्रकार के योग में प्रवृत्त होने के प्रयास कृत्रिम हैं। अपितु, अनुशंसित विधि है ऊँचे स्वर में हरे कृष्ण का जप एवं श्रवण करना। तब, भले ही मन भटक जाए, उसे ध्वनि-कम्पन \"कृष्ण\" पर एकाग्र होने के लिए विवश होना पड़ेगा। मन को प्रत्येक वस्तु से खींचना आवश्यक नहीं है; वह स्वतः ही खिंच जाएगा, क्योंकि वह ध्वनि-कम्पन पर एकाग्र हो जाएगा। यदि हम किसी मोटरगाड़ी को गुज़रते हुए सुनते हैं, तो हमारा ध्यान स्वतः ही उस ओर खिंच जाता है। इसी प्रकार, यदि हम निरन्तर हरे कृष्ण का जप करें, तो हमारा मन स्वतः ही श्रीकृष्ण पर स्थिर हो जाएगा, यद्यपि हम अनेक अन्य वस्तुओं का चिन्तन करने के अभ्यस्त हैं।\n\nमन की प्रकृति चंचल एवं अस्थिर है। किन्तु आत्म-साक्षात्कारी योगी को मन का संयम करना होता है; मन को उसका संयम नहीं करना चाहिए। वर्तमान समय में, मन हमारा संयमन कर रहा है (गो-दास)। मन हमें कहता है, \"कृपया, उस सुन्दर युवती को क्यों न देखें?\" और इस प्रकार हम देखते हैं। वह कहता है, \"उस उत्तम मदिरा को क्यों न पिएँ?\" और हम कहते हैं, \"हाँ।\" वह कहता है, \"यह सिगरेट क्यों न पिएँ?\" \"हाँ,\" हम कहते हैं। \"इतने स्वादिष्ट भोजन के लिए इस भोजनालय में क्यों न जाएँ? यह क्यों न करें? वह क्यों न करें?\" इस प्रकार, मन आदेश देता रहता है, और हम उसका अनुसरण करते रहते हैं। भौतिक जीवन का अर्थ है इन्द्रियों के, अथवा मन के, संयमन में रहना, जो समस्त इन्द्रियों का केन्द्र है। मन के संयमन में रहने का अर्थ है इन्द्रियों के संयमन में रहना, क्योंकि इन्द्रियाँ मन की सहायक हैं। स्वामी मन आदेश देता है, \"उसे देखने जाओ,\" और नेत्र, मन के निर्देशों का अनुसरण करते हुए, उस इन्द्रिय-विषय को देखते हैं। मन हमें किसी विशेष स्थान पर जाने को कहता है, और पैर, मन के निर्देशों के अधीन, हमें वहाँ ले जाते हैं। इस प्रकार, मन के निर्देश के अधीन होने का अर्थ है इन्द्रियों के संयमन में आ जाना। यदि हम मन का संयम कर सकें, तो हम इन्द्रियों के संयमन में नहीं रहेंगे। जो इन्द्रियों के संयमन में रहता है, वह गो-दास कहलाता है। *go* शब्द का अर्थ है \"इन्द्रियाँ\", और *dāsa* का अर्थ है \"सेवक\"। जो इन्द्रियों का स्वामी है, वह गोस्वामी कहलाता है, क्योंकि *svāmī* का अर्थ है \"स्वामी\"। अतः जिसकी उपाधि गोस्वामी है, वह वही है जिसने इन्द्रियों पर अधिकार पा लिया है। जब तक कोई इन्द्रियों का सेवक है, तब तक वह गोस्वामी अथवा स्वामी नहीं कहलाया जा सकता। जब तक कोई इन्द्रियों पर अधिकार नहीं पा लेता, तब तक उसका स्वामी अथवा गोस्वामी उपाधि स्वीकार करना मात्र छल का एक रूप है। श्रील रूप गोस्वामी ने ही इस प्रकार गोस्वामी शब्द का अर्थ परिभाषित किया। मूलतः, श्रील सनातन गोस्वामी तथा श्रील रूप गोस्वामी गोस्वामी नहीं, अपितु शासन के मन्त्री थे। केवल जब वे भगवान् चैतन्य महाप्रभु के शिष्य बने, तभी वे गोस्वामी बने। अतः गोस्वामी कोई वंशानुगत उपाधि नहीं, अपितु एक योग्यता है। मनुष्य प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों के अधीन ही ऐसा योग्य बनता है। केवल जब किसी ने इन्द्रिय-संयम में सिद्धि प्राप्त कर ली हो, तभी वह गोस्वामी कहलाया जा सकता है और अपनी बारी में स्वयं आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। जब तक कोई इन्द्रियों पर अधिकार नहीं पा सकता, तब तक वह मात्र एक कूट आध्यात्मिक गुरु ही होगा।\n\nइसे श्रील रूप गोस्वामी ने अपने उपदेशामृत (1) में समझाया है:\n\n*vāco vegaṁ manasaḥ krodha-vegaṁ*\n\n*jihvā-vegam udaropastha-vegam*\n\n*etān vegān yo viṣaheta dhīraḥ*\n\n*sarvām apīmāṁ pṛthivīṁ sa śiṣyāt*\n\n\"जो धीर पुरुष वाणी के वेग, मन की माँगों, क्रोध की क्रियाओं, तथा जिह्वा, उदर एवं जननेन्द्रिय के वेगों को सहन कर सकता है, वह सम्पूर्ण विश्व में शिष्य बनाने योग्य है।\" इस श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी छह \"वेगों\" (*vegam*) का उल्लेख करते हैं। यह वेग एक प्रकार का आवेग है। उदाहरणार्थ, जब प्रकृति बुलाती है, तो हमें शौचालय जाना पड़ता है, और हम इस आवेग को रोक नहीं सकते। अतः यह आवेग *vegam* कहलाता है, एक प्रकार का धक्का। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार, छह वेग हैं। *Vāco vegam* अनावश्यक रूप से बोलने का आवेग है। यह जिह्वा का एक प्रकार का धक्का है। फिर *krodha-vegam* है, क्रोधित होने का आवेग। जब हम क्रोध की ओर धकेले जाते हैं, तो हम स्वयं को रोक नहीं पाते, और कभी-कभी मनुष्य इतना क्रोधित हो जाता है कि वह हत्या तक कर बैठता है। इसी प्रकार, मन धक्का देता है, आदेश देता है, \"तुम्हें तुरन्त वहाँ जाना है,\" और हम तत्काल वहीं चले जाते हैं जहाँ हमें कहा जाता है। *jihvā-vegam* शब्द जिह्वा के स्वादिष्ट भोजन चखने हेतु प्रेरित होने को इंगित करता है। *Udara-vegam* उदर के आवेगों को इंगित करता है। यद्यपि उदर भरा हुआ है, तथापि वह और अधिक भोजन चाहता है, और यह उदर का एक प्रकार का धक्का है। और जब हम जिह्वा एवं उदर के धक्कों के समक्ष झुक जाते हैं, तब जननेन्द्रियों के आवेग अत्यन्त प्रबल हो जाते हैं, और मैथुन की आवश्यकता पड़ती है। यदि कोई अपने मन अथवा अपनी जिह्वा का संयम नहीं कर सकता, तो वह अपनी जननेन्द्रियों का संयम कैसे कर सकता है? इस प्रकार, इतने सारे धक्के हैं, इतने अधिक कि यह शरीर एक प्रकार की धक्का-यन्त्र है। अतः श्रील रूप गोस्वामी हमें बताते हैं कि मनुष्य आध्यात्मिक गुरु तभी बन सकता है जब वह इन समस्त आवेगों का संयम कर सके।\n\n*Etān vegān yo viṣaheta dhīraḥ sarvām apīmāṁ pṛthivīṁ sa śiṣyāt*: \"जो इन धक्कों का संयम कर स्थिर रह सकता है, वह सम्पूर्ण विश्व में शिष्य बना सकता है।\" *dhīra* शब्द का अर्थ है \"स्थिर, धीर\"। केवल वही, जो धीर है, शिष्य बनाने योग्य है। यह सब मनुष्य के प्रशिक्षण पर निर्भर करता है। वस्तुतः, योग का अर्थ है मन एवं इन्द्रियों को आत्मा पर स्थिर रहने का प्रशिक्षण देना। यह दिन में केवल पन्द्रह मिनट ध्यान करके और फिर बाहर जाकर जो कुछ इन्द्रियाँ आदेश दें वही करके सम्भव नहीं है। जीवन की समस्याएँ इतने सस्ते में कैसे हल हो सकती हैं? यदि हमें कोई बहुमूल्य वस्तु चाहिए, तो हमें उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। भगवान् चैतन्य की कृपा से, यह मूल्य अत्यन्त सरल बना दिया गया है—केवल हरे कृष्ण का जप करो। हमारे जप से, यह संयम की प्रणाली, यह योग-प्रणाली, सिद्ध हो जाती है। *Ihā haite sarva siddhi haibe tomāra*. इस प्रकार भगवान् चैतन्य ने हमें आशीर्वाद दिया है। केवल हरे कृष्ण का जप करके, हम आत्म-साक्षात्कार की सिद्धि प्राप्त करेंगे। कलियुग के इस युग में, जब लोग इतने पतित हैं, अन्य प्रक्रियाएँ सफल नहीं होंगी। यही एकमात्र प्रक्रिया है, और यह सरल, उदात्त, प्रभावी एवं व्यावहारिक है। इसके द्वारा मनुष्य स्वयं को साक्षात् कर सकता है।\n\n*भगवद्गीता* के नवें अध्याय (9.2) में श्रीकृष्ण के अनुसार, यह प्रक्रिया सर्वाधिक उदात्त है।\n\n*rāja-vidyā rāja-guhyaṁ*\n\n*pavitram idam uttamam*\n\n*pratyakṣāvagamaṁ dharmyaṁ*\n\n*su-sukhaṁ kartum avyayam*\n\n\"यह ज्ञान शिक्षा का राजा है, समस्त रहस्यों में परम रहस्य है। यह शुद्धतम ज्ञान है, और क्योंकि यह साक्षात्कार द्वारा आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति प्रदान करता है, अतः यह धर्म की सिद्धि है। यह शाश्वत है, और इसका सम्पादन आनन्दपूर्वक किया जाता है।\"\n\nभोजन करने के पश्चात्, मनुष्य समझ सकता है कि उसकी क्षुधा तृप्त हो गई है; इसी प्रकार, कृष्णभावनामृत के सिद्धान्तों का अनुसरण करके, मनुष्य समझ सकता है कि वह आत्म-साक्षात्कार में उन्नत हो गया है।"}
{"ref": "pop/6", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/6/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "परमात्मा की अनुभूति", "purport": "*praśānta-manasaṁ hy enaṁ*\n\n*yoginaṁ sukham uttamam*\n\n*upaiti śānta-rajasaṁ*\n\n*brahma-bhūtam akalmaṣam*\n\n\"जिस योगी का मन मुझ पर स्थिर है, वह निश्चय ही उच्चतम सुख प्राप्त करता है। ब्रह्म से अपने तादात्म्य के कारण वह मुक्त होता है; उसका मन शान्त है, उसके आवेग प्रशमित हैं, और वह पाप से मुक्त है।\" (गीता 6.27)\n\n*yuñjann evaṁ sadātmānaṁ*\n\n*yogī vigata-kalmaṣaḥ*\n\n*sukhena brahma-saṁsparśam*\n\n*atyantaṁ sukham aśnute*\n\n\"आत्मा में स्थिर रहते हुए, समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त होकर, योगी परम चेतना के स्पर्श में सुख की उच्चतम सिद्ध अवस्था को प्राप्त करता है।\" (गीता 6.28)\n\nअतः यह रही सिद्धि: \"जिस योगी का मन मुझ पर स्थिर है।\" क्योंकि श्रीकृष्ण बोल रहे हैं, अतः \"मुझ\" से तात्पर्य श्रीकृष्ण से है। यदि मैं बोल रहा हूँ और कह रहा हूँ, \"मुझे एक गिलास जल दो,\" तो मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि वह जल किसी अन्य को दिया जाए। अतः हमें स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि क्योंकि *भगवद्गीता* श्रीकृष्ण द्वारा कही जा रही है, अतः जब वे कहते हैं \"मुझे,\" तो उनका तात्पर्य श्रीकृष्ण से ही है। दुर्भाग्यवश, अनेक टीकाकार ऐसे हैं जो इन स्पष्ट निर्देशों से विचलित हो जाते हैं। मैं नहीं जानता क्यों; उनके अभिप्राय निःसन्देह दुष्ट हैं।\n\n*sarva-bhūta-stham ātmānaṁ*\n\n*sarva-bhūtāni cātmani*\n\n*īkṣate yoga-yuktātmā*\n\n*sarvatra sama-darśanaḥ*\n\n\"सच्चा योगी मुझे समस्त प्राणियों में देखता है, और प्रत्येक प्राणी को भी मुझमें देखता है। वस्तुतः, आत्म-साक्षात्कारी मनुष्य मुझे सर्वत्र देखता है।\" (गीता 6.29) *Sarva-bhūta-stham ātmānam*: \"सच्चा योगी मुझे समस्त प्राणियों में देखता है।\" यह कैसे सम्भव है? कुछ लोग कहते हैं कि समस्त प्राणी ही श्रीकृष्ण हैं और इसलिए श्रीकृष्ण की पृथक् रूप से आराधना करने का कोई अर्थ नहीं है। फलस्वरूप, ऐसे लोग मानवतावादी गतिविधियों को अपना लेते हैं, यह दावा करते हुए कि ऐसा कार्य श्रेष्ठतर है। वे कहते हैं, \"श्रीकृष्ण की आराधना क्यों की जाए? श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को प्रत्येक प्राणी में श्रीकृष्ण को देखना चाहिए। अतः आओ, हम दरिद्र-नारायण, अर्थात् सड़क के मनुष्य, की सेवा करें।\" ऐसे मिथ्या व्याख्याकार उचित विधियों को नहीं जानते, जिन्हें प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के अधीन सीखना होता है।\n\nसच्चा योगी, जैसा पूर्व में समझाया गया, श्रीकृष्ण का भक्त है, और सर्वाधिक उन्नत भक्त कृष्णभावनामृत का प्रचार करने हेतु आगे बढ़ता है। क्यों? क्योंकि वह समस्त प्राणियों में श्रीकृष्ण को देखता है। यह कैसे? क्योंकि वह देखता है कि समस्त प्राणी श्रीकृष्ण के अभिन्न अंश हैं। वह यह भी समझता है कि क्योंकि ये प्राणी श्रीकृष्ण को भूल चुके हैं, अतः उन्हें कृष्णभावनामृत के प्रति जागृत करना उसका कर्तव्य है। कभी-कभी धर्मप्रचारक आदिम, अशिक्षित लोगों को शिक्षित करने हेतु इसीलिए आगे बढ़ते हैं क्योंकि वे देखते हैं कि वे मनुष्य हैं और इसलिए जीवन के मूल्य को समझने हेतु शिक्षित किए जाने के योग्य हैं। यह धर्मप्रचारक की सहृदयता के कारण होता है। भक्त भी इसी प्रकार प्रेरित होता है। वह समझता है कि प्रत्येक को स्वयं को श्रीकृष्ण का अभिन्न अंश जानना चाहिए। भक्त समझता है कि लोग श्रीकृष्ण की अपनी विस्मृति के कारण कष्ट भोग रहे हैं।\n\nइस प्रकार भक्त प्रत्येक वस्तु में श्रीकृष्ण को देखता है। वह इस भ्रम में नहीं रहता कि प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण बन गई है। अपितु, वह प्रत्येक जीव को ईश्वर के पुत्र के रूप में देखता है। यदि मैं कहूँ कि यह बालक श्री जॉनसन का पुत्र है, तो क्या मेरा अभिप्राय यह है कि यह बालक स्वयं श्री जॉनसन ही है? मैं इस बालक में श्री जॉनसन को देख सकता हूँ क्योंकि यह बालक उनका पुत्र है, किन्तु भेद बना रहता है। यदि मैं प्रत्येक जीव को श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में देखूँ, तो मैं प्रत्येक प्राणी में श्रीकृष्ण को देखता हूँ। इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। यह न तो कोई कल्पना है और न कोई दृष्टिभ्रम, अपितु एक तथ्य है।\n\nजब कोई भक्त किसी बिल्ली अथवा कुत्ते को देखता है, तो वह उसमें श्रीकृष्ण को देखता है। वह जानता है कि बिल्ली, उदाहरणार्थ, एक जीव है, और अपने पूर्व कर्मों के कारण उसे बिल्ली का शरीर प्राप्त हुआ है। यह उसकी विस्मृति के कारण है। भक्त बिल्ली को कुछ कृष्ण-प्रसाद देकर उसकी सहायता करता है, ताकि किसी दिन वह बिल्ली कृष्णभावनामृत में आ सके। यही बिल्ली में श्रीकृष्ण को देखना है। भक्त यह नहीं सोचता, \"ओह, यहाँ श्रीकृष्ण हैं। मैं इस बिल्ली का आलिंगन करूँ और ईश्वर के रूप में इसकी सेवा करूँ।\" ऐसा सोचना निरर्थक है। यदि कोई बाघ को देखता है, तो वह यह नहीं कहता, \"ओह, यहाँ श्रीकृष्ण हैं। आओ, कृपया मुझे खा लो।\" भक्त समस्त प्राणियों का श्रीकृष्ण के रूप में आलिंगन नहीं करता, अपितु प्रत्येक जीव के प्रति सहानुभूति रखता है क्योंकि वह समस्त प्राणियों को श्रीकृष्ण के अभिन्न अंश के रूप में देखता है। इस प्रकार, \"सच्चा योगी मुझे समस्त प्राणियों में देखता है।\" यही वास्तविक दृष्टि है।\n\nकृष्णभावनामृत में जो कुछ भी किया जाता है, चाहे जानते हुए अथवा अनजाने, उसका प्रभाव अवश्य होगा। जो बालक प्रणाम करते हैं अथवा श्रीकृष्ण के नामों का उच्चारण करने का प्रयास करते हैं अथवा कीर्तन के समय तालियाँ बजाते हैं, वे वास्तव में कृष्णभावनामृत के अपने खाते में इतना कुछ संचित कर रहे होते हैं। अग्नि क्रिया करेगी, चाहे कोई बालक हो अथवा वयस्क। यदि कोई बालक अग्नि को स्पर्श करता है, तो अग्नि जलाएगी। अग्नि यह नहीं कहती, \"ओह, मैं इसे नहीं जलाऊँगी। यह बालक है और नहीं जानता।\" नहीं, अग्नि सदैव अग्नि के समान ही क्रिया करेगी। इसी प्रकार, श्रीकृष्ण परम आत्मा हैं, और यदि कोई बालक कृष्णभावनामृत में सहभागी होता है, तो वह प्रभावित होगा। श्रीकृष्ण क्रिया करेंगे, चाहे बालक जाने अथवा न जाने। प्रत्येक जीव को कृष्णभावनामृत में सहभागी होने का अवसर दिया जाना चाहिए क्योंकि श्रीकृष्ण वहाँ विद्यमान हैं और क्रिया करेंगे। अतः प्रत्येक को आकर प्रसाद ग्रहण करने हेतु आमन्त्रित किया जा रहा है, क्योंकि यह प्रसाद किसी दिन अपना प्रभाव दिखाएगा।\n\nहमें यह सोचने की भूल न करने में सावधान रहना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति श्रीकृष्ण है; अपितु, हमें प्रत्येक में श्रीकृष्ण को देखना चाहिए। श्रीकृष्ण सर्वव्यापी हैं। उन्हें केवल मनुष्यों में ही क्यों देखा जाए? जैसा ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, वे परमाणु के भीतर भी विद्यमान हैं: *aṇḍāntara-stha-paramāṇu-cayāntara-stham*। [ब्र.सं. 5.35] *paramāṇu* शब्द का अर्थ है \"परमाणु\", और हमें समझना चाहिए कि श्रीकृष्ण प्रत्येक परमाणु के भीतर विद्यमान हैं। \"सच्चा योगी मुझे समस्त प्राणियों में देखता है और प्रत्येक प्राणी को भी मुझमें देखता है।\" योगी प्रत्येक प्राणी को \"मुझमें\" कैसे देखता है? यह इसलिए सम्भव है क्योंकि सच्चा योगी जानता है कि जो कुछ भी हम देखते हैं, वह श्रीकृष्ण है। हम इस फ़र्श पर अथवा इस कालीन पर बैठे हैं, किन्तु वास्तव में हम श्रीकृष्ण पर बैठे हैं। हमें इसे एक तथ्य के रूप में जानना चाहिए। यह कालीन श्रीकृष्ण कैसे है? यह श्रीकृष्ण है क्योंकि यह श्रीकृष्ण की ऊर्जा से बनी है। परमेश्वर की विविध ऊर्जाएँ हैं, जिनके तीन प्रमुख विभाग हैं—भौतिक ऊर्जा, आध्यात्मिक ऊर्जा, तथा तटस्थ ऊर्जा। *Parāsya śaktir vividhaiva śrūyate*. हम जीव तटस्थ ऊर्जा हैं, भौतिक जगत् भौतिक ऊर्जा है, और आध्यात्मिक जगत् आध्यात्मिक ऊर्जा है। हम इस अर्थ में तटस्थ ऊर्जा हैं कि हम आध्यात्मिक अथवा भौतिक रूप से स्थित हो सकते हैं। कोई तीसरा विकल्प नहीं है; या तो हम भौतिकतावादी बनते हैं या आध्यात्मिकतावादी।\n\nजब तक हम भौतिक जगत् में हैं, तब तक हम भौतिक ऊर्जा पर आसीन हैं, और इसलिए हम श्रीकृष्ण में स्थित हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण की ऊर्जा श्रीकृष्ण से पृथक् नहीं है। ज्वाला में ऊष्मा एवं प्रकाश दोनों होते हैं, दो ऊर्जाएँ। न तो ऊष्मा और न ही प्रकाश ज्वाला से पृथक् हैं; अतः एक अर्थ में ऊष्मा अग्नि है, और प्रकाश अग्नि है, किन्तु उनमें भेद किया जा सकता है। इसी प्रकार, यह भौतिक ऊर्जा भी श्रीकृष्ण है, और यद्यपि हम सोच रहे हैं कि हम इस फ़र्श पर बैठे हैं, वस्तुतः हम श्रीकृष्ण पर बैठे हैं। अतएव कहा गया है, \"आत्म-साक्षात्कारी मनुष्य मुझे सर्वत्र देखता है।\" श्रीकृष्ण को सर्वत्र देखने का अर्थ है प्रत्येक जीव को तथा अन्य प्रत्येक वस्तु को भी श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध में देखना। *भगवद्गीता* के सातवें अध्याय (7.8) में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उन्हें विभिन्न अभिव्यक्तियों में कैसे देखा जा सकता है।\n\n*raso 'ham apsu kaunteya*\n\n*prabhāsmi śaśi-sūryayoḥ*\n\n*praṇavaḥ sarva-vedeṣu*\n\n*śabdaḥ khe pauruṣaṁ nṛṣu*\n\n\"हे कुन्तीपुत्र [अर्जुन], मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य एवं चन्द्र का प्रकाश हूँ, वैदिक मन्त्रों में ओंकार अक्षर हूँ; मैं आकाश में ध्वनि हूँ और मनुष्य में सामर्थ्य हूँ।\"\n\nजल समस्त जीवों द्वारा पिया जाता है, और पक्षियों, पशुओं तथा मनुष्य को इसकी आवश्यकता होती है। इसका उपयोग केवल पीने के लिए ही नहीं, अपितु धोने तथा पौधों के उत्पादन के लिए भी होता है। युद्धभूमि पर खड़ा सैनिक समझ सकता है कि जल कितना महत्त्वपूर्ण है। युद्ध करते समय सैनिक प्यासे हो जाते हैं, और यदि उनके पास जल न हो, तो वे मर जाते हैं। एक बार मनुष्य ने *भगवद्गीता* का दर्शन सीख लिया, तो जब भी वह जल पीता है, वह श्रीकृष्ण को देखता है। और ऐसा कौन-सा दिन बीतता है जब हम जल नहीं पीते? यही कृष्णभावनामृत का मार्ग है। \"मैं सूर्य एवं चन्द्र का प्रकाश हूँ।\" अतः चाहे दिन हो अथवा रात्रि, हम या तो सूर्य का प्रकाश देखते हैं या चन्द्र का प्रकाश। तब हम श्रीकृष्ण को कैसे भूल सकते हैं? अतः यही पूर्ण योग का मार्ग है। हमें श्रीकृष्ण को सर्वत्र तथा सर्वदा देखना है।\n\n*yo māṁ paśyati sarvatra*\n\n*sarvaṁ ca mayi paśyati*\n\n*tasyāhaṁ na praṇaśyāmi*\n\n*sa ca me na praṇaśyati*\n\n\"जो मुझे सर्वत्र देखता है और प्रत्येक वस्तु को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी विलुप्त नहीं होता, और न ही वह कभी मेरे लिए विलुप्त होता है।\" (गीता 6.30) यही *sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ* है: [गीता 8.6] सदा श्रीकृष्ण का स्मरण करना। यदि हम इस प्रकार जीने का अभ्यास करें, तो हम कभी श्रीकृष्ण को नहीं खोते और न कभी श्रीकृष्ण के लिए विलुप्त होते हैं, और इसलिए मृत्यु के समय हम निश्चय ही श्रीकृष्ण के पास जाते हैं। यदि हम श्रीकृष्ण के लिए विलुप्त नहीं हैं, तो हम श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कहाँ जा सकते हैं? नवें अध्याय में, श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं, *kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati* (गीता 9.31): \"हे कुन्तीपुत्र, साहसपूर्वक घोषणा कर दो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।\"\n\nकेवल श्रीकृष्ण को दृष्टि से ओझल न होने दो। यही जीवन की सिद्धि है। हम अन्य सब कुछ भूल सकते हैं, किन्तु हमें श्रीकृष्ण को कभी नहीं भूलना चाहिए। यदि हम श्रीकृष्ण का स्मरण रख सकें, तो हम मनुष्यों में सर्वाधिक धनी हैं, भले ही लोग हमें अत्यन्त निर्धन देखें। यद्यपि श्रील रूप गोस्वामी तथा श्रील सनातन गोस्वामी विद्वान् पण्डित एवं अत्यन्त ऐश्वर्यवान् मन्त्री थे, तथापि उन्होंने भिक्षुकों का निर्धन जीवन अपना लिया। श्रील श्रीनिवास आचार्य अपने श्री षड्-गोस्वाम्यष्टक (श्लोक 4) में इस प्रकार छह गोस्वामियों का वर्णन करते हैं:\n\n*tyaktvā tūrṇam aśeṣa-maṇḍala-pati-śreṇīṁ sadā tuccha vat*\n\n*bhūtvā dīna-gaṇeśakau karuṇayā kaupīna-kanthāśritau*\n\n*gopī-bhāva-rasāmṛtābdhi-laharī-kallola-magnau muhur*\n\n*vande rūpa-sanātanau raghu-yugau śrī-jīva-gopālakau*\n\n\"मैं छह गोस्वामियों—श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी, तथा श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी—को सादर नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने समस्त कुलीन संगति को तुच्छ मानकर त्याग दिया। निर्धन, बद्ध आत्माओं का उद्धार करने हेतु, उन्होंने कौपीन एवं चिथड़े स्वीकार कर लिए और भिक्षुक बन गए, किन्तु वे सदैव श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों के प्रेम के आनन्दमय समुद्र में निमग्न रहते थे, और वे सदैव उस समुद्र की लहरों में बारम्बार स्नान करते रहते थे।\"\n\n*kaupīna-kanthāśritau* शब्द इंगित करते हैं कि गोस्वामीगण केवल अधोवस्त्र एवं कौपीन धारण करते थे और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। दूसरे शब्दों में, उन्होंने भिक्षुकों के रूप में जीवन की निर्धनतम रीति को स्वीकार कर लिया। सामान्यतः, यदि कोई उच्च स्तर के अनुसार जीने का अभ्यस्त हो, तो वह तत्काल अपना स्तर नहीं गिरा सकता। यदि कोई धनी व्यक्ति ऐसी निर्धन स्थिति को स्वीकार कर ले, तो वह जीवित नहीं रह सकता, किन्तु गोस्वामीगण अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक रहते थे। यह कैसे सम्भव हुआ? *Gopī-bhāva-rasāmṛtābdhi-laharī-kallola-magnau muhur/ vande rūpa-sanātanau raghu-yugau śrī-jīva-gopālakau*. वे वास्तव में धनी थे क्योंकि वे निरन्तर गोपियों के प्रेम-प्रसंगों के समुद्र में स्वयं को निमग्न रखते थे। यदि कोई केवल श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों के प्रेम का चिन्तन करे, तो वह विलुप्त नहीं होता। श्रीकृष्ण को दृष्टि से ओझल न होने देने के अनेक उपाय हैं। यदि हम श्रीकृष्ण को दृष्टि से ओझल न होने दें, तो हम विलुप्त नहीं होंगे।\n\nकृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्ण को सर्वत्र देखता है, और वह प्रत्येक वस्तु को श्रीकृष्ण में देखता है। ऐसा व्यक्ति भले ही भौतिक प्रकृति की समस्त पृथक् अभिव्यक्तियों को देखता प्रतीत हो, किन्तु प्रत्येक एवं हर प्रसंग में वह श्रीकृष्ण के प्रति सचेत रहता है, यह जानते हुए कि प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण की ऊर्जा की अभिव्यक्ति है। श्रीकृष्ण के बिना कुछ भी विद्यमान नहीं रह सकता, और श्रीकृष्ण प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं—यही कृष्णभावनामृत का मूल सिद्धान्त है। भक्त यह कैसे जानता है कि प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण की ऊर्जा की अभिव्यक्ति है? सर्वप्रथम, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति एक दार्शनिक होता है। यदि वह किसी वृक्ष को देखता है, तो वह सोचता है, \"यह वृक्ष क्या है?\" तब वह देखता है कि वृक्ष के पास एक भौतिक शरीर है—जिस प्रकार उसके पास एक भौतिक शरीर है—और कि वृक्ष भी एक जीव है, किन्तु वृक्ष के पूर्व दुष्कर्मों के कारण उसे ऐसा निन्द्य शरीर प्राप्त हुआ है कि वह चल भी नहीं सकता। वृक्ष का शरीर भौतिक है, भौतिक ऊर्जा है, और भक्त स्वतः ही प्रश्न करता है, \"किसकी ऊर्जा? श्रीकृष्ण की ऊर्जा। अतः वृक्ष श्रीकृष्ण से जुड़ा है। जीव होने के कारण, वृक्ष श्रीकृष्ण का अभिन्न अंश है।\" इस प्रकार, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति वृक्ष को नहीं देखता, अपितु वहाँ उपस्थित श्रीकृष्ण को देखता है। यही कृष्णभावनामृत है: तुम वृक्ष को नहीं देखते। तुम श्रीकृष्ण को देखते हो। यही योग की सिद्धि है, और यही समाधि भी है।\n\nकृष्णभावनामृत श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम का विकास है—एक ऐसी स्थिति जो भौतिक मुक्ति से भी दिव्य है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति वृक्ष का ऐसा विचार क्यों करता है? क्योंकि उसे श्रीकृष्ण से प्रेम है। यदि तुम अपने बालक से प्रेम करते हो और तुम्हारा बालक दूर है, तो जब तुम उसके जूते देखते हो, तब तुम उसका स्मरण करते हो। तुम सोचते हो, \"ओह, यह मेरे प्रिय बालक का जूता है।\" ऐसा नहीं है कि तुम जूते से प्रेम करते हो, अपितु बालक से। किन्तु जूता उस प्रेम को जगा देता है। इसी प्रकार, ज्यों ही हम किसी जीव में श्रीकृष्ण की ऊर्जा को प्रकट होते देखते हैं, हम उस जीव से प्रेम करते हैं क्योंकि हम श्रीकृष्ण से प्रेम करते हैं। अतः, यदि हम श्रीकृष्ण से प्रेम करते हैं, तो सार्वभौम प्रेम का प्रश्न स्वतः सुलझ जाता है। अन्यथा \"सार्वभौम प्रेम\" निरर्थक है, क्योंकि श्रीकृष्ण से प्रेम किए बिना सबसे प्रेम करना सम्भव नहीं है। यदि हम श्रीकृष्ण से प्रेम करते हैं, तो सार्वभौम प्रेम स्वतः ही वहाँ विद्यमान रहता है। कृष्णभावनाभावित हुए बिना, कोई व्यक्ति कह सकता है, \"यह मेरा अमेरिकी भाई है, और यह मेरा भारतीय भाई है। अब आओ, इस गाय को खाएँ।\" ऐसा व्यक्ति अन्य मनुष्यों को भाई के रूप में देख सकता है, किन्तु गाय को भोजन के रूप में देखता है। क्या यह सार्वभौम प्रेम है? तथापि, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सोचता है, \"ओह, यह रही एक गाय। यह रहा एक कुत्ता। वे श्रीकृष्ण के अभिन्न अंश हैं, किन्तु किसी न किसी प्रकार उन्होंने भिन्न शरीर प्राप्त कर लिए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे मेरे भाई नहीं हैं। मैं अपने भाइयों को कैसे मारकर खा सकता हूँ?\" यही सच्चा सार्वभौम प्रेम है—जो श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम में निहित है। ऐसे कृष्णभावनामृत के बिना, प्रेम का प्रश्न ही नहीं उठता।\n\nकृष्णभावनामृत आत्म-साक्षात्कार से परे की अवस्था है, जिसमें भक्त इस अर्थ में श्रीकृष्ण से एक हो जाता है कि श्रीकृष्ण भक्त के लिए सब कुछ बन जाते हैं, और भक्त श्रीकृष्ण के प्रेम में परिपूर्ण हो जाता है। तब भगवान् एवं भक्त के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध विद्यमान रहता है। उस अवस्था में, जीव अपनी अमरता प्राप्त करता है। और न ही भगवान् कभी भक्त की दृष्टि से ओझल होते हैं। श्रीकृष्ण में विलीन हो जाना आध्यात्मिक विनाश है। भक्त ऐसा कोई संकट मोल नहीं लेता। ब्रह्म-संहिता (5.38) में कहा गया है,\n\n*premāñjana-cchurita-bhakti-vilocanena*\n\n*santaḥ sadaiva hṛdayeṣu vilokayanti*\n\n*yaṁ śyāmasundaram acintya-guṇa-svarūpaṁ*\n\n*govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi*\n\n\"मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जिन्हें वह भक्त सदैव देखता है जिसके नेत्र प्रेम के लेप से अनुलिप्त हैं। वे अपने नित्य श्यामसुन्दर रूप में, भक्त के हृदय के भीतर स्थित होकर, देखे जाते हैं।\" जिसने श्रीकृष्ण के प्रति ऐसा प्रेम विकसित कर लिया है, वह सदैव अपने हृदय के भीतर श्यामसुन्दर, कर्तामेशान को देखता है। इस अवस्था में, भगवान् श्रीकृष्ण कभी भक्त की दृष्टि से लुप्त नहीं होते, और न ही भक्त कभी भगवान् को दृष्टि से ओझल होने देता है। उस योगी के प्रसंग में, जो भगवान् को हृदय के भीतर परमात्मा के रूप में देखता है, यही बात लागू होती है। ऐसा योगी शुद्ध भक्त में परिणत हो जाता है और भगवान् को अपने भीतर देखे बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता।\n\nयही वह वास्तविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम ईश्वर को देख सकते हैं। ईश्वर हमारे आदेश-आपूर्तिकर्ता नहीं हैं। हम यह माँग नहीं कर सकते, \"आइए और अपने को प्रकट कीजिए।\" नहीं, हमें पहले स्वयं को योग्य बनाना होगा। तब हम प्रत्येक क्षण एवं सर्वत्र ईश्वर को देख सकते हैं।\n\n*sarva-bhūta-sthitaṁ yo māṁ*\n\n*bhajaty ekatvam āsthitaḥ*\n\n*sarvathā vartamāno 'pi*\n\n*sa yogī mayi vartate*\n\n\"जो योगी यह जानता है कि मैं तथा समस्त प्राणियों के भीतर स्थित परमात्मा एक हैं, वह सभी परिस्थितियों में मेरी आराधना करता है और सदैव मुझमें ही रहता है।\" (गीता 6.31)\n\nजो योगी परमात्मा पर ध्यान का अभ्यास कर रहा है, वह अपने भीतर श्रीकृष्ण के पूर्ण अंश को विष्णु के रूप में देखता है—चार भुजाओं सहित, शंख, चक्र, गदा एवं कमल-पुष्प धारण किए हुए। विष्णु की यह अभिव्यक्ति, जो योगी की एकाग्रता का विषय है, श्रीकृष्ण का पूर्ण अंश है। जैसा ब्रह्म-संहिता (5.48) में कहा गया है,\n\n*yasyaika-niśvasita-kālam athāvalambya*\n\n*jīvanti loma-vilajā jagad-aṇḍa-nāthāḥ*\n\n*viṣṇur mahān sa iha yasya kalā-viśeṣo*\n\n*govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi*\n\n\"लौकिक जगतों के ब्रह्मा तथा अन्य स्वामी महा-विष्णु के रोमकूपों से प्रकट होते हैं और उनके एक उच्छ्वास की अवधि तक जीवित रहते हैं। मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, क्योंकि महा-विष्णु उनके पूर्ण अंश का एक अंश हैं।\" *govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi* ** (\"मैं आदि भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ\") शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। *ādi* शब्द का अर्थ है \"मूल\", और *puruṣam* का अर्थ है \"आदि पुरुष के रूप में भगवान्, आदि भोक्ता\"। और ये गोविन्द कौन हैं जिनका पूर्ण अंश महा-विष्णु हैं? और महा-विष्णु का कार्य क्या है?\n\nप्रत्येक ब्रह्माण्ड में एक प्रमुख, मूल जीव होता है जो ब्रह्मा के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मा का जीवन ब्रह्माण्ड का जीवन है, और यह जीवन महा-विष्णु के केवल एक श्वास-काल (उच्छ्वास एवं निःश्वास) तक ही विद्यमान रहता है। महा-विष्णु कारण-समुद्र पर शयन करते हैं, और जब वे उच्छ्वास छोड़ते हैं, तब उनके शरीर से लाखों ब्रह्माण्ड बुलबुलों के समान निकलते हैं और फिर विकसित होते हैं। जब महा-विष्णु निःश्वास लेते हैं, तब ये लाखों ब्रह्माण्ड उनके भीतर लौट जाते हैं, और इसे विनाश की प्रक्रिया कहा जाता है। संक्षेप में, यही इन भौतिक ब्रह्माण्डों की स्थिति है: वे महा-विष्णु के शरीर से बाहर निकलते हैं और फिर पुनः लौट जाते हैं। *भगवद्गीता* के नवें अध्याय (9.7) में भी यह संकेत है कि ये भौतिक ब्रह्माण्ड एक निश्चित काल में प्रकट होते हैं और फिर विनष्ट हो जाते हैं।\n\n*sarva-bhūtāni kaunteya*\n\n*prakṛtiṁ yānti māmikām*\n\n*kalpa-kṣaye punas tāni*\n\n*kalpādau visṛjāmy aham*\n\n\"हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अन्त में, प्रत्येक भौतिक अभिव्यक्ति मेरी प्रकृति में प्रवेश कर जाती है, और दूसरे कल्प के आरम्भ में, मैं अपनी शक्ति से पुनः सृष्टि करता हूँ।\" इस भौतिक विश्व-प्रकटीकरण की सृष्टि, पालन तथा विनाश पूर्णतः भगवान् की परम इच्छा पर निर्भर हैं। \"कल्प के अन्त में\" का अर्थ है ब्रह्मा की मृत्यु के समय। ब्रह्मा एक सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं, और उनका एक दिन हमारे 4,30,00,00,000 पार्थिव वर्षों के बराबर आँका जाता है। उनकी रात्रि भी इतनी ही अवधि की होती है। उनका मास ऐसे तीस दिन-रातों से बनता है, और उनका वर्ष बारह मासों से। ऐसे एक सौ वर्षों के पश्चात्, जब ब्रह्मा की मृत्यु होती है, तब प्रलय अथवा विनाश होता है; इसका अर्थ है कि परमेश्वर द्वारा प्रकट की गई ऊर्जा पुनः उन्हीं में समेट ली जाती है। अर्थात्, महा-विष्णु निःश्वास लेते हैं। फिर पुनः, जब विश्व-जगत् को प्रकट करने की आवश्यकता होती है, तब यह उनकी इच्छा से किया जाता है: \"यद्यपि मैं एक हूँ, मैं अनेक बन जाऊँगा।\" यही वैदिक सूत्र है। वे स्वयं को इस भौतिक ऊर्जा में विस्तारित करते हैं, और सम्पूर्ण विश्व-प्रकटीकरण पुनः घटित होता है।\n\nक्योंकि भौतिक ब्रह्माण्डों की समग्र सृष्टि एवं विनाश महा-विष्णु के उच्छ्वास एवं निःश्वास पर निर्भर हैं, इसलिए हम उन महा-विष्णु की महिमा की कल्पना भी कठिनाई से कर सकते हैं। और तथापि यहाँ कहा गया है कि ये महा-विष्णु श्रीकृष्ण के, जो आदि गोविन्द हैं, पूर्ण अंश के पूर्ण अंश मात्र हैं। महा-विष्णु प्रत्येक ब्रह्माण्ड में गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में प्रवेश करते हैं, और गर्भोदकशायी विष्णु आगे क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में विस्तारित होते हैं, और यही विष्णु-रूप प्रत्येक जीव के हृदय में प्रवेश करता है। इस प्रकार, विष्णु सम्पूर्ण सृष्टि में प्रकट हैं। अतः योगी अपने मन को हृदय के भीतर क्षीरोदकशायी विष्णु-रूप पर एकाग्र करते हैं। जैसा *भगवद्गीता* के अन्तिम अध्याय (18.61) में कहा गया है,\n\n*īśvaraḥ sarva-bhūtānāṁ*\n\n*hṛd-deśe 'rjuna tiṣṭhati*\n\n*bhrāmayan sarva-bhūtāni*\n\n*yantrārūḍhāni māyayā*\n\n\"हे अर्जुन, परमेश्वर प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं, और समस्त जीवों के भ्रमण का निर्देशन करते हैं, जो भौतिक ऊर्जा से बने एक यन्त्र पर मानो आसीन हैं।\"\n\nअतः, योग-प्रक्रिया के अनुसार, योगी यह खोज निकालता है कि क्षीरोदकशायी विष्णु हृदय के भीतर कहाँ आसीन हैं, और जब वह वहाँ इस रूप को पा लेता है, तब वह उन पर एकाग्र होता है। योगी को जानना चाहिए कि यह विष्णु श्रीकृष्ण से भिन्न नहीं हैं। परमात्मा के इस रूप में श्रीकृष्ण प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त, जीवों के असंख्य हृदयों में उपस्थित असंख्य परमात्माओं के बीच कोई भेद नहीं है। उदाहरणार्थ, आकाश में केवल एक ही सूर्य है, किन्तु यह सूर्य जल से भरी लाखों बाल्टियों में प्रतिबिम्बित हो सकता है। अथवा, कोई लाखों-करोड़ों लोगों से पूछे, \"सूर्य कहाँ है?\" और प्रत्येक कहेगा, \"मेरे सिर के ऊपर।\" सूर्य एक है, किन्तु वह असंख्य बार प्रतिबिम्बित होता है। *वेदों* के अनुसार, जीव असंख्य हैं; उन्हें गिनने की कोई सम्भावना नहीं है। जिस प्रकार सूर्य जल से भरी असंख्य बाल्टियों में प्रतिबिम्बित हो सकता है, उसी प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु प्रत्येक एवं हर के हृदय में निवास कर सकते हैं। यही वह रूप है जो श्रीकृष्ण का पूर्ण अंश है, और यही वह रूप है जिस पर योगी एकाग्र होता है।\n\nजो कृष्णभावनामृत में संलग्न है, वह पहले से ही एक पूर्ण योगी है। वस्तुतः, श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा में सदैव संलग्न कृष्णभावनाभावित भक्त तथा परमात्मा पर ध्यान में संलग्न पूर्ण योगी के बीच कोई भेद नहीं है। समाधि में स्थित योगी (विष्णु-रूप पर ध्यान करते हुए तन्मय) तथा विभिन्न गतिविधियों में संलग्न कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के बीच कोई भेद नहीं है। भक्त—यद्यपि भौतिक अस्तित्व में रहते हुए विविध गतिविधियों में संलग्न रहता है—सदैव श्रीकृष्ण में स्थित रहता है। इसकी पुष्टि श्रील रूप गोस्वामी के *भक्ति-रसामृत-सिन्धु* में होती है: *nikhilāsv apy avasthāsu/ jīvan-muktaḥ sa ucyate*. भगवान् का भक्त, जो सदैव कृष्णभावनामृत में कार्य करता है, स्वतः ही मुक्त है। इसकी पुष्टि *भगवद्गीता* के चौदहवें अध्याय (14.26) में भी होती है:\n\n*māṁ ca yo 'vyabhicāreṇa*\n\n*bhakti-yogena sevate*\n\n*sa guṇān samatītyaitān*\n\n*brahma-bhūyāya kalpate*\n\n\"जो पूर्ण भक्ति-सेवा में संलग्न होता है, जो किसी भी परिस्थिति में पतित नहीं होता, वह तत्काल प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर पहुँच जाता है।\"\n\nइस प्रकार अनन्य भक्ति में संलग्न भक्त प्रकृति के भौतिक गुणों को पहले ही पार कर चुका होता है। ब्रह्म-स्तर पर स्थित होने का अर्थ है मुक्त होना। तीन स्तर हैं: देहिक अथवा ऐन्द्रिक; मानसिक; तथा आध्यात्मिक। आध्यात्मिक स्तर को ब्रह्म-स्तर कहा जाता है, और मुक्ति का अर्थ है उसी स्तर पर स्थित होना। बद्धजीव होने के कारण हम इस समय देहिक अथवा ऐन्द्रिक स्तर पर स्थित हैं। जो कुछ उन्नत हैं—कल्पनावादी, दार्शनिक—वे मानसिक स्तर पर स्थित हैं। इससे ऊपर मुक्ति का, ब्रह्म-साक्षात्कार का स्तर है।\n\nजो भक्त सदा कृष्णभावनामृत में कार्यरत रहता है, वह स्वतः ब्रह्म के मुक्त स्तर पर स्थित होता है—इसकी पुष्टि नारद-पञ्चरात्र में भी होती है:\n\ndik-kālādy-anavacchinne\n\nkṛṣṇe ceto vidhāya ca\n\ntan-mayo bhavati kṣipraṁ\n\njīvo brahmaṇi yojayet\n\n\"जो कृष्ण सर्वव्यापी तथा देश-काल से परे हैं, उनके दिव्य रूप पर अपना ध्यान केन्द्रित करने से मनुष्य कृष्ण के चिन्तन में तल्लीन हो जाता है और तब वह उनके साथ दिव्य संग के आनन्दमय स्तर को प्राप्त करता है।\"\n\nकृष्णभावनामृत योगाभ्यास में समाधि की सर्वोच्च अवस्था है। यह बोध ही कि कृष्ण प्रत्येक के हृदय में परमात्मा रूप में विद्यमान हैं, योगी को निर्दोष बनाता है। वेद भगवान् की इस अचिन्त्य शक्ति की पुष्टि इस प्रकार करते हैं:\n\neko 'pi san bahudhā yo 'vabhāti\n\naiśvaryād rūpaṁ ekaṁ ca sūrya vad bahudheyate\n\n\"विष्णु एक हैं, फिर भी वे निश्चय ही सर्वव्यापी हैं। अपनी अचिन्त्य शक्ति से, अपने एक ही रूप के होते हुए भी, वे सर्वत्र विद्यमान हैं। जैसे सूर्य एक ही समय में अनेक स्थानों पर प्रकट होता है।\"\n\nātmaupamyena sarvatra\n\nsamaṁ paśyati yo 'rjuna\n\nsukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ\n\nsa yogī paramo mataḥ\n\n\"हे अर्जुन! वही पूर्ण योगी है जो अपने स्वरूप की तुलना से समस्त प्राणियों की सच्ची समानता को, उनके सुख तथा दुःख दोनों में, देखता है।\" (गीता 6.32) यही सच्ची विश्वव्यापी दृष्टि है। ऐसा नहीं है कि भगवान् मेरे हृदय में विराजमान हों किन्तु कुत्ते, बिल्ली अथवा गाय के हृदय में नहीं। सर्व-भूतानाम् का अर्थ है कि वे समस्त जीवों के हृदय में विराजमान हैं, मनुष्य के हृदय में भी और चींटी के हृदय में भी। भेद केवल इतना है कि बिल्ली और कुत्ते इसे अनुभव नहीं कर सकते। मनुष्य यदि सांख्य-योग अथवा भक्ति-योग पद्धति का अनुसरण करने का प्रयत्न करे, तो वह समझ सकता है, और यही मानव-जीवन का विशेषाधिकार है। यदि हम इस अवसर को गँवा दें, तो हम महान् हानि उठाते हैं, क्योंकि हमने विकास-प्रक्रिया से होकर तथा इस मानव-रूप को प्राप्त करने हेतु अस्सी लाख से अधिक योनियों से गुज़रकर यह शरीर पाया है। अतः हमें इसके प्रति सचेत रहना चाहिए और सावधान रहना चाहिए कि यह अवसर हाथ से न निकल जाए। हमारे पास उत्तम शरीर है, मानव-रूप, तथा बुद्धि एवं सभ्यता। हमें पशुओं की भाँति जीवन नहीं बिताना चाहिए और अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष नहीं करना चाहिए, अपितु अपने समय का उपयोग शान्तिपूर्वक चिन्तन करते हुए तथा परमेश्वर से अपने सम्बन्ध को समझते हुए करना चाहिए। यही भगवद्गीता की शिक्षा है: इस अवसर को मत खोओ; इसका भली-भाँति उपयोग करो।"}
{"ref": "pop/7", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/7/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "आधुनिक युग के लिए योग", "purport": "arjuna uvāca\n\nyo 'yaṁ yogas tvayā proktaḥ\n\nsāmyena madhusūdana\n\netasyāhaṁ na paśyāmi\n\ncañcalatvāt sthitiṁ sthirām\n\n\"अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन, जिस योग-पद्धति का आपने सार प्रस्तुत किया है, वह मुझे अव्यावहारिक तथा असह्य प्रतीत होती है, क्योंकि मन चंचल तथा अस्थिर है।\" (गीता 6.33)\n\nयह उस अष्टांग-योग की आठ-अंगीय पद्धति की निर्णायक कसौटी है, जिसका वर्णन यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने किया है। पहले ही समझाया जा चुका है कि मनुष्य को एक विशेष रीति से बैठना होता है और हृदय में स्थित विष्णु के रूप पर मन एकाग्र करना होता है। अष्टांग-योग पद्धति के अनुसार, सर्वप्रथम मनुष्य को इन्द्रियों का संयम करना होता है, समस्त नियमों का पालन करना होता है, आसन तथा प्राणायाम-प्रक्रिया का अभ्यास करना होता है, हृदय के भीतर विष्णु के रूप पर मन एकाग्र करना होता है, और तब उस रूप में तल्लीन हो जाना होता है। इस अष्टांग-योग पद्धति में आठ प्रक्रियाएँ हैं, किन्तु यहाँ अर्जुन स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह अष्टांग-योग पद्धति अत्यन्त कठिन है। वस्तुतः वे कहते हैं कि यह \"मुझे अव्यावहारिक तथा असह्य प्रतीत होती है।\"\n\nवास्तव में अष्टांग-योग पद्धति अव्यावहारिक नहीं है, क्योंकि यदि यह अव्यावहारिक होती, तो भगवान् श्रीकृष्ण इसका वर्णन करने में इतना श्रम न उठाते। यह अव्यावहारिक नहीं है, अपितु अव्यावहारिक प्रतीत होती है। जो एक मनुष्य के लिए अव्यावहारिक हो, वह दूसरे के लिए व्यावहारिक हो सकता है। अर्जुन इस अर्थ में सामान्य मनुष्य के प्रतिनिधि हैं कि वे न तो भिक्षुक हैं, न संन्यासी, न विद्वान्। वे अपने राज्य के लिए युद्धभूमि में लड़ रहे हैं, और इस अर्थ में वे एक सांसारिक कार्य में संलग्न एक साधारण मनुष्य हैं। वे जीविका कमाने, अपने परिवार का भरण-पोषण करने इत्यादि से चिन्तित हैं। अर्जुन के समक्ष अनेक समस्याएँ हैं, ठीक जैसे सामान्य मनुष्य के समक्ष होती हैं, और सामान्यतः यह अष्टांग-योग पद्धति साधारण सामान्य मनुष्य के लिए अव्यावहारिक है। यही बात यहाँ कही जा रही है। यह उसके लिए व्यावहारिक है जो पहले ही सब कुछ पूर्णतः त्याग चुका है और किसी पर्वत की तलहटी में अथवा गुफा में किसी एकान्त, पवित्र स्थान पर बैठ सकता है। किन्तु इस युग में ऐसा कौन कर सकता है? यद्यपि अर्जुन एक महान् योद्धा, राजकुल के सदस्य तथा अत्यन्त उन्नत व्यक्ति थे, फिर भी वे इस योग-पद्धति को अव्यावहारिक घोषित करते हैं। और अर्जुन की तुलना में हम क्या हैं? यदि हम इस पद्धति का प्रयत्न करें, तो असफलता निश्चित है।\n\nअतः रहस्यवाद की यह पद्धति, जिसका वर्णन भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से शुचौ देशे शब्दों से आरम्भ करके योगी परमः शब्दों पर समाप्त करते हुए किया, यहाँ अर्जुन द्वारा अपनी असमर्थता के भाव से अस्वीकार कर दी जाती है। जैसा पहले कहा जा चुका है, इस कलियुग में किसी सामान्य मनुष्य के लिए यह सम्भव नहीं कि वह घर छोड़कर पर्वतों अथवा जंगलों में किसी एकान्त स्थान पर जाकर योगाभ्यास करे। वर्तमान युग की विशेषता है अल्पकालिक जीवन के लिए घोर संघर्ष। ज्यों-ज्यों कलियुग आगे बढ़ता है, हमारी आयु छोटी से छोटी होती जाती है। हमारे पूर्वज सौ वर्ष अथवा उससे अधिक जीते थे, किन्तु अब लोग साठ या सत्तर वर्ष की आयु में ही मर जाते हैं। क्रमशः आयु और भी घटती जाएगी। इस युग में स्मृति, करुणा तथा अन्य सद्गुण भी क्षीण होते जाएँगे।\n\nकलियुग में लोग सरल, व्यावहारिक उपायों से भी आत्म-साक्षात्कार के प्रति गम्भीर नहीं हैं, फिर इस कठिन योग-पद्धति की तो बात ही क्या, जो रहन-सहन के ढंग, बैठने की रीति, स्थान के चयन तथा भौतिक प्रवृत्तियों से मन की अनासक्ति का नियमन करती है। एक व्यावहारिक मनुष्य के रूप में अर्जुन ने सोचा कि इस योग-पद्धति का अनुसरण करना असम्भव है, यद्यपि वे अनेक प्रकार से अनुकूल रूप से सम्पन्न थे। वे एक छद्म योगी बनकर कुछ व्यायाम-कौशल का अभ्यास करने को तैयार नहीं थे। वे ढोंगी नहीं, अपितु एक योद्धा तथा एक गृहस्थ थे। अतः उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उनके लिए यह योग-पद्धति समय की बर्बादी होगी। अर्जुन राजकुल के थे और अनेक गुणों के कारण अत्यन्त उन्नत थे; वे एक महान् योद्धा थे, उनकी आयु दीर्घ थी, और सबसे बढ़कर, वे भगवान् श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र थे। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व, जब अर्जुन जीवित थे, तब आयु अत्यन्त दीर्घ थी। उस समय लोग एक हज़ार वर्ष तक जीते थे। वर्तमान कलियुग में आयु सौ वर्ष तक सीमित है; द्वापर-युग में आयु एक हज़ार वर्ष थी; त्रेता-युग में आयु दस हज़ार वर्ष थी; और सत्य-युग में आयु एक लाख वर्ष थी। इस प्रकार ज्यों-ज्यों युग अधोगति को प्राप्त होते हैं, आयु घटती जाती है। यद्यपि अर्जुन ऐसे समय में जीवित थे जब मनुष्य एक हज़ार वर्ष तक जीकर ध्यानाभ्यास कर सकता था, फिर भी उन्होंने इस पद्धति को असम्भव माना।\n\nपाँच हज़ार वर्ष पूर्व अर्जुन के पास अब हमसे कहीं उत्तम सुविधाएँ थीं, फिर भी उन्होंने इस योग-पद्धति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वस्तुतः इतिहास में हमें कहीं भी ऐसा कोई अभिलेख नहीं मिलता कि उन्होंने कभी इसका अभ्यास किया हो। अतः इस पद्धति को इस कलियुग में सामान्यतः असम्भव ही मानना चाहिए। निःसन्देह, यह कुछ अत्यन्त विरले, दुर्लभ मनुष्यों के लिए सम्भव हो सकती है, किन्तु जनसामान्य के लिए यह एक असम्भव प्रस्ताव है। यदि पाँच हज़ार वर्ष पूर्व यह स्थिति थी, तो वर्तमान काल की तो बात ही क्या? जो लोग विभिन्न तथाकथित विद्यालयों तथा समाजों में इस योग-पद्धति का अनुकरण कर रहे हैं, वे यद्यपि आत्मसन्तुष्ट हैं, फिर भी निश्चय ही अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। वे अभीष्ट लक्ष्य से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं।\n\nचूँकि यह अष्टांग-योग पद्धति असम्भव मानी जाती है, अतः सबके लिए भक्ति-योग पद्धति की अनुशंसा की जाती है। बिना किसी प्रशिक्षण अथवा शिक्षा के, मनुष्य स्वतः भक्ति-योग में भाग ले सकता है। एक छोटा बालक भी कीर्तन में ताली बजा सकता है। अतः भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भक्ति-योग को इस युग के लिए एकमात्र व्यावहारिक पद्धति घोषित किया है।\n\nharer nāma harer nāma\n\nharer nāmaiva kevalam\n\nkalau nāsty eva nāsty eva\n\nnāsty eva gatir anyathā\n\n[Adi 17.21]\n\n\"इस कलह तथा कपट के युग में उद्धार का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का जप है। अन्य कोई मार्ग नहीं। अन्य कोई मार्ग नहीं। अन्य कोई मार्ग नहीं।\" जप अत्यन्त सरल है, और मनुष्य तुरन्त फल का अनुभव करेगा। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यम्। यदि हम अन्य योग-पद्धतियों का अभ्यास करने का प्रयत्न करें, तो हम अन्धकार में ही रहेंगे; हमें यह ज्ञात नहीं होगा कि हम उन्नति कर रहे हैं या नहीं। भक्ति-योग में मनुष्य समझ सकता है, \"हाँ, अब मैं उन्नति कर रहा हूँ।\" यही एकमात्र योग-पद्धति है जिससे मनुष्य इसी जीवन में शीघ्र आत्म-साक्षात्कार तथा मुक्ति प्राप्त कर सकता है। उसे किसी अन्य जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।\n\ncañcalaṁ hi manaḥ kṛṣṇa\n\npramāthi balavad dṛḍham\n\ntasyāhaṁ nigrahaṁ manye\n\nvāyor iva suduṣkaram\n\n\"क्योंकि हे कृष्ण, मन चंचल, उद्धत, हठी तथा अत्यन्त बलवान् है, और मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उसका दमन करना वायु को वश में करने से भी अधिक कठिन है।\" (गीता 6.34) हरे कृष्ण का जप करके मनुष्य तुरन्त मन को वश में कर लेता है। केवल कृष्ण नाम का उच्चारण करके तथा उसे सुनकर, मन स्वतः कृष्ण पर केन्द्रित हो जाता है। इसका अर्थ है कि योग-पद्धति तुरन्त प्राप्त हो जाती है। समूची योग-पद्धति का लक्ष्य विष्णु के रूप पर एकाग्रता है, और कृष्ण वही आदि पुरुष हैं जिनसे ये समस्त विष्णु-रूप विस्तृत होते हैं। कृष्ण उस आदि दीपक के समान हैं जिससे अन्य समस्त दीपक प्रज्वलित होते हैं। यदि एक दीपक प्रज्वलित हो, तो मनुष्य कितने ही दीपक जला सकता है, और इसमें सन्देह नहीं कि प्रत्येक दीपक आदि दीपक के समान ही शक्तिशाली है। तथापि, मनुष्य को आदि दीपक को आदि के रूप में पहचानना चाहिए। इसी प्रकार, कृष्ण से लाखों विष्णु-रूप विस्तृत होते हैं, और प्रत्येक विष्णु-रूप कृष्ण के समान ही है, किन्तु कृष्ण आदि बने रहते हैं। इस प्रकार जो अपना मन भगवान् श्रीकृष्ण, आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पर केन्द्रित करता है, वह तुरन्त योग की सिद्धि प्राप्त कर लेता है।\n\nśrī-bhagavān uvāca\n\nasaṁśayaṁ mahā-bāho\n\nmano durnigrahaṁ calam\n\nabhyāsena tu kaunteya\n\nvairāgyeṇa ca gṛhyate\n\n\"श्रीभगवान् ने कहा: हे महाबाहु कुन्तीपुत्र, निःसन्देह चंचल मन को रोकना अत्यन्त कठिन है, किन्तु यह निरन्तर अभ्यास तथा वैराग्य से सम्भव है।\" (गीता 6.35) कृष्ण यह नहीं कहते कि यह कठिन नहीं है। अपितु वे स्वीकार करते हैं कि यह कठिन है, किन्तु निरन्तर अभ्यास के साधन से सम्भव है। निरन्तर अभ्यास का अर्थ है स्वयं को ऐसी कुछ प्रवृत्तियों में संलग्न करना जो हमें कृष्ण का स्मरण कराएँ। इस कृष्णभावनामृत संघ में, इसीलिए हमारी अनेक प्रवृत्तियाँ हैं—कीर्तन, मन्दिर-सम्बन्धी कार्य, प्रसाद, प्रकाशन इत्यादि। प्रत्येक व्यक्ति कृष्ण को केन्द्र में रखकर किसी न किसी प्रवृत्ति में संलग्न है। अतः चाहे कोई कृष्ण के लिए टंकण कर रहा हो, कृष्ण के लिए पाक बना रहा हो, कृष्ण के लिए जप कर रहा हो, अथवा कृष्ण के लिए साहित्य वितरित कर रहा हो, वह योग-पद्धति में है, और वह कृष्ण में भी है। हम भौतिक जीवन की भाँति ही प्रवृत्तियों में संलग्न होते हैं, किन्तु ये प्रवृत्तियाँ इस प्रकार ढाली जाती हैं कि वे सीधे कृष्ण से जुड़ी रहती हैं। इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्ति के माध्यम से कृष्णभावनामृत सम्भव है, और योग की सिद्धि स्वतः अनुसरण करती है।\n\nasaṁyatātmanā yogo\n\nduṣprāpa iti me matiḥ\n\nvaśyātmanā tu yatatā\n\nśakyo 'vāptum upāyataḥ\n\n\"जिसका मन अनियन्त्रित है, उसके लिए आत्म-साक्षात्कार कठिन कार्य है। किन्तु जिसका मन वश में है और जो उचित साधनों से प्रयत्न करता है, उसकी सफलता निश्चित है। यह मेरा मत है।\" (गीता 6.36) पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् घोषित करते हैं कि जो मनुष्य भौतिक प्रवृत्ति से मन को विरक्त करने हेतु उचित उपचार स्वीकार नहीं करता, वह आत्म-साक्षात्कार में सफलता कठिनता से ही प्राप्त कर सकता है। मन को भौतिक भोग में संलग्न रखते हुए योगाभ्यास करने का प्रयत्न उस अग्नि को प्रज्वलित करने के प्रयत्न के समान है जिस पर जल डाला जा रहा हो। इसी प्रकार, मानसिक संयम के बिना योगाभ्यास समय की बर्बादी है। मैं ध्यान करने बैठ सकता हूँ और अपने मन को कृष्ण पर केन्द्रित कर सकता हूँ, और यह अत्यन्त प्रशंसनीय है, किन्तु अनेक ऐसे योग-समाज हैं जो अपने शिष्यों को शून्य पर अथवा किसी रंग पर एकाग्रता सिखाते हैं। अर्थात्, वे विष्णु के रूप पर एकाग्रता की अनुशंसा नहीं करते। मन को निर्विशेष पर अथवा शून्य पर एकाग्र करने का प्रयत्न अत्यन्त कठिन तथा कष्टकर है। इसे श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के बारहवें अध्याय (12.5) में कहा है,\n\nkleśo 'dhikataras teṣām\n\navyaktāsakta-cetasām\n\navyaktā hi gatir duḥkhaṁ\n\ndehavadbhir avāpyate\n\n\"जिनके मन परम के अव्यक्त, निराकार पक्ष में आसक्त हैं, उनके लिए उन्नति अत्यन्त कष्टकर है। उस अनुशासन में प्रगति करना देहधारियों के लिए सदा कठिन होता है।\"\n\nमन्दिर में भक्त कृष्ण के रूप पर एकाग्र होने का प्रयत्न करता है। शून्यता पर, शून्य पर एकाग्र होना अत्यन्त कठिन है, और स्वाभाविक रूप से मन अत्यन्त चंचल रहता है। अतः शून्य पर एकाग्र होने के स्थान पर मन कुछ और ही खोजने लगता है। मन को किसी न किसी वस्तु के चिन्तन में संलग्न रहना ही होता है, और यदि वह कृष्ण का चिन्तन नहीं कर रहा, तो उसे माया का चिन्तन करना ही होगा। अतः निराकार शून्य पर छद्म-ध्यान केवल समय की बर्बादी है। योगाभ्यास का ऐसा प्रदर्शन भौतिक रूप से लाभदायक हो सकता है, किन्तु जहाँ तक आध्यात्मिक साक्षात्कार का प्रश्न है, यह निरर्थक है। मैं योगिक ध्यान की एक कक्षा खोल सकता हूँ और लोगों से इस बात के लिए धन वसूल सकता हूँ कि वे बैठकर अपनी नाक को इधर-उधर दबाएँ, किन्तु यदि मेरे शिष्य योगाभ्यास के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त न करें, तो उन्होंने अपना समय तथा धन बर्बाद किया, और मैंने उन्हें ठगा।\n\nअतः मनुष्य को अपना मन स्थिर तथा निरन्तर रूप से विष्णु के रूप पर एकाग्र करना होता है, और इसी को समाधि कहते हैं। कृष्णभावनामृत में, मन को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में निरन्तर संलग्न करके वश में किया जाता है। जब तक मनुष्य कृष्णभावनामृत में संलग्न नहीं है, वह स्थिर रूप से मन को वश में नहीं कर सकता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति बिना किसी पृथक् प्रयास के योगाभ्यास का फल सहज ही प्राप्त कर लेता है, किन्तु योग का अभ्यासी कृष्णभावनाभावित हुए बिना सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।"}
{"ref": "pop/8", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/8/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "योग में असफलता तथा सफलता", "purport": "मान लीजिए मैं अपना व्यवसाय, अपना सामान्य पेशा छोड़ देता हूँ, और योग का, वास्तविक योग का, जैसा यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है, अभ्यास करने लगता हूँ। मान लीजिए मैं अभ्यास करता हूँ, और किसी न किसी कारण असफल हो जाता हूँ; मैं इस प्रक्रिया को भली-भाँति पूर्ण नहीं कर पाता। तब, इसका क्या परिणाम होता है? यही अर्जुन का अगला प्रश्न है।\n\narjuna uvāca\n\nayatiḥ śraddhayopeto\n\nyogāc calita-mānasaḥ\n\naprāpya yoga-saṁsiddhiṁ\n\nkāṁ gatiṁ kṛṣṇa gacchati\n\n\"अर्जुन ने कहा: उस श्रद्धावान् मनुष्य की क्या गति होती है जो दृढ़तापूर्वक प्रयत्न नहीं करता, जो आरम्भ में आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया को अपनाता है किन्तु बाद में सांसारिक चित्तवृत्ति के कारण उससे विरत हो जाता है और इस प्रकार रहस्यवाद में सिद्धि प्राप्त नहीं करता?\" (गीता 6.37)\n\nआत्म-साक्षात्कार के, रहस्यवाद के मार्ग का वर्णन भगवद्गीता में किया गया है। आत्म-साक्षात्कार का मूल सिद्धान्त यह जानना है कि \"मैं यह भौतिक शरीर नहीं हूँ अपितु इससे भिन्न हूँ, और मेरा सुख नित्य जीवन, आनन्द तथा ज्ञान में है।\" आत्म-साक्षात्कार के बिन्दु पर पहुँचने से पूर्व, मनुष्य को यह स्वीकार करना होता है कि वह यह शरीर नहीं है। यही पाठ भगवद्गीता के प्रारम्भ में ही पढ़ाया जाता है: जीव यह भौतिक शरीर नहीं है अपितु कुछ भिन्न है, और उसका सुख नित्य जीवन में है।\n\nस्पष्ट है कि यह जीवन नित्य नहीं है। योग की सिद्धि का अर्थ है ज्ञान से परिपूर्ण आनन्दमय, नित्य जीवन को प्राप्त करना। समस्त योग-पद्धतियों का सम्पादन उसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मनुष्य चर्बी घटाने के लिए अथवा शरीर को इन्द्रियतृप्ति के योग्य रखने के लिए योग-कक्षाओं में जाए। यह योग का लक्ष्य नहीं है, किन्तु लोगों को इसी प्रकार सिखाया जाता है क्योंकि वे ठगा जाना चाहते हैं। वास्तव में, यदि आप कोई भी व्यायाम-क्रम करें, तो आपका शरीर स्वस्थ रहेगा। शारीरिक व्यायाम की अनेक पद्धतियाँ हैं—भार उठाना तथा अन्य खेलकूद—और वे शरीर को स्वस्थ रखने, चर्बी घटाने तथा पाचन-तन्त्र को सहायता पहुँचाने में सहायक होती हैं। अतः इन प्रयोजनों के लिए योगाभ्यास करने की कोई आवश्यकता नहीं। योगाभ्यास का वास्तविक प्रयोजन यह अनुभव करना है कि मैं यह शरीर नहीं हूँ। मुझे नित्य सुख, पूर्ण ज्ञान तथा नित्य जीवन चाहिए—यही सच्ची योग-पद्धति का परम लक्ष्य है।\n\nयोग का लक्ष्य दिव्य है, शरीर तथा मन दोनों से परे। आत्म-साक्षात्कार तीन विधियों से खोजा जाता है: (1) ज्ञान का मार्ग (ज्ञान); (2) आठ-अंगीय पद्धति का मार्ग; अथवा (3) भक्ति-योग का मार्ग। इनमें से प्रत्येक प्रक्रिया में, मनुष्य को जीव की स्वरूपगत स्थिति, भगवान् से उसके सम्बन्ध, तथा उन प्रवृत्तियों को अनुभव करना होता है जिनसे वह खोई हुई कड़ी को पुनः स्थापित कर सके और कृष्णभावनामृत के सर्वोच्च सिद्ध-स्तर को प्राप्त कर सके। उपर्युक्त तीन विधियों में से किसी का अनुसरण करते हुए, मनुष्य देर-सवेर परम लक्ष्य तक अवश्य पहुँचता है। यह भगवान् ने दूसरे अध्याय में दृढ़ता से कहा: दिव्य मार्ग पर थोड़ा-सा भी प्रयत्न उद्धार की महान् आशा प्रदान करता है।\n\nइन तीन विधियों में से, भक्ति-योग का मार्ग इस युग के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि यह ईश्वर-साक्षात्कार की सर्वाधिक प्रत्यक्ष विधि है। दुगुनी पुष्टि के लिए, अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से उनके पूर्व कथन की पुष्टि करने को कह रहे हैं। मनुष्य भले ही ईमानदारी से आत्म-साक्षात्कार का मार्ग स्वीकार कर ले, किन्तु ज्ञान-संवर्धन (ज्ञान) की प्रक्रिया तथा आठ-अंगीय योग-पद्धति का अभ्यास सामान्यतः इस युग के लिए अत्यन्त कठिन हैं। अतः निरन्तर प्रयत्न के बावजूद, मनुष्य अनेक कारणों से असफल हो सकता है। सर्वप्रथम, हो सकता है मनुष्य वस्तुतः उस प्रक्रिया, उन नियमों का अनुसरण ही न कर रहा हो। दिव्य मार्ग का अनुसरण करना कमोबेश मायाशक्ति के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करना है। जब हम आत्म-साक्षात्कार की कोई भी प्रक्रिया स्वीकार करते हैं, तब हम वस्तुतः माया, भ्रम के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर रहे होते हैं, और माया निश्चय ही हमारे समक्ष अनेक कठिनाइयाँ रखेगी। अतः असफलता की सम्भावना है, किन्तु मनुष्य को अत्यन्त स्थिर हो जाना चाहिए। जब भी कोई व्यक्ति मायाशक्ति के बन्धन से बचने का प्रयत्न करता है, वह विविध प्रलोभनों से उस अभ्यासी को परास्त करने का प्रयत्न करती है। बद्धजीव तो भौतिक शक्ति के गुणों से पहले ही मोहित रहता है, और दिव्य अनुशासनों का सम्पादन करते समय भी पुनः मोहित होने की पूरी सम्भावना रहती है। इसे योगाच् चलित-मानसः कहते हैं: दिव्य मार्ग से विचलन। अर्जुन आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से विचलन के परिणाम जानने को उत्सुक हैं।\n\nजैसा कि भगवद्गीता (6.37) में, जिसे ऊपर उद्धृत किया गया है, कहा गया है, योगात् का अर्थ है \"योगाभ्यास से\", चलित का अर्थ है \"विचलन\", और मानसः का अर्थ है \"मन\"। अतः मन के योगाभ्यास से विचलित होने की पूरी सम्भावना है। हम सबको कुछ-न-कुछ यह अनुभव है कि किसी पुस्तक को पढ़ते हुए एकाग्र होने का प्रयत्न करते समय हमारा मन इतना विचलित रहता है कि वह हमें उस पुस्तक पर एकाग्र नहीं होने देता।\n\nवस्तुतः अर्जुन एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछ रहे हैं, क्योंकि सभी प्रकार के योग में मनुष्य असफलता का पात्र हो सकता है—चाहे वह आठ-अंगीय योग-पद्धति हो, कल्पनात्मक दर्शन की ज्ञान-योग पद्धति हो, अथवा भक्ति की भक्ति-योग पद्धति हो। इनमें से किसी भी मार्ग पर असफलता सम्भव है, और असफलता के परिणामों को स्वयं श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ निम्नलिखित संवाद (गीता 6.38–44) में स्पष्ट रूप से समझाया है। अर्जुन, अपनी जिज्ञासा को आगे बढ़ाते हुए, पूछते हैं,\n\nkaccin nobhaya-vibhraṣṭaś\n\nchinnābhram iva naśyati\n\napratiṣṭho mahā-bāho\n\nvimūḍho brahmaṇaḥ pathi\n\n\"हे महाबाहु कृष्ण, क्या ऐसा मनुष्य, जो दिव्यता के मार्ग से विचलित हो गया है, किसी भी क्षेत्र में स्थान न पाकर छिन्न बादल की भाँति नष्ट नहीं हो जाता?\"\n\netan me saṁśayaṁ kṛṣṇa\n\nchettum arhasy aśeṣataḥ\n\ntvad-anyaḥ saṁśayasyāsya\n\nchettā na hy upapadyate\n\n\"हे कृष्ण, यह मेरा सन्देह है, और मैं आपसे इसे पूर्णतः दूर करने की प्रार्थना करता हूँ। आपके अतिरिक्त, ऐसा कोई नहीं मिलता जो इस सन्देह का नाश कर सके।\"\n\nśrī-bhaga vān uvāca\n\npārtha naiveha nāmutra\n\nvināśas tasya vidyate\n\nna hi kalyāṇa-kṛt kaścid\n\ndurgatiṁ tāta gacchati\n\n\"श्रीभगवान् ने कहा: हे पृथापुत्र, शुभ कर्मों में संलग्न दिव्यवादी का न तो इस लोक में और न ही आध्यात्मिक जगत् में विनाश होता है; हे मित्र, जो भलाई करता है, वह कभी बुराई से परास्त नहीं होता।\"\n\nprāpya puṇya-kṛtāṁ lokān\n\nuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ\n\nśucīnāṁ śrīmatāṁ gehe\n\nyoga-bhraṣṭo 'bhijāyate\n\n[Bg. 6.41]\n\n\"असफल योगी, पुण्यात्मा जीवों के लोकों में अनेकानेक वर्षों के भोग के पश्चात्, धर्मात्मा लोगों के कुल में, अथवा धनी कुलीन परिवार में जन्म लेता है।\"\n\natha vā yoginām eva\n\nkule bhavati dhīmatām\n\netad dhi durlabhataraṁ\n\nloke janma yad īdṛśam\n\n[Bg. 6.42]\n\n\"अथवा वह ऐसे दिव्यवादियों के कुल में जन्म लेता है जो निश्चय ही महान् बुद्धिमान् होते हैं। वस्तुतः, ऐसा जन्म इस संसार में दुर्लभ है।\"\n\ntatra taṁ buddhi-saṁyogaṁ\n\nlabhate paurva-dehikam\n\nyatate ca tato bhūyaḥ\n\nsaṁsiddhau kuru-nandana\n\n[Bg. 6.43]\n\n\"हे कुरुनन्दन, ऐसा जन्म प्राप्त करके, वह अपने पूर्व जीवन की दिव्य चेतना को पुनः जाग्रत करता है, और पूर्ण सफलता प्राप्त करने हेतु और अधिक उन्नति करने का प्रयत्न करता है।\"\n\npūrvābhyāsena tenaiva\n\nhriyate hy avaśo 'pi saḥ\n\njijñāsur api yogasya\n\nśabda-brahmātivartate\n\n\"अपने पूर्व जीवन की दिव्य चेतना के बल पर, वह स्वतः ही योगिक सिद्धान्तों की ओर आकृष्ट हो जाता है—उन्हें खोजे बिना भी। योग के लिए प्रयत्नशील ऐसा जिज्ञासु दिव्यवादी सदा शास्त्रों के कर्मकाण्डी सिद्धान्तों से ऊपर रहता है।\"\n\nचेतना की शुद्धि ही इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रयोजन है। इस समय हम इस दिव्य चेतना को तैयार कर रहे हैं, क्योंकि मृत्यु के समय हमारी चेतना हमारे साथ जाती है। चेतना शरीर से उसी प्रकार वहन की जाती है जैसे किसी पुष्प की सुगन्ध वायु द्वारा वहन की जाती है। जब हम मरते हैं, तब पाँच तत्त्वों—पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश—से बना यह भौतिक शरीर विघटित हो जाता है, और स्थूल पदार्थ अपने तत्त्वों में लौट जाते हैं। अथवा, जैसा ईसाई बाइबल कहती है, \"तू धूल है, और धूल में ही लौट जाएगा।\" कुछ समाजों में शरीर जलाया जाता है, अन्यों में गाड़ा जाता है, और अन्यों में पशुओं के समक्ष डाल दिया जाता है। भारत में, हिन्दू शरीर को जलाते हैं, और इस प्रकार शरीर भस्म में परिणत हो जाता है। भस्म तो केवल पृथ्वी का ही दूसरा रूप है। ईसाई शरीर को गाड़ते हैं, और कुछ काल समाधि में रहने के पश्चात्, शरीर अन्ततः धूल में बदल जाता है, जो भस्म की भाँति, पुनः पृथ्वी का ही दूसरा रूप है। अन्य समाज भी हैं—जैसे भारत में पारसी समुदाय—जो शरीर को न जलाते हैं, न गाड़ते हैं, अपितु उसे गिद्धों के समक्ष डाल देते हैं, और गिद्ध तुरन्त शरीर को खाने आ जाते हैं, और तब शरीर अन्ततः मल में परिणत हो जाता है। अतः किसी भी स्थिति में, यह सुन्दर शरीर, जिसे हम साबुन लगाते तथा इतने यत्न से सँभालते हैं, अन्ततः या तो मल, या भस्म, या धूल में बदल जाएगा।\n\nमृत्यु के समय सूक्ष्म तत्त्व (मन, बुद्धि तथा अहंकार), जो मिलकर चेतना कहलाते हैं, आत्मा के उस लघु कण को अपने कर्म के अनुसार दुःख भोगने अथवा सुख भोगने के लिए दूसरे शरीर में ले जाते हैं। हमारी चेतना हमारे कर्म से ढलती है। यदि हम मल के संग में रहें, तो हमारी चेतना, जो वायु के समान है, मल की सुगन्ध वहन करेगी, और इस प्रकार मृत्यु के समय हमें किसी अवांछित शरीर में ले जाएगी। अथवा, यदि चेतना गुलाबों के ऊपर से गुज़रे, तो वह गुलाबों की सुगन्ध वहन करती है, और इस प्रकार हम ऐसे शरीर में पहुँचाए जाते हैं जहाँ हम अपने पूर्व कर्म के फल का भोग कर सकें। यदि हम स्वयं को कृष्णभावनामृत में कार्य करने हेतु प्रशिक्षित करें, तो हमारी चेतना हमें कृष्ण के पास ले जाएगी। विभिन्न प्रकार के शरीर चेतना के अनुसार विकसित होते हैं; अतः, यदि हम अपनी चेतना को योगिक सिद्धान्तों के अनुसार प्रशिक्षित करें, तो हमें ऐसा शरीर प्राप्त होगा जहाँ हम योगाभ्यास कर सकें। हमें उत्तम माता-पिता तथा योग-पद्धति का अभ्यास करने का अवसर मिलेगा, और स्वतः ही हम अपने पूर्व शरीर में अभ्यस्त कृष्णभावनामृत को पुनः जाग्रत करने में समर्थ होंगे। अतः इस अन्तिम श्लोक में कहा गया है, \"अपने पूर्व जीवन की दिव्य चेतना के बल पर, वह स्वतः ही योगिक सिद्धान्तों की ओर आकृष्ट हो जाता है—उन्हें खोजे बिना भी।\" अतः हमारा वर्तमान कर्तव्य दिव्य चेतना का संवर्धन करना है। यदि हमें दिव्य जीवन, आध्यात्मिक उन्नति, तथा ज्ञान से परिपूर्ण नित्य, आनन्दमय जीवन चाहिए—दूसरे शब्दों में, यदि हमें घर वापस, भगवद्धाम वापस जाना है—तो हमें स्वयं को दिव्य चेतना, अथवा कृष्णभावनामृत में प्रशिक्षित करना होगा।\n\nयह सहज ही संग के द्वारा किया जा सकता है (सङ्गात् सञ्जायते कामः)। दिव्य संग के द्वारा हमारी चेतना दिव्य बनती है, और आसुरी संग के द्वारा हमारी चेतना आसुरी बनती है। अतः हमारी चेतना को कृष्णभावनामृत में स्थित लोगों के उचित संग के द्वारा दिव्य बनने हेतु प्रशिक्षित करना चाहिए। यही इस मानव-रूप में स्थित मनुष्य का कर्तव्य है, ऐसा रूप जो हमें अपने अगले जीवन को पूर्णतः दिव्य बनाने का अवसर देता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, हमें उनसे सम्पर्क करने का प्रयत्न करना चाहिए जो दिव्य चेतना का विकास कर रहे हैं।\n\nprayatnād yatamānas tu\n\nyogī saṁśuddha-kilbiṣaḥ\n\naneka-janma-saṁsiddhas\n\ntato yāti parāṁ gatim\n\n\"किन्तु जब योगी ईमानदार प्रयत्न से और अधिक उन्नति करने में संलग्न होता है, तथा समस्त कल्मषों से धुल जाता है, तब अन्ततः, अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात्, वह परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।\" (गीता 6.45) जैसा इस श्लोक में संकेतित है, उन्नति करना अभ्यास का प्रश्न है। जब बालक जन्म लेता है, तब वह न तो धूम्रपान करना जानता है, न मद्यपान करना, किन्तु संग के द्वारा वह मद्यप अथवा धूम्रपानी बन जाता है। संग ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक है। सङ्गात् सञ्जायते कामः। उदाहरणार्थ, अनेक व्यावसायिक संगठन हैं, और कुछ संगठनों का सदस्य बनकर मनुष्य का व्यवसाय फलता-फूलता है। किसी भी प्रयास में संग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। दिव्य चेतना के विकास हेतु, हमने अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ की स्थापना की है, जिसमें दिव्य चेतना प्राप्त करने की विधियाँ सिखाई जाती हैं। इस संघ में हम सबको आकर हरे कृष्ण जप करने का निमन्त्रण देते हैं। यह प्रक्रिया कठिन नहीं है, और बालक भी इसमें भाग ले सकते हैं। किसी पूर्व योग्यता की आवश्यकता नहीं; किसी को स्नातकोत्तर उपाधि अथवा डॉक्टरेट की आवश्यकता नहीं। सबके प्रति हमारा निमन्त्रण है कि इस संघ में सम्मिलित हों और कृष्णभावनाभावित बनें।\n\nपरमेश्वर, भगवान्, शुद्ध हैं, और उनका धाम भी शुद्ध है। यदि कोई उनके धाम में प्रवेश करना चाहे, तो उसे भी शुद्ध होना चाहिए। यह अत्यन्त स्वाभाविक है; यदि हम किसी विशिष्ट समाज में प्रवेश करना चाहें, तो हमें कुछ योग्यताएँ पूरी करनी होती हैं। यदि हम घर वापस, भगवद्धाम वापस लौटना चाहें, तो एक योग्यता है जो हमें पूरी करनी होगी—हमें भौतिक रूप से कल्मषयुक्त नहीं होना चाहिए। और यह कल्मष क्या है? अनियन्त्रित इन्द्रियतृप्ति। यदि हम स्वयं को इन्द्रियतृप्ति के भौतिक कल्मष से मुक्त कर सकें, तो हम भगवद्धाम में प्रवेश के योग्य बन सकते हैं। स्वयं को मुक्त करने की, इस कल्मष से स्वयं को धोने की वह प्रक्रिया योग-पद्धति कहलाती है। जैसा पहले कहा जा चुका है, योग का अर्थ पन्द्रह मिनट बैठकर ध्यान करना और फिर इन्द्रियतृप्ति जारी रखना नहीं है। किसी रोग से मुक्त होने के लिए, हमें किसी चिकित्सक के परामर्श का पालन करना होता है। भगवद्गीता के इस छठे अध्याय में, योग की प्रक्रिया की अनुशंसा की गई है, और भौतिक कल्मष से मुक्त होने के लिए हमें विहित विधियों का पालन करना होता है। यदि हम ऐसा करने में सफल हों, तो हम परमेश्वर से जुड़ सकते हैं, अथवा सम्बद्ध हो सकते हैं।\n\nकृष्णभावनामृत परमेश्वर से सीधे जुड़ने की विधि है। यह भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का विशेष उपहार है। यह विधि न केवल प्रत्यक्ष तथा तात्कालिक है, अपितु यह व्यावहारिक भी है। यद्यपि इस संघ में प्रवेश करने वाले अनेक लोगों के पास कोई योग्यता नहीं होती, फिर भी वे केवल इस संघ के सम्पर्क में आने से ही कृष्णभावनामृत में अत्यन्त उन्नत हो जाते हैं। इस युग में जीवन अत्यन्त छोटा है, और दीर्घकाल लेने वाली योग-प्रक्रिया जनसामान्य की सहायता नहीं करेगी। कलियुग में, सब लोग इतने दुर्भाग्यशाली हैं, और संग अत्यन्त बुरा है। अतः परमेश्वर से सीधे सम्पर्क करने की इस प्रक्रिया की अनुशंसा की जाती है—हरि-नाम। कृष्ण अपने दिव्य नाम के रूप में विद्यमान हैं, और हम उनका नाम सुनकर तुरन्त उनसे सम्पर्क कर सकते हैं। केवल कृष्ण नाम सुनकर ही हम तुरन्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाते हैं।\n\nजैसा कि भगवद्गीता के सातवें अध्याय (7.28) में कहा गया है,\n\nyeṣāṁ tv anta-gataṁ pāpaṁ\n\njanānāṁ puṇya-karmaṇām\n\nte dvandva-moha-nirmuktā\n\nbhajante māṁ dṛḍha-vratāḥ\n\n\"जिन व्यक्तियों ने पूर्व जन्मों में तथा इस जीवन में पुण्य कर्म किए हैं, जिनके पापकर्म पूर्णतः मिट चुके हैं, और जो द्वैत के भ्रम से मुक्त हैं, वे दृढ़ संकल्प के साथ मेरी सेवा में संलग्न होते हैं।\" यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि मनुष्य को कृष्णभावनामृत में पूर्णतः स्थिर होना चाहिए, द्वैत से रहित होना चाहिए, और केवल पुण्य कर्म ही करने चाहिए। चूँकि मन चंचल है, द्वैत सदा आते रहेंगे। मनुष्य सदा विचार करता रहता है, \"क्या मैं कृष्णभावनाभावित बनूँ, अथवा किसी अन्य भावना में संलग्न होऊँ?\" ये समस्याएँ सदा रहती हैं, किन्तु यदि कोई पूर्व जीवन में किए गए पुण्य कर्मों के बल पर उन्नत हो, तो उसकी चेतना स्थिर रूप से स्थिर रहेगी, और वह संकल्प करेगा, \"मैं कृष्णभावनाभावित रहूँगा।\"\n\nहमने इस जीवन में पुण्य कर्म किए या पूर्व जीवन में, इससे वास्तव में कोई अन्तर नहीं पड़ता। हरे कृष्ण का यह जप इतना सामर्थ्यवान् है कि इसके द्वारा हम तुरन्त शुद्ध हो जाएँगे। तथापि हममें यह संकल्प होना चाहिए कि हम आगे और अपवित्र कर्मों में न उलझें। अतः जो इस कृष्णभावनामृत संघ में दीक्षित होना चाहते हैं, उनके लिए चार सिद्धान्त हैं: अवैध मैथुन नहीं, नशा नहीं, मांसाहार नहीं, तथा द्यूत नहीं। हम यह नहीं कहते, \"मैथुन नहीं।\" किन्तु हम यह अवश्य कहते हैं, \"अवैध मैथुन नहीं।\" यदि आप मैथुन चाहते हैं, तो विवाह करें और कृष्णभावनाभावित सन्तान उत्पन्न करें। \"नशा नहीं\" का अर्थ है चाय अथवा कॉफी तक न लेना—अन्य नशीली वस्तुओं की तो बात ही क्या। और द्यूत नहीं तथा मांसाहार नहीं (मछली तथा अण्डों सहित)। केवल इन चार मूल नियमों का पालन करके ही मनुष्य तुरन्त कल्मष-रहित हो जाता है। आगे किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं। ज्यों ही मनुष्य इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में सम्मिलित होता है और इन नियमों का पालन करता है, भौतिक कल्मष तुरन्त दूर हो जाता है, किन्तु मनुष्य को सावधान रहना चाहिए कि वह पुनः कल्मषयुक्त न हो। अतः इन नियमों का सावधानी से पालन करना चाहिए।\n\nभौतिक कल्मष इन चार बुरी आदतों से आरम्भ होता है, और यदि हम इन्हें रोकने में सफल हों, तो कल्मष का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः ज्यों ही हम कृष्णभावनामृत अपनाते हैं, हम मुक्त हो जाते हैं। तथापि, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि कृष्णभावनामृत हमें मुक्त बनाता है, अतः हम पुनः इन चार बुरी आदतों में लिप्त हो सकते हैं और जप करके मुक्त हो सकते हैं। यह छल है, और यह स्वीकार्य नहीं होगा। एक बार मुक्त हो जाने पर, हमें स्वयं को पुनः कल्मषयुक्त नहीं होने देना चाहिए। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए, \"मैं मद्यपान करूँगा या अवैध मैथुन करूँगा और फिर जप करके स्वयं को मुक्त कर लूँगा।\" कुछ धार्मिक प्रक्रियाओं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि मनुष्य सब प्रकार के पाप कर सकता है और फिर गिरजाघर जाकर, पुरोहित के समक्ष स्वीकारोक्ति करके, समस्त पाप से मुक्त हो सकता है। अतः लोग बार-बार पाप करते तथा स्वीकारोक्ति करते, और पुनः पाप करते तथा स्वीकारोक्ति करते रहते हैं। किन्तु यह कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया नहीं है। यदि आप मुक्त हो जाएँ, तो ठीक है, किन्तु पुनः ऐसा न करें। आखिर, स्वीकारोक्ति का प्रयोजन क्या है? यदि आप स्वीकार करते हैं, \"मैंने ये पापकर्म किए हैं,\" तो आपको उन्हें पुनः क्यों करना चाहिए? यदि कोई चोर स्वीकार करता है कि वह जेब काटता रहा है, तो वह अपनी स्वीकारोक्ति के बल पर अपने पाप से मुक्त हो जाता है, किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि उसे पुनः बाहर जाकर जेबें काटनी चाहिए? इसके लिए थोड़ी बुद्धि चाहिए। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि स्वीकारोक्ति करने से मनुष्य मुक्त हो जाता है, अतः उसे पापकर्म करते रहना चाहिए, पुनः स्वीकारोक्ति करनी चाहिए, और पुनः मुक्त हो जाना चाहिए। यह स्वीकारोक्ति का प्रयोजन नहीं है।\n\nअतः हमें यह समझना चाहिए कि यदि हम अनियन्त्रित पापकर्मों में लिप्त रहें, तो हम कल्मषयुक्त हो जाते हैं। हमें सावधान रहना चाहिए कि हम केवल नियमों के अनुसार ही मैथुन करें, केवल वही भोजन करें जो विहित है तथा उचित रीति से अर्पित किया गया है, और रक्षा वैसे ही करें जैसे कृष्ण ने अर्जुन को सलाह दी—उचित कारण के लिए। इस प्रकार हम कल्मष से बच सकते हैं और अपने जीवन को शुद्ध कर सकते हैं। यदि हम मृत्यु के समय तक शुद्ध जीवन जीते रह सकें, तो हम निश्चय ही भगवद्धाम में स्थानान्तरित किए जाएँगे। जब मनुष्य पूर्णतः कृष्णभावनामृत में होता है, तब वह अपना शरीर त्यागने पर इस भौतिक जगत् में नहीं लौटता। यह चौथे अध्याय (गीता 4.9) में कहा गया है।\n\njanma karma ca me divyam\n\nevaṁ yo vetti tattvataḥ\n\ntyaktvā dehaṁ punar janma\n\nnaiti mām eti so 'rjuna\n\n\"हे अर्जुन, जो मेरे प्राकट्य तथा कर्मों के दिव्य स्वरूप को जानता है, वह शरीर त्यागने पर इस भौतिक जगत् में पुनर्जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करता है।\"\n\nअसफल योगी किसी उत्तम परिवार में अथवा किसी धर्मात्मा, धनी, या कुलीन परिवार में लौटता है, किन्तु यदि कोई पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित हो, तो वह पुनः नहीं लौटता। वह नित्य आध्यात्मिक आकाश में गोलोक वृन्दावन को प्राप्त करता है। हमें संकल्प करना चाहिए कि हम इस भौतिक जगत् में पुनः न लौटें, क्योंकि भले ही हम किसी धनी अथवा कुलीन परिवार में उत्तम जन्म प्राप्त कर लें, हम अपने उत्तम अवसर का अनुचित उपयोग करके पुनः स्वयं को अधोगति में डाल सकते हैं। यह जोखिम क्यों उठाएँ? इसी जीवन में कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया को पूर्ण कर लेना श्रेयस्कर है। यह अत्यन्त सरल है और तनिक भी कठिन नहीं। हमें केवल कृष्ण का चिन्तन करते रहना है; तब हमें यह आश्वासन रहेगा कि हमारा अगला जन्म आध्यात्मिक आकाश में, गोलोक वृन्दावन में, भगवद्धाम में होगा।\n\ntapasvibhyo 'dhiko yogī\n\njñānibhyo 'pi mato 'dhikaḥ\n\nkarmibhyaś cādhiko yogī\n\ntasmād yogī bhavārjuna\n\n\"योगी तपस्वी से श्रेष्ठ है, ज्ञानी से श्रेष्ठ है, और सकाम कर्म करने वाले से भी श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन! सब परिस्थितियों में योगी बनो।\" (भगवद्गीता 6.46) इस भौतिक जगत् में जीवन की विविध श्रेणियाँ हैं, किन्तु यदि कोई योग के सिद्धान्त के अनुसार, विशेषतः भक्तियोग के सिद्धान्तों के अनुसार जीवन व्यतीत करे, तो वह सम्भव सर्वाधिक पूर्ण जीवन जी रहा होता है। अतएव श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं, \"हे मेरे प्रिय मित्र अर्जुन! सब परिस्थितियों में योगी बनो और योगी ही बने रहो।\"\n\nyoginām api sarveṣāṁ\n\nmad-gatenāntarātmanā\n\nśraddhāvān bhajate yo māṁ\n\nsa me yuktatamo mataḥ\n\n\"और समस्त योगियों में से जो श्रद्धावान योगी सदा मुझमें स्थित रहता है, अपने अन्तःकरण में मेरा चिन्तन करता है तथा दिव्य प्रेममयी सेवा में मेरी आराधना करता है, वह योग में मुझसे परम घनिष्ठतापूर्वक युक्त है और समस्त योगियों में श्रेष्ठ है।\" (भगवद्गीता 6.47) यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि योगियों के अनेक प्रकार हैं—अष्टांग-योगी, हठयोगी, ज्ञानयोगी, कर्मयोगी और भक्तियोगी—और इन समस्त योगियों में से \"जो सदा मुझमें स्थित रहता है\", वह सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। \"मुझमें\" का अर्थ है श्रीकृष्ण में; अर्थात् सर्वश्रेष्ठ योगी सदा कृष्णभावनामृत में रहता है। ऐसा योगी \"श्रद्धापूर्वक मुझमें स्थित रहता है, दिव्य प्रेममयी सेवा में मेरी आराधना करता है, योग में मुझसे परम घनिष्ठतापूर्वक युक्त है, और समस्त योगियों में श्रेष्ठ है।\" सांख्ययोग पर इस छठे अध्याय की यही प्रमुख शिक्षा है: यदि कोई योग के सर्वोच्च स्तर को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे कृष्णभावनामृत में स्थित रहना होगा।\n\nसंस्कृत में भजते शब्द, जिसका मूल भज् (भज्-धातु) है, का अर्थ है \"सेवा करना\"। किन्तु श्रीकृष्ण की सेवा कौन करता है, यदि वह श्रीकृष्ण का भक्त न हो? इस कृष्णभावनामृत संघ में भक्तगण बिना किसी वेतन के, श्रीकृष्ण के प्रति प्रेमवश सेवा कर रहे हैं। वे अन्यत्र सेवा करके मासिक सैकड़ों डॉलर अर्जित कर सकते हैं, किन्तु यहाँ की जाने वाली यह सेवा प्रेममयी सेवा (भज्) है, जो भगवत्प्रेम पर आधारित है। भक्तगण अनेक प्रकार से सेवा करते हैं—बागवानी, टंकण, पाक, सफ़ाई इत्यादि। समस्त क्रियाएँ श्रीकृष्ण से सम्बद्ध हैं, और इसीलिए दिन-रात चौबीसों घण्टे कृष्णभावनामृत व्याप्त रहता है। यही सर्वोच्च प्रकार का योग है। यही \"दिव्य प्रेममयी सेवा में मेरी आराधना\" है। जैसा पूर्व में कहा गया, योग की पूर्णता अपनी चेतना को विष्णु अथवा श्रीकृष्ण, परमेश्वर के सम्पर्क में रखने में है। हम केवल यह डींग नहीं हाँक रहे कि एक बालक भी मात्र कृष्णभावनामृत में भाग लेकर सर्वोच्च योगी बन सकता है; नहीं, यह तो प्रामाणिक शास्त्र—*भगवद्गीता*—का निर्णय है। ये शब्द हमारी रचना नहीं हैं, अपितु इन्हें स्वयं *पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्*, भगवान् श्री*कृष्ण* ने विशेष रूप से कहा है।\n\nवस्तुतः आराधना और सेवा में कुछ अन्तर है। आराधना में कोई न कोई स्वार्थ निहित होता है। मैं किसी मित्र अथवा किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की आराधना इसलिए करता हूँ कि यदि मैं उस व्यक्ति को प्रसन्न कर सकूँ, तो मुझे कुछ लाभ प्राप्त हो सकता है। जो देवताओं की आराधना करते हैं, वे किसी गूढ़ प्रयोजन से आराधना करते हैं, और इसकी निन्दा *भगवद्गीता* के सातवें अध्याय में की गई है (7.20):\n\nkāmais tais tair hṛta-jñānāḥ\n\nprapadyante 'nya-devatāḥ\n\ntaṁ taṁ niyamam āsthāya\n\nprakṛtyā niyatāḥ svayā\n\n\"जिनका मन भौतिक इच्छाओं से विकृत हो चुका है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं और अपने-अपने स्वभाव के अनुसार आराधना के विशिष्ट विधि-विधानों का पालन करते हैं।\" जो काम से विमोहित हैं, वे किसी स्वार्थ से देवताओं की आराधना करते हैं; अतः जब हम आराधना की बात करते हैं, तो उसमें कोई न कोई स्वार्थ निहित रहता है। किन्तु सेवा भिन्न है, क्योंकि सेवा में कोई स्वार्थ नहीं होता। सेवा प्रेमवश की जाती है, ठीक जैसे माता अपने शिशु की सेवा मात्र प्रेमवश करती है। उस शिशु की उपेक्षा सब कर सकते हैं, किन्तु माता नहीं कर सकती, क्योंकि वहाँ प्रेम विद्यमान है। भज्-धातु भी इसी प्रकार है कि उसमें स्वार्थ का कोई प्रश्न नहीं, अपितु सेवा शुद्ध प्रेमवश की जाती है। यही कृष्णभावनामृत की पूर्णता है।\n\nयही *श्रीमद्भागवत* की भी अनुशंसा है (1.2.6):\n\nsa vai puṁsāṁ paro dharmo\n\nyato bhaktir adhokṣaje\n\nahaituky apratihatā\n\nyayātmā suprasīdati\n\n\"समस्त मानवजाति के लिए परम धर्म वह है जिसके द्वारा मनुष्य उस दिव्य भगवान् की प्रेममयी भक्ति को प्राप्त कर सके। आत्मा को पूर्णतया सन्तुष्ट करने हेतु ऐसी भक्ति निष्काम तथा अविच्छिन्न होनी चाहिए।\" यतो भक्तिरधोक्षजे। भक्ति शब्द भज् के ही मूल से आया है। प्रथम श्रेणी के धर्म की कसौटी यही है कि हम भगवान् के प्रति अपना प्रेम विकसित कर रहे हैं या नहीं। यदि हम किसी गूढ़ स्वार्थ से, अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की आशा से धर्म का पालन करते हैं, तो हमारा धर्म प्रथम श्रेणी का नहीं, अपितु तृतीय श्रेणी का है। यह समझना चाहिए कि प्रथम श्रेणी का धर्म वही है जिसके द्वारा हम भगवत्प्रेम विकसित कर सकें। अहैतुक्यप्रतिहता। यह पूर्ण धर्म बिना किसी गूढ़ स्वार्थ अथवा बाधा के सम्पन्न किया जाना चाहिए। यही वह योग-पद्धति है जिसकी अनुशंसा *श्रीमद्भागवत* में तथा *भगवद्गीता* के इस छठे अध्याय में की गई है। यही कृष्णभावनामृत की पद्धति है।\n\nकृष्णभावनामृत किसी स्वार्थ को मन में रखकर सम्पन्न नहीं किया जाता। भक्तगण श्रीकृष्ण की सेवा इस उद्देश्य से नहीं करते कि वे उन्हें यह अथवा वह प्रदान करें। भक्त के लिए किसी वस्तु का अभाव नहीं होता। यह नहीं सोचना चाहिए कि कृष्णभावनाभावित होकर मनुष्य दरिद्र बन जाता है। नहीं। यदि श्रीकृष्ण विद्यमान हैं, तो सब कुछ विद्यमान है, क्योंकि श्रीकृष्ण ही सर्वस्व हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हमें श्रीकृष्ण के साथ व्यापार करने का प्रयत्न करना चाहिए, यह माँगते हुए कि \"श्रीकृष्ण, मुझे यह दीजिए। मुझे वह दीजिए।\" श्रीकृष्ण हमसे अधिक जानते हैं, और वे हमारे स्वार्थों को भी जानते हैं। शिशु अपने माता-पिता से यह कहते हुए माँग नहीं करता, \"हे पिताजी, मुझे यह दीजिए। मुझे वह दीजिए।\" चूँकि पिता अपने शिशु की आवश्यकताओं को जानता है, अतः शिशु को माँगने की आवश्यकता नहीं। इसी प्रकार, भगवान् से यह अथवा वह माँगना बहुत उत्तम विचार नहीं है। हम क्यों माँगें? यदि भगवान् सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान हैं, तो वे हमारी अभिलाषाओं, हमारी आवश्यकताओं को जानते हैं, और उनकी पूर्ति कर सकते हैं। इसकी पुष्टि *वेदों* में होती है। एको बहूनां यो विदधाति कामान्: \"वह एक अद्वितीय सर्वशक्तिमान भगवान् लाखों-करोड़ों जीवों को समस्त आवश्यकताएँ प्रदान कर रहे हैं।\" अतः हमें भगवान् से कुछ नहीं माँगना चाहिए, क्योंकि हमारी आवश्यकताएँ पहले से ही पूरी हो रही हैं। समस्त सामग्री पहले से ही विद्यमान है। हमें तो केवल भगवान् से प्रेम करने का प्रयत्न करना चाहिए। बिल्ली और कुत्ते तक चर्च जाकर और भगवान् से याचना किए बिना अपनी आवश्यकताएँ पा रहे हैं। यदि बिल्ली या कुत्ता बिना माँगे अपनी आवश्यकताएँ पा लेते हैं, तो भक्त को उसकी आवश्यक वस्तुएँ क्यों न प्राप्त हों? अतएव हमें भगवान् से कुछ नहीं माँगना चाहिए, अपितु केवल उनसे प्रेम करने का प्रयत्न करना चाहिए। तब सब कुछ पूर्ण होगा, और हम योग के सर्वोच्च स्तर को प्राप्त कर लेंगे।\n\nहम वस्तुतः देख सकते हैं कि शरीर के विभिन्न अंग किस प्रकार शरीर की सेवा करते हैं। यदि मुझे खुजली होती है, तो अँगुलियाँ तत्काल खुजला देती हैं। यदि मैं कुछ देखना चाहता हूँ, तो नेत्र तत्काल देख लेते हैं। यदि मैं कहीं जाना चाहता हूँ, तो पैर तत्काल मुझे ले जाते हैं। जिस प्रकार मुझे अपने शरीर के विभिन्न अंगों से सेवा प्राप्त होती है, उसी प्रकार भगवान् को अपनी समस्त सृष्टि के अंगों से सेवा प्राप्त होती है। भगवान् सेवा करने के लिए नहीं हैं। यदि शरीर के अंग समस्त शरीर की सेवा करते हैं, तो शरीर के अंगों को स्वतः ऊर्जा प्राप्त होती है। इसी प्रकार, यदि हम श्रीकृष्ण की सेवा करें, तो हमें समस्त आवश्यकताएँ, समस्त ऊर्जा स्वतः प्राप्त होती है।\n\n*श्रीमद्भागवत* इसकी पुष्टि करता है कि हम सब परमेश्वर के अंश हैं। यदि शरीर का कोई अंग नियमित रूप से सेवा न कर सके, तो वह शरीर को पीड़ा देता है, और यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की सेवा न करे, तो वह परमेश्वर को मात्र पीड़ा और कष्ट दे रहा होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति को कष्ट भोगना पड़ता है, ठीक जैसे एक अपराधी को कष्ट भोगना पड़ता है जब वह राज्य के नियमों का पालन नहीं करता। ऐसा अपराधी सोच सकता है, \"मैं तो बहुत अच्छा व्यक्ति हूँ\", किन्तु चूँकि वह राज्य के नियमों का उल्लंघन कर रहा है, अतः वह सरकार को कष्ट दे रहा है, और परिणामस्वरूप सरकार उसे कारागार में डाल देती है। जब जीव परमेश्वर को कष्ट देते हैं, तो भगवान् आते हैं, उन्हें एकत्र करते हैं, और इस भौतिक जगत् में डाल देते हैं। संक्षेप में, वे कहते हैं, \"तुम यहाँ रहो। तुम सब सृष्टि को विक्षुब्ध कर रहे हो; अतः तुम अपराधी हो और तुम्हें इस भौतिक जगत् में रहना होगा।\" स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः: \"मनुष्य अपनी स्वाभाविक स्थिति से नीचे गिर जाता है।\" यदि कोई अँगुली रोगग्रस्त हो, तो उसे काट देना पड़ता है ताकि वह सम्पूर्ण शरीर को दूषित न कर दे। ईश्वर-भावना के सिद्धान्तों के विरुद्ध विद्रोह करके हम अपनी मूल स्थिति से कट गए हैं। हम गिर चुके हैं। अपनी मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने हेतु हमें परमेश्वर की सेवा पुनः आरम्भ करनी होगी। यही पूर्ण उपचार है। अन्यथा हम पीड़ा भोगते रहेंगे, और भगवान् हमारे कारण पीड़ा भोगेंगे। यदि मैं पिता हूँ, और मेरा पुत्र सुयोग्य नहीं है, तो मैं कष्ट पाता हूँ, और मेरा पुत्र भी कष्ट पाता है। इसी प्रकार, हम सब भगवान् के पुत्र हैं, और जब हम भगवान् को पीड़ा पहुँचाते हैं, तो हम भी पीड़ित होते हैं। सर्वोत्तम मार्ग यही है कि हम अपने मूल कृष्णभावनामृत को पुनर्जीवित करें और भगवान् की सेवा में संलग्न हों। यही हमारा स्वाभाविक जीवन है, और यह आध्यात्मिक आकाश, गोलोक वृन्दावन में सम्भव है।\n\nअवजानन्ति शब्द का वास्तविक अर्थ है \"उपेक्षा करना\"। इसका अर्थ है यह सोचना, \"भगवान् क्या हैं? मैं ही भगवान् हूँ। मैं भगवान् की सेवा क्यों करूँ?\" यह ठीक उस अपराधी के समान है जो सोचता है, \"यह सरकार क्या है? मैं अपने कार्य स्वयं सँभाल सकता हूँ। मुझे सरकार की परवाह नहीं।\" इसे ही अवजानन्ति कहते हैं। हम भले ही इस प्रकार बोलें, किन्तु हमें दण्डित करने हेतु पुलिस विभाग विद्यमान है। इसी प्रकार, हमें त्रिविध तापों से दण्डित करने हेतु भौतिक प्रकृति यहाँ विद्यमान है। ये ताप उन धूर्तों के लिए हैं जो अवजानन्ति, जो भगवान् की परवाह नहीं करते अथवा जो भगवान् के अर्थ को तुच्छ मानते हुए कहते हैं, \"मैं भगवान् हूँ। तुम भगवान् हो।\"\n\nइस प्रकार योग की सामान्य प्रगति क्रमिक है। पहले मनुष्य कर्मयोग का अभ्यास करता है, जो सामान्य, सकाम कर्म को इंगित करता है। सामान्य कर्मों में पापमय कर्म भी सम्मिलित हैं, किन्तु कर्मयोग ऐसे कर्मों को बाहर रखता है। कर्मयोग केवल शुभ, पुण्यमय कर्मों को, अथवा उन कर्मों को इंगित करता है जो विहित हैं। कर्मयोग सम्पन्न करने के पश्चात् मनुष्य ज्ञानयोग, अर्थात् ज्ञान के स्तर पर आता है। ज्ञान के स्तर से मनुष्य इस अष्टांग-योग, अर्थात् आठ अंगों वाली योग-पद्धति—ध्यान, धारणा, प्राणायाम, आसन इत्यादि—को प्राप्त करता है, और अष्टांग-योग से, जैसे ही मनुष्य विष्णु पर एकाग्र होता है, वह भक्तियोग के बिन्दु पर आ पहुँचता है। भक्तियोग पूर्णता की अवस्था है, और यदि कोई कृष्णभावनामृत का अभ्यास करे, तो वह इस अवस्था को आरम्भ से ही प्राप्त कर लेता है। यही प्रत्यक्ष मार्ग है।\n\nयदि कोई ज्ञानयोग का अभ्यास करता है और सोचता है कि उसने परम लक्ष्य प्राप्त कर लिया, तो वह भ्रम में है। उसे और आगे प्रगति करनी होगी। यदि हम किसी सीढ़ी पर हैं और हमें सबसे ऊपरी तल पर, अर्थात् सौवें तल पर पहुँचना है, तो हम भ्रम में हैं यदि हम तीसवें तल पर रहते हुए यह सोच लें कि हम पहुँच गए। जैसा पूर्व में कहा गया, सम्पूर्ण योग-पद्धति को एक सीढ़ी के समान माना जा सकता है, जो हमें भगवान् से जोड़ती अथवा सम्बद्ध करती है। परम लक्ष्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्राप्त करने हेतु हमें सर्वोच्च स्तर पर पहुँचना होगा, और वही भक्तियोग है।\n\nकिन्तु इन समस्त सोपानों पर चढ़ें ही क्यों, यदि हमारे पास एक उद्वाहक (लिफ़्ट) पकड़ने का अवसर है? उद्वाहक के माध्यम से हम कुछ ही क्षणों में शिखर पर पहुँच सकते हैं। भक्तियोग यही उद्वाहक है, वह प्रत्यक्ष पद्धति जिसके द्वारा हम कुछ ही क्षणों में शिखर पर पहुँच सकते हैं। हम पग-पग करके, अन्य समस्त योग-पद्धतियों का अनुसरण करते हुए जा सकते हैं, अथवा सीधे जा सकते हैं। चूँकि इस कलियुग में मनुष्यों की आयु अल्प है और वे सदा विक्षुब्ध तथा चिन्तित रहते हैं, अतः भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपा से हमें वह उद्वाहक प्रदान किया है जिसके द्वारा हम तत्काल भक्तियोग के स्तर पर आ सकते हैं। वह प्रत्यक्ष साधन हरे कृष्ण का जप है, और यही भगवान् चैतन्य महाप्रभु का विशेष उपहार है। अतएव रूप गोस्वामी भगवान् चैतन्य महाप्रभु को सादर प्रणाम अर्पित करते हैं, नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते: [चै.च. मध्य 19.53] \"ओह, आप सर्वाधिक उदार अवतार हैं, क्योंकि आप साक्षात् कृष्ण-प्रेम प्रदान कर रहे हैं। शुद्ध कृष्ण-प्रेम प्राप्त करने हेतु मनुष्य को योग की अनेक अवस्थाओं से गुज़रना पड़ता है, किन्तु आप यह प्रेम सीधे प्रदान कर रहे हैं। अतः आप सर्वाधिक उदार हैं।\"\n\nजैसा *भगवद्गीता* के अठारहवें अध्याय में कहा गया है (18.55),\n\nbhaktyā mām abhijānāti\n\nyāvān yaś cāsmi tattvataḥ\n\ntato māṁ tattvato jñātvā\n\nviśate tad-anantaram\n\n\"मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जैसे वे हैं, वैसा केवल भक्ति के द्वारा ही समझ सकता है। और जब मनुष्य ऐसी भक्ति के द्वारा परमेश्वर के पूर्ण भावनामृत में होता है, तब वह भगवद्धाम में प्रवेश कर सकता है।\" अन्य योग-पद्धतियों में भक्ति का कुछ मिश्रण अवश्य होना चाहिए, किन्तु भक्तियोग अमिश्रित भक्ति है। यह बिना किसी स्वार्थ के की जाने वाली सेवा है। सामान्यतः लोग किसी स्वार्थ को मन में रखकर प्रार्थना करते हैं, किन्तु हमें केवल भक्ति में और अधिक संलग्नता हेतु ही प्रार्थना करनी चाहिए। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने हमें सिखाया है कि जब हम प्रार्थना करें, तो हमें किसी भौतिक वस्तु के लिए प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। आरम्भ में हमने भगवान् चैतन्य महाप्रभु की पूर्ण प्रार्थना उद्धृत की थी:\n\nna dhanaṁ na janaṁ na sundarīṁ\n\nkavitāṁ vā jagad-īśa kāmaye\n\nmama janmani janmanīśvare\n\nbhavatād bhaktir ahaitukī tvayi\n\n\"हे सर्वशक्तिमान भगवान्, मुझे न धन संचय करने की इच्छा है, न सुन्दर स्त्रियों के भोग की। न मुझे किसी संख्या में अनुयायी चाहिए। मुझे तो केवल जन्म-जन्मान्तर अपने जीवन में आपकी भक्ति की अहैतुकी कृपा चाहिए।\" (शिक्षाष्टक 4) इस श्लोक में चैतन्य महाप्रभु परमेश्वर को जगदीश के रूप में सम्बोधित करते हैं। जगत् का अर्थ है \"विश्व\", और ईश का अर्थ है \"नियन्ता\"। परमेश्वर विश्व के नियन्ता हैं, और इसे कोई भी समझ सकता है; अतः चैतन्य महाप्रभु परमेश्वर को श्रीकृष्ण या राम के स्थान पर जगदीश के रूप में सम्बोधित करते हैं। इस भौतिक जगत् में हमें अनेक नियन्ता मिलते हैं, अतः यह तर्कसंगत है कि सम्पूर्ण विश्व का भी एक नियन्ता है। चैतन्य महाप्रभु धन, अनुयायियों, अथवा सुन्दर स्त्रियों के लिए प्रार्थना नहीं करते, क्योंकि ये भौतिक याचनाएँ हैं। प्रायः लोग इस भौतिक जगत् के भीतर बहुत बड़े नेता बनना चाहते हैं। कोई फ़ोर्ड अथवा रॉकफ़ेलर के समान बहुत धनी व्यक्ति बनने का प्रयत्न करता है, तो कोई दूसरा राष्ट्रपति अथवा कोई ऐसा महान नेता बनने का प्रयत्न करता है जिसका अनुसरण हज़ारों लोग करेंगे। ये सब भौतिक याचनाएँ हैं: \"मुझे धन दीजिए। मुझे अनुयायी दीजिए। मुझे एक सुन्दर पत्नी दीजिए।\" भगवान् चैतन्य महाप्रभु ऐसी भौतिकतावादी याचनाएँ करने से इनकार करते हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं, \"मुझे इनमें से कोई वस्तु नहीं चाहिए।\" वे यहाँ तक कहते हैं, मम जन्मनि जन्मनीश्वरे। अर्थात्, वे मोक्ष की भी याचना नहीं कर रहे। जैसे भौतिकतावादियों की अपनी याचनाएँ हैं, वैसे ही योगी मोक्ष की याचना करते हैं। किन्तु चैतन्य महाप्रभु इस प्रकार की कोई वस्तु नहीं चाहते। तो फिर वे भक्त क्यों हैं? वे श्रीकृष्ण की आराधना क्यों कर रहे हैं? \"मैं तो केवल जन्म-जन्मान्तर आपकी सेवा में संलग्न रहना चाहता हूँ।\" वे जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु के अन्त की भी प्रार्थना नहीं करते। कोई भी याचना नहीं है, क्योंकि यही सर्वोच्च स्तर है, भक्तियोग की अवस्था है।\n\nहरे कृष्ण का जप भी भगवान् से यही याचना है, \"कृपया मुझे अपनी सेवा में संलग्न कीजिए।\" यह वह मन्त्र है जिसे स्वयं चैतन्य महाप्रभु ने सिखाया है। हरे भगवान् की ऊर्जा को इंगित करता है, और कृष्ण तथा राम स्वयं भगवान् के नाम हैं। जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं, तो हम श्रीकृष्ण से याचना कर रहे होते हैं कि वे कृपया हमें अपनी सेवा में संलग्न करें। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारा सम्पूर्ण भौतिक रोग इसी कारण है कि हम भगवान् की सेवा करना भूल गए हैं। भ्रमवश हम सोच रहे हैं, \"मैं भगवान् हूँ। वह दूसरा कौन-सा भगवान् है जिसकी मुझे सेवा करनी है? मैं स्वयं भगवान् हूँ।\" अन्ततः यही एकमात्र रोग है, भ्रम का अन्तिम फन्दा है। सबसे पहले व्यक्ति प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति, रॉकफ़ेलर, फ़ोर्ड, यह और वह बनने का प्रयत्न करता है, और जब वह असफल हो जाता है अथवा ऐसा पद प्राप्त कर लेता है और फिर भी अप्रसन्न रहता है, तो वह भगवान् बनना चाहता है। यह तो और भी उच्चतर राष्ट्रपति बनने के समान है। जब मुझे यह समझ में आता है कि राष्ट्रपति-पद मुझे नित्य आनन्द तथा ज्ञान नहीं देता, तो मैं सर्वोच्च राष्ट्रपति-पद की माँग करता हूँ। मैं भगवान् बनने की माँग करता हूँ। किसी भी अवस्था में, माँग वहाँ विद्यमान है, और यही माँग हमारा रोग है। भ्रमवश हम सर्वोच्च बनने की माँग कर रहे हैं, किन्तु भक्तियोग की पद्धति ठीक इसके विपरीत है। हम सेवक बनना चाहते हैं, भगवान् के सेवकों के सेवक बनना चाहते हैं। भगवान् बनने की माँग का तो प्रश्न ही नहीं उठता; हम तो केवल सेवा करना चाहते हैं। बस इतना ही।\n\nहमारा मूल स्वभाव सेवा में निहित है, और सेवा करने की इच्छा ही भक्त की निर्णायक कसौटी है। हम भले ही इसे न समझें, किन्तु इस भौतिक जगत् में भी हम सेवा ही कर रहे हैं। यदि हम राष्ट्रपति बनना चाहते हैं, तो हमें मतदाताओं से अनेक प्रतिज्ञाएँ करनी पड़ती हैं। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रपति को कहना पड़ता है, \"मैं जनता को अपनी सेवा दूँगा।\" जब तक वह अपने देश की सेवा करने की प्रतिज्ञा न करे, तब तक उसके राष्ट्रपति बनने का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः यदि कोई सर्वाधिक प्रतिष्ठित नेता भी हो, तो भी उसकी स्थिति सेवा करने की ही है। लोगों के लिए यह समझना बहुत कठिन है। देश का सर्वोच्च कार्यपालक बन जाने पर भी मनुष्य को जनता की सेवा करनी पड़ती है। यदि वह सेवा न दी जाए, तो मनुष्य के पदच्युत हो जाने, हटा दिए जाने, अथवा मार दिए जाने की सम्भावना रहती है। भौतिक जगत् में सेवा बहुत संकटपूर्ण है। यदि किसी की सेवा में थोड़ी-सी भी विसंगति हो, तो उसे तत्काल हटा दिया जाता है। जब जनता को राष्ट्रपति निक्सन द्वारा की जा रही सेवा पसन्द नहीं आई, तो उन्होंने उन्हें त्यागपत्र देने को विवश किया। कुछ लोग राष्ट्रपति केनेडी से असहमत थे, और वे मार डाले गए। इसी प्रकार, भारत में गांधी भी मार डाले गए, क्योंकि कुछ लोगों को उनके सेवा करने का ढंग पसन्द नहीं था। भौतिक जगत् में सदा यही स्थिति रहती है; अतः मनुष्य को इतना विवेकवान होना चाहिए कि वह भौतिक स्वार्थों के लिए सेवा करना बन्द करने का निर्णय ले। हमें परमेश्वर की सेवा करनी चाहिए, और सेवा का वही अर्पण हमारी पूर्णता है।\n\nहमने यह अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ इसलिए स्थापित किया है कि लोगों को वह सिखाया जा सके जिसे वे भूल चुके हैं। इस भौतिक जगत् में हम राधा-कृष्ण की सेवा भूल चुके हैं; अतएव हम माया, अर्थात् इन्द्रियों के सेवक बन गए हैं। इसलिए, इस संघ में हम कह रहे हैं, \"तुम अपनी इन्द्रियों की सेवा कर रहे हो। अब अपनी सेवा को राधा और कृष्ण की ओर मोड़ दो, और तुम सुखी हो जाओगे। तुम्हें सेवा करनी ही होगी—या तो माया [भ्रम], इन्द्रियों की, अथवा श्री श्री राधा-कृष्ण की।\"\n\nइस जगत् में सब लोग इन्द्रियों की सेवा कर रहे हैं, किन्तु लोग सन्तुष्ट नहीं हैं। कोई भी सन्तुष्ट नहीं हो सकता, क्योंकि इन्द्रियाँ सदा और अधिक तृप्ति माँगती रहती हैं, और इसका अर्थ है कि हमें निरन्तर इन्द्रियों की सेवा करनी पड़ती है। किसी भी अवस्था में, सेवक के रूप में हमारी स्थिति वही बनी रहती है। प्रश्न यह है कि हम अपनी सेवा में सुखी होना चाहते हैं या नहीं। *भगवद्गीता* तथा अन्य वैदिक शास्त्रों का यही निर्णय है कि अपनी इन्द्रियों की सेवा करने का प्रयत्न करके हम कभी सुखी नहीं होंगे, क्योंकि वे तो केवल दुःख के स्रोत हैं। अतएव भगवान् चैतन्य महाप्रभु श्रीकृष्ण की सेवा में स्थित होने की प्रार्थना करते हैं। वे यह भी प्रार्थना करते हैं,\n\nayi nanda-tanuja kiṅkaraṁ\n\npatitaṁ māṁ viṣame bhavāmbudhau\n\nkṛpayā tava pāda-paṅkaja-\n\nsthita-dhūlī-sadṛśaṁ vicintaya\n\n\"हे महाराज नन्द के पुत्र [श्रीकृष्ण], मैं आपका नित्य सेवक हूँ, फिर भी किसी न किसी प्रकार मैं जन्म-मृत्यु के सागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया मुझे इस मृत्यु-सागर से उठा लीजिए और अपने चरणकमलों में एक अणु के रूप में स्थापित कर लीजिए।\" (शिक्षाष्टक 5) यह भी श्रीकृष्ण से हमें उनकी सेवा में संलग्न करने की याचना का एक और रूप है।\n\nप्रेममयी भक्ति केवल श्रीकृष्ण के साकार रूप, श्यामसुन्दर को ही अर्पित की जा सकती है। निराकारवादी विराट्-रूप पर बल देते हैं, जिसे *भगवद्गीता* के ग्यारहवें अध्याय में प्रदर्शित किया गया है, किन्तु वहीं यह भी कहा गया है (11.21) कि देवता इस रूप से अत्यन्त भयभीत हो जाते हैं, और अर्जुन कहते हैं,\n\nadṛṣṭa-pūrvaṁ hṛṣito 'smi dṛṣṭvā\n\nbhayena ca pravyathitaṁ mano me\n\ntad eva me darśaya deva rūpaṁ\n\nprasīda deveśa jagan-nivāsa\n\n\"इस विराट् रूप को देखकर, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा, मैं हर्षित हूँ, किन्तु साथ ही मेरा मन भय से विचलित है। अतः कृपया मुझ पर अपनी कृपा कीजिए और पुनः अपना भगवद्रूप [श्रीकृष्ण, अर्थात् श्यामसुन्दर] प्रकट कीजिए, हे देवेश, हे जगन्निवास।\" (भगवद्गीता 11.45) विराट्-रूप से प्रेम करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यदि श्रीकृष्ण आपके समक्ष विराट्-रूप में आ जाएँ, तो आप इतने भय से भर जाएँगे कि अपना प्रेम भूल जाएँगे। अतः निराकारवादियों के समान विराट्-रूप देखने के लिए उत्सुक न हों; केवल श्यामसुन्दर, श्रीकृष्ण की प्रेममयी सेवा करें।\n\nहमने सन् 1942 में कलकत्ता में युद्धकाल के समय श्रीकृष्ण को विश्व-रूप के रूप में न्यूनाधिक देखा था। सायरन बजा, और हम एक आश्रय-स्थल में भागे, और बमबारी आरम्भ हो गई। इस प्रकार, हम वह विश्व-रूप देख रहे थे, और मैं सोच रहा था, \"निस्सन्देह, यह भी श्रीकृष्ण का ही एक अन्य रूप है। किन्तु यह कोई अत्यन्त प्रिय रूप नहीं है।\" भक्त श्रीकृष्ण को उनके मूल रूप में प्रेम करना चाहता है, और यह विश्व-रूप उनका मूल रूप नहीं है। सर्वशक्तिमान होने के कारण श्रीकृष्ण किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं, किन्तु उनका प्रिय रूप तो श्रीकृष्ण, श्यामसुन्दर का ही है। यद्यपि कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी हो सकता है, किन्तु जब वह घर पर होता है, तो वह अपने पुत्र के लिए एक प्रिय पिता होता है। किन्तु यदि वह अपनी पिस्तौल चलाते हुए घर आए, तो पुत्र इतना भयभीत हो जाएगा कि वह भूल जाएगा कि वह उसका प्रिय पिता है। स्वाभाविक रूप से, बालक अपने पिता से तब प्रेम करता है जब वह घर पर पिता के समान रहता है, और इसी प्रकार हम श्रीकृष्ण से उसी रूप में प्रेम करते हैं जैसे वे अपने नित्य धाम में, श्यामसुन्दर के रूप में हैं।\n\nविश्व-रूप अर्जुन को उन धूर्तों को चेतावनी देने हेतु दिखाया गया था जो दावा करते हैं, \"मैं भगवान् हूँ।\" अर्जुन ने विश्व-रूप देखने की याचना इसलिए की कि भविष्य में हमारे पास कोई कसौटी हो जिससे हम भगवान् होने का दावा करने वाले धूर्तों की परीक्षा ले सकें। दूसरे शब्दों में, यदि कोई कहे, \"मैं भगवान् हूँ\", तो हम सरलता से उत्तर दे सकते हैं, \"यदि तुम भगवान् हो, तो कृपया मुझे अपना विश्व-रूप दिखाओ।\" और हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि ऐसे धूर्त यह रूप प्रदर्शित नहीं कर सकते।\n\nनिस्सन्देह, अर्जुन विश्व-रूप को समस्त आदर अर्पित कर रहे थे। यह भक्त का स्वाभाविक गुण है। भक्त दुर्गा, माया तक का आदर करता है, क्योंकि माया श्रीकृष्ण की ऊर्जा है। यदि हम श्रीकृष्ण का आदर करते हैं, तो हम सबका आदर करते हैं, एक चींटी तक का। अतएव ब्रह्मा प्रार्थना करते हैं,\n\nsṛṣṭi-sthiti-pralaya-sādhana-śaktir ekā\n\nchāyeva yasya bhuvanāni bibharti durgā\n\nicchānurūpam api yasya ca ceṣṭate sā\n\ngovindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi\n\n\"बाह्य ऊर्जा, माया, जो चित् [आध्यात्मिक] शक्ति की छाया के स्वरूप वाली है, समस्त लोगों द्वारा दुर्गा के रूप में आराधित है, जो इस लौकिक जगत् की सृष्टि, पालन तथा संहार करने वाली अभिकर्त्री है। मैं उन आदि-पुरुष भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जिनकी इच्छा के अनुसार दुर्गा कार्य करती है।\" (ब्रह्म-संहिता 5.44) इस प्रकार जब हम श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं, तो हम तत्काल दुर्गा से भी प्रार्थना करते हैं, क्योंकि दुर्गा उनकी ऊर्जा है। और जब हम दुर्गा से प्रार्थना करते हैं, तो हम वस्तुतः श्रीकृष्ण से ही प्रार्थना कर रहे होते हैं, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के निर्देशन में कार्य कर रही है। जब भक्त माया की क्रियाओं को देखता है, तो वह तत्काल श्रीकृष्ण को देख लेता है, यह सोचते हुए, \"ओह, माया श्रीकृष्ण के निर्देशन में कितना भली-भाँति कार्य कर रही है।\" जब कोई पुलिसकर्मी को आदर अर्पित करता है, तो वह वस्तुतः सरकार को ही आदर अर्पित कर रहा होता है। दुर्गा, अर्थात् भौतिक ऊर्जा, इतनी शक्तिशाली है कि वह सृष्टि, संहार तथा पालन कर सकती है, किन्तु समस्त अवस्थाओं में वह श्रीकृष्ण के निर्देशन में ही कार्य करती है।\n\nभक्ति, अर्थात् श्रीकृष्ण की शुद्ध भक्ति के द्वारा, हम माया की संगति छोड़ सकते हैं और श्रीकृष्ण की नित्य संगति को प्राप्त हो सकते हैं। कुछ गोप, अर्थात् श्रीकृष्ण के सखा, नित्य पार्षद हैं, और अन्य उस नित्य स्थिति को प्राप्त किए जाते हैं। यदि केवल श्रीकृष्ण के नित्य पार्षद ही उनके साथ खेल सकते हैं और अन्य नहीं, तो फिर कृष्णभावनाभावित होने का क्या अर्थ है? हम भी अनेक-अनेक जन्मों में सम्पन्न किए गए पुण्य कर्मों के द्वारा श्रीकृष्ण के नित्य पार्षद बन सकते हैं। वस्तुतः, इस भौतिक जगत् में प्रकट वृन्दावन में, श्रीकृष्ण के पार्षद मुख्यतः वे बद्धजीव हैं जो कृष्णभावनामृत की पूर्ण अवस्था को प्राप्त किए गए हैं। इस प्रकार प्रोन्नत होकर, उन्हें सर्वप्रथम उस लोक में श्रीकृष्ण के दर्शन करने दिए जाते हैं जहाँ श्रीकृष्ण की लीलाएँ सम्पन्न हो रही हैं। इसके पश्चात्, उन्हें आध्यात्मिक आकाश में दिव्य गोलोक वृन्दावन में प्रोन्नत किया जाता है। अतएव भागवत (10.12.11) में कहा गया है, कृत-पुण्य-पुञ्जाः।\n\nभक्तियोग का अर्थ है स्वयं को श्रीकृष्ण, भगवान् से जोड़ना और उनके नित्य पार्षद बनना। भक्तियोग किसी अन्य उद्देश्य पर लागू नहीं किया जा सकता; अतएव बौद्ध धर्म में, उदाहरणार्थ, भक्तियोग नहीं है, क्योंकि वे परम उद्देश्य के रूप में विद्यमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते। किन्तु ईसाई जब ईसा मसीह की आराधना करते हैं, तो वे भक्तियोग का अभ्यास करते हैं, क्योंकि वे उन्हें भगवान् के पुत्र के रूप में स्वीकार करते हैं और इस प्रकार भगवान् को स्वीकार करते हैं। जब तक मनुष्य भगवान् को स्वीकार नहीं करता, तब तक भक्तियोग का प्रश्न ही नहीं उठता। अतएव ईसाई धर्म भी वैष्णवता का ही एक रूप है, क्योंकि भगवान् को स्वीकार किया जाता है। फिर भी, भगवद्-साक्षात्कार की विविध अवस्थाएँ हैं। मुख्यतः, ईसाई धर्म कहता है, \"भगवान् महान हैं\", और यह बहुत उत्तम कथन है, किन्तु भगवान् की वास्तविक महत्ता को *भगवद्गीता* तथा *श्रीमद्भागवत* से समझा जा सकता है। भगवान् की महत्ता को स्वीकार करना भक्ति का आरम्भ है। भक्तियोग मुसलमानों में भी विद्यमान है, क्योंकि मुस्लिम धर्म में भगवान् ही लक्ष्य हैं। किन्तु, जहाँ साकार भगवान् की कोई स्वीकृति नहीं—दूसरे शब्दों में, जहाँ केवल निराकारवाद है—वहाँ भक्तियोग का प्रश्न ही नहीं उठता। भक्तियोग में तीन तत्त्वों का होना अनिवार्य है: सेवक, सेव्य, और सेवा। सेवा स्वीकार करने हेतु एक का उपस्थित होना आवश्यक है, और सेवा अर्पित करने हेतु एक का उपस्थित होना आवश्यक है। मध्यवर्ती माध्यम स्वयं सेवा की प्रक्रिया है, अर्थात् भक्तियोग है। अब, यदि उस सेवा को स्वीकार करने वाला कोई न हो, तो भक्तियोग कैसे सम्भव है? अतएव, यदि कोई दर्शन अथवा धर्म भगवान् को पूर्ण पुरुष के रूप में स्वीकार नहीं करता, तो भक्तियोग के लागू होने की कोई सम्भावना नहीं है।\n\nभक्तियोग की प्रक्रिया में, आध्यात्मिक गुरु की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा अनिवार्य है। यद्यपि आध्यात्मिक गुरु तब तक बारम्बार लौटते रहेंगे जब तक उनके शिष्य भगवद्-साक्षात्कार प्राप्त न कर लें, तथापि किसी को इसका अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए। हमें अपने आध्यात्मिक गुरु को कष्ट नहीं देना चाहिए, अपितु इसी जीवन में भक्तियोग की प्रक्रिया पूर्ण कर लेनी चाहिए। शिष्य को अपने आध्यात्मिक गुरु की सेवा में गम्भीर होना चाहिए, और यदि भक्त विवेकवान है, तो उसे यह सोचना चाहिए, \"मैं ऐसा क्यों करूँ कि मेरे आध्यात्मिक गुरु को मुझे पुनः उद्धार करने का कष्ट उठाना पड़े? मैं इसी जीवन में श्रीकृष्ण का साक्षात्कार कर लूँ।\" यही सोचने का उचित ढंग है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए, \"ओह, मुझे विश्वास है कि मेरे आध्यात्मिक गुरु आएँगे और मुझे बचा लेंगे। अतः मैं जो चाहूँ, वही करूँगा।\" यदि हमें अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति तनिक भी स्नेह है, तो हमें इसी जीवन में यह प्रक्रिया पूर्ण कर लेनी चाहिए, ताकि उन्हें हमें उद्धार करने हेतु पुनः लौटना न पड़े।\n\nइस सन्दर्भ में, बिल्वमंगल ठाकुर का उदाहरण है, जो अपने पूर्व जीवन में प्रेम-भक्ति, अर्थात् भक्ति के सर्वोच्च स्तर तक प्रायः उन्नत हो चुके थे। किन्तु, चूँकि सदा पतन की सम्भावना बनी रहती है, अतः किसी न किसी प्रकार उनका पतन हो गया। अपने अगले जन्म में उन्होंने *भगवद्गीता* के छठे अध्याय (6.41) में प्रतिपादित सिद्धान्त शुचीनां श्रीमतां गेहे के अनुसार एक अत्यन्त धनी ब्राह्मण कुल में जन्म लिया। दुर्भाग्यवश, जैसा धनी बालकों के साथ प्रायः होता है, वे वेश्यागामी बन गए। फिर भी कहा जाता है कि उनके आध्यात्मिक गुरु ने उन्हें उन्हीं की वेश्या के माध्यम से शिक्षा दी, यह कहते हुए, \"ओह, तुम इस मात्र मांस और अस्थि के प्रति इतने आसक्त हो। यदि तुम इतने ही श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त होते, तो कितना कल्याण प्राप्त कर लेते!\" तत्काल बिल्वमंगल ठाकुर ने अपनी भक्ति पुनः आरम्भ कर दी।\n\nयद्यपि आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्य का उत्तरदायित्व ग्रहण करते हैं, तथापि हमें इसका अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए। अपितु, हमें अपने आध्यात्मिक गुरु को प्रसन्न करने का प्रयत्न करना चाहिए (यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादः **)। हमें अपने आध्यात्मिक गुरु को ऐसी स्थिति में नहीं डालना चाहिए कि उन्हें हमें किसी वेश्यालय से उद्धार करना पड़े। किन्तु यदि उन्हें ऐसा करना भी पड़े, तो वे करेंगे, क्योंकि जब वे अपने शिष्य को स्वीकार करते हैं, तब वे यह उत्तरदायित्व ग्रहण कर लेते हैं।\n\nभक्तियोग की प्रक्रिया इसी जीवन में पूर्ण कर लेनी चाहिए, क्योंकि इस जीवन में हमारे पास पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होने हेतु समस्त आवश्यक उपकरण विद्यमान हैं। हमारे पास हरे कृष्ण का कीर्तन करने हेतु मृदंग, करताल और जिह्वा हैं। यदि हमारे पास मृदंग और करताल न भी हों, तो भी हमारे पास जिह्वा है। किसी को जिह्वा क्रय नहीं करनी पड़ती। हमारे पास उस ध्वनि को सुनने हेतु कान भी हैं, जिसे जिह्वा उच्चरित करती है। अतएव हमारे पास वे समस्त उपकरण हैं जिनकी हमें आवश्यकता है—एक जिह्वा और कान। हमें तो केवल हरे कृष्ण का कीर्तन करना है और अपने कानों से इस ध्वनि-कम्पन को सुनना है, और समस्त पूर्णता वहीं विद्यमान होगी। हमें कोई अत्यधिक शिक्षित वैज्ञानिक अथवा दार्शनिक बनने की आवश्यकता नहीं। हमें तो केवल कीर्तन करना और सुनना है।\n\nइस प्रकार हमारे पास सब कुछ पूर्ण है। पूर्णमदः पूर्णमिदम् [*ईशोपनिषद्*, आवाहन]: भगवान् द्वारा सृजित प्रत्येक वस्तु पूर्ण है। उदाहरणार्थ, यह समग्र पृथ्वी पूर्ण है। समुद्रों में पर्याप्त जल है, और सूर्य इस जल को वाष्पीकृत करता है, उसे बादलों में परिवर्तित करता है, और भूमि पर वर्षा बरसाता है ताकि पौधे उत्पन्न हों। और पर्वतों से शुद्ध नदियाँ बहती हैं ताकि वर्ष भर जल की आपूर्ति होती रहे। यदि हम कुछ सौ गैलन जल वाष्पीकृत करना चाहें, तो हमें अनेक प्रबन्ध करने पड़ते हैं, किन्तु यह सृष्टि इतनी पूर्ण है कि लाखों टन जल समुद्र से खींचा जा रहा है, बादलों में परिवर्तित किया जा रहा है, और फिर समस्त भूमि पर छिड़का जा रहा है तथा पर्वतों की चोटियों पर संचित किया जा रहा है, ताकि अन्न और शाक के उत्पादन हेतु जल उपलब्ध रहे। इस प्रकार सृष्टि पूर्ण है, क्योंकि वह पूर्ण से आती है, और इसी प्रकार आध्यात्मिक साक्षात्कार हेतु हमारे शरीर भी पूर्ण हैं। पूर्ण यन्त्र पहले से ही हमारे पास है। हमें तो केवल इसका उपयोग हरे कृष्ण के दिव्य ध्वनि-कम्पन (शब्द) को उच्चरित करने हेतु करना है, और हम समस्त भौतिक पीड़ाओं से पूर्ण मुक्ति प्राप्त कर लेंगे।"}
{"ref": "pop/9", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/9/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "मृत्यु के पश्चात् गन्तव्य", "purport": "sarva-dvārāṇi saṁyamya\n\nmano hṛdi nirudhya ca\n\nmūrdhny ādhāyātmanaḥ prāṇam\n\nāsthito yoga-dhāraṇām\n\n\"योग की स्थिति समस्त ऐन्द्रिक संलग्नताओं से विरक्ति की स्थिति है। इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बन्द करके और मन को हृदय में तथा प्राणवायु को मस्तक के शिखर पर स्थिर करके, मनुष्य स्वयं को योग में स्थापित करता है।\" (भगवद्गीता 8.12)\n\nयोग शब्द का एक अनुवाद \"जोड़\" है—अर्थात्, ठीक \"घटाव\" के विपरीत। वर्तमान क्षण में, अपनी भौतिक रूप से दूषित चेतना के कारण, हम भगवान् से घटे हुए हैं। जब हम अपने जीवन में भगवान् को जोड़ते हैं, जब हम उनसे जुड़ते हैं, तो जीवन पूर्ण हो जाता है। यह प्रक्रिया मृत्यु के समय पूर्ण की जानी चाहिए; अतएव जब तक हम जीवित हैं, हमें उस पूर्णता के बिन्दु के समीप पहुँचने का अभ्यास करना होगा, ताकि मृत्यु के समय, जब हम इस भौतिक शरीर का त्याग करें, तब हम परमेश्वर का साक्षात्कार कर सकें।\n\nprayāṇa-kāle manasācalena\n\nbhaktyā yukto yoga-balena caiva\n\nbhruvor madhye prāṇam āveśya samyak\n\nsa taṁ paraṁ puruṣam upaiti divyam\n\n\"जो मनुष्य मृत्यु के समय अपनी प्राणवायु को भौंहों के मध्य स्थिर करता है और पूर्ण भक्ति से परमेश्वर के स्मरण में संलग्न होता है, वह निश्चय ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्राप्त होगा।\" (भगवद्गीता 8.10) प्रयाण-काले शब्दों का अर्थ है \"मृत्यु के समय\"। जीवन मानो अन्तिम परीक्षा, अर्थात् मृत्यु की एक प्रकार की तैयारी है। यदि हम वह परीक्षा उत्तीर्ण कर लेते हैं, तो हम आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं। एक अत्यन्त प्रचलित बंगाली कहावत के अनुसार, \"पूर्णता हेतु तुम जो कुछ करते हो, उसकी परीक्षा तुम्हारी मृत्यु के समय होगी।\"\n\nयह प्रक्रिया, जिसके द्वारा योगी इन्द्रियों के द्वारों को बन्द करता है, तकनीकी रूप से प्रत्याहार कहलाती है, जिसका अर्थ है \"ठीक विपरीत\"। वर्तमान में, हमारी इन्द्रियाँ सांसारिक सौन्दर्य को देखने में संलग्न हैं। \"ठीक विपरीत\" का अर्थ है इन्द्रियों को उस सौन्दर्य से खींच लेना और भीतर के सौन्दर्य को देखना। श्रवण उस ओंकार ध्वनि पर एकाग्र किया जाता है जो भीतर है। इसी प्रकार, अन्य समस्त इन्द्रियाँ बाह्य क्रिया से खींच ली जाती हैं। तत्पश्चात् मन हृदय के भीतर विष्णु-मूर्ति पर एकाग्र किया जाता है (मनः हृदि निरुध्य)। निरुध्य शब्द का अर्थ है मन को हृदय के भीतर \"नियन्त्रित करना\"। जब योगी इस प्रकार अपनी इन्द्रियों को खींच लेता है और अपने मन को एकाग्र कर लेता है, तब वह प्राणवायु को मस्तक के शिखर पर स्थानान्तरित करता है और निर्णय लेता है कि उसे कहाँ जाना चाहिए। असंख्य लोक हैं, और इन लोकों के परे आध्यात्मिक जगत् है। योगी इन लोकों की जानकारी वैदिक साहित्य से प्राप्त करते हैं, ठीक जैसे, संयुक्त राज्य अमेरिका आने से पूर्व, मैंने इस देश की जानकारी पुस्तकों से प्राप्त की थी। चूँकि आध्यात्मिक जगत् के समस्त उच्चतर लोक वैदिक साहित्य में वर्णित हैं, अतः योगी सब कुछ जानता है और स्वयं को किसी भी इच्छित लोक में स्थानान्तरित कर सकता है। उसे किसी भौतिक अन्तरिक्ष-यान की आवश्यकता नहीं।\n\nवैज्ञानिक अनेक वर्षों से अन्तरिक्ष-यानों द्वारा अन्य लोकों तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु यह वह प्रक्रिया नहीं है। सम्भवतः इस साधन से एक या दो व्यक्ति किसी लोक तक पहुँच सकते हैं, किन्तु वह सामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह सबके लिए सम्भव नहीं है। सामान्यतः, यदि कोई स्वयं को किसी उच्चतर लोक में स्थानान्तरित करना चाहता है, तो वह इस ज्ञानयोग पद्धति का अभ्यास करता है। भक्तियोग पद्धति का नहीं। भक्तियोग की पद्धति किसी भौतिक लोक को प्राप्त करने हेतु प्रयोग नहीं की जाती।\n\nश्रीकृष्ण के भक्त इस भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर किसी भी लोक में रुचि नहीं रखते, क्योंकि वे जानते हैं कि समस्त लोकों पर चार मूल ताप विद्यमान हैं—जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु। उच्चतर लोकों पर, मनुष्य की आयु इस पृथ्वी की अपेक्षा कहीं अधिक हो सकती है, किन्तु अन्ततः मृत्यु वहाँ है। अतएव जो कृष्णभावनामृत में हैं, वे भौतिक जीवन में नहीं, अपितु आध्यात्मिक जीवन में रुचि रखते हैं, जिसका अर्थ है इन चतुर्विध तापों से छुटकारा। जो विवेकवान हैं, वे स्वयं को इस भौतिक जगत् के भीतर किसी भी लोक तक उन्नत करने का प्रयत्न नहीं करते। किसी उच्चतर लोक को प्राप्त करने हेतु, मनुष्य को एक विशिष्ट प्रकार का शरीर तैयार करना पड़ता है जो उसे उस लोक पर जीवित रहने में समर्थ बनाए। हम इन लोकों को कृत्रिम, भौतिकतावादी साधनों से प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि वहाँ रहने हेतु एक उपयुक्त शरीर आवश्यक है। हम जल के भीतर केवल अल्प समय तक रह सकते हैं, किन्तु मछलियाँ वहाँ अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करती हैं। किन्तु मछली के पास स्थल पर रहने के योग्य शरीर नहीं है। इसी प्रकार, किसी उच्चतर लोक में प्रवेश करने हेतु, मनुष्य को एक उपयुक्त शरीर तैयार करना पड़ता है।\n\nउच्चतर लोकों में, हमारे छह मास उनके एक दिन के बराबर हैं, और इन लोकों के निवासी दस सहस्र वर्ष जीवित रहते हैं। यह सब वैदिक साहित्य में वर्णित है। यद्यपि इन लोकों पर आयु बहुत दीर्घ है, तथापि अन्ततः मृत्यु है। दस सहस्र वर्ष, बीस सहस्र वर्ष, अथवा लाखों वर्ष के पश्चात्—चाहे जो भी हो—अन्ततः मृत्यु वहाँ है।\n\nकिन्तु, *भगवद्गीता* के सर्वारम्भ में ही हम सीखते हैं कि हम मृत्यु के अधीन नहीं हैं।\n\nna jāyate mriyate vā kadācin\n\nnāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ\n\najo nityaḥ śāśvato 'yaṁ purāṇo\n\nna hanyate hanyamāne śarīre\n\n\"आत्मा के लिए न कभी जन्म है और न मृत्यु। न तो वह एक बार होकर पुनः होना बन्द करता है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत, अमर तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारा जाता।\" (भगवद्गीता 2.20) इस प्रकार श्रीकृष्ण हमें शिक्षा देते हैं कि हम आत्मा हैं और नित्य हैं; तो फिर हम स्वयं को जन्म और मृत्यु के अधीन क्यों करें? जो अपनी बुद्धि का उपयोग करता है, वह इसे समझ सकता है। जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह ऐसे किसी लोक में प्रोन्नति में रुचि नहीं रखता जहाँ मृत्यु विद्यमान है; अपितु, आध्यात्मिक आकाश में प्रोन्नत होकर, वह ठीक भगवान् के समान शरीर प्राप्त करता है। ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः [ब्रह्म-संहिता 5.1]। भगवान् का शरीर सच्चिदानन्द है—नित्य, ज्ञानपूर्ण तथा आनन्दपूर्ण। अतएव श्रीकृष्ण समस्त आनन्द के आगार कहलाते हैं। यदि, इस शरीर को त्यागने पर, हम स्वयं को आध्यात्मिक जगत् में—श्रीकृष्ण के लोक अथवा किसी अन्य आध्यात्मिक लोक में—स्थानान्तरित कर लें, तो हम सच्चिदानन्द से पूर्ण एक तत्सम शरीर प्राप्त करते हैं।\n\nआत्मा शरीर के भीतर एक अत्यन्त सूक्ष्म कण है। इसे बाह्य शरीर के समान देखा नहीं जा सकता, किन्तु यह बाह्य शरीर को धारण किए हुए है। षट्-चक्र पद्धति का उद्देश्य आत्मा को मस्तक के सर्वोच्च भाग पर स्थित करना है। वहाँ से, जो ध्यानयोग में पूर्ण है, वह स्वयं को इच्छानुसार किसी उच्चतर लोक में स्थानान्तरित कर सकता है। यही इस प्रकार के योग की पूर्णता है। ध्यानयोगी कुछ-कुछ उस यात्री के समान है जो सोचता है, \"ओह, मैं देखूँ कि चन्द्रमा कैसा है, फिर मैं स्वयं को उच्चतर लोकों में स्थानान्तरित करूँगा।\" वह ब्रह्माण्ड में यहाँ से वहाँ जाता है, ठीक जैसे पृथ्वी पर यात्री न्यूयॉर्क से कैलिफ़ोर्निया अथवा कनाडा जाते हैं। किन्तु एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति इस भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर ऐसी अन्तर्ग्रहीय यात्रा में रुचि नहीं रखता। उसका लक्ष्य श्रीकृष्ण की सेवा तथा आध्यात्मिक आकाश में स्थानान्तरण है।\n\noṁ ity ekākṣaraṁ brahma\n\nvyāharan mām anusmaran\n\nyaḥ prayāti tyajan dehaṁ\n\nsa yāti paramāṁ gatim\n\n\"इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा पवित्र अक्षर ॐ, अक्षरों के परम संयोग का उच्चारण करते हुए, यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का चिन्तन करता है और अपने शरीर का त्याग करता है, तो वह निश्चय ही आध्यात्मिक लोकों को प्राप्त होगा।\" (भगवद्गीता 8.13) ॐ, अथवा ओंकार, दिव्य ध्वनि-कम्पन का संक्षिप्त रूप, अथवा निराकार रूप है। ध्यानयोगी को श्रीकृष्ण, अथवा विष्णु, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का स्मरण करते हुए ॐ का उच्चारण करना चाहिए। श्रीकृष्ण की निराकार ध्वनि ॐ है, किन्तु हरे कृष्ण ध्वनि में ॐ निहित है। चाहे जो भी हो, सम्पूर्ण योग-पद्धति का लक्ष्य विष्णु पर एकाग्रता है। निराकारवादी विष्णु के किसी रूप की कल्पना कर सकते हैं, किन्तु साकारवादी कल्पना नहीं करते; वे वास्तव में परमेश्वर के रूप का दर्शन करते हैं। चाहे कोई कल्पना करे अथवा वास्तव में दर्शन करे, उसे अपने मन को विष्णु-रूप पर एकाग्र करना होता है। यहाँ माम् शब्द का अर्थ है \"परमेश्वर, विष्णु में।\" यदि कोई इस शरीर का त्याग करते समय विष्णु का स्मरण कर सके, तो वह आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश कर सकता है।\n\nजो विवेकवान है, वह स्वाभाविक रूप से सोचता है, \"मैं नित्य और शाश्वत हूँ। मुझे उन वस्तुओं में रुचि क्यों लेनी चाहिए जो स्थायी नहीं हैं?\" वस्तुतः, कोई भी ऐसा अस्तित्व नहीं चाहता जो अस्थायी हो। यदि हम किसी अपार्टमेंट में रह रहे हैं और मकान-मालिक हमें उसे खाली करने को कहता है, तो हमें वैसा करना ही पड़ता है, चाहे हम जाना चाहें या न चाहें। किन्तु, यदि हम किसी बेहतर अपार्टमेंट में जाते हैं, तो हमें खेद नहीं होता। तथापि, यह हमारा स्वभाव है कि हम जहाँ रहते हैं, वहीं बने रहना चाहें। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम नित्य हैं और एक नित्य निवास चाहते हैं। हमारी प्रवृत्ति बने रहने की है। अतएव हम मरना नहीं चाहते। हम जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु के तापों को नहीं चाहते। ये बाह्य ताप हैं जो भौतिक प्रकृति द्वारा थोपे जाते हैं, और ये किसी ज्वर के समान हम पर आक्रमण करते हैं। स्वयं को इनसे मुक्त करने हेतु, हमें कुछ सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं। इन तापों से छुटकारा पाने हेतु, भौतिक शरीर से छुटकारा पाना आवश्यक है, क्योंकि ये ताप भौतिक अस्तित्व में अन्तर्निहित हैं।\n\nइस प्रकार ॐ का उच्चारण करके और परमेश्वर का चिन्तन करते हुए भौतिक शरीर का त्याग करके, योगी आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। किन्तु जो साकारवादी नहीं हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक लोक में प्रवेश नहीं कर सकते। वे बाहर, ब्रह्मज्योति तेज में रह जाते हैं। ठीक जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्यगोलक से अभिन्न नहीं है, वैसे ही परमेश्वर की ब्रह्मज्योति तेज परमेश्वर से अभिन्न नहीं है। निराकारवादी उस ब्रह्मज्योति में सूक्ष्म कणों के रूप में स्थापित कर दिए जाते हैं। हम सब आध्यात्मिक स्फुलिंग हैं, और ब्रह्मज्योति इन्हीं आध्यात्मिक स्फुलिंगों से पूर्ण है। इस प्रकार, निराकारवादी आध्यात्मिक अस्तित्व में विलीन हो जाते हैं; तथापि, व्यक्तित्व बना रहता है, क्योंकि आत्मा स्वभावतः एक व्यष्टि है। चूँकि निराकारवादी कोई साकार रूप नहीं चाहते, अतः वे निराकार ब्रह्मज्योति में स्थापित तथा धारण किए जाते हैं। वहाँ वे ठीक उसी प्रकार विद्यमान रहते हैं जैसे सूर्य के प्रकाश के भीतर परमाणु विद्यमान रहते हैं। व्यष्टि आध्यात्मिक स्फुलिंग ब्रह्मज्योति के भीतर मानो समजातीय रूप में बना रहता है।\n\nजीव के रूप में, हम सब आनन्द चाहते हैं। हम केवल अस्तित्व नहीं चाहते। हम स्वभावतः सच्चिदानन्द हैं—नित्य (सत्), ज्ञानपूर्ण (चित्), तथा आनन्दपूर्ण (आनन्द)। जो निराकार ब्रह्मज्योति में प्रवेश करते हैं, वे इस ज्ञान के साथ कि \"अब मैं विलीन हूँ। अब मैं ब्रह्म से एक हूँ\", वहाँ नित्य नहीं रह सकते। यद्यपि वहाँ नित्यता और ज्ञान है, तथापि आनन्द का अभाव है। कोई किसी कक्ष में वर्ष-प्रति-वर्ष अकेला कौन रह सकता है, कोई पुस्तक पढ़ते हुए और स्वयं को आनन्दित करने का प्रयत्न करते हुए? हम सदा अकेले नहीं रह सकते। अन्ततः हम उस कक्ष को छोड़ देंगे और किसी संगति की खोज करेंगे। यह हमारा स्वभाव है कि हम दूसरों के साथ कुछ मनोरंजन चाहें। निराकारवादी, भगवान् के निराकार तेज में अपनी स्थिति के एकाकीपन से असन्तुष्ट होकर, अतः पुनः इस भौतिक जगत् में लौट आते हैं। यह *श्रीमद्भागवत* (10.2.32) में कहा गया है:\n\nye 'nye 'ravindākṣa vimukta-māninas\n\ntvayy asta-bhāvād a viśuddha-buddhayaḥ\n\nāruhya kṛcchreṇa paraṁ padaṁ tataḥ\n\npatanty adho 'nādṛta-yuṣmad-aṅghrayaḥ\n\n\"हे कमलनयन भगवान्, यद्यपि अभक्त, जो सर्वोच्च स्थिति प्राप्त करने हेतु कठोर तप तथा तपस्याएँ स्वीकार करते हैं, स्वयं को मुक्त मान सकते हैं, तथापि उनकी बुद्धि अशुद्ध है। वे अपनी कल्पित श्रेष्ठता की स्थिति से नीचे गिर जाते हैं, क्योंकि उन्हें आपके चरणकमलों का कोई आदर नहीं।\"\n\nनिराकारवादी किसी लोक की खोज में अन्तरिक्ष-यात्रियों के समान हैं। यदि वे किसी लोक पर विश्राम नहीं कर पाते, तो उन्हें पृथ्वी पर लौटना पड़ता है। यहीं *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है (अनादृत-युष्मद्-अङ्घ्रयः) कि निराकारवादी को भौतिक जगत् में लौटना ही पड़ता है, क्योंकि उसने परमेश्वर की प्रेम और भक्ति से सेवा करने की उपेक्षा की है। जब तक हम इस पृथ्वी पर हैं, हमें श्रीकृष्ण, परमेश्वर से प्रेम करने तथा उनकी सेवा करने का अभ्यास करना चाहिए; तभी हम उनके आध्यात्मिक लोक में प्रवेश कर सकते हैं। यदि हम इस प्रकार प्रशिक्षित नहीं हैं, तो हम एक निराकारवादी के रूप में ब्रह्मज्योति में प्रवेश कर सकते हैं, किन्तु इसमें पूरा-पूरा संकट है कि हम पुनः भौतिक अस्तित्व में गिर पड़ेंगे। एकाकीपन के कारण, हम किसी संगति की खोज करेंगे और इसलिए भौतिक जगत् में लौट आएँगे। हम वस्तुतः जो चाहते हैं, वह परमेश्वर की नित्य संगति है। यही नित्यता, ज्ञान तथा आनन्द की हमारी स्वाभाविक स्थिति है। यदि हम अकेले हैं, यदि हम परमेश्वर की संगति नहीं करते, तो उस आनन्द का अभाव रहता है। आनन्द के अभाव में, हम असहज अनुभव करते हैं। आनन्द के अभाव में, हम किसी भी प्रकार की संगति, किसी भी प्रकार के आनन्द को स्वीकार कर लेंगे। अतएव, एक प्रकार की हताशा से, हम कहेंगे, \"ठीक है, तो फिर मुझे पुनः भौतिक आनन्द ही मिल जाए।\" यही वह संकट है जिसे निराकारवादी मोल लेते हैं।\n\nभौतिक जगत् में, सर्वोच्च आनन्द काम-भोग में पाया जाता है। वह तो आध्यात्मिक जगत् में श्रीकृष्ण के साथ अनुभूत आनन्द का मात्र विकृत प्रतिबिम्ब है। जब तक आध्यात्मिक जगत् में काम-भोग विद्यमान न हो, तब तक यह यहाँ प्रतिबिम्बित नहीं हो सकता। किन्तु, हमें यह समझना चाहिए कि यहाँ वह प्रतिबिम्ब विकृत है। वास्तविक जीवन तो वहाँ श्रीकृष्ण में है। श्रीकृष्ण आनन्द से पूर्ण हैं, और यदि हम स्वयं को कृष्णभावनामृत में उनकी सेवा करने हेतु प्रशिक्षित करें, तो मृत्यु के समय स्वयं को आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित करना और कृष्णलोक, अर्थात् श्रीकृष्ण के लोक में प्रवेश करना तथा समस्त आनन्द के आगार श्रीकृष्ण की संगति में आनन्दित होना सम्भव होगा।\n\nश्रीकृष्ण के लोक का वर्णन ब्रह्म-संहिता (5.29) में इस प्रकार किया गया है:\n\ncintāmaṇi-prakara-sadmasu kalpa-vṛkṣa-\n\nlakṣāvṛteṣu surabhīr abhipālayantam\n\nlakṣmī-sahasra-śata-sambhrama-sevyamānaṁ\n\ngovindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi\n\n\"मैं उन आदि-पुरुष भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जो प्रथम जनक हैं, जो समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली सुरभि गौओं का पालन करते हैं, जो लाखों कल्पवृक्षों (इच्छापूरक वृक्षों) तथा आध्यात्मिक रत्नों से निर्मित धामों से घिरे हैं, और जिनकी सहस्रों लक्ष्मियाँ अत्यन्त श्रद्धा और स्नेह से सदा सेवा करती हैं।\" इस प्रकार कृष्णलोक का वर्णन किया गया है। वहाँ घर स्पर्शमणि (चिन्तामणि) के बने हैं। यदि स्पर्शमणि का एक छोटा कण किसी लौह-दण्ड को स्पर्श करे, तो वह दण्ड तत्काल स्वर्ण में परिणत हो जाएगा। निस्सन्देह, इस भौतिक जगत् में हमें स्पर्शमणि जैसी किसी वस्तु का कोई अनुभव नहीं है, किन्तु ब्रह्म-संहिता के अनुसार कृष्णलोक के समस्त धाम स्पर्शमणि से निर्मित हैं। इसी प्रकार, वहाँ के वृक्ष इच्छावृक्ष (कल्पवृक्ष) कहलाते हैं, क्योंकि मनुष्य उनसे जो कुछ चाहे, वही प्राप्त कर सकता है। यहाँ हम आम के वृक्ष से केवल आम ही प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु कृष्णलोक में हम किसी भी वृक्ष से जो कुछ चाहें, वही प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि वे वृक्ष कल्पवृक्ष हैं। यह तो कृष्णलोक, अर्थात् आध्यात्मिक आकाश में श्रीकृष्ण के नित्य धाम का मात्र आंशिक वर्णन है।\n\nअतएव निष्कर्ष यह है कि हमें स्वयं को किसी भी भौतिक लोक तक उन्नत करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, क्योंकि जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु की वही दुःखमय परिस्थितियाँ उन सबमें विद्यमान हैं। वैज्ञानिक \"वैज्ञानिक\" प्रगति पर अत्यन्त गर्व करते हैं, किन्तु वे वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु को रोकने में समर्थ नहीं हो सके हैं। वे मृत्यु को त्वरित करने हेतु कोई वस्तु निर्मित कर सकते हैं, किन्तु ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मृत्यु को रोक सके। यह उनकी शक्ति में नहीं है।\n\nजो विवेकवान हैं, वे जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का अन्त करने तथा नित्यता, आनन्द और ज्ञान से पूर्ण एक आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने में रुचि रखते हैं। भक्तियोगी जानता है कि ऐसा जीवन कृष्णभावनामृत के अभ्यास तथा मृत्यु के समय श्रीकृष्ण के स्मरण के द्वारा सम्भव है।\n\nananya-cetāḥ satatam\n\nyo māṁ smarati nityaśaḥ\n\ntasyāhaṁ sulabhaḥ pārtha\n\nnitya-yuktasya yoginaḥ\n\n\"जो अनन्य भाव से मेरा निरन्तर स्मरण करता है, हे पृथापुत्र, उसके लिए मैं सुलभ हूँ, क्योंकि वह भक्ति में निरन्तर संलग्न रहता है।\" (भगवद्गीता 8.14) इस श्लोक में, नित्य-युक्त शब्द का अर्थ है \"निरन्तर समाधि में\"। ऐसा व्यक्ति जो निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है और सदा कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, वही सर्वोच्च योगी है। उसका ध्यान ज्ञानयोग, ध्यानयोग, अथवा किसी अन्य पद्धति की ओर विचलित नहीं होता। उसके लिए केवल एक ही पद्धति है—श्रीकृष्ण। अनन्य-चेताः का अर्थ है \"अविचल भाव से\"। एक कृष्णभावनाभावित भक्त किसी भी वस्तु से विक्षुब्ध नहीं होता, क्योंकि उसका मन सदा श्रीकृष्ण पर एकाग्र रहता है। सततम् शब्द का अर्थ है कि वह समस्त स्थानों पर और समस्त समय श्रीकृष्ण का चिन्तन करता रहता है। जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब वे वृन्दावन में प्रकट हुए। यद्यपि मैं इस समय अमेरिका में रह रहा हूँ, मेरा निवास वृन्दावन में है, क्योंकि मैं सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करता हूँ। यद्यपि मैं न्यूयॉर्क के किसी अपार्टमेंट में हो सकता हूँ, मेरी चेतना वहाँ है, और यह वहीं होने के तुल्य है।\n\nकृष्णभावनामृत का अर्थ है सदा श्रीकृष्ण के साथ उनके आध्यात्मिक लोक में रहना। चूँकि हम श्रीकृष्ण के प्रति भावनाभावित हैं, अतः हम पहले से ही उनके साथ रह रहे हैं। हमें तो केवल इस भौतिक शरीर का त्याग करके वहाँ जाने हेतु प्रतीक्षा करनी है। जो श्रीकृष्ण का अविचल भाव से स्मरण करता है, उसके लिए वे सुलभ हैं। तस्याहं सुलभः पार्थ: \"मैं उनके लिए अत्यन्त सस्ता हो जाता हूँ।\" जो कृष्णभावनामृत को अपनाता है, उसके लिए सर्वाधिक मूल्यवान वस्तु अत्यन्त सुलभ हो जाती है। चूँकि मनुष्य भक्तियोग में संलग्न है, अतः श्रीकृष्ण सरलता से सुलभ हो जाते हैं। हम श्रीकृष्ण को प्राप्त करने हेतु इतना कठोर प्रयत्न क्यों करें, जब श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं, \"मैं सुलभ हूँ\"? हमें तो केवल हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का चौबीसों घण्टे प्रतिदिन जप करना है। कोई कठोर नियम तथा विधान नहीं है। हम मार्ग पर अथवा भूमिगत रेल में, अपने घर में अथवा अपने कार्यालय में जप कर सकते हैं। न कोई व्यय है, न कोई कर।\n\nवस्तुतः श्रीकृष्ण, सर्वशक्तिमान होने के कारण, अजेय हैं, किन्तु कहा जाता है कि वे न केवल प्राप्त किए जाते हैं, अपितु शुद्ध भक्ति के द्वारा जीते भी जाते हैं। जैसा पूर्व में कहा गया, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का साक्षात्कार करना सामान्यतः अत्यन्त कठिन है; अतएव उनके नामों में से एक अजित है, जिसका अर्थ है, \"वे जिन्हें कोई जीत नहीं सकता।\" *श्रीमद्भागवत* (10.14.3) में, ब्रह्मा अजित से प्रार्थना करते हैं,\n\njñāne prayāsam udapāsya namanta eva\n\njīvanti san-mukharitāṁ bhavadīya-vārtām\n\nsthāne sthitāḥ śruti-gatāṁ tanu-vāṅ-manobhir\n\nye prāyaśo 'jita jito 'py asi tais tri-lokyām\n\n\"हे मेरे प्रिय भगवान् अजित, जो भक्त परम सत्य की निराकार धारणाओं को त्याग चुके हैं और इसीलिए जिन्होंने अनुभववादी दार्शनिक सत्यों की चर्चा छोड़ दी है, उन्हें आत्म-साक्षात्कारी भक्तों से आपके पवित्र नाम, रूप, लीला तथा गुणों के विषय में सुनना चाहिए। उन्हें भक्ति के सिद्धान्तों का पूर्णतया पालन करना चाहिए और अवैध काम, द्यूत, मद्यपान तथा पशु-वध से मुक्त रहना चाहिए। शरीर, वचन और मन से स्वयं को पूर्णतया समर्पित करके, वे किसी भी आश्रम अथवा सामाजिक स्थिति में रह सकते हैं। निस्सन्देह, आप ऐसे व्यक्तियों द्वारा जीते जाते हैं, यद्यपि आप सदा अजेय हैं।\"\n\nइस श्लोक में, ज्ञाने प्रयासम् शब्द उन ब्रह्मविद्यावादियों तथा दार्शनिकों को इंगित करते हैं जो वर्ष-प्रति-वर्ष और जन्म-जन्मान्तर भगवान्, अथवा परम सत्य को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनके प्रयास उस कूप के मेंढक के समान हैं जो अटलांटिक तथा प्रशान्त महासागरों की विशालता को समझने का प्रयत्न कर रहा है। बाह्य अन्तरिक्ष को मापने के हमारे प्रयास तक व्यर्थ हैं, फिर भगवान् को मापने के प्रयास का तो कहना ही क्या। ऐसे प्रयास असफलता हेतु अभिशप्त हैं; अतएव *श्रीमद्भागवत* अनुशंसा करता है कि हम परमेश्वर को मापने के समस्त प्रयास त्याग दें। अपने सीमित ज्ञान से भगवान् को समझने का प्रयत्न करना पूर्णतया व्यर्थ है, और एक विवेकवान व्यक्ति इसे समझता है। हमें विनम्र बनना चाहिए और यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि इस सृष्टि में हमारी स्थिति एक अत्यन्त नगण्य अंश की है। नमन्त एव शब्द इंगित करते हैं कि हमें परमेश्वर को किसी विश्वसनीय स्रोत से समझने हेतु बस विनम्र बन जाना है। और वह स्रोत क्या है? सन्-मुखरिताम्: आत्म-साक्षात्कारी आत्माओं के मुख से। अर्जुन भगवान् को साक्षात् श्रीकृष्ण के मुख से समझ रहे हैं, और हमें भगवान् को अर्जुन अथवा उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि के मुख से समझना होगा। हम भगवान् के दिव्य स्वरूप को केवल किसी विश्वसनीय स्रोत से ही समझ सकते हैं। वह स्रोत भारतीय, यूरोपीय, अमेरिकी, जापानी, हिन्दू, मुसलमान, अथवा कुछ भी हो सकता है। परिस्थितियाँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। हमें तो केवल सुनकर समझने का प्रयत्न करना है और फिर उस प्रक्रिया को अपने दैनिक जीवन में व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना है। विनम्र बनकर, सही स्रोत से सुनकर, और शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में लागू करने का प्रयत्न करके, हम परमेश्वर के विजेता बन सकते हैं। जो ऐसा करता है, उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण सरलता से सुलभ हो जाते हैं। सामान्यतः, भगवद्-साक्षात्कार अत्यन्त कठिन है, किन्तु जो विनम्र भाव से सुनता है (श्रुति-गताम्), उसके लिए यह अत्यन्त सरल है।\n\nज्ञान अर्जित करने की दो प्रक्रियाएँ हैं: एक आरोही प्रक्रिया (आरोह-पन्था) है, और दूसरी अवरोही प्रक्रिया (अवरोह-पन्था) है। आरोही प्रक्रिया से, मनुष्य अपने ही प्रयासों से—दर्शन करके, ध्यान करके, अथवा कल्पना करके—भगवान् को समझने का प्रयत्न करता है। अवरोही प्रक्रिया के अनुसार, मनुष्य ज्ञान केवल किसी प्रामाणिक स्रोत से, प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु तथा शास्त्रों से सुनकर अर्जित करता है। जहाँ तक आरोही प्रक्रिया का प्रश्न है, ब्रह्म-संहिता (5.34) में कहा गया है,\n\npanthās tu koṭi-śata-vatsara-sampragamyo\n\nvāyor athāpi manaso muni-puṅgavānām\n\nso 'py asti yat-prapada-sīmny a vicintya-tattve\n\ngovindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi\n\n\"मैं उन आदि-पुरुष भगवान् गोविन्द की आराधना करता हूँ, जिनके चरणकमलों के केवल अँगूठों के अग्रभाग तक ही वे योगी और ज्ञानी पहुँच पाते हैं, जो वायु अथवा मन की गति से अरबों वर्षों तक यात्रा करते हैं।\" हम सब समझ सकते हैं कि मन की गति कितनी महान है। न्यूयॉर्क नगर में बैठे होने पर भी, मैं तत्काल भारत का चिन्तन कर सकता हूँ, जो हज़ारों-हज़ारों मील दूर है। यहीं कहा गया है कि भले ही कोई इस गति से अरबों वर्षों तक यात्रा करे, फिर भी श्रीकृष्ण अचिन्त्य ही बने रहेंगे। मुनि-पुङ्गवानाम् शब्द एक महान विचारक को इंगित करता है, किसी सामान्य व्यक्ति को नहीं। भले ही ऐसा महान विचारक मन की गति से लाखों वर्षों तक यात्रा करे, फिर भी वह पूर्ण पुरुष को अज्ञेय ही पाएगा। फिर भी जो कृष्णभावनामृत के इस मार्ग को अविचल भाव से अपनाता है, उसके लिए श्रीकृष्ण सुलभ हैं। ऐसा क्यों है? नित्य-युक्तस्य योगिनः: \"क्योंकि ऐसा व्यक्ति निरन्तर मेरी भक्ति में संलग्न रहता है, और मैं उसे भूल नहीं सकता।\" अतः यही वह प्रक्रिया है। हमें तो केवल भगवान् का ध्यान आकर्षित करने हेतु विनम्र बनना है। मेरे गुरु महाराज कहा करते थे, \"भगवान् को देखने का प्रयत्न मत करो, अपितु इस प्रकार कार्य करो कि भगवान् तुम्हें देखें। भगवान् तुम्हारी देखभाल करेंगे। तुम्हें उन्हें देखने का प्रयत्न नहीं करना है।\"\n\nयही हमारी प्रवृत्ति होनी चाहिए। हमें यह नहीं सोचना चाहिए, \"मैं भगवान् को देखना चाहता हूँ। हे भगवन्, कृपया आइए और मेरे समक्ष खड़े हो जाइए। मेरे सेवक के समान बन जाइए।\" किन्तु चूँकि भगवान् किसी के सेवक नहीं हैं, अतः हमें अपने प्रेम और सेवा से उन्हें अनुगृहीत करना होगा। हम सब जानते हैं कि किसी देश के राजा अथवा राष्ट्रपति को देखना कितना कठिन है। एक सामान्य व्यक्ति के लिए ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति से भेंट करना व्यवहारतः असम्भव है, फिर इस महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के स्वयं आकर उसके समक्ष खड़े होने का तो कहना ही क्या। फिर भी लोग यह माँग कर रहे हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् आएँ और उनके समक्ष खड़े हो जाएँ। श्रीकृष्ण की लालसा करना हमारा स्वभाव है, क्योंकि वे ब्रह्माण्ड में सर्वाधिक आकर्षक, सर्वाधिक सुन्दर, सर्वाधिक ऐश्वर्यवान, सर्वाधिक शक्तिशाली, सर्वाधिक विद्वान तथा सर्वाधिक यशस्वी पुरुष हैं। प्रत्येक व्यक्ति इन गुणों की लालसा करता है, और श्रीकृष्ण इन समस्त गुणों के आगार हैं, और वे इन्हें पूर्ण रूप से धारण करते हैं। श्रीकृष्ण सर्वस्व के आगार हैं (रसो वै सः); अतएव जब हम सौन्दर्य अथवा शक्ति अथवा ज्ञान अथवा यश की लालसा करते हैं, तब हमें अपना ध्यान श्रीकृष्ण की ओर मोड़ देना चाहिए। तब हमारे हृदय की जो भी इच्छा हो, वह हमें स्वतः प्राप्त हो जाएगी।"}
{"ref": "pop/10", "book": "pop", "lang": "hi", "url": "/hi/library/pop/10/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "पूर्णता का पथ", "purport": "mām upetya punar janma\n\nduḥkhālayam aśāśvatam\n\nnāpnuvanti mahātmānaḥ\n\nsaṁsiddhiṁ paramāṁ gatāḥ\n\n\"मुझे प्राप्त करने के पश्चात् वे महात्मा, जो भक्ति में स्थित योगी हैं, इस अनित्य संसार में फिर कभी नहीं लौटते, जो दुःखों से भरा हुआ है, क्योंकि उन्होंने सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर ली है।\" (गीता 8.15)\n\nइस भौतिक जगत् को इसके रचयिता, अर्थात् परमेश्वर ने स्वयं दुःखालयम् कहकर प्रमाणित किया है, जिसका अर्थ है \"दुःखों का स्थान\"। जब बात ऐसी है, तब हम तथाकथित वैज्ञानिक प्रगति से इसे सुखमय कैसे बना सकते हैं? दुःख का अर्थ है \"कष्ट\" अथवा \"पीड़ा\", और वास्तविक पीड़ा है जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु। हमने इन समस्याओं को एक ओर रख छोड़ा है, क्योंकि हम इनका समाधान नहीं कर सकते; अतः वैज्ञानिक अणुबमों तथा अन्तरिक्षयानों पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे इन महत्त्वपूर्ण समस्याओं का समाधान क्यों नहीं कर पाते, जो सदैव हमें पीड़ा पहुँचाती रहती हैं? स्पष्ट है कि उनमें ऐसा करने की शक्ति नहीं है।\n\nकिन्तु इस श्लोक में श्रीकृष्ण समाधान देते हैं: mām upetya punar janma [गीता 8.15]। अर्थात्, \"यदि कोई मेरे धाम को प्राप्त कर ले, तो वह इस दुःखमय स्थान पर फिर नहीं लौटता।\" दुर्भाग्यवश, तमोगुण में डूबे होने के कारण लोग यह नहीं समझ पाते कि वे एक दुःखमय स्थिति में हैं। पशु अपनी दुःखमय स्थिति को नहीं समझ सकते, क्योंकि उनमें विवेक नहीं होता। मनुष्य के पास विवेक है, जिससे वह इसे समझ सकता है, किन्तु इस युग में लोग अपनी विवेक-शक्ति का प्रयोग अपनी पाशविक प्रवृत्तियों की तृप्ति हेतु कर रहे हैं। विवेक का प्रयोग तो इस दुःखमय अवस्था से मुक्त होने में होना चाहिए। तथापि, यदि हम बिना विचलित हुए चौबीसों घण्टे कृष्णभावनामृत में संलग्न रहें, तो हम श्रीकृष्ण के पास जाएँगे और इस दुःखमय संसार में पुनः जन्म नहीं लेंगे। महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः: वे महान् आत्माएँ, जिन्होंने सर्वोच्च पूर्णता अर्थात् कृष्णभावनामृत प्राप्त कर ली है, सदा के लिए दुःख से मुक्त हो जाती हैं। इस श्लोक में महात्मा शब्द उस कृष्णभावनाभावित मनुष्य की ओर संकेत करता है, जो श्रीकृष्ण के धाम में प्रवेश करने योग्य है। महात्मा शब्द महात्मा गांधी जैसे किसी राजनैतिक नेता की ओर नहीं, अपितु एक महान् आत्मा अर्थात् श्रीकृष्ण के शुद्ध भक्त की ओर संकेत करता है।\n\nजब श्रीकृष्ण कहते हैं कि महात्मा उनके धाम में प्रवेश करता है, तब वे अपने दिव्य राज्य, गोलोक वृन्दावन की ओर संकेत करते हैं। जिस वृन्दावन से मैं आया हूँ, वह भौम वृन्दावन कहलाता है, जिसका अर्थ है कि वह वही वृन्दावन है जो इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। जिस प्रकार श्रीकृष्ण अपनी निजी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, उसी प्रकार उनका धाम, उनका आवास भी अवतरित होता है। दूसरे शब्दों में, जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं, तब वे स्वयं को उस विशेष भूमि, वृन्दावन में प्रकट करते हैं, और इसलिए वह भूमि भी पवित्र है। इसके अतिरिक्त, आध्यात्मिक आकाश में श्रीकृष्ण का अपना धाम है, और यह गोलोक वृन्दावन कहलाता है।\n\nमहात्मा इस जीवन में उस दिव्य धाम में प्रवेश करने की तैयारी करता है। मनुष्य-योनि प्रकृति का अपने सर्वोत्तम हित में उपयोग कर सकती है। पशु ऐसा नहीं कर सकते। इन सुविधाओं का उपयोग महात्मा बनने के प्रयास में तथा इस भौतिक जगत् में जन्म का अन्त करने में होना चाहिए, जो त्रिविध तापों से युक्त है। ये त्रिविध ताप वे हैं जो मन अथवा शरीर से सम्बन्धित होते हैं, प्राकृतिक उपद्रव, तथा अन्य जीवों के द्वारा उत्पन्न दुःख। इस भौतिक जगत् में हमारी स्थिति चाहे जो भी हो, हम पर सदैव किसी-न-किसी प्रकार का दुःख थोपा जाता रहता है। श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इस भौतिक जगत् में दुःख से बचना सम्भव नहीं है, क्योंकि यह जगत् दुःख के लिए ही बना है। जब तक दुःख उपस्थित न हों, तब तक हम कृष्णभावनामृत में नहीं आ सकते। दुःख एक प्रेरणा का कार्य करता है, जो हमें कृष्णभावनामृत तक उठाने में सहायक होता है। एक बुद्धिमान् व्यक्ति यह समझता है कि यद्यपि वह दुःख नहीं चाहता, फिर भी उस पर बलपूर्वक दुःख थोपे जाते हैं। कोई दुःख नहीं चाहता, किन्तु व्यक्ति को इतना बुद्धिमान् होना चाहिए कि वह प्रश्न करे, \"ये दुःख मुझ पर बलपूर्वक क्यों थोपे जा रहे हैं?\" दुर्भाग्यवश, आधुनिक सभ्यता में लोग दुःखों को एक ओर रखने का प्रयत्न करते हैं, यह सोचकर, \"अरे, क्यों कष्ट उठाना? मैं अपने दुःखों को किसी मादक पदार्थ से ढक लेता हूँ।\" किन्तु जीवन के दुःखों का समाधान कृत्रिम नशे से नहीं हो सकता। ज्यों ही नशा उतरता है, मनुष्य उसी बिन्दु पर लौट आता है। भौतिक अस्तित्व के दुःखों का समाधान केवल कृष्णभावनामृत से ही हो सकता है। यदि हम सदैव कृष्णभावनामृत में स्थित रहें, तो इस भौतिक शरीर को छोड़ने पर हम श्रीकृष्ण के लोक में स्थानान्तरित हो जाएँगे। यही सर्वोच्च पूर्णता कहलाती है।\n\nलोग पूछ सकते हैं, \"अच्छा, आप कहते हैं कि श्रीकृष्ण के लोक में प्रवेश करना ही सर्वोच्च पूर्णता है, किन्तु हमारी रुचि तो चन्द्रमा पर जाने में है। क्या यह भी एक प्रकार की पूर्णता नहीं है?\" वस्तुतः, उच्चतर लोकों में प्रवेश करने की इच्छा मनुष्य के मन में सदैव विद्यमान रहती है। तथ्यतः जीव का एक अन्य नाम सर्व-गत है, जिसका अर्थ है कि वह सर्वत्र भ्रमण करना चाहता है। यही जीव का स्वभाव है। जिन अमेरिकियों के पास धन होता है, वे प्रायः भारत, यूरोप अथवा किसी अन्य देश में जाते हैं, क्योंकि उन्हें एक ही स्थान पर ठहरना अच्छा नहीं लगता। यही हमारा स्वभाव है, और इसी कारण हम चन्द्रमा पर अथवा अन्यत्र जाने में रुचि रखते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण के अनुसार, चाहे हम उच्चतर लोकों को भी प्राप्त कर लें, तब भी हम भौतिक दुःखों के अधीन ही रहते हैं।\n\nābrahma-bhuvanāl lokāḥ\n\npunar āvartino 'rjuna\n\nmām upetya tu kaunteya\n\npunar janma na vidyate\n\n\"भौतिक जगत् के सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम लोक तक, सभी दुःख के स्थान हैं, जहाँ बारम्बार जन्म और मृत्यु होती रहती है। किन्तु हे कुन्तीपुत्र! जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है, वह फिर कभी जन्म नहीं लेता।\" (गीता 8.16)\n\nब्रह्माण्ड चौदह लोक-मण्डलों (चतुर्दश-भुवन) में विभाजित है—सात निम्नतर और सात उच्चतर। पृथ्वी मध्य में स्थित है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं, आब्रह्म-भुवनाल् लोकाः: चाहे कोई सर्वोच्च लोक, ब्रह्मलोक में ही प्रवेश कर ले, फिर भी वहाँ जन्म और मृत्यु है। पुनर् आवर्तिनः शब्दों का अर्थ है \"पुनः लौटना\", अथवा \"जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति\"। हम शरीरों को उसी प्रकार बदलते रहते हैं जैसे हम वस्त्र बदलते हैं, एक शरीर को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करते हुए। सभी लोक जीवों से भरे हुए हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि केवल पृथ्वी ही बसी हुई है। उच्चतर लोकों पर तथा निम्नतर लोकों पर भी जीव हैं। अपने अनुभव से हम देख सकते हैं कि पृथ्वी पर कोई भी स्थान जीवों से रहित नहीं है। यदि हम पृथ्वी खोदें, तो हमें कुछ कीड़े मिलते हैं, और यदि हम जल में जाएँ तो हमें अनेक जलचर मिलते हैं। वायु पक्षियों से भरी हुई है, और यदि हम बाह्य अन्तरिक्ष का विश्लेषण करें, तो हमें अनेक जीव मिलेंगे। यह निष्कर्ष निकालना अतार्किक है कि अन्य लोकों पर कोई जीव नहीं हैं। इसके विपरीत, वे जीवों से परिपूर्ण हैं।\n\nजो भी हो, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम लोक तक जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति है। फिर भी, पूर्व श्लोक की भाँति, वे कहते हैं, माम् उपेत्य: \"यदि तुम मेरे लोक को प्राप्त कर लो, तो तुम्हें इस दुःखमय भौतिक जगत् में लौटना नहीं पड़ता।\" इस बात पर बल देने हेतु श्रीकृष्ण दोहराते हैं कि गोलोक वृन्दावन, अपने नित्य धाम को प्राप्त करने पर मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है और नित्य जीवन प्राप्त कर लेता है। इन समस्याओं को समझना तथा एक आनन्दमय, नित्य जीवन प्राप्त करना, जो ज्ञान से परिपूर्ण हो, मनुष्य-जीवन का कर्तव्य है। दुर्भाग्यवश, इस युग के लोग जीवन के लक्ष्य को भूल गए हैं। क्यों? दुराशया ये बहिर्-अर्थ-मानिनः (भा. 7.5.31)। लोग भौतिक चकाचौंध के जाल में फँस गए हैं—गगनचुम्बी अट्टालिकाओं, विशाल कारखानों, और राजनैतिक गतिविधियों के द्वारा। लोग ठहरकर यह विचार नहीं करते कि गगनचुम्बी अट्टालिका चाहे कितनी ही विशाल क्यों न हो, उन्हें उसमें अनन्त काल तक रहने की अनुमति नहीं मिलेगी। अतः हमें अपनी ऊर्जा महान् नगरों के निर्माण में नष्ट नहीं करनी चाहिए, अपितु अपनी ऊर्जा का उपयोग स्वयं को कृष्णभावनामृत तक उठाने में करना चाहिए। कृष्णभावनामृत कोई धार्मिक सूत्र अथवा कोई आध्यात्मिक मनोरंजन नहीं है, अपितु हमारे जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।\n\nलोग उच्चतर लोकों को प्राप्त करने में रुचि रखते हैं, क्योंकि वहाँ मनुष्य का भोग हज़ार गुना अधिक होता है और आयु बहुत अधिक लम्बी होती है।\n\nsahasra-yuga-paryantam\n\nahar yad brahmaṇo viduḥ\n\nrātriṁ yuga-sahasrāntāṁ\n\nte 'ho-rātra-vido janāḥ\n\n(गीता 8.17)\n\nभौतिक ब्रह्माण्ड की अवधि सीमित है। यह कल्पों के चक्रों में प्रकट होता है। एक कल्प ब्रह्मा का एक दिन है, और ब्रह्मा का एक दिन चार युगों, अर्थात् युगों के एक हज़ार चक्रों से बनता है: सत्य, त्रेता, द्वापर, और कलि। सत्ययुग का चक्र पुण्य, प्रज्ञा और धर्म से युक्त है, जिसमें अज्ञान और पाप व्यावहारिक रूप से नहीं होते, और यह युग 17,28,000 वर्ष तक रहता है। त्रेतायुग में पाप का प्रवेश होता है, और यह युग 12,96,000 वर्ष तक रहता है। द्वापरयुग में पुण्य और धर्म का और भी अधिक ह्रास होता है, पाप बढ़ता जाता है, और यह युग 5,64,000 वर्ष तक रहता है। और अन्ततः, कलियुग में (वह युग जिसे हम विगत पाँच हज़ार वर्षों से भोग रहे हैं), कलह, अज्ञान, अधर्म और पाप की प्रचुरता होती है, सच्चा पुण्य व्यावहारिक रूप से अविद्यमान रहता है, और यह युग 4,32,000 वर्ष तक रहता है। कलियुग में पाप इस सीमा तक बढ़ जाता है कि युग के अन्त में परमेश्वर स्वयं कल्कि-अवतार के रूप में प्रकट होते हैं, असुरों का संहार करते हैं, अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, और एक और सत्ययुग का आरम्भ करते हैं। तत्पश्चात् यह प्रक्रिया पुनः चलने लगती है। ये चार युग एक हज़ार बार घूमकर सृष्टिकर्ता देव ब्रह्मा के एक दिन की रचना करते हैं, और उतनी ही संख्या एक रात्रि की रचना करती है। ब्रह्मा ऐसे एक सौ \"वर्ष\" जीते हैं और फिर मर जाते हैं। ये \"एक सौ वर्ष\" पृथ्वी की गणना के अनुसार कुल 31 खरब और 4 करोड़ पार्थिव वर्ष होते हैं। इन गणनाओं से ब्रह्मा का जीवन अद्भुत और अनन्त-सा प्रतीत होता है, किन्तु नित्यता के दृष्टिकोण से यह विद्युत् की कौंध के समान संक्षिप्त है। कारण-सागर में असंख्य ब्रह्मा अटलांटिक के बुलबुलों की भाँति उठते और विलीन होते रहते हैं। ब्रह्मा तथा उनकी सृष्टि सभी भौतिक ब्रह्माण्ड के अंग हैं, और इसलिए वे निरन्तर परिवर्तनशील हैं।\n\nभौतिक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा भी जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु की प्रक्रिया से मुक्त नहीं हैं। तथापि ब्रह्मा इस ब्रह्माण्ड के प्रबन्धन में साक्षात् परमेश्वर की सेवा में संलग्न रहते हैं; इसलिए वे तत्काल मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। उन्नत संन्यासी ब्रह्मा के विशेष लोक, ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं, जो भौतिक ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च लोक है और जो लोक-मण्डल के ऊपरी स्तरों में स्थित समस्त स्वर्गीय लोकों के बाद तक रहता है, किन्तु यथासमय ब्रह्मा तथा ब्रह्मलोक के समस्त निवासी भौतिक प्रकृति के नियम के अनुसार मृत्यु के अधीन हो जाते हैं। अतः चाहे हम लाखों और खरबों वर्ष भी जीवित रहें, हमें मरना ही पड़ता है। मृत्यु से बचा नहीं जा सकता। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सृष्टि और संहार की प्रक्रिया चलती रहती है, जैसा कि अगले श्लोक में वर्णित है:\n\navyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ\n\nprabhavanty ahar-āgame\n\nrātry-āgame pralīyante\n\ntatraivāvyakta-saṁjñake\n\n\"जब ब्रह्मा का दिन प्रकट होता है, तब यह जीव-समूह उत्पन्न होता है, और ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर वे सभी विलीन हो जाते हैं।\" (गीता 8.18)\n\nजब तक हम आध्यात्मिक आकाश में नहीं जाते, तब तक जन्म और मृत्यु, सृष्टि और संहार की इस प्रक्रिया से बचा नहीं जा सकता। जब ब्रह्मा के दिन समाप्त होते हैं, तब ये समस्त लोक-मण्डल जल से ढक जाते हैं, और जब ब्रह्मा पुनः जागते हैं, तब सृष्टि होती है। अहर् शब्द का अर्थ है \"दिन के समय\", जो ब्रह्मा के जीवन के बारह घण्टे हैं। इस समय में यह भौतिक प्रकटीकरण—ये समस्त लोक—दृष्टिगोचर होते हैं, किन्तु जब रात्रि आती है तब वे सभी जल में विलीन हो जाते हैं। अर्थात्, उनका संहार हो जाता है। रात्र्य्-आगमे शब्द का अर्थ है \"रात्रि के होने पर\"। इस समय में ये समस्त लोक अदृश्य रहते हैं, क्योंकि वे जल में डूबे रहते हैं। यह परिवर्तनशीलता ही भौतिक जगत् का स्वभाव है।\n\nbhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ\n\nbhūtvā bhūtvā pralīyate\n\nrātry-āgame 'vaśaḥ pārtha\n\nprabhavaty ahar-āgame\n\n\"हे पार्थ! बारम्बार दिन आता है, और यह जीव-समूह सक्रिय हो जाता है; और फिर रात्रि होती है, और वे विवश होकर विलीन हो जाते हैं।\" (गीता 8.19) यद्यपि हम प्रलय नहीं चाहते, तथापि प्रलय अनिवार्य है। रात्रि में सब कुछ जलमग्न हो जाता है, और जब दिन प्रकट होता है, तब धीरे-धीरे जल लुप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ, इसी एक लोक पर, धरातल का तीन-चौथाई भाग जल से ढका हुआ है। धीरे-धीरे भूमि उभर रही है, और वह दिन आएगा जब जल नहीं रहेगा, अपितु केवल भूमि होगी। यही प्रकृति की प्रक्रिया है।\n\nparas tasmāt tu bhāvo 'nyo\n\n'vyakto 'vyaktāt sanātanaḥ\n\nyaḥ sa sarveṣu bhūteṣu\n\nnaśyatsu na vinaśyati\n\n\"फिर भी एक अन्य प्रकृति है, जो नित्य है और इस व्यक्त तथा अव्यक्त पदार्थ से परे, दिव्य है। वह परम है और कभी संहार को प्राप्त नहीं होती। जब इस जगत् में सब कुछ संहार को प्राप्त हो जाता है, तब वह अंश ज्यों-का-त्यों बना रहता है।\" (गीता 8.20)\n\nहम इस ब्रह्माण्ड की लम्बाई और चौड़ाई की गणना नहीं कर सकते। इस भौतिक जगत् के भीतर इस जैसे लाखों-करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं, और इस भौतिक जगत् के ऊपर आध्यात्मिक आकाश है, जहाँ समस्त लोक नित्य हैं। उन लोकों पर जीवन भी नित्य है। यह भौतिक प्रकटीकरण सम्पूर्ण सृष्टि का केवल एक-चौथाई अंश है। एकांशेन स्थितो जगत्। एकांशेन का अर्थ है \"एक-चौथाई\"। सृष्टि के तीन-चौथाई भाग इस भौतिक आकाश से परे हैं, जो एक गेंद की भाँति ढका हुआ है। यह आवरण लाखों-करोड़ों मील तक फैला हुआ है, और उस आवरण को भेदने के पश्चात् ही कोई आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश कर सकता है। वह खुला आकाश है, नित्य आकाश है। इस श्लोक में कहा गया है, परस् तस्मात् तु भावो 'न्यः: [गीता 8.20] \"फिर भी एक अन्य प्रकृति है।\" भाव शब्द का अर्थ है एक अन्य \"प्रकृति\"। हमें केवल इस भौतिक प्रकृति का ही अनुभव है, किन्तु *भगवद्गीता* से हम यह समझते हैं कि एक आध्यात्मिक प्रकृति है, जो दिव्य और नित्य है। वस्तुतः हम उसी आध्यात्मिक प्रकृति के हैं, क्योंकि हम आत्मा हैं, किन्तु इस समय हम इस भौतिक शरीर से ढके हुए हैं, और इसलिए हम भौतिक और आध्यात्मिक का एक संयोग हैं। जिस प्रकार हम यह समझ सकते हैं कि हम दोनों प्रकृतियों का संयोग हैं, उसी प्रकार हमें यह भी समझना चाहिए कि इस भौतिक ब्रह्माण्ड से परे एक आध्यात्मिक जगत् है। आध्यात्मिक प्रकृति श्रेष्ठ कहलाती है, और भौतिक प्रकृति निम्न कहलाती है, क्योंकि आत्मा के बिना पदार्थ गति नहीं कर सकता।\n\nइसे प्रायोगिक ज्ञान से नहीं समझा जा सकता। हम दूरदर्शकों के द्वारा लाखों-करोड़ों तारों को देख सकते हैं, किन्तु जो हम देख रहे हैं, उसके निकट नहीं पहुँच सकते। इसी प्रकार, हमारी इन्द्रियाँ इतनी अपर्याप्त हैं कि हम आध्यात्मिक प्रकृति की समझ के निकट नहीं पहुँच सकते। असमर्थ होने के कारण, हमें ईश्वर और उनके राज्य को प्रायोगिक ज्ञान से समझने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। अपितु, हमें *भगवद्गीता* को सुनकर समझना है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है। यदि हम यह जानना चाहें कि हमारे पिता कौन हैं, तो हमें केवल अपनी माता पर विश्वास करना होता है। उनके अतिरिक्त हमारे पास जानने का कोई अन्य उपाय नहीं है। इसी प्रकार, यह समझने के लिए कि ईश्वर कौन हैं और उनकी प्रकृति क्या है, हमें *भगवद्गीता* में दी गई जानकारी को स्वीकार करना होता है। प्रयोग का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। एक बार जब हम कृष्णभावनामृत में उन्नत हो जाते हैं, तब हम ईश्वर और उनकी प्रकृति का साक्षात्कार करेंगे। हम यह समझने लगते हैं, \"हाँ, ईश्वर है और एक आध्यात्मिक राज्य है, और मुझे वहाँ जाना है। वस्तुतः, मुझे वहाँ जाने के लिए स्वयं को तैयार करना ही होगा।\"\n\nव्यक्त शब्द का अर्थ है \"प्रकट\"। यह भौतिक ब्रह्माण्ड, जिसे हम अपने समक्ष देख रहे हैं (अथवा आंशिक रूप से देख रहे हैं), प्रकट है। कम से कम रात्रि में हम देख सकते हैं कि तारे टिमटिमा रहे हैं और असंख्य लोक हैं। किन्तु इस व्यक्त से परे एक अन्य प्रकृति है, जो अव्यक्त कहलाती है, जो अप्रकट है। वही आध्यात्मिक प्रकृति है, जो सनातन, अर्थात् नित्य है। इस भौतिक प्रकृति का आदि और अन्त है, किन्तु उस आध्यात्मिक प्रकृति का न आदि है न अन्त। यह भौतिक आकाश महत्-तत्त्व, अर्थात् पदार्थ के आवरण के भीतर है। यह पदार्थ बादल के समान है। जब आँधी आती है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि समस्त आकाश बादलों से ढक गया है, किन्तु वास्तव में आकाश का एक अत्यन्त नगण्य भाग ही ढका होता है। क्योंकि हम बहुत सूक्ष्म हैं, यदि कुछ सौ मील ही ढक जाएँ, तो ऐसा प्रतीत होता है कि समस्त आकाश ढक गया है। ज्यों ही वायु आती है और बादलों को उड़ा देती है, हम पुनः आकाश को देख सकते हैं। बादलों की भाँति, इस महत्-तत्त्व रूपी आवरण का आदि और अन्त है। इसी प्रकार, भौतिक शरीर, भौतिक प्रकृति का अंश होने के कारण, आदि और अन्त वाला है। शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है, कुछ समय रहता है, कुछ उपोत्पाद छोड़ता है, क्षीण होता है, और फिर लुप्त हो जाता है। जो भी भौतिक प्रकटीकरण हम देखते हैं, वह इन छह मूल विकारों से गुज़रता है। जो भी वस्तु भौतिक प्रकृति के भीतर विद्यमान है, वह अन्ततः संहार को प्राप्त होगी। किन्तु यहाँ श्रीकृष्ण हमें बता रहे हैं कि इस विनश्वर, बादल-सदृश भौतिक प्रकृति से परे, एक श्रेष्ठ प्रकृति है, जो सनातन, अर्थात् नित्य है। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति। जब इस भौतिक प्रकटीकरण का संहार हो जाता है, तब वह आध्यात्मिक आकाश बना रहता है। यह अव्यक्तो 'व्यक्तात् कहलाता है।\n\n*श्रीमद्भागवत* के द्वितीय स्कन्ध में हमें आध्यात्मिक आकाश का तथा वहाँ निवास करने वाले लोगों का वर्णन मिलता है। वहाँ इसके स्वभाव और लक्षणों की भी चर्चा है। इस द्वितीय स्कन्ध से हम यह समझते हैं कि आध्यात्मिक आकाश में आध्यात्मिक विमान हैं, और वहाँ के जीव—जो सभी मुक्त हैं—उन विमानों पर सम्पूर्ण आध्यात्मिक आकाश में विद्युत् के समान यात्रा करते हैं। यह भौतिक जगत् मात्र एक अनुकृति है; जो भी हम यहाँ देखते हैं, वह वहाँ विद्यमान वस्तु की मात्र एक छाया है। यह भौतिक जगत् एक चलचित्र के समान है, जिसमें हम उस वास्तविक वस्तु की, जो विद्यमान है, मात्र एक अनुकृति अथवा छाया देखते हैं। यह भौतिक जगत् केवल एक छाया है। जैसा कि *श्रीमद्भागवत* (1.1.1) में कहा गया है, यत्र त्रि-सर्गो 'मृषा: \"यह माया-निर्मित भौतिक जगत् पदार्थ का एक संयोग है।\" दुकानों की खिड़कियों में हम प्रायः पुतले देखते हैं, किन्तु कोई भी विवेकशील मनुष्य यह नहीं सोचता कि ये पुतले वास्तविक हैं। वह देख सकता है कि वे अनुकृतियाँ हैं। इसी प्रकार, जो भी हम यहाँ देखते हैं, वह सुन्दर हो सकता है, ठीक जैसे एक पुतला सुन्दर हो सकता है, किन्तु वह आध्यात्मिक जगत् में पाई जाने वाली वास्तविक सुन्दरता की मात्र एक अनुकृति है। जैसा कि श्रीधर स्वामी कहते हैं, यत् सत्यतया मिथ्या-सर्गो 'पि सत्यवत् प्रतीयते: आध्यात्मिक जगत् वास्तविक है, और यह अवास्तविक भौतिक प्रकटीकरण केवल वास्तविक प्रतीत होता है। हमें यह समझना चाहिए कि वास्तविकता का कभी संहार नहीं होगा और सारतः वास्तविकता का अर्थ है नित्यता। इसलिए भौतिक सुख, जो क्षणिक है, वास्तविक नहीं है; वास्तविक सुख श्रीकृष्ण में विद्यमान है। फलस्वरूप, जो वास्तविकता के पीछे हैं, वे इस छाया-सुख में भाग नहीं लेते।\n\nइस प्रकार, जब भौतिक जगत् में सब कुछ संहार को प्राप्त हो जाता है, तब वह आध्यात्मिक प्रकृति नित्य बनी रहती है, और उस आध्यात्मिक आकाश तक पहुँचना ही मनुष्य-जीवन का प्रयोजन है। दुर्भाग्यवश, लोग आध्यात्मिक आकाश की वास्तविकता से अवगत नहीं हैं। *श्रीमद्भागवत* (7.5.31) के अनुसार, न ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुम्: लोग अपने स्वार्थ को नहीं जानते। वे यह नहीं जानते कि मनुष्य-जीवन आध्यात्मिक वास्तविकता को समझने और स्वयं को उस वास्तविकता में स्थानान्तरित होने हेतु तैयार करने के लिए है। यहाँ इस भौतिक जगत् में कोई भी नहीं रह सकता। समस्त वैदिक साहित्य हमें इसी प्रकार उपदेश देते हैं। तमसि मा ज्योतिर् गम: \"इस अन्धकार में मत रहो। प्रकाश की ओर जाओ।\" *भगवद्गीता* के पन्द्रहवें अध्याय (15.6) के अनुसार,\n\nna tad bhāsayate sūryo\n\nna śaśāṅko na pāvakaḥ\n\nyad gatvā na nivartante\n\ntad dhāma paramaṁ mama\n\n\"मेरा वह धाम न सूर्य से प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा से, न ही विद्युत् से। जो उसे प्राप्त कर लेता है, वह इस भौतिक जगत् में फिर कभी नहीं लौटता।\" यह भौतिक जगत् स्वभाव से अन्धकारमय है, और हम कृत्रिम रूप से इसे विद्युत्-प्रकाश, अग्नि इत्यादि से प्रकाशित कर रहे हैं। जो भी हो, इसका स्वभाव अन्धकारमय है, किन्तु आध्यात्मिक प्रकृति प्रकाश से परिपूर्ण है। जब सूर्य उपस्थित होता है, तब अन्धकार नहीं रहता; इसी प्रकार, आध्यात्मिक आकाश का प्रत्येक लोक स्वयं-प्रकाशित है। इसलिए वहाँ न अन्धकार है, न सूर्य, चन्द्रमा अथवा विद्युत् की आवश्यकता है। सूर्यो शब्द का अर्थ है \"सूर्य\", शशाङ्को का अर्थ है \"चन्द्रमा\", और पावकः का अर्थ है \"अग्नि\" अथवा \"विद्युत्\"। अतः आध्यात्मिक आकाश में प्रकाश हेतु इनकी आवश्यकता नहीं है। और पुनः, श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं, यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परमं मम: \"वही मेरा परम धाम है, और जो उसे प्राप्त कर लेता है, वह इस भौतिक जगत् में फिर कभी नहीं लौटता।\" यह *भगवद्गीता* में बारम्बार कहा गया है। पुनः, इसी आठवें अध्याय में (गीता 8.21),\n\navyakto 'kṣara ity uktas\n\ntam āhuḥ paramāṁ gatim\n\nyaṁ prāpya na nivartante\n\ntad dhāma paramaṁ mama\n\n\"वह परम धाम अव्यक्त और अक्षर कहलाता है, और वही परम गति है। जब कोई वहाँ जाता है, तब वह फिर कभी नहीं लौटता। वही मेरा परम धाम है।\" पुनः अव्यक्त शब्द का, जिसका अर्थ है \"अप्रकट\", प्रयोग होता है। अक्षर शब्द का अर्थ है \"वह जिसका कभी संहार नहीं होता\", अथवा \"वह जो अविनाशी है\"। इसका अर्थ यह है कि चूँकि परम धाम नित्य है, इसलिए वह पूर्व में वर्णित छह विकारों के अधीन नहीं है।\n\nक्योंकि इस समय हम भौतिक इन्द्रियों के वस्त्र से ढके हुए हैं, इसलिए हम आध्यात्मिक जगत् को नहीं देख सकते, और आध्यात्मिक प्रकृति हमारे लिए अचिन्त्य है। तथापि हम अनुभव कर सकते हैं कि कुछ आध्यात्मिक उपस्थित है। आध्यात्मिक प्रकृति से पूर्णतः अनभिज्ञ मनुष्य भी किसी-न-किसी प्रकार से उसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकता है। मनुष्य को केवल मौन रहकर अपने शरीर का विश्लेषण करना है: \"मैं क्या हूँ? क्या मैं यह उँगली हूँ? क्या मैं यह शरीर हूँ? क्या मैं ये केश हूँ? नहीं, मैं न यह हूँ, न वह हूँ। मैं इस शरीर से कुछ भिन्न हूँ। मैं इस शरीर से परे कुछ हूँ। वह क्या है? वही आध्यात्मिक है।\" इस प्रकार, हम इस पदार्थ के भीतर आध्यात्मिकता की उपस्थिति को अनुभव अथवा प्रतीत कर सकते हैं। जब कोई शरीर मृत हो जाता है, तब हम आत्मा की अनुपस्थिति को अनुभव कर सकते हैं। यदि हम किसी को मरते हुए देखें, तो हम अनुभव कर सकते हैं कि कुछ शरीर को छोड़ रहा है। यद्यपि हमारे पास उसे देखने की आँखें नहीं हैं, फिर भी वह कुछ आत्मा है। शरीर में उसकी उपस्थिति की व्याख्या *भगवद्गीता* (2.17) के आरम्भ में ही की गई है:\n\navināśi tu tad viddhi\n\nyena sarvam idaṁ tatam\n\nvināśam avyayasyāsya\n\nna kaścit kartum arhati\n\n\"जान लो कि जो सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है, वह अविनाशी है। उस अव्यय आत्मा का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।\"\n\nआध्यात्मिक अस्तित्व नित्य है, जबकि शरीर नित्य नहीं है। कहा जाता है कि आध्यात्मिक वायुमण्डल अव्यक्त, अर्थात् अप्रकट है। तब वह हमारे लिए प्रकट कैसे हो सकता है? अप्रकट को प्रकट करना ही कृष्णभावनामृत की यह प्रक्रिया है। *पद्म पुराण* के अनुसार,\n\nataḥ śrī-kṛṣṇa-nāmādi\n\nna bhaved grāhyam indriyaiḥ\n\nsevonmukhe hi jihvādau\n\nsvayam eva sphuraty adaḥ\n\n[भ.र.सि. 1.2.234]\n\n\"कोई भी श्रीकृष्ण को, जैसे वे हैं, स्थूल भौतिक इन्द्रियों से नहीं समझ सकता। किन्तु वे अपने भक्तों पर, उनके द्वारा अर्पित दिव्य प्रेममयी सेवा से प्रसन्न होकर, स्वयं को प्रकट करते हैं।\" इस श्लोक में इन्द्रियैः शब्द का अर्थ है \"इन्द्रियाँ\"। हमारे पास ज्ञान-संग्रह हेतु पाँच इन्द्रियाँ हैं (आँख, कान, नाक, जिह्वा, और त्वचा), और कर्म हेतु पाँच इन्द्रियाँ हैं (वाणी, हाथ, पैर, जननेन्द्रिय, और गुदा)। ये दस इन्द्रियाँ मन के नियन्त्रण में हैं। इस श्लोक में कहा गया है कि इन स्थूल भौतिक इन्द्रियों से हम श्रीकृष्ण के नाम, रूप इत्यादि को नहीं समझ सकते। ऐसा क्यों? श्रीकृष्ण पूर्णतः आध्यात्मिक हैं, और वे परम भी हैं। इसलिए उनका नाम, रूप, गुण, और साज-सामग्री भी आध्यात्मिक हैं। भौतिक बद्धता, अथवा भौतिक बन्धन के कारण, हम इस समय यह नहीं समझ सकते कि आध्यात्मिक क्या है, किन्तु यह अज्ञान हरे कृष्ण के जप से दूर किया जा सकता है। यदि कोई मनुष्य सो रहा है, तो उसे ध्वनि-कम्पन से जगाया जा सकता है। तुम उसे पुकार सकते हो, \"अरे, उठो, समय हो गया है!\" यद्यपि वह व्यक्ति अचेत है, फिर भी श्रवण इतना प्रमुख है कि एक सोते हुए मनुष्य को भी ध्वनि-कम्पन से जगाया जा सकता है। इसी प्रकार, इस भौतिक बद्धता से अभिभूत होकर हमारी आध्यात्मिक चेतना इस समय सो रही है, किन्तु इसे हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के इस दिव्य कम्पन से पुनर्जीवित किया जा सकता है। जैसा कि पहले कहा गया है, हरे भगवान् की ऊर्जा की ओर संकेत करता है, और कृष्ण तथा राम स्वयं भगवान् की ओर संकेत करते हैं। इसलिए, जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं, तब हम प्रार्थना करते हैं, \"हे भगवन्! हे भगवान् की ऊर्जे! कृपया मुझे स्वीकार कीजिए।\" \"कृपया मुझे स्वीकार कीजिए\" के अतिरिक्त हमारी कोई अन्य प्रार्थना नहीं है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने हमें सिखाया कि हमें केवल रोना और प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान् हमें स्वीकार करें। जैसा कि श्रीचैतन्य महाप्रभु ने स्वयं प्रार्थना की,\n\nayi nanda-tanuja kiṅkaraṁ\n\npatitaṁ māṁ viṣame bhavāmbudhau\n\nkṛpayā tava pāda-paṅkaja-\n\nsthita-dhūlī-sadṛśaṁ vicintaya\n\n\"हे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण! किसी-न-किसी प्रकार मैं अविद्या और अज्ञान के इस सागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया मुझे उठा लीजिए और अपने चरण-कमलों के एक अणु के रूप में स्थापित कर लीजिए।\" यदि कोई मनुष्य सागर में गिर पड़ा हो, तो उसके जीवित रहने की एकमात्र आशा यही है कि कोई आकर उसे उठा ले। तत्काल राहत अनुभव करने हेतु उसे केवल जल से एक इंच ऊपर उठाने की आवश्यकता है। इसी प्रकार, ज्यों ही हम कृष्णभावनामृत को ग्रहण करते हैं, हम उठा लिए जाते हैं, और हम तत्काल राहत अनुभव करते हैं।\n\nहम इस बात में सन्देह नहीं कर सकते कि दिव्य तत्त्व विद्यमान है। *भगवद्गीता* को साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने स्वयं कहा है; इसलिए हमें उनके वचन में सन्देह नहीं करना चाहिए। एकमात्र समस्या यह अनुभव करने और समझने की है कि वे हमें क्या बता रहे हैं। उस समझ को धीरे-धीरे विकसित करना होगा, और वह ज्ञान हरे कृष्ण के जप से प्रकट होगा। इस सरल प्रक्रिया के द्वारा, हम आध्यात्मिक राज्य, आत्मा, भौतिक जगत्, ईश्वर, अपनी बद्धता के स्वरूप, भौतिक बन्धन से मुक्ति, और अन्य सब कुछ समझने लगते हैं। यह चेतो-दर्पण-मार्जनम् [चै.च. अन्त्य 20.12] कहलाता है, अर्थात् अशुद्ध मन के धूल-भरे दर्पण को स्वच्छ करना।\n\nजो भी हो, हमें श्रीकृष्ण के वचन में श्रद्धा रखनी चाहिए। जब हम पैन अमेरिकन अथवा एयर इंडिया का टिकट खरीदते हैं, तब हमें यह श्रद्धा होती है कि वह कम्पनी हमें हमारे गन्तव्य तक पहुँचाएगी। श्रद्धा इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि वह कम्पनी अधिकृत है। हमारी श्रद्धा अन्धी नहीं होनी चाहिए; इसलिए हमें उसी को स्वीकार करना चाहिए जो मान्यता-प्राप्त हो। *भगवद्गीता* को भारत में हज़ारों वर्षों से अधिकृत शास्त्र के रूप में मान्यता मिली हुई है, और भारत के बाहर भी अनेक विद्वान्, धर्माचारी, और दार्शनिक हैं जिन्होंने *भगवद्गीता* को आधिकारिक रूप में स्वीकार किया है। कहा जाता है कि अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान् वैज्ञानिक भी नियमित रूप से *भगवद्गीता* पढ़ते थे। अतः हमें *भगवद्गीता* की प्रामाणिकता में सन्देह नहीं करना चाहिए।\n\nइसलिए जब भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक परम धाम है और हम वहाँ जा सकते हैं, तब हमें यह श्रद्धा होनी चाहिए कि ऐसा धाम विद्यमान है। अनेक दार्शनिक यह सोचते हैं कि आध्यात्मिक धाम निराकार अथवा शून्य है। शांकर तथा बौद्ध जैसे निर्विशेषवादी प्रायः शून्य अथवा रिक्तता की बात करते हैं, किन्तु *भगवद्गीता* हमें इस प्रकार निराश नहीं करती। शून्यवाद के दर्शन ने केवल नास्तिकता को जन्म दिया है, क्योंकि जीव का स्वभाव ही भोग की कामना करना है। ज्यों ही वह यह सोचता है कि उसका भविष्य शून्य है, वह इस भौतिक जीवन की विविधता का भोग करने का प्रयत्न करेगा। इस प्रकार निर्विशेषवाद आरामकुर्सी पर बैठकर की जाने वाली दार्शनिक चर्चाओं तथा भौतिक भोग के प्रति आसक्ति की ओर ले जाता है। हम कल्पना करने में आनन्द ले सकते हैं, किन्तु ऐसी कल्पना से कोई वास्तविक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं हो सकता।\n\nभक्तिः परेशानुभवो विरक्तिर् अन्यत्र च (भा. 11.2.42)। एक बार जब हम भक्ति-भाव विकसित कर लेते हैं, तब हम तत्काल सभी प्रकार के भौतिक भोग से विरक्त हो जाते हैं। ज्यों ही एक भूखा मनुष्य भोजन करता है, वह तत्काल सन्तोष अनुभव करता है और कहता है, \"नहीं, मुझे अब और नहीं चाहिए। मैं तृप्त हूँ।\" यह सन्तोष कृष्णभावनाभावित मनुष्य का एक लक्षण है।\n\nbrahma-bhūtaḥ prasannātmā\n\nna śocati na kāṅkṣati\n\nsamaḥ sarveṣu bhūteṣu\n\nmad-bhaktiṁ labhate parām\n\n\"जो इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित है, वह तत्काल परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह न तो कभी शोक करता है, न ही किसी वस्तु की कामना करता है; वह प्रत्येक जीव के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त कर लेता है।\" (गीता 18.54)\n\nज्यों ही कोई आध्यात्मिक रूप से साक्षात्कृत होता है, वह पूर्ण सन्तोष अनुभव करता है और चंचल भौतिक भोग के पीछे फिर लालायित नहीं होता। जैसा कि *भगवद्गीता* के द्वितीय अध्याय (2.59) में कहा गया है,\n\nviṣayā vinivartante\n\nnirāhārasya dehinaḥ\n\nrasa-varjaṁ raso 'py asya\n\nparaṁ dṛṣṭvā nivartate\n\n\"देहधारी आत्मा इन्द्रिय-भोग से तो विरत हो सकती है, यद्यपि विषयों के प्रति रुचि बनी रहती है। किन्तु एक उच्चतर रस का अनुभव करके ऐसे भोगों को त्यागकर वह चेतना में स्थिर हो जाती है।\" एक चिकित्सक किसी रोगी से कह सकता है, \"यह मत खाओ। वह मत खाओ। यौन-सम्भोग मत करो। मत करो। मत करो।\" इस प्रकार, एक रोगी को इतने सारे \"मत करो\" स्वीकार करने पर विवश किया जाता है, किन्तु भीतर वह सोचता रहता है, \"अरे, यदि मुझे ये वस्तुएँ मिल जाएँ, तो मैं सुखी हो जाऊँगा।\" इच्छाएँ भीतर बनी रहती हैं। तथापि, जब कोई कृष्णभावनामृत में स्थित हो जाता है, तब वह भीतर से इतना सबल होता है कि उसे इच्छा का अनुभव ही नहीं होता। यद्यपि वह नपुंसक नहीं है, फिर भी वह यौन-सम्भोग नहीं चाहता। वह तीन बार विवाह कर सकता है, फिर भी विरक्त रह सकता है। परं दृष्ट्वा निवर्तते। जब कोई श्रेष्ठ वस्तु प्राप्त हो जाती है, तब मनुष्य स्वाभाविक रूप से सभी निम्न वस्तुओं को त्याग देता है। जो श्रेष्ठ है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और नास्तिकता तथा निर्विशेषवाद हमें यह नहीं दे सकते। वे केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही प्राप्त होते हैं।\n\npuruṣaḥ sa paraḥ pārtha\n\nbhaktyā labhyas tv ananyayā\n\nyasyāntaḥ-sthāni bhūtāni\n\nyena sarvam idaṁ tatam\n\n\"पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो सबसे महान् हैं, अनन्य भक्ति के द्वारा प्राप्त होते हैं। यद्यपि वे अपने धाम में विद्यमान हैं, फिर भी वे सर्वव्यापी हैं, और सब कुछ उनके भीतर स्थित है।\" (गीता 8.22) पुरुषः स परः शब्द उस परम पुरुष की ओर संकेत करते हैं, जो अन्य सबसे महान् हैं। यह कोई शून्य नहीं बोल रहा, अपितु एक ऐसे पुरुष हैं जिनमें व्यक्तित्व के समस्त लक्षण पूर्ण रूप से विद्यमान हैं। जिस प्रकार हम आमने-सामने बात कर रहे हैं, उसी प्रकार जब हम परम धाम को प्राप्त करते हैं, तब हम ईश्वर से आमने-सामने बात कर सकते हैं। हम उनके साथ खेल सकते हैं, उनके साथ भोजन कर सकते हैं, और बहुत कुछ कर सकते हैं। यह अवस्था मानसिक कल्पना से नहीं, अपितु दिव्य प्रेममयी सेवा (भक्त्या लभ्यः) से प्राप्त होती है। तु अनन्यया शब्द यह संकेत करते हैं कि यह भक्ति मिलावट से रहित होनी चाहिए। यह अनन्य होनी चाहिए।\n\nयद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम एक पुरुष हैं और आध्यात्मिक आकाश में अपने धाम में विद्यमान हैं, फिर भी वे इतने व्यापक हैं कि सब कुछ उनके भीतर है। वे भीतर भी हैं और बाहर भी। यद्यपि ईश्वर सर्वत्र हैं, फिर भी उनका अपना राज्य, अपना धाम है। सूर्य भले ही अपने सूर्यप्रकाश से ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो, फिर भी सूर्य स्वयं एक पृथक् तत्त्व है।\n\nअपने परम धाम में परमेश्वर का कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। हम चाहे जहाँ भी हों, हमें एक प्रधान व्यक्ति मिलता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रधान व्यक्ति राष्ट्रपति है। किन्तु जब अगला चुनाव आएगा, तब राष्ट्रपति के इतने सारे प्रतिद्वन्द्वी होंगे, किन्तु आध्यात्मिक आकाश में परमेश्वर का कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। जो प्रतिद्वन्द्वी बनना चाहते हैं, उन्हें इस भौतिक जगत् में, भौतिक प्रकृति की अवस्थाओं के अधीन रखा जाता है। आध्यात्मिक आकाश में कोई प्रतिद्वन्द्विता नहीं है, और वहाँ के समस्त निवासी मुक्त आत्माएँ हैं। *श्रीमद्भागवत* से हमें यह जानकारी मिलती है कि उनके शारीरिक लक्षण देवताओं के समान हैं। कुछ आध्यात्मिक लोकों में ईश्वर एक द्विभुज रूप प्रकट करते हैं, और अन्य में वे एक चतुर्भुज रूप प्रकट करते हैं। उन लोकों के जीवों के तदनुरूप लक्षण होते हैं, और कोई यह नहीं पहचान सकता कि कौन ईश्वर हैं और कौन नहीं। यह सारूप्य-मुक्ति कहलाती है, जिसमें मनुष्य के लक्षण भगवान् के समान हो जाते हैं। मुक्ति पाँच प्रकार की होती है: सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य, सार्ष्टि, और सामीप्य। सायुज्य-मुक्ति का अर्थ है ईश्वर के निराकार तेज, अर्थात् ब्रह्मज्योति में लीन हो जाना। हमने इस पर चर्चा की है, और यह निष्कर्ष निकाला है कि लीन होकर अपने व्यक्तित्व को खो देने का प्रयास वांछनीय नहीं है और अत्यन्त जोखिमपूर्ण है। सारूप्य-मुक्ति का अर्थ है ठीक भगवान् के समान शरीर प्राप्त करना। सालोक्य-मुक्ति का अर्थ है ईश्वर के साथ उसी लोक में निवास करना। सार्ष्टि-मुक्ति का अर्थ है ईश्वर का-सा ऐश्वर्य प्राप्त करना। उदाहरणार्थ, ईश्वर अत्यन्त शक्तिशाली हैं, और हम उनके समान शक्तिशाली बन सकते हैं। यह सार्ष्टि कहलाती है। सामीप्य-मुक्ति का अर्थ है ईश्वर के एक पार्षद के रूप में सदैव उनके साथ रहना। उदाहरणार्थ, अर्जुन श्रीकृष्ण के मित्र के रूप में सदैव उनके साथ हैं, और यह सामीप्य-मुक्ति कहलाती है। हम इन पाँच प्रकार की मुक्तियों में से कोई एक प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु इन पाँच में से सायुज्य-मुक्ति, अर्थात् ब्रह्मज्योति में लीन होना, वैष्णव दर्शन के द्वारा अस्वीकृत है। वैष्णव दर्शन के अनुसार, हम ईश्वर की उपासना जैसे वे हैं वैसे ही करते हैं और उनकी सेवा करने हेतु अपनी पृथक् पहचान को नित्य बनाए रखते हैं। मायावाद दर्शन, अर्थात् निर्विशेषवाद के अनुसार, मनुष्य अपनी व्यक्तिगत पहचान को खोकर परम के अस्तित्व में लीन होने का प्रयत्न करता है। किन्तु वह एक आत्मघाती नीति है और श्रीकृष्ण द्वारा *भगवद्गीता* में इसकी अनुशंसा नहीं की गई है।\n\nइसे भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भी अस्वीकार किया है, जिन्होंने वियोग में उपासना का समर्थन किया। जैसा कि पहले कहा गया है, शुद्ध भक्त मुक्ति तक नहीं चाहता; वह केवल यही माँगता है कि वह जन्म-जन्मान्तर श्रीकृष्ण का भक्त बना रहे। यह भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु की प्रार्थना है, और \"जन्म-जन्मान्तर\" शब्द यह संकेत करते हैं कि कोई मुक्ति नहीं है। इसका अर्थ है कि भक्त को इसकी चिन्ता नहीं कि वह मुक्त है अथवा नहीं। वह केवल कृष्णभावनामृत में संलग्न रहना, परमेश्वर की सेवा करना चाहता है। ईश्वर की दिव्य प्रेममयी सेवा में सदैव संलग्न रहने की इच्छा ही शुद्ध भक्ति का लक्षण है। निःसन्देह, भक्त चाहे कहीं भी हो, वह आध्यात्मिक राज्य में ही रहता है, भले ही भौतिक शरीर में हो। अपनी ओर से, वह पाँच प्रकार की मुक्तियों में से कोई भी नहीं माँगता, न ही अपनी व्यक्तिगत श्रेष्ठता अथवा सुख-सुविधा के लिए कुछ माँगता है। किन्तु आध्यात्मिक लोकों में ईश्वर के साथ संग करने हेतु मनुष्य को उनका शुद्ध भक्त बनना ही होगा।\n\nजो शुद्ध भक्त नहीं हैं, उनके लिए भगवान् श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि मुक्ति प्राप्त करने हेतु मनुष्य को किन समयों पर शरीर त्यागना चाहिए।\n\nyatra kāle tv anāvṛttim\n\nāvṛttiṁ caiva yoginaḥ\n\nprayātā yānti taṁ kālaṁ\n\nvakṣyāmi bharatarṣabha\n\n\"हे भरतश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें उन विभिन्न समयों के विषय में बताऊँगा, जिनमें इस जगत् से प्रयाण करते हुए मनुष्य लौटता है अथवा नहीं लौटता।\" (गीता 8.23) भारत में, पश्चिम के विपरीत, ज्योतिषियों का जन्म के क्षण की खगोलीय स्थिति की सूक्ष्म गणनाएँ करना सामान्य बात है। वस्तुतः, किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली केवल जन्म के समय ही नहीं, अपितु मृत्यु के समय भी पढ़ी जाती है, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि अगले जीवन में उसकी स्थिति क्या होगी। यह सब ज्योतिषीय गणना से निर्धारित किया जा सकता है। इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण उन ज्योतिषीय सिद्धान्तों को स्वीकार कर रहे हैं, यह पुष्टि करते हुए कि यदि कोई एक विशेष समय पर अपना शरीर त्यागता है, तो वह मुक्ति प्राप्त कर सकता है। यदि कोई एक क्षण पर मरता है, तो वह मुक्त हो सकता है, अथवा यदि वह किसी अन्य क्षण पर मरता है, तो उसे भौतिक जगत् में लौटना पड़ सकता है। यह सब \"संयोग\" का प्रश्न है, किन्तु वह संयोग किसी-न-किसी प्रकार वही है जो मनुष्य के पास होता है। किन्तु भक्त के लिए संयोग का कोई प्रश्न नहीं उठता। ज्योतिषीय स्थिति चाहे जो भी हो, कृष्णभावनामृत में स्थित भक्त को मुक्ति का आश्वासन है। अन्यों के लिए, ऐसी सम्भावनाएँ हैं कि यदि वे एक विशेष क्षण पर अपना शरीर त्यागें, तो वे मुक्ति प्राप्त कर आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, अथवा उनका पुनर्जन्म हो सकता है।\n\nagnir jyotir ahaḥ śuklaḥ\n\nṣaṇ-māsā uttarāyaṇam\n\ntatra prayātā gacchanti\n\nbrahma brahma-vido janāḥ\n\n\"जो परब्रह्म को जानते हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव में, प्रकाश में, एक शुभ क्षण पर, चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष में, और उन छह मासों में जगत् से प्रयाण करते हैं, जब सूर्य उत्तर की ओर यात्रा करता है।\" (गीता 8.24) जैसा कि हम सब जानते हैं, सूर्य की गतियाँ भिन्न-भिन्न हैं: छह मास वह विषुवत् रेखा के उत्तर में रहता है, और छह मास वह दक्षिण में रहता है। वैदिक गणनाओं के अनुसार सूर्य भी गतिमान है, और *श्रीमद्भागवत* से हमें यह जानकारी मिलती है कि सूर्य ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है। जिस प्रकार सभी लोक गतिमान हैं, उसी प्रकार सूर्य भी प्रति सेकण्ड सोलह हज़ार मील की गणना की गई गति से गतिमान है। यदि कोई व्यक्ति तब मरता है जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध में हो, तो वह मुक्ति प्राप्त कर सकता है। यह न केवल *भगवद्गीता* का निर्णय है, अपितु अन्य शास्त्रों का भी है।\n\ndhūmo rātris tathā kṛṣṇaḥ\n\nṣaṇ-māsā dakṣiṇāyanam\n\ntatra cāndramasaṁ jyotir\n\nyogī prāpya nivartate\n\n\"जो योगी इस जगत् से धूम के समय, रात्रि के समय, अमावस्या के पक्ष में, अथवा उन छह मासों में प्रयाण करता है जब सूर्य दक्षिण की ओर जाता है, अथवा जो चन्द्रलोक को प्राप्त करता है, वह फिर लौट आता है।\" (गीता 8.25) कोई यह नहीं कह सकता कि वह कब मरने वाला है, और उस अर्थ में मनुष्य की मृत्यु का क्षण आकस्मिक है। किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित भक्त के लिए \"आकस्मिकताओं\" का कोई प्रश्न नहीं उठता।\n\nśukla-kṛṣṇe gatī hy ete\n\njagataḥ śāśvate mate\n\nekayā yāty anāvṛttim\n\nanyayāvartate punaḥ\n\n\"*वेदों* के अनुसार, इस जगत् से प्रयाण करने के दो मार्ग हैं—एक प्रकाश में और एक अन्धकार में। जब कोई प्रकाश में प्रयाण करता है, तब वह नहीं लौटता; किन्तु जब कोई अन्धकार में प्रयाण करता है, तब वह लौट आता है।\" (गीता 8.26) प्रयाण और प्रत्यागमन का यही वर्णन आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने छान्दोग्य उपनिषद् से उद्धृत किया है। इस प्रकार, जो सकाम कर्मी और दार्शनिक कल्पनावादी हैं, वे अनादि काल से निरन्तर आ-जा रहे हैं। वस्तुतः वे परम मोक्ष को प्राप्त नहीं करते, क्योंकि वे श्रीकृष्ण की शरण नहीं लेते।\n\nnaite sṛtī pārtha jānan\n\nyogī muhyati kaścana\n\ntasmāt sarveṣu kāleṣu\n\nyoga-yukto bhavārjuna\n\n\"हे अर्जुन! जो भक्त इन दोनों मार्गों को जानते हैं, वे कभी मोहित नहीं होते। इसलिए सदैव भक्ति में स्थिर रहो।\" (गीता 8.27) यहाँ भगवान् पुष्टि करते हैं कि जो भक्तियोग का अभ्यास करता है, उसके लिए \"संयोग\" का कोई प्रश्न नहीं है। उसका गन्तव्य निश्चित है। वह तब मरता है जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध में हो अथवा दक्षिणी गोलार्ध में, इसका कोई महत्त्व नहीं। जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं, यदि कोई मृत्यु के समय श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, तो वह तत्काल श्रीकृष्ण के धाम में स्थानान्तरित हो जाएगा। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सदैव कृष्णभावनामृत में स्थित रहो। यह हरे कृष्ण के जप के द्वारा सम्भव है। चूँकि श्रीकृष्ण और उनका आध्यात्मिक राज्य अभिन्न हैं, परम होने के कारण, इसलिए श्रीकृष्ण और उनका ध्वनि-कम्पन एक ही हैं। केवल श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन करके हम श्रीकृष्ण के संग का आनन्द ले सकते हैं। यदि हम मार्ग पर चलते हुए हरे कृष्ण का जप कर रहे हैं, तो श्रीकृष्ण भी हमारे साथ चल रहे हैं। यदि हम मार्ग पर चलें और आकाश की ओर देखें, तो हम देख सकते हैं कि सूर्य अथवा चन्द्रमा हमारे साथ चल रहा है। मुझे लगभग पचास वर्ष पूर्व का स्मरण है, जब मैं एक गृहस्थ था, मेरा दूसरा पुत्र, जो उस समय लगभग चार वर्ष का था, मेरे साथ मार्ग पर चल रहा था, और उसने अचानक मुझसे पूछा, \"पिताजी, चन्द्रमा हमारे साथ क्यों चल रहा है?\"\n\nयदि चन्द्रमा जैसी एक भौतिक वस्तु में हमारे साथ चलने की शक्ति है, तो हम निश्चय ही यह समझ सकते हैं कि परमेश्वर, जो सर्वशक्तिमान् हैं, सदैव हमारे साथ रह सकते हैं। सर्वशक्तिमान् होने के कारण, वे सदैव हमारा साथ दे सकते हैं, बशर्ते कि हम भी उनका साथ देने के योग्य हों। शुद्ध भक्त सदैव श्रीकृष्ण के चिन्तन में लीन रहते हैं और सदैव यह स्मरण रखते हैं कि श्रीकृष्ण उनके साथ हैं। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक (श्लोक 2) में श्रीकृष्ण के परम स्वरूप की पुष्टि की है:\n\nnāmnām akāri bahudhā nija-sarva-śaktis\n\ntatrārpitā niyamitaḥ smaraṇe na kālaḥ\n\netādṛśī tava kṛpā bhagavan mamāpi\n\ndurdaivam īdṛśam ihājani nānurāgaḥ\n\n\"हे मेरे प्रभु! हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्! आपके पवित्र नाम में जीव के लिए समस्त सौभाग्य है, और इसलिए आपके अनेक नाम हैं, जैसे कृष्ण और गोविन्द, जिनके द्वारा आप स्वयं को विस्तारित करते हैं। आपने अपनी समस्त शक्तियाँ उन नामों में निवेशित कर दी हैं, और उनके स्मरण के लिए कोई कठोर नियम नहीं हैं। हे प्रिय प्रभु! यद्यपि आप पतित, बद्ध आत्माओं पर अपने पवित्र नामों को उदारतापूर्वक सिखाकर ऐसी कृपा करते हैं, फिर भी मैं इतना अभागा हूँ कि पवित्र नाम का जप करते समय अपराध करता हूँ, और इसलिए मैं जप के प्रति अनुराग प्राप्त नहीं कर पाता।\"\n\nहम बहुत-सा धन व्यय करने का प्रयत्न कर सकते हैं और श्रीकृष्ण के लिए एक मन्दिर बनाने अथवा स्थापित करने का प्रयास कर सकते हैं, किन्तु यदि हम ऐसा करते हैं तो हमें अनेक नियमों और विधियों का पालन करना होगा और मन्दिर के प्रबन्धन की समुचित देखभाल करनी होगी। किन्तु यहाँ इसकी पुष्टि की गई है कि केवल जप करने से ही कोई भी मनुष्य श्रीकृष्ण के संग का लाभ प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण के साथ उसी रथ पर रहकर लाभ उठा रहे हैं, उसी प्रकार हम भी श्रीकृष्ण के पवित्र नामों के जप के द्वारा उनके संग से लाभ उठा सकते हैं—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। यह महामन्त्र मेरी व्यक्तिगत कल्पना नहीं है, अपितु भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु द्वारा अधिकृत है, जिन्हें न केवल एक अधिकारी, अपितु साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। यह भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ही थे जिन्होंने कहा, \"हे भगवन्! आप इस भौतिक जगत् के लोगों पर इतने दयालु हैं कि आप अपने पवित्र नाम में स्वयं को विस्तारित करते हैं, ताकि वे आपके साथ संग कर सकें।\"\n\nयद्यपि महामन्त्र संस्कृत भाषा में है और बहुत-से लोग इसका अर्थ नहीं जानते, फिर भी यह इतना आकर्षक है कि जब इसका सार्वजनिक रूप से कीर्तन होता है, तब लोग उसमें भाग लेते हैं। महामन्त्र का जप करते समय हम पूर्णतः सुरक्षित रहते हैं, इस अत्यन्त संकटपूर्ण स्थिति में भी। हमें सदैव यह सचेत रहना चाहिए कि इस भौतिक जगत् में हम सदैव एक संकटपूर्ण स्थिति में हैं। *श्रीमद्भागवत* पुष्टि करता है: पदं पदं यद् विपदां न तेषाम्। इस जगत् में पग-पग पर संकट है। किन्तु भगवान् के भक्त इस दुःखमय, संकटपूर्ण स्थान में रहने के लिए नहीं हैं। इसलिए हमें इस मनुष्य-योनि में रहते हुए कृष्णभावनामृत में उन्नति करने का यत्न करना चाहिए। तब हमारा सुख सुनिश्चित है।"}
